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	<title>web-panjab-kesari &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/web-panjab-kesari/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "web-panjab-kesari"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 13:29:44 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[जो समझ में आया वही लिख दिया-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 15:21:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</guid>
<description><![CDATA[मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेखक श्री समीर लाल वाकई हिंदी ब्लाग जगत के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। वह मेरे ब्लागों पर सबसे अधिक टिप्पणी रखने वाले व्यक्ति हैं और मैं हृदय में उनके प्रति आत्मीयता का भाव रखता हूं पर उसका प्रदर्शन करना मुझे ठीक नहीं लगता। उनकी टिप्पणियां आमतौर से संक्षिप्त और औपचारिक  होती हैं पर उससे अपने अंदर एक प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। मैं यह लेख उनकी प्रशंसा या समीक्षा के लिये नहीं लिख रहा हूं बल्कि कल उनकी टिप्पणी में जिस तरह दूसरे ब्लाग और टिप्पणियां लिखने के लिये अभियान चलाने की बात कही है उसी परिप्रेक्ष्य में मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये जो शायद अलग प्रतीत हों पर  उनको रखना जरूरी समझता हूं। </p>
<p>श्री समीरलाल जी ने हिंदी में ब्लाग बढ़ाने तथा उन पर टिप्पणियां लिखने  की बात कहीं है वह मेरे अभियान का एक भाग है पर मैं हिंदी ब्लाग जगत लिये पाठक जुटाने के अभियान को भी कम वरीयता नहीं देता।  हिंदी ब्लाग में निराशाजनक स्थिति को मैं भी अनुभव करता हूं पर इसके लिये पाठकों की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अंतर्जाल  हिंदी ब्लाग के लिये पाठकों की संख्या नगण्य है। इसलिये अनेक ब्लाग लेखक केवल हिंदी के ब्लाग सभी एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटरों पर हिंट पाने के लिये लिखते हैं और वहां साहित्य सृजन जैसा वातावरण अभी नहीं बन पाया है। अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में यह बात लिख चुके हैं कि वह लिखने तो आये थे साहित्य और यहां अब कुछ अन्य लिख रहे हैं। मैं उनका लिखा पढ़कर यह बात मानता भी हूं कि वह वाकई साहित्य लिखते होंगे। देव और कृतिदेव फोंट में टाईप करने वाले अनेक लेखक यूनिकोड में लिखते हुए ब्लाग पर आये तो स्वयं मूल स्वरूप खो बैठे जिनमें मैं भी स्वयं भी शामिल हूं। अब देव और कृतिदेव को यूनिकोड मेंे बदलने वाला टूल आया है तब अनेक लोग खुश हुए क्योंकि उनको लगा कि वह अब पहले से अच्छे परिणाम निकाल सकते हैं। आज इतना बड़ा लेख लिखने का साहस मेरे अंदर केवल इसीलिये आया क्योंकि  सीधे कृतिदेव में लिख रहा हूं और यह टूल आये अभी अधिक वक्त नहीं हुआ। ऐसे में मुझे विश्वास है कि आगे और ब्लाग लेखक बेहतर लिखकर लेखक जुटाने का प्रयास करेंगे। इस समय जो हिंदी ब्लाग जगत पर लिखा जा रहा है उस पर दृष्टिपात किये बिना हम अगर किसी अभियान पर निकलेंगे तो शायद वहीं होंगे जहां अभी हैं। </p>
<p>शुरूआती दिनों में मैंने भी एग्रेगेटरों पर हिट पाने के लिये ऐसी पोस्टें लिखीं पर मुझे ध्यान आया कि एक लेखक के लिये अपने पाठकों की संख्या बढ़ाने वाले  व्यापक आधार वाले विषयों पर लिखना आवश्यक है। मैने हास्य कविताएं, आलेख, हास्य व्यंग्य, कहानियां, लघु कथाएं बहुत कठिनाई से यूनिकोड में लिखीं पर एग्रीगेटरों पर उनके हिट ने मुझे निराश किया।  फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा यह सोचकर कि देखा जायेगा कि आगे क्या होता है? ब्लाग लेखक साथी हो सकते हैं पाठक नहीं यह बात मुझे अपने बढ़ते पाठक देखकर बहुत बाद में समझ आयी। तब मैंने तय किया कि अब आम पाठक को लक्ष्य कर लिखना चाहिए। फिर यह भी देखा कि मेरे ब्लाग पर आने वाला पाठक अन्य ब्लाग भी देखे ताकि वह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के ब्लागों से परिचित हो सके इसलिये मैंने दूसरे ब्लाग लेखकों के भी ब्लाग लिंक किये ताकि अगर पाठक मुझसे  असंतुष्ट हो तो वह दूसरे का ब्लाग लेखकों  का लिखा पढ़कर वह यह समझ सके कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने वाले भी कम नहीं है। यह मैने बहुत देर से किया फिर भी मेरे ब्लाग दूसरे ब्लागों  पर पाठक भेजते हैं। यह मैं बीस हजार की पाठक संख्या पार करने वाले ब्लाग की सूचनाओं में बता चुका हूं। उसमें यह भी बता चुका हूं कि किस तरह लोग जहां हास्य की सामग्री देखते ही  झपट पड़ते हैं। उसमें ‘हंसते रहो’ और ‘ठहाका’ ब्लाग को अधिक संख्या में मेरे ब्लाग से पाठक मिलना इसी बात का प्रमाण हैं। मेरे  ब्लाग से उड़न तश्तरी ब्लाग पर  भी पाठक जाते हैं और श्रीसमीरलाल जी के पास कोई काउंटर हो तो वह इसे देख सकते हैं। मैं श्रीसमीरलाल को बहुत पसंद करता हूं पर मेरे अज्ञात पाठक मेरी इस राय को नहीं जानते इसलिये उड़न तश्तरी के बाद लिंक किये गये ब्लागों पर अधिक गये-केवल इसलिये ही न कि  उसका नाम वहां किसी हास्य सामग्री होने का संदेश नहीं देता।<br />
केवल  नये ब्लाग बनवाने और टिप्पणियां लिखने से हिंदी ब्लाग जगत के लाभ की मैं संभावना नहीं देखता। सबसे बड़ी बात यह है कि विषय भी आम पाठक से सरोकार रखने वाला होना चाहिए। इस हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो हमेशा ही कमेंट देते हैं और कुछ ब्लाग लेखक जब कोई जोरदार विषय होता है तो इस बात की परवाह नहीं करते कि मैंने उनको कभी टिप्पणी दी कि नहीं वह लिख जाते हैं।<br />
श्री समीरलाल जी अकेले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो ब्लाग से हटकर लिखे गये विषयों पर भी बहुत सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं पर इसका श्रेय उनके मधुर व्यवहार को जाता  है और टिप्पणियां तो इतनी करते हैं कि मैं भी सोचता हूं कि  यह व्यक्ति अगर ऐसा न करे तो मैं लिखूंगा कि नहीं। वह बहुत अच्छा लिखते हैं पर इतनी सारी हिट दिलाने के लिये यह अकेला कारण नहीं है। </p>
<p>        इस अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक लंबे समय तक  लिखना चाहते हैं उनको सोचना अंतर्मुखी होगा पर लिखना बहिर्मुखी होगा। मेरे दिमाग में कुछ विचार हैं जो इस प्रकार हैं।</p>
<p>(1) अपने ब्लाग पर दूसरे के ब्लाग को भी लिंक दे। अकेले सफलता पाने का का विचार त्याग दें। कोई हमारा मित्र है या नियमित रूप से टिप्पणी करने वाला ब्लाग लेखक  तो लिंक दें अच्छी बात है पर यह भी देखें कि क्या कोई ऐसे ब्लाग लेखक भी हैं जो आपको कमेंट नहीं देते पर उनकी सामग्री पठनीय है तो उसे भी लिंक दें। हो सकता है उसकी वजह से  आपका ब्लाग पढ़ने आम पाठक आये क्योंकि वह सोचेगा कि यह आपके ब्लाग में लगा ब्लाग है वह ऊपर उसका पता थोड़े ही देखता है। मेरे मित्र उड़न तश्तरी और ममता श्रीवास्तव को पढ़ते हैं पर वह जाते मेरे ही ब्लाग से ही हैं-उनके ब्लाग का कोई अपने कंप्यूटर पर पता नहीं रखता।  हो सकता है कोई ऐसे भी लोग हैं जो मेरे ब्लाग पर इसलिये आते हों कि किसी दूसरे ब्लाग लेखक का ब्लाग मेरे ब्लाग से चिपका समझते होंं। जब तक नारद अभिव्यक्ति  पत्रिका से लिंक था मैं वहीं से उस पर जाता था-हो सकता है कि कुछ पाठक मेरे जैसे ही हों। अगर कोई अच्छा लिखने वाला ब्लाग लेखक है तो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका ब्लाग लिंक करें। इसके लिये आपको सभी ब्लाग पढ़ना पढ़ेंगे।<br />
(2)ब्लाग लेखकों को ऐसे विषयों पर ही ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक हों। अगर कोई समाचार दे रहें हैं तो उसके साथ एक संपादक के रूप में भी विचार व्यक्त करें। याद रखिये जो आम पाठक यहां आते हैं वह उस ब्लाग लेखक की मौलिकता देखना चाहते हैं। महापुरुषों के संदेश लिखने वाली पोस्टों पर अनेक लोगों ने टिप्पणी लिखी थी कि अगर आप इनके साथ अपने विचार रखते तो बहुत अच्छा होता।<br />
(3)अपनी पोस्ट के साथ अधिकतम श्रेणियां रखें। कभी-कभी अंग्रेजी में भी टिप्पणियां रखें। हमारा  ब्लाग अंग्रेजी वालें भी पढ़ें यह तो चाहते हैं पर इस बात का ध्यान नहीं रखते कि अंग्रेजी वाले वहां कैसे आयेंगे। इसके अलावा अंग्रेजी शब्दों से भी हिंदी पाठक ब्लाग पर आते हैं<br />
(4)आलेख, निबंध, कविता, हास्य कविता, व्यंग्य और कहानी जैसे शब्द शीर्षक में लिख दें तो बढिया। मेरी वही हास्य कविताएं लोग पढ़ रहे हैं जिन पर मैंने ऊपर ही लिख दिया है।<br />
मैं जैसा हूं सबके सामने हैं। एग्रीगेटरों पर मैं हिट नहीं पाता यह सच है पर मुझे लगता है कि आम पाठकों का कुछ रुझान मेरी तरफ है। आम पाठकों की बात तो मैं ही लिखता हूं बाकी तो कोई नहीं बताता कि उसकी तरफ कैसा रुझान है? यह सबसे महत्वपूर्ण है। एग्रीगेटरों पर अनेक ब्लाग लेखकों से मित्रता मेरे लिए एक बोनस है क्योंकि मेरा मुख्य लक्ष्य पाठकों तक पहुंचना है। अभी सफलता दूर है पर मैंने भी ऐसा क्या लिख दिया है कि उछलता फिरूं। सच तो यह है कि कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिलने के बाद तो मैंने सहज भाव से लिखना शुरू किया है और मैं जानता हूं कि यह सफलता अकेले चलने से नहीं मिलेगी इसलिये चाहता हूं कि अन्य ब्लाग लेखक भारी सफलता पायेंगे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आयेगी। आखिरी बात यह है कि मैं कोई सिद्ध व्यक्ति नहीं हूं जो यह कहूं कि जो मैने लिखा है वही सही है। जो अनुभव किया वही लिख रहा हूं और हो सकता है कई इससे सहमत न हों और इसकी संभावना रहेगी भी क्योंकि ब्लागवाणी के हिट इस बात का प्रमाण है कि मेरे हाथ से कोई हिट पोस्ट नहीं निकली। वैसे भी मैं अपने कंप्यूटर की समस्याओं से एक महीने से परेशान हूँ और इधर कही बिजली तो कभी आंधी मेरी पोस्ट को रोक देती हैं।शेष फिर कभी	</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी-अंग्रेजी टूल बहुत दिलचस्प लगा-आलेख (2)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:44:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=519</guid>
<description><![CDATA[हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी -अंग्रेजी अनुवाद  टूल का मैं कल से उपयोग कर रहा देख रहा हूं तो उसमें सुखद आश्चर्य का  अनुभव हो रहा है। प्रथम तो यह कि यदि शुद्ध हिंदी भाषा को लिखेंगे तो ही वह स्वीकार करेगा। कहीं पाठ को लिखने के दौरान उर्दू या इंग्लिश शब्द का उपयोग किया तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। जैसे भावनाओं को जजबात नहीं लिख सकते। धर्म को मजहब नहीं लिख सकते । भ्रम को गलतफहमी लिखेंगे तो वह कोई नहीं पढ़ पायेगा। अगर कोई हिंदी शब्द लिखने में गलती कर जाते हैं तो अंग्रेजी में अनुवाद करने वाला टूल उसे अनुवाद करने की बजाय वैसे का वैसे ही प्रस्तुत कर देता है। </p>
<p>मै अंग्रेजी में अनुवाद से पहले अपनी देवनागरी भाषा  में पाठ लिखने के बाद उसे यूनिकोड टूल में ले जाता हूं फिर उसे अनुवाद टूल में रखता हूं और जब उसमें कोई लिख गया शब्द नहीं बदला होता है तो उसे पहले अपने मूल पाठ में सही करता हूं। एक से अधिक शब्द होने पर सभी शब्दों को पुनः लिखने के बाद फिर उसे यूनिकोड में बदलने वाले टूल पर लाता हूं वहां से फिर अनुवाद वाले टूल पर कर देखता पड़ता है कि सही हुआ कि नहीं। बहरहाल अब यह तो इग्लिश में पढ़ने वाले ही तय करेंगे कि उसका परिणाम कैसा है पर एक बात निश्चित है कि वह अगर ऐसे टूलों से ही हिंदी पढ़ने वाले हैं तो उसके लिये मेरे द्वारा किये गये थोड़े प्रयास भी मेरे द्वारा रचित पाठ को अधिक पढ़ने योग्य बना देंगे बनिस्बत अन्य हिंदी ब्लाग के उन पाठों  के जो इस अनुवाद वाले टूल पर परीक्षण करके नहीं रखे गये। कल कुछ ब्लागर लिख रहे थे कि इसमें कुछ कमियां है और इसका उपाय यह है कि जो ब्लागर चाहते हैं तो उनके सामने दो रास्ते हैं कि वह अपने पाठ का इस अनुवाद टूल पर परीक्षण कर देखें कि उसमें पूरे शब्द अंग्रेजी में आ रहे हैं कि नहीं, जो नहीं आ रहे उनमें परिवर्तन कर फिर देखें और अपनी पोस्ट रखें दूसरा यह कि  छोड़ दे पढ़ने के इच्छुक पाठक के लिये जो इस टूल से वैसा ही पढ़ेगा जैसा कि अपने रखा है पर उसके लिये उसे यह टूल लाना पड़ेगा। ऐसे में वह शायद जहमत न उठाये तो आपने अगर अपना पाठ अंग्रेजी में रखा है तो वह पढ़ ही लेगा।</p>
<p>मैने कुछ पोस्टों पर प्रयोग किया और पाया कि वैसी भाषा किसी के लिये नहीं हो सकती जिसका वह पाठक है पर भाव तो समझा ही जा सकता है। मैंने आज कुछ इंग्लिश ब्लाॅगरों की पोस्ट को हिंदी में पढ़ा। उसमें बहुत दिक्कत है पर अंग्रेजी और हिंदी दोनों के पाठ मेरे सामने थे तो भाव और अर्थ मैंने एकदम समझ लिया। मैं यह कह सकता हूं कि मैंने आज जो इंग्लिश ब्लाग देखे वह पूरी तरह पढ़े और समझे हैं। उनकी विषय वस्तु पूरी तरह वैसे ही मेरे समझ में आयी जैसा उसका लेखक चाहता था। थोड़ी मेहनत हुई पर जिस तरफ विश्व का ब्लाग जगत बढ़ रहा है उसकी दृष्टि से वह कोई अधिक नहीं थी। इंग्लिश-हिंदी अनुवाद टूल का मतलब यह है कि आप दुनियां की पंद्रह भाषाओं में घुसपैठ कर सकते हैं और जब ऐसा करेंगे तो दूसरी भाषा के ब्लागर भी ऐसा ही करेंगे। भले ही अनुवाद के पाठ ऐसे नहीं आ रहे जैसे अपेक्षित हैं पर वह इतने बुरे नहीं है कि संवाद कायम करने के लिये काफी न हों। समय की कमी के कारण कुछ लोग इस पर अधिक काम न करें पर जिनके पास समय है वह पूरी दुनियां में अनेक भाषाओं में अपने मित्र बनायेंगे। क्या यह आश्चर्य नहीं होगा कि जब कोई चीनी अपनी हमारी पोस्ट को अपनी भाषा में पढ़ने का प्रयास करेगा।<br />
              हालांकि मैंने अपनी कुछ पोस्टों का अंग्रेजी अनुवाद कर उसे ब्लाग पर प्रस्तुत किया है पर हमेशा ऐसा नहीं करूंगा पर यह तय है कि उनको लिखने के बाद इंग्लिश अनुवाद टूल पर परीक्षण कर उसे इस लायक तो बनाऊंगा कि उसे कोई अहिंदी भाषी पढ़ना चाहे तो उसे दिक्कत न आये। इसके अलावा इंग्लिश ब्लाग भी पढ़ता रहूंगा ताकि उसे जानकारियां मिल सकें। आज तीन ब्लाग पढ़कर यह समझ में आ गया कि जितनी अंग्रेजी सीखी है वह पर्याप्त है।</p>
<p><strong>it translashan by google tool</strong><br />
<strong>Hindi - English tool seemed very interesting - Article (2)</strong></p>
<p>Hindi - English translation tool use from tomorrow I am going to see if there is a feeling of pleasant surprise. First, the Hindi language to write the net if he will accept. During much of the text to write English or Urdu word used, it will not accept it. Such as feelings jajbat can not write. religion to religion can not write. Write to the confusion, misunderstanding that no one will read. If a mistake in writing the Hindi word to the English are translated into a tool to translate it so instead of just presenting them out. </p>
<p>I translated into English from its first published in the language of the text after writing it in Unicode tools it takes I am strongly in the translation tool and when it was writing a word, it is not changed before I correct in his original text. More than one word at all to re-write the words again after a change in the Unicode tool brought on from there, then I can see the translation of the tool that is not correct that. However, it is now in inglish determine that its reading of the results of what is certain is that if one thing from such टूलों Hindi, who read for him by my little efforts have been made to the text Created by me to read more qualified Blog other than the will of the Hindi translation of the texts of the tool on the test were not maintained. Yesterday that there were some blogger write some drawbacks and is the measure that ब्लागर who want that way, their front two of his trial on the text of the translation tool that it can see the whole word in English that are not , Which did not come back to see them change and keep his second post that leave the reader to read the willing tool of the things just want it kept as it is for him on this tool will bring. So perhaps he did not, you've taken into account if your English is, he will read it. </p>
<p>I used some of the posts and found that such a language for which the reader can not be understood, but the price may be. Today I have some English blogger the post read in Hindi. There is a lot of trouble both in English and Hindi text in front of me was the sense of meaning and I totally understood. I can say that I am today that he viewed the English Blog read and fully understood. Her subject matter so I fully understand his films, as was the author. A little hard on the side of the world's Blog world is increasing its terms, it was not any more. English - Hindi translation tool means is that you fifteen languages of the world can infiltrate and will do so when the other language blogger do the same. Even if such a translation of the text has not been as expected but it is not so bad, that is not enough to maintain dialogue. Due to time some of the people who do more work time is not on the whole world in several languages, create your friend. Is it any wonder that when the Chinese will not be posted to our own will try to read in their language.<br />
               However, I have some posts on the Blog of the English translation it is always presented on it so that I will not write them after the English translation tool on the testing that will make it worth it to a non-speaking, reading to go to trouble Do not come. Besides, I read the English blog information so that it can get. Today, the three Blog reading was in the understanding that it is learnt English as adequate.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह टूल मुझे तो दिलचस्प लगा-आलेख It is interesting tool, I thought - Stories]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 15:09:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</guid>
<description><![CDATA[मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्ठाकारों की चर्चा को अवश्य पढ़ता हूं। उसमें हमेशा अपने मतलब की बात ढूंढने की कोशिश करता हूं। श्री अनुनाद सिंह-जिन्होंने देवनागरी का टूल दिखाकर मुझे एक तरह से  हिंदी ब्लाग जगत के दूसरे दौर में पहुंचा दिया-ने आज वहां एक अनुवाद का दिखाया। इस टूल की चर्चा मैं अक्सर करता रहा हूं कि हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद  का कोई <a href="http://translate.google.com/translate_t">"&#62;टूल</a> है जो शायद हमारे पास नहीं पहुंचा। एक अंग्रेजी के ब्लागर ने मेरी एक पोस्ट पर कमेंट में कहा था कि अब तो भाषा की दीवार ही खत्म होने वाली है और उसी के कहने पर मैने अपना एक लिखा था कि शायद कोई ऐसा टूल है। मेरी पोस्टों पर अनेक बार अग्रेजी लोगों ने अपनी कमेंट रखीं हैं, शुरूआत में मुझे हैरानी होती थी कि यह भला कैसे पढ़ते होंगे। फिर मुझे लगा कि शायद मेरे वर्डप्रेस के ब्लागों की  श्रेणियां अंग्रेजी वालों से टकरातीं है इसीलिये खोलकर वह अपनी भाषा में चिपका जाते होंगे।</p>
<p>कुछ दिनों से ब्लागस्पाट के ब्लाग भी पता नहीं किन ऐसे लोगों की पकड़ में आ जाते हैंे जो अंग्रेजी में कुछ कमेंट चिपका देते हैं। जब उस ब्लागर ने ऐसे टूल की बात की तो मुझे यकीन हो गया कि ऐसा कोई टूल है जो हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा है। आज श्रीअनुनाद सिंह ने इसकी चिट्ठाकार चर्चा में जानकारी दी तो मैंने एक दो लाइन लिख कर प्रयोग किया। ऐसा लगा कि ठीकठाक है। पिछले एक माह में श्रीअनुनाद सिंह ने यह तीसरा टूल दिया है जिसका मै प्रयोग करने वाला हूं। एक टूल तो उन्होनें मुझे देवनागरी से अरबी लिपि में भी भेजा। जब मैने उसका प्रयोग किया तो मेरी आंखें फटी रह गयी कि देखो अंतर्जाल पर क्या क्या देखने को मिल रहा है।</p>
<p>अगर यह टूल सफल रहता है तो वाकई इस दुनियां में बहुत कुछ बदलने वाला है। मेरे जैसा अंग्रेजी में पैदल आदमी भी जब अपनी पोस्ट अंग्रेजी मैंने  लिखेगा तो फिर जो अंग्रेजी में पढ़ कर लिख रहे है उनसे दो आगे ही रहेगा। अगर किसी को हानि न पहुंचे  तो मैं अपने प्रयोग भी करता हूं। आज यह पोस्ट उसी टूल से अंग्रेजी में कर प्रस्तुत करूंगा। बहुत शोर सुनते थे कि अंग्रेजी वाले हिट हैं। यहां हिंदी में तो हिट हुए नहीं देखते हैं अंग्रेजी में क्या स्थिति बनती है। अभी शायद कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर आप बताईये हिंदी के ब्लाग लेखक अंग्रेजी में लिखेंगे तब क्या वह अपना कुछ प्रभाव नहीं छोड़ेंगे? हालांकि अंग्रेजी वाले इससे पढ़ सकते है पर उनको भी इसका का क्या पता कि जो शब्द दिख रहे हैं वह  हिंदी है कि अरबी? इसलिये क्यों ने अपनी एकाध पोस्ट अंग्रेजी में अनुवाद कर रख दें। हालांकि मैं हिंदी को लेकर बहुत संवेदलशील हूं और उसमें लिखते रहने के इच्छुक होने के कारण कभी अंग्रेजी का आत्मसात नहीं किया। वरना इतनी तो मुझे आती है कि थोड़ा अभ्यास कर लिखने लगता।</p>
<p>जैसे हमें अंग्रेजी का हिंदी में अनुवाद  अच्छा लगता है वैसे ही अंग्रेजी वालों को भी लगता है। यह मानवीय स्वभाव है कि जिस स्थिति में वह रहता है उससे अलग वातावरण में उसकी जिज्ञासा रहती है। बहरहाल लंबी चौड़ी   बातें तो होतीं रहेंगी फिलहाल की जानकारी पर श्रीअनुनाद सिंह को बधाई।मैंने यह अनुवाद उसी टूल से किया है और ऐसा लगता है कि अगर सावधानी से  हिन्दी लिखी जाये तभी इसका इस्तेमाल सही रूप से किया जा सकता है. कुछ गलतियां इसमें थीं जिस मैंने अपने विवेक से ठीक करने का प्रयास किया है. इसमें मैं अपने हिन्दी में लिखे के लिए जिम्मेदार हूँ बाकी जिम्मा तो टूल का है. बहरहाल यह टूल दिलचस्प है.<br />
http://translate.google.com/translate_t<br />
---------------------------------------<br />
My habit is that I come to your email on the discussion chitthakar  must read me. There is always a matter of their means I am trying to find. Mr. Singh resonance - who published showing me a kind of tool to Hindi Blog to the world's second round - there today showed a translation tool. The discussion of the tools that I am often been translated into English, Hindi, a tool that perhaps we have not arrived. I have an English blogger on ksment  said at a post now that the language of the wall and ending at the behest of the same one I wrote that perhaps a tool. My posts on a number of times people have  his givan coment, in the beginning was that I wonder how good it will be read. Then I felt that perhaps my wordpress  the English blog  categories of those who matchd  is open so  he  go to paste in their language.</p>
<p>A few days from the Blog of  blogspot  not know what these people are caught in English, some of which is  paste coment  you. When he did a tool of blogger spoke, I was convinced that it is a tool which has been translated into Hindi from English. mr. anunad  Singh, today discussed its chitthakar  given a two-line, I used to write. It felt right. Singh, the last one month in the third mr anunad singh tool to use to which I am. I published a tool, they also sent in from the Arabic script. When I used it, my eyes remain open been on internet  Look to see what is getting.</p>
<p>If the tool is always successful, this really is going to change many things in the world. I also like the English man in the foot when his post in English, then, that I write in English are read by writing them will be two further. If a loss is not reached by then I am also using his. Today, that same post in English to submit a tool to do. Hear that the English were a lot of noise hit. Here in the hit Hindi, not English, see what the situation is going. Perhaps some people still joke believe it, you told that    writer in English, Hindi Blog then write what it does not leave some effect? Who can read English, although it is on them will also address what are showing that the Hindi word that Arabic? Why so few of his posts to keep the translation in English. However, I took a lot of Hindi  stay, and I wrote it for being willing to absorb ever not English. Otherwise, I come so that it seems a bit of writing exercises.</p>
<p>We like the English translation of the Hindi is so good even those who feel English. It is human nature that he lives in which case it is a different atmosphere in his curiosity often. However, things have long  will remain on information currently mr anunaad  Singh congratulated.<br />
<a href="http://www.google.com/transliterate/indic/">http://www.google.com/transliterate/indic/</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आशा ही नहीं रखते तो निराशा भी नहीं होती-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=516</link>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 09:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=516</guid>
<description><![CDATA[ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#008000;"><strong>ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेदान की तरह लगते है। उस दिन मैं अपने टेलिफोन और इंटरनेट कनेक्शन का बिल भरने  गया तो वहां पानी पीने के लिये प्लास्टिक का ग्लास उठाया और पीने के बाद  वहीं पड़े फाइबर प्लास्टिक के कूड़ेदान में डाल दिया। वह दिखने में बहुत अच्छा लग रहा था तब मुझे ब्लागस्पाट के ब्लाग की याद आयी।<br />
इसके ब्लागों पर मैंने भी बहुत लिखा है पर लगता है कि गई भैंस पानी में। जब मैंने शुरू में इस पर ब्लाग बनाये तब विज्ञापन वर्गैरह का विचार नहीं था। फिर जब दूसरे ब्लागरोंं के ब्लाग पर विज्ञापन देखें तो हमने भी लगा लिये। उस समय अधिक जानकारी नहीं  थी, सो  थोड़ी जगह पर ही विज्ञापन लगाये। फिर हमने एक वरिष्ठ ब्लागर की पोस्ट पर पढ़ा कि गूगल का हिंदी में आर्थिक योगदान नगण्य है। तब हमने इसके विज्ञापन हटा दिये। फिर एक ब्लाग पर पढ़ा कि अगर गूगल के विज्ञापनों को अधिक जगह दी जायें तो उससे आय हो सकती हैं। वह किया तो एक ब्लागर के ब्लाग पर पढ़ा कि यह अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले कमीशन कम देता है। मतलब वह भी हिंदी के प्रकाशकों की तरह है। </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>अब हमने जब अपने गूगल एकाउंट को चेक किया तो इसमें तो 100 डालर में दस से पाचं वर्ष से क्या कम समय लगेगा-यह अनुमान मेरा अपने ब्लाग के बारे में दूसरों का मुझे पता नहीं है। मतलब साफ है कि गूगल के एडस एकाउंट का प्रदर्शन हिंदी में अत्यंत खराब है और इसलिये ही गूगल को भारत में अधिक लोकप्रियता भी नहीं मिली। मैंने देखा है जो हमारे निजी जानकार मित्र हैं अधिकतर लोग याहू पर अपना ईमेल बनाते है। सच तो यह है कि हिंदी के ब्लागर अगर ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं बनाते तो शायद उसके जीमेल को कोई भी नहीं पूछता। मैने भी शुरूआत मंे याहू पर ही ईमेल बनाया और वर्डप्रेस के दो ब्लाग मैंने उसी पर ही बनाये। वहां समझ में नही आया (उसकी वजह यह थी कि मैं यूनिकोड में नही लिख रहा था) तब ब्लागस्पाट पर ब्लाग बनाने के लिये जीमेल बनाया।  </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>मैने वर्डप्रेस और ब्लागस्पाट पर बराबर लिखा है। हां पहले सोचा था कि देखें<br />
ब्लागस्पाट के ब्लाग से शायद कोई आय हो जाये पर अब तो लगता है कि सारी मेहनत पानी में गयी। असल में इसके पीछे एक कारण और भी है। वर्डप्रेस पर हम चाहें अपनी पोस्ट पर जितनी श्रेणी रख दें वह लेता है जबकि ब्लागस्पाट पर अंग्रेजी के 200 वर्ण से अधिक नहीं लेता। यही श्रेणियां पाठक तक हमारे ब्लाग को ले जातीं है। इसलिये वर्डपेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटा लेते हैं और चहलकदमी करते हैं और वहां के ब्लागर उनको देखकर अपना दिल भी बहलाते हैं। उसका डेशबोर्ड ब्लागरों के आपस में मिलाने का काम भी करता है। जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये पूरी तरह हिंदी के एग्रीगेटरों पर ही निर्भर रहता पड़ता है। ब्लागस्पाट पर अपनी पोस्टें रखने का मतलब है कि साठ फीसदी पाठकों से अपनी पोस्ट दूर रखना। आज दोपहर तक ब्लागस्पाट के सात   ब्लाग पर केवल आठ व्यूज हैं जबकि  वर्डप्रेस के पांच ब्लाग पर  पचास व्यूज हैं। शाम तक वर्डप्रेस के ब्लाग करीब डेढ़ सौ के आसपास व्यूज जुटा लेंगे और  ब्लागस्पाट पर अगर कोई नई पोस्ट नहीं लिखी तो वहां अधिक से अधिक दस और व्यूज आएंगे। </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>मुझे हमेशा वर्डप्रेस पर  अपनी सक्रियता देखकर खुशी होती है जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग बोर कर देते हैं। न इसमें नाम है और न नामा। गूगल का एड एकाउंट जितनी आय दिखा रहा है उससे कई गुना तो वह जगह घेर रहा है हालांकि यह भी सही है कि उस पर एग्रीगेटर के बाहर पाठक नगण्य हैं। अन्य ब्लाग पर  भी जब गूगल के विज्ञापन देखता हूं तो मुझे अपने पर हंसी आती है। यह सोचकर कि देखो हम  दूसरों पर  भ्रम में पड़ जाने वाली बात कहते है और हम  भी इसमें पड़ गये। बहरहाल उनकी चमक की वजह से ही लोग उस पर अधिक आकर्षित हैं पर जैसा कि नाचने के बाद मोर रोता है वैसे ही वहां से ब्लागर जब उकता जाते हैं तो निराशा की बातें भी करते हैं जबकि वर्डप्रेस वाले क्योंकि कोई आशा ही नहीं रखते तो निराश भी नहीं होते।<br />
</strong></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम कहां जा रहे हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 10:57:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</guid>
<description><![CDATA[आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;">आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों को दौरा किया तो लगा कि जैसे व्यंग्य के लिऐ कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं है। अक्सर  व्यंग्य लिखने के प्रयास में रहता हूं और इसके लिये मुझे विषय की आवश्यकता होती है। पहले जब सीधे यूनिकोड में लिखता था तो गद्य में व्यंग्य लिखने से बचता था और इसीलिये हास्य कविताओं से काम चलाता था जिसमें विषय को स्पष्ट करने में कठिनाई होती थी अब जब कृतिदेव में मेरे लिये लिखना सरल हुआ है तब से विषयों को लेकर कोई समस्या नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आज एक ब्लाग देखा जिसमें लिखा था कि ब्लाग चूंकि फ्री में है इसलिये चाहे जो उस पर लिख रहा है और इस तरह ब्लागिंग दिशाहीन हो रही है। मैंने सोचा था कि उसमें कोई भारी भरकम विचार होगा पर जब ब्लाग खोला तो पाया कि केवल दस लाईनें लिखीं हैं। ऐसा-वैसा बस और कुछ नहीं। अब ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उसकी दिशा क्या हो? इसका जवाब उसमें नहीं लिखा था। लिखने वाले ने भी लिखने के लिये लिखा था और उसे जोरदार हिट मिले थे।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">यह फोरम हिंदी ब्लागिंग को दिशा देने के लिये सज्जन लोगों ने बनाये पर वहां आकर अच्छा खासा लेखक दिशाहीन हो ही जाता है। रोज जो दोस्तों से हिट और कमेंट मिलते हैं उसे पचाना आसान होगा यह तो हम नहीं मानते क्योंकि हमें न तो इतने हिट मिलते हैं और न ही कमेंट। सो पता नहीं उसको पचाने के लिये कितनी देर वज्रासन में बैठना पड़ेगा। फोरमों पर अपने ब्लाग फ्लाप देखकर दिल को तसल्ली होती है कि अब कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिट मिलेंगे तो लोगों की दृष्टि में आ जायेंगे और वह फिर तमाम तरह के मीनमेख निकालने लगेंगे। फिर उनका जवाब देते फिरो। समय की खराबी और ऊर्जा के निरर्थक विसर्जन के अलावा उसमें कुछ नहीं हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">अब लोग लिख रहे है कि ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उनका खुद का लिख किस दिशा से आया और किस दिशा को जा रहा है यह हम पूछ सकते थे पर लगा कि ख्वामख्वाह में उनको नाराज कर दें। इसीलिये अपना ही एक व्यंग्य लिख दें। वह इसे पढेगे ही नहीं क्योंकि किसकों यहां पता हम किसको पढ़कर लिख रहे हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">सभी आदमी सब जगह दौड़े जा रहे हैं।  दिशा का पता नहीं पर दौड़े जा रहे हैं।  एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि ‘आखिर हम किस दिशा में दौड़ रहे हैं?’</span></p>
<p><span style="color:#003300;">पर कोई किसी को जवाब नहीं देता। पूछते सब ही हैं जब थककर सांस लेते हैं। उस समय सब दौड़ रहे होते हैं और जवाब इसलिये नहीं देते कि क्या पता फिनिशिंग टच में ही इस दौड़ प्रतियोगिता में पिछड़े गये हैं तो गया जो मिलने वाला होगा। क्या? इसका किसी को पता नहीं है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">सो ब्लागिंग भी ऐसे ही है। सब लिखे जा रहे है कि हो सकता है आगे कोई पुरस्कार वगैरह मिल जाये तो हो सकता है कि समाज में थोड़ा सम्मान बढ़ जाये। अब 2008 चल रहा है और साल भर इसी तरह कुछ लाईने लिखते रहे तो हो सकता है इस साल के नाम पर मिलने वाला कोई पुरस्कार ही हाथ लग जाये। इसी तरह ही लिखते जाओ। ब्लागरों पर कुछ भी लिख दो हिट हो जाता है। आम पाठक के लिये वह दो र्कौड़ी का नहीं है। इसीलिये हम ब्लागरों को विषय इस तरह बनाते हैं कि वह आम पाठक को भी समझ में आये कि इंटरनेट पर ईमेल के विस्तार के रूप में एक ब्लाग भी होता है जिस पर लोग कुछ लिखते भी हैं और वह ब्लागर कहलाते हैं। हमारे लिये यह ईमेल का विस्तार ऐसे ही जैसे एक पत्रिका। जिस तरह एक रजिस्टर का इस्तेमाल एक गणित का छात्र भी करता है तो एक लेखक उस पर अपनी रचनाएं लिखता है-कुछ लोग डायरी भी लिखते हैं पर वह लेखक नहीं कहलाते।<br />
 हम तो एक लेखक की तरह लिखने का काम कर रहे हैं। हमारी नजर में ब्लागर वह हैं जो ब्लाग का ईमेल के विस्तार की तरह इस्तेमाल करते हैं और लेखक वह हैं जो इसे अपनी रचनाओं के लिखने के लिये उपयोग करते हैं। जिस तरह रजिस्टर पर लिखा गया सभी लोगों के उपयोग का नहीं होता। वैसे ही हाल ब्लाग का है। हम इतनी बड़ी पोस्ट लिख रहे हैं यह फोरमों पर फ्लाप हो जायेगी पर दिशाहीन बताने वाली पोस्ट हिट पा चुकी है। है न दिलचस्प बात!</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ पुराने ब्लागर अब यह समझ गये हैं कि इन फोरमों के आगे भी होती है ब्लागिंग। पहले एक फोरम पर तो कविता के ब्लाग ही नहीं लिये जाते थे और अब हालत यह है कि फोरम वाले हिंदी का जो ब्लाग देखते हैं वही अपने यहां दिखाने लगते हैं। अभी कोई कथित पुरस्कार बंटे तो बड़ी बेदर्दी से कहा गया कि इसमे कविता के ब्लाग शामिल नहीं किये गये। हमने अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाने पर जब हास्य कविताएं बरसाईं तो समझ में आया कि क्या होती है कविता। हमें भी बहुत हैरानी होती है यह देखकर कि हमारी हास्य कविताएं पाठकों में ऐसे हिट पा रहीं है कि डर लगने लगा कि कहीं इतना लिखने की सजा हम हास्य कवि की उपाधि के रूप में न पायें। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">हिंदी भाषा लिखने में हमें मजा  आता है पर कोइै कहानीकार, व्यंग्यकार और लेखक कहे तो सुनकर अच्छा लगता है पर हास्य कवि कहे तो ऐसा लगता है कि हमारी पूरी मेहनत गयी पानी में-क्योंकि उससे कि हमारा दायदा सीमित हो गया प्रतीत होता है।  </span></p>
<p><span style="color:#003300;">बहरहाल दिशाहीनता की स्थिति नहीं है। हां,यहां लेखक कम हैं और ईमेल विस्ताकर अधिक हैं जो तात्कालिक हिट्स या ईमेल पाकर खुश हो जाते हैं।  आम पाठक अभी अपनी बात लिख कर लेखक को दे नहीं रहा इसीलिये कभी कभी निराशा होती है पर फिर अपनी रचना से जो प्रतिबद्धता हो वह फिर होंसला ला देती है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आखिरी बात यह ब्लाग फ्री में नहीं है जैसा कि कुछ ब्लागर लिखते हैं। जनाब जिस कंपनी के भी इंटरनेट कनेक्शन हैं उनके विज्ञापन गूगल पर  अन्य वेब साईटों पर देखे जा सकते हैं और उनको हम बराबर भुगतान कर रहे है। कंपनियां अपनी कमाई के सारे रास्ते खुले रखना चाहतीं हैं इसलिये इस ब्लाग को एस.एम.एस की तरह ही इस्तेमाल करवा रहीं हैं। अपनी भडास निकालो और हर महीने कनेक्शन का भुगतान करते जाओ। फिर भी कुछ ब्लागर अच्छा लिख रहे हैं और उनको पढ़ने में मजा आता है-जहां तक हमारी जानकारी है कुछ ब्लागर हमारे लिखे का भी आनंद उठाते हैं। हम फोरमों पर एक पाठक की तरह जाते हैं इसीलिये कभी अपने हिट या फ्लाप होने का अध्ययन नहीं करते। हां, अपना ब्लाग सामने आ जाता है तब ही उसके व्यूज देखते हैंं। आम पाठकों की संख्या बढ़ती लग रही हैं। इधर कृतिदेव में सीधे लिखने की वजह से हम और बेपरवाह हो गये हैं कि अब तो लिखना है हिट या फ्लाप तो अब आम पाठक तय करेंगे और दिशा भी अब उनकी पसंद पर ही तय होनी है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी-कभी  ऐसा भी होता है-आलेख  ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=514</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 14:54:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=514</guid>
<description><![CDATA[              अगर देखा जाये तो ब्लागवाणी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#333300;">              अगर देखा जाये तो ब्लागवाणी फ्लाप ब्लागरों के लिये अपने प्रचार के लिये बिल्कुल उपयोगी नहीं है। अधिकतर ब्लागर ब्लागवाणी पर आते हैं तो  वह याद रखें कि उनसे कोई मिलने वाला घर मिलने आये तो उसे अपने ब्लाग दिखाते हैं तो उसके बाद  कोई फोरम दिखाना हो तो कभी ब्लागवाणी पर न ले जायें क्योंकि अगर किसी ने पूछ लिया कि यह पोस्ट के आगे अंक होने का क्या मतलब है और आपने सज्जनता  से बता दिया कि यह पढ़ने वालों की संख्या है तो आपका भांडा फूट जायेगा। भले ही आपने पूरी ईमानदारी बरती हो पर बाहर वह सबको बता देगा कि आप फ्लाप हैं-क्योंकि मेरे हिसाब से अधिकतर ब्लाग बहुत सहज और सरल भाव के हैं क्योंकि लिख तो वही सकता है जो ऐसा हो। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">आज एक सज्जन आये थे शादी का कार्ड देने और मुझसे अपना कंप्यूटर दिखाने के लिये बोले तो मैं उनको वहां तक ले आया और जब उन्होंने इंटरनेट कनेक्शन देखा तो पूछा-‘‘इस पर क्या करते हो?</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">मैने कहा-‘‘ब्लाग लिखता हूं। तुम समझो तो अपनी निज पत्रिका प्रकाशित करता हूं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">ब्लाग से वह समझ नहीं पाते इसलिये मैने उनको निज पत्रिका कहा और उनके समझ में भी आ गया। फिर मैने उनको अपने ब्लाग दिखाये और अन्य फोरम दिखाता हुआ ब्लागवाणी की तरफ ले गया। मैने कहा कि इन एग्रीगेटरो को तुम एक अखबार भी कह सकते हो और हमारे ब्लाग यहां एक पृष्ठ की तरह हैं। वह देखते रहे और जब मैं अपने ब्लाग की तरफ आया और अपने व्यूज देखे तो वहां से तत्काल आगे कर्सर निकाल ले गया। बाद में उन सज्जन ने अपनी कुछ बेव साइट देखीं और विदा हो गये। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">तब मैं सोच रहा था कि अगर यह मैं उनको बता देता कि यह  मेरे ब्लाग की पाठक संख्या है तो वह क्या सोचते? अब उसके लिये फिर उनको वर्डप्रेस या स्टेट काउंटर दिखाने पड़ते। कुल मिलाकर तब यह लगा कि ब्लागवाणी अपने लिये तो ठीक है पर हम किसी और को अपना ब्लाग वहां दिखायें यह हम फ्लाप श्रेणी के ब्लाग को नहीं करना चाहिए। हालांकि वहां हिट होना कोई मुश्किल काम नहीं है पर उसके लिये पोस्टें भी ऐसीं होना चाहिए जो ब्लागरों के मतलब की हों पर वह फिर आम पाठक को दिखाने के मतलब की नहीं होतीं।  हमारे जो दोस्त अंतर्जाल पर देखते हैं वह ऐसी पोस्टों पर नाराज होते हैं। मैने एक मित्र को बता दिया कि अगर ब्लागवाणी पर जाये तो वह पढ़ने वालों की संख्या कतई नहीं देखे नहीं तो उसे दुःख होगा। एक दिन वह ब्लागवाणी से घूमफिरकर आया और बोला-‘‘तुंम ठीक हो अपनी राह चलो। वहां जाने की बजाय तो मैं तुम्हारे  ब्लाग पर लिंकित ब्लाग ही पढ़ लिया करूंगा। हालांकि वहां  कुछ अच्छा लिखने वाले भी हैं और तुम उन सबको अपने उस ब्लाग पर लिंक कर दो जहां से हम दाखिल होते हैं।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">उसने जो वहां हिट पोस्टें देखीं तक उसमें एक-दो में अपठनीय शब्द था जिस कारण उसका मन भी खराब हुआ। हालांकि वह इन फोरमों को देखकर खुश होता है और कहता है कि हिंदी को अंतर्जाल पर पढ़ना ऐसे ही जैसे फाइव स्टार टाइप पढ़ना। एक बात याद रखना मैं कोइै शिकायत नहीं कर रहा न मुझे किसी बात पर एतराज है। एग्रीगेटरों की अपनी दुनियां हैं और मेरी अपनी। अंर्तजाल पर हिंदी लिखने के अभियान के तहत उनसे मेरा संपर्क हुआ है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम लोग एक दूसरे पर अपनी बातें थोपें। एक जगह ब्लाग दिखने के जो फायदे हैं उन्हें नहीं भूलना चाहिए। इसके बावजूद यह तय है कि यह एक मंच है जिस पर हम ऐकत्रित हैं। हालांकि बाद में मुझे इस बात का अफसोस भी हुआ कि मैंने अपनी पाठक संख्या के बारे में उनको क्यों नहीं बताया? आप कह सकते हैं  यह भी वास्तविकता है कि आत्मविश्वास कभी साथ छोड़ जाता है या कभी आप अनावश्यक रूप से कोई बात बताना जरूरी नहीं होता। यह दोनों बातें मेरे मस्तिष्क में एक साथ मौजूद थीं। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">मुझे आज अपनी पोस्टों पर लगायीं गयीं कमेंटों  का ध्यान आया जिसमें ब्लागवाणी के हिट्स पर प्रतिकूल टिप्पणियां की जातीं हैं। मैं उन पर ध्यान देता हूं पर कुछ लिखकर फिर भूल जाता हूं। कभी कभी मुझे लगता है कि कुछ ब्लागर इस बात से बहुत नाराज है कि वह वहां हिट्स नहीं ले पाते और मेरा ध्यान उनकी तरफ कभी नहीं जाता आज गया तो सोचा लिख डालूं एक पोस्ट कि भई अंतर्जाल की यह माया है कहीं हिट्स और फ्लाप की माया है। अभी प्रयोगात्मकता का दौर है जब उसके कुछ परिणाम दिखने लगेंगे  उस पर भी लिखेंगे। कौन हिट कौन फ्लाप का फैसला अभी बहुत दूर है शायद इसलिये कुछ ब्लागर लोगों को जाने अनजाने इसमें व्यस्त रखकर ब्लागरों से लिखवा रहे हैं। इस फिर कभी।  </span></strong></p>
<p><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['मेरा परिचय' में क्या रखा है-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=511</link>
<pubDate>Sun, 06 Apr 2008 15:06:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=511</guid>
<description><![CDATA[आज वर्डप्रेस के नवीनीकृत डेशबोर्ड पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज वर्डप्रेस के नवीनीकृत डेशबोर्ड पर दिख रही अपनी टाप पोस्टों को अवलोकन  इस दृष्टि से कर रहा  था कि देखें आखिर पाठकों का क्या रुझान है। इसमे एक ब्लाग पर मेरा परिचय दूसरे नंबर  पर चमक रहा  था। चूंकि उसमें केवल शूरू की तीन पोस्टों के व्यूज ही बताता है इसलिये अन्य पर मेरा परिचय को कितनी बार क्लिक किया गया होगा यह पता नहीं पर वह बाकी चार ब्लाग पर   शूरू के तीन  नंबरों में  नहीं है<br />
जब मैं शुरू मे अपने ब्लाग बना रहा था तब मैने अपना परिचय बिना किसी विचार के  रख दिया। अगर मुझे सबसे अधिक कठिन कोई बात लगती है तो वह अपना परिचय लिखना। फिर यूनिकोड में सीधे लिखना तो पहाड़ जैसा। अब तो शूरू में हिंदी टाइप के फोंट कृतिदेव में लिखने में बहुत सहुलियत हो रही है पर फिर भी दोबारा परिचय लिखना तो कठिन लगता है। अब सोचा है कि किसी दिन फुरसत में बैठकर आत्ममुग्ध होकर लिखेंगे। उसमें अपनी खूब डींगें हांकेंगे। अब कोई ब्लागर तो हमारा परिचय पढ़ेंगे नहीं जो कोई आक्षेप ढूंढ पायेंगे। </p>
<p>मुझे सबसे अधिक इस बात का आश्चर्य है कि आखिर मेरा परिचय लोग क्योंे पढ़ते हैं? अभी तक जो मेरी सीधी यूनिकोड में लिखी गयी रचनाओं में ढेर सारी गल्तियां हैं और  क्या यह देखने के लिये लोग पढ़ते हैं कि आखिर इतनी गल्तियां करने वाला  कौन है? अपनी रचनाओं को लेकर मेरे अंदर कोई खुशफहमी नहीं है। हो सकता है कि बेसिर-पैर की रचनाएं देखकर सोचते हों कि हो कोई आसपास का तो उसे डांट आयें कि क्या लिखता है, समझ में नहीं आता। वगैरह................वगैरह।</p>
<p>लिखने को लेकर मेरे मन में कभी आत्ममुग्धता का भाव नहीं रहा तो यह भी कि मैने कभी कुंठा भी नहीं पाली। जैसा मैं पढ़ना चाहता हूं वैसा ही लिखता हूं। कलम मेरे लिये एक मित्र की तरह रही है और मै जानता हूं कि वह मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाने वाली है। मगर यह परिचय.........................जितना दिया है उतना ही ठीक है। इसमें जोड़ने के लिये अब मेरे पास कुछ नहीं है। जैसा लिखता हूं वैसा हूं भी। बचपन से ही लेखक बन जाने के कारण अंतर्मुखी तो हूं पर भीड़ में भी घबड़ाता नहीं हूं  क्योंकि लिखने की सामग्र्री तो वहीं से मिलती है। भीड़ में एक आदमी के रूप में ही जाना मुझे पसंद है। सामने मंच पर बुत हों और नीचे बैठे बुत उन्हें देख रहे हो यह भी देखता हूं-दोनों में ही कुछ कहानियां और विचार ढूंढता हूं। न आम हूं न खास हूं बस एक लेखक हूं। कुछ चिंतन और कुछ मनन चलता रहता है। उसका जिक्र किसी से नहीं करता पर अगर कहीं वार्तालाप चलता है  और उसमें जब  बोलता हूं तो लोग प्रभावित  होते हैं और लिखे की तारीफ तो खैर बहुत होती है। अपने लिखे से लाभ की भावना कभी नहीं रही क्योंकि एक रचना करने के बाद मैं दूसरी के पीछे लग जाता हूं तो पहली वाली का फायदा उठाने की फुरसत ही कहां  रहती है? हजारों रचनाएं छपी हुई पड़ी है पर अब उनमें मुझे कोई सार नजर नहीं आता।<br />
पहले कवि सम्मेलनों में जाता  था पर तब भी श्रोताओं के बीच में जाकर बैठ जाता था। गोष्ठियों में गया तो बस एक-दो कविता सुनाई या फिर सुनकर ही संतोष कर लिया। आकाशवाणी पर एक बार व्यंग्य और कविताएं पढ़कर आया और उसके बाद फिर अपने रोजगार में लग गया। दूसरों का लिखा पढ़ता हूं पर उनके परिचय में भी मेरी दिलचस्पी नहीं रहती। एक मजेदार बात यह है कि मेरे घनिष्ठ लेखक मित्रों के घर कभी नहीं गया और न मेरे पास आये-इसका कारण यह भी हो सकता है कि शहर छोटा होने के कारण हमारी मुलाकातें कुछ निश्चित स्थानों पर हो जातीं है। । इनमें से ही  एक मित्र ने  मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया जो इधर ब्लाग जगत में ले आया। यहां भी ढेर सारे मित्र बन गये हैं। वक्त आने पर उनके मिलूंगा। </p>
<p>मैं क्या लिखता हूं इस पर बात करता हूं। मेरे क्या विचार हैं यह भी सुनाता हूं। अगर किसी का काम पड़ जाये तो वह करने में खुशी  होती है। मैं कहां रहता हूं, क्या करता हूं? उनमें भी छिपाने लायक कुछ नहीं है पर कोई पूछता है तो मैं असहज होता हूं। जरूरत समझता हूं तो बता देता हूं पर कोई पूछता है तो टालने की करता हूं। तब सोचता हूं कि क्या मेरा लिखे शब्द कुछ नहीं बतातंे? क्या वह निरर्थक है? एक लेखक की सबसे बड़ा परिचय तो उसके शब्द होते हैं जिनके साथ वह जी रहा होता है। वह उसके अंतर्मन को खोल देते हैं। फिर उसके बारे में क्या जानना? आदमी हजारों नाटक करता है और लेखक को भी अपने देह पालन के लिये वह सब करना पड़ता है पर वह अपने लिखे के प्रति प्रतिबद्ध अपनी आत्मा के साथ होता है तो?</p>
<p>आप सवाल करेंगे कि क्या ऐसे लेखक भी है जो अपनी आत्मा से प्रतिबद्ध नहीं होते? मैं किसी पर आक्षेप नहीं करता पर यह जरूर कहता हूं कि कई लोग ऐसी  कोशिश करते हैं और  जीवन भर करते ही रहते हैं पर हालत उनको ऐसा नहीं करने देते। मैं इसलिये प्रतिबद्ध रह पाया  हूं कि मेरे शब्द ही इस जीवन में मेरे सच्चे मित्र रहे हैं और अगर मै उनसे वफादारी नहीं निभाता तो चलता कैसै? शेष फिर कभी</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वर्डप्रेस के डेशबोर्ड की अब नये ढंग से प्रस्तुति-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=510</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 12:34:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वर्डप्रेस के ब्लाग का  डेशबोर्ड अब नई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong><span style="color:#3366ff;">वर्डप्रेस के ब्लाग का  डेशबोर्ड अब नई और आकर्षक साजसज्जा के साथ प्रस्तुत हुआ है। इस समय हिंदी के अधिकतर ब्लागर ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस पर ही लिखते हैं। वर्डप्रेस के ब्लाग की थीम से अधिक आकर्षक तथा विज्ञापन की सुविधा होने के कारण अधिकतर ब्लागर ब्लागस्पाट पर लिखते हैं। एक वर्ष पूर्व तक अनेक प्रसिद्ध ब्लागर वर्डप्रेस  के ब्लाग छोड़कर ब्लागस्पाट पर पहुंच गये। मेरे तो कुछ समझ में ही नही आ रहा था क्योंकि उस समय तक मेरा कोई भी ब्लाग नारद पर नहीं था इसलिये दोनो पर बराबर लिखता रहा।<br />
ब्लागस्पाट के विज्ञापन पहले लगाये फिर हटाये और पुनः यह सोचकर कि देखें कुछ फायदा होता है उनका जोड दिया। इधर विज्ञापन डाले तो उधर  कुछ वरिष्ठ ब्लागरों की गूगल के विज्ञापन खाते के संबंध मेंं निराशजनक जानकारी  भी पढ़ी। तब मैने सोचा कि फिलहाल उन्हें बना रहने दो। असली बात यह है कि हिंदी के सामान्य ब्लागर के पास इस समय केवल उसी से ही आय का आसरा हो सकता है शायद इसलिये अनेक लोग उससे जुड़े। </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><span style="color:#3366ff;">इसके बावजूद कई एसे ब्लागर है जिनका वर्डप्रेस से मोह खत्म नहीं हुआ। इसके कुछ कारण हैं। ब्लागस्पाट में किसी भी पोस्ट पर लेबल के रूप में अंग्रेजी  के 200 वर्ण से अधिक नहीं लिख सकते और अगर हिंदी में कुछ लेबल लगायें तो वह फिर अधिक से अधिक अंग्रेजी वर्ण होने के कारण वह सीमित संख्या में ही लग पाते हैं। वर्डप्रेस में इसकी कोई सीमा नहीं है। वहां चाहे जितनी श्रेणियां और टैग लगाये जा सकते हैं। इससे कोई भी पोस्ट अधिक से अधिक शब्दों के साथ सर्च इंजिन में आ जाती है। हालांकि यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि ब्लागस्पाट के शीर्षक भी सर्च इंजिन में आ जाते हैं पर अंग्रेजी में अधिक शब्दों के साथ उन्हें पकड़ा जा सकता है। यह बात सही है कि हम हिंदी में लिख रहे हैं पर देश के आम पाठक के दिमाग में अभी अंग्रेजी शब्दों  से सर्च इंजिन में ढूंढने की प्रवृत्ति है और इसलिये वर्डप्रेस पर उनका इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जा सकता है। इस कारण वहां पर पाठक अधिक आते दिखते हैं। मैं अंतर्जाल पर कोई दावा पक्के ढंग से नहीं करता क्योंकि हो सकता है कि मेरे से समझने में कहीं चूक हो रही हो इसकी संभावना को हमेशा मानता हूं। वर्डप्रैस पर पाठकों की लगातार आमद देख कर एक विश्वास बना रहता है कि आगे इनकी संख्या बढ़ सकती है। कई बार तो ऐसा होता है कि पोस्ट न लिखने के बावजूद  भी डेशबोर्ड ब्लाग रेटिंग में ऊपर बना रहता है। इसलिये वहां लिखने वालों का मन लगा रहता है। यही कारण है कि वर्डप्रैस  पर लिखने वाले कभी निराशाजनक बातें करते हुए नहीं दिखते। ब्लागस्पाट के ब्लाग पर भी पाठक आते दिखते हैं पर उनकी संख्या वहां के मुकाबले बहुत कम है और अगर पोस्ट न लिखने पा फोरमों से पाठक नहीं मिल पाते तब एक निराशा घर कर जाती है। यही कारण है कि ब्लागस्पाट के ब्लागर कभी-कभी निराशाजनक बातें कर जाते हैं।</span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><span style="color:#3366ff;">वर्डप्रेस ने आज मेरे ब्लाग पर ही तमाम तरह के नवीन दृश्य रखना शुरू कर दिये। सबसे अधिक हिट और सक्रिय पोस्ट के पाठकों की संख्या के साथ पाठकों की संख्या का विवरण भी दिखाना शुरू कर दिया और अब उसके लिये अब कहीं नहीं जाना। कमेंट भी अब सामने पढ़ी जा सकतीं है। पहले कमेंट पढ़ने के लिये उसके कमेंट कालम को क्लिक करना पड़ता था और शायद इसलिये कई ब्लागर उसे अपने पास रखे हुए थे। जिन लोगों ने माडरेशन का अधिकार नहीं रखा उनका तो देखना पड़ता था कि कोई कमेंट तो नहीं आया। </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><span style="color:#3366ff;">अब डेशबोर्ड आकर्षक और अधिक जानकारी प्रदान करने वाला हो गया है। इधर कुछ नये ब्लागर भी वहां अच्छा और जोरदार लिखने वाले आ गये हैं। कुछ पुराने और जोरदार ब्लागर अभी भी वहंा लिख रहे हैं। हम वर्डप्रैस  के ब्लागर एक दूसरे को फोरमों पर ही पढ़ लेते हैं। सच तो यह है कि ब्लागस्पाट पर जब कोई पोस्ट रखता हूं तो मुझे ऐसा लगता है कि वह पाठकों की सीमित संख्या में पढ़ी जायेगी। बीच में वर्डप्रैस के ब्लाग और गूगल के विज्ञापन खाते को जोड़कर ब्लोग इन काम के बनाये  ब्लोग की चर्चा मैंने की थी पर उस पर लिखने का विचार अभी तक नहीं बन पाया क्योंकि उसका खाता जब ब्लागस्पाट से ब्लाग पर ही अधिक उपयोगी नहीं है तो फिर दूसरी जगह कैसे रहेगा? ऐसे में ख्वामख्वाह में बदनामी लेते फिरो कि पैसे के लिये लिख रहा है। </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><span style="color:#3366ff;">बहरहाल वर्डप्रैस भी जिस तरह नित बदलाव कर रहा है उससे लग रहा है कि हो सकता है कि वह आगे कोई विज्ञापन का भी इंतजाम करे। आज ही मैंने एक ब्लाग में पढ़ा तो उससे पता लगा कि उन्हीं विज्ञापनों में फायदा है जो आनलाइन खरीददारी के लिये उपयोगी हों। इसका मतलब यह है कि अभी कुछ समय लगेगा। बहरहाल वर्डप्रैस वालों को इन नवीन परिवर्तनों के लिये बधाई। इस पर मिलने वाली दिलचस्प जानकारी है इसमें कोई संदेह नहीं है।<br />
 .....................................................................<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देखते-देखते बीत गया एक साल-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/04/05/dekhte-dekhte-beet-gayaa-es-saal-aalekh/</link>
<pubDate>Fri, 04 Apr 2008 15:37:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/04/05/dekhte-dekhte-beet-gayaa-es-saal-aalekh/</guid>
<description><![CDATA[मैने आज अपने ब्लाग देखे। 4 अप्रैल 2007 को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैने आज अपने ब्लाग देखे। 4 अप्रैल 2007 को मेरा ब्लाग नारद पर आया था जबकि अपने ब्लागों पर  फरवरी 2007  से ही  लिखना शुरू कर चुका था। अपने  मुख्य  ब्लागों-दीपक भारतदीप का चिंतन और दीपक बापू कहिन  पर मैने 4 अप्रैल  को ही यूनिकोड में लिखना शूरू किया था। इससे पहले इन पर  देव और कृतिदेव में पोस्ट रखी थीं और शीर्षक यूनिकोड में रखे थे। आज मैने एक लेख वहां से उठाने का प्रयास किया ‘क्रिकेट में सब चलता है यार’, तो उसमें 1713 शब्द थे। कृतिदेव में लिखरा गया यह आलेख मैने परिवर्तित टूल में ले जाकर उसे यूनिकोड में बदला और फिर उसे वहीं रख दिया। इतना बड़ा लेख दोबारा पोस्ट करने का साहस नहीं कर सका।<br />
मैने अपनी छोटी कविताएं दूसरे ब्लाग पर मार्च में ही रखी थी पर नारद पर न होने की वजह से अन्य ब्लागर उसे नहीं पढ़ पाये पर लोग उनको आज भी पढ़ते है।</p>
<p>    पूरा एक वर्ष हो गया ब्लाग जगत पर आधिकारिक रूप से लिखते हुए। मेरा सबसे पहला लेख था कि ‘हकलाते हुए लिख रहा हूं’। यह इसलिये लिखा था क्योंकि मुझे अपने हिंदी में कार्य करने के अभ्यास के  विपरीत अंगे्रजी टाईप का सहारा लेना पड़ रहा था। आज एक वर्ष बाद मैं अपना यह आलेख कृतिदेव में टाईप कर रहा हूं यह अलग बात है कि इसे परिवर्तित टूल से यूनिकोड में कर पोस्ट करूंगा।<br />
पिछले एक वर्ष का लेखाजोखा प्रस्तुत करने का कोई लाभ नहीं है पर फिर भी इस दौर में मैने बहुत कुछ देखा और अनुभव किया। कई बार मैने यूनिकोड में लिखना छोड़कर सीधे अपनी पोस्ट कृतिदेव में लिखने का मन भी बनाया यह सोचकर कि जिसके पास हिंदी फोंट होगा तो अपने आप पढ़ेगा पर इस बात से कभी आश्वस्त नहीं था कि कुछ लोग भी इसे पढ़ पायेंगे।  जब अभी श्रीअनुनाद सिंह ने देव और कृतिदेव फोंट को यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल बताया तो मुझे बहुत खुशी हुई पर जब इसमें दोबारा काम शुरू किया  तो लगा कि मैं जिस तेजी से अपना दिमाग यूनिकोड में चला रहा  था उतना अब नहीं चला रहा हूं क्योंकि उसमें मुझे अंग्रेजी की बोर्ड के हिसाब से सक्रिय रहना पड़ता था और उससे विचार भी तेजी से आते थे। कृतिदेव में टाईप करते हुए आराम से सोचता  हूं और इसका प्रभाव मेरे तीव्र लेखन पर विपरीत  पड्ता लग रहा है। मुझे यह टूल तब मिला जब मुझे इसकी जरूरत नहीं थी पर मेरे लिये इस टूल को अपनाने का अलावा कोई रास्ता नहीं था। </p>
<p>एक बात जो अब हुई  वह यह कि अब मेरे पास बुरे और अतार्किक लेखन का कोई बहाना नहीं रहा हैं। मेरे मित्र मुझे यही कह रहे थे। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा‘‘तुम अब कृतिदेव वे टाईप कर रहे हो यह बात हमें तुम्हारी पोस्टों से पता लग गयी है। अब हमारे सामने यह बहाने नहीं करना कि क्या करूं यूनिकोड में लिखता हूं। पहले तो तुम पर तरस आता था इसलिये बिना मतलब की  कविताएं झेल जाते थे पर अब तुम वैसा ही लिखना जिसकी वजह से हम तुम्हें एक लेखक माने न कि ब्लागर’</p>
<p>मैने कहा-‘पर तुम भी अपना हाजमा ठीक कर लो। हमेशा कहते हो कि छोटा लिखो पढ़ते हुए कंप्यूटर पर आंखें थक जातीं हैं। जब दोबारा फार्म में आऊंगा वहां कृतिदेव में व्यंग्य लिखूंगा तो वह सत्रह-अठारह शब्दों  से कम क्या होगा। पढ़ पाओगे?’’</p>
<p>वह मित्र बोला-‘‘नहीं यार, ऐसा गजब मत करना। भले ही देर से फार्म में आना पर अपने व्यंग्य और कहानी छोटे रूप में ही लिखना।’’  </p>
<p>पिछले एक वर्ष पर शायद लिखने के अलावा मेरे पास अधिक नहीं है। इस लेख को पढ़ने वाले तो यही कहेंगे कि हम तो जैसे पहले पढ़ रहे थे वैसे ही अब भी पढ़ रहे हैं पर मेरे लिये वैसा लिखना नहीं है जैसा पहले लिखता था। मेरे यह लेख वैसे ही लिखा जा रहा है जैसे मैं एक वर्ष पहले लिख रहा था पर अब आप परिवर्तित टूल से इसे यूनिकोड में पढ़ रहे हैं और  मैं इसे कृतिदेव में सहजतापूर्वक टाईप कर रहा हूं।</p>
<p>जब आया तो केवल फोरम था नारद। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने के लिये तीन फोरम और हैं-ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लाग्स। मेरे मित्रों की जो संख्या है उससे मै संतुष्ट हूं। मुझे किसी से कोई गिला नहीं है। मैने जो भी लिखा स्वविवेक से लिखा और ब्लागरों पर कुछ लिखा तो इसलिये क्योंकि इसे  समाज में स्थापित एक नया वर्ग या जाति मानता हूं। यह मेरे स्वभाव में ही है कि मैं अपने देश के पुराने अध्यात्मिक स्वरूप को बहुत मानता हूं पर जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम बने समूहों को एक भ्रम मानता हूं। किसी भी ब्लाग पर जाता हूं तो ऐसा लगता है कि अपने स्वजातीय बंधु का लिखा पढ़ने आया हूं। यूनिकोड में असहज परिस्थतियों में  भी सहजता से पूरी ताकत से लिखा पर कृतिदेव में लिखते हुए मुझे ताकत का उपयोग नहीं करना पड़ता। सच कहूं तो मुझे ब्लाग जगत से निकाल दिया क्योंकि यूनिकोड में सीधे न लिखकर मैं ऐसा ही अनुभव करता हूं।  </p>
<p>आखरी बात ब्लागरों ने कृतिदेव से हटाकर यूनिकोड में लिखकर एक तरह से मेरे लेखक को बेहोश कर दिया पर अब कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल देकर उसे फिर होश में लाये। हिंदी में लिखने की प्रतिबद्धता तो बचपन से ही मेरे मन में आ गयी थी और इसी कारण मैं सभी हिंदी में लिखने वालों का सम्मान करता हूं। लिखना कोई आसान काम नहीं है जो भी लिख रहे हैं वह एक असाधारण काम कर रहे हैं।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब बंद हो गया हकलाते हुए लिखना ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 07:22:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</guid>
<description><![CDATA[     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल पर लिखना शुरू कर रहा हूं। रोमन लिपि में लिखकर हिंदी लिखता तो कहीं न कही मन में अस्वभाविकता का अनुभव तो होता ही था-एसा लगता था कि हकलाते और तुतलाते  हुए ही लिख रहा हूं। मैने नारद पर अपनी जो पहली पोस्ट लिखी थी  उसका शीर्षक ही था ‘मैं हकलाते हुए लिख रहा हूं’। उसके  बाद भी बहुत लिखा पर हमेशा कहीं न कहीं यह लगता  कि अपना मौलिक स्वरूप जब खुद ही नहीं दिख पा रहा हूं तो दूसरे क्या देख पाते होंगे।</p>
<p>    कृतिदेव में  कल से यह मेरी छठी पोस्ट है। कल कृतिदेव का हिंदी टूल जब अपने डेस्कटाप पर ला रहा था तो शंका थी कि वह सफल होगा क्यांकि पहले भी ऐसे ही दो टूलों पर मैं अपना समय खराब कर चुका था-हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि वह टूल गलत थे। हो सकता है कि मुझे उपयोग करना ही नहीं आता हो। संभवत: मेरा कंप्यूटर उसे स्वीकार नहीं करता हो। ऐसे टूल रहे होंगे इसमें तो मुझे यकीन था क्योंकि अंतर्जाल की दो पत्रिकाओं हिन्दी नेस्ट और अभिव्यक्ति-अनुभूति ने मेरी देव और कृतिदेव फोट में भेजी गयी रचनाओं को संभवतः इन्हीं टूलों  से यूनिकोड में बदल कर प्रकाशित किया गया होंगा। इसके बावजूद मैं एक वर्ष तक इन टूलों से दूर रहा तो इसका कारण यही हो सकता है कि यह टूल पूरी तरह सौ प्रतिशत उपयोगी नहीं रहे होंगे या इनका स्थानांतरण कठिन होगा। ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैने कुछ साथी ब्लागरों को यह लिखते हुए देखा कि हमें तो कृतिदेव में ही काम करना पसंद करते है।’ इधर यह भी स्वीकार करते थे कि वह यूनिकोड में लिख रहे है।</p>
<p>    मैं इन चर्चाओं पर नजर रखता था। एक बार तो मैने लिख  भी दिया था कि ऐसा कोई प्रमाणिक टूल आयेगा तो वह गूगल से ही आयेगा।  कल जब मैने एक  ब्लाग  देखा और उसमें इस टूल को अपने डेस्कटाप पर लाया। जब इसमें मैने अपनी कृतिदेव में टंकित सामग्री यूनिकोड में रखी और क्लिक किया तो जो सामने परिणाम आया उसे मन खुश हो गया। यूनिकोड का उपयोग के इस्तेमाल की बात करें तो कह सकते हैं कि कुछ नहीं से तो जो है वहीं ठीक है। अपनी अभिव्यक्ति करने के लिये रोमन लिपि का हिंदी टूल का उपयोग किया पर कृतिदेव का परिवर्तित टूल का कल से इतना उपयोग कर लिया है कि अब उसमें सीमित दिलचस्पी रह गयी। वह भी कभी कमेंट लगाने या शीर्षक के लिये काम में लेंगे। </p>
<p>    यह टूल बहंत पहले नहीं मिला इसको लेकर मन में कोई निराशा भी नहीं है। वजह यह है कि यूनिकोड में बहुंत कठिनाई से लिखते थे पर वह संघर्ष कई एसी हास्य कविताओं का जन्मदाता बना जिसके न होने पर संभव नहीं होता। कई बार अच्छा और मजेदार ख्याल आया तो उस पर बड़ा व्यंग्य लिखने की बजाय छोटी हास्य कविताएं लिख दीं और वह पंसद की गयीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि महापुरूषों के संदेश सुबह लिखने का मन बनाया क्यांकि अपने निजी जीवन और लेखन  में उनके संदेशों पर आधुनिक संदर्भ में व्याख्या को कई  लोगों ने बहुत पसंद किया। जब शूरूआत की तो कम समय होने के कारण हमने सीधे संदेश ही लिखे ताकि मन को तसल्ली रहे कि हम यहां भी वही कर रहे है। पिछले पंद्रह दिन से अपनी टंकण की  अपनी गति को बढ़ा हुआ देखा तो वर्तमान संदर्भ में   व्याख्या देने का काम शूरू किया तब तक यह टूल आ गया। यह टूल आफलाइन भी काम कर रहा है इसलिए इंटरनेट को खोलकर बैठने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा कोई शब्द गलत दिख जाये तो उसे बीच में ठीक किया जा सकता है जबकि दूसरे टूलों पर यह त्रटियां ठीक करने में कठिनाई आती थी।</p>
<p>     कई बार जब व्यंग्य या कहानी लिखने का मन आता  तो पहले तो यह सोचना पड़ता था कि वह कितना लंबा खिंचेगा। जब लगता  कि वह लंबा खिंचेगा तो फिर मन नहीं होता था। कृतिदेव में इस चिंता से मुक्त रहेंगे। एक बैठक में नहीं तो अगली बैठक में उसे पूरा कर सकते है-क्योंकि उसको तो अपने वर्ड  प्रोग्राम में ही तो रखना है।<br />
कुल मिलाकर अभी तक हकलाते और तुतलाते लिख रहे थे पर अब लगता है कि वह बंद हो गया है। सबसे बड़ी बात यह कि इसमें हमारी आंखें नहीं थकेंगी क्योंकि इसमें हमें कंप्यूटर की तरह देखने की जरूरत ही नहीं है। अगर कोई कागज या किताब  सामने  रखकर लिखते जायेगे जबकि यूनिकोड में सामने भी देखना पड़ता है कि अक्षर सही आया कि नही