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	<title>web-jagran &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/web-jagran/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "web-jagran"</description>
	<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 08:25:09 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA['काश! हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=477</link>
<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 15:21:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=477</guid>
<description><![CDATA[ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की<br />
चाहत किसमें नहीं होती<br />
पर परिंदों जैसी<br />
किस्मंत सभी की नहीं होती<br />
उड़ते हैं आसमान में<br />
पर उसे छू कर देखने की<br />
ख्वाहिश उनमें नहीं होती<br />
उड़ नहीं सकता आसमान में<br />
फिर भी इंसान की<br />
नजरें उसी पर होती<br />
उड़ते हुए परिंदे<br />
आसमान से जमीन पर भी आ जाते<br />
पर इंसान के कदम जमीन पर होते<br />
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते<br />
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें<br />
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए<br />
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें<br />
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती<br />
अपने पैर में जंजीरें डालकर<br />
आदमी फिर भी कहता है<br />
'काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'<br />
-----------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला होना चाहिए-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=472</link>
<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 15:44:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=472</guid>
<description><![CDATA[यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर
कुदरत का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर<br />
कुदरत का खजाना<br />
बटोरने वाला चाहिए<br />
बेजान चीजों पर दिल लगाने<br />
को सब हो जाते हैं तैयार<br />
जानदार की परवाह<br />
करने वाले होना चाहिए<br />
इस जहां में दूसरों की कदर कौन करेगा<br />
पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला<br />
दिमाग से सोचने वाला इंसान चाहिए<br />
...............................</p>
<p>किसी के पास ज्ञान का<br />
किसी के पास विज्ञान का<br />
किसी की पास शिक्षा का है ठेका<br />
किसी ने लिया है<br />
इंडियन आइडियल बनाने का<br />
किसी के पास है विश्व चैंपियन<br />
बनाने का ठेका<br />
पालक अपने बालकों को<br />
उनसे पास भेजकर सोचते हैं<br />
सब काम अपने आप हो जायेंगे<br />
अब वह सिरमौर ही बनकर घर  आएंगे</p>
<p>जो सफल हो  जाते हैं वह<br />
गाते  हैं ठेकेदारों की महिमा<br />
जो असफल हौं वह अपनी<br />
किस्मत को दोष देकर रह जाते हैं<br />
हर तरह की गारंटी वाला<br />
सब जगह चल रहा है ठेका</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द कितना था और कितने जाम पिये -हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=80</link>
<pubDate>Sun, 17 Aug 2008 10:14:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=80</guid>
<description><![CDATA[
यूं तो शराब के कई जाम हमने पिये
दर्द कम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
यूं तो शराब के कई जाम हमने पिये<br />
दर्द कम था पर लेते थे हाथ में ग्लास<br />
उसका ही नाम लिये<br />
कभी इसका हिसाब नहीं रखा कि<br />
दर्द कितना था और कितने जाम पिये </p>
<p>कई बार खुश होकर भी हमने<br />
पी थी शराब<br />
शाम होते ही सिर पर<br />
चढ़ आती<br />
हमारी अक्ल साथ ले जाती<br />
पीने के लिये तो चाहिए बहाना<br />
आदमी हो या नवाब<br />
जब हो जाती है आदत पीने की<br />
आदमी हो जाता है बेलगाम घोड़ा<br />
झगड़े से बचती घरवाली खामोश हो जाती<br />
सहमी लड़की दूर हो जाती<br />
कौन मांगता जवाब<br />
आदमी धीरे धीरे शैतान हो जाता<br />
बोतल अपने हाथ में लिये</p>
<p>शराब की धारा में बह दर्द बह जाता है<br />
लिख जाते है जो शराब पीकर कविता<br />
हमारी नजर में भाग्यशाली समझे जाते हैं<br />
हम तो कभी नहीं पीकर लिख पाते हैं<br />
जब पीते थे तो कई बार ख्याल आता लिखने का<br />
मगर शब्द साथ छोड़ जाते थे<br />
कभी लिखने का करते थे जबरन प्रयास<br />
तो हाथ कांप जाते थे<br />
जाम पर जाम पीते रहे<br />
दर्द को दर्द से सिलते  रहे<br />
इतने बेदर्द हो गये थे<br />
कि अपने मन और तन पर ढेर सारे घाव ओढ़ लिये </p>
<p>जो ध्यान लगाना शूरू किया<br />
छोड़ चली शराब साथ हमारा<br />
दर्द को भी साथ रहना नहीं रहा गवारा<br />
पल पल हंसता हूं<br />
हास्य रस के जाम लेता हूं<br />
घाव मन पर जितना गहरा होता है<br />
फिर भी नहीं होता असल दिल पर<br />
क्योंकि हास्य रस का पहरा होता है<br />
दर्द पर लिखकर क्यों बढ़ाते किसी का दर्द<br />
कौन पौंछता है किसके आंसू<br />
दर्द का इलाज हंसी है सब जानते हैं<br />
फिर भी नहीं मानते हैं<br />
दिल खोलकर हंसो<br />
मत ढूंढो बहाने जीने के लिये<br />
........................... </strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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<a href="http://rajdpk2.wordpress.com">लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</a></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=388</link>
<pubDate>Sat, 16 Aug 2008 16:48:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=388</guid>
<description><![CDATA[मन के समंदर में उठती लहरें
कई नाम है जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मन के समंदर में उठती लहरें<br />
कई नाम है जो नाव की तरह<br />
लहराते निकल जाते हैं<br />
जिसका किनारा आ गया<br />
वह साथ छोड़कर चला गया<br />
वह लहरें भी रूप बदल देती<br />
जिनके साथ वह खेल जाते हैं<br />
एक लहर आती, एक नाव ले आती<br />
उसके रुखसत होने के पहले ही<br />
दूसरी उठती नजर आती<br />
हर किसी का मन है समंदर<br />
सबकी अलग अलग कहानी हैं<br />
कुछ लहरों के साथ ही बहते<br />
तो कुछ दृष्टा बनकर<br />
लहर और नाव का खेल देखते जाते हैं<br />
मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम<br />
हाथ में तो सबके किरकिरी नजर आती है<br />
...............................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गरीबों का नाम बहुत बड़ा, दर्शन होता है छोटा-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=77</link>
<pubDate>Wed, 13 Aug 2008 15:56:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=77</guid>
<description><![CDATA[एक टीवी चैनल पर प्याज के बढती कीमतों प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक टीवी चैनल पर प्याज के बढती कीमतों पर लोगों के इन्टरव्यू आ रहे थे, और चूंकि उसमें सारा फोकस मुंबई और दिल्ली पर था इसलिये वहाँ के उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों से बातचीत की जा रही थी। प्याज की बढती कीमतें देश के लोगों के लिए और खास तौर से अति गरीब वर्ग के लिए चिंता और परेशानी का विषय है इसमें कोई संदेह नहीं है पर जिस तरह उसका रोना उसके ऊंचे वर्ग के लोग रोते हैं वह थोडा अव्यवाहारिक और कृत्रिम लगता है। उच्च और मध्यम वर्ग के लोग यही कह रहे थे किश्प्याज जो पहले आठ से दस रूपये किलो मिल रहा था वह अब पच्चीस रूपये होगा। इसे देश का गरीब आदमी जिसका रोटी का जुगाड़ तो बड़ी मुशिकल से होता है और वह बिचारा प्याज से रोटी खाकर गुजारा करता है, उसका काम कैसे चलेगाश्?</p>
<p>अब सवाल है कि क्या वह लोग प्याज की कीमतों के बढने से इसलिये परेशान है कि इससे गरीब सहन नहीं कर पा रहे या उन्हें खुद भी परेशानी है? या उन्हें अपने पहनावे से यह लग रहा था कि प्याज की कीमतों के बढने पर उनकी परेशानी पर लोग यकीन नहीं करेंगे इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपने साक्षात्कार को प्रभावी बना रहे थे। हो सकता है कि टीवी पत्रकार ने अपना कार्यक्रम में संवेदना भरने के लिए उनसे ऐसा ही आग्रह किया हो और वह भी अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए ऐसा करने को तैयार हो गये हौं। यह मैं इसलिये कह रहा हूँ कि एक बार मैं हनुमान जी के मंदिर गया था और उस समय परीक्षा का समय था। उस समय कुछ भक्त विधार्थी मंदिर के पीछे अपने रोल नंबर की पर्ची या नाम लिखते है ताकि वह पास हो सकें। वहां ऐक टीवी पत्रकार एक छात्रा को समझा रहा थाश्आप बोलना कि हम यहाँ पर्ची इसलिये लगा रहे हैं कि हनुमान जीं हमारी पास होने में मदद करें।श्<br />
उसने और भी समझाया और लडकी ने वैसा ही कैमरे की सामने आकर कहा। वैसे उस छात्र के मन में भी वही बातें होंगी इसमें कोई शक नहीं था पर उसने वही शब्द हूबहू बोले जैसे उससे कहा गया था।</p>
<p>प्याज पर हुए इस कार्यक्रम में जैसे गरीब का नम लिया जा रहा था उससे तो यही लगता था कि यह बस खानापूरी है। मेरे सामने कुछ सवाल खडे हुए थे-<br />
क्या इसके लिए कोई ऐसा गरीब टीवी वालों को नहीं मिलता जो अपनी बात कह सके। केवल उन्हें शहरों में उच्च और मध्यम वर्ग के लोग ही दिखते हैं, और अगर गरीब नहीं दिखते तो यह कैसे पता लगे कि गरीब है भी कि नहीं। जो केवल प्याज से रोटी खाता है उसका पहनावा क्या होगा यह हम समझ सकते हैं तो यह टीवी पत्रकार जो अपने परदे पर आकर्षक वस्त्र पहने लोगों को दिखाने के आदी हो चुके हैं क्या उससे सीधे बात कराने में कतराते हैं जो वाकई गरीब है। उन्हें लगता है कि गरीब के नाम में ही इतनी ही संवेदना है कि लोग भावुक हो जायेंगे तो फिर फटीचर गरीब को कैमरे पर लाने की क्या जरूरत है। जो गरीब है उसे बोलने देना का हक ही क्या है उसके लिए तो बोलने वाले तो बहुत हैं-क्या यही भाव इन लोगों का रह गया है। आजादी के बाद से गरीब का नाम इतना आकर्षक है कि हर कोई उसकी भलाई के नाम पर राजनीति और समाज सेवा के मैदान में आता है पर किसी वास्तविक गरीब के पास न उन्हें जाते न उसे पास आते देखा जाता है। जब कभी पैट्रोल और डीजल की दाम बढ़ाये जाते है तो मिटटी के तेल भाव इसलिये नही बढाए जाते क्योंकि गरीब उससे स्टोव पर खाना पकाते हैं। जब कि यह वास्तविकता है कि गरीबों को तो मिटटी का तेल मिलना ही मुश्किल हो जाता है। देश में ढ़ेर सारी योजनाएं गरीबों के नाम पर चलाई जाती हैं पर गरीबों का कितना भला होता है यह अलग चर्चा का विषय है पर जब आप अपने विषय का सरोकार उससे रख रहे हैं तो फिर उसे सामने भी लाईये। प्याज की कीमतों से कोई मध्यम वर्ग कम परेशान नहीं है और अब तो मेरा मानना है कि मध्यम वर्ग के पास गरीबों से ज्यादा साधन है पर उसका संघर्ष कोई गरीब से कम नहीं है क्योंकि उसको उन साधनों के रखरखाव पर भी उसे व्यय करने में कोई कम परेशानी नहीं होती क्योंकि वह उनके बिना अब रह नहीं सकता और अगर गरीब के पास नहीं है तो उसे उसके बिना जीने की आदत भी है। पर अपने को अमीरों के सामने नीचा न देखना पडे यह वर्ग अपनी तकलीफे छिपाता है और शायद यही वजह है कि ऐक मध्यम वर्ग के व्यक्ति को दूसरे से सहानुभूति नहीं होती और इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपनी समस्या भी कह जाते है और अपनी असलियत भी छिपा जाते हैं। यही वजह है कि टीवी पर गरीबों की समस्या कहने वाले बहुत होते हैं खुद गरीब कम ही दिख पाते हैं। सच तो यह है कि गरीबों के कल्याण के नारे अधिक लगते हैं पर उनके लिये काम कितना होता है यह सभी जानते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[कही पर अनसुनी बात भी अपना काम कर जाती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=467</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 14:51:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=467</guid>
<description><![CDATA[कभी-कभी उदास होकर
चला जाता हूँ भीड़ मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कभी-कभी उदास होकर<br />
चला जाता हूँ भीड़ में<br />
सुकून ढूँढने अपने लिए<br />
ढूँढता हूँ कोई हमदर्द<br />
पर वहाँ तो खडा रहता है<br />
हर शख्स अपना दर्द साथ लिए<br />
सुनता हूँ जब सबका दर्द<br />
अपना तो भूल जाता हूँ<br />
लौटता हूँ अपने घर वापस<br />
दूसरों का दर्द साथ लिए</p>
<p>कोई नहीं सुनता पर फिर भी सुनाकर<br />
दिल को तसल्ली तो हो जाती<br />
दूसरे के दर्द की बात भला<br />
अपने दिल में कहां ठहर पाती<br />
कही पर अनसुनी बात भी अपना काम कर जाती<br />
कभी सोचता हूँ कि<br />
अगर इस जहाँ में दर्द न होता<br />
तो हर शख्स कितना बेदर्द होता<br />
फिर क्यों कोई किसी का हमदर्द होता<br />
कौन होता वक्ता, कौन श्रोता होता<br />
तब अकेला इंसान जीवन गुजारता<br />
अपना दर्द पीने के लिए</strong><br />
................................................</p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हवाई मुद्दों का सौदा-लघु कथा]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=464</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 13:00:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=464</guid>
<description><![CDATA[कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम और तस्करी का सामान लिये हुए थे कुछ लोग अपने हाथ में जमीन के असली और नकली कागज पकड़े हुए थे। यह ऐसे लेनदेन का काम करते थे जिसे दो नंबर का कहा जाता है पर लेबल उस पर एक नंबर का ही होता है। इनको शराब,अफीम और भूमाफिया भी कहा जाता है यह नाम इनको मीडिया वालों ने सम्मान के रूप में दिया है ताकि कोई इनको अपराधी न कहे। </p>
<p>हुआ यू कि एक दिन यह सब  माफिया अपने हाथ में हमेशा की तरह अपने व्यवसाय के अनुसार सारे सामान लिये बाजार में जा रहा था तो देखा कि कोई कलम कागज लिये तो कोई कैमरा लिये अपने भागता हुआ उनके पीछे आ रहा है। सबके माथे की पट्टी पर हुआ था ‘मीडिया’। उनकेा आते देखकर माफिया के सरदार ने कहा-‘भागो,यह मीडिया वाले आ रहे हैं। हम जिन इलैक्ट्रोनिक सामान की तस्करी कर लाते थे उससे यह मीडिया बहुत पावरफुल हो गया है। यह हमारा स्टिंग आपरेशन करने वाला है सो भागो।’<br />
तब उनमें से एक बोला-‘आने दो। हम उनके सरदार से बात कर लेते हैं। अरे, इस जमाने में और भी मामले में हैं। हमें दिखाकर इनको क्या मिलेगा?’</p>
<p>तब तक मीडिया वाले भी वहां पहुंच गये और लगे फोटो खींचने और साक्षात्कार लेने-‘आपको यह धंधा करते हुए कैसा लग रहा है?’<br />
‘क्या आपको कोई पकड़ता नहीं है।’<br />
आपके धंधे के मूल मंत्र क्या हैं?’<br />
एक माफिया ने मीडिया के सरदार से कहा-‘यार, तुम आज हमारी बदौलत ही इतने पावरफुल हुए हो। अगर हमारी भद्द पिटी तो तुम्हारा भी बुरा हाल होगा।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘पर अब बताओ हम करें क्या? दिखाने और छापने के लिये कुछ सनसनीखेज तो चाहिए।’<br />
माफिया सरदार ने कहा-‘यार, इसका मतलब तुम हमें ही निपटा दोगे। समाज ने अगर हमसे डरना बंद कर दिया तो सबसे पहले तुम्हारा ही पता कटेगा। तुम लोग भी कोई दूध को धुले नहीं हो।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘अब तुम्हीं बताओ। हम अपना काम कैसे चलायें। सनसनी खबरें कब तक और कहां से लायें।<br />
समझदार माफिया ने कहा-‘चलो अभी मास्टर माइंड के यहां चलते हैं। वह कोई न कोई रास्ता निकाल देगा। वह हवा में तीर चलाने की कला में माहिर है।’</p>
<p>दोनों मास्टर माइंड के पास पहुंचे। उसने कहा-‘मेरे को माल देते जाओ। माफिया वाले अपना काम करते रहें और मीडिया वालों को भी मुद्दे ढूंढने के लिये कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है। उनके घर पर रोज नये मुद्दे पहुंच जायेंगे, पर उस पर बहस अधिक करना पर मूल विषय पर कभी नहीं जाना क्योंकि वह केवल हवाई मुद्दे होंगें।</p>
<p>मीडिया और माफिया दोनों के सरदारों ने उत्सुकता से पूछा ? कैसे?’<br />
मास्टर माइंड ने कहा-‘यह जमीन खाली पड़ी है। इस पर किसी मकान बनाने का प्रस्ताव पहले उछालेंगे और फिर बहस करवायेंगे। इस पर तुम्हारा समय अच्छा निकल जायेगा। बस यह कहने की कोशिश बिल्कुल मत करना कि इस इमारत बनी तो नहीं बनी तो क्या फर्क पड़ना है क्योंकि इससे विषय बिल्कुल खत्म हो जायेगा। यह देखो पेड़ से पता गिर गया है इसका सीधा प्रसारण करना और पर्यावरण पर भारी संकट घोषित करना। ऐसे दिखाना जैसे कि पूरा पेड़ गिर गया है।  किसी ऐसे विद्वान को मत बुलाना जो कहे कि ऐसे तो पते रोज गिरते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कहीं मंदिर का मामला होगा तो कहीं दहेज का सब जगह अपनी टांग ऐसे फंसाना जैसे वह राष्ट्रीय मामला हो।’</p>
<p>मीडिया के सरदार ने कहा-‘यह तो हम ही कर लेंगे। फिर तुम्हारी क्या जरूरत है?’<br />
 माफिया वाले हमें ही ऐसे मुद्दे बनाने के लिये किराये पर लें तो क्या फर्क पड़ता है।’<br />
मास्टर माइंड हंस पड़ा-‘लोगों को कहां से लाओगे? यह काम तो हम ही कर सकते हैं। यह भीड़ को भेड़ की तरह हांकने वाले सरदार भी हैं जो अपनी ताकत रखते हैं वह हमारी  सलाह ही मानते  हैं भले ही तुम दोनोे की कृपा पर वह भी चलते हैं। जिंदा सांप से अधिक मरे हुए सांप को जीवंत मुद्दा बनाना  इतना आसान नहीं है। इसलिये तुम्हें हमेशा ऐसे हवाई मुद्दों के लिये हम पर निर्भर रहना पड़ेगा।’<br />
इस तरह तीनों के बीच हवाई मुद्दों को बनाये रखने का फैसला हुआ।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी जुबान से स्वयं को आजाद बताते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=461</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 15:33:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=461</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज लाया अखबार और बोला
‘बापू हम लो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फंदेबाज लाया अखबार और बोला<br />
‘बापू हम लोग बेकार में अपनी<br />
व्यवस्था का मजाक उड़ाते<br />
बिचारे अंग्रेज भी ऐसी ही<br />
व्यवस्था में अपनी सांस फंसी पाते<br />
देखो अखबार में लिखा<br />
वहां भी दफ्तरों में कागज पर<br />
अधिक होता काम<br />
जमीन पर लगता है जाम<br />
फाईलों अधिक चलती हैं<br />
व्यवस्था में लगे लोगों के कारण<br />
वहां भी जनता अपने हाथ मलती है<br />
तसल्ली हो गयी है<br />
जो दर्द हमें दे गये यहां पर अंग्रेज<br />
उसके अहसास में खुद भी जले जाते’</p>
<p>सुनकर पहले गुस्से में उसे देखा<br />
और फिर मुस्कराते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘फिर काहे आजादी का जश्न मनाते<br />
जब उनके पदचिन्हों पर ही चल कर खुश हो जाते<br />
यह आजादी कितना भ्रम है<br />
यह तुम्हें अब आया ज्ञान<br />
ज्ञानियों ने तो पहले ही लिया था मान<br />
अंग्रेज जाते जाते अपनी शिक्षा और संस्कृति<br />
यहां अपने अग्रजों को सौंप गये थे<br />
आजादी के नाम गुलामी का छुरा घौंप गये थे<br />
पूर्वजों की तरह जो चला रहे हैं व्यवस्था<br />
नहीं हैं उनके व्यवस्थापक होने की अवस्था<br />
कदम कदम पर अंग्रेजियत का बोलाबाला है<br />
हर घर में लगा अक्ल का ताला है<br />
बिना पढ़े लिखो<br />
साहब जैसा हमेशा दिखो<br />
जो लिखो कोई पढ़कर समझे नहीं<br />
समझे तो कुछ पूछने की हिमाकत करे नहीं<br />
अपने मतलब से नियम बनाओ<br />
खुद न चलो दूसरे को चलाओ<br />
अंग्रेजी पढ़कर रोटी मिलेगी<br />
इस पर चले हैं सब देश में<br />
फिर भी घूम रहे हैं बेरोजगार के वेश  में<br />
अंग्रेजों बिना किताब के नियम पर चलते हैं<br />
पर यहां चलने से पहले नियम बनते हैं<br />
कागजों में हो गयी आदमी की जिंदगी<br />
नौकर बनने के लिये कर रहे हैं<br />
बड़े बड़े लोगों की बंदगी<br />
आजादी एक नारा थी<br />
सच में मिली कहां<br />
शिखर पर बैठे पुतलों के चेहरे बदले<br />
जमीन में खड़ा आदमी तो अभी भी<br />
मुश्किलों में है वहां<br />
जिस पर है पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति<br />
उसकी करते हैं सब गुलामों जैसी भक्ति<br />
बन गये हैं जो खास आदमी<br />
वह समझतें है जैसे गुलाम हैं सब उनके आम आदमी<br />
सच पर पहरे बहुत हैं<br />
जितना बाहर आने की करता हम छिपाते<br />
कोई हंसे नहीं इसलिये<br />
अपनी जुबान से स्वयं को आजाद बताते<br />
अंग्रेज जो अंग्रेजियत छोड़े गये<br />
उसके हम भी गुलाम है<br />
पर फिर भी आजादी की जंग कहां शुरू कर पाते<br />
.............................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मस्तराम के नाम से असत् साहित्य की  लोकप्रियता से हिंदी को लाभ नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=457</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 15:24:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=457</guid>
<description><![CDATA[मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अंतर्जाल पर मस्तराम के नाम से कई लोग लिख रहे हैं यह अलग बात है हर कोई अपने साथ अपना नाम या अपना तख्ल्लुस जोड़ देता है।<br />
मैंने एक बार अपने एक ब्लाग में नाम के साथ ही मस्तराम भी जोड़ दिया। वह मेरा एक फालतू ब्लाग था और गूगल के इंडिक टूल मिलने से पहले उस पर लिखकर वहां से कापी कर दूसरे ब्लाग पर पोस्ट करता था। इस दौरान ब्लाग लेखक मित्रों ने विकिपीडिया का हिंदी टूल दिया। उससे कुछ दिन लिखा तो कंप्यूटर खराब हो गया क्योंकि वह पहले ही वाइरस ग्रस्त था। बाद में जब उसका हिंदी टूल लोड किया तो वह अधिक हिंदीमय हो गया था और इसलिये फिर अपने ब्लाग पर ही लिखने लगा। गूगल का इंडिक टूल आने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही इसलिये मेरे कम से कम चार फालतू ब्लाग ऐसे ही रह गये।  इनमे एक पर उठाकर मस्तराम लिखा और उस पर अपनी रचनाओं पर लेबल लगाने लगा साथ ही कुछ इधर उधर से पोस्ट रखने लगा। </p>
<p>हैरानी की बात यह रही वह मस्तराम नाम धारी ब्लागों में वह हिट पाने लगा। इसी बीच मैंने एक ब्लाग पर मस्तराम के बारे में पढ़ा। पता लगा कि मस्तराम ‘आवारा’ के नाम से  हिंदी फोरमों पर जो दो पंजीकृत ब्लाग हैं का नाम भी उनमें शुमार है और उन्होंने इस संबंध में विवाद उठा जो बाद में शांत हो गया। तब मेरी दिलचस्पी इसमें जागी। इसके बाद मैंने अपने मस्तराम के नामधारी ब्लाग की जांच की तो पाया कि चिट्ठाजगत ने उनको अपने यहां रख कर दिखाना शुरू किया। उनमें मेरा वास्तविक नाम था इसलिये चिट्ठाजगत वालों को यह पता था कि यह किसके ब्लाग हैं। उन्होनें मेरे ब्लाग स्पाट के एक और वर्डप्रेस के दो ब्लाग इस तरह मुझसे पूछे  बिना रख लिये। चूंकि मैं उनको प्रयोग पर जारी रखे हुए हूं और उन पर कोई नयी पोस्ट नहीं रखता पर जो भी रखता हूं वह चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर चला जाता है। इसलिये मैंने उनके नाम से मस्तराम हटा लिया पर उसके बाद अन्य ब्लाग पर लिखा। आज पता लगा कि वह भी चिट्ठाजगत वालों ने ले लिया। </p>
<p>मस्तराम अंतर्जाल पर बिना किसी सहायता के हिट पाने का एक उपाय है पर लोग उस पर कोई साहित्य पढ़ने नहीं आते। ऐसा लगता है कि गूगल से जुड़े या अन्य पुराने ब्लाग लेखकों ने अंतर्जाल पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिये मस्तराम के नाम से लिखना शुरू किया। गूगल के तो विज्ञापनों में ही इतनी गंदी गालियां लिखी हुईं हैं कि उन्हें यहां कोई लिखना ही नहीं चाहेगा। एक ब्लाग लेखक ने यौन साहित्य लिखा उसमेंं कुछ अश्लील नहीं था पर उसके अनुसार  उसके ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है और किसी ने गूगल को इसकी शिकायत की है उसका यह परिणाम है। मैंने उसे समझाया कि उसकी ब्लाग स्पाट की सैटिंग में गड़बड़ी है वह उसे चेक कर ले। मैंने अपने ब्लागस्पाट के एक ब्लाग पर वह कर देखा था जिससे वह चेतावनी अपने आप आने लगती है। मैंने उसे यह भी लिखा कि उसका ब्लाग क्या किसी का भी ब्लाग गूगल केवल इस कारण बैन नहीं कर सकता क्योंकि उसके विज्ञापनों के शीर्षकों में ऐसी गालियां हैं कि उन्हें कोई सामान्य हिंदी ब्लागर अपने अंदर पाठ में भी नहीं लिख सकता। </p>
<p>मस्तराम कोई असली नाम नहीं हैं और कई छद्म नाम के लोग इस पर लिख रहे हैं। हिंदी का कोई फोरम कभी भी उनको अपने यहां नहीं लिंक देता क्योंकि उनको अपनी श्वेत छबि बनाये रखने के लिये उससे दूर रहना ही श्रेयस्कर लगता है। चूंकि मेरे वह ब्लाग अन्य ब्लाग की तरह सामान्य पाठों हैं इसलिये उनको चिट्ठाजगत वाले लिंक देते हैं। संदेह के घेरे में वह इसलिये हैं कि वह मस्तराम शब्द डालकर ही वहां जाते हैं क्योंकि उन ब्लाग पर जितने भी हिट आये वह इसी शब्द से आये। हिंदी फोरमों पर दिख रहे हिंदी ब्लाग पर कभी कभार मस्तराम के नाम से लिखे जा रहे  ऐसे वैसे साहित्य पर चर्चा होती है पर कोई यह नहीं कहता कि हम भी वहां जाते हैं। सच तो यह है कि कई ब्लाग लेखक वह तांक झांक करते हैं नहीं तो मेरे ब्लाग उनके दृष्टिपथ में कैसे आते। </p>
<p>मस्तराम ‘आवारा’ से मैंने जिज्ञासावश एक पूछा था कि उनके ब्लाग पर कितने व्यूज आते हैं। बहुत दिन बाद उन्होंने अपने जवाब में बताया कि प्रतिदिन दोनों ब्लाग पर चालीस से पचास व्यूज आते हैं। जिस दिन पोस्ट नयी होती है उस दिन चारों फोरमों से भी जमकर व्यूज आते हैं। उससे एक बात तो लगी कि मस्तराम वाकई अपने आप में हिट दिलवाने वाला नाम है।  वह ब्लाग चेक किये तो उनका पता ही मस्तराम से शूरू है जबकि मैंने जी वगैरह लगाकर पता बनाया है। इसके बावजूद उस पर इतने हिट तो आ ही जाते हैं जो अन्य सामान्य ब्लाग पर नहीं आते। एक बार ख्याल आया था कि मैं भी ऐसा पता बनाऊं पर <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथी</a> और <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> के व्यूज देखकर मन नहीं माना। वह दोनों ही अध्यात्म के दम पर 20 से 25 व्यूज कभी पचास व्यूज तब भी जुटा लेते हैं जब कोई उन पर पाठ नहीं होता।  फिर वर्डप्रेस पर मस्तराम की श्रेणी में भी मेरे पास व्यूज आते हैं। इससे एक बात पता लगती है कि मस्तराम नामधारी ब्लाग जमकर हिट ले रहे हैं पर जैसे जैसे हिंदी पर लिखा बढ़ता जायेगा सामान्य जन की रुचि बढ़ेगी और अंततःसत्साहित्य ही हिंदी का सारथी बनेग और उसकी ध्वजपताका अंतर्जाल पर फहरायेगा।  मस्तराम आवारा से एक बात और पता लगी कि उन ब्लाग पर  टिप्पणियां तभी आती हैं जब वह फोरमों पर होती है। तब मैंने सोचा कि जब मस्तराम शब्द से ही उसके ब्लाग खुल रहा है तो ब्लाग लेखक इतने तो समझदार हैं कि वह वहां टिप्पणियां नहीं लगायेंगे क्योंकि उससे पता लग जायेगा कि वह मस्तराम के इलाके में गये थे।<br />
वैसे हमारे इलाके में मस्तराम का इतना नाम प्रचलित नहीं है पर उस दिन एक आदमी ने बताया कि उसका नाम ऐसी वैसी रचनाओं के लिये खूब जाना जाता है। यही कारण है कि छद्म नाम से ऐसी वैसी रचनायें लिखने वाले वहां अपनी रचनाएं लिख रहे हैं और कुछ भले लोग भी हैं जो इस बात से बेखबर होकर ठीकठाक भी प्रस्तुति के साथ जुड़े हैं। ऐसा लिखने वालों के पुराने ब्लाग लेखकों होने का संदेह इसलिये भी जाता है कि तकनीकी और विज्ञापन की दृष्टि से वह जितना सुसज्तित हैं वह ज्ञान उन्हीं में संभव है। संभवतः हिंदी में लिखे गये वह पहले ब्लाग भी हो सकते हैं क्योंकि मैंने कई पर पांच वर्ष से अधिक पुरानी तारीखें देखीं हैं। मैं वहां अपने पाठकों के आने के मार्ग देखता हुआ वहां जाता हूं और इस दौरान वहां लिख पढ़ता हूं तो सोचता हूं चाहे कितने भी उन पर हिट हों हिंदी भाषा के समृद्धि करने का उनमें सामथर््य नहीं हैं।  बहरहाल अब मैं अपने नाम से मस्तराम नहीं हटाऊंगा क्योंकि यह मेरे प्रयोग का हिस्सा है। चिट्ठाजगत वाले हर ब्लाग अपने यहां ले जायेंगे तो मैं किस किसका नाम बदलूंगा। कहीं अगर मस्तराम दीपक भारतदीप पर दृष्टिपथ में आ जाये तो बाद वाला ही नाम पढ़ें क्योंकि पहला नाम तो प्रयोग के लिये है। अगर उनको हटाने से  तो मेरे प्रयोग प्रभावित होंगे। बहरहाल अंतर्जाल पर अनेक तरह के नये मसले सामने आते हैं जो केवल यहीं दिख सकते हैं और कहीं नहीं।  </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःसच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=74</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 04:25:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=74</guid>
<description><![CDATA[पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पापान्निवारयति योजयते हिताय<br />
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।<br />
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले<br />
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः</strong></p>
<p><strong>हिन्दी में भावार्थ- </strong>अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या-</strong>अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं। </p>
<p>आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[धूल ने क्लर्क को सिखाया-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=71</link>
<pubDate>Wed, 06 Aug 2008 15:53:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=71</guid>
<description><![CDATA[बहुत दिन बाद ऑफिस में
आये कर्मचारी ने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बहुत दिन बाद ऑफिस में</p>
<p>आये कर्मचारी ने पुराना</p>
<p>कपडा उठाया और</p>
<p>टेबल-कुर्सी और अलमारी पर</p>
<p>धूल हटाने के लिए बरसाया</p>
<p>धूल को भी ग़ुस्सा आया</p>
<p>और वह उसकी आंखों में घुस गयी</p>
<p>क्लर्क चिल्लाया तो धूल ने कहा</p>
<p>'धूल ने कहा हर जगह प्रेम से</p>
<p>कपडा फिराते हुए मुझे हटाओ</p>
<p>मैं खुद जमीन पर आ जाऊंगी</p>
<p>मुझे इंसानों जैसा मत समझो</p>
<p>कि हर अनाचार झेल जाऊंगी</p>
<p>इस तरह हमले का मैंने हमेशा</p>
<p>प्रतिकार किया है</p>
<p>बडों-बडों के दांत खट्टे किये हैं</p>
<p>जब भी कोई मेरे सामने आया '<br />
---------------</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[शायर और माशुका-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=66</link>
<pubDate>Tue, 05 Aug 2008 18:00:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=66</guid>
<description><![CDATA[माशुका ने शायर से कहा
‘बहुत बुरा समय थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>माशुका ने शायर से कहा<br />
‘बहुत बुरा समय था जब मैंने<br />
अपनी सहेलियों के सामने<br />
किसी शायर से शादी करने की कसम खाई<br />
तुमने मेरे इश्क में कितने शेर लिखे<br />
पर किसी मुशायरे में तुम्हारे शामिल होने की<br />
खबर  अखबार में नहीं आई<br />
सब सहेलियां शादी कर मां बन गयीं<br />
पर मैं उदास बैठी देखती हूं<br />
अब तो कोई मशहूर शायर<br />
देखकर शादी करनी होगी<br />
नहीं झेल सकती ज्यादा जगहंसाई’</p>
<p>शायर खुश होकर बोला<br />
‘लिखता बहुत हूं<br />
पर सुनने वाले कहते हैं कि<br />
उसमें दर्द नहीं दिखता<br />
भला ऐसा कैसे हो<br />
जब मैं तुम्हारे प्यार में<br />
श्रृंगार रस में डुबोकर शेर लिखता<br />
अब तो मेरे शेरों में दर्द की<br />
नदिया बहती दिखेगी<br />
जब शराब मेरे सिर पर चढ़कर लिखेगी<br />
अपने प्यार से तुम नहीं कर सकी मुझे रौशन<br />
मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी  दो जुदाई’</strong></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</guid>
<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल
सब कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
..........................................</p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द हमेशा अंतरिक्ष  में लहराते-हिंदी कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=64</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 14:51:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=64</guid>
<description><![CDATA[हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही<br />
जुबान से बाहर आता<br />
जो मनभावन हो तो<br />
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता<br />
नहीं तो खलनायक कहलाता<br />
संस्कृत हो या हिंदी<br />
या हो अंग्रेजी<br />
भाव से शब्द पहचाना जाता है<br />
ताव से अभद्र हो जाता </p>
<p>बोलते तो सभी है<br />
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है<br />
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो<br />
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो<br />
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते  ं<br />
पर जो मजदूरी मांगें<br />
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार  टांगें<br />
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं<br />
वातानुकूलित कमरों  में बैठे तो  हो जायें ‘सर‘<br />
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर<br />
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन<br />
जो मजदूर प्यार से बोले<br />
बैठने को भी नहीं देते लोग  उसे आसन<br />
शब्द का मोल समझे जों<br />
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर<br />
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता </p>
<p>शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते<br />
चाहे जहां लिखें और बोले जायें<br />
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं<br />
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते<br />
पर सुनने और पढ़ने वाले<br />
उस समय चाहे जैसा समझें<br />
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते<br />
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों<br />
शब्द ही हैं यहां अमर<br />
बोलने और लिखने वाले<br />
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते<br />
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ<br />
हमेशा अंतरिक्ष में लहराता<br />
...........................................................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://razlekh-hindi.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सही पता बताने वाले बहुत कम हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=449</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 12:24:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=449</guid>
<description><![CDATA[निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये
प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये</p>
<p>पर जब आया मौका साथ देने का</p>
<p>कई बहाने सुना दिये</p>
<p>हम आसरा फिर भी करते रहे</p>
<p>यही सोचकर कि कभी तो</p>
<p>उनके बहाने खत्म हो जायेंगे</p>
<p>और वह काम आयेंगे</p>
<p>इस इंतजार में कितने बरस गुजार दिये<br />
.......................................................................</p>
<p>आहिस्ता चलो</p>
<p>राहों पर फिसलन बहुत है</p>
<p>गिरने पर संभालने वाले कम हैं</p>
<p>अपनी मंजिल और राहों को खुद चुनो</p>
<p>भटकाने वाले बहुत हैं </p>
<p>सही पता बताने वाले बहुत बहुत कम हैं<br />
...............................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले प्रेमपत्र से दूसरा भाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 13:21:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</guid>
<description><![CDATA[लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये<br />
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और<br />
अपना नाम लिखा प्रेमी<br />
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया<br />
लड़की ने  पत्र बिना  उत्तर के वापस लौटाया<br />
दूसरे में उसने लिखी शायरी<br />
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया<br />
लड़की को आशुका बताया<br />
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया</p>
<p>पहली मुलाकात में<br />
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा<br />
तो उसने बताया<br />
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है<br />
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है<br />
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं<br />
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं<br />
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं<br />
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं<br />
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं<br />
वैसे तो मुझे कविता और शायरी<br />
दोनों की की समझ नहीं है<br />
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है<br />
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और<br />
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा<br />
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम<br />
तुम्हारा आशिक होना और<br />
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा<br />
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ<br />
इसलिये मुझे  दूसरा प्रेम पत्र भाया<br />
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया<br />
.........................................................................</p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=60</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 07:59:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=60</guid>
<description><![CDATA[घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की ची]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>घर भरा है समंदर की तरह<br />
दुनियां भर की चीजों से<br />
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह<br />
फिर भी इंसान बेचैन  है</p>
<p>चारों तरफ नाम फैला है<br />
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई<br />
उनके कदमों मे पड़ा है<br />
फिर भी इंसान  बेचैन  है</p>
<p>लोग तरसते हैं पर<br />
उनको तो हजारों सलाम करने वाले<br />
रोज मिल जाते हैं<br />
फिर भी इंसान  बेचैन है</p>
<p>दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं<br />
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं<br />
अपने अंदर ढूंंढे तभी मिलता चैन है<br />
---------------------</p>
<p>अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’<br />
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया<br />
‘जब कारखाने में चीज बनती हो<br />
पर बाजार में नहीं दिखती हो<br />
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है<br />
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो<br />
समझ लो आपूर्ति है कम<br />
सफेद बाजार को उन्होंने<br />
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया<br />
.............................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<p>बाजार भी भला कभी<br />
काले और सफेद होते<br />
सौदागर की नीयत जैसी<br />
वैसे ही उसके नाम होते<br />
छिपकर कोई नहीं करता अब<br />
हर शय के सौदे सरेआम होते<br />
खरीददार की मजी नहीं चलती<br />
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता</p>
<p>चाहे दूने और चौगुने दाम होते<br />
.....................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल और ध्यान-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=443</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 16:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=443</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज ने राह चलते हुए
रोक लिया और लग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फंदेबाज ने राह चलते हुए<br />
रोक लिया और लगा गुस्सा होने<br />
‘दीपक बापू यह क्या बात हुई<br />
हम जब भी तुम्हारा मोबाइल खटखटाते<br />
उसका स्विच आफॅ पाते<br />
स्कूटर की डिग्गी में भला<br />
कहीं ऐसे मोबाइल बंदकर क्यों ले जाते<br />
हम तुम्हारे दोस्त हैं<br />
तुम्हारे फ्लाप ब्लाग अगर  हिट हो जायें तो<br />
इसकी खबर पहले सुनने के लिये ही<br />
रोज तुम्हारे मोबाइल की घंटी बजाते<br />
तुम सुबह अपने ब्लाग की दशा<br />
देखकर ही जरूर घर से बाहर जाते<br />
मालुम है मिलते तो वह तुम्हें<br />
हमेशा फ्लाप ही हैं पर<br />
तुम फिर भी कहां बाज  आते<br />
तुम्हारी चिंता कम हुई हो<br />
यह  जानने के लिये ही<br />
हम तुमसे करते हैं सुबह संपर्क<br />
पर तुम्हार रवैया देख कर खफा  हो जाते’</p>
<p>सुनकर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘हमारे फ्लाप होने की चिंता बहुत हैं तुमको<br />
इसलिये सुबह से शाम तक<br />
मिस काल ही लगाते<br />
कभी काम पड़ता है तभी<br />
करते हो मोबाइल पर बात<br />
पर कभी ब्लाग के बारे में पूछते हो<br />
याद हमें नहीं आता<br />
तुम्हें हमारे मोबाइल बंद होने से अधिक<br />
फिक्र इस बात की है कि<br />
हम क्यों नहीं अपने साथ<br />
राह पर यह संकट भी ले जाते<br />
जिससे चाहकर भी तुम निजात नहीं पाते<br />
पर तुमसे नहीं सीखना मोबाइल का उपयोग<br />
दिमाग में नहीं भरना रोग<br />
याद रखना<br />
सारी दुनिया मानती है कि<br />
भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है<br />
मोबाइल वालों को कहां इसका ज्ञान है<br />
राह पर वाहन चलाते हुए<br />
कितने मोबाइल वाले दूसरे की गाडि़यों में<br />
घुस कर दम तोड़ गये<br />
खबरों के लिये सनसनी छोड़ गये<br />
हमें मोबाइल पर पद्मश्री मिलने की<br />
खबर मिलने की संभावना हो तब भी<br />
रास्ते में उसे बंद ही रखेंगे<br />
कहीं तुम्हारे मिस काल पर आया ध्यान<br />
स्कूटर कहां घुस जाये इसका नहीं रहेगा भान<br />
जिंदा रहते तो नहीं फैला सके लिखकर सनसनी<br />
न मिला सम्मान<br />
घुस गये किसी गाड़ी में<br />
तो बन जायेगी एक खबर हमारे नाम की<br />
फैलायेंगे खबरची तमाम सनसनी<br />
इसलिये मोबाइल को खोलकर साथ नहीं ले जाते</strong><br />
................................</p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार का पहला शब्द कहना सीख ले-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=58</link>
<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 14:07:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=58</guid>
<description><![CDATA[अपने मन में है बस व्यापार
बाहर ढूंढते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने मन में है बस व्यापार<br />
बाहर ढूंढते हैं प्यार<br />
मन में ख्वाहिश<br />
सोने, चांदी और धन<br />
के हों भण्डार<br />
पर दूसरा करे प्यार<br />
मन की भाषा में हैं लाखों शब्द<br />
पर बोलते हुए जुबान कांपती है<br />
कोई सुनकर खुश हो जाये<br />
अपनी नीयत पहले यह भांपती है<br />
हम पर हो न्यौछावर<br />
पर खुद किसी को न दें सहारा<br />
बस यही होता है विचार<br />
इसलिए वक्त ठहरा लगता है<br />
छोटी मुसीबत बहुत बड़ा कहर लगता है<br />
पहल करना सीख लें<br />
प्यार का पहला शब्द<br />
पहले कहना सीख लें<br />
तो जिन्दगी में आ जाये बहार<br />
-----------------</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<blockquote><p><strong>उधार की बैसाखियाँ</strong></p></blockquote>
<p>आकाश में चमकते सितारे भी<br />
नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा<br />
जब होता  वह किसी गम का मारा<br />
चन्द्रमा भी शीतल नहीं कर पाता<br />
जब अपनों में भी वह गैरों जैसे<br />
अहसास की आग में जल जाता<br />
सूर्य की गर्मी भी उसमें ताकत<br />
नहीं पैदा कर पाती<br />
जब आदमी अपने जज्बात से हार जाता<br />
कोई नहीं देता यहाँ मांगने पर सहारा</p>
<p>इसलिए डटे रहो अपनी नीयत पर<br />
चलते रहो अपनी ईमान की राह पर<br />
इन रास्तों की शकल तो कदम कदम पर<br />
बदलती रहेगी<br />
कहीं होगी सपाट तो कहीं पथरीली होगी<br />
अपने पाँव पर चलते जाओ<br />
जीतता वही है जो उधार की बैसाखियाँ नहीं माँगता<br />
जिसने ढूढे हैं सहारे<br />
वह हमेशा ही इस जंग में हारा</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ असली पुतलों का खेल-लघुकथा]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=54</link>
<pubDate>Tue, 29 Jul 2008 15:45:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=54</guid>
<description><![CDATA[कठपुतली का खेल दिखाने वाला एक व्यक्ति ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कठपुतली का खेल दिखाने वाला एक व्यक्ति अपना काम बंद कर स्टेडियम के बाहर मूंगफली का ठेला लगाकर बैठ गया था। बचपन में उसका खेल देखने वाले व्यक्ति ने जब उसे देखा तो पूछा-‘ तुमने कठपुतली का खेल दिखाना बंद कर यह मूंगफली का ठेला लगाना कब से शुरू कर दिया ?’</p>
<p>वह बोला-‘बरसों हो गये। जब से इन असली पुतलों का खेल शूरू हुआ है तब से अब लकड़ी के नकली पुतलों का खेल छोड़कर इधर ही आते हैं। इसलिए मैं भी इधर आ गया।</p>
<p>वह आदमी हंस पड़ा तो उसने कहा-‘‘आप अखबार तो पड़ते होंगे। यह हाड़मांस के असली पुतले भी कोई न तो अपनी बोलते हैं न चाल चलते हैं। इनकी भी डोर किसी नट के हाथ में ही तो है। स्टेडियम में लोग तालियां बजाते हैं पर किसके लिये? जो खेल रहे हैं वह क्या अपने मजे के लिये खेल रहे हैं? नहीं वह पैसा कमाने के लिये खेल रहे हैं। आप फिल्मों में हीरो-हीरोइन के देख लीजिये वह भी तो किसी के कहने पर डायलाग बोलते हैं, नाचते हैं और झगड़े के सीन करते हैं। बड़े लोग जिनके पास किसी के पास जाने की फुर्सत नहीं है इन मैचों और संगीत कार्यक्रमों को देखने आते हैं। भला हमारे खेल को कौन देखता? इसलिये अब मैं स्टेडियम के बाहर आते खिलाडियों, अभिनेताओं और दर्शकों को ऐसे ही देखता हूं जैसे वह मेरे पुतलों को देखते थे। </p>
<p>उस आदमी ने कहा-तो तुम अब खेल देखते हो? वह भी बाहर बैठकर।</p>
<p>वह बोला-‘‘दर्शक तो मैं ही हूं जो इतने सारे पुतलों को देख रहा हूं। बाकी सब तो करतब दिखाने वाले हैं। हां, हमारे खेल में हम दिखते थे पर इनके नट कौन है उनको कोई नहीं देख पाता। यह सब कैमरे का कमाल है।’’<br />
--------------------------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
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<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
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<blockquote><p><strong>माफ़ी किस बात की-हिन्दी शायरी</strong></p></blockquote>
<p>अपनी जिंदगी में कामयाबी पाने का नशा<br />
आदमी के सिर कुछ यूं चढ़ जाता<br />
कि नाकामी झेलने की मनस्थिति में नहीं आता<br />
जजबातों के खेल में<br />
कुछ ऐसा भी होता है<br />
कि जिसकी चाहत दिल में होती<br />
वही पास नहीं आता है<br />
इस जिंदगी के अपने है दस्तूर<br />
अपने दस्तूरों पर चलने वाला<br />
आदमी हमेशा पछताता है<br />
..........................</p>
<p>अपने वादे से मुकर कर उसने कहा<br />
‘यार माफ करना मैंने तुम्हें धोखा दिया’<br />
हमने कहा<br />
‘माफी किस बात की<br />
भला कब हमने तुम पर यकीन किया’<br />
.......................................................  .</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/लघुकथा पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सस्ते में बिकने से आता नहीं आदमी बाज-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=51</link>
<pubDate>Mon, 28 Jul 2008 13:50:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=51</guid>
<description><![CDATA[
अपने हाथ से अपने ही सिर पर
पहन लेते हैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
अपने हाथ से अपने ही सिर पर<br />
पहन लेते हैं कोई भी ताज<br />
किससे लिया और कैसे<br />
सवालों के जवाब में रखते राज<br />
मेहनत की राह चलकर<br />
कौन तकलीफें उठाना चाहता<br />
सभी बांधते हैं तारीफों के पुल<br />
एक दूसरे के लिये<br />
जीवन की सफलता का मार्ग<br />
इस पार से उस पार जाकर पाता<br />
सस्ते में बिकने से आता नहीं आदमी बाज<br />
....................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<p>किसी की तारीफों के पुल बांधने से<br />
सफलता का आसमान मिल गया होता<br />
तो फिर धरती होती आकाश<br />
और आकाश वीरान होता<br />
भला कौन यहां अन्न के लिये बीज बोता<br />
कौन बहाता पसीना<br />
कौन कपड़ा बनता होता<br />
मेहनतकश आसमान में इसलिये नहीं उड़ पाते<br />
क्योंकि तारीफ लायक कोई उनके पास नहीं होता<br />
हर कोई उनके पास खून चूसने के लिए होता<br />
........................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<p>  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=49</link>
<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 12:42:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=49</guid>
<description><![CDATA[
मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं
पर उनकी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं<br />
पर उनकी याद कभी नहीं आती<br />
मझधार में भंवर के बीच आकर जो<br />
किनारे तक पहुंचा जाते<br />
फिर नजर नहीं आते<br />
ऐसे मित्रों की याद मुझे सताती </p>
<p>घाव करने के लिए इस जहां में बहुत हैं<br />
जो बदन से रिसता लहू देखकर<br />
जोर से मुस्कराते हैं<br />
जिन्होंने घावों को सहलाया<br />
जब तक दूर नहीं हुआ दर्द<br />
अपना साथ निभाया<br />
फिर ऐसे गायब हुए कि दिखाई न दिए<br />
आँखें उनको देखने को तरस जाती हैं </p>
<p>इस जिन्दगी के खेल बहुत हैं<br />
नाखुश लोगों से दूर नहीं जाने देती<br />
जो तसल्ली देते हैं<br />
उनको आँखों से दूर ले जाती है<br />
शायद इसलिए दुनिया रंगरंगीली कहलाती हैं<br />
-------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति-पत्रिका’ </a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप<br />
  </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच और फिल्म से तो अच्छा है ब्लाग लिखना और पढ़ना-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=439</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 13:01:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=439</guid>
<description><![CDATA[क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्म के अभिनेत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्म के अभिनेता अभिनेत्रियों के चेहरों और नाम के सहारे ही आजकल देश के सारे समाचार चैनल चल रहे हैं इसमें कोई संदेह नहीं हैं। अगर क्रिकेट का कोई मैच नहीं हो रहा होता है तो भी समाचार चैनल खेलों के समय में खिलाडि़यों की  क्रीड़ेत्तर (खेल से अलग) गतिविधियों के समाचार देते हैं-जैसे वह कहां रैम्प पर गया या उसका अभी तक किस किस से प्रेम का संबंध चला। उसी तरह किसी फिल्म अभिनेता या अभिनेत्री की फिल्म नहीं रिलीज हो रही होती  तो उसके प्रेम प्रसंग या सामाजिक सेवा की जानकारी फिल्म टाईम में दी जाती है।  एक घंटे के समाचार समय में पौन घंटे इन दो क्षेत्रों पर ही व्यय किये जाते हैं। कहते हैं कि बाजार उपभोक्ताओं की मांग पर चलता है पर समाचार चैनल देख ऐसा नहीं लगता कि वह आम दर्शक के भरोसे हैं। उनको विज्ञापन मिल रहे हैं तो वह दर्शकों के कारण नहीं बल्कि अपनी सजावट के कारण मिल रहे हैं। </p>
<p>बहरहाल समाचार चैनलो के लिए खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां एक तरह से प्रचार के लिये माडल हैं। आज भारत से श्रीलंका हार गया तो यह समाचार चैनल (इस लेखक यह जानकारी समाचार चैनलों से ही मिली है) वाले उन पुराने  खिलाडि़यों  पर बरस रहे है जिनको एक सप्ताह पहले वह मील का पत्थर और अनुभवी बता रहा थे। एक माह पहले तक उनको बीस ओवरीय मैच में न खिलाने पर आलोचना कर रहा थे। आज तो बस वही पुराने खिलाड़ी उनके लिये खलनायक बन गये थे।</p>
<p>‘उनको सोचना चाहिए कि वह अब क्रिकेट खेलना चाहिए या नहीं! केवल नाम के सहारे ही बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता।’<br />
‘उन पुराने खिलाडि़यों को अपने आप से पूछना चाहिए कि वह कहां खड़े हैं?’<br />
वगैरह वगैरह। मतलब खिलाड़ी स्वयं तय करें कि उनको आगे खेलना हैं कि नहीं। चयनकर्ता को तो विचार ही नहीं करना चाहिए। यह समाचार चैनल वाले अपीलें कर रहे हैं कि ‘जाओ श्रीमान! आपका खेल पूरा हो गया।‘ </p>
<p>चार दिन बाद फिर वह थोड़ा खेल कर दिखायेंगे तो यही कहेंगे कि ‘ साहब वह तो  पुराने चावल हैं’। आशय यह है कि दर्शक को अपने हाथ में पकड़े रहना चाहते हैं। </p>
<p>क