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	<title>web-bhasakar &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/web-bhasakar/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "web-bhasakar"</description>
	<pubDate>Sat, 10 May 2008 20:31:20 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो समझ में आया वही लिख दिया-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 15:21:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</guid>
<description><![CDATA[मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेखक श्री समीर लाल वाकई हिंदी ब्लाग जगत के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। वह मेरे ब्लागों पर सबसे अधिक टिप्पणी रखने वाले व्यक्ति हैं और मैं हृदय में उनके प्रति आत्मीयता का भाव रखता हूं पर उसका प्रदर्शन करना मुझे ठीक नहीं लगता। उनकी टिप्पणियां आमतौर से संक्षिप्त और औपचारिक  होती हैं पर उससे अपने अंदर एक प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। मैं यह लेख उनकी प्रशंसा या समीक्षा के लिये नहीं लिख रहा हूं बल्कि कल उनकी टिप्पणी में जिस तरह दूसरे ब्लाग और टिप्पणियां लिखने के लिये अभियान चलाने की बात कही है उसी परिप्रेक्ष्य में मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये जो शायद अलग प्रतीत हों पर  उनको रखना जरूरी समझता हूं। </p>
<p>श्री समीरलाल जी ने हिंदी में ब्लाग बढ़ाने तथा उन पर टिप्पणियां लिखने  की बात कहीं है वह मेरे अभियान का एक भाग है पर मैं हिंदी ब्लाग जगत लिये पाठक जुटाने के अभियान को भी कम वरीयता नहीं देता।  हिंदी ब्लाग में निराशाजनक स्थिति को मैं भी अनुभव करता हूं पर इसके लिये पाठकों की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अंतर्जाल  हिंदी ब्लाग के लिये पाठकों की संख्या नगण्य है। इसलिये अनेक ब्लाग लेखक केवल हिंदी के ब्लाग सभी एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटरों पर हिंट पाने के लिये लिखते हैं और वहां साहित्य सृजन जैसा वातावरण अभी नहीं बन पाया है। अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में यह बात लिख चुके हैं कि वह लिखने तो आये थे साहित्य और यहां अब कुछ अन्य लिख रहे हैं। मैं उनका लिखा पढ़कर यह बात मानता भी हूं कि वह वाकई साहित्य लिखते होंगे। देव और कृतिदेव फोंट में टाईप करने वाले अनेक लेखक यूनिकोड में लिखते हुए ब्लाग पर आये तो स्वयं मूल स्वरूप खो बैठे जिनमें मैं भी स्वयं भी शामिल हूं। अब देव और कृतिदेव को यूनिकोड मेंे बदलने वाला टूल आया है तब अनेक लोग खुश हुए क्योंकि उनको लगा कि वह अब पहले से अच्छे परिणाम निकाल सकते हैं। आज इतना बड़ा लेख लिखने का साहस मेरे अंदर केवल इसीलिये आया क्योंकि  सीधे कृतिदेव में लिख रहा हूं और यह टूल आये अभी अधिक वक्त नहीं हुआ। ऐसे में मुझे विश्वास है कि आगे और ब्लाग लेखक बेहतर लिखकर लेखक जुटाने का प्रयास करेंगे। इस समय जो हिंदी ब्लाग जगत पर लिखा जा रहा है उस पर दृष्टिपात किये बिना हम अगर किसी अभियान पर निकलेंगे तो शायद वहीं होंगे जहां अभी हैं। </p>
<p>शुरूआती दिनों में मैंने भी एग्रेगेटरों पर हिट पाने के लिये ऐसी पोस्टें लिखीं पर मुझे ध्यान आया कि एक लेखक के लिये अपने पाठकों की संख्या बढ़ाने वाले  व्यापक आधार वाले विषयों पर लिखना आवश्यक है। मैने हास्य कविताएं, आलेख, हास्य व्यंग्य, कहानियां, लघु कथाएं बहुत कठिनाई से यूनिकोड में लिखीं पर एग्रीगेटरों पर उनके हिट ने मुझे निराश किया।  फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा यह सोचकर कि देखा जायेगा कि आगे क्या होता है? ब्लाग लेखक साथी हो सकते हैं पाठक नहीं यह बात मुझे अपने बढ़ते पाठक देखकर बहुत बाद में समझ आयी। तब मैंने तय किया कि अब आम पाठक को लक्ष्य कर लिखना चाहिए। फिर यह भी देखा कि मेरे ब्लाग पर आने वाला पाठक अन्य ब्लाग भी देखे ताकि वह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के ब्लागों से परिचित हो सके इसलिये मैंने दूसरे ब्लाग लेखकों के भी ब्लाग लिंक किये ताकि अगर पाठक मुझसे  असंतुष्ट हो तो वह दूसरे का ब्लाग लेखकों  का लिखा पढ़कर वह यह समझ सके कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने वाले भी कम नहीं है। यह मैने बहुत देर से किया फिर भी मेरे ब्लाग दूसरे ब्लागों  पर पाठक भेजते हैं। यह मैं बीस हजार की पाठक संख्या पार करने वाले ब्लाग की सूचनाओं में बता चुका हूं। उसमें यह भी बता चुका हूं कि किस तरह लोग जहां हास्य की सामग्री देखते ही  झपट पड़ते हैं। उसमें ‘हंसते रहो’ और ‘ठहाका’ ब्लाग को अधिक संख्या में मेरे ब्लाग से पाठक मिलना इसी बात का प्रमाण हैं। मेरे  ब्लाग से उड़न तश्तरी ब्लाग पर  भी पाठक जाते हैं और श्रीसमीरलाल जी के पास कोई काउंटर हो तो वह इसे देख सकते हैं। मैं श्रीसमीरलाल को बहुत पसंद करता हूं पर मेरे अज्ञात पाठक मेरी इस राय को नहीं जानते इसलिये उड़न तश्तरी के बाद लिंक किये गये ब्लागों पर अधिक गये-केवल इसलिये ही न कि  उसका नाम वहां किसी हास्य सामग्री होने का संदेश नहीं देता।<br />
केवल  नये ब्लाग बनवाने और टिप्पणियां लिखने से हिंदी ब्लाग जगत के लाभ की मैं संभावना नहीं देखता। सबसे बड़ी बात यह है कि विषय भी आम पाठक से सरोकार रखने वाला होना चाहिए। इस हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो हमेशा ही कमेंट देते हैं और कुछ ब्लाग लेखक जब कोई जोरदार विषय होता है तो इस बात की परवाह नहीं करते कि मैंने उनको कभी टिप्पणी दी कि नहीं वह लिख जाते हैं।<br />
श्री समीरलाल जी अकेले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो ब्लाग से हटकर लिखे गये विषयों पर भी बहुत सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं पर इसका श्रेय उनके मधुर व्यवहार को जाता  है और टिप्पणियां तो इतनी करते हैं कि मैं भी सोचता हूं कि  यह व्यक्ति अगर ऐसा न करे तो मैं लिखूंगा कि नहीं। वह बहुत अच्छा लिखते हैं पर इतनी सारी हिट दिलाने के लिये यह अकेला कारण नहीं है। </p>
<p>        इस अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक लंबे समय तक  लिखना चाहते हैं उनको सोचना अंतर्मुखी होगा पर लिखना बहिर्मुखी होगा। मेरे दिमाग में कुछ विचार हैं जो इस प्रकार हैं।</p>
<p>(1) अपने ब्लाग पर दूसरे के ब्लाग को भी लिंक दे। अकेले सफलता पाने का का विचार त्याग दें। कोई हमारा मित्र है या नियमित रूप से टिप्पणी करने वाला ब्लाग लेखक  तो लिंक दें अच्छी बात है पर यह भी देखें कि क्या कोई ऐसे ब्लाग लेखक भी हैं जो आपको कमेंट नहीं देते पर उनकी सामग्री पठनीय है तो उसे भी लिंक दें। हो सकता है उसकी वजह से  आपका ब्लाग पढ़ने आम पाठक आये क्योंकि वह सोचेगा कि यह आपके ब्लाग में लगा ब्लाग है वह ऊपर उसका पता थोड़े ही देखता है। मेरे मित्र उड़न तश्तरी और ममता श्रीवास्तव को पढ़ते हैं पर वह जाते मेरे ही ब्लाग से ही हैं-उनके ब्लाग का कोई अपने कंप्यूटर पर पता नहीं रखता।  हो सकता है कोई ऐसे भी लोग हैं जो मेरे ब्लाग पर इसलिये आते हों कि किसी दूसरे ब्लाग लेखक का ब्लाग मेरे ब्लाग से चिपका समझते होंं। जब तक नारद अभिव्यक्ति  पत्रिका से लिंक था मैं वहीं से उस पर जाता था-हो सकता है कि कुछ पाठक मेरे जैसे ही हों। अगर कोई अच्छा लिखने वाला ब्लाग लेखक है तो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका ब्लाग लिंक करें। इसके लिये आपको सभी ब्लाग पढ़ना पढ़ेंगे।<br />
(2)ब्लाग लेखकों को ऐसे विषयों पर ही ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक हों। अगर कोई समाचार दे रहें हैं तो उसके साथ एक संपादक के रूप में भी विचार व्यक्त करें। याद रखिये जो आम पाठक यहां आते हैं वह उस ब्लाग लेखक की मौलिकता देखना चाहते हैं। महापुरुषों के संदेश लिखने वाली पोस्टों पर अनेक लोगों ने टिप्पणी लिखी थी कि अगर आप इनके साथ अपने विचार रखते तो बहुत अच्छा होता।<br />
(3)अपनी पोस्ट के साथ अधिकतम श्रेणियां रखें। कभी-कभी अंग्रेजी में भी टिप्पणियां रखें। हमारा  ब्लाग अंग्रेजी वालें भी पढ़ें यह तो चाहते हैं पर इस बात का ध्यान नहीं रखते कि अंग्रेजी वाले वहां कैसे आयेंगे। इसके अलावा अंग्रेजी शब्दों से भी हिंदी पाठक ब्लाग पर आते हैं<br />
(4)आलेख, निबंध, कविता, हास्य कविता, व्यंग्य और कहानी जैसे शब्द शीर्षक में लिख दें तो बढिया। मेरी वही हास्य कविताएं लोग पढ़ रहे हैं जिन पर मैंने ऊपर ही लिख दिया है।<br />
मैं जैसा हूं सबके सामने हैं। एग्रीगेटरों पर मैं हिट नहीं पाता यह सच है पर मुझे लगता है कि आम पाठकों का कुछ रुझान मेरी तरफ है। आम पाठकों की बात तो मैं ही लिखता हूं बाकी तो कोई नहीं बताता कि उसकी तरफ कैसा रुझान है? यह सबसे महत्वपूर्ण है। एग्रीगेटरों पर अनेक ब्लाग लेखकों से मित्रता मेरे लिए एक बोनस है क्योंकि मेरा मुख्य लक्ष्य पाठकों तक पहुंचना है। अभी सफलता दूर है पर मैंने भी ऐसा क्या लिख दिया है कि उछलता फिरूं। सच तो यह है कि कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिलने के बाद तो मैंने सहज भाव से लिखना शुरू किया है और मैं जानता हूं कि यह सफलता अकेले चलने से नहीं मिलेगी इसलिये चाहता हूं कि अन्य ब्लाग लेखक भारी सफलता पायेंगे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आयेगी। आखिरी बात यह है कि मैं कोई सिद्ध व्यक्ति नहीं हूं जो यह कहूं कि जो मैने लिखा है वही सही है। जो अनुभव किया वही लिख रहा हूं और हो सकता है कई इससे सहमत न हों और इसकी संभावना रहेगी भी क्योंकि ब्लागवाणी के हिट इस बात का प्रमाण है कि मेरे हाथ से कोई हिट पोस्ट नहीं निकली। वैसे भी मैं अपने कंप्यूटर की समस्याओं से एक महीने से परेशान हूँ और इधर कही बिजली तो कभी आंधी मेरी पोस्ट को रोक देती हैं।शेष फिर कभी	</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह टूल मुझे तो दिलचस्प लगा-आलेख It is interesting tool, I thought - Stories]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 15:09:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</guid>
<description><![CDATA[मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्ठाकारों की चर्चा को अवश्य पढ़ता हूं। उसमें हमेशा अपने मतलब की बात ढूंढने की कोशिश करता हूं। श्री अनुनाद सिंह-जिन्होंने देवनागरी का टूल दिखाकर मुझे एक तरह से  हिंदी ब्लाग जगत के दूसरे दौर में पहुंचा दिया-ने आज वहां एक अनुवाद का दिखाया। इस टूल की चर्चा मैं अक्सर करता रहा हूं कि हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद  का कोई <a href="http://translate.google.com/translate_t">"&#62;टूल</a> है जो शायद हमारे पास नहीं पहुंचा। एक अंग्रेजी के ब्लागर ने मेरी एक पोस्ट पर कमेंट में कहा था कि अब तो भाषा की दीवार ही खत्म होने वाली है और उसी के कहने पर मैने अपना एक लिखा था कि शायद कोई ऐसा टूल है। मेरी पोस्टों पर अनेक बार अग्रेजी लोगों ने अपनी कमेंट रखीं हैं, शुरूआत में मुझे हैरानी होती थी कि यह भला कैसे पढ़ते होंगे। फिर मुझे लगा कि शायद मेरे वर्डप्रेस के ब्लागों की  श्रेणियां अंग्रेजी वालों से टकरातीं है इसीलिये खोलकर वह अपनी भाषा में चिपका जाते होंगे।</p>
<p>कुछ दिनों से ब्लागस्पाट के ब्लाग भी पता नहीं किन ऐसे लोगों की पकड़ में आ जाते हैंे जो अंग्रेजी में कुछ कमेंट चिपका देते हैं। जब उस ब्लागर ने ऐसे टूल की बात की तो मुझे यकीन हो गया कि ऐसा कोई टूल है जो हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा है। आज श्रीअनुनाद सिंह ने इसकी चिट्ठाकार चर्चा में जानकारी दी तो मैंने एक दो लाइन लिख कर प्रयोग किया। ऐसा लगा कि ठीकठाक है। पिछले एक माह में श्रीअनुनाद सिंह ने यह तीसरा टूल दिया है जिसका मै प्रयोग करने वाला हूं। एक टूल तो उन्होनें मुझे देवनागरी से अरबी लिपि में भी भेजा। जब मैने उसका प्रयोग किया तो मेरी आंखें फटी रह गयी कि देखो अंतर्जाल पर क्या क्या देखने को मिल रहा है।</p>
<p>अगर यह टूल सफल रहता है तो वाकई इस दुनियां में बहुत कुछ बदलने वाला है। मेरे जैसा अंग्रेजी में पैदल आदमी भी जब अपनी पोस्ट अंग्रेजी मैंने  लिखेगा तो फिर जो अंग्रेजी में पढ़ कर लिख रहे है उनसे दो आगे ही रहेगा। अगर किसी को हानि न पहुंचे  तो मैं अपने प्रयोग भी करता हूं। आज यह पोस्ट उसी टूल से अंग्रेजी में कर प्रस्तुत करूंगा। बहुत शोर सुनते थे कि अंग्रेजी वाले हिट हैं। यहां हिंदी में तो हिट हुए नहीं देखते हैं अंग्रेजी में क्या स्थिति बनती है। अभी शायद कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर आप बताईये हिंदी के ब्लाग लेखक अंग्रेजी में लिखेंगे तब क्या वह अपना कुछ प्रभाव नहीं छोड़ेंगे? हालांकि अंग्रेजी वाले इससे पढ़ सकते है पर उनको भी इसका का क्या पता कि जो शब्द दिख रहे हैं वह  हिंदी है कि अरबी? इसलिये क्यों ने अपनी एकाध पोस्ट अंग्रेजी में अनुवाद कर रख दें। हालांकि मैं हिंदी को लेकर बहुत संवेदलशील हूं और उसमें लिखते रहने के इच्छुक होने के कारण कभी अंग्रेजी का आत्मसात नहीं किया। वरना इतनी तो मुझे आती है कि थोड़ा अभ्यास कर लिखने लगता।</p>
<p>जैसे हमें अंग्रेजी का हिंदी में अनुवाद  अच्छा लगता है वैसे ही अंग्रेजी वालों को भी लगता है। यह मानवीय स्वभाव है कि जिस स्थिति में वह रहता है उससे अलग वातावरण में उसकी जिज्ञासा रहती है। बहरहाल लंबी चौड़ी   बातें तो होतीं रहेंगी फिलहाल की जानकारी पर श्रीअनुनाद सिंह को बधाई।मैंने यह अनुवाद उसी टूल से किया है और ऐसा लगता है कि अगर सावधानी से  हिन्दी लिखी जाये तभी इसका इस्तेमाल सही रूप से किया जा सकता है. कुछ गलतियां इसमें थीं जिस मैंने अपने विवेक से ठीक करने का प्रयास किया है. इसमें मैं अपने हिन्दी में लिखे के लिए जिम्मेदार हूँ बाकी जिम्मा तो टूल का है. बहरहाल यह टूल दिलचस्प है.<br />
http://translate.google.com/translate_t<br />
---------------------------------------<br />
My habit is that I come to your email on the discussion chitthakar  must read me. There is always a matter of their means I am trying to find. Mr. Singh resonance - who published showing me a kind of tool to Hindi Blog to the world's second round - there today showed a translation tool. The discussion of the tools that I am often been translated into English, Hindi, a tool that perhaps we have not arrived. I have an English blogger on ksment  said at a post now that the language of the wall and ending at the behest of the same one I wrote that perhaps a tool. My posts on a number of times people have  his givan coment, in the beginning was that I wonder how good it will be read. Then I felt that perhaps my wordpress  the English blog  categories of those who matchd  is open so  he  go to paste in their language.</p>
<p>A few days from the Blog of  blogspot  not know what these people are caught in English, some of which is  paste coment  you. When he did a tool of blogger spoke, I was convinced that it is a tool which has been translated into Hindi from English. mr. anunad  Singh, today discussed its chitthakar  given a two-line, I used to write. It felt right. Singh, the last one month in the third mr anunad singh tool to use to which I am. I published a tool, they also sent in from the Arabic script. When I used it, my eyes remain open been on internet  Look to see what is getting.</p>
<p>If the tool is always successful, this really is going to change many things in the world. I also like the English man in the foot when his post in English, then, that I write in English are read by writing them will be two further. If a loss is not reached by then I am also using his. Today, that same post in English to submit a tool to do. Hear that the English were a lot of noise hit. Here in the hit Hindi, not English, see what the situation is going. Perhaps some people still joke believe it, you told that    writer in English, Hindi Blog then write what it does not leave some effect? Who can read English, although it is on them will also address what are showing that the Hindi word that Arabic? Why so few of his posts to keep the translation in English. However, I took a lot of Hindi  stay, and I wrote it for being willing to absorb ever not English. Otherwise, I come so that it seems a bit of writing exercises.</p>
<p>We like the English translation of the Hindi is so good even those who feel English. It is human nature that he lives in which case it is a different atmosphere in his curiosity often. However, things have long  will remain on information currently mr anunaad  Singh congratulated.<br />
<a href="http://www.google.com/transliterate/indic/">http://www.google.com/transliterate/indic/</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आशा ही नहीं रखते तो निराशा भी नहीं होती-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=516</link>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 09:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=516</guid>
<description><![CDATA[ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#008000;"><strong>ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेदान की तरह लगते है। उस दिन मैं अपने टेलिफोन और इंटरनेट कनेक्शन का बिल भरने  गया तो वहां पानी पीने के लिये प्लास्टिक का ग्लास उठाया और पीने के बाद  वहीं पड़े फाइबर प्लास्टिक के कूड़ेदान में डाल दिया। वह दिखने में बहुत अच्छा लग रहा था तब मुझे ब्लागस्पाट के ब्लाग की याद आयी।<br />
इसके ब्लागों पर मैंने भी बहुत लिखा है पर लगता है कि गई भैंस पानी में। जब मैंने शुरू में इस पर ब्लाग बनाये तब विज्ञापन वर्गैरह का विचार नहीं था। फिर जब दूसरे ब्लागरोंं के ब्लाग पर विज्ञापन देखें तो हमने भी लगा लिये। उस समय अधिक जानकारी नहीं  थी, सो  थोड़ी जगह पर ही विज्ञापन लगाये। फिर हमने एक वरिष्ठ ब्लागर की पोस्ट पर पढ़ा कि गूगल का हिंदी में आर्थिक योगदान नगण्य है। तब हमने इसके विज्ञापन हटा दिये। फिर एक ब्लाग पर पढ़ा कि अगर गूगल के विज्ञापनों को अधिक जगह दी जायें तो उससे आय हो सकती हैं। वह किया तो एक ब्लागर के ब्लाग पर पढ़ा कि यह अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले कमीशन कम देता है। मतलब वह भी हिंदी के प्रकाशकों की तरह है। </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>अब हमने जब अपने गूगल एकाउंट को चेक किया तो इसमें तो 100 डालर में दस से पाचं वर्ष से क्या कम समय लगेगा-यह अनुमान मेरा अपने ब्लाग के बारे में दूसरों का मुझे पता नहीं है। मतलब साफ है कि गूगल के एडस एकाउंट का प्रदर्शन हिंदी में अत्यंत खराब है और इसलिये ही गूगल को भारत में अधिक लोकप्रियता भी नहीं मिली। मैंने देखा है जो हमारे निजी जानकार मित्र हैं अधिकतर लोग याहू पर अपना ईमेल बनाते है। सच तो यह है कि हिंदी के ब्लागर अगर ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं बनाते तो शायद उसके जीमेल को कोई भी नहीं पूछता। मैने भी शुरूआत मंे याहू पर ही ईमेल बनाया और वर्डप्रेस के दो ब्लाग मैंने उसी पर ही बनाये। वहां समझ में नही आया (उसकी वजह यह थी कि मैं यूनिकोड में नही लिख रहा था) तब ब्लागस्पाट पर ब्लाग बनाने के लिये जीमेल बनाया।  </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>मैने वर्डप्रेस और ब्लागस्पाट पर बराबर लिखा है। हां पहले सोचा था कि देखें<br />
ब्लागस्पाट के ब्लाग से शायद कोई आय हो जाये पर अब तो लगता है कि सारी मेहनत पानी में गयी। असल में इसके पीछे एक कारण और भी है। वर्डप्रेस पर हम चाहें अपनी पोस्ट पर जितनी श्रेणी रख दें वह लेता है जबकि ब्लागस्पाट पर अंग्रेजी के 200 वर्ण से अधिक नहीं लेता। यही श्रेणियां पाठक तक हमारे ब्लाग को ले जातीं है। इसलिये वर्डपेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटा लेते हैं और चहलकदमी करते हैं और वहां के ब्लागर उनको देखकर अपना दिल भी बहलाते हैं। उसका डेशबोर्ड ब्लागरों के आपस में मिलाने का काम भी करता है। जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये पूरी तरह हिंदी के एग्रीगेटरों पर ही निर्भर रहता पड़ता है। ब्लागस्पाट पर अपनी पोस्टें रखने का मतलब है कि साठ फीसदी पाठकों से अपनी पोस्ट दूर रखना। आज दोपहर तक ब्लागस्पाट के सात   ब्लाग पर केवल आठ व्यूज हैं जबकि  वर्डप्रेस के पांच ब्लाग पर  पचास व्यूज हैं। शाम तक वर्डप्रेस के ब्लाग करीब डेढ़ सौ के आसपास व्यूज जुटा लेंगे और  ब्लागस्पाट पर अगर कोई नई पोस्ट नहीं लिखी तो वहां अधिक से अधिक दस और व्यूज आएंगे। </strong></span></p>
<p><span style="color:#008000;"><strong>मुझे हमेशा वर्डप्रेस पर  अपनी सक्रियता देखकर खुशी होती है जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग बोर कर देते हैं। न इसमें नाम है और न नामा। गूगल का एड एकाउंट जितनी आय दिखा रहा है उससे कई गुना तो वह जगह घेर रहा है हालांकि यह भी सही है कि उस पर एग्रीगेटर के बाहर पाठक नगण्य हैं। अन्य ब्लाग पर  भी जब गूगल के विज्ञापन देखता हूं तो मुझे अपने पर हंसी आती है। यह सोचकर कि देखो हम  दूसरों पर  भ्रम में पड़ जाने वाली बात कहते है और हम  भी इसमें पड़ गये। बहरहाल उनकी चमक की वजह से ही लोग उस पर अधिक आकर्षित हैं पर जैसा कि नाचने के बाद मोर रोता है वैसे ही वहां से ब्लागर जब उकता जाते हैं तो निराशा की बातें भी करते हैं जबकि वर्डप्रेस वाले क्योंकि कोई आशा ही नहीं रखते तो निराश भी नहीं होते।<br />
</strong></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम कहां जा रहे हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 10:57:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</guid>
<description><![CDATA[आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;">आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों को दौरा किया तो लगा कि जैसे व्यंग्य के लिऐ कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं है। अक्सर  व्यंग्य लिखने के प्रयास में रहता हूं और इसके लिये मुझे विषय की आवश्यकता होती है। पहले जब सीधे यूनिकोड में लिखता था तो गद्य में व्यंग्य लिखने से बचता था और इसीलिये हास्य कविताओं से काम चलाता था जिसमें विषय को स्पष्ट करने में कठिनाई होती थी अब जब कृतिदेव में मेरे लिये लिखना सरल हुआ है तब से विषयों को लेकर कोई समस्या नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आज एक ब्लाग देखा जिसमें लिखा था कि ब्लाग चूंकि फ्री में है इसलिये चाहे जो उस पर लिख रहा है और इस तरह ब्लागिंग दिशाहीन हो रही है। मैंने सोचा था कि उसमें कोई भारी भरकम विचार होगा पर जब ब्लाग खोला तो पाया कि केवल दस लाईनें लिखीं हैं। ऐसा-वैसा बस और कुछ नहीं। अब ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उसकी दिशा क्या हो? इसका जवाब उसमें नहीं लिखा था। लिखने वाले ने भी लिखने के लिये लिखा था और उसे जोरदार हिट मिले थे।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">यह फोरम हिंदी ब्लागिंग को दिशा देने के लिये सज्जन लोगों ने बनाये पर वहां आकर अच्छा खासा लेखक दिशाहीन हो ही जाता है। रोज जो दोस्तों से हिट और कमेंट मिलते हैं उसे पचाना आसान होगा यह तो हम नहीं मानते क्योंकि हमें न तो इतने हिट मिलते हैं और न ही कमेंट। सो पता नहीं उसको पचाने के लिये कितनी देर वज्रासन में बैठना पड़ेगा। फोरमों पर अपने ब्लाग फ्लाप देखकर दिल को तसल्ली होती है कि अब कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिट मिलेंगे तो लोगों की दृष्टि में आ जायेंगे और वह फिर तमाम तरह के मीनमेख निकालने लगेंगे। फिर उनका जवाब देते फिरो। समय की खराबी और ऊर्जा के निरर्थक विसर्जन के अलावा उसमें कुछ नहीं हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">अब लोग लिख रहे है कि ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उनका खुद का लिख किस दिशा से आया और किस दिशा को जा रहा है यह हम पूछ सकते थे पर लगा कि ख्वामख्वाह में उनको नाराज कर दें। इसीलिये अपना ही एक व्यंग्य लिख दें। वह इसे पढेगे ही नहीं क्योंकि किसकों यहां पता हम किसको पढ़कर लिख रहे हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">सभी आदमी सब जगह दौड़े जा रहे हैं।  दिशा का पता नहीं पर दौड़े जा रहे हैं।  एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि ‘आखिर हम किस दिशा में दौड़ रहे हैं?’</span></p>
<p><span style="color:#003300;">पर कोई किसी को जवाब नहीं देता। पूछते सब ही हैं जब थककर सांस लेते हैं। उस समय सब दौड़ रहे होते हैं और जवाब इसलिये नहीं देते कि क्या पता फिनिशिंग टच में ही इस दौड़ प्रतियोगिता में पिछड़े गये हैं तो गया जो मिलने वाला होगा। क्या? इसका किसी को पता नहीं है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">सो ब्लागिंग भी ऐसे ही है। सब लिखे जा रहे है कि हो सकता है आगे कोई पुरस्कार वगैरह मिल जाये तो हो सकता है कि समाज में थोड़ा सम्मान बढ़ जाये। अब 2008 चल रहा है और साल भर इसी तरह कुछ लाईने लिखते रहे तो हो सकता है इस साल के नाम पर मिलने वाला कोई पुरस्कार ही हाथ लग जाये। इसी तरह ही लिखते जाओ। ब्लागरों पर कुछ भी लिख दो हिट हो जाता है। आम पाठक के लिये वह दो र्कौड़ी का नहीं है। इसीलिये हम ब्लागरों को विषय इस तरह बनाते हैं कि वह आम पाठक को भी समझ में आये कि इंटरनेट पर ईमेल के विस्तार के रूप में एक ब्लाग भी होता है जिस पर लोग कुछ लिखते भी हैं और वह ब्लागर कहलाते हैं। हमारे लिये यह ईमेल का विस्तार ऐसे ही जैसे एक पत्रिका। जिस तरह एक रजिस्टर का इस्तेमाल एक गणित का छात्र भी करता है तो एक लेखक उस पर अपनी रचनाएं लिखता है-कुछ लोग डायरी भी लिखते हैं पर वह लेखक नहीं कहलाते।<br />
 हम तो एक लेखक की तरह लिखने का काम कर रहे हैं। हमारी नजर में ब्लागर वह हैं जो ब्लाग का ईमेल के विस्तार की तरह इस्तेमाल करते हैं और लेखक वह हैं जो इसे अपनी रचनाओं के लिखने के लिये उपयोग करते हैं। जिस तरह रजिस्टर पर लिखा गया सभी लोगों के उपयोग का नहीं होता। वैसे ही हाल ब्लाग का है। हम इतनी बड़ी पोस्ट लिख रहे हैं यह फोरमों पर फ्लाप हो जायेगी पर दिशाहीन बताने वाली पोस्ट हिट पा चुकी है। है न दिलचस्प बात!</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ पुराने ब्लागर अब यह समझ गये हैं कि इन फोरमों के आगे भी होती है ब्लागिंग। पहले एक फोरम पर तो कविता के ब्लाग ही नहीं लिये जाते थे और अब हालत यह है कि फोरम वाले हिंदी का जो ब्लाग देखते हैं वही अपने यहां दिखाने लगते हैं। अभी कोई कथित पुरस्कार बंटे तो बड़ी बेदर्दी से कहा गया कि इसमे कविता के ब्लाग शामिल नहीं किये गये। हमने अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाने पर जब हास्य कविताएं बरसाईं तो समझ में आया कि क्या होती है कविता। हमें भी बहुत हैरानी होती है यह देखकर कि हमारी हास्य कविताएं पाठकों में ऐसे हिट पा रहीं है कि डर लगने लगा कि कहीं इतना लिखने की सजा हम हास्य कवि की उपाधि के रूप में न पायें। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">हिंदी भाषा लिखने में हमें मजा  आता है पर कोइै कहानीकार, व्यंग्यकार और लेखक कहे तो सुनकर अच्छा लगता है पर हास्य कवि कहे तो ऐसा लगता है कि हमारी पूरी मेहनत गयी पानी में-क्योंकि उससे कि हमारा दायदा सीमित हो गया प्रतीत होता है।  </span></p>
<p><span style="color:#003300;">बहरहाल दिशाहीनता की स्थिति नहीं है। हां,यहां लेखक कम हैं और ईमेल विस्ताकर अधिक हैं जो तात्कालिक हिट्स या ईमेल पाकर खुश हो जाते हैं।  आम पाठक अभी अपनी बात लिख कर लेखक को दे नहीं रहा इसीलिये कभी कभी निराशा होती है पर फिर अपनी रचना से जो प्रतिबद्धता हो वह फिर होंसला ला देती है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आखिरी बात यह ब्लाग फ्री में नहीं है जैसा कि कुछ ब्लागर लिखते हैं। जनाब जिस कंपनी के भी इंटरनेट कनेक्शन हैं उनके विज्ञापन गूगल पर  अन्य वेब साईटों पर देखे जा सकते हैं और उनको हम बराबर भुगतान कर रहे है। कंपनियां अपनी कमाई के सारे रास्ते खुले रखना चाहतीं हैं इसलिये इस ब्लाग को एस.एम.एस की तरह ही इस्तेमाल करवा रहीं हैं। अपनी भडास निकालो और हर महीने कनेक्शन का भुगतान करते जाओ। फिर भी कुछ ब्लागर अच्छा लिख रहे हैं और उनको पढ़ने में मजा आता है-जहां तक हमारी जानकारी है कुछ ब्लागर हमारे लिखे का भी आनंद उठाते हैं। हम फोरमों पर एक पाठक की तरह जाते हैं इसीलिये कभी अपने हिट या फ्लाप होने का अध्ययन नहीं करते। हां, अपना ब्लाग सामने आ जाता है तब ही उसके व्यूज देखते हैंं। आम पाठकों की संख्या बढ़ती लग रही हैं। इधर कृतिदेव में सीधे लिखने की वजह से हम और बेपरवाह हो गये हैं कि अब तो लिखना है हिट या फ्लाप तो अब आम पाठक तय करेंगे और दिशा भी अब उनकी पसंद पर ही तय होनी है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःईमानदारी से धन कमाना ही है सबसे बड़ी पवित्रता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 03:35:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्<br />
योऽथेंशुचिहिं स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः</strong></p>
<p>जीवन में पवित्रता जरूरी है पर इनमें ईमानदारी से धन कमाने की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह सदा ही पवित्र समझा जाना चाहिए। अगर धनोपर्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी पानी आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय टिप्पणी-</strong> अब धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि क्यों लोग मनुस्मृति की कुछ जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनकी आलोचना करते हैं और उसमें वर्णित अन्य ज्ञानपूर्ण वचनों का अनदेखा करते हैं। समाज में बेईमान, चालाकी और धोखे से धन कमाने वालों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और सारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में चले गये हैं। उन्हें मनुस्मृति के संदेश कटु लगते होंगे और इसलिये ही वह नहीं चाहते कि मनुस्मृति की चर्चा एक धार्मिक पुस्तक के रूप में हो।<br />
मनु महाराज के अनुसार तो अनुचित रूप से धन कमाने वाला कभी पवित्र नहीं हो सकता और उसे देखते हुए तो केवल मजदूर, गरीब और मध्यम वर्ग के कुछ  लोग ही पवित्र रह जाते हैं। अगर उचित  तरीके से धन कमाने की बात करें तो हमें निचले वर्ग के लोगों  के अलावा अन्य कहीं मिल ही नहीं सकते। ऐसे लोग मनुस्मृति नहीं पढ़ते वरना वह तो अपनी पवित्रता का दावा करते तब तो धनाढ्य लोगों के लिए मुश्किल हो जाती। इस समय जो चमक सब तरफ दिख रही है वह क्या उचित प्रकार से धन कमाने की वजह से है? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। इतना ही नहीं हमारे कर्मकांडों में पवित्रता के अनेक रूप गढ़े गये हैं और वह काल्पनिक ही लगते हैं। मनु महाराज की पवित्रता की  सबसे बड़ी शर्त ईमानदारी से धन कमाने की है और कितने लोग इस समाज के इस कसौटी पर खरे उतरेंगे यह विचार का विषय है। तमाम तरह के लोग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोई शांति के लिये यज्ञ करा रहा है कोई वर्षा के लिये यज्ञ करा रहा है तो कोई  खेलों में देश की टीमों को जितवाने के लिये टोटका करा रहा है पर प्रश्न एक ही क्या उनमें ईमानदारी से कमाया धन लग रहा है?</p>
<p>यह आश्चर्य का विषय है कि मनुस्मृति के बारे में  लोगों में शायद भ्रांत धारण इसीलिये भरी गयी है ताकि वह कहीं अधिक ज्ञानी न हो जायें और उनकी बुद्धि को भ्रमित कर उनका दोहन कठिन न हो जाय। अगर मनु महाराज के इस श्लोक पर विचार किया जाये तो यह समझ में आ सकता है कि ईमानदार होना ही सबसे अधिक पवित्र होना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मुतिःस्त्रियों का सम्मान न हो तो शुभकर्मों का फल भी नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=130</link>
<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 03:41:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;"> पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा<br />
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">विवाह के समय अपने कल्याण पिता, भाई, पति और देवर कन्या को वस्त्र और आभूषण से संसज्जित कर सकते हैं। कन्य इस तरह सुसज्जित करना पूजा करना कहलाता है।</span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः<br />
यत्रेतास्तु न पूज्यन्त सर्वास्तात्राफलसः क्रियाः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवता भ्रमण करते है और जहां उनका इसके विपरीत होता   वहां शुभ प्रकार के कर्मों का भी कोई फल नहीं होता</span></p>
<p><span style="color:#003300;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वर्तमान समाज में दहेज एक विकट समस्या है और देखा जाये तो मनु जी के अनुसार उसका एक तरह से विरोध ही किया गया है। उनका कहना है कि विवाह के समय कन्या को पति और भाई के साथ पति और देवर भी वस्त्र और आभूषण दे सकते हैं। एक श्लोक में उन्होंने कन्या के पिता द्वारा अपनी कन्या के लिये वर पक्ष से धन लेना वर्जित बताया  है पर यह कहीं नहीं कहा कि कन्या को वह दहेज दें। हालांकि आजकल ससुराल वाले कन्या के लिये गहने और वस्त्र तो करते हैं पर पहले उसके लिये कन्या पक्ष वालों से भारी राशि वसूल करते हैं। यह अनुचित और मनु द्वारा स्थापित पंरपराओं के विपरीत है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जातिवाद को आधार मानकर मनु स्मृति को समाज से विस्मृत करने का प्रयास इसीलिये  किया गया है ताकि कर्मकांडों को समाज पर लादकर उसे बैल की तरह उसे ढोते रहने को बाध्य किया जाये। मनु जी का कहना है कि स्त्रियों का जहां सम्मान नहीं होता वहां शुभकर्मों का भी फल नहीं मिलता। जबकि अनेक धर्मकर्म करने वाले अपनी स्त्रियों को दासी की तरह समझते हैं। एक बात तय है कि मनु स्त्री और पुरुष का जीवन के एक सिक्के की तरह मानते हैं इसलिये वह स्त्री के सम्मान की बात करते हैं। मनु के समय में भी मनुष्य समाज पुरुष प्रधान समाज था और आज भी है और भले ही स्त्रियां आजकल नौकरी और व्यापार में काम कर रहीं है पर वह भी अपने पति और बच्चों को उतना ही प्यार करतीं हैं जितना मनु के समय में करतीं रहीं होंगी। इस प्यार के कारण वह पति का सहयोग नहीं  मिलने पर भी परिवार के कार्यों का समूचा बोझ अपने सिर पर ले लेतीं हैं। इसके बावजूद कई परिवारों में उनको सम्मान नहीं मिलता। जहां स्त्रियां कामकाजी नहीं है तो वहां तो उन्हें और भी परेशान होना पड़ता है। स्त्रियां बहुत सहनशील होतीं हैं और अपने घर की इज्जत को ढंकने के लिये बाहर अपनी घर-परिवार की व्यथाएं नहीं कहतीं पर मनु महाराज के अनुसार पुरुषों को यह समझना चाहिए कि उनके मन से उठी आह उनके शुभकर्मों-यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार से मिलने वाले लाभों से वंचित कर सकतीं है।</span></p>
<p> </p>
<p><span style="color:#003300;"><br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःधन और अन्न न हो तो जल का दान भी पुण्य देना वाला ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=129</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 03:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=129</guid>
<description><![CDATA[भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्<br />
वेदतत्त्वर्थविदूषे, ब्राहणानापादयेत,</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">यदि अपने घर में खाद्यान्न न हो तो एक ग्रास भर भिक्षा या दान देने के लिये उसे स्वादिष्ट बना कर और यदि वह भी न हो तो वेद के तत्व और अर्थ को जानने वाले आदरपूर्वक जल पिलाने वाले गृहस्थ को भी पुण्य की प्राप्त होती है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा तो कि धर्म निभाना तो अमीरों के बस का है और गरीब को तो बस अपनी रोटी कमाने से फुरसत भी नहीं है। अमीरों को दान करते देखकर गरीब भी यह सोचते हैं कि जिसके पास माया है उसे ही दान देने का अधिकार भगवान ने दिया है हम तो बिना कुछ दान किये ऐसा पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते। दरअसल यह केवल अपने आप को दुःख देने के अलावा कुछ नहीं है। मनुष्य योनि में दान की महता इसलिये बताई गयी है क्योंकि वही एक ऐसा जीव है जिसके पास बुद्धि है और वह किसी को दे सकता है। भिक्षा या दान देकर पुण्य कमाने का मूल आशय यह नहीं है कि आपने क्या और कितना दान किया है बल्कि आपने अपने पास से कुछ दान दिया यह महत्वपूर्ण है। अगर धन नहीं है तो अन्न और वह भी पर्याप्त नहीं है तो केवल एक ग्रास और वह भी नहीं है तो दर पर आये किसी सहृदय सज्जन को जल पिला दें तो वह भी पुण्य प्रदान करता है।</span></p>
<p><span style="color:#003366;">हो सकता है कि कुछ लोग गंभीर  चिंतन करते हुए या मजाक में कह दें कि पानी भी न हो तो फिर काहे का दान? इतना तय है कि जल बिना जीवन नहीं है और अगर कोई जीव है तो वहां जल-कही अधिक तो कहीं कम-उपलब्ध होता है और अगर किसी प्यासे को पानी पिलाता है वह स्वयं प्यासा नही तड़पता। तात्पर्य यह है कि अपने हाथ से कुछ किसी को देना ही भिक्षा या दान है और हम अगर किसी को अधिक धन नहीं दे पा रहे तो थोड़ा सा उसमें से किसी को देकर अपने मनुष्य होने की अनुभूति तो कर ही सकते है।</p>
<p></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःसदाचारी को अतिथि सत्कार में भेदभाव नहीं करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=128</link>
<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 07:15:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=128</guid>
<description><![CDATA[शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना<br />
संविभागश्च भूतेभ्यःकर्तव्योऽनुपरोधतः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">सदाचार गृहस्थ को अपनी सामथ्र्यानुसार ब्रह्मचारी और सन्यासी को भिक्षा देनी चाहिए तथा बिना किसी भेदभाव से अतिथि बनकर आये सभी जीवों को उनके भाग का भोजन और पानी देना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्<br />
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्</strong><br />
जो व्यक्ति पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला दूसरो को मूर्ख बनाकर पैसे एंठने वाला वेदों में श्रद्धा रहित पर ऊपर से सहृदय दिखने वाला है उसको गृहस्थ कभी भी अपना अतिथि नहीं बनाये। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong> हमारे अध्यात्मिक दर्शन में दान और अतिथि सत्कार की बड़ी महिमा है पर उसके लिये मनु ने कई बंधन रखे हैं। अक्सर लोग मनु स्मृति पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते है पर वास्तविकता यह है कि तत्कालीन समय में बने हुए समाजों के दृष्टिगत ही उनका उल्लेख उन्होंने किया है और अगर थोड़ा गौर से देखें तो स्पष्टतः भेदभाव को अधिक प्रधानता नहीं दी बल्कि चरित्र को दी है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वह स्पष्टतः कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को दें और आपके घर जो अतिथि आता है उसका बिना किसी भेदभाव के स्वागत करें। जिन लोगों का आतिथ्य सत्कार वर्जित किया है उनमें किसी भी जाति का आदमी हो सकता है और जिनके सत्कार की बात कही है उसमें भी कोई बंधन नही लगाया।<br />
एक सहृदय सज्जन ने मेरे से पूछा था कि आपको नहीं लगता कि दान के कुपात्र के नाम पर लोग  समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि इसमें मनु का क्या दोष? </span></p>
<p><span style="color:#003366;">आजकल दान के नाम पर कथित संत अपना घर भर रहे है तो इसमें मनु के संदेश नहीं बल्कि लोगो का अज्ञान जिम्मदार है। मैं तो कहता हूं कि लोगों को अपने दान के लिये सुपात्र ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">अरे हमारे आसपास अनेक गरीब मजदूरों के बच्चे रहते हैं, चुपचाप जाकर उनको कपड़े, किताबें दे आओ। बीमार पड़ने पर उनका इलाज कराओ।<br />
हमारे घरों और व्यापारिक संस्थानों में अनेक युवक-युवतियां काम करते हैं। उनकी ऐसे ही पगार बढ़ा दो। उनको बोनस दे दो। यह क्यों उनसे कहते हो कि हम दान दे रहे हैं। यह तो अपने मन में रखना चाहिए। हमने अनेक विचाराधाराओं के नाम पर वाद और नारे लगाकर समाज को भ्रमित किया है जो वैसे ही अपने ज्ञान से दूर रहता आया है। हमारे मनीषी इस समाज की वास्तविकताओं से परिचित थे इसीलिये लोगों को दान करने के लिये उकसाते थे। यह कहना गलत है कि वह किसी जाति विशेष को दान करने के लिये कहते थे। ब्राह्मणों को कर्मकांड करने के बाद दान-दक्षिणा देने का प्रावधान किया गया है पर यह तो उनके लिए एक तरह से मेहनताना हुआ।<br />
स्पष्टतः दान का आशय यही है कि आपके आसपास जो उसके पाने के  पात्र है उसे ही दिया जाना चाहिए और आतिथ्य सत्कार में भी कोई भेद नहंी करना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 05:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये<br />
अधिकं वापि विद्येत  सः सोम पातुमर्हति</strong> </span></p>
<p><span style="color:#003300;">जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज<br />
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-</strong>हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है।  अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं।  आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया  संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी-कभी  ऐसा भी होता है-आलेख  ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=514</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 14:54:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=514</guid>
<description><![CDATA[              अगर देखा जाये तो ब्लागवाणी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#333300;">              अगर देखा जाये तो ब्लागवाणी फ्लाप ब्लागरों के लिये अपने प्रचार के लिये बिल्कुल उपयोगी नहीं है। अधिकतर ब्लागर ब्लागवाणी पर आते हैं तो  वह याद रखें कि उनसे कोई मिलने वाला घर मिलने आये तो उसे अपने ब्लाग दिखाते हैं तो उसके बाद  कोई फोरम दिखाना हो तो कभी ब्लागवाणी पर न ले जायें क्योंकि अगर किसी ने पूछ लिया कि यह पोस्ट के आगे अंक होने का क्या मतलब है और आपने सज्जनता  से बता दिया कि यह पढ़ने वालों की संख्या है तो आपका भांडा फूट जायेगा। भले ही आपने पूरी ईमानदारी बरती हो पर बाहर वह सबको बता देगा कि आप फ्लाप हैं-क्योंकि मेरे हिसाब से अधिकतर ब्लाग बहुत सहज और सरल भाव के हैं क्योंकि लिख तो वही सकता है जो ऐसा हो। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">आज एक सज्जन आये थे शादी का कार्ड देने और मुझसे अपना कंप्यूटर दिखाने के लिये बोले तो मैं उनको वहां तक ले आया और जब उन्होंने इंटरनेट कनेक्शन देखा तो पूछा-‘‘इस पर क्या करते हो?</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">मैने कहा-‘‘ब्लाग लिखता हूं। तुम समझो तो अपनी निज पत्रिका प्रकाशित करता हूं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">ब्लाग से वह समझ नहीं पाते इसलिये मैने उनको निज पत्रिका कहा और उनके समझ में भी आ गया। फिर मैने उनको अपने ब्लाग दिखाये और अन्य फोरम दिखाता हुआ ब्लागवाणी की तरफ ले गया। मैने कहा कि इन एग्रीगेटरो को तुम एक अखबार भी कह सकते हो और हमारे ब्लाग यहां एक पृष्ठ की तरह हैं। वह देखते रहे और जब मैं अपने ब्लाग की तरफ आया और अपने व्यूज देखे तो वहां से तत्काल आगे कर्सर निकाल ले गया। बाद में उन सज्जन ने अपनी कुछ बेव साइट देखीं और विदा हो गये। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">तब मैं सोच रहा था कि अगर यह मैं उनको बता देता कि यह  मेरे ब्लाग की पाठक संख्या है तो वह क्या सोचते? अब उसके लिये फिर उनको वर्डप्रेस या स्टेट काउंटर दिखाने पड़ते। कुल मिलाकर तब यह लगा कि ब्लागवाणी अपने लिये तो ठीक है पर हम किसी और को अपना ब्लाग वहां दिखायें यह हम फ्लाप श्रेणी के ब्लाग को नहीं करना चाहिए। हालांकि वहां हिट होना कोई मुश्किल काम नहीं है पर उसके लिये पोस्टें भी ऐसीं होना चाहिए जो ब्लागरों के मतलब की हों पर वह फिर आम पाठक को दिखाने के मतलब की नहीं होतीं।  हमारे जो दोस्त अंतर्जाल पर देखते हैं वह ऐसी पोस्टों पर नाराज होते हैं। मैने एक मित्र को बता दिया कि अगर ब्लागवाणी पर जाये तो वह पढ़ने वालों की संख्या कतई नहीं देखे नहीं तो उसे दुःख होगा। एक दिन वह ब्लागवाणी से घूमफिरकर आया और बोला-‘‘तुंम ठीक हो अपनी राह चलो। वहां जाने की बजाय तो मैं तुम्हारे  ब्लाग पर लिंकित ब्लाग ही पढ़ लिया करूंगा। हालांकि वहां  कुछ अच्छा लिखने वाले भी हैं और तुम उन सबको अपने उस ब्लाग पर लिंक कर दो जहां से हम दाखिल होते हैं।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">उसने जो वहां हिट पोस्टें देखीं तक उसमें एक-दो में अपठनीय शब्द था जिस कारण उसका मन भी खराब हुआ। हालांकि वह इन फोरमों को देखकर खुश होता है और कहता है कि हिंदी को अंतर्जाल पर पढ़ना ऐसे ही जैसे फाइव स्टार टाइप पढ़ना। एक बात याद रखना मैं कोइै शिकायत नहीं कर रहा न मुझे किसी बात पर एतराज है। एग्रीगेटरों की अपनी दुनियां हैं और मेरी अपनी। अंर्तजाल पर हिंदी लिखने के अभियान के तहत उनसे मेरा संपर्क हुआ है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम लोग एक दूसरे पर अपनी बातें थोपें। एक जगह ब्लाग दिखने के जो फायदे हैं उन्हें नहीं भूलना चाहिए। इसके बावजूद यह तय है कि यह एक मंच है जिस पर हम ऐकत्रित हैं। हालांकि बाद में मुझे इस बात का अफसोस भी हुआ कि मैंने अपनी पाठक संख्या के बारे में उनको क्यों नहीं बताया? आप कह सकते हैं  यह भी वास्तविकता है कि आत्मविश्वास कभी साथ छोड़ जाता है या कभी आप अनावश्यक रूप से कोई बात बताना जरूरी नहीं होता। यह दोनों बातें मेरे मस्तिष्क में एक साथ मौजूद थीं। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#333300;">मुझे आज अपनी पोस्टों पर लगायीं गयीं कमेंटों  का ध्यान आया जिसमें ब्लागवाणी के हिट्स पर प्रतिकूल टिप्पणियां की जातीं हैं। मैं उन पर ध्यान देता हूं पर कुछ लिखकर फिर भूल जाता हूं। कभी कभी मुझे लगता है कि कुछ ब्लागर इस बात से बहुत नाराज है कि वह वहां हिट्स नहीं ले पाते और मेरा ध्यान उनकी तरफ कभी नहीं जाता आज गया तो सोचा लिख डालूं एक पोस्ट कि भई अंतर्जाल की यह माया है कहीं हिट्स और फ्लाप की माया है। अभी प्रयोगात्मकता का दौर है जब उसके कुछ परिणाम दिखने लगेंगे  उस पर भी लिखेंगे। कौन हिट कौन फ्लाप का फैसला अभी बहुत दूर है शायद इसलिये कुछ ब्लागर लोगों को जाने अनजाने इसमें व्यस्त रखकर ब्लागरों से लिखवा रहे हैं। इस फिर कभी।  </span></strong></p>
<p><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</guid>
<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति: मांस खाने से कभी स्वर्ग नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 04:33:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#800080;">यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च<br />
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;"><br />
ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्<br />
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत्</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है पर एक बात यह भी कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों का मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि हमारे देश में भी बलि के द्वारा पूजा की प्रवृति रही है। उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यह सब दिखावा है। आपने देखा होगा कि कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर कई जगह पशुओं की बलि देकर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। कई जगह ऐसी मन्नतें भी मांगी जाती है जिसमें उसके पूर्ण होने पर पशुओं की बलि देने की बात कहीं जाती है। यह सब ढोंग है जो कि मांसाहारी लोगों ने अपने फायदे के लिये शुरू किया था। जो लोग ऐसा करते हैं वह पाखंडी हैं और उनको कभी भी पुण्य प्राप्त नहीं हो सकता है। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">इसके विपरीत मांस से मानसिक और शारीरिक विकास उत्पन्न होते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं। इसलिये जिन लोगों को ऐसे भ्रम हैं कि बलि देने से उनके इष्ट प्रसन्न होते हैं उन्हें दूर  कर लेना चाहिए। <br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['मेरा परिचय' में क्या रखा है-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=511</link>
<pubDate>Sun, 06 Apr 2008 15:06:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=511</guid>
<description><![CDATA[आज वर्डप्रेस के नवीनीकृत डेशबोर्ड पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज वर्डप्रेस के नवीनीकृत डेशबोर्ड पर दिख रही अपनी टाप पोस्टों को अवलोकन  इस दृष्टि से कर रहा  था कि देखें आखिर पाठकों का क्या रुझान है। इसमे एक ब्लाग पर मेरा परिचय दूसरे नंबर  पर चमक रहा  था। चूंकि उसमें केवल शूरू की तीन पोस्टों के व्यूज ही बताता है इसलिये अन्य पर मेरा परिचय को कितनी बार क्लिक किया गया होगा यह पता नहीं पर वह बाकी चार ब्लाग पर   शूरू के तीन  नंबरों में  नहीं है<br />
जब मैं शुरू मे अपने ब्लाग बना रहा था तब मैने अपना परिचय बिना किसी विचार के  रख दिया। अगर मुझे सबसे अधिक कठिन कोई बात लगती है तो वह अपना परिचय लिखना। फिर यूनिकोड में सीधे लिखना तो पहाड़ जैसा। अब तो शूरू में हिंदी टाइप के फोंट कृतिदेव में लिखने में बहुत सहुलियत हो रही है पर फिर भी दोबारा परिचय लिखना तो कठिन लगता है। अब सोचा है कि किसी दिन फुरसत में बैठकर आत्ममुग्ध होकर लिखेंगे। उसमें अपनी खूब डींगें हांकेंगे। अब कोई ब्लागर तो हमारा परिचय पढ़ेंगे नहीं जो कोई आक्षेप ढूंढ पायेंगे। </p>
<p>मुझे सबसे अधिक इस बात का आश्चर्य है कि आखिर मेरा परिचय लोग क्योंे पढ़ते हैं? अभी तक जो मेरी सीधी यूनिकोड में लिखी गयी रचनाओं में ढेर सारी गल्तियां हैं और  क्या यह देखने के लिये लोग पढ़ते हैं कि आखिर इतनी गल्तियां करने वाला  कौन है? अपनी रचनाओं को लेकर मेरे अंदर कोई खुशफहमी नहीं है। हो सकता है कि बेसिर-पैर की रचनाएं देखकर सोचते हों 