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	<title>vyngy &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/vyngy/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "vyngy"</description>
	<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 10:00:43 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मैं अभद्र शब्द लिखूंगा तुम खंडन कर देना ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/23/main-abhadr-shbd-likhoongaa-tum-khandan-kar-denaa/</link>
<pubDate>Fri, 23 Nov 2007 14:41:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पहला ब्लोगर घर के दरवाजे   से बाहर निकल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पहला ब्लोगर घर के दरवाजे   से बाहर निकल ही रहा था की दूसरा ब्लोगर वहाँ पहुंच गया। उसे देखकर वह गया और उसे खींचकर घर से दूर ले गया और बोला-''तुम यहाँ क्यों आये? तुम्हारे बारे में अपने घर में मैंने बताया है कि मित्र हो  कोई ब्लोगर नहीं।" </p>
<p>दूसरा ब्लोगर बोला-''यार तुम भी मेरी तरफ डरपोक हो,अपने घरवालों से घबडाते हो।"<br />
पहला ब्लोगर''-नहीं मैं तुमसे अधिक डरपोक हूँ, बताओ क्यों आये हो?''<br />
दूसरा ब्लोगर-यार बहुत दिन से ब्लोगिंग नहीं की, और घर पर कभी मेरे बच्चे अब मुझे बैठने नहीं देते, और कुछ न  कुछ सीखने के नाम पर उससे चिपके रहते हैं और जब कुछ कहता हूँ तो उनकी मान लड़ने आ जाती है। उससे भी  बचता हूँ तो उधार वापस मांगने वाले आ जाते हैं। मैंने सोचा तुम्हारे घर पर ही ब्लोगिंग कर लूं। इससे हम दोनों को फायदा होगा। पर जाने दो यार! तुम घर पर मुसीबत में न आ जाओ इसलिए जाता हूँ।</p>
<p>पहला ब्लोगर बोला-''हाँ जाओ, पर मैं किसी डर के कारण तुमको जाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, तुम्हारी ब्लोगिंग से मुझे खतरे हैं इसलिए तुम्हें अपने घर पर  इसकी इजाजत नहीं दे सकता।''</p>
<p>"क्या ख़तरा है? मैं कोई पोस्ट थोडे ही लिखता हूँ। कमेन्ट ही तो लिखनी है। बहुत दिन से मेरे दोस्त याद  कर रहे होंगे।''दूसरा बोला।<br />
 ''कमेन्ट! तुम कमेन्ट लिखते हो। ताज्जुब है?''पहले ने हैरान होने का नाटक करते हुए कहा।</p>
<p>''और क्या लिखता हूँ?''दूसरे ने कहा।<br />
''मेरे ख्याल से उसे अभद्र शब्दों का पिटारा कहना  चाहिए। नहीं, तुम जाओ। यहाँ मुझे फंसा दोगे।''पहले ने कहा।</p>
<p>दूसरे ने कहा-''नही यार, तुम मुझे गलत मत समझो। गाली देकर दिर माफ़ी भी तो मांग लेता हूँ। वैसे तुम्हारे पास आने का एक और भी कारण था। मैं अपने ईमेल का पासवर्ड भी भूल गया हूँ। सोचा तुम्हारे ईमेल पर ही काम कर लूं।''<br />
''तब तो बिलकुल नहीं।"पहले ब्लोगर ने कहा--''तुम जैसे आदमी को अपने ईमेल का इस्तेमाल करने जैसे बेवकूफी  नहीं करूंगा। कहीं तुने अंट-शंट लिख दिया तो क्या जवाब दूंगा। ईमेल  तो साफ पढ़ने में आता है।"</p>
<p>''कोई बात नहीं, वैसे तो कोई ब्लोगर इतनी खोजबीन नहीं करता और कोई करे भी तो खंडन कर देना। मैं अभद्र  शब्द लिखूं तुम अपनी तरफ से खंडन कर देना.'' दूसरे ब्लोगर ने कहा।</p>
<p>''नहीं, बिलकुल नहीं!" पहेल ब्लोगर ने कहा<br />
''यार, तुमने वाकई सही कहा था मुझसे अधिक डरपोक हो। मैं कई बार ऐसा कर चुका हूँ, पहले जो चाहे लिख देता हूँ फिर कहीं माफ़ी मांगता हूँ कहीं नहीं। अब इसके तुम्हारा क्या जाता है? मैं अंट-शंट लिख दूं तो तुम खंडन  कर देना."</p>
<p>पहले ब्लोगर ने आँखे तरेरते हुए कहा-''मैं अंट-शंट लिखने और कहने में डरपोक हूँ पर सुनने और पढ़ने में बिलकुल नहीं समझे। एक बात तुम्हारी गलती माफ़ कर चुका हूँ पर अब उम्मीद नहीं करना।"</p>
<p>दूसरा बोला-''यार गुस्सा क्यों करते हो अब मैं जा रहा हूँ, पर हाँ इस ब्लोग मीट पर जरूर लिखना। वैसे मैंने सोचा कि तुमने काम करने दिया तो ठीक  और नहीं तो ब्लोगर मीट तो हो ही जायेगी। </p>
<p>वह चला गया तो पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया कि 'यह भला कि भला यह किस तरह की ब्लोगर मीट थी। फिर उसे याद आया कि उसने यह तो बताया ही नहीं कि इस ब्लोगर मीट पर कविता लिखना है कि नहीं। फिर टी किया कि इस बार हास्य आलेख ही लिख देता हूँ, अगली बार पूछ लूंगा। वह अपनी होठों में बुदबुदाया'मैं अंट-शंट लिख दूं तुम खंडन कर देना.<br />
<strong><br />
नोट-यह मेरा हास्य आलेख स्वरचित और काल्पनिक है और किसी घटना और व्यक्ति से इसका कोई संबन्ध नहीं है और अगर किसी की खुराफात से मेल खा जाये तो वही जिम्मेदार है क्योंकि इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे ब्लोगर से मिला ही नहीं जो अभद्र शब्द लिखता हो। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तुम्हारे प्रेम के विरह में हास्य लिखता हूँ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/17/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 08:14:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="color:#777;" class="postBody">ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-''क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो। क्या घर पर झगडा कर आये हो?"<br />
''नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।''ब्लोगर ने कहा;''मुझे पता है कि तुम ब्लोग पर लिखते हो। उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-''क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।'<br />
ब्लोगर ने सहमते हुए कहा-''नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। पर विरह कवितायेँ मैं तुम्हारी याद में नहीं लिखता। वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में लिखता हूँ।''<br />
''धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।''उसने घूरकर पूछा।<br />
''नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। ब्लोगर ने धीरे से उत्तर दिया।<br />
प्रेमिका हंसी-''पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?'<br />
''पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी तो प्रेम में विरह तो हुआ न!''ब्लोगर ने कहा।<br />
पुरानी प्रेमिका ने पूछा -''अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?"<br />
''हास्य कवितायेँ और व्यंग्य लिखता हूँ।" ब्लोगर ने डरते हुए कहा।<br />
''क्या"-वह गुस्से में बोली-''मुझे पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?'<br />
ब्लोगर सहमते हुए बोला-"मैंने देखा एक दिन तुम्हारे पति का उस कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था. मालिक उसे कह रहा था कि''साहब. कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. तुम्हारा पति कह रहा था कि'उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है', तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि...............वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी. तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब......अब मैं और क्या कहूं?''<br />
वह बिफर गयी और बोली-''तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।"<br />
ब्लोगर पीछे से बोला-''तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।''<br />
वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। ब्लोगर सोचने लगा-''अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं हास्य आलेख भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।''<br />
<strong>नोट-यह एक स्वरचित और मौलिक काल्पनिक व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और किसी का इससे मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यारी को  बेगार बना दिया]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/13/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Tue, 13 Nov 2007 15:40:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की
चमक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की<br />
चमक तो मिलती जा रही है<br />
पर धरती की हरियाली<br />
मिटती जा रही है<br />
अंधेरी तिजोरी को चमकाते हुए<br />
इंसान को अंधा बना दिया है<br />
प्यार को व्यापार<br />
और यारी को बेगार बना दिया है<br />
हर रिश्ते की कीमत<br />
पैसे में आंकी जा रही है<br />
अंधे होकर पकडा है पत्थर<br />
उसे हाथी बता रहे हैं<br />
गरीब को बदनसीब और<br />
और छोटे को अजीब बता रहे हैं<br />
दौलत से ऐसी दोस्ती कर ली है की<br />
इस बात की परवाह नहीं कि<br />
इंसान के बीच दुश्मनी बढ़ती जा रही है<br />
--------------------------------</p>
<p>यहाँ बोलने के लिए सब हैं आतुर<br />
अपने बारे में सच सुनने से भयातुर<br />
चारों और बोले जा रहे शब्द<br />
बस बोलने के लिए<br />
सुनता कोई नजर नहीं आता<br />
अपनी भक्ति के गीत हर कोई गाता<br />
जिन्दगी जीने का तरीका कोई नहीं जानता<br />
सिखाता दूसरे को गुर<br />
सूरज उगने के बाद उठते<br />
और बोलना शुरू करें ऐसे जैसे दादुर (मेंढक)<br />
सुबह से शाम तक लोग ढूढ़ते श्रोता<br />
सच सुनने से रहते भयातुर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच और झूठ का द्वंद]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/09/%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 10:02:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक झूठ सौ बार बोला जाये
तो वह सच हो जाता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक झूठ सौ बार बोला जाये<br />
तो वह सच हो जाता है<br />
और एक सच सौ बार<br />
दुहराया जाये तो<br />
मजाक हो जाता है<br />
सच होता है अति सूक्ष्म<br />
विस्तार लेते वृक्ष की तरह<br />
कई झूठ भी समेटे हुए<br />
वटवृक्ष बन जाता है<br />
कौनसा पता झूठ का है<br />
और कौनसा सच का<br />
पता ही नही लग पाता है<br />
लोग पते पकडे हाथ में ऐसे<br />
मानो सच पकडा हो<br />
भले ही झूठ ने उनकी बुद्धि को जकडा हो<br />
जिनके पास सच है<br />
उनको भी भरोसा नहीं उस पर<br />
जिन्होंने झूठ को पकडा है<br />
वह भी अपने पथ को सच<br />
मानकर चलते हैं उस पर<br />
सदियों से चल रहा है द्वंद<br />
सच और झूठ का<br />
इसका अंत कहीं नहीं आता है।<br />
-----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जंग में पिसता है आम आदमी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/04/%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 04 Nov 2007 14:33:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक कहे  आजादी की  जंग
दूसरा दे उसे आतंक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक कहे  आजादी की  जंग<br />
दूसरा दे उसे आतंक का रंग<br />
आम आदमी ही होता है तंग<br />
नहीं होता वह पूर्व और पश्चिम के संग<br />
जानता है  अपने की हो या पराये की<br />
उसके सीने की और ही होता है<br />
संगीन का  निशाना<br />
आजादी और आतंक तो बस होता है  बहाना<br />
अपनी  राजनीतिक आजादी की चाह तो<br />
गांधी जी की राह क्यों नहीं चलते<br />
जानते नहीं क्या हथियारों के उपयोग से<br />
उनके विरोधी के ही पेट पलते<br />
अब तो सूचना का जाल चारों और<br />
बिछ गया<br />
पल-पल की खबर मिलते है  <br />
आम आदमी को इसलिए ही<br />
बेतुकी लगती है <br />
चाहे वह आजादी की  या<br />
आतंक के ख़िलाफ़ हो जंग<br />
-----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह पब्लिक है, सब जानती है ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/02/%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%aa%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Fri, 02 Nov 2007 15:13:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हीरो को जन्म दिन हो तो
सारे चैनल भौंपू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हीरो को जन्म दिन हो तो<br />
सारे चैनल भौंपू हो जाते<br />
बस उसकी आरती सुनाये जाते<br />
चालीस पार हो चुके हों<br />
और बिकती हो खबर बाजार में<br />
तो उसे जवान बताते<br />
और चालीस पार आम आदमी को<br />
स्वस्थ रहने के लिए<br />
गोलियों के ब्रांड<br />
बाल काले रखने के लिए<br />
अनेक तेलों के नाम सुझाते </p>
<p>कहैं दीपक बापू  कब तक<br />
जनता  को चलाओगे<br />
अधेडावस्था के लोगों को कब तक<br />
नवयोवनाओं की आँखों में बसाओगे<br />
दावा करते हो देश में जागरूकता लाने का<br />
फैलाते हो भ्रम<br />
सच बोलने में आती है शर्म<br />
खुलने लगे हैं कर्म<br />
यह जनता सब जानती है<br />
तुम्हारे सच के पीछे झूठ को जानती है<br />
इसलिए तुम नाम बदलते हो<br />
चेहरे वही पुराने सामने लाते<br />
खबर के नाम पर गाने परोसते<br />
जज्बात के नाम पर हीरो के अलावा<br />
और लोग तुम्हें नहीं सुहाते<br />
पर याद रखना यह पब्लिक है<br />
लोग तुमसे नहीं चलते<br />
वही तुम्हें चलाते<br />
-----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के सोच जैसी होगी दुनिया ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 17:14:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मन का खोखलापन
तन को रुग्ण कर देता हैं
व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मन का खोखलापन<br />
तन को रुग्ण कर देता हैं<br />
विचारों की कलुषिता से<br />
अपना दिल ही बैचेन कर देता है<br />
हम अपने ही दायरों में कैद हो जाते हैं </p>
<p>जैसा ख़्याल दिल में होगा<br />
वैसा ही दृश्य हमारे सामने<br />
हर हाल में प्रकट होगा<br />
ख्वाब देखना ठीक है<br />
पर अगर पूरे न हौं तो<br />
देखने वाले तकलीफ उठाएँ जाते हैं</p>
<p>जैसी सोच होती है<br />
वैसी ही दुनिया सामने नजर आती है<br />
कुछ अच्छा और बुरा नहीं<br />
नजरिया जैसा होता है<br />
वैसे ही अहसास हो जाते हैं</p>
<p>इसलिये जैसी दुनिया<br />
देखना चाहते हो<br />
वैसी ही सोच के साथ चलो<br />
ख़्वाबों और ख्यालों में<br />
कुछ खूबसूरत नजरिये<br />
जोड़ते हुए उनके साथ ढलो<br />
जिन्दगी का सफर तो सभी काटते हैं<br />
कुछ रोते कराहते गुजारते हैं<br />
जो हँसते, गुनगुनाते और अपनी<br />
हकीकतों से करते हैं दोस्ती<br />
वही सुख के पल जीं पाते हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी पहचान ढूंढता आदमी ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 16:29:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अलग खडा नहीं रह सकता
इसलिये भीड़ में श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अलग खडा नहीं रह सकता<br />
इसलिये भीड़ में शामिल<br />
हो जाता है आदमी<br />
फिर वहीं तलाशता है<br />
अपनी पहचान आदमी<br />
भीड़ में सवाल-दर सवाल<br />
सोचता मन में<br />
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी</p>
<p>भीड़ में शामिल लोगों में<br />
अपने धर्म के रंग<br />
अपनी जाति का संग<br />
अपनी भाषा का अंग<br />
देखना चाहता आदमी<br />
अपनी टोपी जैसी सब पहने<br />
और उसके देवता को सब माने<br />
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने<br />
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी<br />
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती<br />
यह जानकर उसे कोसता आदमी</p>
<p>अपने अन्दर होते विचारों में छेद<br />
भीड़ में देखता सबके भेद<br />
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद<br />
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश<br />
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर<br />
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा<br />
असफल होने पर सबको समान<br />
बताने का दावा<br />
आदमी देता है भीड़ को धोखा<br />
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता<br />
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता<br />
कोई उसकी भाषा नहीं होती<br />
कहा-सुना सब बेकार<br />
तब हताश हो जाता है आदमी<br />
भीड़ में शामिल होना चाहता है<br />
अपनी शर्तें भूलना नहीं चाहता आदमी<br />
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काहेका भला आदमी! ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/31/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 15:25:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह सुबह जाने की लिए घर से निकले, तो कालो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह सुबह जाने की लिए घर से निकले, तो कालोनी में रहने वाले एक सज्जन उनके पास आ गए और बोले-''मेरी बेटी कालिज में एडमिशन लेना चाहती  है उसे कालेज में प्रवेश का लिए फार्म चाहिये. आपका उस रास्ते से रोज का आना-जाना है. आप तो भले आदमी हैं इसलिए आपसे अनुरोध है कि  वहाँ से उसका फार्म ले आयें तो बहुत कृपा होगी.''</p>
<p>                          वह बोले-''इसमें कृपा की क्या बात है? आपकी बेटी तो मेरी भी तो बेटी है. मैं कालिज से उसका फार्म ले आऊँगा.'' </p>
<p>                             समय मिलने पर वह  उस कालिज गए तो वहाँ फार्म के लिए लाइन लगी थी. वह  फार्म लेने के लिए उस लाइन में लगे और एक घंटे बाद उनको फार्म मिल पाया. वह बहुत प्रसन्न हुए और घर आकर अपना स्कूटर बाहर खडा ही रखा और फिर थोडा पैदल  चलकर उन सज्जन के घर गए और बाहर से आवाज दी वह बैठक से  बाहर आये तो उन्होने उनका फार्म देते हुए कहा-"लीजिये फार्म''<br />
                           सज्जन बोले-"अन्दर  तो आईये. चाय-पानी तो लीजिये.''<br />
                         वह बोले-"नहीं, मैं जल्दी में हूँ. बिलकुल अभी आया हूँ. फिर कभी आऊँगा.''</p>
<p>                      सज्जन फार्म लेकर अन्दर चले गए और यह अपनी घर की तरफ. अचानक उन्हें याद आया कि'फार्म भरने की आखरी तारीख परसों है यह बताना भूल गए'.<br />
                       वह तुरंत लौट गए तो अन्दर से उन्होने सुना कोई कह रहा था-'आदमी तो भला है तभी तो फार्म ले आया .'<br />
                    फिर उन्होने उन सज्जन को यह कहते हुए सुना-''कहेका भला आदमी है. फार्म ले आया तो कौनसी बड़ी बात है. नहीं ले आता तो मैं क्या खुद ही ले आता. जरा सा फार्म ले आने पर क्या कोई भला आदमी हो जाता है."<br />
                   वह हतप्रभ रह गए और सोचने लगे-'क्या यह सज्जन अगर कह देते कि भला आदमी है तो क्या बिगड़ जाता. सुबह खुद ही तो कह रहा था कि आप भले आदमी हो.'</p>
<p>                          फिर मुस्कराते हुए उन सज्जन को आवाज दी तो वह बाहर आये उनके साथ दूसरे सज्जन भी थे. वह बोले-''मैं आपको बताना भूल गया  था कि फार्म भरने की परसों अन्तिम तारीख है.''</p>
<p>                          वह सज्जन बोले-'अच्छा किया जो आपने बता दिया है. हम कल ही यह फार्म भर देंगे.''-फिर वह अपने पास खडे सज्जन से बोले''यह भले आदमी हैं. देखो अपनी बिटिया के लिए फार्म ले आये. </p>
<p>                        वह मुस्कराये. उनके चेहरे के पर विद्रूपता के भाव थे. वह सज्जन फिर दूसरे सज्जन से मिलवाते हुए बोले-''यह मेरा छोटा भाई  है. बाहर रहता है कल ही आया है."</p>
<p>                        वह मुस्कराये और उसे नमस्ते की और बाहर निकल गए और बाहर आकर बुदबुदाये-'' काहेका भला आदमी! </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल और दोस्ती ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 14:47:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमें पूछा था अपने दिल को<br />
बहलाने के लिए किसी  जगह का पता<br />
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया<br />
जहां बिकती है दिल की खुशी<br />
दौलत के सिक्कों से<br />
जहाँ पहुंचे तो सौदगरों ने<br />
मोलभाव में उलझा दिया<br />
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी<br />
और दिमाग का चैन<br />
तो इस दुनिया में रहता<br />
हर आदमी क्यों इतना बैचैन<br />
हम घर पहुंचे और सांस ली<br />
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा<br />
जिस चैन को ढूंढते थक गए थे<br />
आखिर उसने ही उसका पता दिया<br />
-------------------<br />
दोस्ती निभाने के वादे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैंदोस्ती निभाने के वा दे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैं<br />
------------------<br />
कोई भी जब मेरे पास<br />
वादों का पुलिंदा लेकर आता है<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज मी लुटने का दिन है<br />
पहले सलाम करते हैं<br />
फिर पूछते हैं हालचाल<br />
फिर याद दिलाते हैं<br />
पुरानी दोस्ती का इतिहास<br />
मैं इन्तजार करता हूँ<br />
उनकी फरमाइश सुनने का<br />
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर<br />
दावा यह कि केवल तुम अपने हो<br />
इसीलिये कह रहा हूँ<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज एक दोस्त अपने से<br />
सबंध ख़त्म होने का दिन है<br />
________________</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल हुआ इधर से उधर ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%87%e0%a4%a7%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a7%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 09:03:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%87%e0%a4%a7%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%89%e0%a4%a7%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर<br />
कमेन्ट लिखते-लिखते<br />
दोनों के दिल मिल गए  अपने आप<br />
दोनों युवा थे और कविता लिखने  के शौकीन भी<br />
होना था मिलन कभी न कभी<br />
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो<br />
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता<br />
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता<br />
अपना लिखना भूल गया<br />
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता<br />
और खुश होता अपने ही आप </p>
<p>एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश<br />
' कुछ और रचनाएं भी लिखा करो<br />
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे<br />
'केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर'कहलाओगे<br />
इससे होगा मुझे भारी संताप </p>
<p>प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर<br />
वह लिखने में जुट गया<br />
हो गया मशहूर सब जगह<br />
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया<br />
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव<br />
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का<br />
उसके दिल में था घाव<br />
बदला लेने को था बेताब<br />
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर<br />
लगाना शुरू किया कमेन्ट<br />
एक अपने और आठ छद्म नाम से<br />
उसके ब्लोग को हिट कराता<br />
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा<br />
उसको हर बार भेंट<br />
प्रेमिका का दिल भी गया पलट<br />
दूसरे में गया दिल गया भटक<br />
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का<br />
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप </p>
<p>उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने<br />
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा<br />
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया<br />
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर<br />
उसे सब समझ में आया<br />
मन में हुआ भारी संताप<br />
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश<br />
'यह क्या कर रही हो<br />
मुझे लिखने में उलझाकर<br />
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो<br />
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम<br />
अंतर नही समाज रही<br />
धोखा खाओगी अपने आप'</p>
<p>प्रेमिका ने भेजा सन्देश<br />
'तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी<br />
तुम्हारी रचना दर्द  बाँटती हैं<br />
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं<br />
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया<br />
तुम अपना दिल कहीं और लगाना<br />
मत देना अपने को विरह का संताप<br />
सब ठीक हो जायेगा अपने आप </p>
<p><strong>नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आस्तिक-नास्तिक विवाद पर बेकार की बहस]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 08:51:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</guid>
<description><![CDATA[माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगवान् का वरदहस्त मान लिया जाता है. जितनी  भगवान् की महिमा अनंत है उतनी  ही माया की गाथा अनंत है. इस विश्व में कई ऐसे लोग  हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की उपलब्धियों के शिखर पर हैं पर भगवान को नहीं मानते हैं न पूजते हैं. उन लोगों को पूजना भी नहीं चाहिए और उनके नास्तिक विचार पर किसी को आपत्ति भी नहीं करना चाहिए. आखिर हर आदमी भगवान् की पूजा क्यों करता है? माया की कृपा हो इसलिए ही न! कहीं नमन कर तो कहीं ऊपर हाथ उठाकर आखिर आदमी और क्या चाहता है! इस दुनिया में दैहिक  और भौतिक सुख ही न! </p>
<p>     अब किसी के ऊपर माया मेहरबान हो तो लोग यहीं कहते हैं की भगवान् के मेहरबानी है. पर अगर कोई  अपनी उपलब्धियों को अपनी मानता है तो उसे आखिर लोग क्यों जबरदस्ती कहलाना चाहते हैं कि भगवान की कृपा है.मेरे विचार से  भक्ति के नितांत एक  निजी मामला है. अपने देश में तो और भी अधिक मामला पेचीदा है. एक ही परिवार के पांच सदस्य अलग-अलग भगवानों की पूजा करते हैं और उनके आध्यात्म गुरु भी अलग होते हैं और बडे आराम से एक छत के नीचे रहते हैं. कभी एक दूसरे से नहीं कहते कि 'तुम हमारे  भगवान् को पूजो या हमारे गुरु को मानो'. सब जानते हैं कि यह निरंकार की उपासना का मार्ग हैं. जब लोग अपने घरों में ऐसे मामलों  पर बहस नहीं करते तो बाहर विवाद खडा क्यों करना चाहते हैं. </p>
<p>             इतिहास गवाह है की पूरे विश्व में आस्तिक और नास्तिक विचारधारा के लोग एक दूसरे की गर्दन तक उड़ा चुके हैं. ऐसी घटनाएं भारत में तो कम बाहर और भी ज्यादा हो चुकी हैं. पर यह उस समय की बात है जब मनोरंजन और आवागमन  के साधन काम थे और लोग अपने सीमित दायरों में ही रहते और सोचते थे. उस समय भगवान् को मानने की चर्चा इसलिए अधिक थी क्योंकि काम कम था और समय अधिक.  अब समय बदल गया है और ऐसे में आदमी जिन्दगी की धमा-चौकडी में इस कदर  फंसा है की उसे यह पूछना अन्याय लगता है कि बता भगवान् है कि नहीं. घर और रोजगार के स्थानों के बीच की दूरी तय करते हुए आदमी का आधा दिन गुजर जाता है. रिश्तेदारी पहले की तरह अब घर के पिछवाडे में नहीं होती. कहीं से सन्देश आ जाये तो वहाँ पहुँचने के साधन की चिंता अलग से कंरनी पड़ती है. इस समय रेल मिलेगी कि बस. समय पर पहुँचेगे कि नहीं. तमाम  तरह के घरेलू और सामाजिक  तनाव अब ऐसे हैं कि भगवान् के अस्तित्व पर बहस करने का किसी को समय ही नही है. </p>
<p>जिसके मन में हैं वह समय निकाल कर मंदिर चला जाता है और जिसके पास नहीं है घर के अन्दर भी कर लेता है. कोई नहीं भी कर पाता इसका मतलब यह कतई  नहीं है  वह  भगवान् को नहीं मानता-और जो मानता है वह कहने के लिए मानता है औरहृदय में धारण करता है कि नहीं यह पता नहीं लग पाता.  ऐसे में जो नहीं मानता तो उससे भी इस बात के लिए बाध्य करना ठीक नहीं है बता-कैसे कहता है कि भगवान् नहीं है". </p>
<p>                अब तो आधुनिक योग में हमारे पास तमाम  तरह की वैज्ञानिक जानकारी है और इस धरती के लोग अन्तरिक्ष में विचरण कर रहे हैं तब आस्तिक और नास्तिक पर  बहस बेकार लगती है  जो कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करना है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पावर कट तो पोस्ट कट ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%9f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%9f/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 14:10:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%9f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%9f/</guid>
<description><![CDATA[ भारत के बडे शहरों और विदेशों में  रहन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> भारत के बडे शहरों और विदेशों में  रहने वाले हिन्दी ब्लोग लेखक और पाठक  बहुत भाग्य्शाली हैं कि उनको पावर कट के बारे में तो सोचना भी नहीं है पर जो भारत में ही हैं उन्हें  तो इस समस्या से दो चार होना ही है-छोटे और मध्यम शहरों के ब्लोग लेखक और पाठक  के लिये तो यह एक समस्या  बनी  रह्ती है।</p>
<p>      इधर हमें भी अब इस समस्या का सामना करना पड है  और हमारे लिये तो पहले तो पावर  कट का मतलब होता था 'टीवी कट"  और अब साथ में  हो  गया है 'ब्लोग पर पोस्ट कट'। जो बिजली के  जाने  का समय है वही मेरा ब्लोग पर आने का।  यह संकट अभी है। इसलिए अब तो पाठकों और मित्रों के साथ रिश्तों का निर्वाह तो किश्तों में ही हो पायेगा। कभी पोस्ट लिखते लाईट जायेगी तो कभी पढ़ने और   कमेन्ट लिखते समय। इधर अब इस बात की भी गारंटी नहीं रही कि इंटरनेट उस समय खुल पायेगा जब लाईट है। मतलब लिखेंगे कम मजा ज्यादा-क्योंकि जब लाईट जायेगी टू परेशान होंगे और आयेगी टू बहुत खुश होंगे. लाईट नहीं होती तो दूसरे काम ढूंढ  लेते हैं और उसमें मग्न होने के अलावा कोई चारा भी नहीं रहता  है। लाईट  जब आती है तो मन प्रसन्न हो जाता है उस पर अगर इंटरनेट  कभी  उसी क्षण भी काम करे तो और भी मजा आ जाता ।इस तरह जो मजे के लिये ब्लोग लिख रहे थे वह तो पहले ही ले चुके होते हैं तो लिखें क्या? सोचते हैं अब दूसरों के ब्लोग पढ़कर उस पर  कमेंट लिखकर काम चलायें तो उसमें  भी कई बार परेशानी झेलनी पडती है। पता लगा कि हमने पूरी तैयारी कर ली और लाईट गुल! जब लाईट  की समस्या नहीं थी तो खूब लिख कर मजे ले रहे थे  और अब वह सामने आ रही है तो उसके हल होने पर मजे लेते हैं। तकलीफ  ना हो तो आदमी बोर होता है और होती है तो  परेशान और उस्का निराकरण  हो जाये तो आनंद  भी आता है। और वह आनंद और कोई अन्य चीज की तरफ़ जाने नहीं देता।</p>
<p>                     इस देश में ब्लोग लेखन का सीधा संबंध पावर से है। और यह समस्या कोई एक प्रदेश या शहर की नहीं  है। मुश्किल यह है कि इस काम से कोई आय तो अभी है नहीं कि इसे जारी रखने के लिये अपना काम-धंधा छोड कर इस पर बैठ जाये।कोयी अपने कार्यालय से शाम को लौटता  है तो कोई काम धंधे से रात को। फ़िर अपने विश्राम के समय से निकालकर ब्लोग लिखते हैं, एसी स्थिति में देश के ब्लोग लेखक काफी  कड़े संघर्ष करते हुए चलते हैं। हमारा सुबह का कट तो तत्काल प्रभाव से  लागू हो गया है और ऐसा लगता है कि रात का भी कट करना पड़ेगा। पूरी तरह ब्लोग लाइन नहीं छोड सकते पर इसे अब पहले की तरह चलाना मुश्किल लगता है। ऐसा कब तक चलेगा हम नहीं जानते पर जब तक इस देश में पावर की समस्या है और जिन   ब्लोग लेखकों और पाठकों  के सामने यह जब आएगी तो उनको भी  ब्लोग पर पोस्ट कट की नीति पर चलना पडेगा। इस कारण अब पोस्ट में कटौती कर  उसे संक्षिप्त  करनी पडेगी। जैसे पहले देश के प्रेमी लोगों ने  आई लव यू की जगह इलु-इलु कर किया था। जहाँ  कविता लिखनी  हो वहां क्षणिका से काम चलाना पडेगा। और जहाँ आलेख का मन है वहाँ चार लाइन की  सूचना लिखने  जैसी नीति अपनानी पडेगी और पाठकों से कहना पडेगा कि थोडा  लिखा बहुत समझना और उन पाठकों को  भी यह करना पडेगा  जो स्वयं  इस  समस्या से दो चार हो रहे होंगे। अलबता छोटे और मध्यम शहर के शहरों के पाठक और ब्लोगर हमेशा ही  ऐसी समस्याओं से जूझते रहेंगे.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देश में जनचेतना लाना जरूरी ]]></title>
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<pubDate>Wed, 17 Oct 2007 15:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[       आज एक चैनल पर विभिन्न मनोरंजक चैनलो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>       आज एक चैनल पर विभिन्न मनोरंजक चैनलों पर  संगीत कार्यक्रमों में नृत्य और संगीत की प्रतियोगिताओं में किये जा रहे निर्णयों के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए उन पर संशय व्यक्त किया गया. कुछ प्रतियोगी निर्णयों से सन्तुष्ट थे तो कुछ असंतुष्ट. कुछ हारे प्रतियोगियों ने मांग की प्रतियोगियों के जजों को पूर्ण अधिकार दिए जाने चाहिए तो कुछ ने कहा पचास  प्रतिशत जजों को तथा  पचास प्रतिशत  एसएमएस को दिया जाना चाहिए तो कुछ ने अपने अन्य  संशय भी जाहिर किये. </p>
<p>         अभी तक इन प्रतियोगिताओं  के  कार्यक्रम  पर लोगों को संशय था पर प्रचार माध्यम एकदम खामोश थे,  इस संबध में कई  अपने हिंदी के   ब्लोग लेखक लिख चुके हैं. मैने भी कुछ  हास्य कवितायेँ और आलेख इस बारे में लिखे. मैं यह दावा नहीं करता के इन ब्लोग लेखकों की वजह से समाचार माध्यम चेते हैं पर जब  कहीं किसी सार्वजानिक विषय पर  चर्चा शुरू होती है तो उस जगह तक जरूर जाती  है जहाँ से उसका स्त्रोत मौजूद होता है.</p>
<p>           लोगों में इस बार में पहले से ही संशय था और भारत के समाचार चैनलों से यह आशा की जा रही थी कि वह इस पर रोशनी डालें, आज एक चैनल ने इस पर अपना दूसरा पक्ष दिखाया है  कल को दूसरा चैनल भी कर सकता है. अंतर्जाल पर हो रही चर्चाओं पर लोगों की नजर नही जाती यह  कभी नहीं सोचना चाहिए. हो सकता है कि हमें कम पाठक देखते हैं पर कई लोग और संस्थाएं ऎसी हैं जो इस पर नजर रखती होंगी. हिंदी में अन्तर्जाल पर ब्लोग है यह सभी जानते हैं और जिनका काम ही जनसंपर्क का है वह लोग इस पर नजर रखेंगें ही. अत: ब्लोग लेखक यह मानकर चलें कि वह जो लिख रहे हैं और उसका प्रभाव होगा. बढ़ते बाजारी करण में लोगों को भ्रम में डालने के लिए नए नए तरीके आएंगे और उन पर अपने विचार व्यक्त कर जहां ब्लोग लेखक अपनी बात रखकर मन हल्का करेंगे और समाज में चेतना भी ला सकते हैं. इतना ही नहीं प्रचार मध्यम भी आगे चलकर इन पर नजर रखेंगें क्योंकि  उन्हें यहाँ से अपने कार्यक्रमों के बारे में रूचि और अरुचि की जानकारी मिलेगी. </p>
<p>         भारतीय प्रचार माध्यमों  से जुडे लोगों को भी सतत ऎसी व्यवसायिक  चालों पर नजर रखनी होगी, क्योंकि अब उन पर भी नजर रखी  जा रही है. आजकल लोग बहुत  जागरूक हैं और इन प्रतियोगिताओं पर उनके  मन में संशय शुरू से ही है  कि इनमें शायद ही विजेताओं का चयन उस तरह होता हो  जैसा कि दावा किया जाता है. चैनलों द्वारा इस तरह की रिपोर्ट देने से उन लोगों को भी वास्तविक धरातल पर विचार करने का अवसर मिलेगा जो इससे अवगत नहीं थे. व्यवसायिक बाध्यताओं के चलते ऎसी प्रतियोगिताओं के विज्ञापन देने में कोई बुराई नहीं है पर जनचेतना उत्पन्न करने की जिम्मेदारी के तहत उन्हें इनकी वास्तविकताओं पर प्रकाश डालना भी उनका दायित्व है और यह उन्होने किया यह संतोष की बात है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[अगड़म-बगडम लिखते तो हिट हो जाते ]]></title>
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<pubDate>Tue, 16 Oct 2007 16:06:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव में ही रहता है। दरअसल पहले ब्लॉगर का घर भी शहर के बाहर कालोनी में था, और वह गाँव उससे बहुत ज्यादा दूर नहीं था। पहला ब्लॉगर कई बार उस गाँव में जा चुका था।</p>
<p>उसने साइकिल उठाई और वहां चल दिया। पक्की सड़क से होते हुए वह उस कच्ची सड़क की ओर मुड़ा जो उस गाँव की तरफ जाती थी । उसने मोड़ पर स्थित पहले मकान के बाहर मैदान पर घास खोद रहे व्यक्ति को देखा और साइकिल से उतरकर आवाज दीं । वह व्यक्ति उसके पास आया। बनियान और तहमद पहने उस व्यक्ति से उसने दूसरे ब्लॉगर का नाम बताते हुए उसके घर पूछा-‘क्या तुम उस जानते हो कहाँ रहता है।’</p>
<p>उस व्यक्ति ने कहा-'इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता।आप गलत गाँव में आ गये हैं’</p>
<p>पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया। उसे लगा कि उसके मित्र ने उसे धोखा दिया है-पर फिर लगा कि हो सकता है यह आदमी ही उसे नहीं जानता हो क्योंकि वह दूसरा ब्लॉगर उस गाँव का नहीं था शहर से उधारी वालों से परेशान होकर ही वह गाँव के बाहर ही कहीं रह रहा था-ऐसा ही उसके मित्र ने बताया था। फिर उसने उस आदमी को घूर कर देखा और कहा-‘अच्छा तो तुम हमें ही चलाने लगे। क्या बात है आज तुम मुझे ही नहीं पहचान रहे।”</p>
<p>वह दूसरा ब्लॉगर था। उसने भी उसे नहीं पहचाना था फिर उसके समझ में आया और बोला-'अच्छा तो तुम हो यार, मैं डर गया था की कोई गलत आदमी मेरा पता पूछ रहा है क्योंकि मुझे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। यहाँ मेरा दूसरा नाम है।”<br />
पहले ब्लोगर ने कहा-'दूसरा कि तीसरा?'<br />
दूसरा बोला-'चौथा। मैं अपने नाम बदलकर काम करता हूँ।इतनी संख्या है कि मुझे खुद याद नहीं रहता और तुम्हारा भी भेजा फ्राई हो जाएगा।'<br />
पहला ब्लॉगर बोला-'अच्छा किया जो नाम बदल लिया हैं नहीं तो उधार माँगने वाले परेशान करते।'<br />
दूसरा ब्लॉगर-‘तुमसे किसने कहा?’’</p>
<p>पहला ब्लोगार-‘’किसी ने नहीं। मैने अनुमान किया।'</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘’कहो कैसे आना हुआ।''<br />
पहले ने कहा-''सोचा तुमसे मिल लूँ ।''<br />
दूसरा-''क्या घर पर कोई काम नहीं था।''<br />
पहला- 'मैं अपने काम सुबह जल्दी निपटा देता हूँ। जो काम तुम कर रहे हो घास काटने का वह मैं अपने गार्डन में सुबह ही कर चुका हूँ। इस समय तुमसे उस रिपोर्ट के बारे में पूछने आया हूँ जो मैने लिखी थी तुमने देखी कि नहीं?”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-”मैने देखी थी , बहुत अच्छी थी । अब तुम यहाँ से चले जाओ। बडे दिनों बाद घर में एन्ट्री मिली है अगर तुम यहाँ रहे और मेरे घर के लोगों ने देख लिया तो हालत खराब हो जायेगी।''</p>
<p>इतने में गृह स्वामिनी बाहर आई और उसने पहले ब्लॉगर को नमस्ते की और अपने पति से बोली-‘भाई साहब को बिठाओ मैं इनके लिये चाय बनाकर आती हू।”</p>
<p>वह अन्दर चली गयी , पहला ब्लॉगर खुश हो गया और बोला-‘’ अगर चाय पिलाना है तो ठीक हैं, अन्दर चलते हैं। यहाँ कुछ गर्मी है।”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘नहीं, बाहर ही बैठो। मैं अन्दर से कुर्सी ले आता हूँ। वैसे तुम्हें साइकिल पर देखकर वह समझी कि तुम कोई लेनदार हो। इसलिये चाय की पूछ लिया और मैं भी यूं सोच कर चुप रह गया कि तुम्हारा नमक खाया है।”</p>
<p>वह अन्दर गया और दो कुर्सिया ले आया।</p>
<p>पहले ब्लॉगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-‘तुमने उस रिपोर्ट पर कमेंट नहीं दी ।’<br />
दूसरा-‘मैने उसे पढा ही नहीं।”</p>
<p>पहला-'पर तुमने अभी कहा था कि रिपोर्ट देखी थी।”<br />
दूसरा-‘हाँ पर मैने यह कब कहा की मैने उस पढा है।?”</p>
<p>पहला-“तुमने कब देखी थी?</p>
<p>दूसरा –‘’तुमसे मिलने के अगली रात दस बजे को।</p>
<p>पहला-“पर मैने तो उसे रात को एक बजे प्रकाशित किया था।'<br />
दूसरा-''अरे यार, तुम भी ऐसे ही हो। तभी मैं कहूं मुझे दिखाई क्यों नहीं दी। वैसे तुमने रात को एक बजे रिपोर्ट क्यों डाली, यह कोई टाइम है?”</p>
<p>पहला-''इसलिये कि घर में सब सो रहे थे।'</p>
<p>दूसरा-‘तुम यार इतना डरते हो?’<br />
पहला-'यह तुम कह रहे हो। मैं नहीं चाहता की मुझे तुम्हारी तरह कहीं ओर ठिकाने ढूंढने पडे।'</p>
<p>दूसरा-अच्छा छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हारी रिपोर्ट हिट हुई या फ्लाप?<br />
पहला-'एकदम फ्लाप?"<br />
दूसरा-'तुमने रिपोर्ट् के बारे में अकडम्-बकडम लिखा कि नहीं? मैं अपनी भाषा में कहूं तो............तुम्हारी भाषा में ही कहता हूं कि अभद्र शब्द............लिखे कि नही"</p>
<p>पहला-'यह क्या होता है? यह कौनसी विधा है।"<br />
दूसरा-'जब यह नहीं जानते तो लिखा क्या होगा? खाक! इसलिये तो रिपोर्ट फ्लॉप हो गयी ।अकडम-बकडम लिखते तो हिट हो जाते. '</p>
<p>पहला--'यह करना जरूरी है।'</p>
<p>दूसरा-'यह फ़ैशन है।"<br />
पहला-'यह में नहीं कर सकता।'</p>
<p>दूसरा-इसलिये तो तुम्हारा लिखा मेरी समझ में नहीं आता और कमेंट नहीं देता और तुम फ्लॉप हो। मेरी भाषा में लिखो तो मैं खूब कमेंट दूं।"</p>
<p>पहला ब्लोगर-'तुम्हारी भाषा सीखने की मुझे जरूरत नहीं है, मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि भईया रिपोर्ट पढ लेना।'<br />
दूसरा-'अब क्या खाक पढ लेना। हो गयी पुरानी। वैसे किसी ने कमेंट दी।'<br />
पहला-'हां! जो मेरे दोस्त हैं उन्होने दी।'</p>
<p>दूसरा-'ब्लोगरों से दोस्ती। वहां भला कोयी है दोस्ती लायक!'<br />
पहला-'हां, तुम ठीक कह्ते हो। सब भले लोग हैं, तुमसे दोस्ती करने लायक तो नहीं हैं।'<br />
दूसरा-'क्या मैं बुरा हूं। देखो मेरे मोहल्ले में आकर यह बद्तमीजी नहीं चलेगी। यह ठेका तो हमने ले रखा है। ऐसी कमेंट लिख जाऊंगा कि छोडो यार.....'</p>
<p>पहला-'ऐसा सोचना भी नहीं। तुम्हें गलतफ़हमी है कि पहले की तुम्हारी तो गल्तिया माफ़ कर चुका हू, अभी तक तुमसे हिसाब बकाया है।'</p>
<p>दूसरा ब्लोगर गुस्से में उसे घूर रहा था फ़िर बोला-'वह तो तुम्हारे छ्द्म नाम का ब्लोग था।</p>
<p>"पहला-"वह सब ठीक है, पर तुम अपने कहे पर लिखी रिपोर्ट पर कमेंट तो देते।"<br />
दूसरा-"जब पढे ही नहीं तो क्या खाक देता?"<br />
पहला-"तो अब पढ कर देना।'<br />
दूसरा-पढ़ने के बाद तो मैं किसी को कमेंट नहीं देता।<br />
'पहला-'तो बिना पढे ही दे देना।"<br />
दूसरा-' यार तुम मेरे मुहल्ले में आकार मुझे तंग मत करो ,वरना ऐसे कमेंट दूंगा कि ........छोडो यार।'<br />
पहला- ''तुम्हारा मोहल्ला। गुरु तुम किस गलतफहमी में हो। हम दोनों का एक ही मोहल्ला है। इस गाँव में मैं कई बार आता हूँ और ज्यादा दूर नहीं है।'<br />
इतने में एक बच्चा अंदर से चाय के दो कप ले आया और रख कर चला गया।पहले ब्लोगर ने तत्काल एक् कप उठा लिया तो दूसरा बोला कि-'क्या यार घर से चाय पीकर नही चले थे क्या कि मेरे कहने से पहले ही कप उठा लिया।<br />
'पहला-"तुम उठाने के लिये कहते?'<br />
दूसरा-"नही!"</p>
<p>पहला-"मुझे मालुम था। वैसे चाय अच्छी बनी है।"</p>
<p>दूसरा-हमारी पत्नी ने तुम्हें शहर से आया लेनदार समझ लिया इसलिये ऐसी स्पेशल चाय पिलाई है-और मैं भी तुम्हारे घर पर नाश्ता कर आया हूं इसलिये झेल रहा हूं।"</p>
<p>चाय पीने के बाद पहला ब्लोगर जाने के लिये तैयार हुआ तब दूसरा ब्लोगर बोला-'यहां किसी को मत बताना कि मैं ब्लोग लिखता हूं। हम दोनों दोस्त हैं और एक ही मुह्ल्ले के हैं, यह भूलना नहीं।"<br />
पहला ब्लोगर हंसते हुए बोला-'पर तुम तो कह रहे थे कि ब्लोगर भला दोस्ती लायक होते हैं? साथ में मुह्ल्ला भी याद आने लगा। चलो कोयी बात नही, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम जल्दी समझ जाओगे कि दोस्ती किसे कहते हैं?'</p>
<p>दूसरा-'इस मीटिंग पर कब रिपोर्ट कब लिख रहे हो?'<br />
पहला-कौंनसी मीटिंग.........अच्छा यह। कल सुबह छः बजे।<br />
दूसरा-'इतनी सुबह क्यों?"<br />
पहला-'उस समय सब घर पर सोते हैं।"<br />
पहला ब्लोगर वहां से साइकिल पर उठाकर चल दिया। आधे रास्ते पर उसे याद आया कि यह तो उसने बताया ही नहीं कि हास्य कविता लिखनी है या नहीं। फ़िर उसने अपने सिर को झटका दिया कि चलो इस बार भी हास्य कविता नहीं लिखते। अगली मीटिंग में पूछ्कर लिख लेंगे।<br />
नोट-यह हास्य व्यंग्य है और इसके पात्र कल्पित हैं अगर किसी की खुराफात से मेल हो जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इन पंक्तियों का लेखक कभी किसी दुसरे ब्लोगर से नहीं मिला है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -शांति के प्रवर्तक]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/15/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Mon, 15 Oct 2007 14:42:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[समाज के ठेकेदारों की
पड़ती जा रही थी  छ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>समाज के ठेकेदारों की<br />
पड़ती जा रही थी  छबि फीकी<br />
उन्होने तय किया<br />
फैसला नये ज़माने के साथ चलने का<br />
अपने तौर तरीकों को बदलने का<br />
पहले लोग घर के झगडों की<br />
पंचायत कराने आते थे<br />
अब अदालतों में जाने लगे थे<br />
उन्होने तरीका यह सोचकर बदला  कि अब<br />
लोग लोगों के आने का इन्तजार नहीं करेंगे<br />
ऐसे मुद्दे उछालेंगे कि लोग<br />
आपस में पहले से ज्यादा लड़ेंगे<br />
फिर प्रस्ताब रखेंगे उनके सामने<br />
आपस में समझौते करने का<br />
उनकी  योजना काम आयी<br />
उनके पास  अब रोज आते हैं<br />
अवसर शांति के प्रवर्तक बनने का<br />
-------------------------- </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता-बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/14/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 16:29:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें'समय का फेर'<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
लोग पूछ रहें हैं<br />
'वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य'<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असंतोष के सिंह तुम मांद में रहो-हास्य कविता  ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/14/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 08:41:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[असंतोष के सिंह तुम मांद में रहो
तुम्हा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>असंतोष के सिंह तुम मांद में रहो<br />
तुम्हारे लिए किये  इतने सारे इंतजाम<br />
हम सुनाते हैं तुम  सुनो<br />
हम दिखाते हैं तुम देखो<br />
पर तुम अपने होंठ सिलकर रहो<br />
जो हम करते हैं वह सहो<br />
टीवी पर तुम्हारे लिए किया हैं इंतजाम<br />
करना नहीं हैं तुमको कोई काम<br />
गीत और नृत्य देखते रहो<br />
मनोरंजन के कार्यक्रम जंग की तरह सजाये हैं<br />
हम जानते हैं देव-दानवों के द्वन्द्वों के<br />
दृश्य हमेशा तुम्हारे मन को भाये हैं<br />
घर में ही मैदान का मजा दिलाने के लिए<br />
एसएमएस का किया है इंतजाम </p>
<p>सवाल कोई नहीं उठाना<br />
हमारा उद्देश्य है कमाना<br />
जवाब देना नहीं है हमारा काम<br />
सब कुछ अच्छा है<br />
यही हम सब जगह दिखा रहे हैं<br />
खोये रहो तुम ख्वावों में<br />
भयावह सच इसलिये छिपा रहे हैं<br />
हम भी डरते हैं<br />
इसलिये नकली को असली बता रहे हैं<br />
तुम पैसा निकाल सकते हो<br />
इसलिये सब तुम्हारे लिए सजा रहे हैं<br />
जिनके पास नही है<br />
उन्हें तुमसे दूर भगा रहे हैं<br />
तुम नहीं खर्च कर सकते तो<br />
तुम्हारा भी नहीं यहाँ काम </p>
<p>बेकारी, भुखमरी, भय और भ्रष्टाचार पर<br />
चर्चा मत करो<br />
उनसे मत डरो<br />
उसे तुमसे दूर भगा रहे हैं<br />
इसलिये कहीं नहीं दिखा रहे हैं<br />
असंतोष के सिंह तुम मांद में रहो<br />
गीत और नृत्य के कार्यक्रम देखते रहो<br />
हम किये जा रहे अपना काम<br />
तुम करो अपना काम   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट देखने से अच्छा है ब्लोग पर लिखें]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/07/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sun, 07 Oct 2007 10:37:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यूँ तो हारने के हजार  बहाने हैं
पर घर  म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>यूँ तो हारने के हजार  बहाने हैं<br />
पर घर  में ही हार पर कितनी सफाई दो<br />
यहां कौन माने हैं<br />
बाहर जीत कर आये<br />
तो शेर की तरह घर आये<br />
कंगारुओं ने किया पलटवार<br />
दो दिन में तारे नजर आये<br />
नाम बडे हैं जिनके<br />
दर्शन उनके छोटे तो हो जाने हैं  </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
जीत का नशा इतनी जल्दी<br />
उतर जायेगा किसे पता<br />
स्कोर का कोई नाम लेवा नहीं था<br />
फिर अब भीड़ जुटने लगी थी<br />
लगता नही ज्यादा समय तक<br />
चलेगा यह फिर खेल<br />
अपने देश के क्रिकेट में पिटते देख कर<br />
दुखी होने से ज्यादा अच्छा तो यह है कि<br />
लोग अपने ब्लोग पर ही<br />
 शब्दों से खेलने लगें<br />
अब तो इन्टरनेट पर ब्लोग<br />
लिखने-पढने  के दिन भी  जरूर आने हैं<br />
--------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[डाक्टर और अस्पताल की छाया-हास्य कविता  ]]></title>
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<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 16:42:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक आदमी ने सुबह-सुबह
दौड़ लगाने का कार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक आदमी ने सुबह-सुबह<br />
दौड़ लगाने का कार्यक्रम बनाया<br />
और अगले दिन ही घर से बाहर आया<br />
उसने अपने घर से ही<br />
दौड़ लगाना शुरू की<br />
आसपास के लड़के बडे हैरान हुए<br />
वह भी उसके  पीछे भागे<br />
और भागने का कारण पूछा<br />
तो वह बोला<br />
'मैने कल टीवी पर सुना<br />
मोटापा बहुत खतरनाक है<br />
कई बिमारियों का बाप है<br />
आजकल अस्पताल और डाक्टरों के हाल<br />
देखकर डर लगता है<br />
जाओ इलाज कराने और<br />
लाश बनकर लौटो<br />
इसलिये मैने दौड़ने का मन बनाया'</p>
<p>लड़कों ने हैरान होकर पूछा<br />
'पर आप इस उम्र में दौडैंगे कैसे<br />
आपकी हालत देखकर हमें डर समाया'<br />
उसने जवाब दिया<br />
'जब मेरी उम्र पर आओगे तो सब समझ जाओगे<br />
लोग भगवान् का ध्यान करते हुए<br />
योग साधना करते हैं<br />
मैं यही ध्यान कर दौड़ता हूँ कि<br />
जैसे कोई मुझे डाक्टर पकड़ने आया<br />
अपनी स्पीड बढाता हूँ ताकि<br />
उसकी न पडे मुझ पर छाया</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 16:16:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें'समय का फेर'<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
लोग पूछ रहें हैं<br />
'वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य'<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -समस्याओं के जंगल में आन्दोलन ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:19:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी के पास ज्ञान का
किसी के पास विज्ञ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसी के पास ज्ञान का<br />
किसी के पास विज्ञान का<br />
किसी की पास शिक्षा का है ठेका<br />
किसी ने लिया है<br />
इंडियन आइडियल बनाने का<br />
किसी के पास है विश्व चैंपियन<br />
बनाने का ठेका<br />
पालक अपने बालकों को<br />
उनसे पास भेजकर सोचते हैं<br />
सब काम अपने आप हो जायेंगे<br />
अब वह सिरमौर ही बनकर घर आएंगे<br />
जो सफल हो जाते हैं वह<br />
गाते हैं ठेकेदारों की महिमा<br />
जो असफल हौं वह अपनी<br />
किस्मत को दोष देकर रह जाते हैं<br />
हर तरह की गारंटी वाला<br />
सब जगह चल रहा है ठेका</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
