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	<title>swami-anand &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "swami-anand"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 21:48:15 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[&quot;बाम्मन को बैल की तरह जोतवाने का हुक्म 'महात्मा' से दिला दें&quot;: छोटुभाई (५) : स्वामी आनन्द]]></title>
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<pubDate>Fri, 24 Aug 2007 11:08:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[&nbsp;
Technorati tags: छोटूभाई, स्वामी आनन्द, संस्म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">&#160;</p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9b%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88">छोटूभाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%20%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6">स्वामी आनन्द</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%a3">संस्मरण</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/Chhotubhai">Chhotubhai</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/swami%20anand">swami anand</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/memoires">memoires</a></p>
<p align="left">पिछली कड़ियाँ : <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/10/swami-anandmemoireschhotubhai/">एक</a> , <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/13/swami-anandmemoireschhotubhairail-puran/">दो</a> , <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/18/swami-anandmemoires/">तीन</a> , <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/22/chhotubhaimemoiresswami-anand/">चार</a> </p>
<p align="left">११. </p>
<h3></h3>
<p>     छोटुभाई को पाठशाला चलाने, सहकारी सोसायटी खड़ा करने या आवेदन पत्र लिखने जैसे 'रचनात्मक' कामों में कोई 'रुचि' न थी। जुल्म और अन्याय को शिकारी कुत्ते की तरह ढूँढ़ निकाल कर उनके खिलाफ लड़ना और लोगों के मन का डर निकाल कर उन्हें लड़ना सिखाना, यही उनके जीवन का प्राण बन गया था। तहसील दफ़्तर में सच्चे-झूठे फौजदारी के  केस चलते हों, छोटे-बड़े अधिकारी झूठे सबूतों के आधार पर आदिवासियों को जेल की रोटी तोड़ने पर मजबूर करते हों, किसी की खेती की जमीन गलत सलत लिखा - पढ़ी करा के किसी सवर्ण या व्यापारी ठेकेदार ने हडप ली हो, अधिकारी जुल्म करने वालों का साथ देते हों - वे ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाते। उनके तथा उनके शागिर्दों के किए कुकर्मों का इतिहास भूगोल जमीन-आसमान एक कर इकठ्ठा करते। संबंधित तथा अन्य अधिकारियों से मिलते। सबूतों का असला जेब में रख कर उससे बहुत विनम्रता के साथ बात करते। उसकी नीयत<br />
भांप लेते। अगर वह सीधा न लगा तो आंखें दिखा कर जेब से एक या दो 'कान<br />
खजूरे' निकाल कर दिखाते। और अगला पाहिमाम, त्राहिमाम पुकारने लगता। किए<br />
कर्म के लिए पछतावा व्यक्त करवा कर या फिर जिसको अन्याय हुआ हो उसे<br />
समुचित मुआवजा दिला कर ही छोड़ते। बल्कि बिना झूठ बोले बचने का रास्ता भी<br />
दिखा देते।एक दफ़ा एक आदिवासी की हत्या के केस की जांच के सिलसिले में कल्याण के किसी पुलिस अधिकारी के पास एक महिला को भेजा। चिठ्ठी लिखी:<br />
"इस महिला का बयान (अमुक) हत्या की जांच में महत्व की कड़ी साबित हो सकती<br />
है । उसकी बात सुनें तथा आवश्यक जांच करें।"<br />
    महिला को कल्याण जाने के लिए गाड़ी भाड़ा के आठ आना भी अपनी जेब से दिए।कुछ समय बाद ठाणा की सेशन कोर्ट में केस की सुनवाई हुई तो छोटुभाई को साक्षी के रूप में बुलाया गया।<br />
    जज साहब ने स्वयं छोटुभाई से जिरह शुरू कर दी। कोर्ट में, लॉबी में और<br />
आसपास की तमाम अदालतों में हल्ला हो गया।<br />
फालतू बैठे वकील सुनने के लिए दौड़ पड़े।<br />
"वह पागल जज कल्याण वाले काथोड़ी केस में छोटुभाई को क्रॉस कर रहा है।<br />
चलो, चलो देखने। यहां क्यों बैठे हो? दोनों ही सिरफिरे हैं। जरा देखें तो<br />
सही , कौन किसको मात देता है।"<br />
गांव और बाजार से भी लोग दौड़े आए। कोर्टरूम ठसाठस भर गया।<br />
छोटुभाई ने महिला को पैसे दे कर पोलिस थाने भेजा और तिस पर अधिकारी के<br />
नाम चिठ्ठी भी लिखी इस पर जज साहब ने खिंचाई शुरू की:<br />
"आपको केस की जांच में ऐसी क्या रुची है कि आपने अपनी जेब से उस औरत को<br />
कल्याण भेजा?"<br />
"अवश्य, मैंने उसे पैसे दे कर भेजा। वर्ना वह बेचारी कैसे जाती? उसकी<br />
झोंपड़ी में मैं गया था तब उसने कांजी बनाई थी मगर वह  हंडिया टूटी होने की वजह<br />
से जमीन पर बह गई थी। वह हंडिया का तलवा चाट रही थी और कुत्ता जमीन पर<br />
पड़ी कांजी चाट रहा था। वह कल्याण कैसे जा पाती? मुझे तो उसे उस दिन की<br />
मजदूरी, जो वह नहीं कर पाई, वह भी उसे देनी चाहिए थी। लेकिन मेरी जेब में<br />
सिर्फ आठ आने थे। उतने दिए। टिकट के किराए भर के। शाम को थकी हारी घर आ<br />
कर वह बेचारी भूखी सोई होगी। और दुसरे दिन शाम को दिनभर की मजदूरी करने<br />
के बाद ही उसने कांजी खाई होगी।"<br />
"लेकिन आप इस प्रकार जांच में रुचि कैसे ले सकते हैं? क्या इससे शंका<br />
नहीं होती कि आपका इस जांच में कुछ निहित स्वार्थ था?"<br />
"कोई निहित स्वार्थ नहीं, बड़ा ही खुला स्वार्थ था। एक दम सवेरे के उजाले<br />
की तरह साफ़। कोर्ट के इस खंभे की तरह उजला - इन्साफ़ दिलाने का स्वार्थ।<br />
क्या यह जुर्म है? ends of justice के लिए मदद करना एक नागरिक का फर्ज है<br />
ऐसा कानून में नहीं है क्या?"<br />
"लेकिन आपने तो पुलिस अधिकारी पर चिठ्ठी भी लिखी ! आप अपने आप को<br />
हिन्दुस्तान के गवर्नर जनरल समझते हो क्या?"<br />
"आप गलत समझ रहे हैं। यदि मैं अपने आप को ऐसा समझता तो सीधा हुक्म देता:<br />
"Hang him." लेकिन मैंने तो लिखा: "इसकी बात सुनियेगा और please<br />
investigate."<br />
पौन घंटे तक बहस चली। डेवीस जज झक्की व्यक्ति माना जाता था। लेकिन उसका<br />
पाला पड़ा छोटुभाई से। जब बड़े से बड़े अधिकारी उनको काबू मे नहीं कर सके<br />
तो उस बेचारे सेशन जज की क्या बिसात? उससे मुंह में उंगली डलवाई। अंत में उसने<br />
कहा:<br />
Mr. Desai, I am gratified. I am more than satisfied. You are a<br />
remarkable man. I wish there were more social workers of your type in<br />
this country.<br />
आश्रम में आ कर मुझसे कुछ नहीं कहा। अगले कई दिनों तक गांव में जहां जाओ<br />
वहीं इसी की चर्चा। मैंने घर आकर पूछा तो बोले:<br />
"मुझे कहने का मन तो था। लेकिन थोडा डर लगा। तुम contempt of court जैसे<br />
मुद्दे निकाल कर ख्वामखाह मुझे नीरस बना देते। मैंने सोचा एक दो दिन के<br />
बाद जब मामला थोडा ठंडा पड जाए तो धीरे से सारी बात कहूंगा। लेकिन तुम तो<br />
गांव जा कर सारी बात जान आए। लोग बात करते होंगे।"<br />
फिर सिलसिलेवार सारी बात बताई ।</p>
<p align="left">१२<br />
    बाबा मंगल की ढलान के जंगल में रहने वाला एक मेहनतकश काथोड़ी परिवार बरसों<br />
से अंबरनाथ के पास घास-फूस की झोंपडी बना कर रहता था । पहाड़ी की ढलान पर<br />
पाली बना कर खेती करता था। जमीन और झोंपड़ी उसके नाम थे । पड़ोस में एक<br />
दक्कनी ब्राह्मण भैंस पाल कर दूध का व्यापार करता था। दोपहर और मध्य<br />
रात्रि की लोकल से उसके दूध के कनस्तर मुम्बई भेजे जाते। उसकी सब भैंसें<br />
आस-पास के पहाड़ी मैदानों में तथा ढलान पर दिन रात चरा करतीं। उसकी नजर भाऊ<br />
काथोड़ी की झोंपडी वाले मैदान पर अटकी थी । उसने कल्याण के सवर्ण ब्राह्मण<br />
से मिल कर भाऊ काथोड़ी पर झूठा मुकदमा दायर करवाया और झोंपड़ी वाली जमीन<br />
उसकी नहीं है ऐसी रपट बनवा कर उसकी झोंपड़ी सरकार द्वारा उखड़वा दी ।<br />
बेचारे के बाल-बच्चे पेड़ की शरण में आ गए ।<br />
छोटुभाई कहीं मुंबरा कौसा पनवेल की तरफ़ दौरे पर थे। रास्ते में जंगल के<br />
काम पर जाते वारली, काथोड़ी, मजदूर, जो मिल जाए उनसे हर दम बात करते । ऐसे<br />
किसी व्यक्ति से बात सुनी कि अंबरनाथ के किसी काथोड़ी परिवार पर जुल्म हुआ है और<br />
पुलिस ने उसकी झोंपडी उखाड़ फेंकी है ।<br />
    सुनते ही वे रास्ते से लौट पड़े । कौसा में प्यारेअली सेठ के बगीचे से कोई वाहन ले कर ट्रेन पकड़ी और सीधे अंबरनाथ पहुंच गए । वहां केमिकल फैक्टरी वाले भाऊसाहब हम सब के जिगरी दोस्त थे। उनसे कुशल मंगल की बात कर तुरंत पहुंचे भाऊ काथोड़ी की दरवाजे पर। बेचारे की बिवी और बच्चे पेड़ के तले रो रहे थे । टूटी हूई झोंपडी का अवशेष एक ढेर के रूप में कुछ दूरी पर पड़ा हुआ इस आदिवासी परिवार पर बीते सितम की शिकायत कर रहा था। पुलिसवाले तो तोड़-फो्ड़ कर अगले दिन ही चले गए थे। भाऊ की शिकायत तथा भाऊसाहब का बयान लेकर  सीधे कल्याण पहुंचे और कागजी कार्यवाही पूरी कर ४८ घंटे के बाद<br />
आश्रम पहुंचे।<br />
    महिनों तक भाऊ काथोड़ी और कल्याण के चक्कर लगाए । एक कोठरी में बत्तीस<br />
कोठरी की तरह कल्याण के कई छोटे बडे अधिकारियों की 'कुंडलियां' सूंघ-सूंघ<br />
कर खोज निकालीं। कई लोगों को छोटुभाई जुलाब की गोली की तरह लगे। अंत में<br />
भाऊ काथोड़ी की जमीन, उस पर सरकार के खजाने में जमा किया गया टैक्स, ब्राह्मण<br />
अधिकारियों की उस दूध के ब्राह्मण व्यापारी के साथ मिली- भगत और उसकी<br />
गैरकानूनी मदद, उन सब की मिलकर उस गरीब श्रमजीवी आदिवासी परिवार के हक की<br />
जमीन छीन लेने की साजिश --एक-एक बात कागज में लिख कर जग जाहिर कर दी,<br />
सबको नाकों चने चबवाए। भाऊ काथोड़ी को जमीन वापस दिलवाई । उसकी झोंपड़ी उस<br />
व्यापारी के खर्च से बनवाई और ईमानदार तथा मेहनतकश काथोड़ी को किसान के<br />
रूप में प्रोत्साहित करने के लिए कुछ सरकारी मदद भी दिलवाई ।<br />
    यह भाऊ काथोड़ी तो बहुत जोरेदार आदमी निकला। सत्याग्रह आन्दोलनों के दौरान<br />
जेल भी गया । एक बार उसके विशेष आग्रह पर तथा भाऊसाहब की इच्छा को देखते<br />
हुए हमने अंबरनाथ में उसके पड़ोस में आदिवासियों का सम्मेलन भी रखा। उसमें<br />
खेरसाहब, वांदरेकर, वर्तक और ठाणा जिला के कई राजनैतिक एवं रचनात्मक<br />
कार्यकर्ताओं के सामने अपने आदिवासी लोगों को संबोधित कर उसने भाषण भी<br />
किया:<br />
<strong>"माझ्या भावांनो ! आ आपले बाळासाहेब खेर धरमराजे हाय। मा'त्मा गांधीना<br />
चेला ने आपल्या सोटुभायना मुत्तुर हाय। तुरुंगात जावुन आले हाय। मी देखील<br />
तुरुंगात जावुन आलो, हे तुमांस सांगतो। जेल-तुरुंगाला भिण्याचें कांय<br />
नांय। राहायला मोठे राजवाडे - पक्या दगडाचे। सकाळ संध्याकाळ डागतर येवून<br />
विचारपूस करी जाय:<br />
"कसें काय? बरें हाय ना?"<br />
"म्हनून मनतो, जेलमां बीवा जेवुं काय नांय। हे समधे मोठे लोक तुमांस<br />
समजून द्यायला येथें आले हाय। पण तीमां समजून देयाचें काय हाय? तुरंगा<br />
मंधी तो निवळ सायबी रावसायबी ज हाय। खायला प्यायला पूरेपूर अन काम अगदी<br />
हळ्वुं फूल।<br />
"आटलुं तमने समद्यांनां हमजावून आणि या सर्व मोठ्या लोकांनां रामराम करून<br />
मी खाली बसतो।"</strong></p>
<p><strong>    [मेरे भाइयों ! ये अपने बाळासाहब खेर धर्मराज हैं। महात्मा गांधी के चेले<br />
और अपने सोटुभाई के मित्र। जेल जा कर आए हैं। मैं भी जेल देख कर आया हूं,<br />
यह तुम्हें बता रहा हूँ । मैं, तुम्हें जो खुद देखा वह बता रहा हूं। जेल-कारावास<br />
से डरने की कोई बात नहीं है। रहने के लिए बड़ा महल - पक्की ईंटो का। सुबह<br />
शाम डाक्टर आ कर हाल चाल पूछते हैं:<br />
"कैसे हो? सब ठीक है न?"<br />
"इसलिए कहता हूं, जेल से डरने जैसा कुछ नहीं है। ये सब बड़े लोग यहां<br />
तुम्हें समझाने आए हैं। इसमें समझने जैसी कोई बात नहीं है। जेल में साहब, रायसाहब की तरह जीना है । खाना-पीना पूरा और काम एक दम फूल की तरह।<br />
"यह बात आप सबको समझाने और यहां आए सभी बड़े लोगों को राम राम कर मैं अब बैठता हूं।" ]</strong></p>
<p align="left"><strong>१३<br />
</strong>    उसका मामला निपटने के दो-तीन बाद वह ठाणा आश्रम आया था। "सोटुभाई हैं<br />
क्या?" पूछता। मेरे सामने आ कर बैठा । मैंने पूछा, "मुझसे कुछ काम है<br />
क्या?" वह चुप रहा। बैठा रहा । जब मैं बार-बार उसे पूछता तो कहता:<br />
"सोटुभाई ने बताया नहीं?"<br />
बात कुछ ऐसी थी कि छोटुभाई को मौका पा कर उसने एक-दो बार पूछा था:<br />
"वो बाम्मन शाम को मुंबई से वापस आता है तो मेरे खेत की सीमा से हो कर<br />
गुजरता है। उसे देखते ही मेरे सारे तन बदन में आग लग जाती है । कलेजे<br />
में जैसे कोई काटने लगता है। और मेरे भीतर न जाने कुछ कुछ होने लगता है।<br />
मैं आपसे क्या कहूं, लेकिन मुझे कुछ ऐसा मन करता है कि उसकी गर्दन पकड़ कर<br />
उसे खेत में घसीट कर ले जाऊं और मेरी बैल की जो्ड़ी में से एक बैल को छोड़<br />
कर उसकी जगह इसे हल में जोत दूं और खेत के पांच छह चक्कर लगवाऊंड। बस इतना<br />
भर कर दूं तो पता नहीं क्यों मेरे कलेजे को शांति पहुंचे। सिर्फ़ दो, बस<br />
दो ही चक्कर,  इस छोर से दूसरे छोर तक जोतूं। ज्यादा नहीं !"<br />
छोटुभाई उसे बहुत धैर्यपूर्वक समझाते:<br />
"पगले! हम ऐसा नहीं कर सकते। हम महात्मा गांधी के लोग कहे जाते हैं।<br />
महात्मा गांधी का हुक्म है कि हम सिर काटने वाले को भी नहीं छू सकते।"<br />
"लेकिन हमें कहां उसका सिर काटना है? यह तो इतना करने की आप ईजाजत दें तो<br />
मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचे । महात्मा गांधी का हुक्म एक दम सच्चा, सोने की<br />
मुहर जैसा। इस बात का कोई इनकार नहीं। हम सब महात्मा गांधी के लोग हैं।<br />
इसका भी मुझे कहां इनकार है? अब तो मैं आप में से एक हो गया, आप की हां<br />
मेरी हां और आपकी ना मेरी ना। इसीलिए तो मैं रोज यहां आपसे पूछने आता हूं<br />
- कि बस इतनी सी ईजाजत दे दो। आपके हुक्म के बगैर मैं पत्ते को भी नहीं<br />
छूऊंगा। यह बात एक दम पक्की, इस में कोई छूटछाट नहीं।"<br />
अंत में छोटुभाई उसे अपना फैसला सुनाते: "ठाणा आश्रम में आ कर उस स्वामी<br />
दादा का हुक्म ले कर आओ। वे सब बड़े आदमी हैं। वे महात्मा गांधी को रोज<br />
चिठ्ठी लिखते हैं और महात्मा गांधी उन्हें रोज चिठ्ठी लिखते हैं, हुक्म<br />
भेजते हैं। वो स्वामी दादा अगर हुक्म दें तो मैं ना नहीं करूंगा। अब कोई<br />
शिकायत? तो फिर आश्रम में आना जब समय मिले तब । "<br />
    इस लिए भाऊ काथोड़ी आश्रम आने-जाने लगा ।  मेरे घूटने को दोनों हाथ से छू कर<br />
राम राम बोलता, सामने बैठे, मैं जहां काम करता उस ऑफ़िस वाले कमरे में मेरी<br />
गद्दी के सामने घंटो बैठा रहता। मैं एक से ज्यादा बार उससे पूछता :<br />
"किस काम से आए? छोटुभाई से काम है या मुझसे ?" कुछ न बोले। घंटो बीत जाँए।मैं उसे बार-बार घुमाफिरा कर पूछूं तो इतना ही कहे:<br />
"सोटुभाई ने आपसे बात नहीं की?"<br />
अंत में एक दिन मेरे बहुत आग्रह के बाद उसने मुझे बात बताई। छोटुभाई ने<br />
बताई थी वही, लगभग उन्हीं शब्दों में।<br />
अंत में बोला:<br />
"महात्मा गांधी का रास्ता बिलकुल सच्चा। उन्हीं की कृपा से सोटुभाई और आप<br />
जैसे बड़े लोग हमारी इतनी मदद कर रहे हो। और उन्हीं की कृपा से मेरी जमीन<br />
और झोंपडी मुझे सही सलामत वापस मिली। उन्हीं के रास्ते सारी दुनिया को<br />
चलना चाहिए। मुझे भी उस बाम्मन के साथ कोई बैर नहीं रहा कि मैं उसका सिर<br />
काटने का विचार मेरे मन में लाऊं। और अब तो महात्मा गांधी का प्याला<br />
छोटुभाई ने पिला दिया और मैंने पी भी लिया।<br />
"इसलिए महात्मा गांधी का मार्ग तो कभी छोड़ना नहीं, नहीं सो नहीं ही।<br />
लेकिन यह तो मेरे जलते हुए कलेजे को कुछ ठंडक पहुंचे इस लिए पूछ रहा हूं ।<br />
उसका सिर काटने का विचार तो मेरे पेट के किसी कोने में भी नहीं है ऐसा<br />
महात्मा गांधी को बेशक लिख दें। तो फिर इतना करने की ईजाजत मुझे जरूर दे<br />
देंगे.।वे महात्मा पुरुष हैं, वे किसी की बुराई नहीं चाहते. इसलिए इतना<br />
हुक्म मंगा लीजिए।"<br />
"कैसा हुक्म?"<br />
"उस बाम्मन को गले से पकड़ कर हल में जोत कर दो चक्कर खेत के लगवाने काड।<br />
सिर्फ़ दो चक्कर, ज्यादा नहीं।"<br />
"अरे पागल...."<br />
"लेकिन आप जरा पूछ कर तो देखें। इसमें अपना क्या जाता है? नहीं देना हो<br />
तो नहीं देंगे। उनके ऊपर - महात्मा पुरुष पर - अपना जोर थोड़े ही चलने<br />
वाला है ? लेकिन यह तो मेरा मन कह रहा है कि आप अगर पूछ लें तो इतना हुक्म<br />
तो वे जरूर दे देंगे। बस. मेरे कलेजे को फिर तो ठंड ही ठंड।"<br />
उसे समझाने में छोटुभाई, मुझे और भाऊसाहब को कई दिन लगे.
</p>
<p align="left"><strong>( जारी )</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[छोटुभाई : आदिवासी सेवा-९ : स्वामी आनन्द]]></title>
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<pubDate>Wed, 22 Aug 2007 12:01:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: छोटुभाई, स्वामी आनन्द, संस्मरण, m]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9b%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88">छोटुभाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%20%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6">स्वामी आनन्द</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%a3">संस्मरण</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/memoires">memoires</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/swami%20anand">swami anand</a></p>
<p align="left">    ठाणा जिला यानि दमणगंगा से वसई की खाड़ी तक , दक्षिण गुजरात के घुटने<br />
से ले कर पैर तक का अरब सागर और सह्याद्री की दीवार के बीच का इलाका।<br />
पहाड़, समुद्र , खाड़ी और घने जंगल से भरा हुआ। चालीस प्रतिशत जनसंख्या वारली<br />
काथोडी एवं अन्य आदिवासी जातियों की। इन आदिवासियों के बीच ठाणा के गांधी<br />
आश्रम के लिए छोटुभाई ने काम शुरू किया।<br />
    आश्रम की स्थापना छोटुभाई की हिम्मत की ताकत के बूते मैंने ही की थी। पहाड़ी इलाका।आदिवासी जंगल में से लकड़ियां तोड कर कोयला बनाते। ठेकेदारों के जुल्म और सितम की कोई सीमा नहीं थी। मुंबई शहर के २०-२५-३० मील की दूरी पर ऐसे लोग बसते थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेल गाड़ी से सफर नहीं किया था।  भीतरी  गांवों में तो ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेलगाड़ी देखी तक नहीं थी ।<br />
९<br />
    इन आदिम जातियों में काथोडी जाति के लोगों की अवस्था सब से आदिम। १००-१५०<br />
शब्दों से बनी भाषा। खेती करना नहीं जानते थे । एक जगह टिक कर न रहते। जंगलों<br />
में शिकारी पशु की तरह भोजन की तलाश में घूमंतू जीवन गुजारने वाले। सांप, छछुंदर, तिलचट्टा, गिरगिट, कुछ भी दिखा तो शिकारी जानवर की भांति झपट कर पकड़ लेते।<br />
    ऐसी काथोड़ी जाति के लोगों ने पिछले १०० बरसों में जंगल की लकड़ी से  कोयला<br />
बनाना सीख लिया । इस कला में वे इतने माहिर हो गए कि कोई अन्य उनका<br />
मुकाबला न कर सकता था । लेकिन यही हूनर अमरीका के हब्शियों की तरह उनके गले<br />
का फंदा और पैरों की बेड़ियां बन गया। काथोडी जंगल के ठेकेदारों के गुलाम बन गए। ठेकेदार के मुलाजिम उन्हें उनकी बीवी-बच्चों के साथ, गाय-बकरी की तरह जंगल के एक छोर से दूसरे, जहां कहीं भी कोयला बनाने का काम चलता हो, हांक कर ले जाते। एक बोरी कोयला बनाने की दो आना मजदूरी दे्ते। बोरी भी ३६ इंच की जगह ५४ इंच की सिलते और नाप भी उसी की । ठेकेदार आपस में इन काथोड़ियों की  १०-१२ रुपए प्रति व्यक्ति खरीद फरोख्त भी करते। दो आना मजदूरी के बदले, चावल मिल से राई के आकार के चावल के टुकड़े, जिसमें प्रचुर मिट्टी और कंकड़ मिला होता, जिसे सिर्फ़ मुर्गी तथा बतख को दाने के रूप में खिलाया जाता है- दो आना पाव की दर से देते। इसी की राब बना कर काथोड़ी अपना पेट भरते। ठेकेदार ऐसा चूरा चावल ट्रकों में भर कर चावल मिलों से लाते और उसे जंगल के अपने गोदामों में रखते।<br />
    कोयला बनाने के काम में न लगे काथोडी जंगल में लकडी काटने का काम करते।<br />
वारली जाति के खेतिहर आदिवासियों के पास बैल गाड़ियां जिससे वे जलावन की<br />
लकड़ी तथा कोयला स्टेशन या बंदरगाह पहुंचाते ।<br />
    जब से अंग्रेजी हुकूमत के नीचे मुंबई फलने-फूलने लगा तब से ठाणा जिला के सवर्ण, कोंकणी-मुसलमान लोगों में से पढे-लिखे तथा अनपढ़ मगर व्यापार बुद्धि से तेज ऐसे लोग जंगल की लकड़ी, कोयला आदि के व्यापार में लग गए तथा जंगल में रहने वाले आदिवासियों को गुलाम बना कर उनका खून चूसकर तगड़े होते गए।<br />
    एक ही उदाहरण देता हूं। लगभग पचास साल पहले, एक व्यक्ति जो एक आना दिहाड़ी<br />
पर मजदूर, दो आना पर हरवाहा और पांच आना रोज पर बैलगाड़ी भाड़े पर चलाने<br />
वाला ,वन प्रदेश में रहने वाला गंवार जब बड़ा धनपशु बन कर मरा तब वह अपने पीछे सैंकड़ों वर्ग मील के जंगल, ३,००० एकड़ धान की खेती, इमारत की लकड़ी तथा कोयला एवं नमक की खेती के धंधे में लगे तीन हजार वारली, काथोड़ी गुलाम और रोकडा मिला कर ५० लाख से भी ज्यादा कीमत की संपत्ति छोड कर गया । लखपति बन कर घूमने लगा तब तक तो वह हस्ताक्षर की जगह अंगूठे का निशान लगाया करता था।<br />
     अब तो हालात बिलकुल बदल गए हैं। लेकिन चालीस साल पहले जंगल के भीतरी भाग<br />
में रहने वाले काथोडियों के हालात 'अंकल टॉम्स कैबिन' में वर्णित अमरीका के हब्शियों के जैसे थे। पेड से बांध कर मरते दम तक कोड़े मारना और कोयले की भट्ठी में काथोड़ियों को जिंदा जला देने के किस्से भी हमने सुने थे।
</p>
<p align="left">&#160;</p>
<p>१०<br />
    यह काम छोटुभाई ने हाथ में लिया और मानो उन्हें पसंदीदा काम मिल गया। तीन महिने पैदल घूम घूम कर जंगल के एक-एक गांव के हाल जान लिए। आकर बोले:<br />
"स्वामी, आज से हम बन गए मिशनरी।"<br />
    यह मिशन उन्होंने पूरे १० साल चलाया। जब कभी किसी वारली काथोड़ी पर जुल्म<br />
की बात सुनी कि जहां भी खड़े हों वहां से चल देते। जो सामने मिले उसे कहते ,"थोडा आश्रम में जा कर बोल देना या कहलवा देना कि छोटुभाई जंगल की ओर तफ़्तीश करने गए हैं।"<br />
    फिर तो सुबह, शाम, रात, दिन, इक्का, बैलगाडी या पैदल कुछ भी हो, किसी बात<br />
की परवाह न करना। न खाने का ठिकाना, न पीने का। नहाने-धोने, ओढ़ने- बिछाने<br />
का साथ में लेने का तो सवाल ही नहीं खड़ा होता। ठाणा जिला में १२५ इंच से ज्यादा पानी बरसता और गर्मियों में तापमान ११० डिग्री। रात को भी पहाड़ गर्म हवा ऊगलते। ऐसे मौसम में वे दिन रात घूमते। जहां कहीं भी कुछ खाने-पीने को मिल जाता वहां रेगिस्तान के ऊंट की तरह तीन-चार दिन का खाना एक साथ पेट के थैले में भर लेते। नहीं मिला तो भूखे पेट ही रह जाते। भूखे-प्यासे घूमते रहते दो-दो तीन-तीन रोज, कभी कभी तो चार-चार दिनो के बाद बिना नहाए-धोए, बिना हजामत किए, धूल धक्कड से मैले कुचेले कपडों में पहचाने भी न जा सकें ऐसे लैला -मजनूं के भेस में घर लौटते। हम कहते:<br />
"यह कैसे हाल बना कर आए हैं? जरा आईने के सामने खड़े हो कर देखिए तो<br />
सही!" तो कहते:<br />
"अधूरा छोड़ कर कैसे आता? आया हूं सब ठीक करकेड। अब भले ही वे चक्कर लगाते<br />
रहें वकील, अधिकारी और मुंबई के सचिवालय तक का। छोटुभाई का खूंटा गाड़ कर<br />
आया हूं। अब भले ही उसे हिलाते रहे बच्चू, छह-छह महिनों तक।"<br />
एक-एक मामले की छोटी-छोटी बातों की जांच करते। लिफाफे से खत का मजमून<br />
भांप लें। स्टेटमेन्ट लें, एफिडेविट करवाएं, कोई शहर का पढ़ा-लिखा पुलिस<br />
अधिकारी, मेजिस्ट्रेट मिल गया तो उसका पीछा न  छोडें:<br />
"चलो, मिस्टर, इतना स्टेटमेन्ट लेना है, एटेस्टेशन करना है, एफिडेविट करनी है।"<br />
वे ना नुकुर करें तो आंख लाल कर कहें:<br />
"बेटा चढा दूंगा। गलत फहमी मत पालना। यह है आदिवासियों का सोटूकाका। ठीक<br />
से पहचान लो।"<br />
वे थरथर कांपने लगते और गाय की तरह सीधे बन जाते।<br />
बड़े से बड़े सरकारी अधिकारी उनसे डरते। उनके नाम मात्र से भयभीत रहते।<br />
सारे वन इलाके में उनके नाम का डंका बजता।<br />
    १९३७ के बाद राज्य सरकारों की स्थापना हुई। खेर साहब हमारे पुराने साथी<br />
रह चुके थे। अनेक सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए तथा ठाणा आश्रम के भी वे एक ट्रस्टी थे। ठक्कर बापा के साथ मिल कर उन्होंने इस इलाके में 'आदिवासी सेवा मंडल' की स्थापना की इससे पहले छोटुभाई ही जंगलवासियों के एक मात्र त्राता थे। उन्होंने दो ही वर्षों में यहां के ठेकेदारों, जमीनदारों तथा उनके चमचे सरकारी अधिकारियों के छक्के छुडा दिए थे।<br />
    दो-तीन साल बाद सरकार बद्ली तो काम थोडा आसान हो गया। मुख्य मंत्री खेर<br />
साहब आदिवासियों के हमदर्द थे। उनके चारों और कार्यकर्ताओं की जमघट लग गई।<br />
जंगल के जुल्म कम हुए। आदिवासियों को भी मजदूरी के रुपए मिलने लगे।<br />
<strong>(जारी)</strong></p>
<p><strong>पिछले संस्मरण : <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/10/swami-anandmemoireschhotubhai/">एक</a> , <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/13/swami-anandmemoireschhotubhairail-puran/">दो</a> , <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/18/swami-anandmemoires/">तीन</a></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेलवे पुराण - 3 , स्वामी आनन्द]]></title>
<link>http://shaishav.wordpress.com/2007/08/18/swami-anandmemoires/</link>
<pubDate>Sat, 18 Aug 2007 07:19:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://shaishav.wordpress.com/2007/08/18/swami-anandmemoires/</guid>
<description><![CDATA[ पिछले भाग ; एक तथा दो 
६
    इसी इज्जत-आद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"> पिछले भाग ; <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/10/swami-anandmemoireschhotubhai/">एक</a> तथा <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/13/swami-anandmemoireschhotubhairail-puran/">दो </a></p>
<p align="left">६<br />
    इसी इज्जत-आदर के कारण और बरसों की उनकी लगन से हार कर अन्ततः रेलवे के सत्ताधीशों ने उनके लिए कोई स्वतंत्र काम खड़ा करने का सोचा जहां रोज चल कर ऊपरी अधिकारियों को उनसे टकराना न पड़े और फिर भी रेल विभाग को उनकी बुद्धिमत्ता का पूरा लाभ भी  मिल सके &#124; इस प्रकार तार-टिकट मास्टरों में नए रंगरूटों को मुंबई शहर की बुराइयों से बचाने के लिए, और उन्हें ठोक पीट कर तैयार करने के लिए, बोर्डिंग-लोजिंग की सुविधावाली एक रेलवे इन्स्टीट्यूट बेलासिस रोड, भायखला के पास शुरु कर छोटुभाई को उसका जिम्मा<br />
सौंप दिया &#124;
</p>
<p align="left">    वहां भी उन्होंने अधिकारियों को परेशान करना हांलांकि चालू ही रखा फिर भी काम इतना बेहतरीन किया कि सत्ताधीशों ने उनकी मुक्त कंठ से प्रसंशा की&#124; नए भर्ती हुए टिकट मास्टरों को इस प्रकार शिक्षित और तैयार किया कि समूची लाइन में वे 'छोटुभाई महात्मा' के रूप में पहचाने जाने लगे&#124; अगले कई दशक तक मुंबई से विरमगाम, वढवाण और ताप्ती लाइन पर बड़ी - बड़ी मूंछों वाले जवां मर्दों को अचानक छोटुभाई के झुक कर पैर छूते हुए देखा जा सकता था&#124; वे कहते: "इन्होंने ही हमें बनाया&#124; इन्हीं के थप्पड खा कर हमने कुछ सीखा, इसी लिए आज आदमियों की जमात में रह कर मेहनत की कमाई खा रहे हैं &#124; वर्ना हम बरबाद हो गए होते&#124;"</p>
<p align="left">    वे हरदम कहते: "झूठे, अनैतिक, या फिर वो जिसे घूस लेना है, वे दूसरे से दब कर रहते हैं&#124; उतना ध्यान रखें तो फिर एक परमेश्वर को छोड़ कर किसी सी से भी डर ने या दब कर रहने की जरूरत नहीं है&#124; धर्मराज ने सिर्फ एक बार ही सत्य में तनिक मात्र झूठ की मिलावट की थी&#124; लेकिन उतने से ही उनका रथ, जो धरती से एक बित्ता ऊंचा चलता था, वह जमीन पर आ गया था&#124; इसी प्रकार मनुष्य को भी खिसियाना पड सकता है&#124;"</p>
<p align="left">    लेकिन विदेशी हुकूमत में छोटुभाई जैसे स्वाभिमानी स्वतंत्र व्यक्ति का सदा के लिए टिक पाना असंभव था&#124; अंत में सत्ताधिकारियों ने उन से हार कर उन्हें 'घमंडी, तुनक मिजाजी, उद्धत हैं' जैसे अनेक कारण दिखा कर रेलवे की नौकरी से निकाला&#124;</p>
<p align="left">७</p>
<p align="left">    बरख्वास्तगी का हुक्म मिलने के दूसरे ही दिन से छोटुभाई ने तत्कालीन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष स्व. वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में स्थापित स्व. मणिलाल कोठारी द्वारा स्थापित बी.बी.सी.आई. रेलवे कर्मचारी यूनियन में उनके सह सचिव के रूप में काम करना शुरू कर दिया और कासगंज, मथुरा, आगरा, जयपुर, रेवाडी तक की लाइन पर इन्जन ड्राइवरों को संगठित करने का काम हाथ में ले लिया&#124;</p>
<p align="left">    इस प्रकार बी.बी. रेल्वे के ऊपरी अधिकारियों के मत्थे छोटुभाई शनिच्चर की तरह मंडराते रहे&#124; बरख्वास्तगी के खिलाफ भी उन्होंने लिखा-पढ़ी द्वारा लडाई जारी रखी&#124; करीब डेढ़ साल की लड़ाई के अंत में उन्होंने सत्ताधीशों द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज करवाया, बरख्वास्तगी के हुक्म रद्द करवाए और ससम्मान नौकरी पर उसी पद पर पुन:स्थापित करने के हुक्म तामील करवाए&#124;</p>
<p align="left">लेकिन नौकरी पर हाजिर न होते हुए उन्होंने लिखा:</p>
<p align="left">"मैं तो आपने जो मुझ पर अन्याय किया था उसकी मुख़ालफ़त की खातिर ही लड रहा था&#124; मुझे तो अब सार्वजनिक कार्य ही करना है&#124;"</p>
<p align="left">    यह कह कर उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया तथा यूनियन के काम में लगे रहे&#124;</p>
<p align="left">'बंदर कितना ही बूढा़ क्यों न हो जाए वह उछलना नहीं भूलता' इस कथनी को सच साबित करते हुए उन्होंने काफी समय तक रेल अधिकारियों की काली करतूतों के खिलाफ अपनी मुहीम जारी रखी&#124; एक किस्से में तो उन्होंने बी.बी. रेल्वे के एक हजारों रुपए की तन्ख्वाह पाने वाले बहुत बड़े अधिकारी का नाम घूस लेने के आरोप के साथ सार्वजनिक पत्रिका में छाप कर उसे मानहानी का मुकदमा<br />
चलाने के लिए ललकारा&#124; मुंबई पुलिस के पास उसे गिरफ़्तार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचा&#124; आखिर में मुंबई के गोरे पुलिस कमिश्नर ने उसे सुबह से विहार-पवई की ओर शिकार करने भेज कर, शाम को विकरोली से ट्रोम्बे, और वहां से नाव पर बैठा कर समुद्र में खड़े जहाज पर चढ़ा कर विलायत के लिए रवाना कर दिया&#124;<br />
८</p>
<p align="left">    गांधीजी की रहनुमाई में सत्याग्रह की राजनैतिक लड़ाई तो एक दशक से ऊपर से चली आ रही थी&#124; इसलिए कुछ साल बाद रेलवे यूनियन का काम धीरे धीरे ढीला होता गया&#124; १९३०-३१-३३ तक उन्होंने इन आंदोलनों में कमोबेश हिस्सा लिया जुड़े और जब प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़े तो सत्याग्रहियों तथा उनके परिवार जनों की भरपूर मदद की&#124; इन सत्याग्रह आंदोलनों के बाद १९३४ के प्रारंभ से ठाणा जिला के जंगल में बसे आदिवासियों की सेवा का काम मेरे साथ रह कर शुरू<br />
किया &#124; बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि उनके उत्साह, मार्गदर्शन तथा हिम्मत की ताकत के कारण मैंने उनके साथ काम किया&#124;
</p>
<p align="left">    १९३४ के प्रारंभ से वे दीन, दु:खी आदिवासियों की सेवा में तन, मन और वाणी से निष्ठापूर्वक, बिना किसी प्रशंसा या मान्यता की कामना लिए सिर्फ स्वप्रेरित मिशनरी भावना व लगन से जो लगे तो अंत तक लगे ही रहे&#124; ठाणा - आश्रम में उनके कार्यकाल के साल भी उतने ही उज्ज्वल, रमणीय एवं मनोहारी थे &#124;</p>
<p align="left">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेल - पुराण (२) : स्वामी आनन्द]]></title>
<link>http://shaishav.wordpress.com/2007/08/13/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a5%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Mon, 13 Aug 2007 12:02:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: swami anand, memoires, chhotubhai
Technorati tags: स्वामी आनन्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/swami%20anand">swami anand</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/memoires">memoires</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/chhotubhai">chhotubhai</a></p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%20%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6">स्वामी आनन्द</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%a3">संस्मरण</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9b%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88">छोटुभाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/swami%20anand">swami anand</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/memoires">memoires</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/chhotubhai">chhotubhai</a></p>
<p align="left"><strong>    <a href="http://shaishav.wordpress.com/2007/08/10/swami-anandmemoireschhotubhai/">पिछले प्रसंग</a> से आगे :  </strong></p>
<p align="left">    उन्हीं दिनों ठेकेदार ने अपने बाप के गांव में बगीचे में खाद के लिए  वैगन भर कर बकरी की लीद पारडी भेजी । रेलवे रसीद में ८० मन लिखवा कर उतने ही वजन का भाड़ा दिया जबकि वैगन में ३०० मन माल भरा । छोटुभाई ने वैगन का नम्बर तथा उसकी क्षमता लिख ली और सीधी जाने वाली मालगाडी से तत्काल वैगन रवाना कर दिया। कोई रसीद नहीं बनाई। मुनीम से कहा, "रसीद कल ले जाना । वैसे भी आज की डाक से तो रसीद जाने वाली नहीं है।" उसे पता था कि वैगन को पहुंचने में एक सप्ताह लग जाएगा।<br />
    दूसरे दिन मुनीम पता लिखा हुआ  लिफाफा ले कर आया। छोटुभाई ने वैगन<br />
के पूरे नाप के हिसाब से ४६३ बंगाली - मन लीद की रसीद बनाई और उसके<br />
सामने ही लिफाफे में बंद कर डाक से रवाना करने भेज दिया ।<br />
    वैगन तो डेढ दिन में पारडी पहुंच गया था ; और रसीद पहुंचे इसके पहले ही<br />
ठेकेदार के बाप ने वैगन खाली करा कर लीद बगीचे में डलवा भी दी थी। माल की<br />
डेलिवरी न लेने का बहाना भी उसके पास नहीं बचा। ४६३ मन का भाडा चुकाने<br />
में बुड्ढे की कमर टूट गई । कमाऊ बेटे को पुरानी रीति रिवाज के बाप ने<br />
कैसी चिट्ठी लिखी होगी इसकी कल्पना पाठक-श्रोता कर लें।<br />
    उन बैलगाड़ी वाले भील आदिवासी लोगों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी,<br />
गांव-गांव घूम कर, लोगों के बयान तथा भाड़ा न चुकाई गई पर्चियों को जमा कर,<br />
शिकायत पत्र पर सैंकडों भीलों के अंगूठे की छाप इकट्ठा कर गवर्नर-इन-काउन्सिल को भेजी। जांच की मांग उठाई। पूरा मामला साबित हुआ। उसे सारी की सारी रकम चुकता करनी पड़ी और  भील जनता को भविष्य में रक्षा मिले इस आशय का सरकार के पास प्रस्ताव (GR) भी पारित करवाया ।</p>
<p align="left">5<br />
    इसी प्रकार का पानी  अपने से ऊपर के बड़े से बड़े रेलवे अधिकारियों को उन्होंने अनेक बार पिलाया। एक भी मौका न जाने दें। ऐसे प्रकरणों की सृष्टि भी करें।एक बार फ्रन्टीयर के रस्ते विलायत की डाक तथा यात्रियों को लेकर हर शनिवार को आने वाले और हार्बर ब्रान्च की लाइन पर सीधा बेलार्ड पीअर पर लगे पी.एन्ड.ओ. कंपनी के मेल जहाज को डाक तथा यात्री पहुंचाने वाले 'ओवरलैन्ड' को माहिम-वड़ाला के पास घंटे भर खड़ा कर दिया था ! कंन्ट्रोल विभाग ने गलती से एक लंबतडंग माल गाड़ी को उसी पटरी पर जाने दिया था और फिर छोटुभाई पर फोन की झड़ी लगा दी कि मालगाड़ी के लिए गिराया सिगनल उठा<br />
कर ओवरलैन्ड मेल को पहले जाने दें ।<br />
    छोटुभाई ने घिस कर ना कह दी । रेल नियमों का हवाला दिया। एक बार गिराया<br />
गया सिग्नल तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक ट्रेन निकल न जाए। चर्चगेट के रेल मुख्यालय तक तहलका मच गया। ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्ट, ट्राफिक मैनेजर, बड़े से बड़े अधिकारियों के फोन की घंटियां बजने लगीं:<br />
    वह कमबख्त ६० डिब्बों वाली गुड्स ट्रेन घोंघे की गति से चलती थी। तिसपर उसे वड़ाला यार्ड में जहां मुंबई, कुर्ला, बांद्रा, हार्बर लाईन की पटरियों की भूलभुलैया थी वहीं एक दर्जन से ज्यादा शंटिंग कर के साठों डिब्बों को बिखेर कर साइडिंग में जाना था। छोटुभाई ने आराम कुर्सी टेलिफोन के सामने रख कर ठंडे दिमाग से जवाब देना शुरू कर दिया। चर्चगेट के मुख्यालय से वे लोग बोलें:<br />
"हलो, हलो, मि. छोटुभाई देसाई, स्टेशन मास्टर माहिम। हलो, मैं डी.टी.एस.<br />
बोल रहा हूं।.. हलो, मैं ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्ट बोल रहा हूं। हलो, मैं जनरल मैनेजर स्पीकिंग। हलो, मि. देसाई! आप अरजेन्सी समझ सकते हो। हलो, ओवरलैन्ड मेल रुका हुआ है। उसे कैसे रोका जा सकता है? हलो, बेलार्ड पीअर पर पी.एन्ड ओ. मेल को देरी हो रही है। वीकली होम बाउन्ड मेल स्टीमर। समझ रहे हैं न ? उसे कैसे देरी करा सकते हैं?"<br />
छोटुभाई: एलाव, एलाव होम बाउन्ड हो या हेवेन बाउन्ड; खुद ब्रह्मा हो तो भी खड़ा कर दूंगा। एलाव, मैं छोटुभाई देसाई, माहिम स्पीकिंग। एलाव, एलाव, एक बार सिग्नल गिराने के बाद पटरी पर खड़ी गाड़ी जब तक अगले स्टेशन पर न पहुंच जाए तब तक उसे नहीं उठाया जा सकता। इसमें किसी को भी डिस्क्रीशन का अधिकार नहीं है।रीफर टू रेल्वे रेग्युलेशन्सस। एलाव, मेल लेट हो तो चल सकता है, दुर्घटना हो तो नहीं चल सकता। हां। Delay can be explained, accident cannot be explained.  (गुजराती में) ऐसे समय तो तुम बच्चू लोग सभी खिसक जाओगे, और छोटुभाई अकेले को लटकना पडेगा!<br />
"हलो, हलो, मि. छोटुभाई देसाई ! मैं आपको हुक्म देता हूं, सिगनल उठा कर<br />
ओवरलैन्ड मेल को जाने दो। अपने ऊपरी अधिकारियों का आपको कोई डर नहीं है<br />
क्या? आपको पछताना पड़ेगा। रीज़नेबल बनो। समय पहचानो। आप समझदार व्यक्ति<br />
हो । "<br />
"एलाव, एलाव। मैं समझदार व्यक्ति हूं इसीलिए तो समय समझ कर ही काम करता<br />
हूं। आप ऊपरी अधिकारी जरूर हैं। लेकिन रेल नियमों के खिलाफ जाने का हुक्म<br />
आप मुझे नहीं दे सकते। यदि आप ऐसा करें भी तो मैं नहीं मानूंगा। आप में<br />
दम हो तो मुझे डिसमिस भले ही कर दो।"<br />
(गुजराती में) "और जरा सुन लें ...जहां तक डरने पछताने की बात है तो छोटुभाई जिस दिन अपना गांव छोड के निकला उसी दिन दीहण के हनुमानजी को तेल सिंदूर चढ़ा कर निकला था। समझ में आया? अब चुप चाप बैठे रहो -- बड़ी कुर्सी पर।बोला-चाला रामकबीर !"<br />
"य़ानि कि सॉरी। एलाव । मैं छोटुभाई देसाई स्टेशन मास्टर माहिम, स्पीकिंग."<br />
पूरे पचास मिनट के बाद सिग्नल उठाया गया। पी.एन्ड ओ. मेल स्टीमर एक घंटे<br />
से भी ज्यादा देर से रवाना हुई।<br />
    बाद में महिनों तक इस लफ़ड़े का श्राद्ध पूरा करने में लगाया। छोटूभाई भैंसे की ताकत से लड़े और जीते। इतना ही नहीं, ऊपर से सत्ताधिकारियों से लिखित प्रशंसा भी प्राप्त की।<br />
बड़े से बड़े अधिकारी छोटुभाई से हार मान कर नाक जमीन पर रगड़ते   जहां तक हो<br />
सके उनसे छेडखानी नहीं करते। कट कर चलते। मूर नामका एक गोरा अथवा अर्ध गोरा<br />
अधिकारी उनके पीछे पड़ गया। ८७ चेतावनियां (caution), ४५ दंड और एक<br />
तनख्वाह में कटौती (reduction), यह था उनकी उन तीन साल की कमाई का<br />
रेकार्ड ! लेकिन छोटुभाई ने दिन रात कानूनी लड़ाई लड़ कर सत्ताधीशों की<br />
नींद ऐसी हराम कर दी कि उन्हें उनकी हर सजा को रद करने को मजबूर होना<br />
पड़ा । लेकिन इन सब दंड, लफ़ड़े तथा सजाओं का बाद में तो उन्होंने हिसाब ही<br />
रखना छोड़ दिया था ।<br />
    नौकरी लगने के पहले दिन से रेल प्रशासन और विभाग के अधिकारियों के<br />
पीछे वे जिस तरह हाथ धो कर पड़ गए वह  रुका जब उन्होंने नौकरी छोड़ी और<br />
जनसेवक बने तब ज्यों का त्यों वह तेवर कायम रहा । रेलवे मैन्युअल में देशी<br />
कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले native शब्द का विरोध करने से<br />
लेकर एन्ग्लोइन्डियन, पारसी तथा हिन्दू कर्मचारियों के बीच, ग्रेड, प्रमोशन और  युनिफॉर्म के कपड़े तक के मामलों में साम्प्रदायिक अन्याय एवं पक्षपात तथा ऊपरी अधिकारियों के जुल्म, तुनक मिजाजी स्वभाव एवं प्रशासनिक खामियों के कारण रोजमर्रा के कामकाज में होने वाले अनगिनत किस्सों में से 'इस्यू' खड़ा कर वे अंत तक लडते रहे; अनेक मामलों मे सत्ताधीशों को रेल नियमो में परिवर्तन करने को मजबूर होना पड़ा ।<br />
    वैसे अधिकारी उनसे त्राहीमाम कहते और कन्नी काट कर चलते और उन्हें न<br />
छेड़ने में ही अपनी खैरियत समझते, फिर भी घटिया चरित्र के अधिकारियों के<br />
अलावा ज्यादातर ऊपरी अधिकारियों के दिल में उनके लिए अपार श्रद्धा तथा आदर<br />
भाव था। उनकी सच्चाई, भ्रष्ट न होने का गुण तथा ऊँचे चरित्र पर सबको<br />
सम्पूर्ण विश्वास था। छोटुभाई को वे अपने रेल विभाग का आभूषण मानते थे।</p>
<p><strong>[ जारी ]</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महादेव से बड़े : ले. स्वामी आनन्द]]></title>
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<pubDate>Fri, 10 Aug 2007 16:40:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: स्वामी आनन्द, संस्मरण, swami anand, memoires
[ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80%20%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6">स्वामी आनन्द</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%a3">संस्मरण</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/swami%20anand">swami anand</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/memoires">memoires</a></p>
<p align="left">[ स्वामी आनन्द गुजराती गद्य - साहित्य के एक प्रबल हस्ताक्षर माने जाते हैं । वे महात्मा गाँधी और सरदार पटेल के निकट सहयोगी थे और गाँधीजी की पत्रिकाओं के उस दौर में प्रकाशक थे जब अँग्रेज हुकूमत का दमनचक्र चल रहा था । उनकी सशक्त और अनूठी शैली में लिखा ' महादेव थी मोटेरा ' नामक संस्मरण का  नचिकेता देसाई द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद यहाँ देते हुए मुझे खुशी हो रही है । - अफ़लातून ]</p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left">    अखबारवाले - यानि अखबार निकालने वाले और अखबार पढ़नेवाले दोनों की ही<br />
नजरों से ताउम्र ओझल रहने का सौभाग्य जिसे नसीब हुआ,  गुजरात का एक ऐसा<br />
आज़ाद लडाकू , करतार के घर चित्रगुप्त की बही की जांच करने निकल पडा ।<br />
     श्री नरहरिभाई के लिखे 'महादेवभाई का  पूर्वचरित्र' ( नवजीवन प्रकाशन,अहमदाबाद ) में तथा बरसों पहले बारडोली आश्रम में टाइफ़ोइड के ज्वर से पीडित एक मित्र की<br />
पुत्री के मन बहलाने के लिए मैंने लिखी और पढ  कर सुनाई कथा  , जिसे श्री<br />
उमाशंकर जोशी ने मुझ से मांग कर 'संस्कृति' में एक छोटे लेख के रूप में<br />
प्रकाशित किया, मुझे लगता है कि इस के अलावा कोई भी अखबारनवीस शायद ही तीन दशक की उनकी जनसेवा के दौरान उनके नाम से परिचित हो पाया हो।<br />
    संसार की तमाम सुखसुविधाओं से परे रह कर उन्होंने लगभग सत्तर बरस आजाद<br />
जीवन बिताया; फिर भी गुजरात के अगली पंक्ति के निष्टावान समाजसेवियों तथा<br />
आजादी के सैनिकों में उनका नाम सहज ही गिनाया जा सके ऐसा उनका  सेवामय<br />
जीवन था।<br />
१.<br />
    स्व. छोटुभाई बापुभाई देसाई स्व. महादेव भाई देसाई के ताउजी के पुत्र थे,<br />
यानि उनके चचेरे भाई।  महादेवभाई से तीन चार वर्ष बड़े। दोनों साथ पले,<br />
साथ पढ़ाई की ।    बावजूद इसके दोनों की शिक्षा, स्वभाव एवं व्यक्तित्व बहुत भिन्न-भिन्न थे। एक मुगल गार्डन का गुलाब; दुसरा उनई के जंगल का बाँस। एक ताजमहल का शिल्प; दूसरा दक्षिण का गोमटेश्वर ; एक ढाका की शबनम ; दूसरा घाटी की घोंघटी (कम्बल) -<br />
जो बिछाने तथा ओढने वाले  को चुभने वाली, फिर भी ठिठुरती ठंड, बरसात या आंधी में जब कीमती शाल नम हो बेकार हो जाया करती है , तब यही काली घोंघटी ही मीठी गर्मी देकर<br />
न्युमोनिया से बचाती है।<br />
    गुजरात की दो तुनक मिजाज जातियां हैं: लेउआ पटेल तथा अनाविल। दोनों<br />
बादशाह के नाम से जाने जाते हैं। खेतों में बारैया, ढेडा और दुबला (जातियाँ) जैसे<br />
मजदूरों का शोषण करना और बात - बात में अपने कुलीन होने की ऐंठ के लिए मर<br />
मिटना । और गांव के सभी लोगों को नीची जाति का मानकर  संबोधित करना। आधी<br />
सदी पहले अपने आप को   ऊँची जाति कहलाने वाले लोगों का ऐसा ही जीवन था।<br />
छोटुभाई इसी जमाने की पैदाइश थे। उनके किशोरावस्था के पराक्रमों की उड़ती-उड़ती सी<br />
झलक 'पूर्वचरित' में देखने को मिलती है। अपने गांव दीहण (ओलपाड़ तालुका,<br />
सुरत जिला) की पाठशाला के अलावा घर-खेत के काम करना ; पगलाए बैल का सींग<br />
पकड कर उसे खडा कर देना या फिर उसके साथ खेत से गांव की सीमा तक घसिटाते<br />
हुए आना मगर सींग न छोडना; बैल हाथ न आए तो उसकी जगह खुद हल में जुत<br />
जाना; अंग्रजी पाठशाला के मास्टर मणिकाका की धारदार छ्डी सौ से अधिक फटके(सोटे) लगा कर टूट जाती और काका हार कर दुगुने गुस्से से छोटुभाई का सिर दोनों<br />
हाथोंसे पकड कर दिवाल से भडाभड पटकते, फिर भी बिना रोए, बिना आह-उह किए<br />
केवल ओठ चबा कर खडे रहना ; गांव के बीमार के लिए दवा-वैद्य लाने का<br />
बहाना बना कर गांव के मुखिया की घोडी ले कर दीहण से सुरत सैर पर निकल<br />
जाना; बैलगाडी चला कर जब सुरत जाना पड़े तब शहर की ट्राफिक पुलिस या<br />
चुंगीवालों से पंगा लेना; ऐसे तो थे उनके 'पूर्वचरित' के कारनामे ।</p>
<p align="left">२.<br />
    दीहण के देसाई यानि कुलीन घराना तिस पर सुरखाब के पंख। हालांकि घर के अति<br />
दरिद्र थे। मणिकाका की पाठशाला में अंग्रेजी की तीसरी जमात पढ़ने के बाद<br />
तीनों चचेरे भाई जुनागढ, अडाजण आदि गांवों में पढे़ ।<br />
    'माधेव की एक ही पुस्तक से हम सब पढ़ते। दूसरी पुस्तक खरीद ने का सवाल ही नहीं था।'<br />
    पढ़ाई के साथ-साथ अडाजण गांव में रु. ४ के मासिक वेतन पर डाक बांटने का<br />
काम भी किया. एक घंटे में काम निबटा लेते। ज्यादातर चिठ्ठियां स्कूल<br />
आते- जाते ही बांट देते और दूर की डाक बांटने में यदि एक- आध दिन की देरी<br />
हो तो उस दिन की मोहर लगाने का ध्यान रखते! चीन के एक सौदागर पारसी<br />
बावाजी के घर उसकी लडकी को पढ़ाने का भी काम कुछ दिन के लिए किया । लेकिन<br />
पढ़ाने का काम पूरा कर बावाजी की बैठकी पर उन्हें बिना सलाम बजाए चले जाने<br />
के कारण उन्हें टोका गया:<br />
"कल से पढ़ाने नहीं आउंगा।"<br />
लेकिन वे इतना अच्छा पढ़ाते थे कि बावाजी ने उन्हें मनाने के लिए काफ़ी<br />
खुशामत की। उन्हें लेने घोडा भेजा। अपनी चीन की गद्दी पर नौकरी देने का<br />
लालच दिया। लेकिन नहीं माने। अन्त में बावाजी ने उनकी बुद्धि तथा<br />
तेजस्विता से खुश हो कर मेहनताना के अलावा रु. १०० बक्षीश के तौर पर<br />
आग्रहपूर्वक दिए।<br />
    मैट्रिक तक पहुँचे और पास हुए । सुरत टूटा और बम्बई बस रहा था । देश भर में<br />
रेलवे लाइन बिछ गईं, उस जमाने की यह बात है। अनाविल भले कैसे भी हों<br />
आखिर संस्कार तो उनके ब्राह्मण के होते थे। लिखने-पढ़ने की आदत पूरी तरह से छूटी<br />
नहीं थी। इसलिए, अंग्रेजी की तीन-चार कक्षाएं पास कर, सच्ची-झूठी जन्म<br />
तारीख, परीक्षा और सर्टिफिकेट के आधार पर बी.बी. एन्ड सी. आई. रेल्वे में<br />
टिकट मास्टर के तौर पर भरती होने लगे। देखते ही देखते मुम्बई से सुरत,<br />
वड़ोदरा और ताप्ती लाइन में शायद ही कोई ऐसा स्टेशन हो जहां तार-टिकट या<br />
स्टेशन मास्टर अनाविल न हों । दशकों तक यह सिलसिला चला ।<br />
    छोटुभाई इसी रास्ते चल पड़े ।  तार - मास्टर की भर्ती परीक्षा में ६५ आवेदकों<br />
में प्रथम स्थान पा कर पास हुए। लेकिन अपनी १४ या १८ साल की रेल की नौकरी<br />
में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह हो जिस में उन्होंने छोटे-बडे झगडे पैदा न किए हों।<br />
दिमाग ऐसा कि बड़े से बड़े रेल अफसरों को पानी पिला कर बौना ठहरा दिया ।<br />
भूलाभाई तथा मुन्शी (भूलाभाई देसाई व कन्हैयालाल मा. मुन्शी) जैसे दिग्गजों को भी दस मिनट की बात-चीत में उलझा दें ।<br />
    लेकिन इस अपार बुद्धिशक्ति का उपयोग कभी किसी भी मौके पर अपने निजी<br />
स्वार्थ के लिए या किसी दुष्ट इरादे से किसी को परेशान करने में उन्होंने कभी नहीं किया इस बात का गवाह मैं वे जब तक जिन्दा रहे तब तक रहा हूँ ।<br />
   छ्त्तीस बरस की हमारी पहचान। तिस पर बीस बरस तो हमने साथ काम किया। एक<br />
चटाई पर सोया, एक थाली में खाया । लेकिन उनके जैसा लड़ाका मैं ने दूसरा कोई न देखा। जहां भी किसी पर छोटा-बड़ा अन्याय होते देखा कि उसका झगडा  कूद कर अपने सिर पर ले लेते। इस में अपने स्वभाव की निरी अक्खडता या दूसरों के श्राद्ध उधार ले कर उतारने के किस्से भी उतने ही होंगे ।</p>
<p align="left">३.<br />
    रेल - जीवन के सभी वर्ष ऐसे ही झगड़ों में बिताए। चोर व्यापारी, जालिम<br />
ठेकेदारों, घूसखोर अधिकारियों तथा बड़े से बड़े गोरे साहिबों के रूआब को<br />
उन्होंने उतार दिया । किस्से तो बारंबार पैदा करते थे। जानबूझकर छोटे बड़े<br />
अधिकारियों के साथ टकराहट खड़ी करें और सर्वोच्च अधिकारियों तक के दांतों<br />
लोहे के चने चबवाएं।<br />
    रेल नौकरी के दौरान घटित ऐसे अनेक किस्सों को नारायण (देसाई) तथा मोहन<br />
(परीख) जैसे आश्रम के किशोर 'रेलवे - पुराण' कहते और जब भी छोटुकाका पकड<br />
में आ जाएँ तब जिद कर उनसे ये किस्से सुनते । वे सुनाते भी अपनी ठेठ<br />
सुरती देहाती भाषा में, ऐसे अनोखे अंदाज से कि सुनने वाले सभी हंसते - हंसते<br />
दोहरे हो जाएँ और उनके पेट दुखने लगें। ऐसे तो अनेक किस्से हैं जिनका<br />
हिसाब रखना मुश्किल है। नमूने के तौर पर यहां एक दो किस्से पेश कर रहा<br />
हूं।<br />
    ताप्ती लाइन पर चींचपाड़ा स्टेशन के वे स्टेशन मास्टर थे&#124; यहां पारडी का<br />
रहने वाला सरकारी ठेकेदार रेल अधिकारियों की मिलीभगत से जम कर चोरी करता<br />
था। आस-पास के भील आदिवासियों से जोर जबरदस्ती बेगारी में बैलगाडी उठा<br />
लेता । काम ले कर भाड़े की पर्ची लिख दे और जब वे बेचारे पैसा लेने जाएं तो<br />
उनसे पर्ची छीन कर फाड़ दें , गाली दे कर मार पीट कर उन्हें भगा दे। भिलाड,<br />
संजाण  से अपना काम करवाने के लिए सौ-सौ मजदूर बिना टिकट के रेल में ले कर<br />
सप्ताह- पंद्रह दिन में ले कर आता। गार्ड को मिला लिया था। छोटुभाई ने एक<br />
झटके में १२० लोगों को बिना टिकट पकड लिया:</p>
<p align="left">'क्यों लाए? तुम्हारी शिकायत करूंगा,' बोल कर गार्ड को धमकाया और संजाण<br />
से चींचपाडा तक का १२० जन का रेल भाडा दंड सहित उगलवाया।<br />
ठेकेदार गुस्से से आगबबूला हो गया:<br />
"मास्टर!  कहां के  हो? मुझे पहचानते हो? कितने दिन नौकरी करनी है?"<br />
"जिस गांव की बेरी उसी गांव का बबूल! आगे की पहचान तो याद नहीं आ रही।<br />
लेकिन आज पहचान हो गयी। और देखो न, नौकरी कितने दिन करनी है यह तो अपने<br />
मुंबई के अधिकारियों से पूछ कर बताउंगा।"<br />
कुछ ही दिनों के बाद उसका टीन के पत्तर का वैगन आया। ठेकेदार लेने आया।<br />
स्टेशन मास्टर मिला हुआ था। छोटुभाइ से कहा,<br />
"इन्हें डिलीवरी दे दो।"<br />
छोटुभाई ने उससे रेलवे रसीद मांगी।<br />
ठेकेदार बोला, "अभी आई नहीं है। कल की डाक से आते ही भिजवा दूंगा।<br />
डिलीवरी दे दो, मेरा काम बिगड रहा है।"<br />
छोटुभाई बोले, "ठीक है, भाड़े का रुपया और बैलगाड़ी के साथ अपने मुनीम को भेज दो।"<br />
मुनीम बैलगाडी ले कर आया और पत्तर लाद कर ले गया। छोटुभाई ने न तो पैसे<br />
लिए और न ही डिलिवरी रजिस्टर में दस्तखत करवाए।<br />
"कल जब रसीद आए तो पैसे भर कर दस्तखत कर देना। एक-आध दिन देर-सबेर हुआ तो<br />
खामख्वाह डेमरेज भरना पडेगा।"<br />
दूसरे दिन स्टेशन मास्टर के नाम ऊपरी अधिकारी का तार आया:<br />
"पत्तर के वैगन की डेलिवरी न करें। माल भेजने वाले ने मना किया है।"<br />
भेजने वाले ने रेलवे की रसीद वी.पी.पी. से भेजी थी जो ठेकेदार ने पैसे न<br />
भरने की वजह से लौट आयी थी।<br />
लेकिन डेलिवरी तो वह ले चुका था।<br />
स्टेशन मास्टर को पसीना आ गया। छोटुभाई ने ढाढस दिया:<br />
"आप बिलकुल न डरें। मैं तो आदमी को उसके पैर देख कर पहचान लेता हूं।<br />
मैंने डिलिवरी जरूर दी है, मगर न तो उससे पैसा लिया है न ही रजिस्टर में<br />
एन्ट्री की और न तो उस से दस्तखत कराई। आप बैठ कर तमाशा देखिए। अब बच्चू<br />
को बुला कर सीधा करता हूं।"<br />
झंडीवाले पोइन्टमैन को भेज कर ठेकेदार को बुलवाया:<br />
"आइए चीन के सौदागर। यह तार पढें।"<br />
(थोडा रुक कर) "अभी तुरंत अगर माल भेजने वाले को पैसा भेज कर शाम के पांच<br />
बजे से पहले रेलवे विभाग का डिलिवरी की मंजूरी देता तार नहीं मंगवाया तो<br />
गोडाउन में से पत्तर चोरी करने के जुर्म में सीधा पुलिस के हवाले कर<br />
दूंगा। यह तार का टुकडा मेरे हाथ में ही है, देख रहे हो ना?"<br />
"वैसे इस प्रकार का धंधा करने के आदी लगते हो इसलिए कभी तो हाथ में जंजीर<br />
जरूर पहनी होगी।"</p>
<p align="left">  पैसे भरे गए. डेलिवरी देने का तार भी शाम पांच बजे से पहले आ गया। स्टेशन<br />
मास्टर छोटुभाई के पैर पकड कर रोया।
</p>
<p align="left"><strong>[ जारी ]</strong></p>
]]></content:encoded>
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