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	<title>sahity &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/sahity/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "sahity"</description>
	<pubDate>Sat, 10 May 2008 21:03:27 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:31:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#ff00ff;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff00ff;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढि़या अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट खेल में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धोनी कप्तान की तरह पेश आयें-a article in hindi on cricket]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/02/19/dhoni-kaptane-ki-tarah-pesh-aayen/</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 10:34:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/02/19/dhoni-kaptane-ki-tarah-pesh-aayen/</guid>
<description><![CDATA[धोनी कप्तान की तरह पेश आयें
एक दिवसीय ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>धोनी कप्तान की तरह पेश आयें<br />
एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्रेलिया ने भारत को   हराकर यह सिद्ध कर दिया है कि अभी भी विश्व में उसके सामने कोई टीम टिक नहीं सकती। बीस ओवर के मैचों में भारत को विश्व विजेता का खिताब क्या मिला लोग फिर एक बार क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने लगे थे पर अब इन दो पराजयों से उनकी खुमारी उतरने लगी है। समस्या यह है कि दोनों के खेल नियमों बहुत अंतर है और फिर पचास ओवर में हमेशा खिलाड़ियों के खेल के साथ उनके और कप्तान के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा होती है। इस मामले में भी हमेशा भारतीय खिलाडी कमजोर रहे हैं। कप्तान बनना तो सभी चाहते हैं पर उसके दायित्व को कोई नहीं समझता। सबको यह सम्मान तो चाहिए पर इस पद का निर्वाह कैसे हो यह कोई नहीं जानता। जब टीम जीतती है तो कप्तान वाह-वही लूटने को तैयार है और हारते हैं तो सारा आरोप खिलाडियों पर डाल देते हैं-उसमें भी किसी खिलाडी का नाम लेने से कराते हैं। कभी कोई कप्तान अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते नज़र नहीं आते। भारतीय गेंदबाज कभी कप्तान से निर्देश लेकर गेंद डाल रहे हों ऐसा नहीं लगता।</p>
<p>मैने एक कप्तान को यह कहते हुए सुना था कि 'सभी खिलाडी प्रोफेशनल हैं और कोई चीज समझाने की जरूरत नहीं है, वह सब खुद ही जानते है'। मैं सोच रहा था कि फिर अखिर कप्तान आखिर किस मर्ज की दवा है। क्या वह अपने साथी खिलाडियों को सख्ती से अपने मूल स्वरूप के साथ हालत के अनुसार खेलने का निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा लगता है कि भारतीय टीम में सीनियर-जूनियर का कहीं न कहीं भेद चलता है इसीलिये ही सीनियर खिलाड़ी चाहे जैसा खेलने लगते हैं क्योंकि इनको वहां समझ या चेतावनी देने वाला कोई नहीं होता। अगर आज हम धोनी से यह अपेक्षा करें कि वह अपनी से वरिष्ठ खिलाडियों पर उनके निराशाजनक खेल पर नाराजगी जताए तो इसकी संभावना नहीं लगती। शायद यह भारतीय टीम के अभ्यास में ही नहीं है कि उसका कप्तान अपने से वरिष्ठ या कनिष्ठ खिलाडी पर ग़ुस्सा जाहिर करे क्योंकि कब सामने वाला उसका कप्तान बनकर आ जाये और फिर बदला लेने। फिर धोनी तो अपनी सामने ही तीन ऐसे भूतपूर्व कप्तानों के खेलते देख रहे हैं जो कभी भी फिर कप्तान बन सकते हैं और ऎसी स्थिति में 'जैसा चल रहा है वैसे चलने दो' की नीति पर चलने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।</p>
<p>बीस ओवर की विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी इस मामले में बडे भाग्यशाली थे कि उनके व्यक्तित्व को वहाँ चुनौती देने वाला युवराज के अलावा और कोई नहीं था और उसने भी उनका बखूबी साथ निभाया। पर इन एक दिवसीय मैचों में जिस तरह भारतीय टीम पिट रही हैं उससे तो यह लगता है कि धोनी अब कप्तान के रूप में असफल होते  जा रहे हैं और खिलाड़ियों पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। इस तरह लगतार असफल होने पर अगर वह अपने साथी खिलाडियों पर अगर इस वजह से गुस्सा नहीं हुए कि भविष्य में कोई उनमें से पुन: उनका कप्तान बनकर उनका भी भविष्य चौपट कर सकता है तो इस टीम के खिलाडियों के खेल में कोई सुधार नहीं होने वाला। अगर धोनी चाहते हैं कि उनका नाम सफल कप्तानों की सूची में शामिल हो तो उन्हें वरिष्ठ खिलाड़ियों को भी हालत के अनुसार खेलने के निर्देश देने होंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वेलेंटाइन डे और भारतीय संस्कृति-hindi article]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 15:05:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</guid>
<description><![CDATA[कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर के अनुसार सऊदी अरब में वेलेंटाइन डे पर उसे मनाने से रोकने के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए-गुलाब के फूलों की बिक्री रोकी गयी और लाल रंग के कागज़ के रैपर में उपहार बेचने पर पाबंदी लगाई गयी. हमारे देश में भी कई लोग इसका विरोध करते हैं और उसे रोकने के लिए वह उपाय करते हैं जो मेरे विचार से अनुचित है. वेलेंटाइन डे पर कल मैंने दो हास्य कवितायेँ लिखीं थी और मैं इसका विरोध या समर्थन करने की बजाय इसकी उपेक्षा करने का पक्षधर रहा हूँ. मेरे लिए इसे मनाने वाले हंसी के  पात्र हैं एक तरह से प्यार का ऐसा नाटक करते हैं जिसके बारे में वह खुद नहीं जानते. </p>
<p>मैं इस बात के विरुद्ध हूँ कि किसी को ऐसे कार्य से जबरदस्ती रोका जाये जिससे  किसी दूसरे को कोई हानि होती है. स्पष्टत: मैं वेलेंटाइन डे का पक्षधर नहीं हूँ और कभी-कभी तो लगता है कि इसके विरोधियों ने ही इसको प्रोत्साहन दिया है. यह पांचवां  वर्ष है जब इसे इतने जोश-खरोश से मनाया गया. इससे पहले क्यों नहीं मनाया जाता था? साफ है कि इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों को रोज कुछ न कुछ  कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रचार करते हैं. होटलों और अन्य व्यवसायिक स्थानों पर युवा-युवतियों की  भीड़ जाती है. पार्क और अन्य एकांत स्थान पर जब खतरे की आशंका देखते हैं तो वह पैसा खर्च करते हैं. आखिर उसका फायदा किसे होता है?<br />
हमारे में से कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने आज से दस वर्ष पूर्व वेलेंटाइन डे का नाम भी सुना हो. अब उसका समर्थन और विरोध अजीब लगता है. जहाँ तक देश की संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मुझे जबरन विरोध कोई तरीका नजर नहीं आता. इससे तो उसे प्रचार ही मिलता है. फिर आम आदमी जो इसे नहीं जानता वह भी इसका नाम लेता है. कई लोगों ने इसका आपसी चर्चा में जिक्र किया और मैंने सुना. मुझे लगता है कि इस तरह इसे और प्रचार मिला. </p>
<p>जहाँ तक संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मैं इसे भी वाद और नारों में लिपटे शब्दों की तरह देखता हूँ. आप यह कह सकते हैं कि मैं हर विषय पर वाद और नारों से जुडे होने की बात क्यों लिखता हूँ. तो जनाब आप  बताईये कि बच्चों को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का काम किसे करना चाहिऐ-माता-पिता को ही न! इस तरह जबरन विरोध कर आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि कुछ लोग हैं जो इस काम में नाकाम रहे हैं. दूसरी बात आखिर संस्कारों और संस्कृति का व्यापक रूप लोगों के दिमाग में क्या है यह आज तक कोई नहीं बताया. बस बचाना है और शुरू हो जाते हैं. आखिर इसकी उपेक्षा क्यों नहीं कर देते. एक दिन के विरोध से क्या हम समाज में जो नैतिकता का पतन हुआ है उसे बचा सकते हैं? कतई नहीं, क्योंकि हम अपने समाज के उस खोखलेपन को नहीं देख रहे जो इसे ध्वस्त किये दे रहा है. देश में कन्या के भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं पर उसमें  कामयाबी नहीं मिल रही है. जिस दहेज़ प्रथा को हम सामान्य मानते हैं उससे जो विकृति आई है उस पर कभी किसी ने सोचा है?इसने समाज को बहुत बुरी तरह खोखला कर दिया है. </p>
<p>हम सऊदी अरब द्वारा लगाए प्रतिबन्ध की बात करें. वहाँ कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहाँ  भी इस बीमारी ने अपने कदम रखे हैं तो इसका सीधा मतलब यही है कि बाजार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पूंजीवर्ग के सदस्य  ही विजय श्री प्राप्त करते  है. इस प्रसंग में एक बात जो महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब में  एक धार्मिक राज्य होते हुए भी वहाँ क्यों लोग इसके प्रति आकर्षित हुए? विश्व में उदारीकरण के नाम पर  बाजार के ताकतवर लोगों के द्वार सब जगह खुले हैं पर आम आदमी के लिए नहीं. इसलिए बाजार की व्यवस्था वह सब परंपराएं और विचार लेकर आगे बढ़ रही है जो उसके लिए आय के स्त्रोत बना सकते हैं.<br />
इसका मुकाबला करना है तो उसके लिए उन लोगों को खुद दृढ़ हो होना पडेगा जिन पर अपने बच्चों पर संस्कार डालने की जिम्मेदारी है. अपने घर और बाहर अपने बच्चों को अपने आध्यात्म से अवगत कराये बिना उनको ऐसे  हास्यास्पद काम से दूर नहीं रखा जा सकता. सुबह और शाम आरती जो लोग पहले करते थे उसे फिजूल मानकर अब छोड़ दिया गया है पर आदमी के मन में संस्कार भरने का काम उसके  द्वारा किया जाता था वह अनमोल था.  कभी बच्चे को मंदिर ले जाया जाता था तो कभी तीज-त्यौहार   पर बडों के चरण स्पर्श कराये जाते थे. अब सब बातें  छोड़ उसे अपना काम सिद्ध करने का ज्ञान दिया जाता है और फिर जब वह छोड़ कर बाहर चला जाता है तो अकेलेपन के साथ केवल उसकी यादें रह जातीं हैं. </p>
<p>संस्कारों और संस्कृति के नाम पर वह फसल हम लहलहाते देखना चाहते हैं जिसके बीज हमें बोये ही नहीं. आखिर हमारे संस्कारों और संस्कृति की कौनसी ऐसी फसल खड़ी है जिसे बचाने के लिए हम हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं. अपने आध्यात्म से परे होकर हमें ऐसी आशा नहीं करना चाहिए. याद रखना पूरी दुनिया भारत की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा मानती है पर अपने देश में कितने लोग उससे परिचित हैं इस पर विचार करना चाहिए. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ़िर भी लिखता रहूँगा]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=16</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 14:31:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=16</guid>
<description><![CDATA[अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉग बनाना और लिखना वैसे ही है जैसे किसी शो के लिए एस.एम् एस. करना. जिस तरह टीवी चैनल पर शो होते हैं उनके लिए लोग आत्म मुग्ध होकर एस.एम् एस करते हैं कि हमने अपनी जोरदार भूमिका अदा की. इसी तरह रेडियो पर भी ज़रा-ज़रा से प्रश्नों पर जवाब के लिए एस.एम्. एस कराया जाता है. कुछ लोगों को विजेता बनाकर उनकी आवाज वहाँ सुनाई जाती है ताकि सब लोग उससे प्रेरित हों.<br />
उससे किसका फायदा होता है सब जानते हैं. अलबता बड़े शहर के लोगों के लिए अपना नाम कमाने का खूब यहाँ अवसर हैं पर छोटे शहरों के ब्लॉग लेखकों को तो केवल भीड़ ही माना जायेगा. </p>
<p>इधर अब देश में भी ब्लॉग पर लिखने वालों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मैंने एक वर्ष पूर्व जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि शायद कुछ पढने वाले मिल जायेंगे. यहाँ उस समय नारद करके एक फॉरम था जिस पर सब हिन्दी के ब्लॉग दिखते थे. उसके बाद तीन अन्य फॉरम  भी खुल गए. वैसे वर्डप्रेस स्वयं भी अपने आप में एक फॉर्म चला रहा है पर ब्लागस्पाट.कॉम के लिए यह सभी  हिन्दी  फॉरम बहुत उपयोगी हैं क्योंकि उसके हिन्दी ब्लॉग एक साथ  देखने के लिए कोई अन्य जगह नहीं है. बहरहाल मैंने अन्य लोगों के आग्रह पर वहाँ अपना ब्लॉग पंजीकृत कराया. शुरू में ऐसा लगा कि शायद कोई बहुत अच्छी जगह है पर अब लगाने लगा कि वहाँ अपनी रचना दिखाने का मतलब है कि उसको बाजार में बेचना. वहां ग्राहक आपकी  चीज पर कोई प्रतिकूल कमेन्ट भी कर सकता है. </p>
<p>पर अब उसका दूसरा रूप भी सामने आ रहा है. मैंने एक वर्ष तक जमकर लिखा कि शायद पाठक संख्या बढे पर ऐसा हुआ नहीं उल्टे ऐसा लगा कि ब्लॉग लेखकों  संख्या बढाकर कुछ लोग अपनी भीड़ बढाना चाहते हैं. पुराने ब्लोगर जिनके वेब साईटों में अपने संपर्क लगते हैं अपने लिए खूब प्रचार जुटा रहे हैं. मीडिया में ऐसे लोगों को प्रचार मिल रहा है जिनकी पढने की दृष्टि से हिन्दी ब्लॉग जगत में अधिक मान्यता नहीं है. इन लोगों ने पुरस्कार बांटे और फ़िर उनका अखबारों में खूब प्रचार किया.  मुझे हैरानी हुई  कि किसी ने भी मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया जब कि मैंने  १२ सौ से अधिक पोस्टों को लिखा. हद तो इस बात की हो गयी कि ब्लोगों के विषयों का उल्लेख करते हुए उन महत्वपूर्ण विषयों-चाणक्य,कबीर, रहीम, मनु स्मृति, और कौटिल्य, विदुर नीति श्री गीता-का उल्लेख तक नहीं किया जाता क्योंकि इसे मैं लिखता हूँ. इतना भयभीत लोग हैं मैं समझता नहीं था. बड़े शहरों के लोगों के दो समूह बन गए हैं जिनका लिखने से अधिक इस बात पर यकीन है कि आत्मप्रचार किया जाए. वैसे मैं इन  विषयों पर लिखते हुए किसी सम्मान की आशा करता भी नहीं क्योंकि इसके लिए कोई प्रायोजक नहीं मिल सकता. उल्टे अपमानित  किए जाने पर कोई पुरस्कार जरूर पा सकता है ऐसी मैं आशा नहीं करता था. </p>
<p>छोटे  शहरों के ब्लोगरों के लिए नाम,नामा और इनाम जैसी अभी कोई संभावना नहीं बनती दिखती. अब तो यही सोच रहा हूँ कि हिन्दी फोरमों पर जो ब्लॉग हैं उन पर अधिक नहीं लिखा जाए क्योंकि वहाँ सम्मान न मिले पर अपमानित कर कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो सकते हैं. जैसे-जैसे यह संख्या बढेगी मुझे अपने  आत्म सम्मान के बचाव के लिए अधिक मानसिक संघर्ष करना पड़ेगा और ऐसे में मेरी रचनाधर्मिता प्रभावित होगी. मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा-न नाम, न नामा न इनाम पर इससे वह संतुष्ट नहीं है. क्योंकि मेरे विषय अगर कुछ लोगों को प्रिय हैं तो कुछ लोग उनको अपमानित कर अपने लिए सम्मान भी जुटा सकते हैं. एक तो विषय है फ़िर छोटे शहर का और फ़िर लिखकर उसका पीछा न करने की आदत मुझे कहीं पुरस्कृत कराएगी यह तो मैं सोचता भी नहीं पर अपमानित करने पर कुछ लोग पुरस्कृत हों क्या मैं यह स्वीकार कर लेता. बहरहाल फ़िर भी इन फोरमों पर लिखूंगा ताकि कुछ और कहानियाँ यहाँ पर मिल सकें.  वैसे मैं धर्म भीरू इन्सान हूँ और श्रीगीता का संदेश नए संदर्भों में प्रस्तुत करने का मन है, उस पर मैं लिखता भी रहा हूँ पर जिस स्वरूप में लिखने का विचार है उसे शुरू नहीं कर सका. देखता हूँ कि आगे भगवान् की क्या मेहरबानी होती है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी कभी खामोशी भी बहुत भली]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=15</link>
<pubDate>Mon, 04 Feb 2008 15:12:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=15</guid>
<description><![CDATA[जब कभी में चौपालों पर लिखता हूँ तो ऐसा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब कभी में चौपालों पर लिखता हूँ तो ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि मैं वहाँ कुछ लिखूं.<br />
कल एक चिट्ठाकार मेरे चिट्ठे पर बदतमीजी भरी कमेन्ट लिख गया और सुबह मैं जल्दी में था इसलिए उसका कोई जवाब नहीं दे सकता था पर थोडा गुस्से में उसका ब्लोग देखकर आया और फिर अपने ब्लोग से उसके कमेन्ट डीलीट कर दिए और अब उसका पता ढूंढ रहा हूँ. हालांकि मैं उसका कडा जवाब दे सकता था पर इसके पीछे उसी यह चाल भी लगती है कि वह मेरे द्वारा अपने ब्लोग की प्रसिद्धि चाहता हो. क्योंकि अक्सर कोई भी बदतमीजी करता है तो छद्म नाम से करता है, पर उसका ब्लोग और ईमेल पता मेरे ब्लोग पर दिख रहा था. इसका मतलब यह है कि वह कुछ प्रचार की उम्मीद कर रहा होगा. बहरहाल उसका पता मुझे भले ही याद न हो पर उसका ब्लोग जब मेरे सामने आयेगा तब समझ जाऊंगा. </p>
<p>वह मेरी एक कविता से बौखलाया हुआ लगता था जबकि उसके साथ मेरा कोई संपर्क नहीं है. अगर उसको कविता से विरोध था तो उसमें कुछ नहीं था और उसने के नहीं तीन कमेन्ट दिए थे. मुझे शक है कि वह पिए हुए था. अगर मेरे अन्य ब्लोग और रचनाओं को उसने पढा होता तो शायद वह ऐसा नहीं करता. ऐसा भी हो सकता है कि कुछ भद्र ब्लोगर जो मेरे लिखे से ग्रसित हैं उसे इसलिए तैयार किया हो कि वह मुझे आतंकित करे. उसने ब्लोग पर कुछ लिखा है, और कुछ वरिष्ठ ब्लोगर के उस पर कमेन्ट भी थे. बाकी पीछे की  पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं था. आज मैंने एक ब्लोग देखा पर उस पर ऐसा नहीं लग रहा कि वह सज्जन ऐसे भी हो सकते हैं.<br />
मैंने अभी इस बारे में खामोशी अख्तियार करने का फैसला लिया है क्योंकि इससे वह लोग बहुत खुश होंगे जो मुझे अपमानित करना चाहते हैं. वैसे भी मैंने चौपालों पर अधिक लिखने का इरादा छोड़ दिया है क्योंकि वहाँ लिखने का मतलब है कि अपनी पोस्ट मछली बाजार में ले जाना.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिन्दी के ठेकेदार- हास्य-व्यंग्य  कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=13</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 17:19:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=13</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की
कोशिश ने क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की<br />
कोशिश ने कुछ लोगों को अंधा बना दिया<br />
अपने दोस्त लेखकों  की भीड़ जुटाकर<br />
सम्मान की एक  दुकान को   सजा दिया </p>
<p>एक लेखकनुमा ब्लोगर जो<br />
लिख नहीं पाता था कविता<br />
पसंद भी नहीं था पढ़ना<br />
चुन लाया कहीं से तीन सर्वश्रेष्ठ<br />
और अपना फैसला सुना दिया<br />
कवियों के  ब्लोग दूर ही रखे गए<br />
तकनीकी वाले जरूरी थे सो पढे गए<br />
लो मैंने अपना फैसला सुना दिया </p>
<p>मच गया शोर<br />
बरसी कहीं से हास्य कवितायेँ<br />
उसके इस काम पर<br />
आ गया वह बचाव पर<br />
देने लगा पुराने वाद और नारे पर बयान<br />
कर रहा था मैं भी वर्ग में बांटकर<br />
ब्लोग लेखकों का सम्मान<br />
पर लोगों ने अनसुना कर दिया </p>
<p>अब आया एक नेतानुमा ब्लोगर<br />
कर लाया कहीं से बीस का जुगाड़<br />
पुराने दोस्तों को सजाया थाली में<br />
जैसे कोई पकवान<br />
इनके लायक ही है सर्वश्रेष्ठ का सम्मान<br />
लोकतंत्र है सो करो मतदान<br />
मैंने तो बीस का थाल सजा दिया </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
अभी शुरू भी नहीं हुई<br />
इंटरनेट पर हिन्दी के आने की प्रक्रिया<br />
पहुंच गए हैं धंधेबाज पहले ही<br />
और अपना दुकान सजा दिया<br />
हैरान है लोग<br />
जो हिन्दी की ठेकेदार<br />
 हर जगह  हैं<br />
सन्देश देते हैं<br />
यहाँ हिन्दी का अपमान हुआ है इस पर लिखो<br />
जमकर विरोध करते दिखो<br />
तुम लिखो जैसा हमने सन्देश दिया </p>
<p>क्या ब्लोग तुम्हारी जागीर है<br />
जो थाल सजाये घूम  रहे हो<br />
अपनी वीरों को ही क्यों नहीं झोंकते<br />
तुम्हारी फौज में दम नहीं है<br />
जो हिन्दी का अपमान नहीं रोकते<br />
फिर काहे उनको सम्मान दिया<br />
ग़लतफ़हमी मत पालो<br />
नारों और वाद पर हम नहीं भड़कते<br />
लिखते हैं अपने ख्याल खुद<br />
तुम तो पूजते हो<br />
अपने महल सजाते हो दूसरों के सम्मान से<br />
हिन्दी की दुर्दशा पर रोने वालों<br />
लिखने वालों तो जीते हैं अपमान से<br />
फिर भी दमदार लिखते हैं<br />
वह और होंगे जो तुम्हारे  सम्मान पर बिकते हैं<br />
हिन्दी लिखने वाले तो दिल से लिखते हैं<br />
उन्हें परवाह नहीं सम्मान तुमने<br />
दिया कि  नहीं दिया<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सपने सिर्फ सपने होते-हिन्दी साहित्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=12</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 14:30:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=12</guid>
<description><![CDATA[सपने  में जब खोये रह्ते
कभी पूरी होंगे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सपने  में जब खोये रह्ते<br />
कभी पूरी होंगे यही सोचकर<br />
बहुत कुछ सहते<br />
जब होता है हकीकतों की तपिश से सामना<br />
तब सबके जिस्म जलने लगते   </p>
<p>पूरे भी हो जाएं तो भी<br />
सपने  वैसे ही नहीं लगते<br />
जिन्हें पालते-पोसते हैं बडे चाव से दिल में<br />
कभी भी वह सपने सच होकर भी<br />
अपनी नहीं लगते<br />
हकीकतों से कब तक मुहँ मोड़ सकता है कोई<br />
पर सपने भी कब पीछा छोड़ते<br />
कभी-कभी जिंदा रहने का बहाना बनते हैं </p>
<p>जब जला देती हैं हकीकतें बदन<br />
तब सपने देखकर ही की जा सकती है तसल्ली<br />
पर उन पर फ़िदा होकर रोना ठीक नहीं<br />
सपने सिर्फ सपने होते हैं<br />
सच हो जाएं तो अपने नसीब होते<br />
नहीं तो पराये लगते<br />
------------------------------------------ </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सत्य से जितनी दूर जाओगे-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=9</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 11:25:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=9</guid>
<description><![CDATA[सत्य से जितनी दूर जाओगे
भ्रम को उतना ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सत्य से जितनी दूर जाओगे<br />
भ्रम को उतना ही करीब पाओगे<br />
खवाब भले ही हकीकत होने लगें<br />
सपने चाहे सामने चमकने लगें<br />
उम्मीदें भी आसमान में उड़ने लगें<br />
पर तुम अपने पाँव हमेशा<br />
जमीन से ऊपर नहीं उठा पाओगे </p>
<p>झूठ को सच साबित करने के लिए<br />
हजार बहानों की बैसाखियों की<br />
जरूरत होती है<br />
सच का कोई श्रृंगार नहीं होता<br />
कटु होते हुए भी<br />
उसकी संगत में सुखद अनुभूति   होती हैं<br />
कब तक उससे आंखें छिपाओगे<br />
------------------------------------</p>
<p>प्यार सच है<br />
पर कभी दिखता नहीं है<br />
जो दिख रहा है<br />
वह केवल एक पल का सपना है<br />
जिसमें होती है यह गलतफहमी कि<br />
जो सामने वह अपना है<br />
इस झूठ में बह गए कई लोग<br />
अपनी हंसती-खेलती जिन्दगी<br />
उनको चलता फिरता मुर्दा दिखता है<br />
पराये को भी जबरदस्ती<br />
पड़ता समझना अपना है<br />
---------------------------------<br />
<strong>नोट-यह पत्रिका-ब्लोग कहीं भी लिंक नहीं है और न ही इसे पूर्व अनुमति के लिंक किया जाये. इसको लिंक करने के लिए पहले भुगतान आवश्यक है. इसकी रचनाओं के पूर्व प्रकाशन के के लिए भी अनुमति लेना जरूरी है-दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:मांगने से सम्मान कम होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=8</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 04:02:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई।
ताह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई।<br />
ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥ </strong></p>
<p>अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है, ऐसे व्यक्ति को जाग्रत रहने के शिक्षा देना भी उचित नहीं है।<br />
कविवर रहीम का आशय यह कई जो लोग ऐसा करते हैं उनके मन में दुर्भावना होती है और वह अपने आपको सबसे श्रेष्ठ समझते हैं अत: उन्हें समझना कठिन है और उन्हें सुधारने का प्रयास करना भी व्यर्थ है। </p>
<p><strong>मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम<br />
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम </strong></p>
<p>यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिन्दगी ऐसे ही बीत जाती-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/01/25/jindge-aise-hee-beet-jati-kavita-sahity/</link>
<pubDate>Fri, 25 Jan 2008 15:59:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी की पीडा को दूर करने की कोशिश
जब हो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसी की पीडा को दूर करने की कोशिश<br />
जब हो  जाती है नाकाम<br />
बढ़ जाती है उसकी पीडा तो<br />
हो जाते बदनाम<br />
कमजोर दिल के लोगों के बीच<br />
रहते हुए<br />
किसी पर तरस खाने में डर लगता है<br />
लोग दर्द के कम होने से अधिक<br />
दूसरों को जख्म देकर खुश होने की<br />
कोशिश कर चलाते हैं अपना काम<br />
------------------------------------------<br />
समंदर की तरह उठती हैं<br />
मन में उठतीं है लहरें<br />
जब लौटती हैं वापस तो<br />
इच्छाओं और आकांशाओं को<br />
साथ लेकर छोड़ जाती हैं<br />
आदमी ढोता है उनका बोझ<br />
हर पल गुजारता है बैचैनी के साथ<br />
जोड़ता रहता है हर पल सामान पर<br />
फिर भी रहते उसके खाली हाथ<br />
उसकी जिन्दगी ऐसे ही बीत जाती </p>
<p>कहीं नहीं लिखा जिन्दगी गुजारो<br />
किसी गुलाम की तरह<br />
पर आदमी अपनी उम्मीदों की ही<br />
करता जिन्दगी भर गुलामी<br />
आजादी की सोचते हुए<br />
पूरी जिन्दगी गुलामी में बीत जाती</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लेखकीय अधिकार से लिखें अनुयायी बनकर नहीं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/24/%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sat, 24 Nov 2007 13:38:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[इस देश में स्वतंत्रता के बाद विचार और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस देश में स्वतंत्रता के बाद विचार और चिंतन के नाम पर तमाम तरह के वाद और नारे दिए गए। जिन पर देश का बौद्धिक और चिन्तक वर्ग कई भागों में बंट गया। सभी ने अपने वाद और नारों के अनुसार किताबे लिखीं, लिखवाईं और बंटवाईं। उन्होने तय किया किया कि  लोगों के बच्चे वह पढें जो हम पढ़वाएं। ऐसा हुआ भी पर इस देश में हमारे पुराने महापुरुषों के जीवन चरित्र और संदेशों से भरपूर साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और लोगों ने मैकाले द्वारा रचित इस शिक्षा प्रणाली से अक्षर ज्ञान  तो लिया पर अपने मन और विचारों से अपने  प्राचीनतम ज्ञान  को विस्मृत नहीं होने दिया। नेताओं और अभिनेताओं द्वारा प्रदत विषयों के साथ लोग उठे-बैठे पर उनको धारण नहीं किया और यही बात इस देश पर बौद्धिक रूप से अपना नियंत्रण करने वालों को अखरी तब उन्होने उन पर अपने मन पसंद के पात्रों को शैक्षिक पुस्तकों में पढ़ने के लिए   थोपा।  फिर उनसे भी काम नहीं चला तो अब ऐसे पात्र पढ़ने के लिए दिए जा रहे हैं जिनका मापदंड यह है कि वह लोकप्रिय रहें  भले ही  इसके लिए  कोई निर्धारित नियम   नहीं है। </p>
<p>मैं बात कर रहा हूँ विचारधाराओं की। दरअसल नारे लगाना अलग चीज है और अपने मान्य दर्शन पर चलना अगला मामला है। वाद और नारों से भीड़ एकत्रित तो हो जाती है इस आशा के साथ  कि उसका लाभ होगा  पर जब वह अपने अगुआओं को शक्ति तो प्रदान कर देती है पर बाद में पता लगता है कि वास्तविकता कुछ और है। </p>
<p>हमारे देश में राजनीति के सबसे विशारद के रूप में चाणक्य में लिया जाता है और उनके नाम का मोह लोगों के मन में इतना है कि जो भी नेता वयोवृद्ध हो जाता है अपने को इस नाम की उपाधि मिलने पर प्रसन्न होता है। जो सता में आ जाता है तो वह उसे एक तरह से चाणक्य ही कहा जाता है। मगर आप जानते हैं कि चाणक्य ने कभी  कोई पद नहीं लिया-कभी सुख सुविधा का पीछा नहीं किया। इधर-उधर से विचारधाराएं लाकर अपने को एक उम्र के बाद चाणक्य कहे जाने पर प्रसन्न होने वाले विचारधाराओं के यह पोषक उसे महान व्यक्तित्व के मार्ग पर चलना तो दूर उस  पर एक कदम भी नहीं रखे सके। सच तो यह है कि जब इस देश का समाज शब्दश: उनके मार्ग पर नहीं चलेगा यहाँ कि व्यवस्था नहीं सुधर सकती।</p>
<p>मैं अपने साथियों को जो ब्लोग पर लिख रहे  हैं उन्हें इस बात के लिए आगाह कर देना चाहता हूँ कि मैंने अब तक जितना चाणक्य का लिखा हुआ अपने ब्लोगों पर लिखा है वह ज्ञान  बघारने के लिए नहीं स्वाध्याय के लिए लिखा है और उसमें  अभी तक कहीं भी ऐसे पंक्ति नहीं आयी जिसमें लिखा हो कि राजनीति में किसी पर विश्वास करना चाहिए। इस देश में जो विचारधाराएं हैं वह कहीं न कहीं राजनीति का प्रतिबिम्ब हैं और जो ब्लोगर इससे प्रेरित  होकर लिखे रहें हैं उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि<br />
१।क्या वह सही राह पर हैं?<br />
२। क्या वह जिन लोगों का अपनी विचारधारा के आधार पर समर्थन कर रहे हैं वह वाकई  उस पर चल रहे हैं<br />
३।क्या उनसे कोई निजी लाभ हैं?<br />
४।क्या वह जिनके समर्थन  या विरोध में लिख रहे हैं उस पर उन्होने स्वयं गहनता से विचार किया है।<br />
५।क्या उससे सामान्य व्यक्ति संतुष्ट है।<br />
इस मामले मने अगत लिखने से तत्काल कोई उनको लाभ मिलता है तो जरूर लिखें पर भविष्य में मिलने की उम्मीद में लिखने की बजाय अन्य रुचिकर विषयों पर लिखें. राजनीति में भविष अनिश्चित होता है.यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी को किसी विषय पर लिखने के लिए न तो प्रेरित कर रहा हूँ न रोक रहा हूँ क्योंकि इसका न मुझे अधिकार है न किसी और को। यह आलेख केवल मैं अपने साथ ब्लोगरों से  चर्चा और विचार के लिए लिख रहा हूँ। मैं सोचता हूँ कि ब्लोगिंग एक  ऐसी  विधा है जिसमें अपने विचार स्वतन्त्र रूप का अवसर मिलता है जो कि अब से पहले दुर्लभ था और हम दूसरे  के हाथ में मौजूद साधनों पर निर्भर थे। तब हम इस बात का भी विचार करते थे कि उनसे हमारे विचार न मिलते हों तो छपने के लिए मिला लेना चाहिए। इस आदत ने हमारी चिन्त्तन और मनन की प्रक्रिया को पंगु कर दिया है। इसलिए जब ब्लोगर ऐसे विषय को लेते हैं तो उन्हें उस पर गहनता पूर्वक विचार कर फिर लिखना चाहिए। मैं देखता हूँ कि कई लेखक जब लिखते हैं तो साफ लगता है कि उसमें उनका सोच कम विचारधाराओं के स्वयंभू लोगों के नारे अधिक  हैं। अपने वैचारिक चिन्त्तन और अनुसंधान का अभाव  उनमें साफ नजर आता है। ऐसे में मुझे लगता है कि शायद किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध  कोई अखबार पढ़ रहा हूँ। </p>
<p>मैं अपने अच्छा लेखक हूँ या नहीं मुझे पढ़ने वाले आप लोग तय करेंगे पर मैं अच्छी और सरस रचनाओं को पढ़ने वाला एक अच्छा पाठक हूँ और मुझे किसी विचारधारा से न तो विरोध हैं न प्रतिबद्धता पर मैं कुछ नया पढ़ना चाहता हूँ। राजनितिक विषयों से मुझे परहेज नहीं है पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथी जब लिखें तो अपने लेखकीय अधिकार से लिखें किसी के अनुयायी या प्रशंसक  बनकर नहीं.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग पर त्रुटियों की तरफ  ध्यान दिलाने वालों का आभार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/11/20/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%ab/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 16:45:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कुछ ब्लोगों में शब्द और वर्तनी की गलति]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ ब्लोगों में शब्द और वर्तनी की गलतिया आ जाती हैं. मैं खुद कई गलतियां कर जाता हूँ, यह स्वीकार करते हुए कोई शर्म नहीं है कि यह गलतिया मेरी लापरवाही से होतीं हैं. जो लोग मेरा  इनकी तरफ  आकर्षित कराते हैं  उनका आभारी हूं. वैसे कई ब्लोगर अनजाने में यह गलतियां कर जाते हैं और जल्दबाजी में उनको ठीक करना भूल जाते हैं. </p>
<p>इन गलतियों के पीछे केवल एक ही कारण है कि हम जब इसे टंकित कर रहे हैं तो अंग्रेजी की बोर्ड का इस्तेमाल करते हैं. दूसरा यह कि कई शब्द ऐसे हैं जो बाद में बेक स्पेस से वापस आने पर सही होते हैं, और कई शब्द तो ऐसे हैं जो दो मिलाकर एक करने पड़ते हैं.  ki से की भी आता है और कि भी. kam से काम भी आता है कम भी. एक बार शब्द का चयन करने के बाद दुबारा सही नहीं करना पड़ता है पर गूगल के हिन्दी टूल का अभ्यस्त  होने के कारण कई बार इस तरफ ध्यान नहीं जाता और कुछ गलतिया अनजाने में चली जाती हैं. वैसे तो मैं कृतिदेव से करने का आदी हूँ और यह टूल इस्तेमाल करने में मुझे बहुत परेशानी है, पर मेरे पास फिलहाल इसके अलावा कोई चारा नहीं है. वैसे मैं अंतरजाल पर लिखने  से पहले अपनी रचनाएं सीधी कंप्यूटर पर कृतिदेव में टायप करता था और हिन्दी टूल  से  अब भी यही करता हूँ और मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपने मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं लिख पाता. ऐसा तभी होगा जब मैं हाथ से लिखकर यहाँ टाइप करूंगा. अभी यहाँ बड़ी  रचनाएं लिखने का माहौल नहीं बन पाया है और जब हाथ से लिखूंगा तो बड़ी हो जायेंगी. इसलिए अभी जो तात्कालिक रूप से विचार आता है उसे तत्काल यहाँ लिखने लगता हूँ, उसके बाद पढ़ने पर जो गलती सामने आती है उसको सही करता हूँ फिर भी कुछ छूट जातीं हैं. </p>
<p>चूंकि अंग्रेजी की बोर्ड का टाईप सभी कर रहे हैं इसलिए गलती हो जाना स्वाभाविक है पर इसे मुद्दा बनाना ठीक नहीं है और अगर सब कमेन्ट लिखते समय एक दूसरे  इस तरफ  ध्यान दिलाएं तो अच्छी बात है-क्योंकि जब कोई रचना या पोस्ट चौपाल पर होती है तो उसका ठीक हो जाना अच्छी बात है, अन्य पाठकों के पास तो बाद में पहुँचती है और तब तक यही ठीक हो जाये तो अच्छी बात है. वैसे कुछ लिखने वाले वाकई कोई गलती नहीं करते पर कुछ हैं जिनसे गलतियां हो जातीं हैं. हाँ इस गलती आकर्षित करने पर किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए. अब बुध्दी हो या बुद्धि हम समझ सकते हैं कि कोई जानबूझकर गलती नहीं करता. इस पर किसी का मजाक नहीं बनाना चाहिऐ. मैंने बडे-बडे अख़बारों में ऐसी गलतियां देखीं हैं. </p>
<p>इस मामले में मैं उन लोगों का आभारी  हूँ जिन्होंने मेरा ध्यान इस तरफ दिलाया है, और अब तय किया है कि अपने लिखे को कम से कम दो बार पढा करूंगा. इसके बावजूद कोई रह जाती है तो उसका ध्यान आकर्षित करने वालों का आभार व्यक्त करते हुए ठीक कर दूंगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर (२)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 14:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब मैं अपने सभी ब्लोग पर पाठकों की संख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब मैं अपने सभी ब्लोग पर पाठकों की संख्या देखता हूँ तो चक्कर में पड़ जाता हूँ, क्योंकि  अधिकतर ब्लॉगों पर संख्या १०० से ऊपर निकल जाती है, चाहे मैं पोस्ट करूं या नहीं. पिछले कई दिनों से इस बढ़ती संख्या की वजह से  उन पर यह सोचकर लिखता हूँ कि नियमित से अगर वह पढ़ रहें है तो आखिर मुझे क्यों न लिखना चाहिए. स्वभाव से मैं जिज्ञासु और कुछ कर गुजरने की इच्छा वाला व्यक्ति हूँ. इसलिए यह देखता रहता हूँ कि किस किस्म की रचनाएं उनके द्वारा देखी जा रहीं है और वह  किस तरह मेरे ब्लोग पर आते हैं. मेरे ब्लोग कितनी वेब साइटों पर लिंकित हैं और कैसे पढे जा रहे हैं इसे मैं निरंतर देखता हूँ. खासतौर से वर्डप्रेस के ब्लोग इस मामले में मुझे बहुत सारी जानकारी देते हैं क्योंकि उसमें मैंने केटेगरी और टेग अधिक रखे हुए हैं. </p>
<p>मुझे यह पता नहीं कि ब्लाग पर लिखने वालों के क्या अनुभव हैं पर एक बात मेरी समझ में आ गयी है कि यह भी एक वेब साईट की तरह हैं. मैंने जो अंग्रेजी में इन पर केटेगरी या टेग अपनी पोस्ट  दिए हैं वह जब सर्च पा डालता हूँ तो  उस विषय बनी वेब साईट के बाद मेरे ब्लोग वहाँ दिखाई देते हैं,  और हिन्दी में देवनागरी में डालने पर तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. उदाहरण के लिए अगर मैं चाणक्य, कबीर या रहीम लिखता हूँ तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. वैसे यह हमें मालूम है कि यह वेब साईट नहीं है पर जो पढ़ने वाले हैं उनके लिए यह एक वेब साईट की तरह हैं. जब लोग हिन्दी टूल से अपने शब्द इन सर्च इंजिनों में डालेंगे तो जो हमने टेग या केटेगरी अपनी पोस्ट में लगाते हैं वह उनके सामने ब्लोग ला खडा कर देंगे. </p>
<p>इसलिए जो लेखक अपनी रचनाओं के लिए इन ब्लोग का इस्तेमाल करेंगे उनको आगे बहुत पढ़ने वाले मिलेंगे.<br />
जब मैं सर्च पर जाकर हिन्दी और अंग्रेजी में शब्द रखता हूँ और मेरे ब्लोग मेरे सामने आ जाते हैं तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मेरा लिखा अंतर्जाल पर इस तरह फ़ैल चुका है. इसलिए लिखते समय मेरे दिमाग में यही विचार रहता है कि ऐसा लिखा जाये जो बहुत समय तक नवीनता का बोध लिए हो. बस बात वहीं आकर अटकती हैं कि लोगों को हिन्दी टूल के बारे में बताया जाये ताकि अपने सर्च में टूल से हिन्दी देवनागरी के शब्द पोस्ट करें.<br />
                                   ऐसा नहीं है कि लोग कर नहीं रहे पर उनकी संख्या कम है. मैंने अपने दो मित्रों को हिन्दी टूल बताया और जब इसका उपयोग किया तो उनका मत था कि अभी इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को इस बारे में अधिक पता नहीं है. उन्होने कुछ जगह अपने दिवाली की बधाई हिन्दी भाषा में भेजी तो उनसे पूछा गया कि आप ऐसे हिन्दी कैसे लिखते हैं जो हमारी पढ़ने में आती है.  इसलिए मेरा मानना है कि अंतरजाल पर जो हिन्दी लिख रहे हैं वह अपने लोगों को ब्लोग बनाने के साथ हिन्दी दूल के इस्तेमाल के लिए  प्रेरित करें.</p>
<p>                  इधर मैंने कुछ ब्लोग देखें हैं जिनमें कई युवा लेखक इसका उपयोग अपनी साहित्यक रचनाओं के लिए करना चाहते हैं और उनकी रचनाओं में जो पुट है उसको देखते हुए मुझे लगता है कि वह लोग इस विधा को बहुत आगे तक ले जाने वाले हैं. उससे भी अधिक जिसकी कल्पना इसके आविष्कार करने वालों ने भी नहीं की होगी.  वैसे भी मैं आशावादी हूँ और निराशावादिता का मेरा जीवन मैं कोई स्थान नहीं है.इसलिए जो इस पर लिख रहे हैं उन्हें निराश नहीं होना चाहिऐ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पुराने सुपर स्टार का दुख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/17/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 12:54:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ओम शांति फिल्म में अपनी मजाक उडाये जान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ओम शांति फिल्म में अपनी मजाक उडाये जाने से भारतीय फिल्मों के पुराने अभिनेता कलाकार   मनोजकुमार आज के तथाकथित सुपर स्टार शाहरुख खान और निदेशिका फराह खान से बहुत नाराज हैं। मनोजकुमार की नक़ल करते हुए इस फिल्म में उनका मजाक उडाया गया है और उन्होने इस मामले को सिने आर्टिस्ट एसोसियेशन में ले जाने की धमकी दी है। </p>
<p>हम थोडी देर के लिए तुलना करें तो शाहरुख खान आज के सशक्त प्रचार माध्यमों की वजह से लोगों को याद कराये जाते हैं कि वह इस देश के सुपर स्टार हैं जबकि मनोजकुमार तो बिना याद कराये ही लोगों के  दिमाग में आज भी पुराने  सुपर स्टार हैं। शाहरुख़ खान तो अभिनेता हैं और मनोजकुमार कलाकार हैं। अभिनेता और कलाकार में फर्क होता है। अभिनेता तो फिल्म में किसी  तय पात्र का  अभिनय करता है और कलाकार उस पात्र को जीवन देता है। अगर हम पुराने अभिनेताओं में देवानंद, मनोजकुमार, राजेंद्र कुमार,जानीवाकर और राजेश खन्ना की फिल्में देखे तो लगता है कि उनकी जगह और कोई उस फिल्म में  होता तो उस पर फिट नहीं बैठता। सबके संवाद  प्रेषण की अपने एक शैली थी और ऐसा लगता था कि वह वास्तव में वह पात्र जी रहे हैं। जिस फिल्म में शाहरुख़ होते हैं अगर उसमें सलमान खान भी हों तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इन सबके चेहरे सपाट हैं और पात्र के अनुसार संवाद तो बोलते हैं पर चेहरे पर वैसी  प्रतिक्रिया नहीं होती। नये कलाकारों में कई  अभिनेता तथाकथित रूप से सुपर स्टार जरूर हैं पर वह मनोजकुमार जैसे कलाकार से अभी कोसों दूर हैं। यही कारण हैं कि शोले, दीवार, सन्यासी, जंजीर, उपकार, पूरब पश्चिम, रोटी कपडा और विदाई जैसी  फिल्में जिनको  मील  का पत्थर  कहा जा सकता है अब नहीं बनती। </p>
<p>आज भी मिमिक्री करने वाले पुराने महान कलाकारों की नक़ल करते हैं यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उनके बाद के कलाकारों के पास अभिनय और संवाद की अपनी कोई शैली नहीं है। अपनी धमाचौकडी में मग्न कलाकारों और निदेशकों को यह होश नहीं रहता कि पुराने कलाकारों की नक़ल कर रहे हैं तो कम से कम उनसे पूछ लें या बता दें। यह केवल इस बार ही नहीं हुआ,पहले भी हो चुका है जब देवानंद की नक़ल करने वाला उनका हमशकल कलाकार जब उनसे मिलने पहुंचा तो उन्होने थप्पड़ जड़ दिया क्योंकि वह फिल्मों में उनकी संवाद शैली की नक़ल करता था। उस समय बहुत शोर मचा था कि देवानंद जी  को यह नहीं करना चाहिए था पर उन्होने इस बारे  में कोई सफाई नहीं दी थी।  अब मनोजकुमार जी की नाराजगी से यह पता लगता है कि इन नये लोगों द्वारा पूर्व सोचना या अनुमति न लेना उनका अपमान है। अगर वह इसकी अनुमति लेते तो शायद वह सहर्ष अनुमति देते और जब लोगों को यह पता लगता तो थोडा उनका सम्मान और बढ़ता। क्या एक पुराने कलाकार का यह अधिकार नहीं बनता की नये  कलाकार से कुछ सम्मान पा ले। </p>
<p>मुझे इस बात से तकलीफ नहीं हुई कि उनका मजाक उडाया गया है बल्कि उन्हें बाद में इससे जो दुख पहुंचा है उससे तकलीफ है। वह एक महान कलाकार हैं और उस समय के सुपर स्टार हैं जब टीवी और रेडियो पर उनका नाम भी नहीं होता था पर लोग लेते थे और आज भी याद करते हैं। वैसे फराह खान और शाहरुख खान ने इसके लिए उसने माफी मांगी है। वैसे अगर वह लोग चाहते हैं कि अपनी गलती का प्रायश्चित किया जाये तो उनका सार्वजनिक रूप से सम्मान करें. आज के अभिनेता और निदेशक खूब पैसा कमा रहे हैं और अगर कुछ पैसा उनके सम्मान पर खर्च हो जायेगा को कौनसी बड़ी बात है, आखिर इस युग में भी अपनी फिल्म हिट कराने के चक्कर में उनको पुराने कलाकार के नाम की जरूरत पडी है. व्यवसायिक दृष्टि से भी किसी का नाम इस्तेमाल करने के लिए उसे पैसा देना चाहिऐ-अभिनेता   खुद भी अनेक उत्पादों में अपना नाम और फोटो देने के लिए पैसे तो लेते ही होंगे।  </p>
<p>वैसे इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर  पैसे के मामले में कलेक्शन तो अच्छा कर लिया होगा पर लोगों के नजरों में कोई खास फिल्म नहीं है. भारत में आम आदमी सफल फिल्म उसे मानता है जिसे दुबारा देखा जाये और जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है वह इसे इस लायक नहीं मानते कि दोबारा देखा जाये. फिर मनोज कुमार की जो छबि इस देश में उसे देखते हुए इस फिल्म के प्रति लोगों के दिमाग में रहा-सहा उत्साह भी जाता रहेगा।<br />
आलेख, फिल्म, </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/16/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 16 Nov 2007 16:42:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ब्लोगरों के वर्गीकरण को लेकर अक्सर सव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लोगरों के वर्गीकरण को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. इसका वैसे कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं हुआ है, पर निरंतर चिट्ठों का अध्ययन करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुचा हूँ कि इसके  दो वर्गीकरण हैं. -१. ब्लोग लेखक २.लेखक ब्लोग (writer cum blogar)</p>
<p>१.ब्लोग लेखक-इससे आशय यह है कि जिन लोगों ने कंप्यूटर के साथ इंटरनेट कनेक्शन लिया है और कुछ रचना कर्म के साथ संबध बढाने और उसे  निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्होने ब्लोग बना लिया है इसलिए लिख रहे हैं और लिखने की विधा में पारंगत भी हो रहे हैं.<br />
२. लेखक (ब्लोग)- यह ऐसे लोग हैं जो कहीं भी लिखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्हें अपने लिखने से मतलब है और ऐसे लोग को मित्र मिल जाये तो उनके लिए बोनस की तरह होता है. लिखना उनके लिए नशा है. वह पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं और ब्लोग इसलिए बनाया है क्योंकि उस पर लिखना है. मैंने ब्लोग इसलिए बनाया क्योंकि मैं लिखना चाहता था, पर इसमें इतने सारे मित्र मिलेंगे यह सोचा नहीं था. मैं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुका हूँ पर इस ब्लोग विधा ने मुझे ब्लोगर बना दिया.  </p>
<p>वैसे दिलचस्प बात यह है कि ब्लोग बनाने वालों ने इन्हें संदेशों के आदान-प्रदान करने के लिए बनाया था, पर जैसा कि हमारे भारत के लोग हैं कि विदेश से अविष्कृत चीज को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं. वैसा ही कुछ लेखक  इसे अपने लिखने के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि इधर कुछ गजब के लोग ब्लोग लिख रहे हैं. वैसे ब्लोग मैं पिछले डेढ़ वर्षों से देख रहा हूँ और मेरा मानना है कि इसमें बहुत अच्छे लेखक  आ गए हैं. मैं जब अभिव्यक्ति पत्रिका पढता था तब यह उस पर लिंकित  नारद चौपाल के   ब्लोग भी देखता था और उस समय मुझे इनकी विषय सामग्री इतनी प्रभावित नहीं करती थी-क्योंकि इसमें साहित्य जैसी विषय वस्तु अधिक नहीं दिखती थी-इसलिए कोई ऐसा विचार नहीं आता था.  वह तो एक दिन एक ऐसे ब्लोग पर नजर पड़ गयी और उसमें एक संवेदनशील विषय पर लिखी पोस्ट ने मुझे प्रभावित किया और तब मुझे लगा कि यह तो अपनी पत्रिका की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. </p>
<p>इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक रोचक विषय है. इसमें कई मित्र मिलना मेरे जैसे लेखक के लिए बोनस है. जो इस पर कमेन्ट देते हैं और या मैं जिन्हें देता हूँ उनके लिए मेरे मन में मैत्री भाव रहता है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लोग हर पोस्ट कमेन्ट दें  या मैं उन्हें दूं- क्योंकि इन फोरम पर कोई हमेशा बना नही रहता. लिखना एक तरह से आपस में मैत्री भाव बढाने का तरीका है. अधिकतर कमेन्ट विभिन्न फोरमों से आती है क्योंकि ब्लोगर कमेन्ट लगाना जानते हैं. आप ताज्जुब करेंगे कि  मेरे निजी मित्र जो मेरे ब्लोग पढ़ते हैं उन्हें अभी तक यह समझ में नहीं आया कि कमेन्ट कैसे देते हैं? मैं उनको कमेन्ट देने के लिए अधिक प्रेरित भी नहीं करता. मेरी पोस्ट पर कमेन्ट देने वाले अनेक ब्लोगरों को उनको नाम याद हैं. अभी मैंने एक अपने मित्र को गूगल का इंडिक ट्रांसलेट टूल इस्तेमाल करना बताया तो वह हैरान हो गया. अभी इस  विधा के बारे अधिक लोगों को पता नहीं है और जैसे-जैसे इसका प्रचार बढेगा अधिक से अधिक लेखक इसमें आयेंगे. </p>
<p>इन ब्लोग के साथ अभी समस्या यह है कि लंबी चौडी पोस्ट लिखने का समय नहीं आया, पर आगे चलकर यह समय भी आयेगा पर वह तभी संभव हो सकता है कि लेखक को यकीन हो जाये कि उसे पढ़ने वाले बहुत हैं. मुझे ब्लोग बनाये हुए एक वर्ष हो गया पर फोरम पर आये आठ महीने हुए हैं. यह आश्चर्य की बात है कि जिन पोस्टों को फोरम पर दस लोग भी नहीं पड़ते वह महीनों तक अन्य पाठकों  द्वारा पढी जातीं हैं. चाणक्य, कौटिल्य, रहीम और कबीर से संबंधित विषय सामग्री पर निरंतर पाठक आते हैं. लोगों की दिलचस्पी को देखते मुझे इन पर लिखने में मजा आता है क्योंकि इससे मुझे 'स्वाध्याय''का अवसर मिलता है-जो कि किसी लेखक के लिए एक अनिवार्य बौद्धिक व्यायाम है. </p>
<p>लेखक  स्वांत सुखाय भाव के होते हैं पर इसका मतलब यह नहीं होता की उनका समाज से सरोकार नहीं होता. देखा जाये तो असली लेखक वही है जो सामाजिक सरोकारों से संबंधित विषयों पर लिखे. ब्लोग की विधा को ऐसे लोग बहुत लंबे समय तक जिंदा रख सकते हैं, पर अभी यह तय नहीं है इसका आगे क्या स्वरूप होगा-यह आने वाले समय पता लग जायेगा. इतना तय है कि प्रतिदिन तीन सौ से अधिक पाठक मेरे ब्लोग पर आते हैं उससे यह लगता है इसमें लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[इस ब्लोग की पाठक संख्या १० हजार हुई ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/10/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a5%a7%e0%a5%a6/</link>
<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 10:41:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दीपकबापू कहिन के बाद मेरा यह दूसरा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दीपकबापू कहिन के बाद मेरा यह दूसरा ब्लोग है जिसने पाठक/व्युज की संख्या दस हजार पर कर ली. अंतर्जाल पर जब मैंने  लिखना शुरू किया था तब मुझे इतना समर्थन मिलने की आशा नहीं थी  पर यह हिन्दी प्रेमी ब्लोग लेखकों और पाठकों ने जो सहयोग दिया उसके लिए मैं उनका आभारी हूँ. </p>
<p>जहाँ दीपक बापू कहिन को आरंभ करते समय ब्लोग के बारे में कुछ नहीं जानता  वहीं इसको इस आशा से शुरू किया कि इस पर  मैं केवल व्यंग्य रचनाओं को प्रस्तुत करूंगा. हालांकि बाद में हर विधा के लिए इसका प्रयोग किया. इस ब्लोग को मैंने इसलिए बनाया कि मुझे दीपक बापू कहिन के बाद इस पर रचनाएं पोस्ट करनी थी. उस समय न यह पता था कि आगे मुझे कुछ फोरम पर जाना है और न यह पता था कि और लोग मेरे ब्लोग को अपने यहाँ दिखाएँगे. बीच में मैंने  ब्लागस्पाट के ब्लोग नारद पर पंजीकृत कराने किए लिए वर्ड प्रेस के इस ब्लोग को हटा लिया था पर इसे कुछ प्रशंसक अलग ही थे, जो इसे अपने यहाँ लिंक किये रहे. मजे की बात  यह रही कि ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग काम मेरे कराये बिना ही इसका पंजीकरण हो गया था और यह बात मुझे बाद में पता चली. </p>
<p>          इस ब्लोग पर श्री  शास्त्री जे.सी.फिलिप की सबसे अधिक कृपा दृष्टि रही है और साथ ही   परमजीत बाली, ममता श्रीवास्तव, रविन्द्र प्रभात, उन्मुक्त जी, रवि रतलामी जी   तथा संजय बेंगानी के साथ-साथ अन्य अनेक ब्लोग लेखकों और पाठकों का इस पर सहयोग और समर्थन मिला.  मैं इसकी सूचना आत्मप्रवंचना के लिए नहीं दे रहा बल्कि सभी को यह बताने के लिए दे रहा हूँ कि ब्लोग लेखन इस देश में आन्दोलन बनेगा. इस समय देश के बुद्धिजीवी वर्ग में हताशा का माहौल है. अभी तक वह विभिन्न विचारधाराओं में नहाकर मन को शांत कर लेते थे. अब छद्म विचार पर्वतों से  कृत्रिम सिद्धांतों की वैतरिणी में बहती इन  विचारधाराओं कि असलियत खुल गयी है और अब सब प्रकार के बुद्धिजीवी  हताश हैं. उन्हें लगता था कि उनको  विचारधारा पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले लोग जब अपना काम निकाल लेते हैं उन फिर उन्हें पूछते नहीं है. इतना ही नहीं उनका काम उस विचारधारा के विपरीत होता है जिसको वह अपनी पूजा मानते हैं. </p>
<p>                        अपनी बात कहने और लिखने के लिए ब्लोग एक सबसे अच्छा जरिया है और आगे वही बुद्धिजीवी होने का गौरव पाएंगे जिनके पास अपना एक ब्लोग होगा. इसमें समय लगा सकता था क्योंकि लोग अभी इस बारे में अधिक नहीं जानते और जब जानेंगे तो फिर इस पर लिखे बिना उनका मन नहीं भरेगा. मेरी इच्छा है कि लोग अधिक से अधिक इस विधा से जुड़ें. मैं पुन: आभारी हूँ उन लोगों का जिन्होंने इस ब्लोग को अपना सतत समर्थन  दिया.  </p>
<p><strong>दीपक बापू कहिन की पाठक संख्या दस हजार तक पहुचने पर लिखे गए लेख की  पुन: प्रस्तुति </strong></p>
<p>आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का आंकडा पार कर लिया है. मेरे द्वारा बनाया जब यह ब्लोग बनाया गया था तब मुझे यह मालुम भी नहीं था की मैं बना क्या रहा हूँ?कमेन्ट क्या होती हैं. इसका पता इतना लंबा है तो केवल इसीलिए के जब उसे लिख रहा तो इस  बात का ज्ञान भी नहीं था कि इसे हमेशा  लिखना होगा. इसे कोई अन्य कैसे पढेगा इसका ज्ञान भी नहीं था. यू.टी.ऍफ़-८ ई फाइल में देव-१० फॉण्ट में लिखता था. हिन्दी श्रेणी भी नही रखा पाया था इसलिए डैशबोर्ड पर भी नहीं दिखता था. </p>
<p>                                 उस समय हमारे मित्र उन्मुक्त जी ने इसे देखा और बताया कि वह इसे पढ़ नहीं पा रहे थे. मुझे हंसी आयी. सोचा कोई होगा जो मुझे परेशान कर रहा है याह खुद कुछ जानता नहीं है और मुझे सीखा रहा है.  उसी समय ब्लागस्पाट का एक ब्लोग भी बनाया था जिसे आज दीपक भारतदीप का चिंतन नाम से जाना जाता है. उसमें इस तरह अपनी घुसपैठ कर ली थी कि वह तो सादा हिन्दी फॉण्ट में भी काम करने लगा था. </p>
<p>        उन्मुक्त जी ने दोनों की कापी  मेरे पास भेज दी तो मैं दंग रह गया. उनकी दशा  देखकर मुझे हैरानी हो रही थी. शहर के अन्य कंप्यूटरों पर देखा तो मुझे सही दिखाए दे रहे थे. ब्लोग बनने से जितना खुश था उतना ही अब परेशान हो रहा था. इसी परेशानी में गूगल का हिन्दी फॉण्ट मेरे हाथ आया. कैसे? यह मुझे याद नहीं. उसीसे लिखना शुरू किया और लिखता चला गया. हर नये  प्रयोग के लिए नया ब्लोग खोलता था. एक नहीं आठ ब्लोग खोल लिए. इसी बीच नारद पर पंजीकरण का प्रयास किया, पर पंजीकरण करना आये तब तो हो. मेरे प्रयासों के उनको गुस्सा आया और बिन करने की धमकी दे डाली. आज जब काम करता हूँ और जो ब्लोग लिखने कि पूरी प्रकिया है उसे देखकर तो उनका गुस्सा सही लगता है. इसके बाद  मैं चुप हो गया और लिखने लगा. तब एक दिन सर्व श्री सागर चंद नाहर, उन्मुक्त जी   संजय  बैगानी और  पंकज  बैगानी जी की  कमेन्ट आयी कि आप तो बहुत लिख चुके हैं पर नारद पर आपका ब्लोग नहीं दिख रहा है आप पंजीकृत कराईये.  </p>
<p>               मैं उस समय सब करने को तैयार था सिवाय नारद पर पंजीकरण कराने के. क्योंकि अब कोई गलती वहाँ से मेरे को बिन करा सकती थी.  मैं सिर पकड़ कर बैठ गया कि अब इस नारद से कैसे सुलझें. बहरहाल उसे दिन भाग्य था और पंजीकरण कैसे हो गया यह अब मुझे भी याद नहीं है. उसके बाद  मेरा ब्लोग मैदान में आ गया. धीरे-धीर  समझ में आने लगा कि वह सब लोग मेरे को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे थे. उन्मुक्त जी के प्रयास तो बहुत प्रशंसनीय हैं. मैं इन सब लोगों का आभारी हूँ. </p>
<p>                     अंतर्जाल लिख्नते समय मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मेरे एक लेखक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति  (अंतर्जाल की पत्रिका)  का पता दिया था. वहाँ मुझे नारद दिखता था पर मैं उसे नहीं देखता था और  जब देखा तो भी मुझे उसमें रूचि नही जागी-इसका कारण यह भी था कि उसमें मुझे उस समय साहित्य जैसे विषय पर कुछ  लिखा गया नहीं लगा. एक बार मेरी नजर ब्लागस्पाट पर एक हिन्दी ब्लोग पर पढ़ गई. मैंने उसे पढा  तो आश्चर्य हुआ. उस  विषय में मेरी दिलचस्पी बहुत थी और उस लेखक ने जो लिखा उससे मैं बहुत  प्रभावित हुआ. उसने मुझे भी उसी तरह लिखने की प्रेरणा दी. अभिव्यक्ति को तो मैं अपनी रचनाएं भेज रहा था पर उस ब्लोग को मैं आज तक नहीं भूल पाया. उसकी विषय सामग्री मेरे दिमाग में आज तक है. मुझे उस लेखक का नाम याद नहीं है. मुझे उस समय अनुभव नहीं था उसके नीचे कमेंट देखता तो शायद कुछ याद रहता-उस समय  कमेंट लगाने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता.  हाँ, ऐसा लगता है कि उस ब्लोग  अपनी इन चारों  फोरम पर होना चाहिए. फुरसत में मैं इन फोरम पर उसका ब्लोग तलाशता हूँ. उसके बारे में कोई संकेत इसलिए नहीं दे सकता क्योंकि वह उस समय एक विवादास्पद  विषय पर लिखा गया था पर उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे मन को खुश कर दिया था. तब मुझे लगा कि इस  ब्लोग विधा को मैं अपने सृजन को लोगों तक पहुचा  सकता हूँ. उस ब्लोग लेखक ने जो व्यंग्य लिखा था वह कोई समाचार पत्र या पत्रिका शायद ही छापने का साहस कर सके और मुझे लगा कि यह विधा आगे आम आदमी को आपनी बात कहने के लिए बहुत योगदान  देने वाली है. मैं उस अज्ञात ब्लोग लेखक को कभी नहीं भूल सकता. </p>
<p>                             श्रीश शर्मा -(ईसवामी) का नाम यहाँ लेना जरूरी है इसलिए  लिख रहा हूँ. वह मेरे मित्र हैं और उनकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आती या मैं उनके अनुसार चल नहीं पाता  यह अलग बात है पर उस अज्ञात ब्लोग लेखक के बाद उनका नंबर भी याद रखने लायक है. जब मैंने अभिव्यक्ति पर नारद खोला तो उनका ब्लोग देखा(यह भी हो सकता है कोई उनका लेख हो) जिसमें उनका कंप्यूटर पर काम करते हुए फोटो था. मैं उस फोटो को देखने से  पहले ब्लोग  लिखने का फैसला कर चुका था और वहाँ  इसलिए गया था कि आगे कैसे बढूँ. उनका लिखा मेरे समझ में नहीं आया पर तय कर चुका था कि इस राह पर चलना ही है और मैं यह नहीं जानता था कि उनसे मेरी मित्रता होने वाली  है-उन्होने अभी मुझे गूगल ट्रांसलेटर टूल का पता  भेजा और मैं कह सकता हूँ कि उनकी यह पहली सलाह है जो काम आ रही है इससे पहले उनका बताया काम तो नहीं आता पर इस इस रास्ते पर अनुभव बढ़ता जाता था.एक बात जो मुझे प्रभावित करती थी कि उन्होने कोई बात पूछने पर उसका उत्तर अवश्य सहज भाव से  देते थे ,   मैंने बाद में श्री देवाशीष और श्री रविन्द्र श्रीवास्तव  के लेख भी पढे और आगे बढ़ने का विचार दृढ़ होता गया. आज मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो हँसता हूँ. शायद यह सब हँसेंगे कि यह क्या लिख रहा है पर मैं बता दूं कि उनका काम अभी ख़त्म नहीं हुआ है मुझ  जैसे अभी कई होंगे जिनकी उन्हें मदद करनी होगी. इन सबका धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आशा करूंगा कि यह लोग अपना सहयोग जारी रखेंगे.<br />
                                आखिर में समीर लाल जी का धन्यवाद ज्ञापित करूंगा कि उन्होने मेरा होंसला बढाने में कोई कसर नहीं छोडी. चिट्ठा चर्चा में उन्होने दीपक बापू कहिन के लिए लिखा था कि यह ब्लोग नया अलख जगायेगा. उनको यह बताने के लिए ही मैं लिख रहा हूँ  १० हजार पाठकों का आंकडा पर कर चुके इस ब्लोग की एक दिन में पाठक संख्या का सर्वोत्तम आंकडा १९१ है जो पिछले सप्ताह ही बना था. उसके बाद  हैं १७७, १६६, १५२, और १४८ है. कल इसकी संख्या ९७ थी.</p>
<p>                                 यह केवल जानकारी भर है और मैं अपने मित्रो और पाठकों को इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि उनकी जो पढ़ने में रुचियाँ हैं उनसे अंतर्जाल पर अच्छा लिखने  वालों की संख्या बढेगी. लोग अच्छा पढ़ना चाहते हैं अगर लिखा जाये तो. मैं आगे भी लिखता रहूंग इस विश्वास के साथ कि आप भी मेरे को प्रेरित करते रहेंगे. मैं चारों फोरम-नारद, ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग- के  कर्णधारों का आभारी हूँ जो अपना सहयोग दे रहे हैं.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग की पाठक संख्या दस हजार के पार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/28/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Sun, 28 Oct 2007 08:02:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का आंकडा पार कर लिया है. मेरे द्वारा बनाया जब यह ब्लोग बनाया गया था तब मुझे यह मालुम भी नहीं था की मैं बना क्या रहा हूँ?कमेन्ट क्या होती हैं. इसका पता इतना लंबा है तो केवल इसीलिए के जब उसे लिख रहा तो इस  बात का ज्ञान भी नहीं था कि इसे हमेशा  लिखना होगा. इसे कोई अन्य कैसे पढेगा इसका ज्ञान भी नहीं था. यू.टी.ऍफ़-८ ई फाइल में देव-१० फॉण्ट में लिखता था. हिन्दी श्रेणी भी नही रखा पाया था इसलिए डैशबोर्ड पर भी नहीं दिखता था. </p>
<p>                                 उस समय हमारे मित्र उन्मुक्त जी ने इसे देखा और बताया कि वह इसे पढ़ नहीं पा रहे थे. मुझे हंसी आयी. सोचा कोई होगा जो मुझे परेशान कर रहा है याह खुद कुछ जानता नहीं है और मुझे सीखा रहा है.  उसी समय ब्लागस्पाट का एक ब्लोग भी बनाया था जिसे आज दीपक भारतदीप का चिंतन नाम से जाना जाता है. उसमें इस तरह अपनी घुसपैठ कर ली थी कि वह तो सादा हिन्दी फॉण्ट में भी काम करने लगा था. </p>
<p>        उन्मुक्त जी ने दोनों की कापी  मेरे पास भेज दी तो मैं दंग रह गया. उनकी दशा  देखकर मुझे हैरानी हो रही थी. शहर के अन्य कंप्यूटरों पर देखा तो मुझे सही दिखाए दे रहे थे. ब्लोग बनने से जितना खुश था उतना ही अब परेशान हो रहा था. इसी परेशानी में गूगल का हिन्दी फॉण्ट मेरे हाथ आया. कैसे? यह मुझे याद नहीं. उसीसे लिखना शुरू किया और लिखता चला गया. हर नये  प्रयोग के लिए नया ब्लोग खोलता था. एक नहीं आठ ब्लोग खोल लिए. इसी बीच नारद पर पंजीकरण का प्रयास किया, पर पंजीकरण करना आये तब तो हो. मेरे प्रयासों के उनको गुस्सा आया और बिन करने की धमकी दे डाली. आज जब काम करता हूँ और जो ब्लोग लिखने कि पूरी प्रकिया है उसे देखकर तो उनका गुस्सा सही लगता है. इसके बाद  मैं चुप हो गया और लिखने लगा. तब एक दिन सर्व श्री सागर चंद नाहर, उन्मुक्त जी   संजय  बैगानी और  पंकज  बैगानी जी की  कमेन्ट आयी कि आप तो बहुत लिख चुके हैं पर नारद पर आपका ब्लोग नहीं दिख रहा है आप पंजीकृत कराईये.  </p>
<p>               मैं उस समय सब करने को तैयार था सिवाय नारद पर पंजीकरण कराने के. क्योंकि अब कोई गलती वहाँ से मेरे को बिन करा सकती थी.  मैं सिर पकड़ कर बैठ गया कि अब इस नारद से कैसे सुलझें. बहरहाल उसे दिन भाग्य था और पंजीकरण कैसे हो गया यह अब मुझे भी याद नहीं है. उसके बाद  मेरा ब्लोग मैदान में आ गया. धीरे-धीर  समझ में आने लगा कि वह सब लोग मेरे को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे थे. उन्मुक्त जी के प्रयास तो बहुत प्रशंसनीय हैं. मैं इन सब लोगों का आभारी हूँ. </p>
<p>                     अंतर्जाल लिख्नते समय मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मेरे एक लेखक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति  (अंतर्जाल की पत्रिका)  का पता दिया था. वहाँ मुझे नारद दिखता था पर मैं उसे नहीं देखता था और  जब देखा तो भी मुझे उसमें रूचि नही जागी-इसका कारण यह भी था कि उसमें मुझे उस समय साहित्य जैसे विषय पर कुछ  लिखा गया नहीं लगा. एक बार मेरी नजर ब्लागस्पाट पर एक हिन्दी ब्लोग पर पढ़ गई. मैंने उसे पढा  तो आश्चर्य हुआ. उस  विषय में मेरी दिलचस्पी बहुत थी और उस लेखक ने जो लिखा उससे मैं बहुत  प्रभावित हुआ. उसने मुझे भी उसी तरह लिखने की प्रेरणा दी. अभिव्यक्ति को तो मैं अपनी रचनाएं भेज रहा था पर उस ब्लोग को मैं आज तक नहीं भूल पाया. उसकी विषय सामग्री मेरे दिमाग में आज तक है. मुझे उस लेखक का नाम याद नहीं है. मुझे उस समय अनुभव नहीं था उसके नीचे कमेंट देखता तो शायद कुछ याद रहता-उस समय  कमेंट लगाने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता.  हाँ, ऐसा लगता है कि उस ब्लोग  अपनी इन चारों  फोरम पर होना चाहिए. फुरसत में मैं इन फोरम पर उसका ब्लोग तलाशता हूँ. उसके बारे में कोई संकेत इसलिए नहीं दे सकता क्योंकि वह उस समय एक विवादास्पद  विषय पर लिखा गया था पर उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे मन को खुश कर दिया था. तब मुझे लगा कि इस  ब्लोग विधा को मैं अपने सृजन को लोगों तक पहुचा  सकता हूँ. उस ब्लोग लेखक ने जो व्यंग्य लिखा था वह कोई समाचार पत्र या पत्रिका शायद ही छापने का साहस कर सके और मुझे लगा कि यह विधा आगे आम आदमी को आपनी बात कहने के लिए बहुत योगदान  देने वाली है. मैं उस अज्ञात ब्लोग लेखक को कभी नहीं भूल सकता. </p>
<p>                             श्रीश शर्मा -(ईसवामी) का नाम यहाँ लेना जरूरी है इसलिए  लिख रहा हूँ. वह मेरे मित्र हैं और उनकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आती या मैं उनके अनुसार चल नहीं पाता  यह अलग बात है पर उस अज्ञात ब्लोग लेखक के बाद उनका नंबर भी याद रखने लायक है. जब मैंने अभिव्यक्ति पर नारद खोला तो उनका ब्लोग देखा(यह भी हो सकता है कोई उनका लेख हो) जिसमें उनका कंप्यूटर पर काम करते हुए फोटो था. मैं उस फोटो को देखने से  पहले ब्लोग  लिखने का फैसला कर चुका था और वहाँ  इसलिए गया था कि आगे कैसे बढूँ. उनका लिखा मेरे समझ में नहीं आया पर तय कर चुका था कि इस राह पर चलना ही है और मैं यह नहीं जानता था कि उनसे मेरी मित्रता होने वाली  है-उन्होने अभी मुझे गूगल ट्रांसलेटर टूल का पता  भेजा और मैं कह सकता हूँ कि उनकी यह पहली सलाह है जो काम आ रही है इससे पहले उनका बताया काम तो नहीं आता पर इस इस रास्ते पर अनुभव बढ़ता जाता था.एक बात जो मुझे प्रभावित करती थी कि उन्होने कोई बात पूछने पर उसका उत्तर अवश्य स