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	<title>movies-फ़िल्में &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/movies-फ़िल्में/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "movies-फ़िल्में"</description>
	<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 00:44:56 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[जोधा-अक़बर सिर्फ़ एक फिल्म है]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/?p=239</link>
<pubDate>Wed, 27 Feb 2008 01:37:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[अभी हाल ही में रिलीज़ हुई रितिक और ऐश्व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अभी हाल ही में रिलीज़ हुई रितिक और ऐश्वर्य की फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0449994/">जोधा अक़बर</a> को लेकर काफ़ी हल्ला हो चुका है। बहुतों का कहना है कि जोधा वास्तव में मुग़ल बादशाह अक़बर की शरीक-ए-हयात न थी वरन्‌ उनके साहिबज़ादे और अगले मुग़ल बादशाह जहाँगीर की बेग़म थी। और ये कुछ लोग इसलिए आशुतोष गोवारिकर से खफ़ा हैं कि खामखा पुत्रवधु को ससुर की लुगाई करार दिया जा रहा है और इतिहास की वाट लगाई जा रही है।</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jodhaa_Akbar"><img src="http://img167.imageshack.us/img167/6144/415pxjodhaaakbarpostertf4.jpg" border="0" /></a></p>
<p>मुझे यह सोच उन लोगों पर हंसी आ रही है कि खामखा अपना समय वे लोग एक बेकार के मुद्दे पर हल्ला कर व्यर्थ कर रहे हैं। फ़िल्में कब से सच्चाई का आईना हो गईं? अधिकतर फ़िल्में मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं और जोधा-अक़बर भी एक कमर्शियल फ़िल्म है जिसका उद्देश्य भी मनोरंजन ही है न कि लोगों का ज्ञानवर्धन करना। तो कुछ हल्ला मचाने वाले लोग यह कह रहे हैं कि जिस तरह जन्नतनशीन फिल्म निर्देशक के.आसिफ़ द्वारा बनाई गई दिलीप कुमार तथा मधुबाला की फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0054098/">मुग़ल-ए-आज़म</a> ने जोधा का अक़बर की बेग़म होने की भ्रांति फैलाई थी उसी प्रकार फ़िल्म जोधा-अक़बर भी उसी भ्रांति को कायम रखे है।</p>
<p>पर बात वही है कि फ़िल्में कब से सच्ची घटनाओं को जस-का-तस देखने का आईना हो गईं? जिन अत्यधिक पढ़े-लिखे महानुभावों को यह पता है कि जोधा वास्तव में अक़बर की बेग़म न होकर जहाँगीर की बीवी थी उन पढ़े-लिखे महानुभावों को यह न दिखा कि फ़िल्म जोधा-अक़बर के आरंभ में कथा बाँचते हुए अमिताभ बच्चन कहते हैं:</p>
<blockquote><p>
हिन्दुस्तान.....<br />
इतिहास गवाह है कि इस ज़मीन पर खून की खुराक से ही सल्तनतें पनपती रही हैं। सन्‌ 1011 से कितनों ने ही वक्त-२ इसे लूटकर इस फूल को अपने कदमों तले रौंदा है। और फिर..... <strong>सन्‌ 1450 में कदम रखा मुग़लों ने</strong>; जिन्होंने इसे अपना घर बनाया, इसे प्यार दिया और इसे नवाज़ा। <strong>बादशाह बाबर से शुरु हुई मुग़लिया हुकूमत</strong> हुमायूँ से होती हुई अक़बर तक पहुँची जिसे मुग़लिया दौर में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हुआ।
</p></blockquote>
<p>फ़िल्म वालों की तो क्या कहें पर इन पढ़े-लिखे विद्वानों और इतिहासकारों पर अवश्य आश्चर्य हो रहा है कि इन्होंने इस बात पर हल्ला नहीं मचाया कि फ़िल्म में कहा गया है कि मुग़ल सन्‌ 1450 में आए थे। अब यह तो फ़िल्म में सही कहा गया है कि मुग़लिया सल्तनत की नींव बादशाह बाबर ने रखी थी पर यह मुझे समझ नहीं आता कि मुग़ल सन्‌ 1450 में भारत कैसे आ गए थे क्योंकि मुग़ल सल्तनत की नींव बाबर ने सन्‌ 1504 के आसपास रखी थी जब उसने काबुल और खोरासन के पूर्वी भागों और सिंध पर कब्ज़ा किया था। और तो और, उसे छोड़िए, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Babur">बाबर</a> का जन्म सन्‌ 1483 में हुआ था तो वह कैसे सन्‌ 1450 में भारत आकर मुग़लिया सल्तनत की शुरुआत कर सका यह वाकई चर्चा का विषय है। क्या कोई समय में यात्रा कर सकने वाला उपकरण उस काल में मौजूद था या भविष्य से कोई वहाँ जाएगा यह करने के लिए? ;)</p>
<p>फ़िल्म में यह बात तो सही दिखाई है कि सन्‌ 1555 में बादशाह हुमायूँ की अकस्मात मृत्यु से लफ़ड़ा हो गया था और हेमचन्द्र विक्रमादित्य भार्गव उर्फ़ हेमु ने दिल्ली और आगरा पर अपना कब्ज़ा जमा अपने को सम्राट घोषित कर दिया था और फिर बैरम खाँ की कमान में चलती फौज ने पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमु की अपने से दोगुणी फ़ौज से लोहा लिया था और हेमु आँख में तीर लगने से ज़ख्मी हो गिर पड़ा था जिसका बैरम खाँ ने तब सिर कलम कर दिया था जब अक़बर ने ऐसा करने से मना किया था। यानि कि पूर्णतया झूठ नहीं दिखाया है फ़िल्म में, कुछ-२ जगह पर सही इतिहास फ़िल्माया गया है।</p>
<p>पर बात यह नहीं है कि क्या सही फ़िल्माया है, बात यह है कि इन हल्ला करने वाले विद्वानों को सन्‌ 1450 वाली त्रुटि क्यों न दिखी? जोधा का अक़बर की बीवी न होने का गूढ़ राज़ मालूम है जो कि अभी भी विवादास्पद है क्योंकि इस बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं पर तारीख का नहीं मालूम जिसके बारे में पक्के ठोस प्रमाण हैं और जो दर्ज इतिहास है?</p>
<p>ज़ाती तौर पर मेरा मानना है कि फ़िल्म मनोरंजन के लिए होती हैं, इतनी टेन्शन न ही लो तो बेहतर होता है। तकरीबन दो वर्ष पहले आई हॉलीवुड की फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0416449/">300</a> का ही उदाहरण लें जो कि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Thermopylae">थरमॉपली की प्रसिद्ध लड़ाई</a> पर बनी थी जिसमें कथित 300 स्पॉर्टा के सैनिकों ने हज़ारों-लाखों की पर्शिया की फौज से लोहा लिया था, परन्तु उसमें दिखाया गया कि अंत में सिर्फ़ स्पॉर्टा के ही सैनिक रह गए जो मारे गए परंतु इतिहास तो कुछ और ही कहता है। दर्ज इतिहास के अनुसार उन 300 स्पॉर्टा के सैनिकों के साथ तकरीबन 700 थेस्पिया के सैनिकों ने भी अंत तक ज़र्कसीस की सागर सी विशाल फौज से लोहा लेते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। तो इस बारंबार दोहराए जाने वाले गूफ़-अप(Goof Up) को क्या कहेंगे कि जब भी थरमॉपली की प्रसिद्ध लड़ाई का ज़िक्र आता है तो सिर्फ़ उन 300 स्पॉर्टा के सैनिकों तथा उनके राजा लियोनाईडस की वाह वाही होती है जबकि उनके साथ आखिरी साँस तक लड़ते हुए शहीद हुए 700 गुमनाम थेस्पियन सैनिक अपने हिस्से की वाह-वाही से वंचित रह जाते हैं!!</p>
<p>तो बात यह भी नहीं है कि फ़िल्म जोधा-अक़बर में बताई गई गलत तारीख को हल्ला करने वाले इतिहास के विद्वानों ने अनदेखा कर दिया; बात यह है कि फ़िल्म को फ़िल्म की तरह ही लो यानि कि काल्पनिक कहानी के रूप में। यदि यह कहा जाता है कि फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर बनी है और फिर उसमें कोई बात गलत दिखाई जाती है तो उसका विरोध लाज़मी है।</p>
<p>और जो हल्ला करने वाले लोग यह कहते हैं कि इस तरह की गलतियों से लोगों को गलत ज्ञान मिलता है तो भई जो व्यक्ति ठोस दर्ज किताबी ज्ञान लेने की जगह फ़िल्म देख यह ज्ञान लेता है कि अक़बर कब बादशाह बना और उसकी बीवी का क्या नाम था तो उस व्यक्ति और उसकी बुद्धि पर तरस ही आ सकता है!! ;)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चक दे ..... हो चक दे इंडिया ......]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/08/10/chak-de-india/</link>
<pubDate>Fri, 10 Aug 2007 01:37:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/08/10/chak-de-india/</guid>
<description><![CDATA[चक‌ दे इंडिया के प्रोमो आदि टीवी पर का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><em>चक‌ दे इंडिया</em> के प्रोमो आदि टीवी पर काफ़ी समय से आ रहे हैं, न्यूज़ चैनलों और बॉलीवुड के खबरी कार्यक्रमों में भी इसकी काफ़ी चर्चा है, कुल मिला के इस फिल्म से काफ़ी आशाएँ रखी जा रही हैं, आखिर किंग खान की फिल्म है जिसमें वो (मेरी जानकारी अनुसार) दूसरी बार किसी खेल टीम के कोच के रूप में नज़र आएँगे। इससे पहले वह अपनी एक शुरुआती फिल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0126234/" target="_blank"><em>चमत्कार</em></a>, जो कि 1992 में रिलीज़ हुई थी, में एक कॉलेज की क्रिकेट टीम के लल्लू कोच के रूप में नज़र आए थे जिसमें उनका साथ दिया था भूत बने नसीरुद्दीन शाह ने। उस समय तो कोच की लाज भूत बादशाह ने मैच जीत के बचा ली थी, लेकिन इस बार कौन बचाएगा? ;)</p>
<p>अभी तक <em>चक दे इंडिया</em> के जो ट्रेलर आदि देखे हैं, उससे फिल्म की कहानी का कुछ-२ अंदाज़ा हो गया है। पिछले साल, 2006 में, हॉलीवुड की एक फिल्म आई थी, <a href="http://www.imdb.com/title/tt0385726/" target="_blank"><em>ग्लोरी रोड</em></a> (Glory Road) जो कि अमेरिकी कॉलेज टेक्सस वेस्टर्न(Texas Western) की बास्केटबॉल टीम के कोच <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Don_Haskins" target="_blank">डॉन हैस्किन्स</a> की वास्तविक ज़िन्दगी के उस हिस्से पर बनी थी जब वो टेक्सस वेस्टर्न के कोच बने थे। टेक्सस वेस्टर्न कॉलेज बास्केटबॉल लीग में बहुत पिछड़ी हुई टीम थी जिसके लिए कोई अच्छा खिलाड़ी खेलना नहीं चाहता था। यह वह दौर था जब सिर्फ़ गोरे प्रोफ़ेशनली खेलते थे, काले नीग्रो खिलाड़ियों को कोई नहीं लेता था और यदि लेता था तो एकाध ही होता था एक टीम में और वह भी रिज़र्व। डॉन हैस्किन्स को जब कोच बनाया गया तो कॉलेज के प्रधानाचार्य ने खिलाड़ियों को सिर्फ़ छात्रवृत्ति(scholarship) दे सकने में ही समर्थता जताई थी, लेकिन कोई भी अच्छा गोरा खिलाड़ी इस टीम के लिए खेलने को तैयार नहीं था। चिढ़कर डॉन हैस्किन्स ने रीति के विरुद्ध जाते हुए देश भर में से बढ़िया खेलने वाले नीग्रो खिलाड़ियों को टीम में लिया, ऐसे खिलाड़ी जो सबसे बेहतरीन खेलते थे लेकिन उनके काले रंग के कारण उनको कोई अपनी टीम में नहीं लिए हुए था। सब ने इस टीम का मज़ाक उड़ाया और एक्सपर्ट्स(experts) ने पहले से ही कह दिया कि डॉन का यह प्रयोग जल्द ही अपने मुँह पर गिर असफ़ल हो जाएगा। लेकिन उन सबके मुँह पर ज़ोरदार तमाचा तब पड़ा जब इस टीम ने खेलना आरंभ किया, कोई टीम इसके आगे टिक नहीं सकी और 17 मैच लगातार जीतकर लीग में चौथा स्थान हासिल किया और उसके बाद इक्कीस मैच जीत और सिर्फ़ एक मैच हारकर इस टीम ने NCAA में तीसरे स्थान पर प्रवेश किया था। 1966 के ऐतिहासिक फाइनल में इसका सामना हुआ था उस समय की मौजूदा नंबर एक और चैम्पियन टीम केन्टकी विश्वविद्यालय(University of Kentucky) से जिसके कोच <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Adolph_Rupp" target="_blank">अडोल्फ रुप्प</a> को शताब्दी का कोच(coach of the century) कहा जा रहा था। उस फाइनल में डॉन हैस्किन्स ने पहले पाँच खिलाड़ी जो कोर्ट में उतारे वो सभी नीग्रो थे, चैम्पियनशिप इतिहास में यह पहली बार हुआ था। कड़े मुकाबले के बाद आखिरकार डॉन हैस्किन्स की टेक्सस वेस्टर्न माइनर्स ने केन्टकी विश्वविद्यालय को धूल चटाई थी और टेक्सस वेस्टर्न की इस टीम ने वह साल 28 जीत और 1 हार के रिकॉर्ड पर समाप्त किया था। यह फाइनल मैच विश्व खेल इतिहास में one of the biggest upsets के तौर पर दर्ज हुआ और इस वर्ष सितंबर में 1966 की इस टीम को <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Naismith_Memorial_Basketball_Hall_of_Fame" target="_blank">नाएस्मिथ मेमोरिअल बास्केटबॉल हॉल ऑफ़ द फेम</a>(Naismith Memorial Basketball Hall of Fame) में शामिल किया जाएगा। कोच हैस्किन्स को इसी हॉल ऑफ़ फेम मे 1997 में बतौर कोच शामिल किया गया।</p>
<p>तो कहने का अर्थ यह है कि <em>चक‌ दे इंडिया</em> मुझे तो <em>ग्लोरी रोड</em> से ही प्रभावित लग रही है, क्या यह भी एक और हॉलीवुड इंस्पायर्ड फिल्म होने वाली है!! अब कहीं से भी इंस्पायर्ड हो इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि फिल्म अच्छी होती है तो मुझे पसंद आती है, चाहे वह रीमेक(remake) हो या किसी फिल्म से प्रभावित हो। तो प्रश्न अब यह है कि <a href="http://www.imdb.com/name/nm0524197/" target="_blank">जोश लूकस</a> ने डॉन हैस्किन्स की जो शानदार भूमिका निभाई थी, क्या शाहरुख इस देसी फिल्म में जानदार भूमिका निभा सकेंगे? कोच का किरदार रोमांटिक हीरो के किरदार से अलग होता है, इसलिए अलग तरह के अभिनय की दरकार होगी। सुना है कि आज यह फिल्म रिलीज़ हो रही है, तो अब तो यह फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि शाहरुख है कि नहीं!! ;)</p>
<p>वैसे मैं <em>ग्लोरी रोड</em> देखने का सुझाव अवश्य दूँगा, बहुत अच्छी फिल्म है और मेरी पसंदीदा फिल्मों की सूचि में इसने जगह बना ली है। :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दुनिया के अंतिम छोर पर .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/03/21/at-worlds-end/</link>
<pubDate>Wed, 21 Mar 2007 15:29:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/03/21/at-worlds-end/</guid>
<description><![CDATA[आहा, अभी पिछले दिसम्बर मैंने &#8220;पॉयरेट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आहा, अभी पिछले दिसम्बर मैंने "<a href="/2006/12/12/pirates-of-the-caribbean/">पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - डैड मैन्स चैस्ट</a>" (कैरिबियन के समुद्री डाकू - मुर्दे का संदूक) के बारे में बताया था कि वह कितनी सही फ़िल्म थी। और साथ ही यह भी बताया था कि इस शृंखला की अंतिम फ़िल्म "<a href="http://www.imdb.com/title/tt0449088/" target="_blank">पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - ऐट वर्ल्ड्स एन्ड</a>" (कैरिबियन के समुद्री डाकू - दुनिया के अंतिम छोर पर) से कितनी आशाएँ हैं, फ़िल्म का जबरदस्त होना तय सा है जो कि किसी भी शृंखला की अंतिम फ़िल्म को होना चाहिए। यह अंतिम फ़िल्म इस वर्ष 25 मई को रिलीज़ हो रही है और इसका ट्रेलर मैंने अभी-२ देखा है, वाकई बहुत सही लग रिया है। :D आप भी देखें।</p>
<p><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/yoh5AQo-8Lc'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/yoh5AQo-8Lc&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span></p>
<p>कैसा लगा? झकास दिखे है कि नहीं? ;)</p>
<p>फ़िल्म के बारे में अधिक मसाले के लिए इसकी साइट पर <a href="http://disney.go.com/disneypictures/pirates/atworldsend/" target="_blank">यहाँ देखें</a>।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैरिबियन के समुद्री डाकू.....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2006/12/12/pirates-of-the-caribbean/</link>
<pubDate>Mon, 11 Dec 2006 22:08:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2006/12/12/pirates-of-the-caribbean/</guid>
<description><![CDATA[&#8220;पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - द कर्स ऑफ़ द ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>"<a href="http://www.imdb.com/title/tt0325980/" target="_blank">पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - द कर्स ऑफ़ द ब्लैक पर्ल</a>" (कैरिबियन के समुद्री डाकू - काले मोती का शाप) फ़िल्म जब आई थी तब देखी थी, फ़िल्म उस समय आने वाली फ़िल्मों से थोड़ा अलग हटकर थी, सही भी थी। लेकिन उसके अगले भाग की आशा नहीं थी। परन्तु उसका अगला भाग "<a href="http://www.imdb.com/title/tt0383574/" target="_blank">पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - डैड मैन्स चैस्ट</a>" (कैरिबियन के समुद्री डाकू - मुर्दे का संदूक) कुछ महीने पूर्व रिलीज हो गया और सुना लोगों ने इस फ़िल्म को भी पसंद किया। अब उस समय मैं फ़िल्म देखने नहीं जा सका, तो अभी हाल ही में जब इसकी सीडी बाज़ार में आई मैंने तुरंत खरीद ली। परन्तु व्यस्तता के चलते उसे भी उसी समय नहीं देख पाया। परन्तु आज जब कंप्यूटर में <a href="http://tinyurl.com/fdwgv" target="_blank">क्रिएटिव का साउंड कार्ड</a> लग गया तो सोचा कि आज देख ही डालते हैं, नए लिए <a href="http://tinyurl.com/rx5hb" target="_blank">क्रिएटिव के 4.1 स्पीकर सिस्टम</a> पर आवाज़ भी जबरदस्त आएगी। :D</p>
<p>फ़िल्म जब आरम्भ हुई तो पिछले भाग की तरह करीब एक-तिहाई भाग तो धीमा सा लगा लेकिन उसके बाद के दो-तिहाई भाग को तो एक रोलर कोस्टर की सवारी कह सकते हैं। बढ़िया लोकेशनों पर हुई शूटिंग और हान्स ज़िम्मर द्वारा रचित शानदार साउंडट्रैक ने फ़िल्म में जान फूँक दी। जॉनी डैप ने पूरी फ़िल्म में अपना किरदार सही ढंग से अदा किया, कैप्टेन जैक स्पैरो पूरी मौज में लगे। "लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स", "ट्रॉय" तथा "किंगडम ऑफ़ हेवन" के बाद ऑर्लेन्डो ब्लूम ने इस फ़िल्म में भी अच्छा अभिनय किया है, विल टर्नर की अदाकारी पिछले भाग से अधिक बढ़िया थी। कीरा नाइटली का इस फ़िल्म में भी कोई खास किरदार नहीं सिवाय एक दो दृश्यों के जहाँ उसके किरदार में दम लगा, अन्यथा पूरी फ़िल्म में जैक स्पैरो और विल टर्नर हावी रहे हैं। लेकिन इस फ़िल्म में एलिज़ाबैथ(कीरा नाइटली) एक ऐसा कार्य करती है जो बहुतों को अजीब या गलत लगेगा, उसकी उस हरकत के कारण जैक को कुछ हो जाता है ..... शायद वह मर जाता है। लेकिन इसी से अगले भाग की भूमिका रचती है, तो अब अनुमान लगा सकते हैं कि अगले वर्ष अगले भाग, "<a href="http://www.imdb.com/title/tt0449088/" target="_blank">पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - ऐट वर्ल्ड्स एन्ड</a>" (कैरिबियन के समुद्री डाकू - दुनिया के अंतिम छोर पर) जो कि कदाचित कड़ी की आखिरी फ़िल्म होगी, में क्या देखने को मिलेगा!! ;)</p>
<p>यदि रेटिंग के लिए बोला जाए तो इस फ़िल्म को मैं 5 में से 4.5 अंक दूँगा। कहानी कोई बहुत निराली नहीं है, देखने वालों को यह पता चल ही जाएगा जिन्होंने बचपन में राक्षस और तोते में कैद उसकी जान की कहानियाँ पढ़ी/सुनी हैं, लेकिन उस कहानी को किस तरह से फ़िल्माया गया है, किस तरह की जगहों पर फ़िल्माया गया है, किरदारों ने अपनी भूमिका कैसी निभाई है, यही वे चीज़ें हैं जो एक फ़िल्म को बढ़िया अथवा घटिया का तमगा दिलवाती हैं और मैं यही कहूँगा कि इस फ़िल्म ने निराश नहीं किया।</p>
<p>अगर अभी तक फ़िल्म नहीं देखी है तो जैसे ही मौका मिले देख लें, बढ़िया टाईमपास की पूरी गारंटी है(शर्तें लागू)। :) और अपन इंतज़ार में हैं इसके अगले भाग की!! ;)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कस्टर्ड जैसा जुआघर??]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2006/11/27/casino-royale/</link>
<pubDate>Mon, 27 Nov 2006 08:34:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2006/11/27/casino-royale/</guid>
<description><![CDATA[पहली बात, मैंने कस्टर्ड की बात क्यों क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पहली बात, मैंने कस्टर्ड की बात क्यों कही? अब ऐसा नहीं है कि मुझे हर समय खाने पीने की बात ही सूझती है, लेकिन वो ऐसा है कि "royale" शब्द का अर्थ जानने के लिए मैंने <a href="http://www.google.com/search?q=define%3A+royale" target="_blank">गूगल</a> से पूछा तो उत्तर मिला:</p>
<blockquote><p>a thin custard cooled and cut into decorative shapes. Used to garnish soups primarily.</p></blockquote>
<p>अब क्या करें, अपनी तो कोई गलती नहीं है ना इसमे!! ;)</p>
<p>बहरहाल, अब हुआ यूँ कि कल(रविवार) का पिरोगराम बनाया जेम्स बांड की नई फ़िल्म "कसीनो रोयाल"(<a href="http://www.sonypictures.com/movies/casinoroyale/" target="_blank">Casino Royale</a>) देखने का। टिकट पहले दिन ही PVR की वेबसाइट पर बुक करवा ली थी और सीटें भी बीचों बीच अपनी पसंद की चुन ली थीं। तो बस फ़िर क्या था, अपने मित्र को ले पहुँच गए क्नॉट प्लेस के पीवीआर रिवोली पर और काउन्टर पर बुकिंग का नंबर दे अपनी आरक्षित टिकटें हासिल की और सिनेमा में प्रवेश किया। समय से कुछ मिनट पहले पहुँच गए थे इसलिए कोई टेन्शन नहीं थी, हॉल के द्वार अभी खुले नहीं थे। कुछ मिनट प्रतीक्षा के बाद खुले और एक महिला अटेन्डेन्ट ने हमको हमारी सीटें दिखाई। कुछ मिनट और कुछ विज्ञापनों के बाद फ़िल्म भी आरंभ हो गई।</p>
<p>अब फ़िल्म का ट्रेलर देख मुझे लगा था कि शायद फ़िल्म बेकार होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। फ़िल्म में बांड परंपरा के विपरीत कोई चमत्कारी उपकरण आदि नहीं दिखाए हैं लेकिन उसके बावजूद फ़िल्म सही लगी। परंपरागत तरीके से, फ़िल्म की शुरुआत एक एक्शन से भरपूर दृश्य से होती है जब अपना नया और हट्टा-कट्टा बांड 40-50 मंज़िल उँची क्रेन और गर्डर आदि से छलांग लगाता है और इस प्रकार फ़िल्म सही चलती रहती है। जैसा कि बांड फ़िल्मों में अक्सर होता है, मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी सी हो जाती है, ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि आरम्भ लगभग हर बांड फ़िल्म का विस्फ़ोटक तरीके से होता है इसलिए मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी लगने लगती है।</p>
<p>लेकिन इस सब के बावजूद फ़िल्म बढ़िया है, खूबसूरत जगहों पर इसको फ़िल्माया गया है, संगीत  आदि भी सही है। फ़िल्म के अंत तक आते आते एक जबरदस्त ताश का खेल होता है एक शाही से जुआघर में जिसमें बांड को हर हाल में जीतना आवश्यक होता है नहीं तो 15 करोड़ डॉलर आतंकवादियों के हाथ चले जाएँगे!! और इस खेल के दौरान बांड लगभग मर जाता है क्योंकि उसे कोई ज़हर दे देता है!! ;)</p>
<p>खैर, फ़िल्म की कथा का तो मैं खुलासा नहीं करूँगा, क्योंकि यदि आपने नहीं देखी तो इसको देख अवश्य लीजिए। यदि आपको बांड की फ़िल्में अच्छी लगती हैं और इससे पहले आपने शॉन कॉनरी(पहला जेम्स बांड) या पियर्स ब्रॉसनैन(पिछला जेम्स बांड) की फ़िल्में देखी हैं तो इस फ़िल्म को देखने से पहले अपने मन में कोई आशाएँ आदि नहीं रखना। नए बांड डेनिएल क्रेग का प्रदर्शन औसत है, आने वाली फ़िल्मों में ही पता चलेगा कि इसमे कितना दम है।</p>
<p>फ़िल्म से बिना कोई आशा रखे उसे देखो तो वो बहुत अच्छी लगेगी। इसलिए कोई आशा नहीं रखी जाए और मौज ली जाए।</p>
<p>वैसे एक रोचक बात यह है कि सोनी पिक्चर की <a href="http://www.sonypictures.in/newsite/casinoroyale.asp" target="_blank">भारतीय साइट</a> पर इस फ़िल्म के भारत में आने की तारीख़ 15 दिसंबर की है, जबकि यहाँ यह फ़िल्म 17 नवंबर को रिलीज हुई जब सारे विश्व में हुई, तो क्या यहाँ के सिनेमा वालों के पास पाईरेटिड कापी है?? ;) साइट का रखरखाव करने वाले ऐसे आलसी और बेकार हैं कि सही जानकारी लिख नहीं सकते और गलत जानकारी को अपनी साइट पर ठीक भी नहीं कर सकते!!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कल से आज तक!!]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2006/03/19/from-tomorrow-till-today/</link>
<pubDate>Sat, 18 Mar 2006 22:43:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2006/03/19/from-tomorrow-till-today/</guid>
<description><![CDATA[फ़िल्में आदि सभी देखते हैं, कई दशकों से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फ़िल्में आदि सभी देखते हैं, कई दशकों से ये लोगों के मनोरंजन का सबसे अधिक लोकप्रिय माध्यम रहीं हैं। पर कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो सदाबहार होती हैं, जो बहुत अच्छी होती हैं, जिन्हें आप कितनी ही बार देख लें, पर जी नहीं भरता। हर किसी की कोई न कोई ऐसी फ़िल्म अवश्य होगी जो उसे बहुत पसंद होगी।</p>
<p>मैं अधिक फ़िल्में नहीं देखता, बस अभी पिछले कुछ महीनों में इतनी फ़िल्में देखी हैं जितनी उससे पहले जीवन में कभी नहीं देखी। इसका एक कारण यह भी है कि पढ़ाई समाप्त होने के कारण अपने समय के स्वयं मालिक हैं, चाहे जो वो करने की स्वतंत्रता है, होमवर्क आदि करने का कोई लफ़ड़ा नहीं है!! :D</p>
<p>और कुछ(निम्न) फ़िल्में मुझे भी इतनी पसन्द हैं कि उन्हें कई बार देख लेने के बाद भी मेरा मन नहीं भरता!!</p>
<ol>
<li><strong>गॉन विद द विन्ड</strong> - हॉलीवुड की यह क्लासिक फ़िल्म मुझे बहुत बढ़िया लगी। आरम्भ में कुछ बोरिन्ग अवश्य लगती है पर समझने का प्रयत्न किया जाए तो लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हुए अमरीकी गृह युद्ध की पृष्ठभूमि में स्थित इसकी कहानी अच्छी लगेगी और साथ ही अच्छा लगेगा ह्रेट बटलर का अभिनय। यह फ़िल्म ग्यारहवीं में मेरी अंग्रेज़ी की अध्यापिका ने पूरी कक्षा को दिखाई थी।</li>
<li><strong>चुपके चुपके</strong> - यह उन कुछ हिन्दी फ़िल्मों में से एक है जो मुझे बहुत पसंद हैं। इसमें जबरदस्त हास्य है, ओमप्रकाश जी की तो बात ही अलग है, धरमेन्द्र और अमिताभ ने भी जो अभिनय किया है, ऐसा मैंने फ़िर कभी नहीं देखा, असरानी साहब तो मात्र दर्शक बनें सब देखते ही रह गए!! :)</li>
<li><strong>स्टॉर वार्स</strong> - ६ फ़िल्मों की इस श्रृंखला का कोई जवाब नहीं, यह वाकई में लाजवाब है। कहानी इतनी ज़ोरदार नहीं है जितना ज़ोरदार अभिनय आदि है। इसकी आखिरी ३ फ़िल्में पहले आई थीं(१९७०-८० के दशकों में) और पहली की ३ फ़िल्में १९९० के बाद आईं हैं। अब जिन लोगों ने उन्हें इसी कड़ी में देखा उनकी तो नहीं जानता परन्तु मैंने इसे सही कड़ी में, यानि १-२-३-४-५-६ में ही देखा है और मुझे यह बहुत अच्छी लगी। असल कहानी तो इसमें यह है कि कैसे एक नायक खलनायक बन जाता है और फ़िर कैसे उसकी अंत में वापसी होती है। स्पेशल इफ़ेक्टस आदि को यदि नज़रअंदाज़ भी कर दें(बहुत कठिन है) तो भी जिस तरह से कलाकारों, अभिनय और कहानी ने समां बाँधा है, वह अद्वितीय है।</li>
<li><strong>जो जीता वोही सिकन्दर</strong> - १९९० के दशक में आई आमिर खान की यह फ़िल्म वाकई बहुत अच्छी है, यदि इसे समझने के भाव से देखा जाए। जिस तरह से इसमें एक लापरवाह, आवारा, मस्तमौला, असफ़ल लड़के को एक समझदार और ज़िम्मेदार व्यक्ति में तब्दील होते हुए और फ़िर सफ़ल होते हुए दिखाया गया है वह वाकई बहुत अच्छा है। ऐसी कोशिश बहुत सी फ़िल्मों में की गई है(हाल ही में रितिक रोशन की "लक्ष्य" इसी तर्ज पर बनी थी) पर मेरे अनुसार वो भाव जो आपको अंदर तक स्पर्श कर जाए, उसे प्रेषित करने में कदाचित् ही कोई सफ़ल हुआ है।</li>
<li><strong>द लीग़ आफ़ ऐक्सट्राआर्डिनरी जेन्टलमेन</strong> - सूपर हीरो प्रकार की फ़िल्म परन्तु बेकार या बोर नहीं, बहुत बढ़िया। शॉन कॉनरी तथा नसीरुद्दीन शॉह का अभिनय वाकई बहुत बढ़िया है।</li>
<li><strong>द हन्ट फ़ॉर रेड आक्टोबर</strong> - एक और शॉन कानरी की बेहतरीन फ़िल्म, बहुत ही बढ़िया साथ दिया ऐलेक बाल्डविन ने। शॉन एक रूसी अणु पन्डुब्बी के कप्तान होते हैं और शीत युद्ध के दौरान उस उच्च तकनीक की बनी आवाज़ रहित अणु पन्डुब्बी को लेकर चल देते हैं अमरीका से हाथ मिलाने। और फ़िर शुरू होता है चूहे बिल्ली का खेल जिसमें रूसी करते हैं उस पन्डुब्बी को डुबाने का और अमरीकी ऐजेन्ट ऐलेक बाल्डविन करते हैं प्रयास उसे बचाने का।</li>
<li><strong>ग्लैडिएटर</strong> - प्राचीन रोमन शासन और उस समय में होने वाले ग्लैडिएटरों के खूनी खेलों पर बनी यह फ़िल्म मेरी देखी गई अभी तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है। रस्सल क्रो ने जो अभिनय दिया है वह मैंने अभी तक की उनकी किसी फ़िल्म में नहीं देखा("अ ब्यूटिफ़ुल माईन्ड" में भी नहीं)। फ़िल्म की कहानी दिल को छू जाती है, कि कैसे एक सेनापति गुलाम बनता है, गुलाम से ग्लैडिएटर और ग्लैडिएटर से जनता का नायक जो कातिल बादशाह से अपने परिवार की निर्मम हत्या का प्रतिशोध लेता है।</li>
<li><strong>द मॉस्क आफ़ ज़ोरो</strong> - कैलीफ़ोर्निया(अमेरिका) की लोककथाओं का नायक और मज़लूमों का मसीहा ज़ोरो, उसकी भूमिका में ऐनटोनियो बान्देरास, साथ में हसीन कैथरीन ज़ेटा जोन्स और ऐन्थोनी हॉपकिन्स, बहुत ही बढ़िया फ़िल्म।</li>
<li><strong>मेन आफ़ आनर</strong> - क्यूबा गुडिन्ग जूनियर और रॉबर्ट डि नेरो के बेहतरीन अभिनय से सज्जित यह फ़िल्म प्रेरणा देने वाली है। कुछ लोगों को बेशक यह बोर लगे पर यह कभी न हारने की प्रेरणा देती है और एक वास्तविक जीवन के नायक पर आधारित है।</li>
<li><strong>ओम जय जगदीश</strong> - बॉक्स आफ़िस पर बेशक यह फ़िल्म न चली हो, पर अनुपम खेर द्वारा निर्देशित यह पहली फ़िल्म वाकई बहुत अच्छी है। फ़िल्म की कहानी ऐसी है जो दिल को छू जाती है, और इसमें फ़िल्म के मधुर संगीत तथा अनिल कपूर के बेहतरीन अभिनय का पूरा योगदान है।</li>
<li><strong>अशोक</strong> - मेरा मानना है कि बॉक्स आफ़िस पर किसी फ़िल्म का चलना न चलना उसकी गुणवत्ता का प्रमाण पत्र नहीं है, क्यों कि आवश्यक नहीं कि हर बार लोगों को फ़िल्म का भाव गहराई से समझ आ सके। २००० वर्ष से भी पूर्व पाटलीपुत्र से पूरे भारत पर राज्य करने वाले मौर्य वंश के सम्राट अशोक पर बनी इस फ़िल्म के मामले में भी ऐसा ही है। शाहरूख खान का अभिनय बेशक उनका सर्वश्रेष्ठ न रहा हो, परन्तु फ़िल्म में कोई कमी नहीं छोड़ी। अनु मलिक के दिए मधुर संगीत से लेकर फ़िल्म की मार्मिक कहानी तक, सभी कुछ उत्तम श्रेणी का है।</li>
<li><strong>द लॉर्ड आफ़ द रिंग्स</strong> - ३ फ़िल्मों की यह श्रृंखला जबरदस्त है, प्रत्येक फ़िल्म अपने जीते हुए आस्कर की वाजिब हकदार है। निर्देशक पीटर जैकसन ने जिस तरह इस कहानी को परदे पर साकार किया है वह प्रशंसनीय है। काफ़ी कटी होने के बावजूद कहानी बंधी हुई लगती है, समां बंधा रहता है, लगता ही नहीं कि कहीं से कहानी कटी हुई है(शायद "हैरी पॉटर" बनाने वालों कुछ सीख की आवश्यकता है)। विग्गो मोर्टेन्सन और आयन मैककैलन का अभिनय बहुत अच्छा है, ओर्लैन्डों ब्लूम ने भी बहुत अच्छा अभिनय किया है। इन फ़िल्मों के बारें में कोई क्या कहे, इनके बारें में जानने के किए शब्द कम हैं, देख कर ही जाना जा सकता है कि क्या बात हो रही है। :)</li>
<li><strong>किन्ग आर्थर</strong> - लगभग १६०० वर्ष पूर्व के अंग्रेज़ी लोककथाओं के नायक पर बनी यह फ़िल्म बेशक आस्करों की होड़ में शामिल न हुई हो, पर मेरे अनुसार यह बहुत अच्छी फ़िल्म है, इसको मैं कितनी ही बार देख चुका हूँ, पर जी नहीं भरा है।</li>
<li><strong>बैटमैन बिगिन्स</strong> - मेरी अभी तक की देखी सभी बैटमैन फ़िल्मों में सबसे बढ़िया यही है। इससे पहले आई जार्ज क्लूनी की बैटमैन फ़िल्में इसके सामने कुछ नहीं लगती। क्रिस्चियन बेल का अभिनय शानदार है, और उतनी ही बढ़िया संगत की है लिआम नीसन ने अपने बेहतरीन अभिनय से। कहानी तो बढ़िया है ही, हांस ज़िम्मर का पार्श्व संगीत अद्वितीय है।</li>
<li><a href="/2006/01/31/the-chronicles-of-narnia/"><strong>द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया</strong></a> - हाल ही में आई इस फ़िल्म के बारें में कुछ पढ़ने से अच्छा है कि आप इसे देख ही लें, क्योंकि इस फ़िल्म के बारे में शब्दों में कुछ कहना बहुत कठिन है और वह इसके साथ पूर्ण न्याय भी न होगा। :)</li>
</ol>
<p>फ़िल्में तो रोज़ ही बनती रहती हैं पर ऐसी फ़िल्में जो आपको अन्दर तक छू जाएँ कभी कभी ही बनती हैं। कुछेक फ़िल्में और भी हैं जो मुझे बेहद पसन्द हैं, पर क्योंकि अब मुझे नीन्द आ रही है(सुबह के ४ बजे हैं), इसलिए मैं उन फ़िल्मों को "फ़िर कभी" के लिए छोड़ देता हूँ। ;)</p>
<p>मैं यह सोचता हूँ कि यदि आपने इन फ़िल्मों में से कोई भी नहीं देखी तो आपने कोई अच्छी फ़िल्म देखी ही नहीं है। ;) तो जो फ़िल्म नहीं देखी है उसे शीघ्र ही देख अपने आप को कृतार्थ करें। :)</p>
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<title><![CDATA[शेर, जादूगरनी और अलमारी!!]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2006/01/25/lion-witch-wardrobe/</link>
<pubDate>Tue, 24 Jan 2006 18:55:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[नहीं, न ही मैं पागल हो गया हूँ न ही मैं क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नहीं, न ही मैं पागल हो गया हूँ न ही मैं कोई कहानी नहीं लिख रहा हूँ, अलबत्ता कहानी के बारे में बता अवश्य रहा हूँ!! और कहानी वो जोकि अब फ़िल्म बनकर आ रही है(वैसे तो पिछले दिसम्बर में ही आ चुकी है परन्तु यहाँ भारत में 26 जनवरी को सिनेमा में लग रही है)। मैं बात कर रहा हूँ वाल्ट डिज़नी द्वारा प्रस्तुत, सी.एस.लुईस के लिखे उपन्यास पर बनी फ़िल्म "<a href="http://disney.go.com/disneypictures/narnia/" target="_blank">द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया - द लायन, द विच एण्ड द वार्डरोब</a>" की, जो कि एक फ़ैन्टसी फ़िल्म है!!</p>
<p>फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह से है। सन् 1940 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की लड़ाई लड़ी जा रही थी जब लुफ़्तवाफ़े(नाज़ी हवाई सेना) ब्रिटेन पर बमबारी कर रही थी, क्योंकि हिटलर ने लंदन को मिटा देने की ठानी थी। तो इस समय कई लोग लंदन छोड़ कर दूर छोटे शहरों और गांवो की ओर जा रहे थे। एक माँ भी अपने चार बच्चों को ऐसे ही लंदन से दूर भेज देती है। जिस घर में वे चार बच्चे पहुँचते हैं, वहाँ उन्हें एक अलमारी मिलती है जिसमें से एक दूसरी दुनिया की ओर जाने का रास्ता है, जिसका नाम है <strong>नारनिया</strong>!! वह दुनिया जादुई है, वहाँ जानवर बोल सकते हैं और वहाँ कई किंवदन्तियों में प्रसिद्ध काल्पनिक जीव भी हैं जैसे साईक्लोप्स, सेन्टॉर इत्यादि। पर वहाँ कोई मनुष्य नहीं है, क्योंकि वहाँ सफ़ेद जादूगरनी का राज है जिसने नारनिया को अनंत शीतकाल में जकड़ रखा है और भविष्यवाणी थी कि आदम के दो बेटे और ईव की दो बेटियाँ(चार मनुष्य, दो लड़के और दो लड़कियाँ) वहाँ आएँगे और उस सफ़ेद जादूगरनी को हरा कर उस शीत ॠतु को समाप्त करेंगे, और वहाँ का असली राजा असलान(एक शेर) पुनः वहाँ राज करेगा।</p>
<p>कहानी कुछ ज़ोरदार लग रही है और उत्सुकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि मैंने यह उपन्यास नहीं पढ़ा!! नारनिया केवल इस एक उपन्यास में ही सीमित नहीं है, इसकी कहानी कुछ अन्य उपन्यासों में भी फ़ैली हुई है, तो आशा कर सकते हैं कि शायद वाल्ट डिज़नी इस पर और भी फ़िल्में बनाए।</p>
<p><a href="http://adisney.go.com/disneypictures/narnia/behind_the_magic.html?movie=trailer&#38;size=QTlarge&#38;clip_title=Theatrical%20Trailer" target="_blank">फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ उपलब्ध है</a>, और इसे देखकर आपका मन भी अवश्य इसको पूरी देखने का करेगा। ट्रेलर देखकर मैं तो कुछ बेचैन सा हो उठा हूँ, जैसा कि हर बार होता है जब मैं किसी चीज़ को लेकर बहुत उत्साहित(और बेसब्र) होता हूँ और मुझे वह चीज़ मिलने से पहले थोड़ी प्रतीक्षा करनी होती है, अब से पहले आखिरी बार मैं "ट्राय" के लिए ऐसा उत्साहित था। (बेसब्री से)प्रतीक्षा है केवल 26 जनवरी की, जब यह भारतीय सिनेमाघरों में लग रही है। :)</p>
<p>ट्रेलर देखकर और फ़िल्म(तथा कहानी) के बारे में पढ़कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि इसके चलने के आसार तो हैं, परन्तु रिलीज़ का समय सही नहीं लगता, क्योंकि यह फ़िल्म बच्चों को अधिक आकर्षित करेगी, और यह समय स्कूलों में पढ़ाई और वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी का है, साथ ही दसवीं और बारहवीं के छात्र भी अपनी बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। यदि यह फ़िल्म पिछले दिसंबर में ही यहाँ भी रिलीज़ हो जाती तो इसके अच्छा व्यापार करने के अधिक आसार थे। पर कुछ कहा नहीं जा सकता, चलने को फ़िल्म अभी भी चल सकती है।</p>
<p>यह फ़िल्म चले या न चले, परन्तु काफ़ी अच्छी होगी इसमें मुझे कोई शक नहीं। यदि आप यह पढ़ रहे हैं और यदि अभीतक यह फ़िल्म नहीं देखी है तो देखने अवश्य जाएँ, समय बर्बाद नहीं होगा यह मेरा विश्वास है। :)</p>
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