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	<title>mastram &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/mastram/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "mastram"</description>
	<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 22:03:43 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[भीड़ की भेड़ नहीं शेर बनो-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 17:17:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि को]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भीड़ में सबको भेड़ की तरह<br />
हांकने कि कोशिश में हैं सब<br />
चलते जाते हैं आगे ही आगे<br />
सीना तानकर अपना चलते<br />
पर कोई शेर आ जाये सामने<br />
तो कायरता का भाव उनमें जागे </p>
<p>भेड़ों की तरह भीड़ में चलते<br />
अब में थक गया हूँ<br />
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी<br />
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं<br />
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे<br />
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह<br />
जो कभी सामने नहीं आते<br />
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते<br />
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं भागे-भागे </p>
<p>मन नहीं चाहता किसी को<br />
अपने पंजों से आहत करूं<br />
पर फिर सोचता हूँ कि<br />
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ<br />
चल पडा हूँ<br />
जिन्दगी की उस दौर में<br />
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे<br />
------------------------------------------<br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साहब क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द-हिन्दी क्षणिकाएँ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=455</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 16:58:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=455</guid>
<description><![CDATA[साहब जैसी जिंदगी जीने का
सपना लिये निक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>साहब जैसी जिंदगी जीने का<br />
सपना लिये निकलते हैं सब<br />
किताबें-दर-किताबें पढ़ते जाते<br />
अपना पसीना बहाते हुए<br />
कागजों के ढेर के ढेर रंगते जाते<br />
फिर नौकरी पाने की कतार में<br />
बड़ी उम्मीद के साथ खडे हो जाते<br />
पता ही नहीं चलता गुलाम बन जाते कब<br />
.........................................................</p>
<p>साहब क्या जाने गुलाम का दर्द<br />
उनको मालुम रहते अपने हक<br />
याद नहीं रहते फर्ज<br />
उनका किया सब जायज<br />
क्योंकि एक ढूंढो हजार लोग<br />
गुलामी के लिये मिल जातें<br />
साहब बनने की दौड़ में<br />
भला कितने दौड़ पाते<br />
साहब तो टपकते हैं आकाश से<br />
क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द<br />
................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मस्तराम के नाम से असत् साहित्य की  लोकप्रियता से हिंदी को लाभ नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=457</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 15:24:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=457</guid>
<description><![CDATA[मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अंतर्जाल पर मस्तराम के नाम से कई लोग लिख रहे हैं यह अलग बात है हर कोई अपने साथ अपना नाम या अपना तख्ल्लुस जोड़ देता है।<br />
मैंने एक बार अपने एक ब्लाग में नाम के साथ ही मस्तराम भी जोड़ दिया। वह मेरा एक फालतू ब्लाग था और गूगल के इंडिक टूल मिलने से पहले उस पर लिखकर वहां से कापी कर दूसरे ब्लाग पर पोस्ट करता था। इस दौरान ब्लाग लेखक मित्रों ने विकिपीडिया का हिंदी टूल दिया। उससे कुछ दिन लिखा तो कंप्यूटर खराब हो गया क्योंकि वह पहले ही वाइरस ग्रस्त था। बाद में जब उसका हिंदी टूल लोड किया तो वह अधिक हिंदीमय हो गया था और इसलिये फिर अपने ब्लाग पर ही लिखने लगा। गूगल का इंडिक टूल आने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही इसलिये मेरे कम से कम चार फालतू ब्लाग ऐसे ही रह गये।  इनमे एक पर उठाकर मस्तराम लिखा और उस पर अपनी रचनाओं पर लेबल लगाने लगा साथ ही कुछ इधर उधर से पोस्ट रखने लगा। </p>
<p>हैरानी की बात यह रही वह मस्तराम नाम धारी ब्लागों में वह हिट पाने लगा। इसी बीच मैंने एक ब्लाग पर मस्तराम के बारे में पढ़ा। पता लगा कि मस्तराम ‘आवारा’ के नाम से  हिंदी फोरमों पर जो दो पंजीकृत ब्लाग हैं का नाम भी उनमें शुमार है और उन्होंने इस संबंध में विवाद उठा जो बाद में शांत हो गया। तब मेरी दिलचस्पी इसमें जागी। इसके बाद मैंने अपने मस्तराम के नामधारी ब्लाग की जांच की तो पाया कि चिट्ठाजगत ने उनको अपने यहां रख कर दिखाना शुरू किया। उनमें मेरा वास्तविक नाम था इसलिये चिट्ठाजगत वालों को यह पता था कि यह किसके ब्लाग हैं। उन्होनें मेरे ब्लाग स्पाट के एक और वर्डप्रेस के दो ब्लाग इस तरह मुझसे पूछे  बिना रख लिये। चूंकि मैं उनको प्रयोग पर जारी रखे हुए हूं और उन पर कोई नयी पोस्ट नहीं रखता पर जो भी रखता हूं वह चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर चला जाता है। इसलिये मैंने उनके नाम से मस्तराम हटा लिया पर उसके बाद अन्य ब्लाग पर लिखा। आज पता लगा कि वह भी चिट्ठाजगत वालों ने ले लिया। </p>
<p>मस्तराम अंतर्जाल पर बिना किसी सहायता के हिट पाने का एक उपाय है पर लोग उस पर कोई साहित्य पढ़ने नहीं आते। ऐसा लगता है कि गूगल से जुड़े या अन्य पुराने ब्लाग लेखकों ने अंतर्जाल पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिये मस्तराम के नाम से लिखना शुरू किया। गूगल के तो विज्ञापनों में ही इतनी गंदी गालियां लिखी हुईं हैं कि उन्हें यहां कोई लिखना ही नहीं चाहेगा। एक ब्लाग लेखक ने यौन साहित्य लिखा उसमेंं कुछ अश्लील नहीं था पर उसके अनुसार  उसके ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है और किसी ने गूगल को इसकी शिकायत की है उसका यह परिणाम है। मैंने उसे समझाया कि उसकी ब्लाग स्पाट की सैटिंग में गड़बड़ी है वह उसे चेक कर ले। मैंने अपने ब्लागस्पाट के एक ब्लाग पर वह कर देखा था जिससे वह चेतावनी अपने आप आने लगती है। मैंने उसे यह भी लिखा कि उसका ब्लाग क्या किसी का भी ब्लाग गूगल केवल इस कारण बैन नहीं कर सकता क्योंकि उसके विज्ञापनों के शीर्षकों में ऐसी गालियां हैं कि उन्हें कोई सामान्य हिंदी ब्लागर अपने अंदर पाठ में भी नहीं लिख सकता। </p>
<p>मस्तराम कोई असली नाम नहीं हैं और कई छद्म नाम के लोग इस पर लिख रहे हैं। हिंदी का कोई फोरम कभी भी उनको अपने यहां नहीं लिंक देता क्योंकि उनको अपनी श्वेत छबि बनाये रखने के लिये उससे दूर रहना ही श्रेयस्कर लगता है। चूंकि मेरे वह ब्लाग अन्य ब्लाग की तरह सामान्य पाठों हैं इसलिये उनको चिट्ठाजगत वाले लिंक देते हैं। संदेह के घेरे में वह इसलिये हैं कि वह मस्तराम शब्द डालकर ही वहां जाते हैं क्योंकि उन ब्लाग पर जितने भी हिट आये वह इसी शब्द से आये। हिंदी फोरमों पर दिख रहे हिंदी ब्लाग पर कभी कभार मस्तराम के नाम से लिखे जा रहे  ऐसे वैसे साहित्य पर चर्चा होती है पर कोई यह नहीं कहता कि हम भी वहां जाते हैं। सच तो यह है कि कई ब्लाग लेखक वह तांक झांक करते हैं नहीं तो मेरे ब्लाग उनके दृष्टिपथ में कैसे आते। </p>
<p>मस्तराम ‘आवारा’ से मैंने जिज्ञासावश एक पूछा था कि उनके ब्लाग पर कितने व्यूज आते हैं। बहुत दिन बाद उन्होंने अपने जवाब में बताया कि प्रतिदिन दोनों ब्लाग पर चालीस से पचास व्यूज आते हैं। जिस दिन पोस्ट नयी होती है उस दिन चारों फोरमों से भी जमकर व्यूज आते हैं। उससे एक बात तो लगी कि मस्तराम वाकई अपने आप में हिट दिलवाने वाला नाम है।  वह ब्लाग चेक किये तो उनका पता ही मस्तराम से शूरू है जबकि मैंने जी वगैरह लगाकर पता बनाया है। इसके बावजूद उस पर इतने हिट तो आ ही जाते हैं जो अन्य सामान्य ब्लाग पर नहीं आते। एक बार ख्याल आया था कि मैं भी ऐसा पता बनाऊं पर <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथी</a> और <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> के व्यूज देखकर मन नहीं माना। वह दोनों ही अध्यात्म के दम पर 20 से 25 व्यूज कभी पचास व्यूज तब भी जुटा लेते हैं जब कोई उन पर पाठ नहीं होता।  फिर वर्डप्रेस पर मस्तराम की श्रेणी में भी मेरे पास व्यूज आते हैं। इससे एक बात पता लगती है कि मस्तराम नामधारी ब्लाग जमकर हिट ले रहे हैं पर जैसे जैसे हिंदी पर लिखा बढ़ता जायेगा सामान्य जन की रुचि बढ़ेगी और अंततःसत्साहित्य ही हिंदी का सारथी बनेग और उसकी ध्वजपताका अंतर्जाल पर फहरायेगा।  मस्तराम आवारा से एक बात और पता लगी कि उन ब्लाग पर  टिप्पणियां तभी आती हैं जब वह फोरमों पर होती है। तब मैंने सोचा कि जब मस्तराम शब्द से ही उसके ब्लाग खुल रहा है तो ब्लाग लेखक इतने तो समझदार हैं कि वह वहां टिप्पणियां नहीं लगायेंगे क्योंकि उससे पता लग जायेगा कि वह मस्तराम के इलाके में गये थे।<br />
वैसे हमारे इलाके में मस्तराम का इतना नाम प्रचलित नहीं है पर उस दिन एक आदमी ने बताया कि उसका नाम ऐसी वैसी रचनाओं के लिये खूब जाना जाता है। यही कारण है कि छद्म नाम से ऐसी वैसी रचनायें लिखने वाले वहां अपनी रचनाएं लिख रहे हैं और कुछ भले लोग भी हैं जो इस बात से बेखबर होकर ठीकठाक भी प्रस्तुति के साथ जुड़े हैं। ऐसा लिखने वालों के पुराने ब्लाग लेखकों होने का संदेह इसलिये भी जाता है कि तकनीकी और विज्ञापन की दृष्टि से वह जितना सुसज्तित हैं वह ज्ञान उन्हीं में संभव है। संभवतः हिंदी में लिखे गये वह पहले ब्लाग भी हो सकते हैं क्योंकि मैंने कई पर पांच वर्ष से अधिक पुरानी तारीखें देखीं हैं। मैं वहां अपने पाठकों के आने के मार्ग देखता हुआ वहां जाता हूं और इस दौरान वहां लिख पढ़ता हूं तो सोचता हूं चाहे कितने भी उन पर हिट हों हिंदी भाषा के समृद्धि करने का उनमें सामथर््य नहीं हैं।  बहरहाल अब मैं अपने नाम से मस्तराम नहीं हटाऊंगा क्योंकि यह मेरे प्रयोग का हिस्सा है। चिट्ठाजगत वाले हर ब्लाग अपने यहां ले जायेंगे तो मैं किस किसका नाम बदलूंगा। कहीं अगर मस्तराम दीपक भारतदीप पर दृष्टिपथ में आ जाये तो बाद वाला ही नाम पढ़ें क्योंकि पहला नाम तो प्रयोग के लिये है। अगर उनको हटाने से  तो मेरे प्रयोग प्रभावित होंगे। बहरहाल अंतर्जाल पर अनेक तरह के नये मसले सामने आते हैं जो केवल यहीं दिख सकते हैं और कहीं नहीं।  </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःईश्वर का वर्णन कोई नहीं कर सकता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=65</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 04:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=65</guid>
<description><![CDATA[रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं<br />
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।<br />
<strong>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःजिनके पास दिमाग है ताकत भी होती उनके पास]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 01:28:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=167</guid>
<description><![CDATA[१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.<br />
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती  है.<br />
२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पता. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली  सिंह को कुएँ में गिराकर मार  डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.<br />
३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://rajraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग यानि अखबार और किताब-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=583</link>
<pubDate>Tue, 05 Aug 2008 15:17:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=583</guid>
<description><![CDATA[अगर मुझसे कोई सवाल करता है कि अंतर्जाल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अगर मुझसे कोई सवाल करता है कि अंतर्जाल पर क्या लिख रहे हो तो मेरा एक ही जवाब होता है कि‘ब्लाग पर लिखता हूं।’<br />
फिर सवाल पूछा जाता है-‘ब्लाग यानि क्या?’<br />
अब मेरे लिये बहुत मुश्किल होता है यह जवाब देना क्योंकि इसका कोई आधिकारिक हिंदी अनुवाद मेरे पास उपलब्ध नहीं है। तब मैं कहता हूं कि यह समझो कि‘जैसे अपनी समाचार पत्र या पत्रिका की तरह ही समझो।’<br />
लोग आराम से मेरी बात समझ जाते हैं। हालांकि उनका अगला प्रश्न होता है कि-‘इसमें तुम्हें मिलता क्या है?’<br />
तब मुझे बताना पड़ता है कि अभी ऐसी संभावना नहीं बनी है।’<br />
उस दिन एक मित्र ने मुझसे कहा-‘यार, मेरी पत्नी एक स्कूल में टीचर है वहां निकलने वाली एक पत्रिका के लिये उसे एक निबंध चाहिये । कोई पुराना लिखा हो तो बता दो या फिर नया लिख दो।’<br />
मैने उससे कहा-‘अलग से तो मैं कुछ लिखने से रहा पर अगर तुम मेरे घर आकर सभी ब्लाग देख लो और जो पसंद आ जाये तो उसे फ्लापी,सीडी, या पेन ड्राइव में ले  जाओ।’<br />
उसने कहा-‘ इंटरनेट तो उसी स्कूल में है तुम तो ब्लाग का पता दे दो।’</p>
<p>दो दिन बाद वह प्रिंट कर ले आया और बोला-‘यार, यह लेख मेरी पत्नी को पसंद आया पर इस पर थोड़ा कुछ और लिख दो मजा आ जाये। यह कुछ छोटा है।’</p>
<p>मैंने उस लेख को देखा और उस ब्लाग पर जाकर वहां से वह लेख ले आया और यूनिकोड से कृतिदेव में परिवर्तित कर विंडो में लाया और फिर उसमें जोड़कर उसे सीडी में दे दिया ताकि वह प्रिंट करा सके। चलते समय उसने कहा-‘यह ब्लाग तो वाकई काम की चीज है। यह एक अखबार की तरह भी है और किताब की तरह भी।<br />
मैंने तुम्हारी कम से कम पांच लेखों की कापी निकलवाई थी और यह इसलिये ले आया कि इसमें संशोधन करा सकूं।’</p>
<p>यह बात आज से चार माह पुरानी है और मेरे से कई लोग कहते हैं कि अपनी रचनायें दो तो मैं उनसे कहता हूं कि तुम मेरे ब्लाग से उठा लो, पर कई लोग सुविधा होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा सकते। कारण यह है कि लोग यहां परंपरावादी हैंं। अभी भी लेखक को एक फालतू का आदमी समझा जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर वह मशहूर नहीं है तो किसी काम का नहीं है। अक्सर मैं सोचता था कि कोई प्रकाशक मिल जाये तो अपनी किताब छपवा लूं। मरे एक मित्र ने अपनी क्षणिकाओं की किताब छपवाई थी और वह चाहता था कि इस संबंध में वह किसी ई-पत्रिका से  संपर्क कर इसे अंतर्जाल पर प्रचारित करे। उस समय मैंने नया कंप्यूटर केवल इस इरादे से लिया था कि उस पर आपन लेख टाईप करूंगा और बाहर का कोई काम आया तो उसे भी कर दूंगा। कंप्यूटर में सौ घंटे का इंटरनेट टाईम फ्री मिला। उससे पांच दस घंटे काम किया और वह फिर बंद हो गया। मेरे मित्र ने एक ई-पत्रिका का पता दिया और मैं उसे ढूंढने में लग गया पर वह नहीं मिली तो दूसरी हाथ लग गयी। उस पर लेख लिखा। उस समय सद्दाम को फांसी दी गयी थी और अंतर्जाल पर इस संबंध में मेरा आलेख वहां छपा। इधर यह विचार बना कि चलो अपना कनेक्शन लगा लेते हैंं। </p>
<p>ब्लाग पर काम करना शुरू किया तब पता लगी इसकी ताकत क्या है? आज एक जगह पढ़ा कि आस्+ट्रेलिया में टीवी चैनलों और अखबारों को इंटरनेट ने पीछे छोड़ दिया है। एक दिन यह यहां भी होना है। जैसे अंतर्जाल पर ब्लाग लेखन बढ़ता जायेगा वैसे पाठक भी इधर आयेगा। जैसे प्रिंटर मेरे पास है अगर उसकी स्याही सस्ती होती तो शायद मैं बहुत सारे प्रिंट निकालकर किताबें बांट चुका होता। यह प्रिंटर जितने का है उतने की तो स्याही है। एक तरह से मेरा प्रिंटर कबाड़ हो गया है। </p>
<p>समय बहुत बलवान है। जिस गति से पिछले दो सालों में जो बदलाव यहां मैने देखे हैं उससे लगता है कि वह समय भी आयेगा जब लोग ब्लाग को किताबों की तरह पढ़ेंगे। मुख्य समस्या यह है कि लेखक को क्या मिलेगा? हिंदी में मौलिक लेखकों के पाठों पर नजर सबकी है पर उनको कुछ मिले इसके लिये कोई प्रयासरत नहीं है। वैसे ही हिंदी लेखकों के साथ बहुत चालाकियां की जाती रहीं है और अंतर्जाल पर तो वह और भी अधिक होंगी इसमें संदेह नहीं है, पर यहां किसी से मनमानी से बचने का एक ही उपाय है कि अपने ब्लाग पर ही लिखते जायें। यहां किसी को आका बनाने की जरूरत नहीं है।  जो मजा लेते हुए लिखेंगे वह कालांतर में बहुत नाम करेंगे। यह ब्लाग किताबों की तरह अंतर्जाल की लाइब्रेरी में बने रहेंगे।  जब तक लिख रहे हैं तब तक अखबार की तरह लिखो। </p>
<p>लिखने के बारे में त्वरित टिप्पणियां का मोह त्यागे बिना अंतर्जाल पर बेहतर लिखना कठिन है।  त्वरित टिप्पणियों से प्रेरणा मिलती है यह ठीक है पर उसमें मोह पालना अपने लेखन के लिए विष है तब केवल ब्लाग लेखकों को प्रसन्न करने के लिये ही लिखने का मन करता है और वह आम पाठकों के लिये किसी मतलब का नहीं रह जाता। कुल मिलाकर हिंदी ब्लाग जगत में अभी आम ब्लाग लेखक को आय अर्जित करने में समय लगेगा क्योंकि अभी किसी ने इतनी ख्याति अर्जित नहीं की है जिसे विज्ञापनदाता विज्ञापन दें। अभी तो जो लोग कमा रहे हैं उनके बारे में क्या लिखना?<br />
वह सभी तो डोमेन लिये बैठे हैं ओर उनके लिये ब्लाग लेखक एक सहायक से अधिक नहीं है पर वह समय आयेगा जब ब्लाग लेखक कहीं लिंक करने के लिये भी पैसे मांगेंगे। शायद यही कारण है कि आम ब्लाग लेखकों को भटकाने की भी कोशिशें हो रहीं हैं। हमारे यहां लिख और दिख। कुछ लोगों को सम्मान आदि भी मिलेंगे पर जिनको अंतर्जाल पर प्रसिद्ध प्राप्त करना है उन्हें केवल अपने ब्लाग पर ही बने रहना बेहतर होगा क्योंकि यह अखबार भी है और किताब भी। उन्हें बेगारी से भी बचना होगा। यहां की चालाकियों पर शेष फिर कभी!</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल
सब कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
..........................................</p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लागवाणी जैसे हिट  किसी के लिये भी सपना-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=580</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 16:40:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=580</guid>
<description><![CDATA[ब्लागवानी के लोग सही कहते हैं कि वह लो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लागवानी के लोग सही कहते हैं कि वह लोग शौकिया हैं पर उनको नहीं मालुम वह कई व्यवसायिक लोगों के लिये चुनौती बने हुए हैंं। इस समय हिंदी ब्लाग जगत में चार हिंदी फोरम ऐसे हैं जो सभी हिंदी ब्लाग को अपनी जगह दिखाते हैं। ब्लाग वाणी के अलावा तीन अन्य हैं-नारद, चिट्ठाजगत, और हिंदी ब्लागस। अधिकतर हिंदी ब्लाग लेखक लिख तो पूरी दुनिया के रहे हैं पर उनकी दुनिया इन चार के आपपास ही सिमटी हुई है। इनमें ब्लागवाणी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। अधिकतर हिंदी ब्लाग लेखक उस पर आकर ही दूसरे के ब्लाग को पढ़ना और उन पर टिप्पणियां लिखना पसंद करते हैं। </p>
<p>ब्लागवाणी के जन्म की एक कहानी है पर उसके बाद जो बदलाव हिंदी ब्लाग जगत में आये हैं उस पर अनेक लोगों की हिंदी ब्लाग जगत में दिलचस्पी जागी। वैसे हिंदी में ब्लाग लेखक की शुरुआत ऐसे लोगों ने की जो व्यवसायिक थे या फिर इसमें आगे व्यवसाय की संभावनाएं तलाश रहे थे। उनके साथ ऐसे लोगों का समूह भी जुड़ा जो पूरी तरह शौकिया था। ब्लाग वाणी के कर्णधार भले ही विनम्रता के कारण अपने आपको कर्णधार कहलाने की वजह कार्यकर्ता कहलाना चाहते हैं पर वह अनेक वेबसाईट और अपने स्वाजातीय फोरमों के कर्णधारों के लिये चुनौती है। ब्लागवाणी के कर्णधार विशुद्ध रूप से शौकिया है कम से कम यह बात हम मान सकते हैं क्योंकि वह किसी बदलाव से विचलित नहीं होते। उनको किसी एग्रगेटर या वेबसाइट का अभ्युदय विचलित नहीं करता पर ब्लागवाणी का आकर्षण कई लोगों के लिये ईष्र्या का विषय हो सकता है।</p>
<p>हिंदी में अन्य एग्रीगेटर और वेबसाईटें ब्लागवाणी की चुनौती का सामना करने के लिये तमाम उपाय कर रहीं हैं। यहां उनमें से किसी का नाम लेना ठीक नहीं है क्योंकि हर किसी को व्यवसाय करने का अधिकार है। मुद्दा यह है कि हिंदी में बरसों से चली आ रही परंपराओं के आधार लेखकों को मजदूर या मुफ्त का समझना है।  हिंदी में लिखने वाले बहुत हैं पर जिसे रचना कहा जाता है उसकी कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं-यह एक अलग विषय है। कई वेबसाईटें अपने यहा लिखने के लिये इनाम आदि देने की बात करती हैं तो कोई इशारों में सम्मान आदि देने की बात भी करती हैंं।  दरअसल उन वेबसाईटों के कर्णधारों का मुख्य उदद्ेश्य अपने आपको प्रचारित करना है। लिखे लेखक और वह उसे छापकर संपादक या हिंदी भाषा के अंतर्जाल पर अभ्युदय करने वाले श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाना चाहते हैं। इनमें कुछ लेखक भी हैं पर निरंतर लिखने के लिये उनके पास अवसर नहीं हैं पर नाम निरंतर चर्चा में बनाये रखने के लिये वह ऐसे प्रयास कर रहे हैं जिन पर सोचना पड़ता है। </p>
<p>ब्लागवाणी के कर्णधारों को अपने फोरम में कोई ऐसा बदलाव नहीं करना चाहिए जिससे ब्लागलेखक उनसे दूर जायें। उन्हें किसी दूसरी वेबसाईट की नकल भी नहीं करना चाहिए और अगर करते हैं तो उन्हें यह देखना चाहिए कि कहीं वह उनको ब्लाग लेखकों से दूर तो नहीं ले जायेगा। आज यह लेख लिखते समय इसके लेखक का  ध्यान उनकी चिप्पियों की तरफ गया। वहां उसके  ब्लाग से संबंधित कुछ भी नहीं था। चाणक्य, कबीर, रहीम, अध्यात्म तथा अन्य कई चिप्पियां गायब हैं। स्पष्टतः यह दूसरी वेबसाईटों से प्रेरित होकर किया लगता है  यही कारण है कि  अपनी श्रेणियों, लेबल और टैगों  से आने वाले पाठकों के आने के मार्ग देखने पर पता चलता है कि  तो वहां  ब्लागवाणी का अस्तित्व नहीं दिखता जबकि उसका एक प्रतिद्वंद्वी फोरम सभी जगह दिखता है। यह लेखक कोई शिकायत नहीं करता क्योंकि इस अंतर्जाल पर किसी भी  लेखक के शब्द ही  अपने ब्लाग पर पाठको को लाने में सक्षम है। बाकी वेबसाईटें या तो अपने प्रिय ब्लाग लेखकों की चिप्पियां लगाये हुए हैं या फिर वह स्वयं ही उनके मालिक भी है। अगर ब्लागवाणी उनकी नकल कर रहा है तो वह गलती करने जा रहा है। यह उनकी अपनी मर्जी है पर लेखक का अपना यह एक  विचार है। इस लेखक  को  तकनीकी ज्ञान नहीं है पर जो दिखता है उसे इसी सरल भाषा में लिखना जरूरी है। खासतौर से ब्लागवाणी के कर्णधार भी जब उसकी श्रेणी के उपेक्षित लेखकों की जमात से हो तब तो और भी जरूरी हो जाता है।<br />
 अनेक हिंदी वेबसाईटों के लिये ब्लागवाणी जितने पाठक पाना अभी भी एक ख्वाब हैं। यह अंतर्जाल है जहां अंतरिक्ष और हवा तक शब्दों घूम रहे हैं यहां जमीन पर चलने वाली पूंजीवादी और सामंतशाही के सहारे हिंदी में प्रसिद्धि पाना एक ख्वाब है। अंतर्जाल पर घूमने वाले टीवी चैनलों और अखबार के आधार पर ही यहां खोज करें यह जरूरी नहीं है। यही कारण है कि ऐसी मानसिकता वाले कुछ लोग ब्लागवाणी जैसा बनना चाहते हैं।</p>
<p>नारद फोरम की पुरानी साख है और वह परिदृश्य में अधिक नहीं होने के बावजूद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। हिंदी ब्लाग्स भी अपनी छबि धीरे धीरे बना रहा है पर चिट्ठाजगत इस समय जमकर प्रयोग कर रहा है। ब्लागवाणी को ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए क्योंकि वह हिंदी ब्लाग जगत पर जितनी चमक बनाये हुए है उसे फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। कई चमकदार चेहरे अपने लेखन और व्यवसायिक कौशल से वैसी ही स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं जो उसके कर्णधारों को बड़ी सहजता से ही मिल गयी। ब्लाग वाणी के कर्णधार पहले पंगों और धुरविरोध के लिये जाने जाते थे। उनमें जोश और लिखने के प्रति निष्काम भाव था जो उन्हें ऐसी स्थिति मिल गयी। ब्लोगवाणी इस लेखक के उस पाठ को नहीं भूले होंगे जिसमे सभी ब्लाग लेखकों से समस्त फोरमों पर जाने का आग्रह किया गया था और उसके बाद ब्लागवाणी तेजी ने नारद पर हावी हो गया। नारद के कर्णधारों ने एक योजना के तहत ही उसे शुरू किया पर ब्लागवाणी के कर्णधारों ने तो केवल उसे चुनौती देने के लिये ही यह फोरम बनाया। </p>
<p>ब्लागवाणी दूसरे फोरमों या वेबसाईटों की नकल करे इसके लिये अन्य बेवसाईटें बहुत प्रयास कर रही हैं- इनामों की घोषणा और हिंदी का एक मात्र मसीहा बनने की होड़ लगी हुई है। कहीं फिल्म के कार्यक्रम जोड़े जा रहे हैं तो कहीं इनाम आदि की घोषणा की जा रही है। कहीं लिखना सिखाया जा रहा है। कहीं ब्लाग लेखकों द्वारा लिखे जा रहे विषयों पर उंगलियां उठाई जा रही है। यह सब प्रयास  प्रयास ब्लागवाणी को पथ से विचलित करने के लिए है।<br />
फोरमों से अलग वेबसाईटें अभी हिंदी ब्लाग को इस तरह दिखाती हैं जैसे वह कोई हल्की विधा हो पर आने वाले समय में यह सभी छांटछांटकर ब्लाग अपने यहां दिखायेंगी यह इस लेखक का दावा है। अभी पुरानी किताबों से पुराने लेखकों की रचनायें छापकर लोग अपना काम चला रहे हैं पर नये लोगों को चाहिए नये संदर्भों के नयी रचनायें और आम ब्लाग लेखकों के अलावा यह कोई और नहीं कर सकता। ऐसे अनेक ब्लाग लेखक हैं जो स्तरीय लिख रहे हैं। अंतर्जाल पर संक्षिप्तता का महत्व है और यहां गागर में सागर भरने वाले ही हिंदी में पुराने लेखकों से भी अधिक नाम कर सकते हैं।<br />
ब्लाग लेखकों को दोयम दर्जे का कहने वालों पर आप हंस सकते हैं क्योंकि उनके लिखों में वैसे ही पूर्वाग्रह हैं जो हम हिंदी में बरसों से देखते आ रहे हैं। अंतर्जाल पर हिंदी को ले जायेंगे तो यही केवल  http://  वाले ब्लागर ही न कि www  वाले। www   लेने के बाद लोग लिखना ही भूल जाते हैं केवल यही  प्रयास करते हैं कि उनके विज्ञापन पर अधिक क्लिक हो। सभी वेबसाईटें अपनी चिप्पियों में इस ब्लाग लेखक की श्रेणियों, लेबलों और टैगों से दूरी बनाये हुए हैं और यह सोच समझकर किया गया है। फोरमों के बारे में तो मुझे कुछ नहीं कहता पर बाकी वेबवाईटें अगर इस ब्लाग लेखक को इतना हेय समझती हैं तो क्यों फिर उसके ब्लाग लिंक किये बैठी हैं। बहरहाल ब्लाग लेखकों को लिखने के लिये प्रेरित किया जा रहा है पर न तो उनको नाम देना चाहता है कोई और नहीं सम्मान।  ब्लाग लेखकों को यह समझना चाहिए कि उनको अपना लिखा ही शिखर पर पहुंचा सकता है। ब्लागवाणी के कर्णधारों के बारे में मेरी राय यही है कि वह आम ब्लाग लेखकों की मानसिकता वाले हैं और इस वास्तविकता का उन्हों समझ लेना चाहिए। वैसे  वह भी जमीन पर पूंजीवादी, सामंतवादी और रूढि़वादी लोगों से उपेक्षित लेखक हैं और वह दूसरों के कहने में आकर बहकेंगे नहीं यह कहा जा सकता है पर सजी सजाई वेबसाईटें देखकर उनके मन में विचार आते ही होंगे तक उन्हें यह सोचना चाहिए कि उन जितने पाठक अभी किसी के पास भी नहीं है। अगर बहके तो वह लोकप्रियता के उस शिखर से गिरेंगे जिसकी कल्पना ही उनके प्रतिद्वंद्वी करते है। ब्लाग लेखकों को तो चारों फोरमों के प्रति एक जैसा रवैया अपनाना चाहिए पर अन्य वेबसाईटों के प्रचार पर बहुत सोच समझ कर विचार करना भी आवश्यक है कि क्या वह वास्तव में ब्लाग लेखकों का सम्मान करती हैं कि नहीं। यहां उन्हें किसी का मोहताज नहीं होना चाहिए। यह अंतर्जाल एक खुला मैदान हैं जहां केवल लेखकों के शब्द ही पाठक जुटा सकते है। इसलिये अपने ब्लाग पर ही लिखते रहें। कितने लोगों ने आज तक पढ़ा यह मत सोचें आगे कितने पढ़ने वाले हैं इस पर विचार करें। ब्लागवाणी नहीं कई ब्लाग लेखक भी इन वेबसाईटों के लिये चुनौती बने हुए हैं हालांकि यह लेखक ब्लागवाणी पर फ्लाप ब्लागर है पर यह इसी कारण कि इधर उधर घूमते हुए ऐसी चीजे उसकी नजर में आती है जिससे लगता है ब्लागवाणी जैसे हिट किसी के लिये भी  अभी तक सपना है।   ब्लागवाणी के कर्णधार (उनके अनुसार कार्यकर्ता) कभी दूसरी वेबसाईटों को देखकर यह न सोचें कि उनकी चमक हमसे अधिक कैसे? उनके पास पाठक नहीं है और न वह आम ब्लाग लेखकों को महत्व देती है। </p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विश्वास की कभी जंग नहीं होती-हिंदी शायरी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=452</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 16:08:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=452</guid>
<description><![CDATA[चेले ने पूछा गुरू से
‘भारी मानसिक युद्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चेले ने पूछा गुरू से<br />
‘भारी मानसिक युद्ध में फंसा हूं<br />
कोई उपाय बताईये<br />
जंग है विश्वास की<br />
उससे मुझे पार लगाईये<br />
एक का निभाता हूं<br />
दूसरे का किसी हालत में तोड़ना होगा विश्वास<br />
इधर जाऊं समझ में नही आता<br />
रास्ता कोई आप ही बताईये<br />
आपके उपदेश पर ही है विश्वास’</p>
<p>गुरू ने कहा<br />
‘किस माया के चक्कर में पड़े हो<br />
उसके हैं तीन रूप धन, शक्ति और प्रतिष्ठा<br />
पहले उसका स्वरूप  बताओ<br />
विश्वास की कभी जंग नहीं होती<br />
हमारी बुद्धि की गली ही तंग होती<br />
तभी हालत ऐसी आती है<br />
सत्य की कोई परीक्षा नहीं है<br />
जिस पर विश्वास है वह निभाएगा भी<br />
पर माया में ही ऐसा होता है<br />
इसलिये जहां माया मोल तोल में भारी हो<br />
वहीं पहुंच जाओ<br />
चाहे जितना माया का ढेर उठा लाओ<br />
नैतिकता का मानदंड कोई<br />
किसी किताब में नहीं लिखा<br />
आज के लोगों में  हमें भी कहीं वह नहीं दिखा<br />
हम तो ठहरे निष्काम<br />
हमें समझ में नहीं आता माया का काम<br />
जिधर ले जाए  वहीं होता विश्वास<br />
जिसे नहीं मिलती वही होता निराश<br />
जमाने को लगी है हवा ऐसी<br />
धन और प्रतिष्ठा में<br />
आदमी की बुद्धि का हो गया निवास<br />
सत्य की राह पर चलते हो तो<br />
अधिक सोचना नहीं<br />
पर माया के रास्ते जाओ तो<br />
कर लेना पहले कम और अधिक का आभास<br />
रास्ते दो ही है इस दुनियां में<br />
एक है सत्य का<br />
दूसरा माया का<br />
इस नियम  पर करना विश्वास<br />
........................................................................</strong><br />
<blockquote><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सही पता बताने वाले बहुत कम हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=449</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 12:24:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=449</guid>
<description><![CDATA[निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये
प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये</p>
<p>पर जब आया मौका साथ देने का</p>
<p>कई बहाने सुना दिये</p>
<p>हम आसरा फिर भी करते रहे</p>
<p>यही सोचकर कि कभी तो</p>
<p>उनके बहाने खत्म हो जायेंगे</p>
<p>और वह काम आयेंगे</p>
<p>इस इंतजार में कितने बरस गुजार दिये<br />
.......................................................................</p>
<p>आहिस्ता चलो</p>
<p>राहों पर फिसलन बहुत है</p>
<p>गिरने पर संभालने वाले कम हैं</p>
<p>अपनी मंजिल और राहों को खुद चुनो</p>
<p>भटकाने वाले बहुत हैं </p>
<p>सही पता बताने वाले बहुत बहुत कम हैं<br />
...............................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले प्रेमपत्र से दूसरा भाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 13:21:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</guid>
<description><![CDATA[लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये<br />
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और<br />
अपना नाम लिखा प्रेमी<br />
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया<br />
लड़की ने  पत्र बिना  उत्तर के वापस लौटाया<br />
दूसरे में उसने लिखी शायरी<br />
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया<br />
लड़की को आशुका बताया<br />
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया</p>
<p>पहली मुलाकात में<br />
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा<br />
तो उसने बताया<br />
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है<br />
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है<br />
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं<br />
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं<br />
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं<br />
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं<br />
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं<br />
वैसे तो मुझे कविता और शायरी<br />
दोनों की की समझ नहीं है<br />
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है<br />
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और<br />
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा<br />
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम<br />
तुम्हारा आशिक होना और<br />
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा<br />
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ<br />
इसलिये मुझे  दूसरा प्रेम पत्र भाया<br />
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया<br />
.........................................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी कविताओं से दूसरों के ईमेल कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=575</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 12:36:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=575</guid>
<description><![CDATA[दनदनाता आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बाप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दनदनाता आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, आज मिल गया<br />
तुम्हारे हिट होने का मंतर<br />
अपने फ्लाप होने का दर्द भूल जाओ<br />
अपने ब्लाग लिखकर दूसरों के ईमेल में<br />
जबरन भिजवाओ<br />
हर कोई एक उड़ाने से पहले एक बार<br />
जरूर देखेगा<br />
इस तरह अपना हिट भेजेगा<br />
चलो आज से जमकर लिखो कविता<br />
और हिट की सीढि़या चढ़ जाओ’</p>
<p>सुनते ही उठ खड़े हुए और<br />
चिल्लाते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘निकल यहां से जल्दी<br />
वरना देख इन जबरन घुसे ईमेल संदेशों की तरह<br />
तुम्हारा नाम भी दोस्तों की लिस्ट से उड़+ा देंगे<br />
क्या समझ रखा है कि<br />
जिस बात से स्वयं परेशान है<br />
वह व्यवहार दूसरे से करेंगे<br />
कमबख्त, जवां दिलों को पटाने के लिये<br />
यह कविताएं नहीं शायरों का नुस्खा है<br />
जैसे उनके लिये तंबाकू का गुटका है<br />
न दिमाग की सोच से इसका वास्ता<br />
न दिल की तरफ जाता शब्दों का रास्ता<br />
यह शब्द भोजन की तरह हैं<br />
आदमी स्वयं दाना खाकर पेट भरता<br />
मछली को खिलाकर फांसता<br />
इन शब्दों में भाव कम<br />
किसी को बहलाने और हिट होने का<br />
ताव है ज्यादा<br />
अपने लेखक और कवि होने का भ्रम<br />
उसे सच बनाने का है इरादा<br />
कविता ऐसे लिखी है जैसे लिखना हो नाश्ता<br />
साहित्य में बहुत जल्दी हिट होने का<br />
साजिश से निकाल रहे है रास्ता<br />
असली लिखने वाले कभी<br />
पाठकों के दरवाजे नहीं  बजाते<br />
ईमेल को कूड़ेदान की तरह नहीं सजाते<br />
लिखा जाये दिन और दिमाग से<br />
तो लेखक और कवि लिखने का ही<br />
सुख बहुत उठा लेते<br />
कोई पढ़े या नहीं इस चिंता से मूंह फेर लेते<br />
भेज रहे हैं जो जबरन कवितायें<br />
दूसरों के गुलदस्ते को कूड़ेदान की तरह सजायें<br />
हम फ्लाप है फिर को परवाह नहीं<br />
हिट होने का ऐसा मोह नहीं कि<br />
दूसरों के सामने हिट के लिये भीख मांगें<br />
हर लिखे गये शब्द कविता या कहानी नहीं हो जाते<br />
जब तक पढ़ने वाले उसे हृदय से नहीं अपनाते<br />
अरे, फैंक रहे हैं जो<br />
कूड़ें की तरह अपनी रचनायें<br />
भला वह कहां सम्मान पायें<br />
पल भर में ईमेल से उड़ा दी जायें<br />
अपनी पत्रिका ही है वह किला<br />
जहां रचना चमकते  रहे शब्द सोने की तरह<br />
पढ़े जो वह सम्मान दें<br />
जो न पढ़ें, वह नहीं करते गिला<br />
किसी दूसरे के आगे जाकर<br />
उनको क्या मिलेगा<br />
जब आदमी को प्यार नहीं मिला<br />
तुम निकल लो यहां से<br />
साथ में अपना मंतर भी ले जाओ<br />
.....................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वफा मुफ्त में नहीं मिलती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</link>
<pubDate>Fri, 01 Aug 2008 16:05:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</guid>
<description><![CDATA[वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती
अगर दाम दे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती<br />
अगर दाम देने की ताकत हो पास तो<br />
बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती<br />
ओ बाजार में खड़े इंसान<br />
अपने मन में कोई खुशफहमी में आकर<br />
किसी से बिना मतलब वफा की<br />
उम्मीद कभी न करना<br />
वफा के सौदागर तरक्की में लगे हैं<br />
उन्हें भी यह कभी मुफ्त में नहीं मिलती<br />
कौड़ी के भाव भले ही खरीद लें वह<br />
पर आम इंसान को सोने के भाव मिलती<br />
.....................................................................</strong></p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 17:07:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</guid>
<description><![CDATA[एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक श्रोता ने कवि से कहा<br />
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो<br />
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा  दो’<br />
कवि ने उदास होते हुए कहा<br />
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं<br />
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी<br />
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर<br />
नींद नहीं आयेगी<br />
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी<br />
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो<br />
अब पहले की तरह कांव-कांव कर<br />
कहां नजर आते<br />
दिख जायें तो इंसानों की<br />
बुरी नजर का शिकार हो जाते<br />
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें<br />
 तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’<br />
......................................................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल और ध्यान-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=443</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 16:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=443</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज ने राह चलते हुए
रोक लिया और लग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फंदेबाज ने राह चलते हुए<br />
रोक लिया और लगा गुस्सा होने<br />
‘दीपक बापू यह क्या बात हुई<br />
हम जब भी तुम्हारा मोबाइल खटखटाते<br />
उसका स्विच आफॅ पाते<br />
स्कूटर की डिग्गी में भला<br />
कहीं ऐसे मोबाइल बंदकर क्यों ले जाते<br />
हम तुम्हारे दोस्त हैं<br />
तुम्हारे फ्लाप ब्लाग अगर  हिट हो जायें तो<br />
इसकी खबर पहले सुनने के लिये ही<br />
रोज तुम्हारे मोबाइल की घंटी बजाते<br />
तुम सुबह अपने ब्लाग की दशा<br />
देखकर ही जरूर घर से बाहर जाते<br />
मालुम है मिलते तो वह तुम्हें<br />
हमेशा फ्लाप ही हैं पर<br />
तुम फिर भी कहां बाज  आते<br />
तुम्हारी चिंता कम हुई हो<br />
यह  जानने के लिये ही<br />
हम तुमसे करते हैं सुबह संपर्क<br />
पर तुम्हार रवैया देख कर खफा  हो जाते’</p>
<p>सुनकर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘हमारे फ्लाप होने की चिंता बहुत हैं तुमको<br />
इसलिये सुबह से शाम तक<br />
मिस काल ही लगाते<br />
कभी काम पड़ता है तभी<br />
करते हो मोबाइल पर बात<br />
पर कभी ब्लाग के बारे में पूछते हो<br />
याद हमें नहीं आता<br />
तुम्हें हमारे मोबाइल बंद होने से अधिक<br />
फिक्र इस बात की है कि<br />
हम क्यों नहीं अपने साथ<br />
राह पर यह संकट भी ले जाते<br />
जिससे चाहकर भी तुम निजात नहीं पाते<br />
पर तुमसे नहीं सीखना मोबाइल का उपयोग<br />
दिमाग में नहीं भरना रोग<br />
याद रखना<br />
सारी दुनिया मानती है कि<br />
भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है<br />
मोबाइल वालों को कहां इसका ज्ञान है<br />
राह पर वाहन चलाते हुए<br />
कितने मोबाइल वाले दूसरे की गाडि़यों में<br />
घुस कर दम तोड़ गये<br />
खबरों के लिये सनसनी छोड़ गये<br />
हमें मोबाइल पर पद्मश्री मिलने की<br />
खबर मिलने की संभावना हो तब भी<br />
रास्ते में उसे बंद ही रखेंगे<br />
कहीं तुम्हारे मिस काल पर आया ध्यान<br />
स्कूटर कहां घुस जाये इसका नहीं रहेगा भान<br />
जिंदा रहते तो नहीं फैला सके लिखकर सनसनी<br />
न मिला सम्मान<br />
घुस गये किसी गाड़ी में<br />
तो बन जायेगी एक खबर हमारे नाम की<br />
फैलायेंगे खबरची तमाम सनसनी<br />
इसलिये मोबाइल को खोलकर साथ नहीं ले जाते</strong><br />
................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=60</link>
<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 13:50:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=60</guid>
<description><![CDATA[हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर पल लोगों के सामने<br />
अपना कद बढाने की कोशिश<br />
हर बार समाज में<br />
सम्मान पाने की कोशिश<br />
आदमी को बांधे रहती है<br />
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते </p>
<p>ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो<br />
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते<br />
कई किताबों के झुंड में से<br />
छांटकर लोगों को सुनाये जाते<br />
झूठ भी सच के तरह बताते </p>
<p>सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए<br />
आदमी को पालतू बनाने के लिए<br />
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह<br />
फिर भी कोई नहीं चाहता<br />
अपने बनाए रास्ते पर चलना<br />
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते<br />
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते<br />
समाज कोई इमारत नहीं है<br />
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते </p>
<p>आदमी अकेला आया है<br />
और अकेला ही जाता भी<br />
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ<br />
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते<br />
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए<br />
इस दुनिया से विदा हो जाते </p>
<p>-----------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>क्यों नहीं देते सुखद अहसास</strong></p></blockquote>
<p>हाथ के स्पर्श से किसी के बदन को<br />
तसल्ली मिलती है तो<br />
उसे छूकर क्यों नहीं देते सुखद अहसास<br />
चंद अल्फाजों से किसी के दिल को<br />
हमदर्दी मिल जाती है<br />
तो अपनी जुबान से बोलकर<br />
क्यों नहीं देते किसी को सुखद अहसास<br />
अपने देखने से किसी को<br />
अच्छा लगता है<br />
तो क्यों नहीं अपनी नजरें इनायत कर<br />
किसी को क्यों नहीं देते अहसास<br />
क्या डरते हैं<br />
अपने से लड़ते हैं<br />
सोचते हैं<br />
किसी को सुखी देख<br />
परेशान होगा मन<br />
ए जिन्दगी को आकाश वाले का तोहफा<br />
माननी वालों<br />
दुख से सजा है यह उसका तोहफा<br />
इसे मिलजुलकर सुख बना दो<br />
इसलिए अक्ल दी है<br />
बांटकर एक दूसरे का दुख-दर्द<br />
क्यों नहीं देते एक दूसरे को सुख का अहसास</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=58</link>
<pubDate>Tue, 29 Jul 2008 14:49:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=58</guid>
<description><![CDATA[एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक सपना लेकर<br />
सभी लोग आते हैं सामने<br />
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन</p>
<p>कहते हैं<br />
‘तुम उस पर बैठ सकते हो<br />
और कर सकते हो दुनियां पर शासन</p>
<p>उठाकर देखता हूं दृष्टि<br />
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि<br />
न कहीं सिंहासन दिखता है<br />
न शासन होने के आसार<br />
कहने वाले का कहना ही है व्यापार<br />
वह दिखाते हैं एक सपना<br />
‘तुम हमारी बात मान लो<br />
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो<br />
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे<br />
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’</p>
<p>उनको देता हूं अपने पसीने का दान<br />
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं<br />
रहने देता अपने मन में निशान<br />
मतलब निकल जाने के बाद<br />
वह मुझसे नजरें फेरें<br />
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं<br />
मुझे पता है<br />
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन<br />
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
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<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>जिस घर के अंदर झांका वहीं जंग का मैदान पाता </strong></p></blockquote>
<p>अपनों में गैर<br />
और गैरों में अजनबी हो जाना<br />
कितना सताता है<br />
जब आदमी अपने को अकेला पाता है </p>
<p>भरी दोपहर में<br />
शरीर से बहता पसीना<br />
चलते जा रहे पांव<br />
चंद पलों के मन के सुख की खातिर<br />
जिस घर के अंदर झांका<br />
वहीं जंग का मैदान पाता है</p>
<p>मांगने पर थोड़ा प्यार<br />
इतराने लगते हैं लोग<br />
देते हैं नसीहतें तमाम<br />
पर चंद प्यार के लफ्ज बोलकर<br />
हमदर्दी जताने का ख्याल<br />
किसी को नहीं आता है </p>
<p>ऊपर से बरसाता आग सूरज<br />
नीचे जलती धरती<br />
नंगे पांव चलता आदमी<br />
ढूंढता है सभी जगह मन की शीतलता<br />
पर भी नजर डाले<br />
लोगों का मन छल से भरा<br />
स्वयं को ही धोखा देता नजर आता है</p>
<p>कुछ पल प्यार की चाह<br />
जलते पांव के लिये शीतलता की राह<br />
मांग कर अपने आपको<br />
शर्मिंदा करने से तो<br />
जलती आग मे चलते रहना ही भाता है<br />
भला आदमी भी कभी आदमी को<br />
सुख के पल दे पाता है<br />
..................................<br />
उस महफिल में चंद पल सुकून से<br />
बिताने की खातिर रखा था कदम<br />
हमें मालुम नहीं था दिलजलों ने<br />
अपने लिये उसे सजाया हैं<br />
उनके मसले देखकर ख्याल आया कि<br />
इससे तो घर ही अच्छे थे हम<br />
पहले भी कम नहीं थे साथ हमारे<br />
वहां से बेआबरू होने का लेकर लौटे गम<br />
......................................</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
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<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी उड़ा ले जाते हैं-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=52</link>
<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 15:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=52</guid>
<description><![CDATA[मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></strong></p></blockquote>
<p></strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल</strong></p></blockquote>
<p>दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम<br />
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम<br />
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते<br />
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम<br />
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते<br />
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम<br />
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते<br />
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम </p>
<blockquote><p><strong><strong></p>
<p>यह कविता  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस सप्ताह के चुनींदा फ्लाप पाठ इस पत्रिका पर प्रस्तुत हैं]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 11:39:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य</strong></p></blockquote>
<p>जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!<br />
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’<br />
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’<br />
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीं रख लेती।’<br />
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।<br />
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’<br />
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’</p>
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’</p>
<p>मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’<br />
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’<br />
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’<br />
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’</p>
<p>बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड