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	<title>mahadev-desai &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "mahadev-desai"</description>
	<pubDate>Tue, 13 May 2008 18:48:59 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA['मोहल्ले' के महादेव इन्हें चीन्हें !]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Wed, 20 Feb 2008 08:43:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[
&#8216;मोहल्ले&#8217; पर किसी ने महादेव देसाई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/files/2008/02/img_0131_edited.jpg" title="malati choudhary ,nagabhushan,"><img width="676" src="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/files/2008/02/img_0131_edited.jpg" alt="malati choudhary ,nagabhushan," height="834" style="width:507px;height:683px;" /></a></p>
<p>'मोहल्ले' पर किसी ने <a href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=2225656928131671963&#38;postID=5381924148177864762">महादेव देसाई</a> के नाम से टीपा।'अंग्रेजों भारत छोड़ो-करो या मरो' के नारे के बाद इस नारे को सर्वप्रथम लगाने वाले के साथ गिरफ़्तार हुए महादेव देसाई १५ अगस्त , १९४२ को जेल बना दिए गए आगा खाँ महल में मरे ।</p>
<p>    उन जैसे महानुभावों से चाहूँगा ऊपर दिए चित्र को चीन्हने की कोशिश करें , दिक्कत हो तब भाकपा(मा.-ले.) के किसी पुरानी साथी से पता करें। मैं करीब २०-२५ दिनों बाद लौटा तब इस चित्र पर लिखूँगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/12/21/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Dec 2007 13:21:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[ 
Technorati tags: महादेव देसाई, पत्रकारिता, स्टे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriteref168148cad0-8d64lloyd7.jpg"><img align="left" width="379" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriteref168148cad0-8d64lloyd-thumb5.jpg" height="404" style="border:0;" /> </a></p>
<div style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be">पत्रकारिता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%a1">स्टेड</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalist">journalist</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a></div>
<p align="left">    अग्रगण्य विदेशी पत्रकारों के विषय में बताना ज्यादा अनुकूल है , उनसे हमें जितना सीखने लायक है वह सीखना है , कारण पत्रकारिता अपनी कला नहीं विदेशी कला है ।</p>
<p align="left">    <strong>लॉईड गैरिसन</strong> का नाम लेते ही आँखें भर आती हैं ।   लॉयड गैरीसन जैसे  अमानुषिक अत्याचार तथा घनघोर गुलामी के मुकाबले भयानक परिणामों की परवाह किए बगैर जूझने वाले व्यक्ति को कोई सत्याग्रही कैसे भुला सकता है ! एक बार उनके मुह से यह बात निकल गयी कि गुलामी रफ़्ता रफ़्ता बन्द होनी चाहिए । तुरन्त भूल समझ में आई तब इसका सार्वजनिक पश्चाताप प्रकट करने में उन्हें संकोच नहीं हुआ । उक्त पश्चाताप को प्रकट करना उन्होंने अपना धर्म माना । उस वक्त के उनके यह उद्गार इतिहास प्रसिद्ध हैं :</p>
<blockquote>
<p align="left"><em>" पार्क स्ट्रीट के गिरजा में रफ़्ता रफ़्ता गुलामी नाबूद करने के लोकप्रिय किन्तु दूषित विचार मैंने बगैर सोचे-समझे कबूले थे । आज उन्हें पूरी तरह वापस लेने का अवसर ले रहा हूँ ताकि उनका कोई दुरुपयोग न कर सके । ईश्वर से , अपने मुल्क से और गरीब गुलामों से जाहिर तौर पर माफ़ी माँग रहा हूँ - कि मैंने भीरुतापूर्ण , अन्यायपूर्ण और बगैर अक्ल के के विचार को खुद के दिमाग में घुसने दिया तथा मैंने उन्हें प्रकट किया । सार्वजनिक माफ़ी माँग कर मेरे अन्तर को ठण्डक पहुँच रही है । मेरी भाषा की कठोरता कइयों को  पसन्द नहीं , यह मैं जानता हूँ । क्या कठोर भाषा की आवश्यकता नहीं है ?  निश्चित ही मैं सत्य जैसा कठोर बनूँगा , न्याय के समान न झुकने वाला रहूँगा । जिस घर में आग लगी हो उसके मालिक को क्या मद्धिम स्वर में पुकार लगानी चाहिए ? - आपका विवेक यदि कहता हो तो बताएँ । जिसकी पत्नी के साथ बलात्कार हो रहा हो उसे आहिस्ता आहिस्ता बचाने की सलाह आप के दिमाग में आती हो तो दीजिए । आग से घिरे बच्चे को रफ़्ता रफ़्ता बचाने की सलाह देने वाला आपका हृदय कठोर हो तो वह आपको मुबरक ! परन्तु इस गुलामी को रफ़्ता रफ़्ता नाबूद करने की बात मेरे सामने मुँह से मत निकालिएगा । गुलामी को नाबूद करनी की मुझे झक चढ़ी है , मैं फूँक फूँक कर नहीं बोलनी वाला हूँ और न ही किसी पर मुरव्वत करने वाला हूँ। मैं रत्ती भर पीछे हटने को तैय्यार नहीं हूँ । मुझे सुने बिना आपका चारा नहीं है । "</em></p>
</blockquote>
<p align="left">    स्टेड कई बार जनता के कोप का शिकार हुआ था । बोर युद्ध में ब्रिटिश  पक्ष को अन्यायी मानते हुए उसकी हार की कामना के सार्वजनिक उद्गार उसने प्रकट किए थे तथा ब्रिटिश फौज द्वारा किए गए अत्याचारों के विवरण अपने पत्र में निडरता से व आग्रहपूर्वक छापे थे । एक बार अनिष्ठ का विरोध करने में वह जेल भी गया था । डीलेन और सी . पी. स्कॉट की कथा मैं कुछ तफ़सील से कहना चाहता हूँ ।</p>
<p align="left">    इंग्लैंड के इन दो नामचीन सम्पादकों से हर पत्रकार को कफ़ी कुछ सीखना चाहिए । <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriteref168148cad0-8d64cp-scott-150x1809.jpg"><img align="left" width="377" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/12/windowslivewriteref168148cad0-8d64cp-scott-150x180-thumb7.jpg" height="374" style="border:0;" /></a> इनमें <strong>सी . पी. स्कॉट</strong> की जीवनी तो किसी कर्मयोगी साधु की जीवनी है , जिसे पढ़ कर पवित्र और उन्नत हुआ जाता है । डीलेन स्कॉट का पूर्ववर्ती था । वह एक विलक्षण मूर्ति था। कहा जाता है कि ३६ वर्षों के सम्पादकत्व में उसने <strong>'टाईम्स ' </strong>में एक भी लेख नहीं लिखा - हांलाकि यह बात अक्षरश: सही नहीं है - बावजूद इसके <strong>'टाईम्स '</strong>  को उसने सरकार का मुखपत्र नहीं परन्तु सरकार का व्यवस्थापक , <strong>oragan नहीं organizer </strong>बनाया था।उसने अब्राहम लिंकन जैसी हस्ती का प्रमाणपत्र हासिल किया -"  <strong>'टाइम्स' </strong>जगत की महाशक्ति है , मिसीसिपी के बाद उससे बड़ी और कोई शक्ति नहीं है ।" डीलेन की जीवनी असाधारण प्रतिभा का एक नमूना है । निडरता की मानो वह मुहर था तथा बड़े भूप अथवा बड़े मान्धाता जैसे प्रधानमन्त्रियों पर भी मुरव्वत किए बिना वह अख़बार चलाता था । " किसी राज्य के धुरंधर का कर्तव्य भले चुप रहना हो, समाचारपत्र का कर्तव्य परिणाम के भय के बिना सत्य प्रगट करना है , अन्याय और अत्याचार को उद्घाटित करना तथा जगत के न्यायासन के समक्ष उसे पेश करना है........ कोई सरकार चाहे जितना तीन पाँच कर सत्ता में आई हो अथवा उसके कृत्य चाहे जितने कूड़ा हों फिर भी उसके प्रति अन्य सरकारें बाह्य मान से भले बरतें परन्तु अख़बार के ऊपर ऐसा कोई बन्धन नहीं होता । कूटनीतिज्ञ परस्पर विवेकपूर्ण व्यवहार भले न करते हों , परन्तु अख़बार को उन धवल बगुला भगत बने लोगों के काले कृत्य तथा ख़ून कर गद्दी हासिल करने वालों के रक्तिम हाथों को अवश्य उद्घाटित करना चाहिए । समाचार विश्लेषकों का कर्तव्य इतिहासकार की भांति सत्य को खोज कर उसे जनता के समक्ष पेश करना है । " - यह उद्गार एक ऐतिहासिक प्रसंग में उसने लिखे थे तथा इन्हीं तत्वों पर टिके रहकर उसने ३६ वर्षों तक <strong>' टाईम्स '</strong>  का सम्पादन किया । सत्य ढूँढ़ निकालने तथा उसे प्रगट करने की उसकी रीति भी गजब थी ; प्रत्येक दिन समाज में और राजनेताओं के बीच घूमना , कैयों को दावत देना और कैयों के यहाँ दावत खाने जाना । इतिहास के झोंके को पहचान कर लोकमत को दिशा देने की तैयारी करना ; रात्रि १० से सुबह ४ - ५ बजे तक लगातार जगे रह कर पत्र की एक एक  खबर देखना , उसकी हर पंक्ति को जाँचना , हर लेख को जाँचना , सुधारना , भूल करने वालों के कान पकड़ना तथा अखबार के अंक की पहली प्रति निकलने से पहले दफ़्तर न छोड़ना । <strong><em>' युरोप का सर्वाधिक जानकार व्यक्ति '</em></strong> की उपाधि उसे मिली थी तथा रानी विक्टोरिया भी उसके लेख नियमित पढ़तीं । इस सब के बावजूद इस पद और प्रतिष्ठा से हासिल शक्ति और सत्ता का दुरुपयोग उसने कभी नहीं किया था , किसी के द्वारा दिए गए विश्वास का अघटित उपयोग नहीं किया , किसी के पक्ष के वश में हुए बिना या किसी पर मुरव्वत किए बिना अपने अख़बार की उच्च प्रतिष्ठा को कभी नीचा नहीं होने दिया , अपने पत्र की भाषा एवं विचार को भी उसने सदा उच्च कक्षा में स्थापित रखा ।</p>
<p align="left"><strong>[ जारी ] </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई]]></title>
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<pubDate>Fri, 23 Nov 2007 02:16:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: महादेव देसाई, पत्रकारिता, सम्पा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be">पत्रकारिता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%95">सम्पादक</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0">सूत्रधार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/editors">editors</a></p>
<p align="left">    अब विचार किया जाए अखबार के इन सभी अंग - उपांगों को एकजुट कर एक सजीव कृति के रूप में गढ़ने वाले सम्पादक पर । उस सजीव कृति को गढ़कर उसे कौन सा उद्देश्य हासिल करना है उस पर काफ़ी कुछ निर्भर रहता है । ( १ ) कुछ सम्पादक सिर्फ़ लोकमत का प्रतिबिम्ब दरसाते हैं , लोकमत की योज्ञता - अयोज्ञता पर बगैर विचार किए सिर्फ़ उन्हें ज्यों का त्यों पेश कर देते हैं । ( २ ) कुछ सम्पादक लोकमत को जान - समझ कर उसे सुधारने वाले , गढ़ने वाले और मौका पड़ने पर जनता के विरुद्ध , उसका तिरस्कार झेल कर भी अन्याय और दुराचार के विरुद्ध जबरदस्त जुंबिश चलाने वाले होते हैं । ( ३ ) कुछ लोकशिक्षक होते हैं , अपने जमाने को पलटने वाले । प्रथम वर्ग में आने वालों की संख्या ढेरों ढेर होती है । दूसरे और तीसरे वर्ग में आने वाले गिने-गिनाये ही होते हैं ।</p>
<p align="left">    विलायत और अमेरिका जैसे स्वतंत्र देशों में पत्रकारिता की कला सम्पूर्ण रूप से खिली है तथा वहाँ इन तीनों प्रकार के सम्पादक मिलते हैं । तीनों प्रकार के सम्पादकों ने अपने - अपने अखबारों को सफल समाचारपत्र बनाया है , शिक्षण सार्वजनिक हो चुका है इसलिए एक - एक पत्र की १० से २० लाख तक नकल  खपती हैं । उनके दफ़्तरों में डेढ़ से दो हजार तक लोग होते हैं । सिर्फ सम्पादकीय विभाग में ही मुख्य सम्पादक के मातहत अनेक विभागों के सम्पादक - उपसम्पादक मिला कर २० - २५ लोग होते हैं जिनके मददगार - कारकून अन्य ढेर सारे होते हैं । हमारे निर्धन देश में एक सूत्रधार को ही यह सारे खेल खेलने होते हैं । देश परतंत्र है इसलिए उसकी चोट जिनके हृदय पर है वे मुल्क को आज़ाद कराने में जूझे अथवा अखबार निकालें ?</p>
<p align="left">    इन विषम परिस्थितियों में भी सी.वाई. चिन्तामणि जैसे , रामानन्द चैटर्जी जैसे , मोतीलाल घोष , श्री नटराजन एवं कालीनाथ राय जैसे सम्पादक तैयार हुए हैं यह ईश्वर की कृपा है । गांधीजी और तिलक महाराज जैसे तो किन्हीं भी परिस्थितियों में पहाड़ तोड़ने वाले विरले होते हैं । अन्य पत्रकार हैं जिन्होंने अपने - अपने अखबारों को आर्थिक रूप से सफलता दिलायी है , जिन्होंने जनता या सरकार को न छेड़ने की नीति अपना कर हवा का रुख देख कर नाव चलाई है । ऐसे सफल अखबार अपने देश में अंग्रेजी में तो चल ही रहे हैं ,  गुजराती में भी चल रहे हैं । मैं इन 'सफल' पत्रों की चर्चा का इच्छुक नहीं हूँ । मेरी नज़र में जनता को गढ़ने वाले , जनता की सेवा करने वाले अखबार ही रहे हैं । इसलिए उपरिवर्णित दूसरे और तीसरे किस्म के सम्पादकों का ही तफ़सील से वर्णन करूँगा ।</p>
<p align="left">    <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter516ad781adc8-78cclokmanya-tilak81.jpg"><img width="495" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter516ad781adc8-78cclokmanya-tilak-thumb61.jpg" height="437" style="border-width:0;" /></a> इन लोक शिक्षक तथा राष्ट्र निर्माता सम्पादक का वर्णन करते हुए सी.पी स्कॉट ने कहा है , " लोकमत पर असर डालना तथा उसे चित्रित करना महाभारत समान है , किसी एक व्यक्ति अथवा एक अखबार के लिए इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरना मुश्किल है । इस कार्य के लिए उत्तमोत्तम कुशलता चाहिए , शिक्षा के उत्तमोत्तम संस्कार चाहिए , कुशाग्र बुद्धि-शक्ति चाहिए ; इन सब गुणों के साथ - साथ इन्हें सामर्थ्य प्रदान करने वाली धर्मभीरुता चाहिए , सत्यनिष्ठा चाहिए - हृदय की नहीं अपितु बुद्धि की सत्यनिष्ठा की आवश्यकता होनी चाहिए । " इन गुणों से लैस सम्पादक ही दूसरी तथा तीसरी कोटि में आ सकते हैं । दूसरी श्रेणी के सम्पादकों के नाम ढूँढ़ने पर अमेरिका के लॉइड गैरिसन , इंग्लैंड के डीलेन , स्टेड और सी.पी. स्कॉट तथा अपने मुल्क में गांधीजी का नाम सूझता है । तीसरी श्रेणी में गांधीजी और तिलक महाराज के सिवा अन्य नाम नहीं सूझता । <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter516ad781adc8-78ccghandi-rightvsmight81.jpg"><img width="456" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter516ad781adc8-78ccghandi-rightvsmight-thumb61.jpg" height="522" style="border-width:0;" /></a></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p>    स्व. मोतीलाल घोष , श्री चिंतामणी , नटराजन , रामानन्द चैटर्जी  तथा कालीनाथ राय की गिनती मैं समर्थ समाचार विश्लेषकों में करता हूँ । देश की परिस्थिति के कारण इनकी सेवा की शक्ति मर्यादित रही है । स्व. मोतीलाल की कटाक्ष भरी कलम एक बार बंगाल की सरकार पर भारी पड़ गयी थी , परन्तु उनका प्रभाव ऐसा था कि उन्हें सरकार कभी जेल में ठूँस न सकी । जेल में भरने का युग आया तब वे ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज जहाँ नहीं उगता उस धाम में पहुँच चुके थे । श्री चिन्तामणि का ज्ञान आश्चर्यजनक है ।कहा जाता है कि पिछले पचास वर्षों का हिन्दुस्तान का इतिहास उन्हें उँगलियों पर याद है और छोटी से छोटी घटना को वे तारीख़ सहित बता सकते हैं । मॉन्टेग्यु जब भारत आया तब उनके ज्ञान से आश्चर्यचकित हो गया था । नटराजन एक अनुभवी समाजसुधारक तथा सिद्धहस्त पत्रकार हैं , रामानन्द चैटर्जी और कालीनाथ राय गहरे अध्ययन के बूते अनेक लेखकों को शिक्षित करने का मद्दा रखते हैं। परन्तु गांधीजी और तिलक महाराज की जात और भात इन सब से जुदा है । उनकी पत्रकारिता पर उनके लोकनेतृत्व की छाप पड़ी है। दोनों राष्ट्र निर्माता और लोकशिक्षक हैं । उनकी बात मैं यहाँ क्या करूँ ?उन दोनों की सत्ता और प्रभाव का अनुभव अभी हम कर रहे हैं तथा आगे भी करेंगे । उनके लोकशिक्षण के नतीजे हमारी नजरों के सामने तैर रहे हैं ।</p>
<p><strong>[ अगला : प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार ]</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई]]></title>
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<pubDate>Thu, 15 Nov 2007 06:34:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    लोगों की सुरुचि के पोषक , रसवृत्ति क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    लोगों की सुरुचि के पोषक , रसवृत्ति की उन्नति करने वाले व बुद्धि का अनुरंजन करने वाले उपायों पर एक भी अखबार जोर नहीं देता। हम वीभत्स चित्र देते हैं लेकिन मौजूदा राजनैतिक अथवा सामाजिक परिस्थिति पर प्रकाश डालने वाले <strong>' कार्टून '</strong>  - व्यंग्य चित्र क्यों नहीं देते ? कार्टून की कला पश्चिम में खूब विकसित हुई है, ' हिन्दुस्तान टाइम्स ' में शंकर नामक कलाकार उत्तम व्यंग्य चित्र बनाता था ।यदि अखबार व्यंग्य चित्रों को तरजीह दें तो उनमें कौशल हासिल करने वाले अनेक लोग पैदा हो सकते हैं । आकर्षक अनुच्छेद लिखने की कला भी विकसित करने लायक है, इससे पाठकों की बुद्धि को खुराक मिलती है तथा विनोद वृत्ति बढ़ती है । 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के तत्कालीन सम्पादक जोसफ़ इस कला में अनूठे थे । एबिसीनिया पर अत्याचार के कारण इटली पर रोक द्वारा सजा के उपायों की बड़ी बड़ी बातें चल रही थीं । इन उपायों को अमल में लाने की कूअत किसी में नहीं थी - इस बात की व्यंग्यात्मक टीका करते हुए इस लेखक का लिखा एक पैराग्राफ़ याद आ रहा है : " सैंकशन्स शुरु होते ही उन का कितनी कड़ाई से अमल होगा , यह काबिले गौर है । न्यू दिल्ली के भोजभात में <em>मेकेरोनी</em> और <em>स्पाघेटी </em>का बहिष्कार होगा । इटालियन शराब तो कोई छुएगा भी नहीं । पराक्रमी फ्रान्स तो सर्वप्रथम सैंकशन्स लगाएगा , इसलिए शैम्पेन की पूछ बढ़ जाएगी । अखबारों को तो लम्बी छुट्टी ले लेनी होगी क्योंकि छपाई तो पूरी <em>रोमन टाइप</em> में होती है, या फिर <em>ईटालिक्स</em> में । अंग्रेजी में शब्द भी लैटिन से आते हैं यानी अत्याचारी प्रजा इटली की भाषा से - इसलिए उसका भी बहिष्कार ! "   <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter94479051063c-d46b800px-spaghetti-prepared9.jpg"><img width="465" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter94479051063c-d46b800px-spaghetti-prepared-thumb5.jpg" height="367" style="border:0;" /></a></p>
<p align="left">    कटाक्ष द्वारा लम्बे बोधप्रद लेख लिखने वाले स्व. लल्लू काका के पुत्र भाई गगनविहारी हैं । उनका पूरा लेख तो क्या उद्धृत करूँ?हमारी कायरता , त्याग तथा उद्यम करने की अशक्ति का दोष खुद पर न ले कर औरों के मत्थे पढ़ने की वृत्ति का जो जानदार उपहास <strong>"कोई और"</strong> नामक लेख में उन्होंने किया है उसे पढ़ कर कौन अपने गिरेबान में नहीं झाँकेगा तथा आनन्द नहीं लेगा ? उस लम्बे लेख से कुछ झलकियाँ पेश कर रहा हूँ :</p>
<blockquote>
<p align="left">" आप के काम में भी क्या यह अज्ञात मनुष्य असंख्य विघ्न नहीं डाला करता है ? कोई किताब ढूँढे न मिल रही हो , कोई नोटबुक या फाइल खो गई हो , कोई कागज लापता हो - ऐसी स्थिति में दफ़्तर के सभी कारकून पूरे यकीन से यही कहते हैं कि भूल किसी दूसरे की थी ।...</p>
<p align="left">" सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में इस अज्ञात व्यक्ति की विनाशकारक शक्ति को हर जगह देखा जा सकता है । सभी युद्ध अन्य देशों की दुष्टता के कारण होते हैं , यह साफ़ है । दूसरे देश ही शान्ति का उल्लंघन करते हैं ,हिंसामय माहौल बनाते हैं तथा हरेक युद्ध का आरम्भ करते हैं ।हमारा अपना देश तो हमेशा आत्मरक्षार्थ ही लड़ता है ।युद्ध के दौरान होने वाले तमाम अधम कृत्य , अत्याचार तो परदेशी ही करते हैं ।.......</p>
<p align="left">" हर रोज अखबार पढ़ने का महान देश-कार्य करते वक्त असंख्य लोगों को यही लगता कि यदि भारी तादाद में दूसरे जेल गए होते , लाठी खाई होती और स्वदेशी का व्रत लिया होता तो पूर्ण स्वराज्य नहीं तो उसका सत्व या तत्व अवश्य मिल जाता । बहुतेरे देशबन्धुओं ने मुझे भरोसा दिया है कि यदि केवल एक लाख लोग मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार होते तो भारत जरूर आज़ादी प्राप्त कर लेता ।.....</p>
<p align="left">" हिन्दू और मुसलमान कौमों के नेता एकता की आवश्यकता के बारे में एकमत हैं । बावजूद इसके एकता क्यों नहीं सधती है ? कौन इन नासमझियों और विद्वेष को उत्पन्न करता है ? दूसरी कौम के दूसरे मनुष्य ! इसलिए नेता अन्य मनुष्यों से ( अथवा नेताओं से ) एकता साधने की निरंतर विनती करते रहते हैं ।.......</p>
<p align="left">" इस प्रकार यह अनजान मनुष्य हमारी राष्ट्रीय प्रगति को अटका देता है , हमारे सामाजिक जीवन को अव्यवस्थित कर देता है तथा आर्थिक उन्नति हासिल करने नहीं देता । इसके बावजूद उससे हमारी भेंट नहीं होती ! कोई शर्लॉक हॉम्स जैसा कुशल डिटेक्टिव या सरकार की खूफिया पुलिस या गुप्त जासूस भी उसे पकड़ नहीं पाते , वैसे ही कोई योगी प्रबल समाधि द्वारा उस सर्वव्यापी , अगाध एवं गहन व्यक्ति के अस्तित्व के रहस्य का भेद नहीं जान पाता है ।...."</p>
<p align="left">" क्या पता यह रहस्य जो इतना कठिन लग रहा है, वह बिलकुल सरल हो ? यह दूसरा आदमी जो हर जगह बसता है और कहीं नहीं बसता - वह शायद आप में , मुझ में तथा हम सब में ही तो नहीं बसता होगा ?....."</p>
</blockquote>
<p align="left">  इसी दिशा में ; परन्तु कुछ अलग प्रकार और अलग लहजे का आभास देने वाले मीठे कटाक्ष 'स्वैरविहारी' रामनारायण पाठक के होते हैं । हम सब की गंदगी जुटाने की वृत्ति पर उनकी कटार देखें :</p>
<blockquote>
<p align="left">"  यहाँ , मुम्बई आया हूँ इसके बावजूद यह नहीं लगा कि मुल्क छोड़ कर आया हूँ । उसका कारण अपनी भाषा , अपने मित्र , जाने-पहचाने रीति रिवाज आदि सब कुछ है परन्तु सब से विशेष है यहाँ का कूड़ा । जब नजर के सामने कूड़े के अम्बार को बढ़ते देखता हूँ तब लगता है, ' नहीं,नहीं, मैं अभी गुजरात में ही हूँ ।'  गीत फूट पड़ता है :</p>
<p align="left">' जहँ - जहँ बसा एक गुजराती , तँह - तँह सदा काल गुजरात ! ' <a href="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter94479051063c-d46bgarbage-pickup5.jpg"><img width="495" src="http://kashivishvavidyalay.files.wordpress.com/2007/11/windowslivewriter94479051063c-d46bgarbage-pickup-thumb3.jpg" height="342" style="border:0;" /></a></p>
<p align="left">" लोग बेवजह बढ़ते हुए कूड़े की फरियाद करते हैं । कूड़ा तो बढ़ेगा ही , और कर ही क्या सकता है ?  मुम्बई का विकास चाहने वालों ने बड़े बड़े पीपे रख छोड़े हैं - कूड़ा इकट्ठा करने के लिए । वैसे तो हमारे गाँव में भी कूड़ा एकत्र करने के लिए स्थान निर्धारित है। पर यह कूड़ा है कि बिना फैले रह नहीं पाता । समुद्र में तूफान भले न आये लेकिन वो कूड़ा जरूर छोडता है । कूड़े की फरियाद करने वाले समझ नहीं पाते । यदि उसका कारण समझ लेते तब शायद फरियाद न करते । कूड़ा यानी गन्दगी की जगह - यह बात सही है , न ? अब हम ठहरे साफ-सुथरे लोग , इतनी ज्यादा गन्दगी वाली जगह से सम्पर्क की सरहद तक कैसे जा सकते हैं ? इसलिए कचरा दूर से फेंकने का चलन है । दूर से फेंकने पर फेंकने वाले तक उसका थोड़ा भाग जरूर बिखरता है । टेनिस खिलाड़ी गेंद मारता है तब हर बार निर्धारित चौखटे में ही गेंद टप्पा खाये यह जरूरी नहीं होता है । फिर कूड़ा एक गेंद जैसा तो होता नहीं । कूड़े में कई चीजें गेंद से बड़ी - छोटी होती हैं । कचरे का पीपा या हाते भी टेनिस के चौखटों जितने बड़े कहाँ होते हैं ? इसलिए दूर से कचरा फेंकने पर उसका थोड़ा भाग फेंकने वाले व्यक्ति तक बिखरेगा । उस के बाद कचरा फेंकने आने वाले व्यक्ति को इस नई सरहद के बाहर खड़े हो कर कचरा फेंकना पड़ता है , इस प्रक्रिया में कूड़े की सीमा का विस्तार होता है,तो उसमें बेचारा व्यक्ति क्या कर सकता है ? "</p>
</blockquote>
<p align="left">यह सुन्दर रुचिकर सामग्री मासिकों में ही क्यों छपे , इसका लाभ दैनिक और साप्ताहिक क्यों नहीं उठा सकते ? दैनिकों और साप्ताहिकों को अपने पाठकों की रसतृप्ति पथ्य के रूप में करना नहीं सूझा है ।</p>
<p align="left"><strong>[ जारी ,</strong> अगली कड़ी<strong>- सम्पादक ]</strong></p>
<p align="left">   </p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/cartoons">cartoons</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/wite-ups">wite-ups</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई]]></title>
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<pubDate>Sun, 11 Nov 2007 06:57:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछला भाग  अखबारों के मुख्य अंगों की ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/11/01/amritbajar_patrikastatesman/">पिछला भाग</a>  अखबारों के मुख्य अंगों की बात मैंने की है । इनमें अब नए नए अंग शामिल हो रहे हैं । सिनेमा जगत के बारे में पूरे पृष्ट की सामग्री आ रही है , खेल कूद की बाबत भी । इन पर मेरी नज़र नहीं पहुँचती है । हाल ही में एक कतरन पढ़ी , जिसमें लेखक कहता है कि साहित्य परिषद<strong> ' फुरसतियों का जलसा '  </strong>है , परन्तु (या तथा ? ) <strong>'सिनेमा साहित्य का प्रमुख अंग है।'</strong> इस साहित्य के बारे में अपना अज्ञान मैं कबूलता हूँ ।सिनेमा देखने वालों की आँखें बहुत तेज़ होनी चाहिए इसमें सन्देह नहीं , मैं तो पूरी जिन्दगी में दो चार बार ही सिनेमा गया हूँ , इसलिए बाल की खाल निकालने की वृत्ति हो ऐसा नहीं , बल्कि मेरी आँखें कमजोर हैं इसलिए । एक सिनेमा-शास्त्र-प्रवीण ने फिल्म की सफलता की अनिवार्य शर्त बतायी है जो जान लेनी चाहिए: ' स्त्री-पुरुष संबंध पर पर्याप्त मात्रा में उत्तेजक सामग्री भरो , अच्छे से अच्छे दृश्य प्रस्तुत करो तथा अभिनय द्वारा पूरा अलंकरण करो , बस बेड़ा पार हो जाएगा ।' इस स्वीकृति से बढ़कर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।</p>
<p align="left">    अखबारों का एक अंग रह गया- वह भी एक आवश्यक 'जीवनप्रद' अंग ; 'जीवनप्रद' क्योंकि कहा जाता है कि अखबार उसके बिना टिक नहीं सकते हैं । यह भी इस जमाने का कैसा अटपटा दस्तूर है कि जहर ही कैसी जीवनप्रद वस्तु बन गया है ? यह मेरी चूक है । अखबारों को वह जहर खुद पीना नहीं पड़ता , वे तो उसे बेचने का व्यापार करते हैं और उसके दम पर जीवित रहते हैं । प्राकृतिक नियमों के चाहे जितने उल्लंघन कीजिए , शरीर अथवा मन को उससे कोई हानि नहीं पहुँचने वाली- अधिकांश आमदनी कराने वाले विज्ञापनों का यह निचोड़ होता है । एक प्रतिष्ठित दैनिक के व्यवस्थापक से मालूम हुआ था कि भड़काऊ लाल रंग में छपे , दो इंच चौड़े और चार इंच लम्बे सिगरेट अथवा याकुती ( चासनी में पगी कामोत्तेजक भाँग) के विज्ञापन से सैंकड़ों रुपये प्राप्त होते हैं । अच्छे से अच्छे माने  जाने वाले अखबारों में याकुति तथा ' नवाबी रति शक्ति '  की वीभत्स विज्ञापन भरे रहते हैं ; ' गुप्त वशीकरण  मन्त्र ' अथवा 'शत प्रतिशत सफल संतति नियमन के साधन ' के विज्ञापन उनके पृष्ठों को सुशोभित करते हैं । चाय के बारे में पाँच हिन्दी अखबारों में छपी पाँच अलग अलग स्तुतियाँ एक सज्जन ने मुझे भेजीं थीं । एक अखबार अपने ग्राहक बनने वालों को उसी प्रेस से छपा 'कामविज्ञान '  मुफ्त देता है । मुम्बई के एक प्रतिष्ठित अखबार ने पूरे एक पृष्ठ पर बिछे विज्ञापन में याकुति को प्रमाणपत्र दिए हैं , उन पर अखबार ने इस बात की अपनी मुहर लगा दी है कि उसके संवाददाता इन प्रमाणपत्रों को देख चुके हैं और उसकी सत्यता की पुष्टि कर रहे हैं । एक प्रतिष्ठित मासिक में 'स्त्री आकृति की कामोत्तेजक अंग' नामक एक पुस्तक का सचित्र विज्ञापन छपा है , इस विज्ञापन में काफी वीभत्स वर्णन हैं । यह पूरा विज्ञापन स्त्री जाति का भीषण अपमान है । यदि इन विज्ञापनों के बिना ये अखबार नहीं टिक सकते हों , तब हम इन्हें तिलांजलि ही क्यों न दे दें ? काका साहब का  इस सम्बन्ध में कहा गया एक तीखा वाक्य उद्धृत किए बगैर काम नहीं चल सकता :"अखबारों में जब इतने सारे घटिया विज्ञापन देखता हूँ तब मन में विचार आता है कि प्रभु सेवा के लिए एकाध उत्तम देवमंदिर बनाने के बाद उसका खर्च चलाने के लिए उसके परिसर स्थित कोठरियाँ शराबखाने तथा वेश्याओं को किराए पर देने जैसा यह नहीं है ? "</p>
<p align="left">    यह तो हुई अनीतिपोषक विज्ञापनों की बात । परन्तु अन्य ऐसे उटपटांग विज्ञापन अखबारों में आते हैं जो कत्तई शोभास्पद नहीं होते।एक बेचारे ने गांधीजी को पत्र लिख कर पूछा था ," बेलगाँव में कानून के कॉलेज के बारे में यह विज्ञापन देखा था ।आपके परिचित हों तो क्या उनसे पूछ कर पुष्टि करा लेंगे ? यह कॉलेज ऐसा है कि ६० रुपये की पहली फीस देनी होगी ,इसके बदले खाना-पीना मुफ्त , किताबें मुफ्त, अमुक महीने में परीक्षा पास करवा देंगे ( परीक्षा हाई कोर्ट में प्लीडर की अथवा ऐसी ही कोई - यह मुझे अब याद नहीं है ।) पास होने पर ६० रुपया वेतन मिलेगा और फेल होने पर ५० रुपये । " यह विज्ञापन तथा ऐसे ही विज्ञापन अखबार नहीं रोक सकते ?</p>
<p align="left">    अखबारों के इन दूषित अंगों में अब एक नया अंग शामिल हुआ है । अनेक उत्तर वाले प्रश्न एकत्र कर उसके सही यानी अखबार द्वारा तय उत्तर देने वाले को ईनाम देने वाली लॉटरी अथवा जुआ । उत्तर तो वहीं दिए हुए होते ही हैं परन्तु निर्दिष्ट उत्तर पसंद करने पर आपकी लॉटरी खुल सकती है । बिना परिश्रम ,बिना बुद्धि धनवान बनना किसे पसन्द न होगा ? ऐसे लोभियों की भरमार से ही अखबारों की जेब गरम रहती है ।</p>
<p align="left"><strong>( आगे - सुरुचिपोषक तत्व )</strong></p>
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<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a8" rel="tag">विज्ञापन</a>, <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0" rel="tag">अखबार</a>, <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be" rel="tag">सिनेमा</a>, <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88" rel="tag">महादेव देसाई</a>, <a href="http://technorati.com/tags/advertisement" rel="tag">advertisement</a>, <a href="http://technorati.com/tags/cinema" rel="tag">cinema</a>, <a href="http://technorati.com/tags/newspapers" rel="tag">newspapers</a>, <a href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai" rel="tag">mahadev desai</a>, <a href="http://technorati.com/tags/journalism" rel="tag">journalism</a></p>
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<title><![CDATA[विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 10:24:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछला भाग :     परदेशी , खास कर युरोपीय घ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/31/reportingkesaritilak/">पिछला भाग</a> :     परदेशी , खास कर युरोपीय घटनाओं के बारे में हम ज्यादा समझ सकें तथा उनकी चर्चा ज्ञानपूर्वक कर सकें , यह जरूरी है । देश के अंग्रेजी अखबारों में भी इस विषय के लिए उत्तम संवाददाताओं का अभाव है , गुजराती अखबारों की तो बात ही दरकिनार  । यह कहा जा सकता है कि उनमें इस विषय का अध्ययन भी सिफ़र है । महायुद्ध ( प्रथम ) के जमाने में खाडिलकर युद्ध के बारे में अध्ययनपूर्ण , ज्ञानवर्धक लेख लिखते थे , उनकी काफ़ी बखान भी होती थी । आज युरोपीय इतिहास और युरोपीय राष्ट्र-सम्बन्धों के ज्ञान से भरे लेखों की बहुत आवश्यकता है । इस कमी को हमें पाटना होगा ।</p>
<p align="left">    लोक वित्त शास्त्र का विषय लें । अब इस विषय के कई विशेषज्ञ यहाँ मिलते हैं । गुजराती अखबारों को चाहिए कि वे इन विशेषज्ञों से वक्त-बेवक्त लेख लेते रहें । विशेष विषय ( उदाहरणार्थ - आज-कल विलायत में शांति की प्रतिज्ञा लेने का अभियान चल रहा है, उस पर ) - अंग्रेजों द्वारा संचालित भारतीय अंग्रेजी अखबारों में इस विषय पर विवेचनापूर्ण और ज्ञानपूर्ण लेख आ रहे हैं । <strong>' स्टेट्समैन '</strong> में युद्ध विषयक हिन्सा-अहिन्सा पर लेखमाला चल रही थी , इस में कुछ लेखों के सुन्दर जवाब <strong>' अमृत बाजार पत्रिका '</strong>  ने दिए थे।गुजराती समाचारपत्र ऐसी बाबतों से अनजान हैं ।</p>
<p align="left">    कुछ घटनाओं पर अध्ययनपूर्ण विवेचन करने के लिए हमें खास लेखकों से गुजारिश करनी चाहिए । ' खोर्द-गोविन्दपुर केस' नाम से चर्चित एक चौंकाने वाला मुकदमा कलकत्ते में चला । इस पर हाइकोर्ट के फैसले की बाबत 'अमृतबाजार पत्रिका' ने इतनी कानूनी ज्ञानभरी टीका छापी कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश को उस पर ध्यान देना पड़ा । वे चिढ़े लेकिन उसके खिलाफ़ कोई कदम न उठा सके और बंगाल भर की जनता के जुबान पर वह मामला चढ़ गया । बारडोली के बेचारे गरीब आदिवासियों को दन्ड न भरने की वजह से सजा हुई ।<br />
इसके बावजूद भी सरकार ने उन्हें बेरहमी के साथ परेशान किया और उनके बर्तन<br />
तथा घरेलू सामान को नीलाम किया । इस पर हाईकोर्ट में कफ़ी टीका हुई और<br />
उन्हें बहुत दिनों के बाद न्याय मिला। इस मसले पर जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी नहीं हुई । ऐसे अन्याय तो अपने गुजरात में थोक में हुए हैं ।
</p>
<p align="left"><strong>[ जारी , अगला - सिनेमा और विज्ञापन वगैरह ]</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p style="display:inline;float:none;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0">अमृतबाजार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/amritbajar%20patrika">amritbajar patrika</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/statesman">statesman</a></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[तिलक महाराज का ' केसरी ' और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/31/%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 14:08:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछला भाग
    इस मामले में (रिपोर्टिंग) ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/30/reportingmahadev-desai/">पिछला भाग</a></p>
<p align="left">    इस मामले में (रिपोर्टिंग) अपने देश में कमी है तथा परिस्थिति का अध्ययन कर उसका भरोसेमन्द वर्णन देने में यह कमी ज्यादा है। कुछ मासिक पत्र इस कमी को पूरा कर पाए हैं । ' प्रस्थान ' मासिक तथा हाल ही में मजदूर सेवकों द्वारा शुरु किए गए ' सर्वोदय ' में विविध आर्थिक विषयों पर अध्ययनपूर्ण एवं अनुभवपूर्ण लेख आ रहे हैं । दैनिकों में इस बाबत मानो अकाल ही रहता है । इस सन्दर्भ में महाराष्ट्र के अखबारों से हम सीख सकते हैं । ' केसरी ' की तिलक महाराज के समय की अथवा केलकर के समय की फाईल उठाइए, उनमें आपको अनेक विषयों पर ढेरों अध्ययनपूर्ण लेख मिल जाएँगे । अध्ययन और स्वाध्याय की जितनी आवश्यकता आज है , उतनी पहले कभी न थी । हमारी राजनीति और अर्थशास्त्र व्यापक हो गए हैं ,गत पन्द्रह वर्षों में हमने यह देखना शुरु किया कि हिन्दुस्तान देहातों में बसा है , किसानों और मजदूरों में बसा है । फिर भी अखबार तो शहरों से ही छपते हैं ।  संवाददाता गाँव तब ही जाते हैं जब किसी नेता का का वहाँ दौरा लगा होता है और उनके भाषण की रपट बनानी होती है । गाँवों के सवाल , किसानों की आर्थिक स्थिति ,  उनकी बदहालियों का उनके बीच रहकर अध्ययन करने वाले बहुत कम हैं । तिलक महाराज से सुना है कि पहले पाँच वर्ष तक किसी आर्थिक विषय को चुनकर उसका अध्ययन करने की शर्त वे अपने मातहतों पर लगाते हैं ,फिर उनसे लेख लिखवा कर परीक्षा लेते थे ।</p>
<p align="left">  सी . पी. स्कॉट जिनका उल्लेख पहले हुआ है , तथा तफ़सील से जिनका जिक्र होगा , उनके अखबार ' मेंचेस्टर गार्डियन ' के विषय में कहा जाता था कि वह अखबार एक विश्वविद्यालय था । ऑक्स्फोर्ड और कैम्ब्रिज से निकले अव्वल स्नातक उस पत्र से जुड़ते परन्तु उनकी सही तालीम मि. स्कॉट के साथ शुरु होती । एक बार अपने बेटे लॉरेन्स को लेख लिखने वाले सहायक का पद लेने के आग्रह करते हुए उन्होंने एक पत्र लिखा । अखबार में काम करने के इच्छुक हर व्यक्ति को इसे पढ़ना चाहिए तथा उसमें बतायी बातों पर अमल करना चाहिए । <img border="0" align="middle" width="204" src="http://www.oakknoll.com/bookimag/039045.jpg" height="252" /></p>
<blockquote>
<p align="left">  " अब तक चित्रकला और नाटक में तुम्हारा मन लगता था । सामाजिक प्रश्न तुम्हें बहुत आकर्षित नहीं कर पाते हैं , परन्तु अपने पसन्दीदा विषयों पर तन - मन से काम किया था वैसे ही अब इन विषयों पर तुम्हें जुटना होगा । मैंने अपना जीवन मानव-सेवा की परम निष्ठा के साथ आरम्भ किया था तथा उसकी वजह से मैं आगे निभ पाया हूँ । जीवन के सभी विषयों पर मेरी वृत्ति इसी रंग में रंगी है । तुम्हारा रास्ता शायद उलटा हो ।मैंने समाज सेवा की सामान्य निष्ठा से काम शुरु किया था , शायद तुम विशिष्ट प्रश्न से आरम्भ कर तब इस निष्ठा पर आओगे । इसका परिणाम भी सुन्दर होना चाहिए । ...............तुम्हें श्रमजीवियों के प्रश्न को हाथ में लेना होगा ।इसके लिए अच्छा खासा परिश्रम करना होगा ,पढ़ना होगा,गरीब कैसे रहते हैं ,खाते - पीते हैं,कौन सी बदहालियाँ झेलते हैं इसका निजी तजुर्बा प्राप्त करना होगा तब तुम्हें इस विषय में मदद मिलेगी। जब श्रमजीवियों की हड़ताल सर पर हो तब उनके नेताओं से खूब मेल जोल बढ़ाना होगा। इस विषय का अध्ययन मि. एण्ड मिसेज़ वेब के मजदूर संघों के इतिहास सम्बन्धी पुस्तक तथा सहकारिता पर लिखी किसी किताब से करना होगा । "</p>
</blockquote>
<p align="left"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%20%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%b0%20%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%95">बाल गंगाधर तिलक</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80">केसरी</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%20%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8">मैंचेस्टर गार्डियन</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%80.%e0%a4%aa%e0%a5%80.%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%9f">सी.पी.स्कॉट</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/tilak">tilak</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/kesari">kesari</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/manchester%20guardian">manchester guardian</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/c.p.scott">c.p.scott</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 09:36:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    मेरे पास &#8216; मेंचेस्टर गार्डियन &#8216; ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    मेरे पास <strong>' मेंचेस्टर गार्डियन '</strong> का एक अंक पड़ा है , उसमें लिबरल 'समर स्कूल ' की व्याख्यानमाला के पाँच सात धुरंधर व्याख्याताओं के चार - पाँच दिनों के व्याख्यानों का उत्तम सार एक पृष्ट के चार कॉलम में दिया गया है । अनेक व्यवसायों के आज के युग में भाषणों के अक्षरश: विवरण लेने की सुविधा हो फिर भी उसका पालन किया जाए यह जरूरी नहीं है , कई लोगों की इतना पढ़ने की फुरसत नहीं होती । फिर यह भी जरूरी है कि वक्ता के साथ तनिक भी अन्याय न हो ऐसा सार संक्षेप प्रस्तुत करने की कला विकसित करना बहुत जरूरी है । कई बार वक्ता आवेश में आ जाता है , गफ़लत में या बेवजह न कहने वाली बातें भी कह देता है , इन बातों को सम्भाल कर ग्रहण करना चाहिए , उसके उद्गारों को हलका करने का नाज़ुक काम भी कुशल रिपोर्टर का हो जाता है ।</p>
<p align="left">    परन्तु यहाँ पुन: सत्यनिष्ठा का प्रश्न उठ खड़ा होता है , न्यायबुद्धि का प्रश्न आ खड़ा होता है । एक ताजा दृष्टान्त दे रहा हूँ । लंडन में <strong>'हिन्दुस्तान में नवयुग की गतिविधियाँ'</strong> शुरु करने के मकसद से एक सभा आयोजित हुई । केटर्बरी के आर्चबिशप ने सदारत की । इनके भाषण की दो रपटें देखें , तथा दोनों का कितना भिन्न भिन्न असर होता है इस पर भी गौर करें । यह है , <strong>रॉईटर</strong> की रिपोर्ट :</p>
<blockquote>
<p align="left">" लंडन में 'हिन्दुस्तान में नवयुग की गतिविधियाँ ' आरम्भ करने के लिए इसी विषय पर केटर्बरी के आर्चबिशप की सदारत में एक सभा हुई । अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने हिन्दुस्तानी ग्रामवासियों के जीवनस्तर को ऊँचा करने के मि. गाँधी के प्रयत्नों की स्तुति की । यह सभा हिन्दुस्तान में काम करने वाले अनेक मिशनरी मंडलों ने आयोजित की थी । वक्ताओं में लखनऊ के बिशप पिकेट भी थे ।</p>
<p align="left">" केटर्बरी के आर्चबिशप ने इस बात पर खास जोर दिया कि अस्पृश्य-उद्धार की हलचल का राजनैतिक लाभ के लिए यदि दुरुपयोग हुआ तो उसको वे कत्तई समर्थन नहीं देंगे ।"</p>
</blockquote>
<p align="left">अब देखिए , उसी दिन के<strong> 'हिन्दू'</strong> के लंडन संवाददाता की रपट :</p>
<blockquote>
<p align="left">" वेस्टमिनिस्टर के सेन्ट्रल हॉल में बीती रात एक बड़ी सभा हुई । वहाँ अस्पृश्यों को ख्रिस्ती धर्म में लेने के लिए इसाई मिशनरी मंडलों की योजनाओं के बारे में सुना गया तथा फलस्वरूप हिन्दुस्तान के अस्पृश्यों के भविष्य की बाबत रस-विशेष जागृत हुआ ।</p>
<p align="left">" केटर्बरी के आर्चबिशप ने मि. गाँधी के कार्य की भारी स्तुति की और साफ़ साफ़ यह कहा कि राजनैतिक टीकाकार भले ही गाँधी की बाबत जो भी कहें या सोचें ,मि. गाँधी ने जो नैतिक छाप डाली है उसके बारे में मुझे या मिशनरियों कोई सन्देह नहीं है । आर्चबिशप ने कहा कि हिन्दुस्तानी लोकमत के नेताओं को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि अस्पृश्यों के बीच काम करने वाले मंडल किसी भी राजनैतिक हलचल का इसाई धर्म के प्रचार के लिए कभी दुरुपयोग नहीं करेंगे तथा हिन्दुस्तान की जनता में से किसी तबके की भावनाओं को भुनाने का कोई भी राजनैतिक दल प्रयास करेगा तो उसमें भगीदार नहीं बनेंगे । इसाई धर्म में शामिल होने की जिनकी इच्छा होगी वैसे लोग इसाई धर्म और उसके कर्तव्य भली भाँति समझ चुके हों तब ही उन्हें स्वीकार किया जा सकता है । "</p>
</blockquote>
<p align="left"><strong>रॉईटर</strong> की रिपोर्ट सच्ची है अथवा <strong>'हिन्दू'</strong> की ? <strong>रॉइटर</strong> की रिपोर्ट में <em>' इसाई धर्म के प्रचार के लिए ' </em>इन शब्दों को उड़ा कर पूरे भाषण को अलग ही ध्वनि दे दी गयी है ,उस रपट में गाँधीजी के अस्पृश्यता निवारण के काम की बजाए ग्राम सेवा कार्य की स्तुतिकी गई- यह बताया गया है ।</p>
<p align="left">    इस प्रकार एक भाषण के संक्षिप्त सारांश से कई बार अर्थ का भारी अनर्थ हो जाता है । गाँधीजी के हिन्दुस्तान में प्रसारित कुछ लेखों के संक्षिप्त सारांश से दक्षिण अफ़्रीका में उनकी जान जा सकती थी । वे लेख जब वहाँ पूरे चपे तब अफ़्रीकावासियों को उन पर हमले करने के लिए पश्चाताप हुआ ।</p>
<p align="left"><strong>[ जारी, अगला : तिलक का 'केसरी' ]</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left">   </p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97">रिपोर्टिंग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/reporting.mahadev%20desai">reporting.mahadev desai</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/27/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sat, 27 Oct 2007 06:10:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    पिछले हिस्से से आगे : समाचारों की बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/21/reportingjournalismmahadev-desai/">पिछले हिस्से</a> से आगे : समाचारों की बात छोड़ कुछ आगे बढ़ा जाए । हांलाकि भाषणों और मुलाकातों के विवरण व्यापक दृष्टि से समाचारों में ही आते हैं । इस सन्दर्भ में हम शैशव में हैं, यह कहा जा सकता है । सिर्फ एक पत्र संतोषजनक है । मद्रास का <strong>'हिन्दू' </strong>। उसके पास कस्बे - कस्बे और गाँव - गाँव में संवाददाता हैं और उसके संवाददाता संकेतलिपि में सिद्धहस्त हैं । बंगाल का <strong>' अमृतबजार पत्रिका '</strong> अब कुछ हद तक <strong>' हिन्दू '</strong>  से टक्कर लेने की कोशिश में है । इस बाबत अन्य कोई समाचार पत्र सन्तोषजनक स्थिति में नहीं है । गुजराती अखबारों की भी वही दशा है । सत्याग्रह का जमाना शुरु होने के बाद भाषणों की रपट देने की कला में काफ़ी हद तक सुधार हुआ है । अपने विषय के साथ न्याय कर , उत्तम साक्षात्कार लेने वाला , अब तक मेरी जानकारी में नहीं है । इसकी वजह अध्ययन और लगन में हमारी कमजोरी है । बिना नोट्स लिए किन्तु समझदारीपूर्वक बातचीत या भाषण का सार प्रस्तुत करने की शक्ति हमारे अंग्रेजी और गुजराती पत्रों में सिफ़र है । ब्लॉविट्ज़ नामक एक प्रसिद्ध संवाददाता १८७२ में<strong> ' टाइम्स '</strong> के सम्पादक डीलेन के साथ वरसाई ( फ्रांस ) गया था । दोनों वरसाई में फ्रांसीसी राष्ट्रपति तियेर का भाषण सुनकर लौटे । ब्लॉविट्ज़ से डीलेन ने कहा : "ऐसे भाषण अक्षरश: छपने चाहिए । कल के अंक में छप पाता तो कितना सही होता ! परन्तु, यह कैसे मुमकिन हो सकता है ?" डीलेन लंदन गया। ब्लॉविट्ज़ स्टेशन से सीधे तार घर गया और लिखने के फार्म ले कर लगा लिखने ।बीच - बीच में आँखें मूँद कर मन में सभा का चित्र लाता और तियेर के हावभाव और वचन याद करता जाता। पलक झपकते भाषण की रपट तैयार हो गयी जो तार से लंडन पहुँची । अगले दिन डीलेन <strong>'टाइम्स'</strong> में ढाई कॉलम में तियेर के वरसाई के भाषण की रपट देख कर भौंचक्का रह गया । अपने यहाँ किसी ब्लॉविट्ज़ के होने की मुझे खबर नहीं है।मैं यह उम्मीद जरूर करता हूँ कि यह मेरा अज्ञान हो । आज के जमाने में ऐसे रिपोर्टर जुटाना असंभव तो नहीं ही होगा ।आवश्यकता विविध विषयों के अध्ययन और तन्मयता की मात्र है ।</p>
<p align="left"><strong>( जारी ) </strong></p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0">समाचार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%95%20%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf">व्यापक दृष्टि</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/news">news</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/21/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 12:55:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    हमारे साप्ताहिक पत्रों में से बहुत ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    हमारे साप्ताहिक पत्रों में से बहुत कम क्षुद्रता से परे रहने वाले हैं । ( इनमें स्थानीय समाचार देने वाले <strong>'प्रजाबन्धु'</strong> और <strong>'लोकवाणी' </strong>को अपवाद स्वरूप गिना जा सकता है ।) इन साप्ताहिकों में भरपूर खबरें रहतीं हैं परन्तु रविवार को पाठकों का मनोरंजन ही इसका मकसद होता है । मनोरंजन भी कैसा ? जो ' हल्का साहित्य ' माना जाता है , उसमें से कौन से उदाहरण दूँ ? इसके अलावा परदेशी पत्रों से उद्धरण , ऊटपटांग कहानियाँ , तथा सिनेमा - स्त्रियों के चित्र के अलावा कुछ नहीं होता । जब हम अनुकरण कर ही रहे हैं तब अच्छे का अनुकरण क्यों न करें ? <strong>' मैनचेस्टर गार्डियन '</strong> अनेक प्रकार से अनुकरण योज्ञ साप्ताहिक है , यह कहा जा सकता है । उसमें भरपूर खबरें होती हैं , चुनिन्दा होती हैं ,समाज , राजनीति , अर्थशास्त्र , के बारे में वर्तमान नेताओं के विचार तथा देश विदेश की घटनाओं का निष्पक्ष वर्णन होता है ; चुनिन्दा पुस्तकों की मार्गदर्शक समालोचना होती है ; शुद्ध साहित्य के एक दो लेख होते हैं ।</p>
<p align="left">    इस पत्र में भी कई बार जल्दबाजी में की गयी आलोचना होती है और भ्रामक खबरें भी होती हैं । लेकिन उसमें इतनी प्रामाणिकता है कि सुधार भेजने पर तुरन्त स्वीकार लिया जाता है । हिन्दुस्तान में उसके संवाददाता सिविल सर्विस के लोग रहते हैं जो उसे टेढ़े मार्ग पर ले जाते हैं परन्तु कोई भी व्यक्ति यदि सप्रमाण खण्डन प्रस्तुत करता है तो उसे भी छापा जाता है ।</p>
<p align="left">    समाचारों के बारे में अपने कथन का उपसंहार मैं रस्किन के उद्गार उद्धृत कर करूँगा : " यदि कोई भी दैनिक छनी हुई शुद्ध खबरें ही देता है , जो भी नयी वस्तु उसे छापने हेतु मिले उसमें भी जो जानकारी बढ़ाने वाली हो ,जो आत्मा का पोषण करने वाली हो , उन्हें ही शुद्ध भाषा में पेश करेगा तो उसकी कमाई होगी या नहीं यह मैं नहीं जानता , परन्तु उसे पढ़ने वाले का लाभ अवश्य होगा । "</p>
<p align="left">    पाठक की कमाई हो इसकी परवाह अखबारों को है क्या ?</p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left">   </p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0">समाचार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97">रिपोर्टिंग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/reporting">reporting</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/20/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:28:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: समाचार, अखबार, गन्दगी, mahadev desai, reporting, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0">समाचार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0">अखबार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80">गन्दगी</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/reporting">reporting</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a></p>
<p align="left"> हम अपने देश में अपनी अदूरदृष्टि के झगड़ों से उबरे नहीं हैं । कई साप्ताहिकों ने  खास कर मराठी दैनिकों ने निन्दा और कीचड़ उछालने को अपनी पूँजी माना है , महसभावादियों ( हिन्दू महासभावादी ) को भरोसा है कि लोग अदालत में नहीं जायेंगे , अथवा गए तब भी गँवाने लायक उनके पास माल-मत्ता न होने के कारण , अच्छे भले नेताओं और संस्थाओं की बदनामी करने में उन्हें शरम नहीं आती ,सीधी बातों को उलटा कर देना वे गौरव मानते हैं , महाराष्ट्र को सुलभ पौराणिक ज्ञान की भोंडी उपमा तथा रूपक का  उपयोग वे करते हैं । मैं इसके उदाहरण नहीं दूँगा ।मात्र सीधी बात को उलटने का एक ताजा नमूना किसी मराठी पाठक ने भेजा है , वह दे रहा हूँ । उस समाचरपत्र ने खबर 'हरिजन' से ली है , परन्तु 'हरिजन' की एक - एक बात को उलट दिया है । मैंने लिखा था : "सेगाँव वर्धा से साढ़े पाँच मील है, मतलब आने-जाने में ग्यारह मील की कसरत हो जाती है । " इस पर उस अखबार ने लिखा : " खुद (गांधी) गाँव में निश्चिन्त हो मजा ले रहे हैं ; और दूसरों को वहाँ तक चलाने में उन्हें शर्म नहीं आती ।" मैंने लिखा था : " ग्रामसेवा विद्यालय विद्यालय के विद्यार्थी गांधीजी के पास गए तब बुवा ने भजन गा कर उन्हें रिझाया । बुवा का तार्रुफ़ देते हुए विद्यार्थियों से गांधीजी ने कहा, ' वे मेरी तरह भाषण नहीं देते । वे बस भजन करते हैं । मेरी तो बोली से ही प्रचार मुमकिन है, चूँकि मैं गा नहीं सकता और न ही भजन बना सकता हूँ । "  उस मराठी पत्र ने लिखा : " गांधी गाँव में गए हैं सेवा करने , किन्तु वहाँ बैठ कर बुवा से भजन सुन रहे हैं । बुवा की बाबत गांधी बोले ,' वे मेरी तरह भाषण नहीं करते , भजन करते हैं । " यह बुवा पर कटाक्ष था उनकी स्तुति ? और खुद गाना भी नहीं आता ,क्या कर महात्मा बन बैठे हैं ? "</p>
<p align="left">    महाराष्ट्र के अखबारों का ही दोष क्यों निकालूँ ? गुजरात में भी ऐसे अखबार है जो उनसे सवाये हैं ।अन्तर सिर्फ यह है कि महाराष्ट्र वालों में बुद्धि है ,जबकि यहाँ के इन पत्रों में दुष्ट बुद्धि के अलावा अन्य बुद्धि नदारद है । उनके उदाहरण लिखने का मतलब कागज को अंकित नहीं कलंकित करना होगा । महाकष्ट से जिन्हें छापा जा सकता है ऐसे एक-दो कुटिलता के नमूने देना पर्याप्त होगा : "मन्दिरों को चकलाघर कहने वाले गांधीजी का सत्याग्रहाश्रम खुद चकलाघर है । सहशिक्षण के प्रभाव में लड़के -लड़कियों का भोगविलास हुआ , परिणामस्वरूप गांधीजी ने उपवास किए ।आखिरकार , आश्रमवासियों के रणसंग्राम से बुज़दिली से हटने के कारण सत्याग्रहाश्रम सरकार को सौंपने का कदम उठाया । ....... अब तो आश्रम में चमार रहते हैं ,और चमड़ा सुधार कर जूते बनाते हैं । " " गांधी को हिन्दू धर्म पर बहुत खुन्नस-जलन है । कहा जाता है कि दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने जो लड़ाई चलायी थी उसमें मुख्यतौर पर मुसलमानों का समर्थन था , विचारशील हिन्दुओं का समर्थन कम ही था , इसलिए यह जलन वे हिन्दू जाति पर निकाल रहे हैं ।यह बात सही है अथवा गलत यह प्रभु जाने, परन्तु हिन्दू धर्म की जड़ खोदने के जो प्रयास गांधीजी ने किए हैं,वैसे पेट में घुस कर धोखा देने के प्रयास मुसलमानों ने भी नहीं किए हैं । "</p>
<p align="left">    किशोरलाल भाई ने 'सहशिक्षण' पर सर्वांगीण चर्चा करते हुए लेख लिखा था । गुजरात में कई लोगों को वह पसन्द आया था । वे अत्यन्त मर्यादावादी हैं,यह सुविदित है । उस लेख में स्त्री-पुरुष संबंधों से उपजे दोषों के कारणों की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा था :</p>
<blockquote>
<p align="left">" सामाजिक तत्त्वज्ञान में आजकल निम्न प्रकार के विचार फैल रहे हैं :</p>
<p align="left">(४) बाप - बेटी , माँ - बेटे या भाई - बहन को मर्यादा में बरतना चाहिए ऐसा कहने वालों में विकृत लिंग चेतना की पराकाष्ठा हुई है । ..... जो बाप या भाई , बेटी या माँ का हाथ पकड़ता है , अथवा उसके साथ अकेला बैठता, या उसके कन्धे पर हाथ रखता है अथवा प्रेम से चुंबन करते वक्त अथवा उसे वस्त्रहीन दशा में देख चिन्ता में पड़ता हो तब वह बहुत छिछला व्यक्ति होना चाहिए ।....</p>
<p align="left">" विद्यालयों में या समाज में धार्मिक तत्त्वज्ञान के नाम पर या सामाजिक तत्त्वज्ञान के नाम पर ऊपर वर्णित विचार फैल रहे हैं जो आज के ब्रह्मचर्य संबंधी दोषों का एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं । "</p>
</blockquote>
<p align="left"> इस लेखक ने इसमें से शुरुआत के और आख़ीर के फिकरे उड़ा दिए और बीच का फिकरा किशोरलाल भाई के मत्थे मढ़ दिया !! ऊपर से यह टीका जड़ दी : " गांधी के दुलरुआ किशोरलाल मशरूवाला दिनप्रतिदिन कैसी अधम दशा में पतित हो रहे हैं , उसका वर्णन ऊपर दिए लेख से मिलता है । "</p>
<p align="left">    मुझे यह बता देना चाहिए कि सनातन धर्म को लजाने वाला यह पत्र सौभाग्य से मासिक है , इसलिए पैसा खर्च कर उसका विष पीने वाले बहुत कम लोग होंगे ।</p>
<p align="left"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p align="left"><strong>पिछले भाग : <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/08/mahadev-desaijournalismliterature/">एक</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/09/journalismpublic-servicemahadev-desai/">दो</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/11/journalismmahadev-desai/">तीन</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/14/journalismreportingmahadev-desai/">चार</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/17/journalismreportingmahadev-desai-2/">पाँच</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/18/reporting-journalismmahadev-desai/">छ:</a></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई]]></title>
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<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 16:30:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    समाचारपत्रों के हाथ में समाज के एक - ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    समाचारपत्रों के हाथ में समाज के एक - एक व्यक्ति की आबरू है , सभ्यता के नियम व्यक्ति पर जितना लागू होते हैं उससे ज्यादा समाचरपत्रों पर लागू होते हैं । इस मर्यादा का पालन कितने अखबार करते हैं ? पंजाब के कुछ अखबार सिर्फ लोगों पर कीचड़ उछालने की धमकी देकर उनसे धन वसूली कर , उसी पर जिन्दा हैं ऐसा माना जाता है । कई बार वास्तविक तथ्य कह देने पर भी असभ्यता और अपमान हो जाता है । किसी शहर में एक बार हड़ताल चल रही थी , उसकी रहनुमाई एक महिला के हाथ में थी । महिला का नाम दिए बगैर एक अखबार ने लिखा : <strong>' बरख्वास्त मुलाजिम की  मेहर हड़तालियों की मुखिया । ' </strong>तथ्यात्मक रूप से बात सही थी लेकिन  उसे इस प्रकार छापना अखबार के लिए शोभनीय नहीं था । किसी के व्यक्तित्व को मलिन करने अथवा अफवाह छापना इससे भी भोंड़ी वस्तु है ।</p>
<p align="left">    <em>किसी भी व्यक्ति के बारे में निहायत जाती किस्म की खबर बिना पुष्टि के स्वीकारनी ही नहीं चाहिए , पुष्टि हो तब उसकी बारीकी से जाँच कर लें कि वह सच है या झूठ , जाँच के बाद यदि खबर सच पाई जाए तब उसे छापने पर जनता का हित होगा या अहित यह विचार कर तब उसे छापा जाए अथवा न छापा जाए ।</em></p>
<p align="left">    इस सामान्य -सी नीति का पालन क्या क्या दुष्कर और दुरूह है ?</p>
<p align="left">  आगामी कड़ी : <strong>अखबारों की गन्दगी</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
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<p align="left">   </p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be">पत्रकारिता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%20%e0%a4%95%e0%a4%be%20%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8">लोगों का सम्मान</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0">समाचारपत्र</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/newspapers">newspapers</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/reporting">reporting</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
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<title><![CDATA[पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ' उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ']]></title>
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<pubDate>Wed, 17 Oct 2007 01:42:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    गलत खबरों की बात दूर रही , हम सच्ची क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    गलत खबरों की बात दूर रही , हम सच्ची किन्तु बेजान खबरों को छाप कर यह मानते हैं कि अखबार की शोभा बढ़ाई । जितनी खबरें हाथ लगती हैं क्या उन सब को छापना जरूरी है ? मेरे पास एक अखबार पड़ा है जिस में दो कॉलम का एक शीर्षक है : <strong>"मशहूर सुन्दरी का अन्तिम फैसला : गरीबों के बीच बसेंगी "</strong> । खबर के साथ उस महिला का चित्र है , चित्र के ऊपर एक चौकोर बॉक्स है : <strong>" चार बार शादी " ।</strong> ऐसा ही एक अन्य भड़काऊ शीर्षक है : <strong>उस नर्तकी से शादी हेतु ५०० लोग तैयार हुए - परन्तु उसने शादी नहीं ही की ।" </strong>इन समाचारों को इस रूप में दे कर अथवा मूल रूप में दे कर भी पाठक की कौन सी सेवा सधी होगी ? एक अन्य अखबार में पाँच कॉलम का शीर्षक है : <strong>" सख़्त पिटाई के बाद औरत को मायके भेजा । " </strong>इसके लिए पाँच कॉलम क्यों? पिटाई करने वाला अपनी वीरता पर गर्व कर सके, इसलिए ? एक अन्य अखबार में खबर है : ' <strong>नाग सन्यासी बना। सब पुजारी दिग्मूढ़ हुए । '</strong> जिस संवाददाता ने इस खबर को भेजा उसके सम्पादक ने शायद ही उसे बुलाकर पूछा होगा कि उसकी नज़र के सामने घटित हुआ अथवा सुनी-सुनाई गप्प है । अन्य अखबार जब इस गप्प की नकल करेंगे तब उन्हें तो सोचने की भी जरूरत नहीं होगी । एक अन्य अखबार खबर दे रहा है : <strong>" प्रणयग्रन्थि में बन्धे जोड़े ने की आत्महत्या " , </strong>अन्य ऐसे पागल युगलों को को इस खबर से उत्तेजन नहीं मिलता होगा ?  स्टोव से जल कर मरनेवालियों की खबर बारम्बार छपने से ऐसे किस्सों में कुछ बढ़ोतरी होती होगी , इस बाबत कोई शंका है ? एक प्रसिद्ध अमेरिकी दैनिक <strong>क्रिश्चन साइन्स मॉनिटर</strong> की नीति जानने लायक है । उसका लंडन संवाददाता मुझसे लंडन में मिला था । वहाँ के अखबारों में हिन्दुस्तान के विषय में जब गलत खबरें छपती थीं , तब - तब वह मेरे पास आता और मुझसे सही खबर ले कर अमेरिका भेजता था । वह अखबार जनहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए मशहूर है । इस अखबार के बारे में विलिस ऍबट नामक प्रसिद्ध पत्रकार लिखते हैं : <strong>" उस अखबार में अपराधों और गुनाहों की खबरें दी ही नहीं जातीं - सिवा इसके कि वह समाचार सरकार अथवा समाज की प्रगति का नुकसान करने वाला हो ; इस पत्र में बड़ी बड़ी आपदाओं व विपदाओं की खबर भड़काऊ ढंग से नहीं छापी जाती ; पत्र का एक मालिक नहीं है बल्कि एक मण्डल है । "  </strong>विलायत के सम्मानित पत्र <strong>'टाइम्स'</strong>  तथा <strong>'मैनचेस्टर गार्डियन'</strong> में भी काफ़ी हद तक इस प्रथा का पालन होता है तथा चौंकाने वाली सुर्खियाँ देने की धूर्ततापूर्ण आदत से ये अखबार मुक्त हैं ।हमारे कई अखबारों की खपत ऐसी खबरों के बूते होती है । समाचारपत्र पढ़ने का लोगों में शौक बढ़ा है , एक - एक पैसे की कीमत वाले अखबार हजारों की संख्या में बिकते हैं , उससे भी अखबार मालिक मोटा-नफ़ा कमाते हैं ,  इसके बदले स्वच्छ वाचन की पूर्ति करने की अपनी जिम्मेदारी क्या वे समझते हैं ?</p>
<p align="left"><strong>( जारी )</strong></p>
<p align="left"><strong>पिछला हिस्सा : <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/08/mahadev-desaijournalismliterature/">एक</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/09/journalismpublic-servicemahadev-desai/">दो</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/11/journalismmahadev-desai/">तीन</a> , <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/14/journalismreportingmahadev-desai/">चार</a> ,</strong></p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be">पत्रकारिता</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0">अखबार</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%20%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88">महादेव देसाई</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/journalism">journalism</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/reporting">reporting</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mahadev%20desai">mahadev desai</a></p>
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<title><![CDATA[पत्रकारिता (४) : &quot; क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? &quot;]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/10/14/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a5%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 18:09:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    किसी अन्य वस्तु से बढ़कर सत्यनिष्ठा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">    किसी अन्य वस्तु से बढ़कर सत्यनिष्ठा ही पत्रकार का प्रथम धर्म है । बॉल्डविन ने इंग्लैंड के सम्मानित पत्रकार सी.पी. स्कॉट के शब्दों को पत्रकारों की एक जमात के समक्ष उद्धृत किया था, इसे हर अखबार के दफ़्तर में बड़े बोर्ड पर लिख कर रखना चाहिए :</p>
<p align="left">&#160;</p>
<blockquote>
<p align="left">    " समाचारपत्र चलाने के लिए सर्वप्रथम इतने गुण तो होने ही चाहिए - प्रामाणिकता , स्वच्छता, निडरता , न्यायबुद्धि तथा पाठक व जनता के प्रति कर्तव्य भाव । बेशक अखबार एक प्रकार का इजारा है , इसलिए अखबार का प्रथम कर्तव्य है इजारे से जुड़ी लालचों  को त्याग करे । खबरें इकट्ठा करना अखबार की प्रथम सेवा है । किसी भी समाचार का मूल दूषित तो नहीं है - इस शुचिता के प्रति जान को जोखिम में डाल कर भी सावधान रहना चाहिए । जो समाचार वह देता है , अथवा नहीं देता है , अथवा जिस प्रकार समाचार दिया जा रहा है उसमें सत्य के शुभ्र वदन पर धब्बा नहीं लगना चाहिए । आलोचना की आजादी सभी को है, परन्तु समाचार एक पवित्र वस्तु है , उसे बदलकर या तोड़मरोड़कर या घटबढ़ द्वारा उसे भ्रष्ट करने का हक किसी को नहीं है। ऐसे घटिया  हथकण्डों का उपयोग निन्दनीय है । खुद के पक्ष के लोगों को उनका पक्ष सुनाने का जितना अधिकार है उतना ही अधिकार विरोधियों को भी है । टीका करते वक्त भी खुद संयम रखना चाहिए । <strong>निख़ालिस टीका करना अच्छा है ; न्यायबुद्धि से टीका करना उससे बेहतर है । "</strong></p>
</blockquote>
<blockquote>
<p align="left">   </p>
<p align="left">  कुछ अखबार अत्युक्ति अथवा तथ्यों को साज-श्रृंगार के साथ को पेश करने को शोभा मानते है । अमेरिकी समाचारपत्रों में यह यह शोभाविहीन शैली अशिष्टता की कोटि में खपती होगी । एक अमेरिकन रिपोर्टर ने मुझसे पूछा : <strong>"क्या गांधी जी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ?</strong></p>
<p align="left"><strong>मैंने कहा : ' हाँ , कुत्ते भी पसन्द हैं , गायें भी पसन्द हैं और तुम भी पसन्द हो । सिर्फ बिल्लियाँ ही क्यों ?'</strong></p>
<p align="left"><strong> वह हँसा और बोला : 'गांधीजी के आसपास के वातावरण का शब्दचित्र देना चाहता हूँ ।उसमें बिल्ली जैसा मजेदार प्राणी कहीं रखा जा सकता तो चार चाँद लग जाते । '</strong>  उसने गांधीजी के साथ बैठ कर दूध पीती बिल्ली को फिट कर 'रंग भर दिया' ।</p>
</blockquote>
<blockquote>
<p align="left">&#160;</p>
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<p align="left"> स्लोकोम्ब को लगा था कि गांधीजी की साधुताभरी नम्रता का चित्र एक काल्पनिक दृष्टांत दे कर ही चित्रित हो सकता है ।सो उसने लिखा : <strong>' प्रिन्स ऑफ़ वेल्स यहाँ आए तब गांधी ने उन्हें साष्टांग प्रणिपात किया था ।' </strong></p>
<p align="left"><strong>उसे धता बताते हुए गांधीजी ने कहा : " आपकी यह गप्प आपकी खुद की कल्पना शक्ति को लज्जित करने वाली है । मैं भंगी को प्रणिपात कर सकता हूँ और उसका चरणरज ले सकता हूँ चूँकि उसे धूल धूसरित करने के पाप में मैं भागी हूँ।प्रिन्स ऑफ़ वेल्स तो क्या शहंशाह जॉर्ज पंचम को मैं प्रणिपात नहीं करूँगा , कार