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	<title>jagjit &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/jagjit/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "jagjit"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 04:27:48 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[अधूरी गजल छोड़ गए फाकिर]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Sat, 01 Mar 2008 08:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
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<description><![CDATA[माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छोटे से हाल में श्रद्धांजलि देने वाले कुछ खास लोग शामिल हुए। उन्हें देखकर ऐसा लगता नहीं था कि कोई बहुत ही नामी शायर सुदर्शन फाकिर की रस्म पगड़ी में इकट्ठे हुए हैं लोग। समुद्र से गहरे थे फाकिर बड़े ही सादा समारोह में गुलशन कुंदरा ने माइक संभाला और कहा कि वह फाकिर को उन दिनों से जानते हैं जब फाकिर फिल्म इंडस्ट्री के फाकिर नहीं, बल्कि उनके बहुत ही प्यारे दोस्त फाकिर थे। उन्होंने कहा कि वह गहरा समुद्र थे। साहिर की तरह फाकिर हैं जालंधर की पहचान दीपक जालंधरी ने बताया कि अगर लुधियाना की पहचान साहिर लुधियानवी हैं तो जालंधर की पहचान सुदर्शन फाकिर हैं। कुछ लोग अपवाद होते हैं हंस राज हंस ने अपनी बात के शुरू में ही कहा कि सुना है कल रात मर गया वो..लेकिन उन्होंने कहा यह बात फाकिर साहब पर लागू नहीं होती क्योंकि फाकिर जैसे लोग मरते नहीं बल्कि अपने पैरों के निशान छोड़ कर जाते हैं। अपनी कीमत पर जिए फाकिर सुरेश सेठ ने कहा कि फाकिर हर विधा में पारंगत था। इसमें कोई दो राय नहीं कि फाकिर अपनी कीमत पर जिया जिसका उसे कोई मलाल नहीं था। नए कलाकार को देते थे प्रोत्साहन हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक सुरेश सहगल ने बताया कि फाकिर साहब की बात ही निराली थी। नए कलाकार को प्रोत्साहन देते थे। समारोह में प्राण शर्मा, मलिक, सतीश भाखड़ी, जानकी दास, प्रिंसिपल वीके तिवाड़ी, राही व कपिला इत्यादि ने भी फाकिर साहब के लिए प्रार्थना की। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने दुख प्रकट किया। जरा सी आहट पर लगता था जगजीत सिंह आ गए हाल में जरा सी आहट होती थी तो लोगों की निगाह दरवाजे पर चली जाती थी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जगजीत सिंह नहीं पहुंचे। प्रो. एचके गुप्ता जो फिरोजपुर से आए थे ने बताया कि अगर जगजीत आ जाता तो यह फाकिर का नहीं जगजीत का सम्मान था। उनके जिगरी दोस्त विनोद धीर ने बताया कि जब जगजीत सिंह के बेटे की एक हादसे में मृत्यु हो गई और वे टूट गए थे। फाकिर ने टूटे हुए जगजीत सिंह के शरीर में फिर से प्राण फूंक दिए थे। अधूरा रहा किताब छपवाने का सपना फाकिर इतने अच्छे शायर होने के बावजूद अपनी किताब अपने जीते जी नहीं देख सके। इसकी सिसकियां उनके आखिरी दिनों में साफ तौर पर सुनाई देती थीं। शायद यही कारण है कि कैंसर से लंबे समय से जूझते हुए फाकिर ने अपनी पत्नी सुदेश फाकिर से कई बार कहा, 'मैं अपनी किताब छपवाना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं जिन गजलों को मैंने अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा है वे कैसी हैं।</p>
<p><i>Source: <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4223989/">Jagran</a></i></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चलती राहो में यूं ही आंख लगी है फाकिर]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 08:37:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2008/02/21/chalti-raho-me-yun-hi-aakh-lagi-hai-fakir/%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b0/" rel="attachment wp-att-156" title="फाकिर"><img src="http://jagjitsinghnews.wordpress.com/files/2008/03/21jal-1_1203596110_m.jpg" alt="फाकिर" border="0" /></a>वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना।</p>
<p>वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए।</p>
<p>फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी 'इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..'। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था।</p>
<p>मोहम्मद रफी ने उनकी गजल 'फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..' गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल 'वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.' गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल 'जिंदगी मेरे घर आना..' गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने 'कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..' गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था 'लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..'। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..' भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था।</p>
<p><i>Source: <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4223989/">Jagran</a></i></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जगजीत सिंह की हुई वापसी]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/12/28/jagjit-singh-returns/</link>
<pubDate>Fri, 28 Dec 2007 08:56:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/12/28/jagjit-singh-returns/</guid>
<description><![CDATA[28 दिसम्बर 2007
कुछ सप्ताह पहले ग़जल सम्राट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:12px;">28 दिसम्बर 2007</span><br />
कुछ सप्ताह पहले ग़जल सम्राट जगजीत सिंह अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें दिमाग में खून का प्रवाह कम हो गया था। अफवाह थी कि उन्हें लकवा का दौरा पड़ा है पर शुक्र है कि यह अफवाह झूठी साबित हुई।</p>
<p><b></b>अब वे पूरी तरह से तंदुरुस्त हैं और उन्होंने अपनी वापसी एक ग़जल शो ‘यादें’ से की। जगजीत सिंह के इस गजल कार्यक्रम का आयोजन पक्षाघात से जुड़ी संस्‍था ‘आदी’ ने किया था।</p>
<p>यह कार्यक्रम नई दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में 25 दिसम्बर को आयोजित किया गया था।</p>
<p><i>Source: <a href="http://www.josh18.com/showstory.php?id=104871" title="Josh18" target="_blank">Josh18</a></i></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वभाव से भी 'गंभीर' हैं गौतम]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/26/swabhav-se-bhi-ghambir-hai-gautam/</link>
<pubDate>Mon, 26 Nov 2007 10:25:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/26/swabhav-se-bhi-ghambir-hai-gautam/</guid>
<description><![CDATA[





गंभीर ने ट्वंटी-20 विश्वकप में बेहतर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<table align="right" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0" width="208">
<tr>
<td rowspan="2" bgcolor="#ffffff"><img src="http://www.bbc.co.uk/f/t.gif" border="0" height="1" width="5" /></td>
<td><img src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2007/11/20071122135414gautam_gambhir300.jpg" alt="गौतम" height="300" width="203" /></td>
</tr>
<tr>
<td class="caption">गंभीर ने ट्वंटी-20 विश्वकप में बेहतरीन बल्लेबाज़ी की थी.</td>
</tr>
</table>
<p><!-- st_story --></p>
<p class="storytext"><strong>टीम इंडिया के चमकते सितारे बन चुके गौतम गंभीर नाम के मुताबिक़ स्वभाव से भी गंभीर हैं और बचपन से ही क्रिकेट बैट के दीवाने रहे हैं. </strong></p>
<p class="storytext">हाल में हुए ट्वेंटी-20 विश्वकप में 26 वर्षीय गौतम की बल्लेबाज़ी भारतीय टीम की जान बनी, और विश्वविजेता आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खेले गए मैच में उन्हें मैन ऑफ़ मैच का ख़िताब भी मिला था.</p>
<p class="storytext">गौतम एक नाती से ज्यादा अपनी नानी के बेटे हैं. पेश है उनकी नानी माँ के साथ <strong>सूफ़िया शानी</strong> की ख़ास बातचीत.</p>
<p class="storytext"><!-- end_story --><strong>कैसा लग रहा है आपको गौतम को इस मुका़म पर देखकर?</strong></p>
<p class="storytext">बहुत खुशी होती है और मेरी खुशी तब और दुगनी हो जाती है जब दूसरे लोग भी उसकी खुशी में शामिल होते है.</p>
<p class="storytext"><strong>कितना बदलाव देखती हैं आप नन्हे गौतम में और गौतम गंभीर में?</strong></p>
<p class="storytext">मुझे तो कोई बदलाव नज़र नहीं आता उसमें मैं शुक्रगुज़ार हूँ ऊपर वाले की कि उसने गौतम को घमंड और नखरों से दूर रखा हैं. हो सकता है मेरे इस नज़रिए में ममता नज़र आए. लेकिन दूसरे और परिवार के लोगों का भी यही कहना है कि गौतम अब भी ज़मीन पर है.</p>
<p class="storytext">
<table align="right" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0" width="208">
<tr>
<td rowspan="2" bgcolor="#ffffff"><img src="http://www.bbc.co.uk/f/t.gif" border="0" height="1" width="5" /></td>
<td><img src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2007/11/20071122114403gambhir203.jpg" alt="गौतम" height="350" width="203" /></td>
</tr>
<tr>
<td class="caption">गौतम गंभीर बचपन से क्रिकेट बैट के दीवाने रहे हैं.</td>
</tr>
</table>
<p class="storytext"><strong>गौतम खेल में ही 'गंभीर' है या पढ़ाई में भी 'गंभीर' रहे हैं ?</strong></p>
<p class="storytext">क्रिकेट क्लब में भेजने से पहले मेरी शर्त ही यही थी गौतम से, कि तुम पढाई पर पूरा ध्यान दोगे. और गौतम कई क्लासों में फ़र्स्ट डिविज़न आया.</p>
<p class="storytext"><strong>गौतम की सबसे अच्छी बात क्या लगती है आपको?</strong></p>
<p class="storytext">उसका भोलापन--वह दिल में कुछ रखता नहीं है. बल्कि ख़ास बात यह है कि वह कभी झूठ नहीं बोलता.</p>
<p class="storytext"><strong>नन्हें गौतम की कोई शरारत याद है आपको ?</strong></p>
<p class="storytext">बचपन में उसकी एक ही शरारत थी कि वह सब बच्चों के बैट छीन लिया करता था. और जब वह अपने खेलने के लिए बैट मांगता था तो उसे कपड़े धोने वाली थापी दे दी जाती थी.</p>
<p class="storytext"><strong>गौतम हक़ीकत में "गंभीर" है या सिर्फ़ नाम के ही गंभीर हैं ?</strong></p>
<p class="storytext">नहीं वह वास्तव में गंभीर है. न वह बचपन में ज्यादा शरारत करता था न अब ज्यादा बात करता है. बल्कि शर्मीले टाइप का है.</p>
<p class="storytext"><strong>क्रिकेट के अलावा और क्या शौक़ है गौतम के?</strong></p>
<p class="storytext">क्रिकेट के बाद उसे संगीत से बहुत लगाव है. जब फ़ुर्सत में होता है तब या तो पुराने गाने सुनता है या जगजीत सिंह की ग़ज़लें.</p>
<p class="storytext"><strong>आपको क्या कहकर बुलाते हैं गौतम?</strong></p>
<p class="storytext">वह मुझे नानी मम्मी कहता है और हम सब उसे गौती कहते है.</p>
<p class="storytext"><strong>नानी और कहानी का गहरा रिश्ता है आपसे किस तरह की कहनी सुनने की डिमांड करते थे नन्हे गौतम?</strong></p>
<p class="storytext">गौती को चिड़िया की या राजा रानी की कहानी पंसद नहीं थी. बल्कि वह शिवाजी या भगतसिंह की कहानी सुनना पंसद करता था. आज भी वह देशभक्ति के गानों का इतना दीवाना है कि कितनी ही जल्दी हो अगर देशभक्ति का गीत आ रहा हो तो रुक कर सुनता ज़रूर है.</p>
<p class="storytext">
<table align="right" border="0" cellpadding="0" cellspacing="0" width="208">
<tr>
<td rowspan="2" bgcolor="#ffffff"><img src="http://www.bbc.co.uk/f/t.gif" border="0" height="1" width="5" /></td>
<td><img src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2007/11/20071122121207gambhir-nani-203.jpg" alt="नानी के साथ" height="152" width="203" /></td>
</tr>
<tr>
<td class="caption">गौतम गंभीर अपनी नानी के बेहद क़रीब हैं, जो उन्हें प्यार से गौती कहती हैं.</td>
</tr>
</table>
<p class="storytext"><strong>गौतम का दिया हुआ सबसे प्यारा तोहफ़ा आपको क्या लगता है?</strong></p>
<p class="storytext">मेरे लिए तो वही अनमोल तोहफ़ा है. वैसे मुझे उसने बहुत सुंदर घड़ी दी है जो वह हमेशा मेरी कलाई में बंधा देखना चाहता है.</p>
<p class="storytext"><strong>हर दादी और नानी की तमन्ना होती है कि नाती-पोते का सेहरा देखे....आपकी यह तमन्ना कब पूरी कर रहे हैं गौतम?</strong></p>
<p class="storytext">वैसे तो गौतम नाती कम बेटा ज्यादा है. तो इन दोनों ही रिश्तों से मेरी दिली इच्छा है उसे दूल्हा बना देखने की. लेकिन गौतम का कहना है कि अभी तो मेरे करियर की शुरुआत है.... मुझे अभी काफी खेलना है.</p>
<p class="storytext"><strong>गौतम को नानी के हाथ की बनी कौन सी चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है?</strong></p>
<p class="storytext">वैसे तो वह हर चीज़ बड़े चाव से खाता है...लेकिन मेरे हाथ के बने राजमा-चावल और कढ़ी-चावल उसे बेहद पसंद हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर...]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/21/ghazal-to-galib-ki-hoti-thi-magar/</link>
<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 07:57:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/21/ghazal-to-galib-ki-hoti-thi-magar/</guid>
<description><![CDATA[ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="storytext">ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए....</p>
<p class="storytext"><em>देख तो दिल के जां से उठता है<br />
ये धुंआ सा कहां से उठता है.<br />
</em><br />
इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है....इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.</p>
<p class="storytext"><!-- end_story -->उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.</p>
<p class="storytext" style="font-size:11px;"><em>Source: BBC</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एयरपोर्ट पर जगजीत की झलक को मची होड़]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/19/jagjit-singh-in-patna/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 09:25:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/19/jagjit-singh-in-patna/</guid>
<description><![CDATA[&nbsp;

 		 Nov 18, 01:21 am
पटना। राजधानी में कार्यक्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="cat-hdln" style="margin-bottom:25px;">&#160;</p>
<p class="cat-im" style="float:left;"><img src="http://in.yimg.com/news/jagran/20071117/21/17pat-41-1_1195335846_m.jpg" /></p>
<p class="cont"> 		<em><span class="ts"> Nov 18, 01:21 am</span></em><br />
पटना। राजधानी में कार्यक्रम के सिलसिले में पहुंचे जगजीत की एक झलक को एयरपोर्ट पर शनिवार को जबदरस्त होड़ मची। परिसर से बाहर आते ही प्रशंसकों ने उनका जबदरस्त स्वागत किया।</p>
<p>अपनी मखमली आवाज के लिए जाने जाने वाले गजल गायक जगजीत सिंह के प्रशंसकों की राजधानी में भी कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम के सिलसिले में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान से अपराह्न चार बजे के आसपास मुंबई से पटना पहुंचे जगजीत सिंह को प्रशंसकों ने परिसर के भीतर आगमन हाल में ही घेर लिया। बकायदा गुलदस्ता देकर उनका विधिवत स्वागत किया गया। जगजीत सिंह के पहुंचने की खबर मिलते ही लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े। उनकी एक झलक पाकर एयरपोर्ट के कर्मचारियों से लेकर विमान यात्री तक काफी रोमांचित दिखे। परिसर के बाहर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी तादाद मौजूद थी।</p>
<p><em>Source: Jagran </em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जगजीत सिंह गवले पहिला बेर भोजपुरी गाना]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/17/jagjit-singh-bhojpuri-song/</link>
<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 15:02:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/17/jagjit-singh-bhojpuri-song/</guid>
<description><![CDATA[दुनिया भर में फैलल जगजीत सिंह के फैन ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दुनिया भर में फैलल जगजीत सिंह के फैन लोग खातिर एगो नया खबर बा. विश्व-प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह पहिला बेर फिल्म पुरब खातिर एगो भोजपुरी गाना गइलें ह. एह फिल्म में भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी मृदुल मुख्य भूमिका में नजर अइहें.</p>
<p>बात अइसन भइल कि, मुम्बई में जगजीत सिंह के स्टुडियो में फिल्म पुरब के गीतन के मिक्सिंग चलत रहुये, ताले जगजीत जी घुमत- घामत ओहिजा आ गइलन. जवन गाना के मिक्सिंग चलत रहे, उ मनोज तिवारी मृदुल का आवाज में रिकार्डेड रहे.</p>
<p>गाना के धुन आ बोल सुन के जगजीत जी कहलन – “मुझे तो पता ही नहीं था कि भोजपुरी में इस स्तर के गीत भी रिकार्ड होते हैं. मैं इस गीत को गाना चाहता हुँ.” इ सुन के स्टुडियो में बैठल लोग के खुशी के ठिकाना ना रहल.</p>
<p>दु दिन बाद जगजीत जी आके लाल सिन्हा (संगीतकार) के बोलवलन आ कहलन – “आज मैं तुम्हारा गीत गा रहा हुँ.”</p>
<p>लाल सिन्हा खुशी का मारे फोन करुअन गीतकार बिपिन बहार के – “बिपिन बाबु, जल्दी गीत लेके आईं. जगजीत जी स्टुडियो में इंतजार करत बाडन.”</p>
<p>इ सुनला का संगे, मानो पांव में पाँख लाग गइल बिपिन के... गीत के रिकार्डिंग जगजीत जी के सुरमयी आवाज में शुरु भईल - ज़ब पूरब जागी, त होई सबेरा...</p>
<p>एह फिल्म के निर्माता बाडे मुर्तजा जाफरी, जबकि एकर निर्देशन अभयादित्य सिंह क रहल बाडे. फिल्म के गीत बिपिन बहार लिखले बाडे, आ ओकरा के अपना संगीत से सजवले बाडे लाल सिन्हा.</p>
<p>एह सब में एगो खास बात इ भी रहल ह कि, अपना जिन्दगी के पहिला भोजपुरी गाना खातिर जगजीत जी कवनो तरह के पारिश्रमिक ना लेहनी ह.</p>
<p><em>Source: bhojpuria.com</em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुनने के नहीं देखने वाले बन रहे हैं गाने]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/16/sunne-ke-liye-nahi-dekhne-wale/</link>
<pubDate>Fri, 16 Nov 2007 06:51:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/16/sunne-ke-liye-nahi-dekhne-wale/</guid>
<description><![CDATA[  शंकर साहनी 
  सिंगर 
दरअसल कंपनियां जल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:14px;font-weight:normal;color:#000000;font-family:ARIAL;line-height:25px;"><span style="font-weight:bold;">  शंकर साहनी </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  सिंगर </span></span></p>
<p>दरअसल कंपनियां जल्द से जल्द रिस्पॉन्स चाहती हैं, इसलिए सॉफ्ट गानों और लिरिक्स पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं। उन्हें लगता है कि कोई ऐसा गाना लाया जाए, जिससे रातों-रात वारे-न्यारे हो जाएं। अब तो गानों की कहानी दिखाने वाली ज्यादा रह गई है और सुनने वाली कम। यह बदलाव नेगेटिव ही है, क्योंकि गानों में बस ग्लैमर और दिखावा रह गया है। संजीदा अल्फाज और विडियो कंटेंट का होना बहुत जरूरी है। अच्छे गाने तो हमेशा ही पसंद किए जाते रहे हैं। सूफी कलाम से लेकर अब तक जितने भी अच्छे गाने आए, उन्हें कौन भूल पाया है। कुछ अच्छे लिरिक्स वाले गाने भी आजकल आ रहे हैं। जो गाने अच्छे होते हैं, वे चलते ही हैं, रुकते कहां हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">  और भी संगीत हैं सुनने के लिए </span></p>
<p><span style="font-weight:bold;">  जगजीत सिंह </span></p>
<p><span style="font-weight:bold;">  गजल गायक </span></p>
<p>वक्त के साथ सब कुछ चेंज होता ही है। लेकिन जो ओरिजिनल और अच्छा होता है, वही सर्वाइव करता है। फिल्मी म्यूजिक में आए बदलाव को ही आप क्यों देखते हैं? सिर्फ वही एक म्यूजिक नहीं है। नॉन फिल्मी म्यूजिक जैसे क्लासिकल, भजन, गजल आदि को देखें, जिसमें पॉजिटिव चेंज आ रहा है। इसमें आया बदलाव उसकी बेहतरी के लिए ही है। फिल्मी म्यूजिक और पॉप ऐल्बम में कुछ लोग पैसे कमाने के चक्कर में वल्गेरिटी डाल रहे हैं। आजकल तो सिंगर खुद ही लिरिक्स लिखने लगे हैं। जिस तरह के लिरिक्स लिखे जा रहे हैं, क्या उनका कोई मतलब है? लेकिन जो लोग ऐसा करते हैं, उनके लिए तो यह चेंज पॉजिटिव ही है।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">  पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे लोग </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  राजू श्रीवास्तव </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  हास्य कलाकार </span></p>
<p>पहले लोग दिल और दिमाग से गाते थे, फिर मुंह से गाने लगे। आजकल नाक से गाने लगे हैं। आगे पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे। अब जो गाने बन रहे हैं, उनमें कोई तबला वगैरह तो बजता नहीं है, बस इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रुमेंट्स का प्रयोग होता है। इन्हें सुनकर ऐसा लगता है, जैसे किसी फैक्ट्री में आ गए हैं, जहां लोग हाथ में हथौड़ी, फावड़ा, आरी लेकर टोपी लगाए हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। आजकल की फीमेल सिंगर्स को देखिए कैसे-कैसे गाने गाती हैं, जैसे किसी को डरा रही हों। भूत हूं मैं... भूत हूं!! सुनकर लगता है, मानो सब कब्रें फाड़कर बाहर निकलकर आए हों। कोई खुश नहीं है, सब दुखी होकर गाने गा रहे हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">  कुछ मीनिंग और मिठास होना जरूरी </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  पूनम भगत </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  फैशन डिजाइनर </span></p>
<p><span style="font-family:MS Sans Serif;"> </span>  आजकल जो बेसिरपैर के गाने आ रहे हैं, उनका मतलब मुझे तो समझ नहीं आता। पुराने जमाने में जिस तरह के गाने बनते थे, पता नहीं वैसे गाने अब क्यों नहीं बन रहे हैं। यंगर जेनरेशन को शायद ये गाने पसंद आते हों। गाने में कुछ मीनिंग, उसमें कुछ मिठास भी तो होनी चाहिए। मगर अब यह कम ही गानों में देखने को मिलती है। इन्हें तीन कैटिगरी में बांट सकते हैं। पहला रोमांटिक सॉन्ग, जिनके अच्छे बोल होते हैं, दूसरा जो डिस्को म्यूजिक पर बजते हैं और उनका मतलब समझ नहीं आता। तीसरा इन दोनों के बीच की कैटिगरी वाले गाने। ऐसा नहीं है कि इस बदले हुए दौर में सिर्फ बेहूदा गाने ही बन रहे हैं, इस दौरान 'परिणीता' और 'कभी खुशी कभी गम' जैसी फिल्मों के अच्छे गाने भी आए हैं।</p>
<p><span style="font-weight:bold;">  ट्रेंड का कोई लॉजिक नहीं होता </span><br />
<span style="font-weight:bold;">  अयान अली खान </span></p>
<p>संगीत में आजकल बहुत अच्छा काम हो रहा है। पिछले कुछ सालों के दौरान स्पैनिश, जापानी, लैटिन म्यूजिक का मिश्रण भारतीय संगीत में हुआ है। ग्लोबल कल्चर के इस प्रभाव का फायदा यह हुआ है कि लोगों को हर तरह का संगीत सुनने का मौका मिला है। बॉलिवुड के म्यूजिक में तो बदलाव आया ही है, साथ ही क्लासिकल म्यूजिक भी प्रभावित हुआ है। समय के साथ बदलाव आते ही हैं। गीतकार और आटिर्स्ट के लिए यह क्रिएटिव चेंज है। इसके सही या गलत का फैसला करना ठीक नहीं है। ट्रेंड क्या है, क्या चल रहा है, उसका कोई लॉजिक या फॉर्म्युला नहीं है। फिर भी लोग इसे पसंद कर ही रहे हैं, उनकी सीडी खरीद रहे हैं। सभी आर्टिस्ट अपना बेस्ट आउटपुट देना चाहते हैं, कोई भी जान बूझकर खराब चीज नहीं बनाएगा।</p>
<p><em>Source: <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com">NBT</a></em></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’]]></title>
<link>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/13/kaun-kehta-hai/</link>
<pubDate>Tue, 13 Nov 2007 07:06:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amarjeet Singh</dc:creator>
<guid>http://jagjitsinghnews.wordpress.com/2007/11/13/kaun-kehta-hai/</guid>
<description><![CDATA[कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कोटा.</strong> गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस <img src="http://www.bhaskar.com/2007/10/19/images/gulam.jpg" alt="gulam ali" align="left" hspace="10" vspace="10" />जमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।</p>
<p>गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।</p>
<p>छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।</p>
<p>दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।</p>
<p><strong>प्रोफाइल</strong><br />
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।<br />
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।<br />
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।<br />
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Baat nikle ge to pher door talalk jaye ge]]></title>
<link>http://shayeri.wordpress.com/2007/05/10/baat-nikle-ge-to-pher-door-talalk-jaye-ge/</link>
<pubDate>Thu, 10 May 2007 09:55:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>gulfaam</dc:creator>
<guid>http://shayeri.wordpress.com/2007/05/10/baat-nikle-ge-to-pher-door-talalk-jaye-ge/</guid>
<description><![CDATA[Baat nikle ge to pher door talalk jaye ge
loog bewaja udhasi ka sabab poochen ge
yeh bhe poochen ge ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Baat nikle ge to pher door talalk jaye ge</p>
<p>loog bewaja udhasi ka sabab poochen ge</p>
<p>yeh bhe poochen ge ki tum itne pareshaan kyun ho</p>
<p>ungleyaan utthen ge sookhe howe baloon ke taraf</p>
<p>ik nazar dekhen ge guzre howe saaloon ke taraf</p>
<p>choreyoon pe bhe kayi tanz keye jayeen ge</p>
<p>kaampte hathoon pe bhe fiqrey kase jayen ge</p>
<p>loog zalim hen her baat ka tana den ge</p>
<p>batoon batoon me mera ziker bhe le aayen ge</p>
<p>un ke batoon ka zara sa bhe aasar mat leena</p>
<p>werna chehre ke taasur se samjh jayeen ge</p>
<p>chahe kuch bhe hoon savalaat na kerna un se</p>
<p>mere baare me koi baat na kerna un se</p>
<p>werna.................</p>
<p>baat nikle ge to pher door talak jaye ge<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Ghazal: Baat Nikalegi Toh Phir Duur Talak Jaayegi]]></title>
<link>http://shrikant.wordpress.com/2007/02/27/ghazal-baat-nikalegi-toh-phir-duur-talak-jaayegi/</link>
<pubDate>Tue, 27 Feb 2007 16:40:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>shrikant</dc:creator>
<guid>http://shrikant.wordpress.com/2007/02/27/ghazal-baat-nikalegi-toh-phir-duur-talak-jaayegi/</guid>
<description><![CDATA[Lyrics:Kafeel Aazar
Singer: Jagjeet Singh

Baat Nikalegi To phir duur talak jaayegii
Log Bevajah Uda]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>Lyrics:Kafeel Aazar<br />
Singer: Jagjeet Singh<br />
</b><br />
Baat Nikalegi To phir duur talak jaayegii</p>
<p>Log Bevajah Udaasii Kaa Sabab Puuchhenge<br />
Ye Bhii Puuchhenge Ki Tum Itanii Pareshaan Kyuu Ho<br />
Ungaliyaa Uthengii Sukhe Huye Baalon Kii Taraf<br />
Ek Nazar Dekhenge Guzare Huye Saalon Kii Taraf<br />
Chudiyon Par Bhii Kayee Tane Kiye Jaayenge<br />
Kaa.Npate Haatho.N Pe Bhii Fikre Kase Jaaye.Nge</p>
<p>Log Zaalim Hain Har Ek Baat Kaa Taanaa Denge<br />
Baaton Baaton Mein Meraa Zikr Bhii Le Aayenge<br />
Unakii Baaton Kaa Zaraa Saa Bhii Asar Mat Lenaa<br />
Varnaa Chehare Ke Taasur Se Samajh Jaayenge<br />
Chaahe Kuchh Bhii Ho Savaalaat Na Karanaa Unase<br />
Mere Baare Mein Koyee Baat Na Karanaa Unase</p>
<p>Baat Nikalegii To Phir Duur Talak Jaayegii</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
