<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindu-life &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindu-life/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindu-life"</description>
	<pubDate>Thu, 22 May 2008 20:23:25 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःभक्ति के लिये हृदय में शुद्ध भावना जरूरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 03:18:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=148</guid>
<description><![CDATA[पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार
भेद अल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार<br />
भेद अलहदा रहि गयो, भेदवंत सो पार<br />
 <br />
संत शिरोमणि कबीदासजी कहते हैं कि पत्थर और पानी को पूज कर सारे संसार के लोग नष्ट हो गये पर अपने तत्व ज्ञान को नहीं जान पाये। वह ज्ञान तो एकदम अलग है। अगर कोई ज्ञानी गुरु मिल जाये तो उसे प्राप्त कर इस दुनियां से पार हुआ जा सकता है।</p>
<p><strong>पाहन ही का देहरा, पाहन ही का देव<br />
पूजनहारा आंधरा, क्यौं करि मानै सेव</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ति  पत्थर की होती है और उसको घर में रखा जाता है वह भी पत्थर का है और लोग उसकी पूजा कर रहे हैं। जिसे खुद कुछ नहीं दिखाई देता वह भला आदमी की सेवा और भक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है।<br />
आज के संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि पत्थरों की प्रतिमाएं या मकान बनाकर उसमेें लोगों को अपनी आस्था और भक्ति व्यक्त करने के परंपरा इस संसार में शूरू हुई है तब से इस संसार में लोगों के मन में तत्वज्ञान के प्रति जिज्ञासा कम हो गयी है। लोग पत्थरों की प्रतिमाओं या स्थानों के जाकर अपने दिल को तसल्ली देते है कि हमने भक्ति कर ली और दुनियां के साथ भगवान ने भी देख लिया।  मन में जो विकास है वह जस के  तस रहते है जबकि सच्ची भक्ति के लिये उसका शुद्ध होना जरूरी है। इस तरह भक्ति या सेवा करने का कोई लाभ नहीं है। पत्थर की पूजा करते हुए मन भी पत्थर हो जाता है और उसकी मलिनता के कारण ं शुद्ध भक्ति और सेवा का  भाव नहीं बन पाता और  आध्यात्मिक शांति पाने के लिये किये गये प्रयास भी कोई लाभ नहीं देते। अगर हम चाहते हैं कि हमारे अंदर सात्विक भाव सदैव रहे तो ओंकार की भक्ति करें या निरंकार की भावना शुद्ध रखना चाहिए। </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 05:36:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः<br />
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः</p>
<p>जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।</p>
<p>सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=145</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 17:09:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=145</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">आया फंदेबाज और बोला<br />
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना<br />
पता नहीं तुम्हें अब यहां<br />
क्रिकेट मैच चल रहे हैं<br />
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय<br />
कंप्यूटर में जल रहे हैं<br />
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुन कर पहले उदास हुए<br />
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू<br />
‘जजबातों में बहकर देख लिया<br />
जिनकी जीत पर हंसे<br />
और हारने पर रोए<br />
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया<br />
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये<br />
आजादी के गाने सुनवाये<br />
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये<br />
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल<br />
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल<br />
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है<br />
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है<br />
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये<br />
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये<br />
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये<br />
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह<br />
डसने लगता है<br />
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें<br />
इससे शरीर उनका कंपता है<br />
हमें तो लगने लगा है कि<br />
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है<br />
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है<br />
कभी इस देश को एक करने के लिये<br />
सब जगह नारे लगे<br />
अब बांटने के लिये सितारे लगे<br />
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में<br />
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है<br />
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता<br />
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं<br />
उनको बांटने से ही कई लोगों का<br />
बेड़ा पार यहीं होता<br />
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते<br />
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते<br />
लोग उसे भुलाने के लिये<br />
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में<br />
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने<br />
उसे देखेंगे शोर के दीवाने<br />
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने<br />
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते<br />
..........................................<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मुहँ में डाले तेल से आंखों देखा घी भला ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=135</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 03:08:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=135</guid>
<description><![CDATA[आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल
साधू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल<br />
साधू सों झगडा भला, ना साकट सों मेल</strong></p></blockquote>
<p>आंखों से देखा घी का दर्शन भी अच्छा है और तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं है। साधू-संतो से झगडा भी अच्छा है परन्तु निगुरा (जिसका कोई गुरू नहीं है) से मेल-मिलाप कदापि अच्छा नहीं है, क्योंकि साधू से झगडा होने पर निर्णय अच्छा हो सकता है पर निगुरे से मेल-मिलाप कभी भी फलदायी नहीं हो सकता। </p>
<blockquote><p><strong>सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय<br />
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय</strong></p></blockquote>
<p>संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:ज्ञान रुपी हाथी की सवारी कीजिए, भौंकने पर ध्यान न  दीजिये]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:29:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार
श्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार<br />
श्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की ज्ञान रूपी हाथी पर सहज भाव से दुलीचा डालकर उस पर सवारी कीजिए और संसार के दुष्ट पुरुषों को कुत्ते की तरह भोंकने दीजिये, उनकी पवाह मत करिये. </p>
<p><strong>कहते को कहि जान दे, गुरु की सीख तू लेय<br />
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोग आलोचना और निंदा करते हैं और उनकी परवाह नहीं करना चाहिऐ. अपने गुरु की शिक्षा लेकर उस पर चलना चाहिऐ और कुछ दुष्ट लोग अगर निंदा करते हैं तो उनके भोंकने पर जवाब नहीं देना चाहिऐ. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय का ख्याल करना पशु-पक्षियों से सीखें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 04:21:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=123</guid>
<description><![CDATA[1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है। </p>
<p>2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।<br />
3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है। </p>
<p>4.पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पशु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।<br />
5.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:हृदय कुएँ से अधिक गहरा नहीं होता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=121</link>
<pubDate>Mon, 11 Feb 2008 03:58:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=121</guid>
<description><![CDATA[गुन ते लेत  रहीम  जन, सलिल  कूप ते काढि
कू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गुन ते लेत  रहीम  जन, सलिल  कूप ते काढि<br />
कूपहु ते कहुं  होत है, मन काहु को बाढि </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की जिस प्रकार रस्सी के द्वारा कुएँ से पानी निकल लेते हैं, उसी प्रकार अच्छे गुणों द्वारा दूसरों के ह्रदय में अपने लिए प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं, क्योंकि किसी का हृदय कुएँ से गहरा नहीं होता। </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की अपना प्रभाव और सम्मान सबको अच्छा लगता है। अपने शरीर की सुन्दरता आती है तो  जाती भी है। जैसे ह्रदय पर पयोधर सुन्दर प्रतीत होते हैं परन्तु अन्यत्र रसौली भी होती है जो अच्छी नहीं लगती।</p>
<p>भावार्थ- मनुष्य में गुण और अवगुण दोनों ही होते हैं और समय पर उनका प्रकट होना आवश्यक भी है। अपना सम्मान अच्छा लगता है पर कभी अपमान का भी सामना करना पड़ता है। देह और मुख पर सुन्दरता होती है तो अच्छी लगती है पर अगर शरीर के किसी हिस्से पर रसौली है तो बहुत बुरी लगती है। ऐसे में हमें दुख-सुख में कभी विचलित नहीं होना चाहिऐ।  </p>
<p><strong><strong>बसन्त पंचमी की समस्त साथियों, पाठकों और मित्रों को बधाई </p>
<p>दीपक भारतदीप </strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जहाँ ले जाता मन-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=117</link>
<pubDate>Mon, 04 Feb 2008 15:40:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=117</guid>
<description><![CDATA[दिल में हो कड़वाहट तो मीठा कैसे लिखें
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिल में हो कड़वाहट तो मीठा कैसे लिखें<br />
उदासी हो दिल में, चेहरे से हँसते कैसे दिखें<br />
कितना कठिन अपने को छिपाना मन की  आँखों से<br />
जैसे अपने को लगें वैसे ही दूसरों को भी  दिखें<br />
जमाने के साथ कब तक चल सकती है चालाकी<br />
कब तक अपने दिल का हाल छिपा कर लिखें<br />
कहीं कोई आस नहीं, फिर भी दिल निराश नहीं<br />
जब तक चल रही सांस, कैसे जिन्दगी से हारते दिखें<br />
कभी अपने कागज़ पर  लिखे शब्द थके हुए लगते हैं<br />
हम रुक जाते, पर फिर वह शेर की तरह दौड़ते दिखे<br />
कहाँ ले जाएं इस  जमाने से आहत अपना मन<br />
रुकने की सोचें, अगले ही पल उसके कहे पर  चलते दिखें </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:माया के स्वरूप को भी कोई नहीं जानता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 04:04:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/23/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय
जो मन म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय<br />
जो मन में ना उतरे, माया कहिए सोय </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया-माया कहकर उसके पीछे तो सब पड़े हैं पर उसका सही स्वरूप कोई नहीं जानता. सभी एक दूसरे को सन्देश देते हैं कि माया के चक्कर में मत पडो पर पर सभी उसके इर्द-गिर्द जिन्दगी भर घूमते हैं. </p>
<p>भावार्थ-आपने देखा होगा कि सब लोग एक दूसरे को तमाम तरह के उपदेश देते हैं कि पैसे से सब कुछ नहीं होता है और धर्म-कर्म भी करना चाहिए और दिखाने के लिए भक्ति भी करते हैं पर उनके मन से माया का मोह नहीं निकलता और भगवान् का नाम लेते हैं पर उनको मन में स्थान नहीं दे पाते.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:एक राम को जानिए ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/sant-kabir-vaaniek-ram-ko-jaaniye/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 04:00:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/sant-kabir-vaaniek-ram-ko-jaaniye/</guid>
<description><![CDATA[आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक<br />
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक </strong></p>
<p>संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युतर  में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।</p>
<p><strong>जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय<br />
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय संत</strong><br />
कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है। </p>
<p><strong>एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय<br />
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय</strong></p>
<p>संत कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शीतल चांदनी का आनंद उठाए कौन ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/17/sheetal-chandni-ka-aanand-uthaye-kaun/</link>
<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 16:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/17/sheetal-chandni-ka-aanand-uthaye-kaun/</guid>
<description><![CDATA[रात्रि में चन्दा बिखेरता
अब भी पहले की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रात्रि में चन्दा बिखेरता<br />
अब भी पहले की तरह<br />
शीतल चांदनी<br />
पर उसका आनन्द उठाएँ कौन<br />
दूरदर्शन और कम्प्यूटर से<br />
अपनी आखें लेकर जूझता आदमी<br />
बाहर है प्राकृतिक सौन्दर्य<br />
खङा है मौन</strong></p>
<p><strong>प्रथम किरणों के साथ<br />
जीवन का संदेश देता सूर्य<br />
रात को देर तक सोकर<br />
सुबह देर बिस्तर छोड़ें आदमी<br />
प्रात:काल नमन करे कौन<br />
शीतल और शुद्ध पवन<br />
आवारा फिरती है<br />
वातानुकूलित कमरों में<br />
उसका है प्रवेश वर्जित<br />
सुखद अनुभूति पाए कौन<br />
कई सदियों से शहर के बीच<br />
बहती है नदी की धारा<br />
नालियों से बहकर आती गंदिगी ने<br />
उसकी शुद्ध आत्मा को मारा<br />
अपने शहर में ही हो गया<br />
आदमी अब परदेशी<br />
उसका हमसफ़र बने कौन</strong></p>
<p><strong>प्राणवायु का सर्जन कर<br />
उसे चारों और  बिखेर  रहा है<br />
बरगद का पेड<br />
जीवंत ह्रदय की प्रतीक्षा में<br />
खड़ा है मौन<br />
जीने की चाह है सभी को<br />
सुख और आनन्द भी मांगें<br />
पर इनका मतलब<br />
समझा पाता कौन<br />
-------------------<br />
हरियाली को बेघर कर<br />
पत्थरों के जंगल खडे कर रहा है<br />
जिसे देखो  वही<br />
आत्मघाती हमले कर रहा है<br />
हवाओं में खुद ही डालता<br />
विषैली गैसें आदमी<br />
हर कोई जीवन को मौत का<br />
सन्देश दे रहा है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन शुद्ध हो तो प्रतिमा में भी भगवान् ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</link>
<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 08:10:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/16/chankya-nitiman-shuddh-ho-to-pratima-men-bhee-bhagvaan/</guid>
<description><![CDATA[1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।<br />
<strong>संपादकीय अभिमत-</strong>विश्व में अनेक प्रकार के ग्रंथ हैं और सबको पढ़ना और उनका ज्ञान धारण करना संभव नहीं है इसलिए सार अपनी दिमाग में रखना चाहिए. अनेक पुस्तकों में कहानियां और उदाहरण दिए जाते हैं पर उनके सन्देश का सार बहुत संक्षिप्त होता है और उसे ही ध्यान में रखान चाहिऐ </p>
<p>2.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।<br />
 3. सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
<strong><strong>संपादकीय अभिमत-</strong></strong>यह सच है की प्रतिमा में भगवान् का अस्तित्व नही दिखता पर इस उसमें उसके होने की अनुभूति हमारे मन होती है. आदमी का मन ही उसका मूल है इसलिए उसे मनुष्य कहा जाता है. जब किसी प्रतिमा  के सामने बहुत श्रद्धा से प्रणाम करते हैं तो कुछ देर इस दुनिया से विरक्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान थोडी  देर के लिए पवित्र भाव को प्राप्त होता है. यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. हाँ, इसके लिए हमें मन में शुद्ध भावना को स्थापित करना पडेगा तभी हम प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं.  </p>
<p>4.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।<br />
5.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बुद्धिमान अपने  आहार की चिंता नहीं करते ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/15/chanky-neetibudhimaan-apne-ahar-ke-chinta-nahin-karte/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 05:17:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/15/chanky-neetibudhimaan-apne-ahar-ke-chinta-nahin-karte/</guid>
<description><![CDATA[१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चिंता नहीं करना चाहिए, उसे तो केवल  अपने धर्म और अनुष्ठान में लगना चाहिए क्योंकि उसका आहार तो उसके मनुष्य जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है.</p>
<p>अभिप्राय-इसका अभिप्राय यह है कि परमपिता परमात्मा ने जिसे जन्म दिया है उसके लिए आहार का इंतजाम तो उसके भाग्य में लिख दिया है, कहा भी जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. आदमी में यह अहंकार रहता है कि में खुद अर्जित कर रहा हूँ जबकि वह  तो उसके भाग्य में लिखा है.</p>
<p> लोगों से जब कहा जाता है कि 'भाई,. धर्म कर्म और भगवान् की भक्ति कर लो.' तो वह कहते हैं कि समय ही कहाँ मिल पाता. परिवार के लिए रोटी कमाने से फुरसत ही कहाँ  है?</p>
<p>ऐसा कहकर अपने को धोखा देते हैं. यहाँ कोई किसी को नहीं पाल सकता. सब अपने लिए नियत भाग्य का खा रहे  हैं. आपने देखा होगा कि कोइ व्यक्ति जब मार जाता है तो उसके पीछे कोई  और मरने नहीं जाता कि अब तो अमुक मर  गया है और अब में कहाँ से रोटी खाऊंगा. अब जिंदा लोग यह खुशफहमी पालें के में किसी को भोजन  और वस्त्र और अन्य  वस्तुएं उपलब्ध करा रहा हूँ तो उसे भ्रमित नहीं तो क्या कहा जायेगा. यह भ्रम नहीं तो और क्या है कि लोग  अपना पूरा जीवन अपने जिस  परिवार को अर्पित करते हुए  धर्म-कर्म और अनुष्टान से दूर रहकर गुजार देते हैं और वह उनके बाद भी यथावत चलता है.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:सच्चा मित्र दही की तरह निभाता है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/rahim-ke-dohesachcha-mitra-dahi-ke-tarah-nibhata-hai/</link>
<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 03:54:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/14/rahim-ke-dohesachcha-mitra-dahi-ke-tarah-nibhata-hai/</guid>
<description><![CDATA[मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong>मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव<br />
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय</strong></strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता। </p>
<p>भावार्थ-सच्चा  दोस्त वक्त पर  ही परखा जाता है जिस प्रकार  दही मट्ठे में परिवर्तित  होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।</p>
<p><strong><strong>मनिसिज माली के उपज, कहि रहीम नहिं जाय<br />
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय</strong></strong> </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि कामदेव रुपी माली  की पैदावार का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। राधा के हृदय पर जो फल लगे हुए हैं उसके फूल श्याम के हृदय पर ही उगे हैं। </p>
<p><strong><strong>रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं<br />
आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि</strong></strong></p>
<p>संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान का निवास  नहीं होगा और यदि  दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हवा और पानी को  शुद्ध नहीं कर सकते ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/hava-aur-pani-ko-shuddh-naheen-kar-sakte/</link>
<pubDate>Thu, 13 Dec 2007 15:35:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/hava-aur-pani-ko-shuddh-naheen-kar-sakte/</guid>
<description><![CDATA[जिन रास्तों पर चलते हुए
कई बरस बीत गये
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जिन रास्तों पर चलते हुए<br />
कई बरस बीत गये<br />
पता ही नही लगा कि<br />
कैसे उनके रूप बदलते गए<br />
जहाँ कभी छायादार पेड़ हुआ करते थे<br />
वहाँ लहराता है सिगरेट का धुआं<br />
जहाँ रखीं थीं गुम्टियाँ<br />
वहाँ ऊंची इमारतों के<br />
पाँव जमते गए<br />
जहाँ हुआ करता था उद्यान<br />
वहाँ कचरे के ढेर बढ़ते गये<br />
कहते हैं दुनिया में तरक्की हो रही है<br />
सच यह है कि पतन की तरफ<br />
हम कदम-दर कदम बढ़ते गए<br />
हवा में लटकी<br />
खातों में अटकी<br />
गरीब से दूर भटकी<br />
दौलत अगर तरक्की का प्रतीक है तो<br />
सोचना होगा कि हम पढे-लिखे हैं कि<br />
किताब पढ़ने वाले अनपढ़ बन गए<br />
आंकडों के मायाजाल में<br />
कितनी भी तरक्की  दिखा लो<br />
हवाओं को तुम ताजा नहीं कर सकते<br />
पानी को साफ नहीं कर सकते<br />
इलाज के लिए कितनी भी दवाएं बना लो<br />
मरे हुए को जिंदा नही कर सकते<br />
आकाश में खडे होकर तरक्की की<br />
सोचने वाले जमीन के दुश्मन बन गए </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/chankya-neetiman-men-pap-ho-to-teerth-se-bhee-shuddhi-naheen/</link>
<pubDate>Thu, 13 Dec 2007 03:14:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/13/chankya-neetiman-men-pap-ho-to-teerth-se-bhee-shuddhi-naheen/</guid>
<description><![CDATA[१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपड]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.<br />
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.<br />
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.<br />
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.<br />
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.<br />
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.<br />
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.</p>
<p><strong>नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें</strong></p>
<p>http//dpkraj.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भ्रम का जाल]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/bhram-kaa-jaal/</link>
<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 15:08:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/bhram-kaa-jaal/</guid>
<description><![CDATA[सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सामने कुछ कहैं<br />
पीठ पीछे कुछ और<br />
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर<br />
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर<br />
बोले और पीछे पछ्ताएं<br />
जैसे नाचने के बाद रोए मोर<br />
जिनके मन में नही सदभाव<br />
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव<br />
अपनी पीठ आप थपथपापाएं<br />
अपने दिल का मैल छिपाएं<br />
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर<br />
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है<br />
अकेले में समय गुजारें<br />
उनके झुंड में रहने से अच्छा है<br />
भले लोगों का तलाश करें ठौर<br />
---------------------------------------</p>
<p>सुबह से शाम तक<br />
पसीन बहाते हुए लोग<br />
बड़ी मुश्किल से रोटी जुटा पाते<br />
फिर भी समाज में तिरस्कार  पाते<br />
जिन्हें  मिली है दौलत की गाडी<br />
वह फिर भी गरीब से इतना खौफ खाते  कि<br />
जिन्हें खुद न माने<br />
उसी जाति,भाषा,  और धर्म के नाम पर<br />
भ्रम का जाल बुनकर उसे फंसाते </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता वहाँ समृद्धि आती है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</link>
<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 04:03:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</guid>
<description><![CDATA[१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी बिना बुलाए निवास करती है.<br />
अभिप्राय-इस कथन का आशय यह है की यदि किसी देश में सुख और समृद्धि आयेगी तो गुणवानों  के समान  से आयेगी.इसके अलावा जहाँ खाद्यान के भण्डार एवं परिवारों में शांति होती है वही खुशहाली होती है.      </p>
<p> 2.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
३.समय  के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि  भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।<br />
4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते है.<br />
५. व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले अपनी नीयत बताओ ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/pahle-apni-neeyat-bataao/</link>
<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 14:17:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/pahle-apni-neeyat-bataao/</guid>
<description><![CDATA[कहते हैं रामजी के होने के
भौतिक सबूत ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कहते हैं रामजी के होने के<br />
भौतिक सबूत हमारे सामने लाओ<br />
नहीं ला सकते तो उन्हें भूल जाओ<br />
राम जी की माया अपरम्पार<br />
जिस पर माया का भूत चढा दें<br />
अपना नाम भी भुलवा दें<br />
सोने के सिंहासन पर बैठते ही<br />
भगवान् की तरह पूजने की चाह<br />
उन्हें अंधा बना देती  है<br />
रामजी का नाम रहते यह संभव नहीं<br />
अमीर तो क्या गरीब के मन भी<br />
उनका नाम बसता है कहीं न कहीं<br />
दिलों के नाम मिटाने के लिए<br />
वह कहते है<br />
उनके होने का सबूत लाओ </p>
<p>राम के नाम का उनको कितना खौफ है<br />
गरीबी, शोषण और बीमारी के दवा के लिए<br />
लोगों को इधर उधर भटकाते हैं<br />
राम की प्रस्तर की प्रतिमा को<br />
पूजने से मना  करने वाले ही<br />
मुर्दों के नाम पर पत्थर लगाकर<br />
उस पर माला चढाते हैं<br />
कहीं अपना काम न बने तो<br />
पत्थर लगवाने के लिए<br />
जिंदा इंसान  को ही मुर्दा बनाते हैं<br />
राम का नाम फिर भी लेते हैं<br />
यह कहने के लिए उसे भूल जाओ </p>
<p>रामभक्त भी सबूत जुटा लेंगे<br />
अपने भक्तों के लिए रामजी  भी<br />
अपनी कृपा उन पर लुटा देंगे<br />
पर सवाल करने वाले भी<br />
इसके पीछे जो उनके  दिल की नीयत  है<br />
क्या वह अपनी हथेली पर रखकर  दिखा देंगे<br />
कर सकते हैं तभी कहें कि<br />
'राम जी के होने के सबूत लाओ'<br />
-----------------------------------  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परिवार का सुख उसके स्वरूप पर निर्भर ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/chankya-neetiparivar-ka-sukh/</link>
<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 04:25:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/10/chankya-neetiparivar-ka-sukh/</guid>
<description><![CDATA[१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्ध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है की परिवार का स्वरूप कैसा है. जहाँ परिवार के सदस्य एक दूसरे के मनोभावों को समझते और सम्मान करे हैं वहीं शांति रह पाती है और शांति से ही सुख समृद्धि आती है.<br />
2. यह मनुष्य का स्वभाव है की यदि वह दूसरे के गुण और श्रेष्ठता को नहीं जानता तो वह हमेशा उसकी निंदा करता रहता है. इस बात से ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.</p>
<p>उदाहरण- यदि किसी भीलनी को गजमुक्ता (हाथी के कपाल में पाया जाने वाला काले रंग का मूल्यवान मोती) मिल जाये तो उसका मूल्य न जानने के कारण वह उसे साधारण मानकर माला में पिरो देती है और गले में पहनती है.  </p>
<p>3.बसंत ऋतू में फलने वाले आम्रमंजरी के स्वाद से प्राणी को पुलकित करने वाले कोयल की वाणी जब तक मधु और कर्ण प्रिय नहीं हो जाती तबतक मौन रहकर ही अपना जीवन व्यतीत करती है.<br />
इसका आशय यह है हर मनुष्य को किसी भी कार्य को करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना चाहिए अन्यथा असफलता का भय बना रहता है.<br />
4.राजा , अग्नि, गुरु और स्त्री इन चारों से न अधिक दूर रहना चाहिऐ न अधिक पास अर्थात इनकी अत्यधिक समीपता विनाश का कारण बनती है और इनसे दूर रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता. अत: विनाश से बचने के लिए बीच का रास्ता अपनाना चाहिऐ.<br />
५.अधिक लाड प्यार बच्चे में  में दोष उत्पन्न करता है और प्रताड़ना से ही उसमें सुधार आता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</link>
<pubDate>Sat, 08 Dec 2007 04:02:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/08/chankya-neetidharam-kaa-niyam-hee-shashvat/</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*संकलनकर्ता  का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।<br />
<strong>नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/vikas-yani-vahanon-kee-chaudaaee-bahdnaa-aur-sadkon-kee-kam-honaa/</link>
<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 14:27:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/06/vikas-yani-vahanon-kee-chaudaaee-bahdnaa-aur-sadkon-kee-kam-honaa/</guid>
<description><![CDATA[बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत समय से देश के विकास होने के   प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह के आंकडे भी दिए जाते हैं पर जब मैं रास्तों से उन रास्तों से गुजरता हूँ-जहाँ चलते हुए वर्षों हो गयी है-तो उनकी हालत देखकर यह ख्याल आता है कि आखिर वह विकास हुआ कहाँ है. अगर इसे विकास कहते हैं तो वह इंसान के लिए बहुत तकलीफ देह होने वाला है.</p>
<p>पेट्रोल, धुएं और रेत से पटे पड़े रास्ते राहगीरों की साँसों में जो विष घोल रहे हैं उससे  अनेक बार तो सांस बंद करना पड़ती हैं कि यह थोडा आगे चलकर यह विष भरा धुआं और गंध कम हो तो फिर लें. टेलीफोन, जल और सीवर की लाईने डालने और उनको सुधारने के लिए खुदाई हो जाती है पर सड़क को पहले वाली  शक्ल-जो पहले भी कम बुरी नहीं थी-फिर वैसी नहीं हो पाती. अपने  टीवी चैनल और अखबार चीन के विकास की खबरें दिखाते हुए चमचमाती सड़कें और ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतें दिखा कर यह बताते हैं कि हम उससे बहुत पीछे हैं-पर यह मानते हैं  कि अपने देश में विकास हो रहा है पर धीमी गति से. मैं जब वास्तविक धरातल पह देखता हूँ तो पानी और पैसे के लिए देश का बहुत बड़ा वर्ग अब भी जूझ रहा है. कमबख्त विकास कहीं तो नजर आये. </p>
<p>आज एक अखबार में पढ़ रहा था कि भारत में पुरुषों से मोबाइल अधिक महिलाओं के पास बहुत हैं. मोबाइल से औरतें  अधिक लाभप्रद स्थिति में दिखतीं  हैं क्योंकि अब किसी से बात करना है तो उसके घर जाने की जरूरत ही नहीं है मोबाइल पर ही बात कर ली, पर पुरुषों की समस्या यह है कि उनको अपने कार्यस्थल तक घर से सड़क मार्ग से ही जाना  है और उनके लिए यह रास्ते कोई सरल नहीं रहे. साथ में मोबाइल लेकर उनके लिए चलना वैसे भी ठीक नहीं है. रास्ते में  मोबाइल की घंटी मस्तिष्क में कितनी बाधा पहुचाती है यह मैं जानता हूँ. उस दिन बीच सड़क पर स्कूटर पर घंटी बजी और मेरे  इर्द-गिर्द वाहनों की गति बहुत तेज थी कि एक तरफ रूकने के लिए मुझे समय लग गया. जब एक तरफ रुका तो जेब से मोबाइल निकाला तो देखा कि 'विज्ञापन' था. उस समय झल्लाहट हुई पर मैं क्या कर सकता था? फिर मैंने स्कूटर भी सड़क से ढलान से उतरकर  ऐसी जगह रोका था  जहाँ सड़क पर लाने के लिए शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करना पडा. </p>
<p>आपने देखा होगा कि जो आंकडे विकास के रूप में दिए जाते हैं उनमें देशों में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के उपभोक्ता की संख्या  शामिल रहती है. अब विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति की आय-व्यय की जगह  धन की बर्बादी से है. यह नहीं देखते कि उनका उपयोग क्या है? मैं तो आज तक समझ नहीं पाया कि लोग मोबाइल पर इतनी लंबी बात करते क्या हैं. फालतू, एकदम फालतू? फिर तमाम ऍफ़ एम् रेडियो, और टीवी पर ऐसे सवाल करते है ( उस पर एस.एम्.एस करने के लिए कहा जाता है) जो एक दम साधारण होते हैं. लोग जानते हैं कि यह सब उनका धन खींचने के लिए किया जा रहा है पर अपने को रोक नहीं पाते क्योंकि उन्हें क्षेत्र, धर्म, और भाषा के नाम पर बौद्धिक रूप से गुलाम बना दिया  गया है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाता. </p>
<p>अगर मुझसे पूछें तो विकास का मतलब है कि वाहनों की चौडाई बढना और सड़क की कम होना. जब भी कहीं जाम में फंसता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि वह लोगों और उनके वाहनों की संख्या की वजह से है. दो सौ मीटर के दायरे में सौ लोग और पच्चीस वाहन भी नहीं होंगे पर जाम फिर भी लग जाता है. वहाँ कारें, ट्रेक्टर और मोटर साइकलों पर एक-एक व्यक्ति सवार हैं पर सड़क तंग है तो रास्ता जाम हो जाता है. सड़कें भी जो पहले चौड़ी थी वहाँ इस  तरह निर्माण  किये गए हैं कि पता नहीं कि कब यह हो गए. जहाँ पहले पेड़ थे वहाँ गुमटियाँ, ठेले और कहीं पक्के निर्माण हो गए हैं और सड़क छोटी हो गयी और वाहन जहाँ साइकिल और स्कूटर थे वहाँ आजकल कारों का झुंड हो गया है. यह विकास और उत्थान  है तो फिर विनाश और पतन   किसे कहते हैं यह मेरे लिए  अभी भी एक पहेली है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जादू-टोना व्यर्थ है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/02/sant-kabir-vanijadu-tona-vyarth-hai/</link>
<pubDate>Sun, 02 Dec 2007 04:48:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/02/sant-kabir-vanijadu-tona-vyarth-hai/</guid>
<description><![CDATA[जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय
नरक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय<br />
नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।</p>
<p><strong><strong>बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि<br />
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि</strong></strong><br />
इसका आशय यह है कि जो आदमी वाणी के महत्त्व को जानता है,, समय देखकर उसके अनुसार सोच और विचार कर बोलता है और अपने लिए उचित स्थान देखकर बैठता है वह कभी भी कहीं भी पराजित नहीं हो सकता।</p>
<p><strong><strong>जंत्र मन्त्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय<br />
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय </strong></strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं का यह आशय है कि यन्त्र-मन्त्र एवं टोना-टोटका आदि सब मिथ्या हैं। इनके भ्रम में मत कभी  मत आओ। परम सत्य के ठोस शब्द-ज्ञान के बिना, कौवा कभी भी हंस नहीं हो सकता अर्थात दुर्गुनी-अज्ञानी लोग कभी  सदगुनी और ज्ञानवान नही हो सकते </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच किसे समझाएं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/sach-kise-samjhaaen/</link>
<pubDate>Sat, 01 Dec 2007 13:02:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/sach-kise-samjhaaen/</guid>
<description><![CDATA[सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सदियों से चले आ रही<br />
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ<br />
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते<br />
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते<br />
बाहर से आदर्श  लगते<br />
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं<br />
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं<br />
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें<br />
सभ्य  समाज हो रहा है दिशाहीन<br />
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है<br />
अक्षरों से बने  शब्दार्थ पर  हो रही है जंग<br />
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग<br />
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है<br />
ऐसे में सच किसे समझाएं<br />
------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अति कदापि न कीजिए ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/rahim-ke-doheati-kadapi-n-kijiye/</link>
<pubDate>Sat, 01 Dec 2007 06:00:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/01/rahim-ke-doheati-kadapi-n-kijiye/</guid>
<description><![CDATA[रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिये निज कानि
स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिये निज कानि<br />
सैजन अति फूले तऊ, दार पात की हानि</strong></p>
<p>अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि किसी चीज की भी अति कदापि न कीजिए, हमेशा अपनी मर्यादा को पकडे रही. जैसे सहिजन वृक्ष के अत्यधिक विकसित होने से उसकी शाखाओं और पत्तों को हानि होती है और वह झड़ जाते हैं. </p>
<p><strong>रन, बन, व्याधि, विपत्ति में रहिमन मरै न रोय<br />
जो रच्छक जननी जठर, सौ हरि गए कि सोय</strong></p>
<p>अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि रणक्षेत्र में, वन में, बीमारी में और आपति आने पर जो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है उसके रोना नहीं चाहिए, जो माता के गर्भ का रक्षक है वह परमात्मा कभी सोता नहीं है. </p>
<p>अभिप्राय- जो ईश्वर जन्म देता है वही मृत्यु भी. ईश्वर की मर्जी होती हैं तो जन्म होता है और उसकी मर्जी होती है तभी वह किसी जीव को अपने पास बुला लेता है. जिसके उसके द्वारा प्रदत्त आयु पूर्ण नहीं हुई है उसे मृत्यं भी नहीं मार सकती.</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
