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	<title>hindu-culture &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindu-culture/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindu-culture"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:40:07 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 06:55:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">आदमी के पंख नहीं होते<br />
जो वह आसमान में उड़ सके<br />
पर उसका मन बिना पंख के ही<br />
उड़ता चला जाता है<br />
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं<br />
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे<br />
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं<br />
खुशी में झूमकर नाचता इंसान<br />
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती<br />
अश्रुधारा में करता स्नान<br />
पर परिंदे कभी रोते नहीं<br />
अपने मन के इशारे पर<br />
कठपुतली की तरह नाचता<br />
कितने भी दावे करे कि<br />
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर<br />
अपनी अक्ल पर है उसका काबू<br />
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के<br />
पर कभी वह सच्चे होते नहीं<br />
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते<br />
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते<br />
यह सच है<br />
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम<br />
रहने वाले  इंसानों के लिये<br />
साबित करना बहुत मुश्किल है कि<br />
वह कठपुतली होते नहीं<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">कठपुतली ने चिडि़या से कहा<br />
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं<br />
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती<br />
मुझे तुम पर तरस आता है’</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की<br />
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया<br />
छूट गयी उसके हाथ से  डोर<br />
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया<br />
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा<br />
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता<br />
अपने मन के इशारे पर डोलता <br />
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता <br />
दावे करता है आकाश में उड़ने का<br />
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर<br />
उड़ता तो क्या हाल करता<br />
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया<br />
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये<br />
इंसान को मन की कठपुतली बनाया<br />
..............................................................</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">दीपक भारतदीप</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;">my other web page</span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://dpkraj.blogspot.com">http://dpkraj.blogspot.com</a> </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://deepkraj.blogspot.com">http://deepkraj.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://teradipak.blogspot.com">http://teradipak.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://terahdeep.blogspot.com">http://terahdeep.blogspot.com</a></span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong><span style="color:#003300;"><a href="http://zeedipak.blogspot.com">http://zeedipak.blogspot.com</a>  </span></strong></p>
<p style="padding-left:60px;"><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</guid>
<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंग्रेजी नाम, हिंदी नाम-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:08:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक बात अनुभव हो रही है कि यहां रूढ़ता का भाव अपने हृदय में रखने को कोई मायने नहीं है। अंतर्जाल पर अनेक वेब साइटों और ब्लाग पर निकल रही हिंदी  पत्र-पत्रिकाओं के नाम हिंदी में है तो अंग्रेजी में नहीं और अंग्रेजी में है तो हिंदी में नहीं। मैं दोनों से संबंध रखता हूं और मेरी रुचि इस बात में है कि किस तरह अंतर्जाल पर हिंदी के पाठक अधिक से अधिक सक्रिय हों। मेरी कुछ पत्रिकाएं ब्लाग पर हैं और कुछ वेब साईटों की पत्रिकाओं पर मैं लिखता हूं। मैंरे अपने वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर बनी पत्रिकाओं के नाम हिंदी में रखे हैं। बीच में मैंने अपनी इन पत्रिकाओं का अंग्रेजी नाम भी रखा था पर हिंदी एग्रीगेटरों से उनके जुड़ने  के बाद अंग्रेजी नाम हटा लिये। इसका पछतावा मुझे आज तक है।</h3>
<h3>एक बात तय है कि विश्व में भाषा की दूरियां अब कम हो रही हैं और ऐसे में वेब साइटों और वेब पृष्ठोंं पर बनी पत्र-पत्रिकाओं को किसी भाषाई रूढ़ता से उबरना होगा तो साथ ही अपनी मौलिकता से निर्वाह करना होगा। मैं बात कर रहा हूं उनके वेब साईटों और वेब पृष्ठों पर बने पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षक और  नाम की। कई जगह पत्र-पत्रिकाओं का नाम अंग्रेजी है पर हिंदी में न होने के कारण उसके शब्द सर्च इंजिन में डालने पर वह उसके सामने नहीं आती तो अंग्रेजी मेें न होने के कारण उसका भी यही हश्र होता है। अब अनुवाद  टूल आने से हमें अब इस संभावना पर भी विचार करना चाहिए कि देश विदेश के अन्य भाषी लोग हिंदी के लेखकों और संपादकों से अपना संपर्क रखना चाहेंगे और यकीन मानिए वह हिंदी शब्द सर्च इंजिन में डालकर तलाश नहीं करेंगे। ऐसे में कोई हिंदी भाषी पत्र-पत्रिका (जो वेब साईट या वेब पृष्ठों   पर हैं) अगर अपना नाम अंग्रेजी में रखती है तो उस पर आपत्ति नहीं है पर अगर वह हिंदी में भी रखें तो अच्छी बात है। वैसे यह आवश्यक नहीं है कि अंग्रेजी के पाठक हिंदी की अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना चाहें पर यह एक संभावना है जो हाल ही में बनी है। वैसे  अंग्रेजी नाम की वजह से कई पत्र-पत्रिकाएं  अन्य भाषियों में ही क्या अपनी भाषा वालों मे भी पैठ भी नहीं बना पाईं।</h3>
<h3>एक बात और है कि हिंदी भाषी पत्र-पत्रिकाओं के अंग्रेजी शीर्षक या नाम रखने वालों को यह समझना चाहिए कि ‘हिंदी’ में नाम होने से ही उनकी मौलिकता प्रकट होगी न कि अंग्रेजी से। अगर कोई विदेशी पाठक हिंदी सामग्री  को पढ़ना चाहेगा तो उसकी दृष्टि में सम्मान तभी बढ़ेगा जब हिंदी में शीर्षक होगा भले ही वह सर्च इंजिन में अंग्रेजी शब्द डालकर वहां तक आया हो। इसलिये अंतर्जाल पर वेब साईटों और वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर चल रहीं पत्र-पत्रिकाओं को अपने नाम अंग्रेजी नाम के साथ हिंदी में रखना चाहिए, जिनके शीर्षक हिंदी में है वह अगर सोचते हैं कि अन्य भाषियों तक उनके लिए पहुंचना संभव है तो वह उसमें अंग्रेजी नाम भी जोड़ सकते हैं। वैसे श्रेणियों और टैग लगाकर भी यह काम हो ही रहा है। </h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 17:50:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की<br />
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई<br />
जा रही थी वह गाड़ी पर<br />
चलते चलते ही उसने<br />
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई<br />
फिर भी वह बातें करता रहा<br />
वह भी सुनती रही<br />
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा<br />
अचानक वह कार  से टकराई<br />
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई<br />
प्रेमी ने पूछा<br />
‘क्या हुआ प्रिये<br />
यह कैसी आवाज आई<br />
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर<br />
चढ़कर वहीं आ जाऊं<br />
मुझे बहुत चिंता घिर आई’<br />
प्रेमिका ने कहा<br />
‘घबड़ाओ नहीं कार से<br />
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई<br />
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई<br />
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी करता रहा इंतजार<br />
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई<br />
एक दिन भेजा संदेश<br />
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई<br />
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई<br />
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है<br />
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई<br />
इन दो पहियों की गाड़ी से<br />
तो अब हो गयी ऊब<br />
चार पहियों वाली गाड़ी में ही<br />
अब घूमने की इच्छा आई’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">प्रेमी सुनकर चीखा<br />
‘यह कैसा मोबाइल है<br />
जिसने मोहब्बत को भी बनाया<br />
अपने जैसा<br />
कितना बुरा किया मैंने जो<br />
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ<br />
..............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःभक्ति के लिये हृदय में शुद्ध भावना जरूरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 03:18:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=148</guid>
<description><![CDATA[पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार
भेद अल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार<br />
भेद अलहदा रहि गयो, भेदवंत सो पार<br />
 <br />
संत शिरोमणि कबीदासजी कहते हैं कि पत्थर और पानी को पूज कर सारे संसार के लोग नष्ट हो गये पर अपने तत्व ज्ञान को नहीं जान पाये। वह ज्ञान तो एकदम अलग है। अगर कोई ज्ञानी गुरु मिल जाये तो उसे प्राप्त कर इस दुनियां से पार हुआ जा सकता है।</p>
<p><strong>पाहन ही का देहरा, पाहन ही का देव<br />
पूजनहारा आंधरा, क्यौं करि मानै सेव</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ति  पत्थर की होती है और उसको घर में रखा जाता है वह भी पत्थर का है और लोग उसकी पूजा कर रहे हैं। जिसे खुद कुछ नहीं दिखाई देता वह भला आदमी की सेवा और भक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है।<br />
आज के संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि पत्थरों की प्रतिमाएं या मकान बनाकर उसमेें लोगों को अपनी आस्था और भक्ति व्यक्त करने के परंपरा इस संसार में शूरू हुई है तब से इस संसार में लोगों के मन में तत्वज्ञान के प्रति जिज्ञासा कम हो गयी है। लोग पत्थरों की प्रतिमाओं या स्थानों के जाकर अपने दिल को तसल्ली देते है कि हमने भक्ति कर ली और दुनियां के साथ भगवान ने भी देख लिया।  मन में जो विकास है वह जस के  तस रहते है जबकि सच्ची भक्ति के लिये उसका शुद्ध होना जरूरी है। इस तरह भक्ति या सेवा करने का कोई लाभ नहीं है। पत्थर की पूजा करते हुए मन भी पत्थर हो जाता है और उसकी मलिनता के कारण ं शुद्ध भक्ति और सेवा का  भाव नहीं बन पाता और  आध्यात्मिक शांति पाने के लिये किये गये प्रयास भी कोई लाभ नहीं देते। अगर हम चाहते हैं कि हमारे अंदर सात्विक भाव सदैव रहे तो ओंकार की भक्ति करें या निरंकार की भावना शुद्ध रखना चाहिए। </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपरोपकार करने वाले को बीच में मत छोड़ो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 02:59:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</guid>
<description><![CDATA[रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच<br />
मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की मित्रता को बीच में ही नहीं छोड़ देना चाहिए। राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस काटकर कबूतर के वजन के बराबर करने के लिए दान दिया  था और ऋषि दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अपनी हड्डियां दान में दे दी थीं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-</strong>इस दुनियां में परोपकार करने वाले मित्र वैसे ही बहुत कम मिलते हैं ऐसे में अगर कोई हमारा ऐसा संगी साथ है जो एक बार हमारा काम कर देता है तो फिर हमें उससे मूंह नहीं फेरना चाहिए क्योंकि फिर कभी कोई परेशानी आई तो उसके सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।<br />
वैसे आजकल लोगों की परेशानियों का कारण यह भी है कि उन्हेंं अच्छे-बुरे व्यक्ति की पहचान नहीं रही। अगर किसी में कोई काम फंस जाता है तो उससे वह करवाकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो पर बाद में जब विपत्ति आती है तो स्वयं ही दोबारा अपना काम कहने में उन्हें शर्म आती है। आजकल लोग अपने मित्रों के साथ भी ‘उपयोग करो और फैंक दो’ (यूज एंड थ्रो) की नीति पर चलते हैं पर याद रखने लायक बात यह  है कि पग-पग पर परोपकारी लोग नहीं मिलते पर विपत्तियों का दौर शुरू होता है तो पग-पग पर आतीं हैं। इसलिये संयोग से कोई परोपकारी साथी मिल जाये तो फिर उसे नहंी छोड़ना चाहिए। हालांकि ‘उपयोग करो और फैंक दो’ की नीति कहने सुनने में हमारी बुद्धिमानी का परिचायक लगती है पर पश्चिम से आयातित यह नीति अपने देश के लिए अनुपयुक्त है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 05:36:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः<br />
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः</p>
<p>जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।</p>
<p>सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःईमानदारी से धन कमाना ही है सबसे बड़ी पवित्रता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 03:35:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</guid>
<description><![CDATA[सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्<br />
योऽथेंशुचिहिं स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः</strong></p>
<p>जीवन में पवित्रता जरूरी है पर इनमें ईमानदारी से धन कमाने की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह सदा ही पवित्र समझा जाना चाहिए। अगर धनोपर्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी पानी आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय टिप्पणी-</strong> अब धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि क्यों लोग मनुस्मृति की कुछ जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनकी आलोचना करते हैं और उसमें वर्णित अन्य ज्ञानपूर्ण वचनों का अनदेखा करते हैं। समाज में बेईमान, चालाकी और धोखे से धन कमाने वालों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और सारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में चले गये हैं। उन्हें मनुस्मृति के संदेश कटु लगते होंगे और इसलिये ही वह नहीं चाहते कि मनुस्मृति की चर्चा एक धार्मिक पुस्तक के रूप में हो।<br />
मनु महाराज के अनुसार तो अनुचित रूप से धन कमाने वाला कभी पवित्र नहीं हो सकता और उसे देखते हुए तो केवल मजदूर, गरीब और मध्यम वर्ग के कुछ  लोग ही पवित्र रह जाते हैं। अगर उचित  तरीके से धन कमाने की बात करें तो हमें निचले वर्ग के लोगों  के अलावा अन्य कहीं मिल ही नहीं सकते। ऐसे लोग मनुस्मृति नहीं पढ़ते वरना वह तो अपनी पवित्रता का दावा करते तब तो धनाढ्य लोगों के लिए मुश्किल हो जाती। इस समय जो चमक सब तरफ दिख रही है वह क्या उचित प्रकार से धन कमाने की वजह से है? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। इतना ही नहीं हमारे कर्मकांडों में पवित्रता के अनेक रूप गढ़े गये हैं और वह काल्पनिक ही लगते हैं। मनु महाराज की पवित्रता की  सबसे बड़ी शर्त ईमानदारी से धन कमाने की है और कितने लोग इस समाज के इस कसौटी पर खरे उतरेंगे यह विचार का विषय है। तमाम तरह के लोग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोई शांति के लिये यज्ञ करा रहा है कोई वर्षा के लिये यज्ञ करा रहा है तो कोई  खेलों में देश की टीमों को जितवाने के लिये टोटका करा रहा है पर प्रश्न एक ही क्या उनमें ईमानदारी से कमाया धन लग रहा है?</p>
<p>यह आश्चर्य का विषय है कि मनुस्मृति के बारे में  लोगों में शायद भ्रांत धारण इसीलिये भरी गयी है ताकि वह कहीं अधिक ज्ञानी न हो जायें और उनकी बुद्धि को भ्रमित कर उनका दोहन कठिन न हो जाय। अगर मनु महाराज के इस श्लोक पर विचार किया जाये तो यह समझ में आ सकता है कि ईमानदार होना ही सबसे अधिक पवित्र होना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःधन और अन्न न हो तो जल का दान भी पुण्य देना वाला ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=129</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 03:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्<br />
वेदतत्त्वर्थविदूषे, ब्राहणानापादयेत,</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">यदि अपने घर में खाद्यान्न न हो तो एक ग्रास भर भिक्षा या दान देने के लिये उसे स्वादिष्ट बना कर और यदि वह भी न हो तो वेद के तत्व और अर्थ को जानने वाले आदरपूर्वक जल पिलाने वाले गृहस्थ को भी पुण्य की प्राप्त होती है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा तो कि धर्म निभाना तो अमीरों के बस का है और गरीब को तो बस अपनी रोटी कमाने से फुरसत भी नहीं है। अमीरों को दान करते देखकर गरीब भी यह सोचते हैं कि जिसके पास माया है उसे ही दान देने का अधिकार भगवान ने दिया है हम तो बिना कुछ दान किये ऐसा पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते। दरअसल यह केवल अपने आप को दुःख देने के अलावा कुछ नहीं है। मनुष्य योनि में दान की महता इसलिये बताई गयी है क्योंकि वही एक ऐसा जीव है जिसके पास बुद्धि है और वह किसी को दे सकता है। भिक्षा या दान देकर पुण्य कमाने का मूल आशय यह नहीं है कि आपने क्या और कितना दान किया है बल्कि आपने अपने पास से कुछ दान दिया यह महत्वपूर्ण है। अगर धन नहीं है तो अन्न और वह भी पर्याप्त नहीं है तो केवल एक ग्रास और वह भी नहीं है तो दर पर आये किसी सहृदय सज्जन को जल पिला दें तो वह भी पुण्य प्रदान करता है।</span></p>
<p><span style="color:#003366;">हो सकता है कि कुछ लोग गंभीर  चिंतन करते हुए या मजाक में कह दें कि पानी भी न हो तो फिर काहे का दान? इतना तय है कि जल बिना जीवन नहीं है और अगर कोई जीव है तो वहां जल-कही अधिक तो कहीं कम-उपलब्ध होता है और अगर किसी प्यासे को पानी पिलाता है वह स्वयं प्यासा नही तड़पता। तात्पर्य यह है कि अपने हाथ से कुछ किसी को देना ही भिक्षा या दान है और हम अगर किसी को अधिक धन नहीं दे पा रहे तो थोड़ा सा उसमें से किसी को देकर अपने मनुष्य होने की अनुभूति तो कर ही सकते है।</p>
<p></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःसदाचारी को अतिथि सत्कार में भेदभाव नहीं करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=128</link>
<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 07:15:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना<br />
संविभागश्च भूतेभ्यःकर्तव्योऽनुपरोधतः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">सदाचार गृहस्थ को अपनी सामथ्र्यानुसार ब्रह्मचारी और सन्यासी को भिक्षा देनी चाहिए तथा बिना किसी भेदभाव से अतिथि बनकर आये सभी जीवों को उनके भाग का भोजन और पानी देना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्<br />
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्</strong><br />
जो व्यक्ति पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला दूसरो को मूर्ख बनाकर पैसे एंठने वाला वेदों में श्रद्धा रहित पर ऊपर से सहृदय दिखने वाला है उसको गृहस्थ कभी भी अपना अतिथि नहीं बनाये। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong> हमारे अध्यात्मिक दर्शन में दान और अतिथि सत्कार की बड़ी महिमा है पर उसके लिये मनु ने कई बंधन रखे हैं। अक्सर लोग मनु स्मृति पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते है पर वास्तविकता यह है कि तत्कालीन समय में बने हुए समाजों के दृष्टिगत ही उनका उल्लेख उन्होंने किया है और अगर थोड़ा गौर से देखें तो स्पष्टतः भेदभाव को अधिक प्रधानता नहीं दी बल्कि चरित्र को दी है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वह स्पष्टतः कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को दें और आपके घर जो अतिथि आता है उसका बिना किसी भेदभाव के स्वागत करें। जिन लोगों का आतिथ्य सत्कार वर्जित किया है उनमें किसी भी जाति का आदमी हो सकता है और जिनके सत्कार की बात कही है उसमें भी कोई बंधन नही लगाया।<br />
एक सहृदय सज्जन ने मेरे से पूछा था कि आपको नहीं लगता कि दान के कुपात्र के नाम पर लोग  समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि इसमें मनु का क्या दोष? </span></p>
<p><span style="color:#003366;">आजकल दान के नाम पर कथित संत अपना घर भर रहे है तो इसमें मनु के संदेश नहीं बल्कि लोगो का अज्ञान जिम्मदार है। मैं तो कहता हूं कि लोगों को अपने दान के लिये सुपात्र ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">अरे हमारे आसपास अनेक गरीब मजदूरों के बच्चे रहते हैं, चुपचाप जाकर उनको कपड़े, किताबें दे आओ। बीमार पड़ने पर उनका इलाज कराओ।<br />
हमारे घरों और व्यापारिक संस्थानों में अनेक युवक-युवतियां काम करते हैं। उनकी ऐसे ही पगार बढ़ा दो। उनको बोनस दे दो। यह क्यों उनसे कहते हो कि हम दान दे रहे हैं। यह तो अपने मन में रखना चाहिए। हमने अनेक विचाराधाराओं के नाम पर वाद और नारे लगाकर समाज को भ्रमित किया है जो वैसे ही अपने ज्ञान से दूर रहता आया है। हमारे मनीषी इस समाज की वास्तविकताओं से परिचित थे इसीलिये लोगों को दान करने के लिये उकसाते थे। यह कहना गलत है कि वह किसी जाति विशेष को दान करने के लिये कहते थे। ब्राह्मणों को कर्मकांड करने के बाद दान-दक्षिणा देने का प्रावधान किया गया है पर यह तो उनके लिए एक तरह से मेहनताना हुआ।<br />
स्पष्टतः दान का आशय यही है कि आपके आसपास जो उसके पाने के  पात्र है उसे ही दिया जाना चाहिए और आतिथ्य सत्कार में भी कोई भेद नहंी करना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=145</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 17:09:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">आया फंदेबाज और बोला<br />
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना<br />
पता नहीं तुम्हें अब यहां<br />
क्रिकेट मैच चल रहे हैं<br />
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय<br />
कंप्यूटर में जल रहे हैं<br />
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुन कर पहले उदास हुए<br />
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू<br />
‘जजबातों में बहकर देख लिया<br />
जिनकी जीत पर हंसे<br />
और हारने पर रोए<br />
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया<br />
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये<br />
आजादी के गाने सुनवाये<br />
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये<br />
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल<br />
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल<br />
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है<br />
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है<br />
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये<br />
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये<br />
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये<br />
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह<br />
डसने लगता है<br />
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें<br />
इससे शरीर उनका कंपता है<br />
हमें तो लगने लगा है कि<br />
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है<br />
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है<br />
कभी इस देश को एक करने के लिये<br />
सब जगह नारे लगे<br />
अब बांटने के लिये सितारे लगे<br />
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में<br />
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है<br />
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता<br />
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं<br />
उनको बांटने से ही कई लोगों का<br />
बेड़ा पार यहीं होता<br />
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते<br />
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते<br />
लोग उसे भुलाने के लिये<br />
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में<br />
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने<br />
उसे देखेंगे शोर के दीवाने<br />
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने<br />
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते<br />
..........................................<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 05:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये<br />
अधिकं वापि विद्येत  सः सोम पातुमर्हति</strong> </span></p>
<p><span style="color:#003300;">जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज<br />
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-</strong>हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है।  अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं।  आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया  संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</guid>
<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आठ साल की बच्ची का हाथ कैसे कुचला जा सकता है-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 16:12:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने कुछ फोटो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने कुछ फोटो की श्रृंखला भेजी जिसने मेरा मन विचलित कर दिया। वह अकेले ऐसे ब्लागर हैं जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से मिल चुका हूं। मुलाकात के बाद वह अपने ब्लाग और ऐसे फोटो ईमेल से भेज देते हैं। उनका लेखन कितना प्रभावी है यह बताने की आवश्यकता नहीं है पर उनके द्वारा प्रेषित फोटो भी बहुत संदेश देते हैं।</strong></p>
<p><strong>उनके बारे में विस्तार से कभी समीक्षा लिखूंगा पर आज उनके द्वारा भेजे गये फोटो ने तत्काल  कुछ लिखने को मजबूर कर दिया। उनके कथानुसार यह फोटो ईरान से लिया गया है। वहां एक आठ वर्षीय लड़की पर ब्रेड चुराने का आरोप लगाया गया और फिर उसका हाथ कार के नीचे कुचला गया। उसके पास एक पेंटशर्ट पहने आदमी बकायदा इसकी घोषणा माइक पर करते दिखाया गया है। उसके आसपास भारी भीड़ खड़ी है।  मुझे यह फोटो देखकर बहुत तकलीफ हुई।</strong></p>
<p><strong>हमारे देश में भी अंधविश्वासों के कारण कई ऐसी घटनाएं होतीं हैं पर एक तो वह अशिक्षित लोगों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में की जातीं है और अगर उसकी जानकारी प्रशासन पर आये तो वह कार्रवाई भी करता है, दूसरे ऐसे कुकृत्यों को कोई सामूहिक सामाजिक समर्थन प्राप्त नहीं होता। मैं ऐसी घटनाओं पर बहुत लिख चुका हूं और एक बात तय है कि ऐसी घटनाओं को कानून की दृष्टि से कोई समर्थन नहीं मिलता। हम ईरान की बात कर रहे हैं वहां के धार्मिक कानून के अनुसार चोरी की सजा हाथ काट देने या कुचलना ही है। मतलब वहां उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है। </strong></p>
<p><strong>अपराध की दृष्टि से देखें तो चोरी सबसे छोटा अपराध है पर हम उसको बड़ा कहते हैं क्योंकि वह कमजोर लोगों द्वारा अपनी  भूख मिटाने के लिये किया जाता है। मैंने तो एक व्यंग्य भी लिखा है ‘‘चोरी करना पाप है’ यह एक नारे की तरह पढ़ाया जाता है। कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ‘रिश्वत लेना पाप है’ या अपहरण करना पाप है। अगर कोई स्कूल यह पढ़ाना शुरू कर दे तो उसके यहां लोग अपने बच्चों को भेजना ही बंद कर देंगे। आखिर वह बच्चों को इसलिये नहीं पढ़ाते कि उनका बच्चा पढ़लिखकर उच्च पद पर तो पहुंचे और ऊपरी कमाई न करे। </strong></p>
<p><strong>पर मैं इन फोटो पर कोई व्यंग्य नहीं लिख सकता। यह मेरे मन को विचलित करने वाली फोटों है। वह तो बच्ची है मैं तो बड़ी आयु के आदमी पर भी ऐसा करने के  विरुद्ध हूं। खासतौर से तब यह वह डबलरोटी चोरी करने के आरोप में दी गयी है। एक समय की भूख के लिये उस बच्ची का जिंदगी भर का हाथ नष्ट करना एक जघन्य अपराध है। होना तो चह चाहिए था कि उस बच्ची की व्यथा सुनकर उसके लिये कोई उपाय किया जाता पर उल्टे उसका हाथा कुचला गया। मैं उन फोटो को अपने ब्लाग पर लाने में सफल नहीं हो पाया और वैसे भी मैने अपने शब्दों में ही जो चित्र खींचा उसे आप पढ़कर समझें तो ठीक रहेगा। वैसे मैंने चिपलूनकर जी सच ईमेल किया है कि वह ऐसी फोटो के लिये एक अलग ब्लाग शुरू करें क्योंकि कई बार चित्र भी बहुत कुछ कह जाते हैं।  आखिर एक गरीब आठ साल की बच्ची का हाथ केवल इसलिये जिंदगी भर के लिये कैसे नष्ट किया जा सकता है जिसने एक समय के खाने के लिये डबलरोटी चुराई हो। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने जो भी  कुछ लिखा है वह चिपलूनकर जी के उसी फोटो को देखकर ही लिखा है।<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति: मांस खाने से कभी स्वर्ग नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 04:33:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#800080;">यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च<br />
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;"><br />
ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्<br />
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत्</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है पर एक बात यह भी कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों का मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि हमारे देश में भी बलि के द्वारा पूजा की प्रवृति रही है। उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यह सब दिखावा है। आपने देखा होगा कि कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर कई जगह पशुओं की बलि देकर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। कई जगह ऐसी मन्नतें भी मांगी जाती है जिसमें उसके पूर्ण होने पर पशुओं की बलि देने की बात कहीं जाती है। यह सब ढोंग है जो कि मांसाहारी लोगों ने अपने फायदे के लिये शुरू किया था। जो लोग ऐसा करते हैं वह पाखंडी हैं और उनको कभी भी पुण्य प्राप्त नहीं हो सकता है। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">इसके विपरीत मांस से मानसिक और शारीरिक विकास उत्पन्न होते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं। इसलिये जिन लोगों को ऐसे भ्रम हैं कि बलि देने से उनके इष्ट प्रसन्न होते हैं उन्हें दूर  कर लेना चाहिए। <br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःविषयी लोग कभी सिद्ध नहीं होते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 06:01:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्यसंशयम्<br />
सन्न्यिम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति </span></strong></p>
<p><strong>इस विश्व में सभी प्रकार के जीव इंद्रियों के विषयों में बुरी  तरह फंस जाते हैं इसलिये उनमे एक नहीं अनेक दोष आ जाते हैं। जो व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं वही सिद्धि प्राप्त कर पाते है।</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्तवा घ्रात्वा च यो नरः<br />
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितन्द्रियः</span></strong></p>
<p><strong>जो  व्यक्ति अपने जीवन में अपनी निंदा-प्रशंसा, प्रिय-अप्रिय वचन सुनने, सुंदर और भद्दा दिखने, छूने में सख्त और कोमल, खाने में मीठे या कड़वे स्वाद,  अच्छी या बुरी गंध को सूंघने  तथा जो सुख और दुख से परे हो जाता है है वही सच्चा सिद्ध है।</strong></p>
<p><strong><span style="color:#993366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</span></strong>आजकल हमारे सामने कई सिद्ध लोग  आते हैं जो अपने पास अनेक प्रकार की चमत्कारी सिद्धि  होने का दावा करते है। उनके कई मानने वाले भी भ्रमवश उनका प्रचार करते है। सच तो यह है कि आजकल सच्चा सिद्ध मिलना  मुश्किल है। सच्चा सिद्ध तो वही है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। आजकल के सिद्ध तो काले पैसे को सफेद करने और अन्य चमत्कार करने में जुटे रहते हैं। सच्चे सिद्ध का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह किसी प्रपंच में नही फंसते। वह स्वयं किसी के पास जाते ह और न किसी को अपने यहंा आने के लिये प्रेरित करते हैं।</p>
<p>सिद्ध होने के लिये कोई सांसरिक कार्य छोड़ने की जरूरत नहीं होती। जिसे सब  त्याग कहते हैं वह वास्तव में भाव का त्याग है। हमारे पास अनेक वस्तुऐं हैं उनका उपयोग तो हमें करना चाहिए पर उसके प्रति स्वामित्व का बोध नहीं रखना चाहिए। हम कोई कार्य करते हैं तो उससे हमें जिस धन की प्राप्ति होती है उसे फल नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हम उस धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। वह धन लेना तो हमारे कर्तव्य का ही हिस्सा है न कि फल है। फल का आशय  है मन की शांति और अगर वह नहीं है तो इसका मतलब यह कि हम अपने मन के  प्रति कर्तव्यविमुख हो रहे हैं। उसको प्रसन्नता तभी मिलती है जब इद्रियों को वश में रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं। धन हो या अन्य भौतिक साधन  हमारे लिये फल नहीं हो सकते बल्कि वह हमारे कर्तव्य पूर्ति का हिस्सा होते हैं। जो यही विचार करते हैं उनको इस संसार के प्रति निष्काम भाव प्राप्त हो जाता है और वह जीवन का आनंद उठा पाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानसिक गुलामी किसी को दिखाई नहीं देती-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=140</link>
<pubDate>Tue, 01 Apr 2008 15:51:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[      मनोरंजन के नाम पर जिस तरह के कार्यक्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>      मनोरंजन के नाम पर जिस तरह के कार्यक्रम विभिन्न टीवी कार्यक्रमों में अंधविश्वासों और रूढियों को प्रतिपादित किया जा रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के मन में आज भी यह बात है कि  इस देश के लोग ज्ञान की दृष्टि से अंधेरे में ही रहे ताकि उनका उल्लू सीधा होता रहे। </p>
<p>        आचार्य चाणक्य, विद्वान विदुर, संत कबीर और रहीम के संदेशों को जब मैं अपने ब्लागों पर रखता हूं तो अपना ज्ञान नही बघारता बल्कि उनका उपयोग मैं अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये भी करता हूं। मैं नही जानता बाकी ब्लागर मेरे बारे में क्या सोचते हैं पर एक बात मुझे लगने लगी है कि उससे मेरी अच्छी  छवि  बनी है।  मुझे याद है मैने शब्दलेख सारथि पर जब  छद्म नाम से चाणक्य और कबीर दास जी के संदेश अपने ब्लाग पर रख रहा था तब मेरा कोई प्रयोजन नहीं था। हां, बस यह सोचता था कि अगर यह रखूंगा तो लोग शायद मुझे व्यंग्य और अन्य आलेख लिखते नहीं देखना चाहें इसलिये अपना असली  नाम नही लिख रहा था। हालत ऐसे बने कि मुझे उस पर असली नाम लिखना पड़ा।  इसके बावजूद मेरे मन में यह भाव कभी नहीं रहा कि लोग मेरे इस काम को अधिक महत्व दें। मेरा सोचना यह है कि जब सब लोग हमारे महापुरुषों के संदेश सुनाकर अपनी पूजा करवा रहे है और मैं उनका विरोध करता हूं तो मैं  अपने लिये कोई ऐसी अपेक्षा रखकर अपने उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाउंगा जिसके लिये मैने इतनी तकलीफ से ब्लाग बनाकर लिखना शुरू किया।  </p>
<p>       इस देश का जितना अध्यात्म स्वर्ण की खदान है जो हमेशा अक्षुण्ण रहेगा उतना ही अंधविश्वास भी एक कीचड़ की तरह हमेशा रहेगा। यह विरोधाभास ही है जिस कारण यहां विदेशी विचारधाराओं को पनपने का अवसर मिला। होता यह है कि लोग अपने देश के अंधविश्वासों और रूढियों से तंग आकर यह सोचते हैं कि यही हमारा धर्म है और दूसरी विचारधारा की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने धर्म के प्रचार का ठेका लिया है वह अध्यात्म के नाम अंधविश्वास की स्थापना करते हैं। ऐसा नहीं है कि यह आजकल से हो रहा है। कबीर और रहीम के समय में भी यह होता आया है और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। </p>
<p>       उम्मीद यह थी कि बढ़ती शिक्षा के साथ यह सब समाप्त हो जायेगा। हुआ उल्टा ही पहले फिल्मों ने और अब टीवी चैनलों के मुख्य पात्र मंदिरों और दरगाहों के चक्कर लगाते हैं जहां कथित पंडित या पीर उनको  ऊपर आकाश  की तरफ इशारा कर उस पर विश्वास करने का संदेश देते हैं।</p>
<p>इससे भी काम नही चलता तो फिल्मों और टीवी के हीरो  ऐसे धार्मिक स्थानों पर आर्शीवाद लेने जाते हैं और उनकी खबरें फिर अखबार और टीवी चैनलों पर आतीं हैं। इससे भी बात   नहीं बने तो ऐसे धार्मिक स्थानों पर कुछ विवाद खड़े किये जाते हैं ताकि लोग उनके बारे में अधिक  जाने।  मतलब यह कि देश अंधविश्वासों और रूढियों में जकड़ा रहे ताकि उसकी आड़ में उस आर्थिक और सामाजिक शासन बना रहे। जिनका सामाजिक सीरियल कहा जाता है मेरे हिसाब से वह तो अपराध  या हारर शो कहे जाने चाहिए क्योंकि उसमें अपनी तकलीफों से  घबड़ाये पात्र को ऐसे धार्मिक स्थानों से ही आशीर्वाद मिलता है और जब कुछ अपराध दिखाये जाते हैं तो वह भयानक होते हैं। </p>
<p>अगर देखा  जाये तो धर्म और अध्यात्म की आड़ में लोगों की भावनाओं को दोहन आज से नहीं सदियों से ही  चल रहा है। पहले आदमी को उसे तथा पुरखों को मोक्ष और स्वर्ग दिलाने के नाम पर कर्मकांडों की जंजीर में बांधा गया तो अब भी वही चल रहा है। सच तो यह है कि दैहिक आजादी तो सबको दिखती है पर जजबातों के नाम आदमी जो मानसिक गुलामी कर रहा है वह दिखाई नही देती।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक ढूंढो हजार मूर्ख मिलते हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 16:53:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[    कल बिहार में एक स्थान पर एक महिला को ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>    कल बिहार में एक स्थान पर एक महिला को जादूटोना करने के आरोप जिस  बहशी ढंग से अपमानित किया गया हैं वह देश के लिये शर्म की बात है। यह कोई पहली घटना नहीं है जो ऐसा हुआ है और न शायद यह आखिरी अवसर है। पहले भी  ऐसी घटनाएं हो चुकी है। यह कोई अभी नहीं हो रहीं है बल्कि सदियो से हो रहीं हैं यह अलग बात है कि अब सूचना माध्यम के शक्तिशाली होने की वह राष्ट्रीय पटल पर आ जातीं है। ऐसी घटनाओं को देख कर अपने इस समाज के बारे में क्या कहें?</p>
<p>एक तरफ प्रचार माध्यम यह बताते हुए थकते नहीं हैं कि भारतीय संस्कृति को विदेशी लोग अपना रहे है- कहीं कोई विदेशी जोडा+ भारतीय पद्धति से विवाह कर रहा है तो कहीं कोई विदेशी दुल्हन देशी दूल्हे से विवाह कर देशी संस्कृति अपना रही है तो कहीं विदेशी दूल्हा देशी दुल्हन के साथ सात फेरे लेकर भारत की संस्कृति आत्मसात  रहा है। एसी खबरें पढ़कर लोग खुश होते है कि हमारी संस्कृति महान है।</p>
<p>ऐसे प्रसंग केवल विवाह तक ही सीमित रहते है और हम मान लेते हैं कि हमारी संस्कृति और संस्कार महान है। मगर क्या हमारी संस्कृति विवाह तक ही सीमित है या हमारी सोच ही संकीर्ण हो गयी है। हिंदी फिल्मो में  एक प्रेम कहानी जरूर होती है जो तमाम तरह के घुमाव फिराव के बाद विवाह पर समाप्त हो जाती है। फिल्म के लेखक विवाह के आगे इसलिये नहीं सोच पाते कि वह भारतीय समाज से जुड़े है या इन फिल्मों को देखते-देखते हमारे समाज की सोच विवाह के संस्कार तक ही सिमट गयी है यह अलग विचार का विषय है। हां, समाज पर फिल्म का प्रभाव देखकर तो यही लगता है कि अब लोग इससे आगे सोच नहीं पाते।</p>
<p>मैंने जब यह दृश्य देखा तो बहुत क्रोध आ गया। वजह! मेरा मानना है कि महिला चाहे कितनी भी बुरी हो वह क्रूर नहीं होती। उसे गांव का एक बुड्ढा आदमी मार रहा था और अन्य औरतें भी उसे मार रहीं थीं। उसके बाल काटे गये। इस बेरहमी पर उसे बचाने वाला कोई नहीं था। मुझे तो उन गंवारों पर बहुत गुस्सा आ रहा था मेरा तो यह कहना है कि उनमें जो महिलाएं थी उन सबसे खिलाफ भी  कड़ी कार्यवाही होना चाहिए।</p>
<p>ऐसी घटनाऐं देखकर मन में अमर्ष भर जाता है। हम जिस कथित संस्कृति की बात करते हैं उसका स्वरूप क्या है? आज तक कोई स्पष्ट नहीं कर सका। यहां मैं बता दूं कि अध्यात्म अलग मामला है और उसका जबरदस्ती संस्कारों और संस्कृति से जोड्ने की जरूरत नहीं है क्यांकि कोई भी विवाह श्रीगीता का पाठ पढ़कर संपन्न नहीं कराया जाता जो कि हमारे अध्यात्म का मुख्य आधार है। उसे कई लोग अपनी जिन्दगी में नहीं पढ़ते और अपनी औलादों को भी नहीं पढ़ने देते कि कहीं उसे पढ़कर वह विरक्त न हो जायें और बुढ़ापे में हमारी सेवा न करें। अंधविश्वास और रूढियों के कारण इस देश का समाज पूरे विश्व में बदनाम है और हम जबरन कहते हैं कि बदनाम किया जा रहा है। गाव में अनपढ़ तो क्या शहर के पढ़े लोग भी अपनी समस्याओं के लिये जादूटोना करने वाले ओझाओं और पीरों के पास जाते है।<br />
खानपान और रहन-सहन में कमी की वजह से बच्चा बीमार हो गया तो कहते हैं कि किसी की नजर लग गयी। मां.-बाप की लापरवाही की वजह से बच्चा बहुंत समय ठीक नहीं हो रहा है तो लगाते है आरोप लगाते कि किसी ने जादूटोना किया होगा। </p>
<p>कमअक्ली के कारण किसी भी काम में सफल नहीं हो रहे तो दूसरों को दोष देते हैं। गांव और शहर एक बहुंत बड़ा तबका अपने आलस्य और व्यसनों की आदतों की वजह से हमेशा संकट में रहता है। आदमी दारू पीते हैं अपने घर में खर्चा नहीं देते पर घर की महिलांए किसी को अपनी पीड़ा नहीं बतातीं और फिर अपना मन हल्का करने के लिए शुरू होता है जादूटोना वाले ओझाओं के पास जाने को दौर।<br />
वह बताते हैं कि उपरी चक्कर है किसी ने जादूटोना किया है। कभी ‘अ’ से नाम बतायेंगे तो कभी ‘ब’ से। ऐसे में कोई निरीह औरत अगर उनके गांव में हो तो उसकी आफत। गांव में एक.दूसरे के प्रति अंदर ही अंदर दुश्मनी रखने वाले लोग मौके का फायदा उठाते हैं और अगर उस औरत को कोई नहीं है और गांव के बूढ़े जो बाहर से भक्त बनते है और अंदर के राक्षस हैं अपना मौका देखते है। ऐसे में कहना पड़ता हैं कि ‘रावण मरा कहां है’। एक निरीह औरत  को मारती हुई औरतें क्या भली कहीं जा सकतीं है। आखिर ऐसी समस्या किसी पुरुष के साथ क्यों नहीं आती? </p>
<p>एक प्रश्न अक्सर समझदार और जागरुक लोग उठाते है कि  ं हमारे देश में आजकल अनेक साधु संत हैं जिनका प्रचार पूरे देश में है पर इनमें से कोई भी इन चमत्कारों के खिलाफ नहीं बोलता बल्कि ईश्वरीय चमत्कारों की कथा सुनाकर वाहवाही लूटते है। भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम का नाम तो केवल लोग दिखावे के लिये लेते हैं। यह सही हैं कि यज्ञ, हवन, मंत्रजाप  और मूर्ति पूजा से मानसिक लाभ होता है क्योंकि इससे आदमी के मन में विश्वास पैदा होता है और वह  सात्विक कर्म करने के लिये प्रेरित होता है। इसका लाभ भी उसी का होता है जो स्वयं करता है। अगर एसा न होता तो ऋषि विश्वामित्र भगवान श्रीराम को अपने यज्ञ और हवन की रक्षा के लिये नहीं ले जाते और श्रीराम जी बाणों से राक्षसों का वध नहीं करते बल्कि खुद भी मंत्रजाप और यज्ञ-हवन करते। हमारें मनीषियों ने हमेशा ही जादूटोनों और चमत्कारों का विरोध करते हुए सत्कर्म को प्रधानता दी है। जबकि हमारें देश का एक बहंुत बड़ा वर्ग जो उनको मानने और उनके बताये रास्ते पर चलने के जोरशोर से चलने को दावा तो करता है पर वह ढोंगी अधिक है। आत्ममंथन तो कोई करना नहीं चाहता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय अध्यात्म हमारे देश की अनमोल निधि है पर अपने देश में जिस तरह जादूटोना ओर चमत्कारों का प्रचार होते देखते है तो यह कहने में भी संकोच नही होता कि दुनियां के सबसे अधिक बेवकूफ हमारे देश में ही बसते है एक ढूंढो हजार मिलते है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:अधर्म से प्राप्त धन छिपाने से अन्य दोष भी प्रकट होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=121</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 03:37:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है.<br />
२. अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरु हैं. दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपकर अधर्म और पाप कार्य करने वालों के शासक यमराज हैं.<br />
३.सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक युवावस्था  बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं.<br />
४.पहली  अवस्था  में वह काम करें जो वृद्धावस्था में सुखपूर्वक रह सकें और जीवन भर वह कार्य करें जिसको मरने पर भी लोग याद करें.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:हमेशा झगडा करने वाला संकट में रहता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=120</link>
<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 03:33:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong> १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारता, अन्य लोगों के साथ दया, कुटिल से कठोरता, सज्जनों से प्रेम तथा दुष्ट से अभिमान, विद्वानों से विनम्रता, शत्रुओं से वीरता और बडों से क्षमा प्रार्थना का व्यवहार करने वाला व्यक्ति सदा ही सुखी रहता है।<br />
	२.बिना सोचे समझे खर्च करने वाला, अनाथ (मटर गश्ती करने वाला) और हमेशा झगडा करने वाला सदैव संकट में रहते हैं।<br />
	३.अन्न से दस गुना आटे में, आटे से दस गुना दूध में, दूध से दस गुना मांस में और मांस से दस गुना घी में शक्ति होती है।<br />
	४.शोक से रोग, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस बढ़ता है। </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[FREE TELUGU PANCHANGAM,FREE ASTROLOGY , FREE HOROSCOPE , FREE PANCHANGAM , FREE SUBHAMUHURTAMS &amp; FREE BOOKS]]></title>
<link>http://lavanyagunana.wordpress.com/?p=5</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 16:35:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>lavanyagunana</dc:creator>
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<description><![CDATA[HELLO, I want to introduce a website, from which you may get benefits. http://www.oursubhakaryam.com]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>HELLO, I want to introduce a website, from which you may get benefits. <a href="http://www.oursubhakaryam.com/">http://www.oursubhakaryam.com</a> is the site, where you can find FREE PANCHANGAMS, FREE HOROSCOPES ( in telugu &#38; in english) , FREE SUBHAMUHURTAMS, BASICS OF PALMISTRY AND VAASTHU etc. This is the site for your complete astrological needs. please visit <a href="http://www.oursubhakaryam.com/">www.oursubhakaryam.com</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[FREE ASTROLOGY , FREE HOROSCOPE , FREE PANCHANGAM , FREE SUBHAMUHURTAMS &amp; FREE BOOKS]]></title>
<link>http://aravindpdp.wordpress.com/?p=6</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 16:16:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>aravindpdp</dc:creator>
<guid>http://aravindpdp.wordpress.com/?p=6</guid>
<description><![CDATA[Hello , i want to introduce a website , from which you may get benifits. http://www.oursubhakaryam.c]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Hello , i want to introduce a website , from which you may get benifits. <a href="http://www.oursubhakaryam.com/">http://www.oursubhakaryam.com</a> is a website for your complete astrological needs. You can find FREE TELUGU PANCHANGAMS, FREE HOROSCOPES (in english &#38; telugu) , FREE SUBHAMUHURTAMS, BASIC THINGS FOR VAASTHU, PALMISTRY AND ASTROLOGY FREELY.  Please visit the site.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार न सोचना विपत्तियों को बुलाना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=118</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 03:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li>
<p align="left">जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
</li>
<li>
<p align="left">समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सुपात्र को दान देने वाला ही सच्चा वीर ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=117</link>
<pubDate>Mon, 24 Mar 2008 03:17:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=117</guid>
<description><![CDATA[१.अर्थ कार्यों का मूल होता है 
राज्यश्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>१.अर्थ कार्यों का मूल होता है </strong><br />
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए<br />
<strong>२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती. </strong><br />
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.<br />
<strong>३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.<br />
</strong>अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
