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	<title>hindoo &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindoo/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindoo"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 10:55:44 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बल से बुद्धि की तीक्ष्णता  भारी ]]></title>
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<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 04:48:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.<br />
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती  है. </p>
<p>२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पाटा. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली  सिंह को कुएँ में गिराकर मार  डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.  </p>
<p>३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -विचारों का धंधा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/19/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 19 Sep 2007 02:43:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास
और बोला
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास<br />
और बोला<br />
'यार आजकल कोई<br />
अपने पास नहीं आता है<br />
हमसे पूछे बिना यह समाज<br />
अपनी राह पर चला जाता है<br />
हम अपनी विचारधाराओं को<br />
लेकर करें जंग<br />
लोगों के दिमाग को करें तंग<br />
ताकि वह हमारी तरफ आकर्षित हौं<br />
और विद्वान की तरह सम्मान करें<br />
नहीं तो हमारी विचारधाराओं का<br />
हो जायेगा अस्तित्व ही खत्म<br />
उसे बचने का यही रास्ता नजर आता है'</p>
<p>दूसरा बोला<br />
'यार, पर हमारी विचारधारा क्या है<br />
यह मैं आज तक नहीं समझ पाया<br />
लोग तो मानते हैं विद्वान पर<br />
मैं अपने को नही मान पाया<br />
अगर ज्यादा सक्रियता दिखाई<br />
तो पोल खुल जायेगी<br />
नाम बना रहे लोगों में<br />
इसलिये कभी-कभी<br />
बयानबाजी कर देता हूँ<br />
इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं आता है'</p>
<p>विचारक बोला<br />
'कहाँ तुम चक्कर में पड़ गये<br />
विचारधाराओं में द्वंद में भला<br />
सोचना कहाँ आता है<br />
लड़कर अपनी इमेज पब्लिक में<br />
बनानी है<br />
बस यही होता है लक्ष्य<br />
किसी को मैं कहूं मोर<br />
तो तुम बोलना चोर<br />
मैं कहूं किसी से बुद्धिमान<br />
तुम बोलना उसे बैईमान<br />
मैं बजाऊँ किसी के लिए ताली<br />
तुम उसके लिए बोलना गाली<br />
बस इतने में ही लोगों का ध्यान<br />
अपने तरफ आकर्षित हो जाता है'</p>
<p>दूसरा खुश होकर उनके पाँव चूने लगा<br />
और बोला<br />
'धन्य जो आपने दिया ज्ञान<br />
अब मुझे अपना भविष्य अच्छा नजर आता है'</p>
<p>विचारक ने अपने पाँव<br />
हटा लिए और कहा<br />
'यह तो विचारों के धंधे का मामला है<br />
सबके सामने पाँव मत छुओ<br />
वरना लोग हमारी वैचारिक जंग पर<br />
यकीन नहीं करेंगे<br />
मुझे तो लोगों को भरमाने में ही<br />
अपना हित नजर आता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -फ्लॉप ब्लोगर और हिट कवि ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/18/%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%aa-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 18 Sep 2007 14:21:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला
&#8216;य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला<br />
'यार, कवि सम्मेलनों में होने लगी है<br />
हुटिंग ज्यादा<br />
मुझे किसी ने अंतर्जाल पर जाकर<br />
अपनी कविता की दुकान सजाने का<br />
आइडिया सुझाया<br />
तो मुझे तुम्हारा नाम याद आया'</p>
<p>ब्लोगर बहुत खुश हुआ<br />
उसने सोचा अब तक मिलती थी<br />
उनचास टिप्पणियां<br />
अब पचास का जुगाड़ खुद मेरे पास आया<br />
तत्काल उसे कम्प्यूटर के सामने बिठाकर<br />
अंतर्जाल पर काम करने का<br />
पूरा आइडिया समझाते हुए<br />
उसका भी एक ब्लोग बनवाया<br />
जाते-जाते कवि गुरूदक्षिणा में<br />
कवि ने दिया ज्ञान<br />
'क्या यह अगड़म-बगडम लिखते हो<br />
कुछ कवितायेँ और कहानियां लिखा करो<br />
अपनी हिन्दी के ज्ञान का विस्तार करो<br />
जिसकी वजह से इतना तुमने नाम पाया'</p>
<p>ब्लोगर ने बाँध ली कवि की बात गाँठ बांधकर<br />
जुट गया साहित्य सृजन में<br />
पर होता गया फ्लॉप<br />
रचनाएं तो बहुत होने लगीं<br />
टिप्पणियां होती गईँ कम<br />
फिर भी वह लिखने से बाज नही आया<br />
एक दिन पहुँचा कवि के घर<br />
और बोला<br />
'बहुत दिन से न तुम्हें देखा<br />
न तुम्हारा ब्लोग<br />
जो तुमने मुझसे बनवाया '</p>
<p>कवि ने उसे अपना ब्लोग दिखाया<br />
और बोला<br />
'तुमसे बनाने के बाद मैंने<br />
ब्लोग को छद्म नाम से बनाया<br />
क्योंकि चुराई हुई कविताओं के लिए<br />
मैं तो पहले ही बदनाम था<br />
उससे बचने का यही रास्ता नजर आया<br />
देखो मेरे नाम पर पुरस्कार भी आया'<br />
ब्लोगर ने देखा कवि का ब्लोग<br />
उसमें कवि के कतरनों के नीचे<br />
उसकी कविताओं के ही अंश लगे थे<br />
जिनमें कवि ने जोडा था अपना नाम<br />
जिनमें पचास-पचास से<br />
ज्यादा कमेन्ट जड़े थे<br />
फिर कवि ने दिखाए<br />
दूसरे ब्लोग<br />
उनमें भी टिप्पणियों में<br />
ब्लोगर की कविताओं की छबि थी<br />
उसने कवि से कहा<br />
'यहाँ भी तुम बाज नहीं आये<br />
मेरी कतरन से हिट पाए<br />
तुम्हारे रास्ते पर चलाकर मैं<br />
तो हो गया फ्लॉप ब्लोगर<br />
तुमने मेरी रचनाओं से ही<br />
इतना बड़ा पुरस्कार पाया'</p>
<p>कवि घबडा गया और बोला<br />
'यार, मैं क्या करता<br />
मैंने तो अखबार की कतरनों और<br />
तुम्हारी कविताओं के अंशों से ही काम चलाया<br />
यही आइडिया मेरी समझ में आया<br />
अब तुम किसी और से मत कहना<br />
मेरी जिन्दगी में तो पहला<br />
पुरस्कार आया'</p>
<p>ब्लोग वहाँ से निकल बाहर आया<br />
और आसमान में देख कर बोला<br />
'अजब है दुनिया<br />
मैं कवितायेँ लिखकर हिट से<br />
फ्लॉप ब्लोगर हो गया<br />
और वह ब्लोग मेरी कवितायेँ लिखकर<br />
हिट कवि कहलाया'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -भूल गया अपना ज्ञान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/16/252/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 09:01:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/16/252/</guid>
<description><![CDATA[
एक बुद्धिमान गया
अज्ञानियों के सम्मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
एक बुद्धिमान गया<br />
अज्ञानियों के सम्मेलन में<br />
पाया बहुत सम्मान<br />
सब मिलकर बोले दो 'हम को भी ज्ञान'<br />
वह भी शुरू हो गया<br />
देने लगा अपना भाषण<br />
अपने विचारों का संपूर्णता से किया बखान<br />
उसका भाषण ख़त्म हुआ<br />
सबने बाजीं तालियाँ<br />
ऐक अज्ञानी बोला<br />
'आपने ख़ूब अपनी बात कही<br />
पर हमारी समझ से परे रही<br />
अपने समझने की विधि का<br />
नहीं दिया ज्ञान</p>
<p>कुछ दिनों बात वही बुद्धिमान गया<br />
बुद्धिजीवियों के सम्मेंलन में<br />
जैसे ही कार्यक्रम शूरू होने की घोषणा<br />
सब मंच की तरफ भागे<br />
बोलने के लिए सब दौडे<br />
जैसे बेलगाम घोड़े<br />
मच गयी वहाँ भगदड़<br />
माइक और कुर्सियां को किया तहस-नहस<br />
मारे एक दूसरे को लात और घूसे<br />
फाड़ दिए कपडे<br />
बिना शुरू हुए कार्यक्रम<br />
हो गया सत्रावसान<br />
नही बघारा जा सका एक भी<br />
शब्द का ज्ञान<br />
स्वनाम बुद्धिमान फटेहाल<br />
वहाँ से बाहर निकला<br />
इससे तो वह अज्ञानी भले थे<br />
भले ही अज्ञान तले<br />
समझने के विधि नहीं बताई<br />
इसलिये सिर के ऊपर से<br />
निकल गयी मेरी बात<br />
पर इन बुद्धिमानों के लफडे में तो<br />
भूल गया मैं अपना ज्ञान</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -कवि सम्मेलन में पहुंचा जब ब्लोगर ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 17:39:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक कवि सम्मेलन में मंच पर
पहुंच गया ब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक कवि सम्मेलन में मंच पर<br />
पहुंच गया ब्लोगर<br />
लोगों ने समझा कोई नया कवि आया<br />
सबकी पुरानी कवितायेँ झेलते हुए<br />
उसको सुनने के इन्तजार में बिताया<br />
आख़िर उसके मित्र कवि संचालक ने<br />
उसे भी कविता सुनाने के लिए बुलाया<br />
'और कहा कि आज हम सुनेंगे<br />
अंतर्जाल के महान कवि जो बहुत हिट हैं<br />
नए जमाने में पूरी तरह फ़िट हैं '<br />
ब्लोगर ने गला किया साफ और<br />
सुनाने लगा वहीं सुनाई गयी<br />
कविताओं के अंश<br />
साथ मे रखता 'बहुत बढ़िया'<br />
और 'बहुत सुन्दर' जैसे शब्द<br />
लोग चीखने और चिल्लाने लगे<br />
और पूछने लगे<br />
'कैसा है ब्लोगर यहीं की कवितायेँ<br />
फिर हमें सुनाता है और<br />
अपने दो शब्द चिपकाता है'</p>
<p>ब्लोगर बोला<br />
' यह ठीक समझो कि<br />
यहाँ कुछ पंक्तियां लेकर<br />
कमेंट लगा रहा हूँ जैसे<br />
वहां करता हूँ<br />
अगर पूरी की पूरी पोस्ट ही लिंक कर देता<br />
तो तुम्हारा क्या हाल होता<br />
सोचो तुम्हारा कितना समय बच जाता है '</p>
<p>लोग हल्ला मचाने लगे<br />
कवियों ने उसे किसी तरह वहाँ से हटाया<br />
वह अपने मित्र से बोला<br />
'कैसे लोग हैं ज़रा भी तमीज नहीं है<br />
कितना हिट हूँ मैं वहां<br />
यहाँ हूट कर दिया<br />
नहीं जानते कि कैसे<br />
ब्लोगर का सम्मान किया जाता है'</p>
<p>कवि मित्र बोला<br />
'इतनी जल्दी घबडा गये<br />
हमारे साथ रोज ही ऐसा हादसा पेश आता है<br />
तुम खुश किस्मत हो कि<br />
तुम्हारे कंप्यूटर से कोई बाहर नही आता है'<br />
--------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -अल्पज्ञानी और कौवा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/12/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 12 Sep 2007 10:58:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए
सिद्ध क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए<br />
सिद्ध के पास लेने ज्ञान<br />
और बोले<br />
'महाराज ज़िन्दगी से हैं हम परेशान<br />
तमाम तरह के तंत्र-मंत्र किये<br />
तमाम दरबारों पर मत्था टेका<br />
पर हुआ नही कल्याण<br />
हमारे मन को शांति मिले<br />
कृपा कर ऐसा दें ज्ञान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने तीनों को देखा और कहा<br />
'मैं कोई चमत्कारों का सौदागर नहीं<br />
जो पल में कर दूं तुम्हारा कल्याण<br />
पहले लूंगा तुम्हारा इम्तहान<br />
फिर दूंगा जीवन का ज्ञान'</p>
<p>तीनों को दी कापी और पेन और कहा<br />
'इस पर कौवे पर निबंध लिखो<br />
इसमें तुम्हारा लिखा हुआ ही<br />
कराएगा परिचय दस मिनट में ही कि<br />
कौन कितना बुद्धिमान'</p>
<p>तीनों ने दस मिनट में कापी लिखकर<br />
दे दीं गुरू जीं के हाथ में<br />
करने लगे वह उसकी जांच<br />
एक ने लिखा<br />
'कौवे के बारे में मुझे कुछ भी<br />
लिखना नही आता<br />
मैं तो हूँ गंवार और अनजान '</p>
<p>दुसरे ने लिखा<br />
'कौवा है एसा पंछी<br />
जिसकी सबसे होती है तीक्ष्ण दृष्टी<br />
उस जैसा गुण पा ले<br />
कभी दुख्नी न हो इन्सान'</p>
<p>तीसरे ने लिखा<br />
'कौवा काला, काली उसकी नीयत<br />
सुबह उसकी आवाज सुन लें तो<br />
पूरा दिन होते परेशान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने फैसला दिया<br />
'कौवे के बारे में जो नहीं जानता<br />
उस निरे अज्ञानी को और<br />
जो उसमें दूरदृष्टि देखता है<br />
उस परम बुद्धिमान को<br />
मैं अपना शिष्य बनाऊंगा<br />
जिसने कौवे में दोष देखे<br />
दिखा उसमें एक भी गुण<br />
उस अल्पज्ञानी को<br />
मैं नहीं दे पाऊँगा कोई ज्ञान'</p>
<p>तीनों चले गए तो गुरुजी के<br />
पुराने और प्रिय शिष्य ने पूछा'<br />
'उस निरे अज्ञानी से तो वह ठीक था<br />
कुछ लिखना-पढना तो जानता था<br />
उसे भी अपना शिष्य बना लेते<br />
कृतार्थ करते उसे देकर ज्ञान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने कहा<br />
'उसे अपने अक्षर ज्ञान का था अहंकार<br />
सब विषय में पढा पर उसका था अभिमान<br />
इसलिये रह गया अल्पज्ञानी<br />
पर उस अपढ़ अज्ञानी को यह मालुम है कि<br />
नहीं है इसके पास नहीं कोई ज्ञान<br />
वह लगन से सीखेगा<br />
बुद्धिमान पर तो होगी थोडी मेहनत<br />
पर उस अल्पज्ञानी पर<br />
पूरी जिन्दगी गुजार देता<br />
फिर भी नहीं होता उसे ज्ञान<br />
सदैव अहंकार में डूबा रहता<br />
थोडा सीखता ज्यादा दिखाता<br />
दोष दूसरों में देखे<br />
नहीं होता कभी उसे अच्छाई का भान<br />
------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -इस तरह वह शादी न हो सकी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/09/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 09 Sep 2007 14:22:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
मंडप में पहुंचने से पहले ही
दूल्हे ने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
मंडप में पहुंचने से पहले ही<br />
दूल्हे ने दहेज़ में<br />
मोटर साइकल देने की माँग उठाई<br />
उसके पिता ने दुल्हन के पिता को<br />
इसकी जानकारी भिजवाई<br />
मच गया तहलका<br />
दुल्हन के पिता ने<br />
आकर दूल्हे से किया आग्रह<br />
शादी के बाद मोटर साइकल देने का<br />
दिया आश्वासन<br />
पर दूल्हे ने अपनी माँग<br />
तत्काल पूरी करने की दोहराई</p>
<p>मामला बिगड़ गया<br />
दूल्हे के साथ आए बरातियों ने<br />
दुल्हन पक्ष की कंगाल कहकर<br />
जमकर खिल्ली उडाई<br />
दूल्हन का बाप रोता रहा ख़ून के आंसू<br />
दूल्हे का जमकर हंसता रहा<br />
आख़िर कुछ लोगों को आया तरस<br />
और बीच-बचाव के लिए दोनों की<br />
आपस में बातचीत कराई<br />
मोटर साइकल जितने पैसे<br />
नकद देने पर सहमति हो पाई</p>
<p>दुल्हन के सहेलियों ने देखा मंजर<br />
पूरी बात उसे सुनाई<br />
वह दनदनाती सबके सामने आयी<br />
और बाप से बोली<br />
'पापा आपसे शादी से पहले ही<br />
मैंने शर्त रखी थी कि मेरे<br />
दूल्हे के पास होनी चाहिए कार<br />
पर यह तो है बेकार<br />
मोटर साईकिल तक ही सोचता है<br />
क्या खरीदेगा कार<br />
मुझे यह शादी मंजूर नहीं है<br />
तोड़ तो यह शादी और सगाई'</p>
<p>अब दूल्हा पक्ष पर लोग हंस रहे थे<br />
'अरे, लड़का तो बेकार है<br />
केवल मोटर साइकिल तक की सोचता है'<br />
बाद में क्या करेगा अभी से ही<br />
दुल्हन के बाप को नोचता है<br />
क्या करेंगे ऐसा जमाई'</p>
<p>बात बिगड़ गयी<br />
अब लड़के वाले गिडगिडाने लगे थे<br />
अपनी मोटर साइकल की माँग से<br />
वापस जाने लगे थे<br />
दूल्हा गया दुल्हन के पास<br />
और बोला<br />
'मेरी शराफत समझो तुम<br />
मोटर साइकल ही मांगी<br />
मैं कार भी माँग सकता था<br />
तब तुम क्या मेरे पास हवाई जहाज<br />
होने का बहाना बनाती<br />
अब मत कराओ जग हँसाई'<br />
दुल्हन ने जवाब दिया<br />
' तुम अभी भी अपनी माँग का<br />
अहसान जता रहे हो<br />
साइकिल भी होती तुम्हारे पास<br />
मैं विवाह से इनकार नहीं करती<br />
आज मांग छोड़ दोगे फिर कल करोगे<br />
मैंने तुममें देखा है कसाई'<br />
दूल्हा अपना मुहँ लेकर लॉट गया<br />
इस तरह शादी नही हो पायी<br />
-------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल, वह और...........]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/31/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 31 Aug 2007 02:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मोबाइल की बेटरी में खराबी की
खबर ने उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोबाइल की बेटरी में खराबी की<br />
खबर ने उसे हिला दिया<br />
क्योंकि उसने अपनी गर्ल फ़्रेंड को दिये थे<br />
उसी कंपनी की मोबाइल प्रेजेंट जिनकी बेट्री<br />
के फ़ट्ने की खबर ने देश में भूचाल ला दिया<br />
मिलता था वह जिन   गर्लफ्रैंडस  से<br />
अलग दिन और अलग जगह पर<br />
बेटरी फटने के भय  ने<br />
सबको एक ही दिन और ऐक ही समय <br />
उसकी होस्टल  के कमरे की  छत के नीचे <br />
आपस में मिलवा  दिया<br />
 <br />
उसने सबको एक ही कंपनी के<br />
मोबाइल तोहफ़े में दिये थे<br />
जिनकी बेटरी  फटने के चर्चे<br />
टीवी चैनलों ने किये थे<br />
भय से काँपती सब उसके रूम में पहुँची<br />
अपने मोबाइल की बेटरी<br />
बदलवाने का आग्रह लेकर  <br />
 पर जो देखा वहां का मंजर<br />
वह  गुस्से में सब भूल  गयीं  और मिलकर<br />
उसे छठी का दूध याद दिला  दिया<br />
जिसे जो मिला उसके सिर पर मार दिया<br />
 <br />
 <br />
 वह पिटा-कूटा अपने कमरे में  पडा था<br />
ऐक दोस्त ने आकर उसे उठाया<br />
वजह पूछी पर वह कुछ नहीं बता रहा था<br />
बस ऐक ही बात रोते हुए  दोहरा रहा था<br />
‘मोबाइल वालों तुमने यह क्या किया<br />
बेटरी फट जाने देते<br />
पहले ही प्रचार क्यों किया<br />
जिस कंपनी के मोबाइल खरीद्कर लव में<br />
हो गया था हिट उसने ही आज पिटवा दिया<br />
--------------------------------<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भूखे को नही दें रोटी , भूत के लिये खोलें तिजोरी]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/29/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%96%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Wed, 29 Aug 2007 14:26:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बरसात का दिन, रात थी अंधियारी
गांव से द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बरसात का दिन, रात थी अंधियारी<br />
गांव से दूर ऐक झौंपडी में<br />
गरीब का चूल्हा नही जल पाया<br />
घर में थी गरीबी की बीमारी<br />
भूख से बिलबिलाते बच्चे और<br />
पत्नी भी परेशानी से हारी<br />
देख नही पा रहा था<br />
आखिर चल पडा वह उसी साहुकार के घर<br />
जिसने हमेशा भारी सूद के साथ<br />
जोर जबरदस्ती वसूल की रकम सारी<br />
जिसकी वजह से छोडा था गांव<br />
और उसके परिवार सहित मरने की<br />
झूठी खबर सुनकर भूल गयी थी जनता सारी</strong></p>
<p><strong>बरसात में भीगे सफ़ेद कपडे उस पर<br />
जमी थी धूल ढेर सारी<br />
आंखें थीं पथराईं गाल पर बह्ते आंसु<br />
साहुकार के घर तक पहुचते-पहुंचते<br />
चेहरा हो गया ऐकदम भूत जैसा<br />
रात के अंधियारे में देखकर उसे<br />
सब घबडा गये वहां के नौकर<br />
भागते-भागते मालिक को देते गये खबर सारी</strong></p>
<p><strong>जब तक वह संभलता पहुंच गया उसके पास<br />
ताकतवर बना गरीब अपने भूत की बलिहारी<br />
जिसकी आवाज थी, बंद मन था भारी<br />
उसने मांगने के लिये हाथ एसे उठाये<br />
जैसे हो कोई भिखारी<br />
साहुकार कांप रहा था<br />
भागा अंदर और अल्मारी से<br />
निकाल लाया नोटों की गड्ढी<br />
और आकर उसके हाथ में दी<br />
कागज पर अंगूठा लगाने के<br />
इंतजार  में वह खडा रहा<br />
कांपते हुए साहुकार ने कहा<br />
''और भी दूं'<br />
तेज बरसात की आवाज में उसने नहीं सुना<br />
बस स्वीकरोक्ति में अपना सिर हिलाया<br />
साहुकार फ़िर अंदर गया और गड्ढी ले आया<br />
और उसके हाथ में दी<br />
उसने हाथ में लेते हुए<br />
अंगूठे के निशान के लिये किया इशारा<br />
साहुकार था डर का मारा बोला<br />
'महाराज उसकी कोई जरूरत नहीं है<br />
आप मेरी जान बख्श दो, चाहे ले लो दौलत सारी'<br />
वह लौट पडा वापस यह सोचकर कि<br />
मेरी परेशानी से साहुकार द्रवित है<br />
इसलिये दिखाई है कृपा ढेर सारी</strong></p>
<p><strong>साहुकार का ऐक समझदार नौकर<br />
पूरा दृश्य देख रहा था<br />
वह उस गरीब के पीछे आया<br />
और उससे कहा<br />
'मैं जानता हूं तुम भूत नहीं हो<br />
बरसात की वजह से तुम्हें काम<br />
नहीं मिलता होगा इसलिये कर्जा मांगने आये हो<br />
अपने हाल की वजह से भूत की तरह छाये हो<br />
कभी तुमने सोचा भी नहीं होगा<br />
आज इतने पैसे पाये हो<br />
कल तुम छोड् देना अपना घर<br />
वरना टूट पडेगा साहुकार का कहर्<br />
कल फ़ैल जायेगी पूरे गांवों में खबर सारी<br />
मैं भी तुम्हारी तरह गरीब हूं<br />
इसलिये करता हूं तरफ़दारी'<br />
उस गरीब के समझ में आयी पूरी बात<br />
और भूल गया वह अपनी भूख और प्यास<br />
और नोटों की गड्ढी की तरफ़ देखते हुए बोला<br />
'कितनी अजीब बात है<br />
भूखे को रोटी नहीं देते और<br />
भूत के लिये तिजोरी खोल देते<br />
जिंदे को जीवन भर सताएं<br />
मरों से मांगें जान की बख्शीश्<br />
गरीब से करें सूद पर सूद वसूल<br />
उसके  भूत के आगे भूल जायें पहले<br />
अंगूठे लगवाने का उसूल<br />
कल छोड जाउंगा अपना घर<br />
भूतों पर यकीन नही था मेरा<br />
पर अपने इंसान होने की  बात भी जाउंगा भूल<br />
नहीं करूंगा फ़िर जिंदगी सारी<br />
----------------------</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हीरो को मिली जेल, प्रियतम प्यार में फेल ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/26/%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Sun, 26 Aug 2007 13:25:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
एक ही हीरो की फिल्म देखने और
गाने सुनन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>एक ही हीरो की फिल्म देखने और<br />
गाने सुनने के शौक़ ने उन दोनों को<br />
आपस में मिलवाया<br />
फिर तो उन्होने फ़िल्मों जैसा ही<br />
प्रेम प्रसंग रचाया</p>
<p>हीरो के जन्म दिन पर<br />
प्रियतम ने प्रेयसी को<br />
फेवरिट हीरो की फिल्मों की<br />
सीडी अपने पहले उपहार के रुप में दीं<br />
और उसने फिल्म में दिया था जैसा<br />
सोने का हार वैसा ही उसे पहनाया<br />
दोनों ने एक होटल में<br />
केक काटकर जश्न मनाया</p>
<p>उसकी हर फिल्म<br />
पहले दिन पहले शो में देखी और<br />
हर गाने पर शोर मचाया<br />
जब प्रेम फिल्मों जैसा था<br />
तो फिल्म जैसी समस्या भी आनी थी<br />
और वह दिन भी आया जब<br />
हीरो को उसके काले कारनामों ने<br />
सीधे असली जेल भिजवाया<br />
प्रियतम तो गया संभल पर<br />
प्रियतमा का हृदय घबडाया<br />
और उसने जेल के बाहर जाकर<br />
अपना डेरा जमाया</p>
<p>इधर प्रियतम ने रोज मिलने के<br />
ठिकाने से जब उसे नदारद पाया<br />
तो बहुत घबडाया<br />
उसने अपनी प्रेयसी के मोबाइल पर<br />
कई बार बजाई घंटी पर उसे बंद पाया<br />
इधर-उधर ढूँढता रहा<br />
अखिर जेल के दरवाजे से<br />
हीरो का दर्शन किये बग़ैर लौटे<br />
उसके ऐक मित्र ने उसे<br />
प्रेयसी का पता बताया</p>
<p>वह वहां पहुंचा तो<br />
अपनी प्रियतमा को गम में डूबा पाया<br />
उसे देखते ही वह बोली<br />
'तुम मुझे प्यार करते हो तो<br />
अन्दर जाकर हीरो का पता लगाओ<br />
उसका हाल जानकार मुझे बताओं'</p>
<p>प्रीतम बोला<br />
'उसे अपने कर्मों का फल भोगने दो<br />
उससे हमारा अब क्या वास्ता<br />
अब उसे तुम भूल जाओ तुमने तो<br />
अब मुझे अपना हीरो बनाया<br />
बिना अपराध के अन्दर जाना संभव नहीं<br />
सरकार ने कानून ही ऐसा बनाया'</p>
<p>प्रेयसी को गुस्सा आ गया और बोली<br />
'मुझे इससे मतलब नहीं है<br />
मुझे तो बस हीरो के दर्शन करने हैं<br />
आज तुम्हारे इम्तहान का समय आया<br />
उस हीरो की वजह से तुम्हारा और मेरा मिलन हुआ<br />
जिसे किस्मत ने सींखचों के पीछे पहुंचाया'</p>
<p>जब प्रियतम ही अपनी जताई असमर्थता<br />
तब वह बोली<br />
'हीरो गया जेल और तुम्हें उस पर<br />
बिल्कुल भी तरस नहीं आया<br />
मैंने तो उसकी तस्वीर तुम में<br />
देखकर ही तुमसे प्यार रचाया<br />
उसके समर्थन में देखो कितने<br />
लोगों ने आवाज उठाई है और तुमने<br />
ऐक भी नहीं लगाया नारा<br />
तुम प्यार के इम्तहान में फेल हो गये<br />
आज मैंने तुम्हें आजमाया'</p>
<p>बहुत समझाने पर भी वह नहीं मानी<br />
तब प्रियतम को भी गुस्सा आया और बोला<br />
'अच्छा ही है जो तुमने<br />
अपना असली रुप दिखाया<br />
नकली हीरे को असली समझकर<br />
उसमें दिल लगाने की बात मेरे<br />
समझ में भी नहीं आयी<br />
परदे की हीरो जिन्दगी के विलेन<br />
अभिनय कें दिखाएँ बहादुरी और जिन्दादिली<br />
हकीकत में कमजोर और बेरहम<br />
लिखे डायलाग बोलने वाले<br />
क्या बेजुबानों की भाषा समझेंगे<br />
उनके चाहने वालों की बुद्धि पर<br />
तो मुझे शक होता है<br />
अच्छा ही उसे मिली जेल<br />
मैं हुआ प्यार में फेल'<br />
ऐसा कहकर प्रियतम अपने घर चला आया</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शांति ढूंढते शोर के बाजार में     ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/19/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Sun, 19 Aug 2007 10:33:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने ख्यालो में 
दुनियाँ भर की दौलत जु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने ख्यालो में <br />
दुनियाँ भर की दौलत जुटाने <br />
घर-परिवार के लिये <br />
हर तरह की सुविधाएं बनाने<br />
का खूबसूरत सपना लेकर  <br />
निकलता है जमीन पर <br />
उसे सच करने के लिये <br />
जिंदगी के सुनहरे पल <br />
यूँ ही बरबाद कर देता <br />
कहीं करता अपने से <br />
बडे आदमी की जी-हुजुरी <br />
कहीं करता अपनी ऊर्जा बेकार <br />
अपने से छोटे को झुकाने  के लिये <br />
 <br />
दिल की शांति ढूंढता  है आदमी  वहाँ <br />
बाजार में शोर का साजो-सामान <br />
सजता है बिकने के लिये जहाँ <br />
किसी को खुद सुकून नहीं देता<br />
घर-घर  और दर-दर<br />
भटकता अपनी तसल्ली के लिये <br />
 <br />
सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है<br />
जो किसी के हाथ में लग जाये <br />
अपने मन में रखें अंधेरा <br />
तो रोशनी कहाँ से आये  <br />
भटकना तो होगा ही आदमी को <br />
अपनी तसल्ली और सुकून के लिये<br />
 कितनो  के घर उजाडता <br />
कितने करता चमन वीरान<br />
बन जाता बेईमान <br />
अपना घर सजाने के लिये <br />
------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक भक्त की कलम से ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/26/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 26 May 2007 08:24:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/26/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[                    हर व्यक्ति के मन में उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                    हर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है।</p>
<p>              चूंकि अधिकांश लोग इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे के अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं। भारत का आदमी धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे ।</p>
<p>                     यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़ वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है। जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये हे न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य !</p>
<p>                  हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पा ता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और अपने गुरुओं और इष्ट का बखान करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं ।</p>
<p>               अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है। मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा रह रही थी। वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये।</p>
<p>               मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं। कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ? जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए ।</p>
<p>                    मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें - भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें ।</p>
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<title><![CDATA[हिंदू धर्म में ज्ञान के साथ विज्ञान भी मौजूद है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/23/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%82-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 23 May 2007 14:21:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
                           पिछले कयी दिनों स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.hindiblogs.com"><img src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>                           पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। एक खास बात जो सामने आ रही है युवा वर्ग में धर्म के प्रति रुझान बढ रहा है । इसका मुख्य कारण यह है कि आजकल घरों में उनको ऐसा धार्मिक माहौल नहीं मिल रहा जैसे पहले वाली पीढ़ी को मिलता था, इसके अलावा उन्हें बाल्यावस्था में ही ऐसे भौतिक साधन मिल रहे हैं जिनसे अमेरिकी अब अपने यहां बोरियत अनुभव करने लगे हैं , उनसे उकताने के बाद जब युवक और युवतियां कहीं अध्यात्म पर चर्चा सुनते है तो उन्हें नवीन भाव का अनुभव होता है ।</p>
<p>                हालांकि आज के अनेक धर्म गुरू केवल अपनी स्वार्थ सिध्दी के कारण ही इस क्षेत्र मैं हैं , उनका उद्देश्य केवल अर्थोपाजन करना ही है न कि धार्मिक परंपराओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करना -यही कारण है कि जितने भी धर्म गुरू हैं वह करोड़ों में खेल रहे हैं , फिर भी किया क्या जाये ? युवक-युवतियों को अपनी उकताहट दूर करने तथा मन में शांति के लिए उनके पास इन संतों के प्रवचन सुनने का अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है।</p>
<p>                     धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्टि से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है। अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता ।</p>
<p>                वैसे भी आजकल केवल धर्म का ज्ञान होना इतना जरूरी नहीं जितना धर्म के व्यापार के लिए अच्छे प्रबंधक साथ में न रखना । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।</p>
<p>              मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ । अब तो अनेक पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं हिंदूं की असली शक्ति उनके ध्यान में है, और ज्ञान का केंद्र श्रीमदभागवत गीता में है । ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे ।</p>
<p>                आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना मनोचिकित्सक स्वयं ही बनना होगा।</p>
<p>                  जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मुझे याद है जब चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए । ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।</p>
<p>              कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। ध्यान पर ऐसे अनेक प्रयोग किये गये हैं जिनसे पता लगता है वह आदमी के मन में एक स्फूर्ति पैदा करता है। शेष अगले अंकों में।</p>
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<title><![CDATA[अपने अन्दर है आध्यात्म शक्ति का केंद्र ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/20/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sun, 20 May 2007 18:29:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                            अक्सर लोग यह कहते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                            अक्सर लोग यह कहते हैं कि हमें धर्म की जरूरत क्यों है? हम अपना काम अच्छी तरह करें तो क्या जरूरत है कि भगवान के किसी स्वरूप की आराधना करें -हम किसी को दुःख न दें, अवसर पडे तो किसी की मदद करें, और न कर सकें तो किसी की हानि न करे और कुछ न करें तो केवल अपना कर्म मेहनत, लगन तथा निष्ठा से करते रहें।</p>
<p>                       अपने आप में यह विचार बहुत अच्छा है ,पर ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि हमारे इस देह में एक मन है जो बहुत चंचल है और वह हमारे विचारो के साथ देह को भी घुमाने की भी क्षमता रखता है और उस पर बिना आध्यत्मिक शक्ति के नियंत्रण नहीं किया जा सकता है-जिसका केंद्र हमारे अन्दर ही स्थित है । मन से ज्यादा शक्तिशाली है हमारी आत्मा जिसे जानना जरूर है हम उस जानने कि विधा को आध्यात्मिकता कहते हैं। हम अपने मन और देह को सदैव सांसरिक कार्यों में लगाए रहते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है पर जो एकरसता की वजह से उब होती है उसे हम समझ नहीं पाते। हम जो मनोरंजन के लिए साधन लाते हैं- जैसे टीवी देखना, क्रिकेट मैच देखना, कोई मनोरंजन किताब पढ़ते है और कभी कहीं पर्यटन करने चले जाते हैं-इससे कुछ देर तक हमारे मन को राहत मिलती है पर फिर जैसे ही नियमित कार्यों में लग जाते हैं पर हमें जल्द ही यह लगने लगता है कि हमारे मन में अभी खालीपन है । फिर तनाव धीरे धीरे हम पर छाने लगता है। इस तनाव को कभी "मूड खराब होने" या "थकावट है" कहकर व्यक्त करते है और यह समझ नहीं पाते कि हम कह क्या रहे हैं और सोच क्या रहे हैं -यह तनाव हमारी आत्मा  का होता है जो हम समझ नहीं पाते । यह आत्मा इस देह और मन में अपने अस्तित्व के अहसास के लिए तरसती है। वह चाहता हैं कि कुछ देर वह उस निरंकार, निर्गुण और शाश्वत सत्य स्वरूप परमपिता परमात्मा का इस देह में स्मरण इस देह और मन से करे जो उसने धारण कर रखी है। इसीलिये सांसरिक कार्य लगन, मेहनत, और निष्ठा से करते हुए भी अपने अध्यात्म से जुडना चाहिए।</p>
<p>             अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अध्यात्म का अर्थ है धार्मिक कर्मकांड , और दिखने और दिखाने के लिए धार्मिक जगहों पर जाना और अपनी रीती से आराधना करना । यह धर्म नहीं भ्रम है। इसका आध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। यह एक तरह की सांसारिकता है। जब हम इस रास्ते पर चलते हैं तो फिर हमें देहधारी तथाकथित भगवानों की शरण में जाना पड़ता है और वह अपने लिए हमारे देह, धन और मन को शौषण करने लगते हैं , चूंकि हम मानकर चलते हैं यही धर्म है तो बुध्दी अपना काम करना बंद कर देती है। जब हमें सत्य का पता लगता है तो भारी दु:ख पहुँचता है ।</p>
<p>                   अध्यात्मिक ज्ञान कोई बहुत विस्तृत नहीं है। प्रात: योगासन , प्राणायाम और ध्यान करने के बाद गायत्री मन्त्र,महा म्रत्युन्जय मंत्र और शांति पाठ करना चाहिऐ और उस समय अपना ध्यान इस संसार से हटाकर ॐ की तरफ लगाना चाहिए और धीरे धीरे उसे निरंकार और निर्गुण परमात्मा में लगाना चाहिऐ । हो सके तो श्रीमद्भागवत गीता का पाठ श्रध्दा के साथ ज्ञान प्राप्त करने के लिए करना चाहिए। इसके बाद भी दिन में कभी अवसर मिले तो बैठकर आँखें बंदकर ध्यान लगाना चाहिए। ध्यान में अपने मन की दृष्टि नाक के ऊपर भृकुटी पर रखना चाहिए। आप कहेंगे जिस ज्ञान को इतने बडे ज्ञान को बरसों से बडे बडे ज्ञानी लंबे चौड़े प्रवचनों में भी नहीं समझा पाए वह इतना छोटा कैसे हो सकता है तो यह बात साफ बता दूं कि वह लोग प्रवचनों को सत्संग की दृष्टि से करते है जिसमें तमाम की तरह कथाएं भी आती हैं और मैं कोई संत नहीं हू एक सामान्य इन्सान हूँ। अपनों से इस तरह की चर्चा करते रहने से आनन्द आता है और किसी अन्य के यहां अपने मन की बात कहने के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ती। शेष अगले अंकों में।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[हिंदूओं की ताकत है ध्यान और गीता का ज्ञान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/19/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%94/</link>
<pubDate>Sat, 19 May 2007 16:25:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                   मैं देश में चल रहे माहौल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                   मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है। धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>            हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की द्रष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्ट से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है।</p>
<p>                अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्री मद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां में बता दूं मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।</p>
<p>             मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ । मेरे इस ब्लोग को जो पढ़ें वह एक बात सुन कर चौंक जायेंगे कि मुझे इन्टरनेट पर ब्लोग लिखने की शक्ति इसी ध्यान से मिली है और प्रेरणा गीता से। ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे ।</p>
<p>               आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना साएक्रितिस्त खुद ही बनना होगा।</p>
<p>                   जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मैंने चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए ।</p>
<p>                 ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। शेष अगले अंकों में। इस तरह की रचनाये पढ़नी है वह मेरे नीचे लिखे ब्लोग को देखते रहे वहां मैं इन पर लिखता रहूँगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बाबा रामदेव की आलोचना से पहले अपने को देखें ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/05/19/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Sat, 19 May 2007 16:19:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                        भारत में आजकल एक फैश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                        भारत में आजकल एक फैशन हो गया है कि अगर आपको सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करनी हो तो हिंदू धर्म या उससे जुडे किसी संत पर आक्षेप कर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिक़ायत नहीं है न उनसे कहने या उन्हें समझाने की जरूरत है।</p>
<p>         अभी कुछ दिनों से बाबा रामदेव पर लोग प्रतिकूल टिप्पणी कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में लगे है । इस समय वह भारत में ही नहीं वरन पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहे हैं ,और मुझे नहीं लगता कि आजादी के बाद कोई व्यक्ति इतनी लोकप्रियता हासिल कर सका हो। सूचना तकनीकी में हम विश्व में उंचे स्थान पर हैं पर वहां किसी व्यक्ति विशेष को यह सम्मान नहीं प्राप्त हो सका है। बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से योगासन, प्राणायाम, और ध्यान की जो विद्या भारत में लुप्त हो चुकी थी उसे एक बार फिर सम्मानजनक स्थान दिलाया है, उससे कई लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न हो गयी है और वह योजनापूर्वक उन्हें बदनाम आकर रहे हैं।</p>
<p>                   पहले यह मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने आज से चार वर्ष पूर्व जब योग साधना प्रारंभ की थी तब बाबा रामदेव का नाम भी नही सुना था। भारतीय योग संस्थान के निशुल्क शिविर में योग करते हुए लगभग डेढ़ वर्ष बाद मैंने उनका नाम सूना था। आज जब मुझसे कोई पूछता है "क्या तुम बाबा रामदेव वाला योग करते हो?</p>
<p>                  मैं उनसे कहता हूँ -"हाँ, तुम भी किया करो ।कहने का तात्पर्य यह है इस समय योग का मतलब ही बाबा रामदेव के योग से हो गया है। मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मैं ह्रदय से चाहता हूँ कि योग का प्रचार और प्रसार बढ़े ।</p>
<p>                      मैं बाबा रामदेव का भक्त या शिष्य भी नहीं हूँ फिर भी लोगों को यह सलाह देने में मुझे कोई झिझक नहीं होती कि वह उनके कार्यक्रमों को देखकर योग सीखें और उसका लाभ उठाएं । इसमें मेरा कोई निजी फायदा नहीं है पर मुझे यह संतुष्टि होती है कि मैं जिन लोगों से योग सीखा हूँ वह गुरू जैसे दिखने वाले लोग नहीं है पर उन्होने गुरूद्क्षिना में इसके प्रचार के लिए काम करने को कहा था। बाबा रामदेव का समर्थन करने के पीछे केवल योग के प्रति मेरी निष्ठा ही नहीं है बल्कि यह सोच भी है कि योग सिखाना भी कोई आसान काम नहीं -योग शिक्षा वैसे ही भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई है और इसे विषय के रुप में स्कूलों में शामिल करने का बहुत विरोध हो रहा है ऐसे में लार्ड मैकाले की शिक्षा से स्वयं को विद्धान की पदवी से अलंकृत कर स्वयंभू तो योग के नाम से बौखला जाते हैं, और उनके उलुलजुलुल बयानों को मीडिया में स्थान भी मिलता है।</p>
<p>                    कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के शिविर में एक बीमार व्यक्ति की मौत हो गयी थी तो मीडिया ने इस तरह प्रचारित करने का प्रयास किया जैसे वह योग्साध्ना से मरा हो, जबकि उसकी बिमारी उसे इस हाल में लाई थी। उस समय एक सवाल उठा था कि अंगरेजी पध्दति से सुसज्जित अस्पतालों में जब कई मरीज आपरेशन टेबल पर ही मर जाते हैं तो क्या इतनी चीख पुकार मचती है और कोई उन्हें बंद करने की बात करता है। ट्रकों, कारों, और मोटर सायाकिलों की टक्कर में सैंकड़ों लोग मर जाते हैं तो कोई यह कहता है इन्हें बंद कर दो? और इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ ने हमारे पर्यावरण को इस क़दर प्रदूषित किया है जिससे लोगों में सांस की बीमारियाँ बढ गयी है तो क्या कोई यह कहने वाला है कि विदेशों से पैट्रोल का आयत बंद कर दो?</p>
<p>                बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से जुडी इस विधा को पुन: शिखर पर पहुंचाया है इसके लिए उन्हें साधुवाद देने की बजाय उनके कृत्य में छिद्र ढूँढने का प्रयास करने वाले लोग उनकी योग शिक्षा की बजाय उनके वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर उसे इस तरह पेश करते हैं कि उसकी आलोचना के जा सके। जहाँ तक योग साधना से होने वाले लाभों का सवाल है तो उसे वही समझ सकता है जिसने योगासन, प्राणायाम , ध्यान और मत्रोच्चार किया हो। शरीर की बीमारी तो पता चलती है पर मानसिक और वैचारिक बीमारी का व्यक्ति को स्वयं ही पता नहीं रहता और योग उन्हें भी ठीक कर देता है। जहां तक उनकी फार्मेसी में निर्मित दवाओं पर सवाल उठाने का मामला है बाबा रामदेव कई बार कह चुके हैं वह बीमारियों के इलाज में दवा को द्वितीय वरीयता देते हैं, और जहाँ तक हो सके रोग को योग साधना से दूर कराने का प्रयास करते हैं। फिर भी कोई न कोई उनकी दवाए उठाकर लाता है और लगता है अपनी विद्वता दिखाने। आज तक कोई किसी अंगरेजी दवा का सैम्पल उठाकर नहीं लाया कि उसमे कितने साईट इफेक्ट होते हैं। इस देश में कितने लोग अंगरेजी बिमारिओं से मरे यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।अब रहा उनके द्वारा हिंदू धर्म के प्रचार का सवाल तो यह केवल उनसे ही क्यों पूछा जा रहा है? क्या अन्य धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार नहीं कर रहे हैं।</p>
<p>                   मैं केवल बाबा रामदेव ही नहीं अन्य हिंदू संतों की भी बात करता हूँ । जो लोग उन पर सवाल उठाते हैं वह पहले अपना आत्म विश्लेषण करें तो उन्हें अपने अन्दर ढ़ेर सारे दोष दिखाई देंगे। दो या तीन घंटे तक अपने सामने बैठे भक्तो और श्रोताओं को-वह भी बीस से तीस हज़ार की संख्या में -प्रभावित करना कोई आसान काम नहीं है। यह बिना योग साधना, श्री मद्भागवत का अध्ययन और इश्वर भक्ती के साथ कडी तपस्या और परिश्रम के बिना संभव नहीं है । उनकी आलोचना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो उन जैसा हो। इसके अलावा उनसे यह भी निवेदन है कि आलोचना से पहले कुछ दिन तक योग साधना भी करके देख लें ।</p>
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<title><![CDATA[प्रात:काल का समय है आत्मसाक्षात्कार का]]></title>
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<pubDate>Thu, 29 Mar 2007 04:25:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब प्रात:काल हमें अपने लिए आत्मसाक्षा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote>जब प्रात:काल हमें अपने लिए आत्मसाक्षात्कार का सुअवसर मिलता है उसे हम व्यर्थ में यह विचार करते हुए गँवा देते हैं कि हमें क्या प्रपंच रचना है<br />
<span class="sg"><br />
<font size="4" color="#000080" face="DevLys 010"><strong>izkrdky% tc lw;Z viuh ykfyek bl /kjrh ij fc[ksj jgk gksrk gS rc mlls vutku vius nSfud dk;kZsa esa O;Lr gks tkrs gSA og fcuk fdlh ijokg ds vius lkFk fnu dk migkj bl /kjrh dks nsrk gS] rkfd lHkh izk.kh vius thou dk vkuan ys ldsaA fQj og fonk gksrs lkSai tkrk gS jkf= dks migkj ds :i esa iznk; dj tkrk gS rkfd lHkh izk.kh foJke dj ldsaA dbZ ml ij ty p&#60;+k dj mldk vfHkuanu djrs gSa rks dbZ mldh rjQ ns[krs Hkh ugha&#38;mUgsa blls eryc ugha gS fd lw;Z dh rjQ ns[kk tk; ;k mlds ckjs esa lkspk tk; mUgsa rks cl jks'kuh ls eryc gSA lw;Z dHkh Hkh viuh jks'kuh nsus esa i{kikr ugh djrkA gka vuqHkwfr;ksa ds vk/kkj ij izk.kh vyx vyx vkSj de vf/kd ykHk mBk ikrs gSA tks yksx mldh mikluk djrs gSa oj vius thou mlds izdk'k dks vuqHko djrs gSa vkSj  tks mldh rjQ ugha ns[krs og ml izdk'k dk vuqHko ugah dj ldrsA mUgsa irk gh ugha dh lqcg ds lwjt dh jks'kuh esa ugkus esa dksbZ lq[k Hkh gSA</strong></font></span><span class="sg"><strong><font size="4" color="#000080" face="DevLys 010">izkr%dky lSj] ;ksxlk/kuk vkSj /;ku djus okys yksx tc mxrs lwjt dk Li'kZ 'kjhj ij vuqHko djrs gSa rks mUgsa,slk yxrk gS fd LoxZ ;gh gS tgka ge gSA muesa Hkh nks izdkj ds yksx gS ftUgsa lq[k dk Li'kZ rks eglwl gksrk gS ij og mldh igpkurs ugha gSaA mUgsa rks cl lq[k eglwl gksrk gSA nwljs og gSa tks tkurs gSa fd ;g lq[k gS vkSj ;g Hkh tkurs gSa fd ;g lq[k lw;Z }kjk migkj ds :i esa mUgsa fn;k x;k gSA ;g Kku mUgas gh gks ikrk gS tks lw;Z esa HkfDr Hkko j[krs gSA HkfDr esa tks 'kfDr gS og fdlh vU; esa ugha gS ij og fufyZIr Hkko ls gksuk pkfg,A ge euq"; gSa gekjk eu fdlh esa yxus dh jkg &#60;wa&#60;rk gSA ,sls esa gesa fdlh b"V dh 'kj.k ysuk gksrh gSA vkneh pkgs dksbZ Hkh gks mldk eu dgha u dgha mls ys gh tkrk gSA vkneh dk 'kkld gS mldk euA ml ij fu;a=.k ds fy;s gesa fdlh b"V dks /kkj.k djuk pkfg, ojuk eu dksbZ Lo;a b"V &#60;wa&#60; ysxk vkSj og 'kjhj dks ,sls dkeksa esa yxk nsxk tks varr% d"Vdkjd fl) gksaxsA og ,sls b"Vksa ds ikl gesa ys tk;sxk tks ckn esa gekjs fy;s d"Vdkjd fl) gksaxsA eu papy gS ij og vts; ugha gS] og vfu;af=r 'kkld gS ij ml ij fu;a=.k j[kuk vko';d gSA</font></strong><strong><font size="4" color="#000080" face="DevLys 010">izkr%dky gesa bl ckr ij fopkj djrs gq, ugha u"V djuk pkfg, fd gesa vkt D;k djuk gSA ;g le; gekjs vkRelk{kkRdkj dk gSA ge iwjk thou bl nsg vksj blds lkFk tqM+h nsgksa ds Hkj.kHkks"k.k ij u"V djrs gSa ij tks gekjk viuk gS ge mldh rjQ ns[krs rd ughaA og gekjk vkRek fdruh rdyhQ &#62;syrk gS flQZ blh dkj.k fd og ftl nsg esa gS mldk eu mldh rjQ ugh vkrkA og m}sfyr gksrk gS gesaihM+k gksrh gS vkSj ge ml le; &#60;w&#60;rs gS ckgj ls dksbZ ennxkj&#38;og dksbZ fpfdRld gks ;k euksfpfdRld gh gks ldrk gSA og D;k dj ldrk gS dsoy gekjh nsg vkSj mlesa jg jgs eu dh ejEer djus ds vykokA vkSj og ,slk dc dj ldrk gS\</font></strong></p>
<p><strong><font size="4" color="#000080" face="DevLys 010">izkr%dky tc i;kZoj.k esa vkDlhtu&#38;ftls izk.kok;w Hkh dgk tkrk gS&#38;i;kZIr ek=k esa gksrh gS mlds lsou ls gekjh nsg dks LoLFk j[kus esa lgk;rk feyrh gS vkSj lw;Z dh igyh fdj.ksa tks gekjs eu dks lgt djrh   gS a ge vkRelk{kkRdkj djus dh 'kfDr xzg.k djrs gSA  izkr%dky vkRelk{kkRdkj dk le; gSA og djds ns[ksaA eglwl djsa fd ;g LFkwy nsg ls vyx dqN ge gSA ;g lq[knq[k vkSj vU; vusd rjg ds Hkko gekjs eu ls tqM+s gS A ;gh papy eu gesa ns[k vkSj lq[k dh vuqHkwfr djkrk gS ij vkRek dh Hkw[k rks lnSo HkfDr vkSj izse dh /kkjk ls gh r`Ir gksrh gS A eu LokFkZ ls rks vkRek ijekFkZ ls izlUu gksrh gSA izkr%dky vkRelk{kkRdkj djrs le; tks gesa fnO; vuqHkwfr;ka gksrh gSa ogh gS lalkj dk ije lq[kA</font></strong></p>
<p></span></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सहजता,सरलता और सौम्यता के प्रतीक हैं भगवान श्री राम ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/03/27/%e0%a4%b8%e0%a5%8c%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8c/</link>
<pubDate>Tue, 27 Mar 2007 09:27:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भगवान श्री राम हमारे देश के लोगों के म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:block;"><span class=" transl_class">भगवान</span> <span class=" transl_class">श्री</span> <span class=" transl_class">राम</span> <span class=" transl_class">हमारे</span> <span class=" transl_class">देश</span> <span class=" transl_class">के</span> <span class=" transl_class">लोगों</span> <span class=" transl_class">के</span> <span class=" transl_class">मन</span> <span class=" transl_class">और</span> <span class=" transl_class">बुद्धि</span> <span class=" transl_class">मैं</span> <span class=" transl_class">सदियों</span> <span class=" transl_class">से</span> <span class=" transl_class">महानायक</span> <span class=" transl_class">के</span> <span class=" transl_class">रुप</span> ;<span class=" transl_class">मैं</span> <span class=" transl_class">स्थापित</span> <span class=" transl_class">हैं</span>। <span class=" transl_class">उनका</span> <span class=" transl_class">नम्</span> <span class=" transl_class">स्मरण</span> <span class=" transl_class">करने</span> <span class=" transl_class">से</span> <span class=" transl_class">हमारे</span> <span class=" transl_class">अंतर्मन</span> <span class=" transl_class">में</span> <span class=" transl_class">नई</span> <span class=" transl_class">स्फूर्ति</span> <span class=" transl_class">आ</span> <span class=" transl_class">जाती</span> <span class=" transl_class">है</span>।</p>
<p align="left"><font size="4" face="DevLys 010"><em>vkt iwjs ns'k esa jkeuoeh dk R;kSgkj euk;k tk jgk gSA  jke gekjsns'k ds yksxksa ds g?n; ds uk;d gSA ;g LokHkkfod gh gS fd yksx jke dk uke lqurs gh izQqfYyr gks mBrs gSaA jke dh efgek ;g fd tSls ftl :i esa mUgsa ekuk tk;s mlh :i esa vkids g?n; esa fLFkr gks tkrs gSA jke muds Hkh tks mudks ekus vkSj jke muds Hkh tks mUgsa Hktsa vkSj og muds Hkh tks mUgsa vius g?n; esa /kkj.k djsaA</em></font></p>
<p align="left"><em><font size="4" face="DevLys 010">eSa cpius ls Hkxoku fo".kw dh mikluk djrk vk;k gwA LokHkkfod :i ls Hkxoku Jh jke ds izfr HkkfDrHkko gSA bldk ,d dkj.k ;g Hkh jgk gS fd eSa ewfrZ Hkxoku fo".kw dh j[krk gwa ikB eSa ckYehdh jkek;.k dk djrk gwaA dqy feykdj Hkxoku fo".kw gh esjs g?n; esa jke dh rjg fLFkr gSaA eryc ;g esjs fy;s Hkxoku gh Hkxoku fo".kw gSA ;g leHkko dh izo`fr eq&#62;s Hkxoku jke ds pfj=ls feyrh gSA</font></em></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left"><em><font size="4" face="DevLys 010">Hkxoku jke ds izfr dsoy Hkkjr esa gh cfYd fo'o esa Hkh mudh vuq;kf;;ksa dh Hkkjh la[;k gSA eryc ;g fd Hkxoku Jhjke dk pfj= dsoy ns'k dh lhekvksa esa ughs lquk vkSj lquk;k tkrk gS oju~ ns'k ds ckgj Hkh muds izfr yksxksa ds eu esa Hkkjh J)k gSA  tc eS vkt Hkkjr ds vanj py jgs gkykrsksa ij utj Mkyrk gwa rks yxrk gS yksx dsoy uke ds fy;s gh jke dks ti jgs gSA Hkxoku jke ds pfj= dh O;k[;k;sa cgqr yksx dj jgs gS ij dsoy yksxksa esa QkSjh rkSj ij HkfDr Hkko txkdj viuh fgr lk/kus  rd gh mudh dksf'k'k jgrh gSA eSa vDlj tc ijs'kkuh ;k ruko esa gksrk gwa rks mudk Lej.k djrk gwaA ;dhu ekfu, eSa Hkxoku jke ds eafnj esa tkdj dksbZ oLrw ;k dk;Zfl) dh ekax ugha djrk oju~ og esjs eu vkSj cqf) esa cus jgsa blhfy;s muds le{k ureLrd gksrk gwaA tc ladV esa mUgsa ;kn djrk gwa rks dsoy blhfy;s fd esjk ?kS;Z] vkLFkk vkSj fo'okl cuks jgs ;gh bPNk esjh gksrh gSA  FkksM+h nsj ckn eq&#62;s eglwl gksrk gS fd og 'kfDr iznkudj jgs gSA Hkxoku Jhjke dk pfj= dHkh fdlh vfo'okl vkSj vdeZ.krk dk izsjd ugha gks ldrkAtks dsoy bl m̳'; ls Hkxoku jke dks iwtrs gSa fd mu ij dksbZ ladV u vk;s vkSj muds lkjs dk;Z fl) gks tk;sa&#38;og jke dk pfj= u rks le&#62;rs gS u mUgsa dHkh vius fo'okl dks izekf.kr djus dk volj fey ikrk gSA</font></em></p>
<p align="left">&#160;</p>
<p align="left"><em><font size="4" face="DevLys 010">Hkxoku Jh jke dh dFkk i&#60;+uk vkSj lquuk vPNh ckr gS ij mUgsa vius g?n;  esa /kkj.k dj thou esa vkuan ys ikrs gSA ,sls fojys gh gksrs gSA Hkxoku jke ds pfj= esa tks lkSE;rk] lgtrk] lg?n;rk] leHkko  vkSj lnk'k;rk gS og fojys gh pfj=ksa esa fey ikrh gSA ;gh dkj.k gS fd Hkkjr dh lhekvksa ds ckgj Hkh mudk pfj= i&#60;k vkSj lquk tkrk gSA vxj euq"; ds :i esa dh x;hmudh yhykvksa dk  ppkZ dh tk;s rks og dHkh fopfyr ugha gq,A dSd;h }kjk cuokl] lhrkth ds gj.k vkSj jko.k ds lkFk ;q) esa Jhy{e.k th ds csgks'k gksus ds le; mUgksaus ftl n`&#60;+rk dk ifjp; fn;k gS og fojyksa esa gh ns[kus dks feyrh gSAjko.k ds lkFk ;q) esa ,d ,slk le; Hkh vk;k tc lHkh jk{klksa dks ,slk yxk jgk Fkk fd Hkxoku jke gh muds lkFk ;q) dj jgs gSA og ?kcM+k dj b/kj m/kj Hkkx jgs Fks tgka tkrs mUgsa jke ns[krsA eryc ;g fd jke dsoy muds gh ugha gS tks muds Hkh gS tks mUgsa ugha iwtrs&#38;ugha rks vkf[kj vius 'k=wvksa dks n'kZu D;ksa nsrs\ ;g muds leHkko dk izrhd gSA D;k ge mUgsa ekuus okys ,slk leHkko fn[kk ikrs gSA drbZ ughaZA ;dhuu gessa vc vkReeaFku djuk pkfg, fd D;k dsoy HkxokuJhjke dh ewfrZ yxkdj muds izfr fn[kkos dh vkLFkk izdV djuk gh dkQh gSA gesa muds iw.kZ Lo:i dk Lej.k dj mls vius eu vkSj cqf) esa LFkkfir djuk pkfg,A ;kn jgs euq"; dh igpku mldh cqf) ls gSA vxj vki viuh cqf) esa vius b"V dks LFkkfir djsaxs rks /khjs /khjs mu tSls gksrs tk;sxaA ,d fo}ku dk ekuuk gS fd ewfrZ iwtk izR;{k :i ls dqN ugha gksrk ij mldk ;g Qk;nk t:j gksrk gS vkneh tc Hkxoku dh iwtk djrk gS rks mlds g?n; esa muds xq.kksa dk ,d Lo:i LFkkfir gksrk gS tks vkxs pydj mldk LFkk;h fgLlk cu tkrk gSA 'krZ ;gh gSog vkneh ml le; fdlh vU; Hkko dk LFkku u nsA</font></em></p>
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<p align="left"><em><font size="4" face="DevLys 010">ges'kk ewfrZiwtk dk fojks/k djus okyksa dh la[;k T;knk jgh gSA njvly og blls gksus okys euksfoKkfud Qk;nksa dks ugha tkursA izR;{k :i ls rks bldk Qk;nk ugh gksrk fn[krk ij vizR;{k :i ls tks O;fDr esa 'kkafr vkSj n`&#60;+rk vkrh gS mldks fdlh iSekus ls ekiuk dfBu gSA eq[; ckr gS vius vanj Hkko mRiUu djukA vkf[kj dksbZ Hkh O;fDr dke djrk gS rks mlds ihNs mlds fopkj] ladYi vkSj fu'p;ksa ds lkFk gh pyrk gS tc muesa nks"k gS rks fdlh lkFkZd dk;Z ds laiUu gksus dh vk'kk djuk gh O;FkZ gSA vc yksx fdlh vkSj dks rks ugha vius vkidks /kks[kk nsrs gSA eafnjksa esa tkdj og Hkxoku ds lkeus ureLrd rks gksrs gS ij Lo:i ds vareZu esa /;ku djus dh dyk esa fdrus n{k gS ;g rks ogh tkusA vycRrk lcls cM+h ckr jke dh HkfDr ds lkFk mUgsa eu vkSj cqf) esa /kkj.k Hkh t:jh   gSA ewfrZ;ka rks mudk og Lo:i gS tks vk[ksa ls xzg.k djus ds fy, LFkkfir fd;k tkrk gS rkfd mls ge vius vareZu esa ys tk ldsA</font></em></p>
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<p align="left"><em><font size="4" face="DevLys 010">Hkxoku jke dk pfj= dHkh u Hkqyk;s tkus okyk pfj= gS