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	<title>hindiblogroll &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindiblogroll"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 10:54:40 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[आखिर उसने इस ब्लाग के पूर्व पाठ की कापी क्यों नहीं की-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=560</link>
<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 08:27:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[उसने कल मेरा इसी ब्लाग पर लिखा गया आले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उसने कल मेरा इसी ब्लाग पर लिखा गया आलेख पढ़ा और इसलिये उसने उसकी कापी नहीं की क्योंकि इसमें उसी पर आक्षेप किया गया था। इसका मतलब साफ है कि वह एक सक्रिय ब्लाग लेखक है। उसने मेरे पाठ की कापी अपने ब्लाग पर रखकर एक तरह से अपराधिक कृत्य किया है। वह शायद अनुमान नहीं कर सकता कि मैं उसे ढूंढ लूंगा। उसे कोई अधिकार नहीं है कि मुझे पैसे का भुगतान किये बिना अपनी वेबसाईट पर मेरे पाठ रखे। </p>
<p>उसने मेरे कल तीन ऐसे ब्लाग की पोस्टें कापी कीं जो हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों नारद, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लाग पर ही दिखते हैं ब्लागवाणी पर नहीं। इनके नाम हैं <a href="http://rajraj.wordpress.com">साहित्य पत्रिका,</a> <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">अभिव्यक्ति पत्रिका,</a> और <a href="http://rajdpk1.wordpresss.com">अनुभूति पत्रिका।</a> इन तीनों के नाम मैं अक्सर बदलता रहता हूं और कल ही इनका यह नाम रखा था, पर वह इनसे पहले से ही पाठ उठा रहा है।  इन पर मैं कभी कभी अपनी पुराने पाठ रखता हूं। जो 12 ब्लाग सभी फोरमों पर दिखते हैं उन पर अपनी नये पाठ रखता हूं। कल के व्यूज देखने से पता चलता है कि उसने नारद और चिट्ठाजगत से ही यह ब्लाग देखे हैं।  वह इन्हीं फोरमों से यह कापी करता होगा क्योंकि ब्लागवाणी से उसे पकड़े जाने का भय भी है। ब्लागवाणी पर पसंद का बटन किसी भी कंप्यूटर से एक बार ही दबता है और यह संदेह पैदा करता है कि कहीं वहां उसकी पकड़ न हो। नारद और चिट्ठाजगत से उसे ऐसा भय नहीं है। मतलब वह पुराना आदमी है और यहां से पूरी तरह जानकार है। </p>
<p>सवाल यह है कि उसने विनय प्रजापति ‘नजर’ और मेरे ब्लाग से ही कापी इस क्यों की? इसका उत्तर यह है उसमें साहित्य जैसे विषय होते हैं जो कि आम पाठक के लिये एक अच्छी सामग्री होती है। उसका यह ब्लाग किसी फोरम पर नहीं है। उसने डोमेन लिया है और वह पैसे कमाना चाहता है। वह यहां भी सक्रिय है एक सभ्य ब्लागर के रूप में।  उसकी कार्यशैली को मैं जानता हूं उसे इस पाठ के माध्यम से यही समझा रहा हूं।<br />
इससे साहित्यक ब्लाग लेखक हताश होंगे। डोमेन के पैसे का भुगतान तो लोग कर रहे हैं पर हमारे पाठों को वह फ्री का माल नहीं समझ सकते। यह अपने ब्लाग लेखकों और मित्रों को बता दूं यहां डोमेन होना या फ्री ब्लाग होना कोई मायने नहीं रखता। यहां महत्व है लिखे गये विषय का! चुराने वाले तो वेब साइट से भी चुरा सकते हैं और ब्लाग से भी! वह मुझसे चिढ़ा हुआ है और फायदा भी उठाना चाहता है। उसने पेैसे खर्च कर डौमेन तो ले लिया पर लिखे क्या? ताउम्र छलकपट में निकाल दी। लिखने के लिये सरल हृदय होना आवश्यक है। उसने ब्लाग बनाया पर लिखता क्या होगा? उसने विनय प्रजापति ‘नजर’, अचेत, रेवा स्मृति तथा मेरे साहित्यक पाठों की कापी अपने यहां रखी क्योंकि वह ऐसा नहीं लिख सकता।<br />
वह अपने कमाने के लिये मेरा मुफ्त में उपयोग नहीं कर सकता है। मेरे एक पाठ की कीमत है 2500 रु.। उसे अधिक लग सकती है। वह कह सकता है कि यह तो फालतू पड़ी थी। नहीं, उसे यह बात समझनी होगी कि शोरुम में सोने के अनेक कीमती गहने पड़े रहते हैंं पर उससे उनकी कीमत कम नहीं हो जाती। मेरे उसने ढाई लाख रुपये से अधिक के पाठों की कापी की है और उसका भुगतान वह कर नहीं सकता। अगर कोई उस ब्लाग को देखेगा तो कहेगा कि यह तो दीपक भारतदीप का ब्लाग है। वह मेरे नाम को भी भुनाना चाहता है। भले ही फोरमों पर मुझे उस जैसे हिट नहीं मिलते पर आम पाठक की पहुंच मेरे ब्लाग पर बढ़ती जा रही है इसलिये वह मेरे नाम को भी लिख रहा है। यह उसकी चाल है। वह कथित रूप से इन फोरमों पर हिट ब्लागर ही हो सकता है। वह तकनीकी ब्लागर नहीं हैं पर प्रयोक्ता के रूप में वह इसका उपयोग अच्छी तरह जानता है। </p>
<p>उसकी सक्रियता का प्रमाण यह है कि कल उसने मेरे पाठ को अपने कापी कर अपने यहां चिपकाने का काम नहीं किया। आज मेरे कमेंट को माडरेट नहीं कर रहा है। शायद वह अपने उस ईमेल को भी नहीं खोलता होगा जिससे यह ब्लाग संबंद्ध है। वह देख चुका है कि इस पर बवाल मच रहा है। मैंने तकनीकी मित्रों से सलाह की है उनका कहना है कि उसे ढूंढना कोई मुश्किल काम नहीं है। मैं गुस्से में हूं पर अपना विवेक कभी नहीं खोता। यहां अनेक ब्लाग लेखकों ने मुझे कभी न कभी सहयोग और प्रेरणा दी है इसलिये नहीं चाहता कि किसी को इतना मानसिक  अधिक आघात पहुंचा दूं कि  फिर मुझे पैर वापस खींचने का अवसर ही न रहे। यहां अनेक ब्लाग लेखक है, और पिछले पौने दो वर्षों से अनेक ब्लाग लेखकों से मेरी मित्रता है और करीब करीब सभी सहृदय हैं। कई तो बहुत भोले हैं और मुझे उनके किसी की चाल में फंसने पर दुःख होता है। जिस ब्लाग लेखक पर संदेह है उसे पता नहीं क्यों मैं शुरू से संशय से देखता आया हूं। वह सक्रिय ब्लाग लेखकों है पर उसने टिप्पणी अधिक से अधिक तीन बार दी होगी और उसके प्रिय विषय देखकर मुझे यह समझते देर नहीं लगती कि बेकार की बातें भी कर सकता है। </p>
<blockquote><p><strong>किसी भी ब्लाग लेखक का पाठ कापी कर अपने ब्लाग पर रखना अपराधिक कृत्य है। इसके लिये उसकी पूर्व अनुमति आवश्यक है।<br />
दीपक भारतदीप, लेखक और संपादक </strong></p></blockquote>
<p>आज मैं राजीव तनेजा जी की शिकायत पर उस ब्लाग पर गया जहां उनकी कहानी कापी कर रखी गयी थी। उसका भी मैंने विश्लेषण किया तो लगा कि अधिक से अधिक दो लोग ही ऐसे हैं जो ऐसा काम कर रहे हैं। उस पर जो देखकर आया उसे पर आगे लिखूंगा। हां, इतना तय है कि यह ब्लाग पर साहित्य लिखने वाले ब्लाग लेखकों को हतोत्साहित करने वाला कदम है। वैसे अगर नारद और चिट्ठा जगत के पास ऐसा कोई साफ्टवेयर हो कि पता चले कि कल मेरे इन तीन ब्लाग को किस ईमेल से देखा गया तो पता चला सकता है कि वह कौन है क्योंकि कुछ लोगों के पास ऐसे साफ्टवेयर हैं जिससे ईमेल से फोन नंबर पता किया जा सकता है-ऐसा । कल मेरे ब्लाग पर वहां से दो-दो व्यूज आये उनमें एक तो सहृदय ब्लाग लेखक अपनी टिप्पणी दे गये। इसका मतलब दूसरा देखने वाला ही संदेह के घेरे में हो सकता है। अधिक व्यूज होते तो मैं नहीं कहता। वैसे एक बात और है कि वर्डप्रेस के ब्लाग कम व्यूज ही बताते हैं इसलिये मैं इस पर दावे से कुछ नहीं कह सकता कि अन्य व्यूज नहीं होंगे। मै ऐसे ही किसी का नाम नहीं लूंगा जब तक मुझे कोई प्रमाण नहीं मिलेगा।  बाकी अभी मैं उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं उसे रोकना तो होगा ही नहीं तो यहां मौलिक लेखक  करना बेकार ही लगने लगेगा।</p>
<p><strong>लेख प्रकाशित करने के  चिट्ठकार समूह की चर्चा देखी तो पता चला कि आई डी तो ढूंढ निकाला है।  नाम कुछ अंग्रेजी में है पर इससे क्या? वह हिंदी जानता है या कोई ऐसा उसका सहायक है। उसने कल मेरी पाठ की कापी नहीं की इसका आशय यह है कि उसका मतलब वह समझ गया है। वैसे जिस ब्लाग लेखक पर मेरा संदेह है वह न हो तो अच्छा ही है। कम से कम मुझे इस बात की प्रसन्नता होगी कि कि हमारे अपने लोगों पर कभी कोई ऐसा आक्षेप नहीं करेगा।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी गलतियों से सिखाता हुआ  बीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया यह ब्लोग]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=534</link>
<pubDate>Thu, 05 Jun 2008 15:23:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=534</guid>
<description><![CDATA[मेरे यह ब्लाग/पत्रिका भी आज बीस हजार क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/2zjie4j.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />मेरे यह ब्लाग/पत्रिका भी आज बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। ऐसा करने वाला यह तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इस ब्लाग का नाम गंभीरता से नहीं लिखा गया। पता तो केवल प्रयोग करने के लिये डाला गया इसी कारण इतना लंबा है। इस ब्लाग से मेरी ऐसी यादें जुड़ीं हुईं है जो मेरा आत्म विश्वास बढ़ाती हैं। कभी कभी मेरे दिमाग में उग्रता का भाव आता है तो मैं इसके लिये ही लिखने लगता हूं। अंतर्जाल पर अपने लिखने के लिऐ एक लेखक जब तकनीकी ज्ञान से रहित हो तब पर किन हालतों से गुजरता है और किस तरह अपनी गलतियों से सीखता है यही संदेश यह ब्लाग मुझे देता है।</p>
<p>आज से सात वर्ष पूर्व मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। तब मुझे लगा कि मैं जब भी अध्यात्म और लेखन से दूर जाता हूं मेरे अंदर अनेक शारीरिक विकार उत्पन्न होते है।  ऐसे में मैंने लिखने में अपना मन लगाने के साथ ध्यान में अपना मन लगाने  का विचार किया। चूंकि यह दोनों मनोवृत्तियां मेरे अंदर प्रारंभ से ही है इसलिये अनेक लोगों से व्यक्तिगत संपर्क में इस पर चर्चा होती रहती है। उन्हीं दिनों एक भक्त किस्म के व्यक्ति को मैं अपनी एक अध्यात्म संबंधी रचना दिखा रहा था तो उसने मुझसे कहा ‘तुम तो दीपक बापू हो‘। फिर वह जब भी मिलते मुझे इसी नाम से बुलाते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक रजिस्टर खरीद लाया और उस पर ऐसे ही शीर्षक लिख दिया ‘दीपक बापू कहिन’। अकेले बैठकर उस पर चिंतन वगैरह लिखता और कभी कभी पत्रिकाओं के लिए व्यंग्य वगैरह लिखता तो वह अलग से लिखता। उस रजिस्टर पर मैंने कविताएं भीं लिखीं। </p>
<p>जब अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो वह रजिस्टर मेरे पास ही था क्योंकि मैं कृतिदेव से पाठ लिखकर इस प्रकाशित करने वाला था। अक्षरग्राम से मेरा संपर्क जम नहीं रहा था। पता नहीं कैसे वर्डप्रेस पर जब दीपक बापू कहिन लिखा कर हाथ पांव मारे तो अक्षरग्राम जैसा कुछ सामने आता लगा-तब मैं नहीं जानता था कि यह एक दरवाजा है जहां से मैं दाखिल हो रहा हूं। फिर नारद से भी संपर्क नहीं जम रहा था तब चल पड़ा था अपनी अकेली राह। हां, मुझे याद है उन्मुक्त का वह संदेश ‘आपका ब्लाग तो कूड़ा दिख रहा है।’ हतप्रभ होकर मैंने दूसरा ब्लाग बनाया जिसे आज <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘शब्द पत्रिका’</a> फिर तीसरा <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘हिंदी पत्रिका’ </a>के नाम से जाना जाता है। ‘हिंदी पत्रिका’ पर यूनिकोड में एक क्षणिका टाईप कर प्रकाशित की और उस पर मिली थी मुझे पहली टिप्पणी। मगर मुझे आगे लेकर निकली थी उन्मुक्त जी और सागरचंद नाहर की टिप्पणियां। मैं उन्मुक्त जी का प्रशंसक हूं। कभी भ्रमित नहीं करते और तकनीकी ब्लाग लेखकों में उनको और अनुनादजी  को मैं बहुत मानता हूं। श्रीश शर्मा जी की बहुत याद आती है पर वह दिखते ही नहीं।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों ने प्रेरित किया और समय समय पर टूल भी बताये पर ब्लाग की तकनीकी के बारे में मुझे किसी ने कुछ नहीं सिखाया। अगर मैं सीखा तो अपनी गलतियों से। अभी दोतीन दिनों से चिट्ठाकार चर्चा में बहस इस बात पर चल रही है कि किसी के ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है। तमाम बड़े ब्लाग लेखक उसके साथ सहानुभूति जता रहे हैं पर यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि ब्लाग स्पाट की सैटिंग में उसने व्यस्क सामग्री पर ‘हां‘ पर क्लिक कर रखा है। मैंने दो दिन पहले भी बताया था और आज भी लिख रहा हूं। पहले मेरा लिखा अगर पढ़ा होता तो शायद आज उनको इतने सारे शब्द खर्च नहीं करना पड़ता। इससे एक बात तो पता लगती है कि जो तकनीकी श्रेणी का छलावा है वह भी कम नहीं है। </p>
<p>चिट्ठा चर्चा में श्री समीरलाल ‘उड़न तश्तरी’ ने लिखा था कि ‘दीपक बापू कहिन इस ब्लाग जगत में नया अलख जगायेगा‘। मैं आज भी सोचता हूं कि उन्होंने केवल तुक्का मारा था या पढ़कर प्रभावित हुए थे। क्योंकि मुझे लगता है कि वह अब कहीं जाकर बेहतर लिख रहे हैं। उस समय तो मुझे उनके पाठों में अधिक रुचि नहीं रहती थी। उस समय मैं उनकी परवाह भी नहीं करता था पर आज देखकर लगता है कि वह वाकई प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक हैं। उस समय उनके अधिकतर पाठ ब्लाग लेखकों को ही प्रभावित करने वाले लगते थे।  अब उनके लेखक में जो गंभीरता आ रही उससे ही लगता है कि वह न केवल अच्छे लेखक भी हैं बल्कि पाठक भी हैं। वैसे अच्छे पाठक अच्छे लेखक हो यह जरूरी नहीं है पर अच्छे लेखक जरूर अच्छे पाठक होते हैं। आप देखिये तीन दिन पहले मैंने ही ब्लाग स्पाट के ब्लाग लेखक को व्यस्क सामग्री संबंधी जानकारी दी  पर किसी ने नहीं पढ़ी और आज सभी लोग फिर उसी बहस में लगे रहे। यह इस बात का प्रमाण है कि लोग कम पढ़ते हैं और लिखने का प्रयास अधिक करते हैं। मैं आज यह सोचता हूं कि मैं एक ब्लाग लेखक होकर वेबसाइट धारकों सलाह लेने की गलती करता था इसी कारण हमेशा परेशान रहा-यह  संदेश मुझे इसी ब्लाग पर मिलता है। इस ब्लाग को विलंब इसलिये भी लगा कि मैंने इस पर रचनाएं भी एक अंतराल के बाद ही दोबारा प्रकाशित करना शुरू कीं। </p>
<p>आने वाले समय में भी मैं सोच रहा हूं कि थोड़ा अधिक बेपरवाह होकर लिखा जाये। अभी कुछ बातें स्पष्ट करने में थोड़ा संकोच होता है पर अब उसे भी छोड़ना होगा। अंतर्जाल पर लटके-झटके और भ्रमजाल का विस्तार हो रहा है। फिर अब यह भी अनुभव हो रहा है कि वेबसाइट बनाने वाले ब्लाग लेखक एक तरह से अपने को अलग समझ रहे हैं। वह अपने को ऐसा ही समझ रहे हैं जैसे अधिक पैसा खर्च कर विशिष्ट कक्ष में बैठे हैं। इनमें कुछ मेरे मित्र है और वाकई भोले हैं पर कुछ चालाक हैं और उनकी मित्रता केवल दिखावा है। लिखने के मामले में अधिक प्रभाव नहीं छोड़ते भले ही टिप्पणियां उनके पास अधिक होती हैं। वेबसाइट का मालिक होने के बावजूद वह ब्लाग जगत में इसलिये सक्रिय हैं कि उनके कुछ निहितार्थ हैं। मैं मूलतः अल्हड आदमी हूं पर  चालाकियां मेरे सामने छिपतीं नहीं है। बहरहाल मैं अपने पाठको, मित्रों और हितचिंतकों का आभारी हूं। यह मेरा सेनापति ब्लाग है और ब्लाग लेखकों के साथ ही अनेक वेबसाइटें इस पर मेहरबान हैं। हां, पाठकों का समर्थन अधिक नहीं मिल पा रहा है इसलिये यह विलंब से इस मुकाम पर आया। अब मेरा सोचना है कि मुझे लिखना कम कर यहां हिंदी ब्लाग जगत पर साहित्य लिखने वालों पर प्रेरणा देन का काम भी टिप्पणियां उनके ब्लाग पर रखकर करना चाहिए। यहां ऐसा लिखने वाले कई हैं पर उनको प्रेरित करने वालों में समीरलाल और दो तीन अन्य लोग ही इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते हैं पर  यह संख्या पर्याप्त नहीं है।<br />
<strong>विभिन्न प्रमुख स्थानों से आये पाठक </strong></p>
<p>narad.akshargram.com 965<br />
blogvani.com 819<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 334<br />
google.co.in/ig?hl=hi 296<br />
chitthajagat.in 146<br />
blogvani.com/?mode=new 75<br />
blogvani.com/Default.aspx?count=100 63<br />
anantraj.blogspot.com 48<br />
rajlekh.blogspot.com 43<br />
narad.akshargram.com/page/2 38<br />
rajlekh.wordpress.com 36<br />
parikalpnaa.blogspot.com 36<br />
gwaliortimes.com 35<br />
blogvani.com/Default.aspx?mode=new 32<br />
narad.akshargram.com/?show=all 31<br />
blogvani.com/Default.aspx?count=50 28 </p>
<p><strong>पाठकों के पसंद से विभिन्न पाठ </strong><br />
Title Views<br />
रहीम के दोहे: सं 423<br />
पुराने ताजमहल ़/a&#62; 212<br />
चाणक्य नीति:अस़/a&#62; 211<br />
तन में तंत्र मन  193<br />
पति-पत्नी और चो༯a&#62; 192<br />
वर्षा ऋतु:कहीं ༯a&#62; 169<br />
फिर करना अभिमा़/a&#62; 168<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 166<br />
भजन करते-करते भ༯a&#62; 148<br />
गर्मी पर लिखी ग༯a&#62; 147<br />
निष्काम और सहज ༯a&#62; 139<br />
चाणक्य नीति:कु़/a&#62; 136<br />
इस ब्लोगर मीट प༯a&#62; 135<br />
अपना नाम भी होग༯a&#62; 128<br />
काहेका भला आदमॼ/a&#62; 127<br />
रहीम के दोहे: जा 127<br />
उसने मोबाइल की ༯a&#62; 126<br />
गीत-संगीत का मो༯a&#62; 118<br />
रहीम के दोहे: वा 115<br />
मूर्ति पूजा से ༯a&#62; 113<br />
रहीम के दोहे:मा༯a&#62; 112<br />
अंग्रेजी की लत़/a&#62; 111<br />
रहीम के दोहे:मे 104<br />
शेयर बाजार के उ༯a&#62; 104 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र:व्यसनी राजा संकट का कारण ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/11/10/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5/</link>
<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 06:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/11/10/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5/</guid>
<description><![CDATA[1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे। चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है। * यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।*यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।</p>
<p>2.मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है। वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करेजो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काहेका भला आदमी! ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/31/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 15:25:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/31/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[वह सुबह जाने की लिए घर से निकले, तो कालो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह सुबह जाने की लिए घर से निकले, तो कालोनी में रहने वाले एक सज्जन उनके पास आ गए और बोले-''मेरी बेटी कालिज में एडमिशन लेना चाहती  है उसे कालेज में प्रवेश का लिए फार्म चाहिये. आपका उस रास्ते से रोज का आना-जाना है. आप तो भले आदमी हैं इसलिए आपसे अनुरोध है कि  वहाँ से उसका फार्म ले आयें तो बहुत कृपा होगी.''</p>
<p>                          वह बोले-''इसमें कृपा की क्या बात है? आपकी बेटी तो मेरी भी तो बेटी है. मैं कालिज से उसका फार्म ले आऊँगा.'' </p>
<p>                             समय मिलने पर वह  उस कालिज गए तो वहाँ फार्म के लिए लाइन लगी थी. वह  फार्म लेने के लिए उस लाइन में लगे और एक घंटे बाद उनको फार्म मिल पाया. वह बहुत प्रसन्न हुए और घर आकर अपना स्कूटर बाहर खडा ही रखा और फिर थोडा पैदल  चलकर उन सज्जन के घर गए और बाहर से आवाज दी वह बैठक से  बाहर आये तो उन्होने उनका फार्म देते हुए कहा-"लीजिये फार्म''<br />
                           सज्जन बोले-"अन्दर  तो आईये. चाय-पानी तो लीजिये.''<br />
                         वह बोले-"नहीं, मैं जल्दी में हूँ. बिलकुल अभी आया हूँ. फिर कभी आऊँगा.''</p>
<p>                      सज्जन फार्म लेकर अन्दर चले गए और यह अपनी घर की तरफ. अचानक उन्हें याद आया कि'फार्म भरने की आखरी तारीख परसों है यह बताना भूल गए'.<br />
                       वह तुरंत लौट गए तो अन्दर से उन्होने सुना कोई कह रहा था-'आदमी तो भला है तभी तो फार्म ले आया .'<br />
                    फिर उन्होने उन सज्जन को यह कहते हुए सुना-''कहेका भला आदमी है. फार्म ले आया तो कौनसी बड़ी बात है. नहीं ले आता तो मैं क्या खुद ही ले आता. जरा सा फार्म ले आने पर क्या कोई भला आदमी हो जाता है."<br />
                   वह हतप्रभ रह गए और सोचने लगे-'क्या यह सज्जन अगर कह देते कि भला आदमी है तो क्या बिगड़ जाता. सुबह खुद ही तो कह रहा था कि आप भले आदमी हो.'</p>
<p>                          फिर मुस्कराते हुए उन सज्जन को आवाज दी तो वह बाहर आये उनके साथ दूसरे सज्जन भी थे. वह बोले-''मैं आपको बताना भूल गया  था कि फार्म भरने की परसों अन्तिम तारीख है.''</p>
<p>                          वह सज्जन बोले-'अच्छा किया जो आपने बता दिया है. हम कल ही यह फार्म भर देंगे.''-फिर वह अपने पास खडे सज्जन से बोले''यह भले आदमी हैं. देखो अपनी बिटिया के लिए फार्म ले आये. </p>
<p>                        वह मुस्कराये. उनके चेहरे के पर विद्रूपता के भाव थे. वह सज्जन फिर दूसरे सज्जन से मिलवाते हुए बोले-''यह मेरा छोटा भाई  है. बाहर रहता है कल ही आया है."</p>
<p>                        वह मुस्कराये और उसे नमस्ते की और बाहर निकल गए और बाहर आकर बुदबुदाये-'' काहेका भला आदमी! </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी भाषा की आत्मा है देवनागरी लिपि ]]></title>
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<pubDate>Sat, 06 Oct 2007 13:25:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[             कुछ लोगों ने अगर यह तय कर लिया है क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>             कुछ लोगों ने अगर यह तय कर लिया है कि वह हिंदी सहित देश की अन्य भाषाओं को रोमन में लिपि में लिखेंगे तो उसकी वजह उनका भाषा प्रेम तो हो ही नहीं सकता-भले ही वह उसका दावा करते हौं। भारत की अधिकांश भाषाओं की लिपि देवनागरी है और आम आदमी उसमें सहजता पूर्वक अध्ययन और लिखने का काम करता है। पर कुछ लोगों को अपने विद्वान होने का प्रदर्शन करने के लिए देवनागरी लिपि पर आपत्ति करना अच्छा लगता है और वह कर रहे हैं। मुझे इसकी संभावना चार वर्ष पूर्व ही लग गयी थी जब यह लगने लगा कि भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है।</p>
<p>          एक समय था कि लोग कहते थे कि हिंदी में पढने-लिखने का कोई मतलब नहीं है क्यों कि उससे रोजगार नहीं मिल सकता। सबने विदेशों में जाकर रोजगार पाने के ख़्वाब संजोते हुए अंग्रेजी की तरफ दौड़ लगाई। तब हिंदी के एक सिरे से खारिज करने वालों को उसकी लिपि में दोष देखने का समय ही कहॉ था क्यों कि हिंदी गरीबों की भाषा थी। मैं जानता हूँ कि भाषा का जितना संबंध भाव से है उतना ही रोजी-रोटी से भी है। उस समय भी मुझे यह नहीं लगता था कि हिंदी भाषा या देवनागरी लिपि कोई अवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है और न आज लगता है। यह दुनियां कि इकलौती ऎसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। जब विश्व में भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने के तरफ अग्रसर है और उसके गरीब भी अब थोडा-बहुत पैसा रखने लगे हैं तब उसकी भाषा पर कब्जे की होड़ तो लगनी ही थी और जो लोग इसकी लिपि रोमन में देखना चाहते हैं उनके दो ही उद्देश्य हो सकते हैं ऐक तो उनको लगता है कि इससे उनको अच्छा व्यवसाय मिलने वाला है या फिर उनके मन में और हिंदी लेखकों को लिखते देखकर यह कुंठा हो रही है और वह सोचते हैं कि एक बार रोमन लिपि का मुद्दा उठा कर लोकप्रियता हासिल कर लें और फिर अपनी दूकान चाहे जिसमें चलाएँ। </p>
<p>         मैं उनको रोकना नहीं चाहता पर इतना जरूर का सकता हूँ कि हिंदी को रोमन लिपि में पढने वालों की संख्या है पर ज्यादा नहीं है-कुछ ब्लोग लेखकों अगर यह लगता है कि उनके ब्लोग रोमन लिपि में पढते हैं तो दूर कर लें। खासतौर से इस संबंध में विदेशी लोगों का हवाला दिया जाता है-पर वहाँ ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जिन्हें हिंदी देवनागरी लिपि में पढ़ना नहीं आता होगा और वह इसमें दिलचस्पी लेते होंगे। उनकी मानसिकता में ही हिंदी होगी इसमें भी शक है। रोमन में हिंदी पढ़ना अपने आप में बिचारगी की स्थिति है। अभी मैने अपना चिट्ठा एक जगह रोमन लिपि में देखा था और मैं यह सोचकर खुश हुआ कि चलो जो इसे रोमन में पढने की चाहत रखने वाले भी पढ़ सकेंगे-क्यों कि उस पर मेरी कोई मेहनत नहीं थी और अगर कोई ऐक दो लोग पढ़ लेते हैं तो बुराई क्या है, पर मैं वहां से ज्यादा पाठक मिलने की आशा नहीं कर सकता। </p>
<p>        ऐसा नहीं है कि रोमन लिपि में हिंदी पढने वाले नहीं मिल सकेंगे क्यों कि हमारे पडोसी देशों में फिल्मों की वजह से हिंदी समझने वालों की संख्या बहुत है और उनमें कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो हिंदी में लिखे को पढने में दिलचस्पी लें और इसमें खास तौर से पाकिस्तान और बंगलादेश के लोग हो सकते हैं, उसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं के भी उनके सीमावर्ती देशों के लोगों को रोमन लिपि में पढ़ना अच्छ लग सकता है। पर अगर हम इसी मद्दे नजर अपने देश के पाठकों को नजर अंदाज करेंगे तो गलती करेंगे। हम यह मानकर भी गलती कर रहे हैं कि देश का पाठक तो केवल चौपालों पर ही आकर पढता है और बाहर जो पढ़ रहे हैं वह सब विदेशों के रहने वाले भारतीय है। इन चौपालों के बारे में देश के लोग बहुत कम जानते है और कंप्यूटर में इन्टरनेट पह हिंदी पढने वाले अपने रास्ते से हिंदी का लिखा पढते हैं। जिन्हें हिंदी में लिखने का मोह है और वह देव नागरी लिपि का ज्ञान नहीं रखते या असुविधा महसूस करते हैं उनके लिए रोमन लिखना स्वीकार्य हो सकता है पर वह कोई बड़ा तीर मार लेंगे यह गलत फ़हमी उन्हें नहीं पालना चाहिए, क्यों कि अंतत: हिंदी की लिपि देवनागरी है और वही आम पाठक तक आपको पहुंचा सकती है, एक बात और कि विदेशों में हिंदी का आकर्षण वहाँ की भारतीयों की वजह से कम इस देश की अर्थव्यवस्था के कारण है। इसलिये रोमन लिपि वाले अगर अपने लिखे से पैसा कमाने की ताक़त रखते हैं तो ख़ूब लिखें पर देश की भाषाओं का उद्धार करने की बात न ही करें तो अच्छा है। उसी तरह ब्लोगर भी यह भूल जाये कि उनको रोमन लिपि से कोई आर्थिक या सामाजिक लाभ होने वाला है। हिंदी को जो भी उर्जा मिलेगी वह इस देश के पाठक से ही मिलेगी-और यह नहीं भूलना चाहिए की हिंदी भाषा की आत्मा देवनागरी लिपि ही है।</p>
<p>पहले इसी ब्लोग पर प्रकाशित कविता<br />
<strong>अभी लिखा क्या है कि  लिपि  पर झगडने लगे</strong><br />
------------------------------------------------</p>
<p>स्कूल से घर लौटे बच्चे आपस में<br />
रोमन और देवनागरी लिपि को<br />
लेकर लड़ने लगे<br />
‘मैं तो रोमन में हिंदी लिखूंगा<br />
तुझे देवनागरी में लिखना है लिख<br />
दूसरा कहता है<br />
‘मैं तो हिंदी में ही हिंदी जैसा दिखूंगा<br />
तुझे अंग्रेजी जैसा दिखना है तो दिख’<br />
माँ हैरान है और पूछती है<br />
‘बेटा अभी तो शब्द ज्ञान आया है<br />
लिखोगे तुम तो पढेगा कौन<br />
तुम चिल्ला रहे हो<br />
कौन सुने और कौन पढे<br />
शब्द तो तभी पढा और सुना जाता है<br />
जब आदमी होता है मौन<br />
तुम क्या लिखोगे और क्या पढोगे<br />
प्रेमचंद, निराला, प्रसाद और कबीर को<br />
नहीं पढा लडाई झगडा करते हुए<br />
अपनी ज़िन्दगी गुजारोगे<br />
अभी तो बोलना शुरू किया है<br />
अब तक लिखा क्या है जो<br />
लिपि को लेकर लड़ने लगे हो<br />
हिंदी का जो होना है सो हॊगा<br />
पहले पढ़ना सीखो और फिर सोचो<br />
लोगों चाव से पढ़ें एसा नहीं लिखा तो<br />
तुम्हारा नाम भी अनाम होगा<br />
यह अभी से ही लग रहा है दिख<br />
जब यूनिकोड है तो काहेका झगडा<br />
रोमन में लिख देवनागरी में पढ<br />
रोमन में भी पढ देवनागरी में लिख’ </p>
<p>------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अभी लिखा क्या है जो लिपि पर झगड़ने लगे-हास्य कविता  ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 04 Oct 2007 13:29:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[स्कूल से घर लौटे बच्चे आपस में
रोमन और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>स्कूल से घर लौटे बच्चे आपस में<br />
रोमन और देवनागरी लिपि को<br />
लेकर लड़ने लगे<br />
'मैं तो रोमन में हिंदी लिखूंगा<br />
तुझे देवनागरी में लिखना है लिख<br />
दूसरा कहता है<br />
'मैं तो हिंदी में ही हिंदी जैसा दिखूंगा<br />
तुझे अंग्रेजी जैसा दिखना है तो दिख'<br />
माँ हैरान है और पूछती है<br />
'बेटा अभी तो शब्द ज्ञान आया है<br />
लिखोगे तुम तो पढेगा कौन<br />
तुम चिल्ला रहे हो<br />
कौन सुने और कौन पढे<br />
शब्द तो तभी पढा और सुना जाता है<br />
जब आदमी होता है मौन<br />
तुम क्या लिखोगे और क्या पढोगे<br />
प्रेमचंद, निराला, प्रसाद और कबीर को<br />
नहीं पढा  लडाई झगडा करते हुए<br />
अपनी ज़िन्दगी गुजारोगे<br />
अभी तो बोलना शुरू किया है<br />
अब तक लिखा क्या है जो<br />
लिपि को लेकर लड़ने लगे हो<br />
हिंदी का जो होना है सो हॊगा<br />
पहले पढ़ना सीखो और फिर सोचो<br />
लोगों चाव से पढ़ें एसा नहीं लिखा तो<br />
तुम्हारा नाम भी अनाम होगा<br />
यह अभी से ही लग रहा है दिख<br />
जब  यूनिकोड है तो काहेका झगडा<br />
रोमन में लिख देवनागरी में पढ<br />
रोमन में भी पढ देवनागरी में लिख' </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सदैव हंसते रहो ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/29/%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%88%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Sat, 29 Sep 2007 05:37:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/29/%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%88%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8b/</guid>
<description><![CDATA[

मनुष्य के मुख पर मुसकान सौभाग्य का चि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>मनुष्य के मुख पर मुसकान सौभाग्य का चिह्न है। हंसना मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है। विधाता के सृष्टि का कोइ दूसरा प्राणी हंसता हुआ नहीं दिखता। प्रसिद्ध चिंत्तक वायर ने ठीक लिखा है-'जब भी संभव हो हंसो, यह ऐक सस्ती दवा है, हंसना मानव-जीवन का ऐक उज्जवल पहलू है।'</p>
<p>पाश्चात्य तत्ववेत्ता स्टर्नने तो यहाँ तक कहा है कि-'मुझे विश्वास है हर बार जब कोई व्यक्ति हंसता या मुसकराता है वह उसके साथ ही अपने जीवन में वृद्धि करता है।'</p>
<p>स्वेट मार्डन प्रसन्नता को धन मानते हुए कहते हैं-'ऐक ऐसा धन है, जिसे सब लोग इकट्ठा कर सकते हैं, वह धन है प्रसन्नता का धन। तुम पर कितनी ही मुसीबतें रहें, तुम कितने कठिनाईयों मैं हो, तुम्हारे सामने अन्धकार ही क्यों न हो, यदि तुम प्रसन्नता को अपनाए रहो तो तुम धनी हो। यह प्रसन्नता तुम्हारे जीवन को उच्च बनाएगी।'</p>
<p>प्रसिद्ध विचारक कार्नेगी का कथन है-'मुसकराहट थके हुए व्यक्ति के लिए विश्राम है, हतोत्साहित के लिए दिन का प्रकाश, सर्दी में ठिठुरते के लिए धुप है और कष्ट के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम प्रतिकार है।'</p>
<p>जबकि होमर के शब्दों में-'मुस्कान प्रेम की भाषा है।'</p>
<p>विलियम शेक्सपियर के कथानुसार-'मुसकान के बल पर जो तुम चाहो पा सकते हो। तलवार से इच्छित वस्तु नष्ट हो जाती है।'<br />
प्रसन्नता वास्तव में चन्दन के समान है, उसे दुसरे के मस्तक पर लगाईये, उंगलिया अपने-आप ही सुगन्धित हो जायेंगी। जीन पोल प्रसन्नता को वसंत की तरह हृदय की सबा कलियाँ खिला देने वाली मानते हैं। तभी तो गेट ने प्रसन्नता हो सभी सदगुणों की माँ कहा है।</p>
<p>इसलिये जीवन में सदैव हंसने और प्रसन्न रहने का प्रयास करो, और ऐसे लोगों से संपर्क मत रखो जो तुम्हें दुःख या अप्रसन्नता देकर तुम्हारी हंसी छीनने का प्रयास करते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धोनी की कप्तानी का अब परीक्षण होगा]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/29/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 14:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

आस्ट्रेलिया की टीम  भारत दौरे पर आ गय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>आस्ट्रेलिया की टीम  भारत दौरे पर आ गयी है और कल उसके साथ भारतीय टीम अपना  पहला एक दिवसीय मैच  खेलने  वाली है। बीस  ओवरीय विश्व कप में अपनी टीम  की जीत से हर्षित भारतीय दर्शकों की एक बार फ़िर क्रिकेट में रुचि जागी है पर उनको इन मैचों में वैसा खेल नहीं देखने को मिलेगा जैसा कि वह अपेक्षा कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इसके नियम वैसे ही जैसे कि पहले थे। बीस ओवरों में नियम कुछ्ह अलग  है और जिसमें बल्लेबाजों को ज्यादा लाभ होता है और वह तेजी से बल्लेबाजी कर   रन बनाते हुए दर्शकों का मनोरंजन कर  सकते हैं जबकि एक दिवसीय  और  पांच दिवसीय टेस्ट मैचों के नियम गेंदबाज और बल्लेबाज दोनों के लिये समान रूप से  लाभदायक हैं।</p>
<p>                         अगर हम एक दिवसीय मैचों की दृष्टि से देखें तो भारतीय टीम की स्थिति उतनी ही दयनीय है जिस तरह पहले थी और विश्व की वरीयता सूची में उसका नबंर चर्चा लायक भी नहीं है। इसके अलावा पुराने खिलाडियों की वापसी भी कोई टीम के मनोबल बढने में सहायक सिद्ध नहीं होने वाली। जो दर्शक इन मैचों में बीस ओवरों वाले दृश्य देखने चाहेंगे उनको निराशा ही हाथ लगेगी। हालंकि एक दिवसीय मैचों के खेल में दक्षता के साथ रणनीतिक कौशल की भी आवश्यकता भी होती है और इस मामले भी भारतीय टीम बहुत् कमजोर है और कभी यह नहीं लगा कि उसका कप्तान कभी कोई रणनीति बनाकर   मैदान में उतरता है। अब धोनी को  नया कप्तान बनाया गया है और यह श्रंखला उसके लिये यह वास्तविक परीक्षा का समय है। उसके सामने सबसे बडी समस्या यह आने वाली है कि अब उसके साथ वह वरिष्ठ खिलाडी भी हैं जिन पर टीम में वैमनस्य की भावना उत्पंन करने की आरोप लगे हैं। एक संदेह यह भी है कि अपने से जूनियर खिलाडी जो अब उनका कप्तान भी है उसके लिये वह वैसा खेलेंगे भी के नहीं जैसा वह चाह्ता है।</p>
<p>              वैसे तो इन खिलाडियों को टीम में शामिल  करने पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं पर भारतीय टीम के चयन में कई बातें एसी होतीं हैं जिसकी वजह से समझोते किये जाते हैं। अगर किसी को यह पता होता कि बीस ओवर में भारतीय टीम जीत भी सकती है तो यकीन मानिये इन वरिष्ठ खिलाडियों को वहां भी ले जाया जाता। यदि भारतीय दर्शकों की रती भर भी दिल्चस्पी उस प्रतियोगिता में होती तो भी इन खिलाडियो को वहां झेलना पडता। इस प्रतियोगिता को भारतीय मीडिया ने भी अधिक महत्व नहीं दिया था वर्ना वह पहले ही इन खिलाडियों का टीम में शामिल करने के लिये दबाव बना देता। विश्व कप में विजय के बाद भारत पहुंचने पर ही धोनी और उसके साथियों को पता लगा कि वह कोई भारी सफ़लता प्राप्त कर लौटे है-यह बात धोनी ने खुद कही है। धोनी इस मामले में किस्मत के घनी रहे कि उनको इन खिलाडियों का सानिध्य   वहां नहीं मिला वरना वह भी असफ़ल कप्तानों की सूची में शामिल होते। इसमें कोई शक नहीं यह सब सीनियर महान हैं पर देश को विश्व विजयी बनाने कि उनमें कुब्बत  नहीं है और इनको ऐक नहीं पांच-पांच अवसर दिये जा चुके हैं। अब धौनी को ऐसी  हालतों से जूझना होगा जिसकी कल्पना भी उनहोने पहले नहीं की होगी। अगर वह इन वरिष्ठ खिलाडियों को साध पाये तो ही वह आगे भी सफ़लता का दौर जारी रख सकते हैं।</p>
<p>        अगर भारतीय टीम इस श्रंखला में अच्छा प्रदर्शन करती है तो भी उसकी विश्व वरीयता में थोडा सुधार हो सकता है इससे अधिक आकर्षण इसमे और अधिक नहीं है। हां नये  कप्तान और विश्व कप जीतने के तत्काल  बाद हो रही इस श्रंखला में लोग पहले से अधिक दिलचस्पी लेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है। बीस ओवरीय  विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी के लिये कप्तान की रूप में करने के लिये ज्यादा के लिये कुछ था भी नहीं पर यहां एक कप्तान के रूप में अपनी क्षमता का परिचय देना होगा।<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक ही कंपनी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:26:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

हीरो ने कहा निर्देशक और निर्माता से
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
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<p>हीरो ने कहा निर्देशक और निर्माता से<br />
'आज शूटिंग नहीं करूंगा<br />
पैकअप करा दो<br />
मेरा मूड है खराब'<br />
निर्माता ने अपना मोबाइल<br />
उसकी तरफ बढ़ाया और कहा<br />
'मैंने नंबर लगा दिया है<br />
पहले इस पर बात कर लो<br />
फिर देना जनाब'</p>
<p>हीरो ने नंबर देखा और घबडाया<br />
अपने सेक्रेटरी को बुलाया<br />
उसने जब मामला समझा<br />
तब उसने भी अपना मोबाइल<br />
निर्माता की तरफ बढाया<br />
और <span>कहा<br />
'</span>उस बिचारे को क्या धमकाते हो<br />
मुझ से बात करो<br />
आप इस नंबर पर बात करो पहले जनाब '</p>
<p>निर्माता का सेक्रेटरी भी वहीं खड़ा<br />
उसने भी नंबर देखा और खुश होकर बोला<br />
'अरे काहेका झगडा आप और हम एक ही<br />
कंपनी का मोबाइल इस्तेमाल करते हैं<br />
फिर क्यों झगडा करते हैं साहब'</p>
<p>हीरो ने कुछ सुना कुछ समझा<br />
और बोला<br />
'बात एक कंपनी ही की है<br />
यह सुनकर मैं खुश हुआ<br />
अब तो शूटिंग शुरू करो जनाब'<br />
----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रचार और बाजार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 14:36:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[उपभोक्ता और निर्माता की
मर्जी पर नहीं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उपभोक्ता और निर्माता की<br />
मर्जी पर नहीं चलता बाजार<br />
करता है काम एक तंत्र<br />
जिसे कहते हैं प्रचार<br />
सामान खरीदने वाले<br />
कही रेडियो पर सुना हो<br />
कही टीवी पर देखा को<br />
कही पत्र-पत्रिका में पढा हो तब<br />
बनाते अपने विचार का आधार<br />
कभी कौन बनेगा करोड़पति<br />
कभी इंडियन आइडियल<br />
तो कभी चाहिए क्रिकेट का हीरो<br />
उत्पाद बेचने के लिए<br />
आजकल जरूरी है यह सब<br />
नहीं तो सिमट जाता है जीरो<br />
पर पूरा व्यापार</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
आदमी की देह से ज्यादा<br />
उसकी अक्ल पर काबू पाने के लिए<br />
चल रही है विज्ञापन की जंग<br />
जिसमें पैसे के अलावा कोई<br />
किसी का साथी नही<br />
कोई किसी के संग<br />
साथ अपने अक्ल लेकर जाओ बाजार<br />
ठगी से बच नही सकते<br />
सस्ती चीज कही से ले नहीं सकते<br />
किसी चीज की गारंटी भी नहीं उपचार<br />
किसी चीज को खरीद कर ठग जाओ<br />
तो भूल जाओ<br />
मत करो पछतावे का विचार</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजप्रमुख अपने पुत्रों पर दृष्टि रखें ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/26/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 03:27:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[



मदोन्मत्त हुए राजप्रमुख (राजा) के पु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
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<p class="post-body entry-content">
<ol>
<li>मदोन्मत्त हुए राजप्रमुख (राजा) के पुत्र निरंकुश हाथी का समान अभिमानी होकर भ्राता तथा पिता की ह्त्या कर डालते हैं।</li>
<li>ऐसे पुत्र अनेक विषयों में अपने आग्रह करते हैं जिससे राज्य की रक्षा में बहुत कठिनाई आती है, जैसे व्याघ्र द्वारा भक्षित मांस की व्याघ्र के रहते हुए रक्षा नहीं हो सकती है।</li>
<li>राजप्रमुख को चाहिए कि वह अपने पुत्रो तथा अपने सहायकों को विनम्रता सिखाये, यी वह विनम्र नहीं होंगे तो कुल और राज्य भी नष्ट हो सकता है।</li>
<li>दुर्बुद्धि पुत्र का त्याग भी नहीं करना चाहिऐ। यदि उसे निकाला जायेगा तो शत्रु से मिलकर वह पिता की भी ह्त्या कर सकता है</li>
<li>अगर राजपुत्र व्यसनों में पडा हो तो उसमें पडे अन्य व्यक्तियों के द्वारा उसे परेशान करवाए ताकि वह व्याकुल होकर उनसे विरक्त हो जाये।</li>
</ol>
<p>नोट-इसमें राजा शब्द की जगह आज के संदर्भों में राजप्रमुख शब्द प्रयोग किया गया है।</p>
<p class="post-footer">
<p class="post-footer-line post-footer-line-1">&#160;</p>
<p><!-- spacer for skins that want sidebar and main to be the same height--></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहस और तर्क तो विद्वानों को करना चाहिए ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 11:40:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
 
बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चाहिए। विद्वान का मतलब यह कि जिस विषय पर बहस हो उसमें उसने कहीं न कहीं शिक्षा और उपाधि प्राप्त की हो या उसने उस विषय को इस तरह पढा हो कि उसे उसके संबंध में हर तथ्य और तत्व का ज्ञान हो गया हो। हमारे देश में हर समय किसी न किसी विषय पर बहस चलती रहती है और उसमें भाग लेने वाले हर विषय पर अपने विचार देते हैं जैसे कि उस विषय का उनको बहुत ज्ञान हो और प्रचार माध्यमों में उनका नाम गूंजता रहता है। उनकी राय का मतलब यह नहीं है कि वह उस विषय में पारंगत हैं। उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने का कारण यह होता है कि वह अपने किसी अन्य कारण से चर्चित होते हैं, न कि उस विषय के विद्वान होने के की वजह से ।</p>
<p>स्वतंत्रता के बाद इस देश में सभी संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों की कार्यशैली का एक तयशुदा खाका बन गया है जिससे बाहर आकर कोई न तो सोचना चाहता है और न उसके पास ऐसे अवसर हैं। धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, राजनीति, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में बहुत लोग सक्रिय हैं पर प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता है जिसके पास या तो कोई पद है या वह उन्हें विज्ञापन देने वाला धनपति है या लोगों की दृष्टि में चढ़ा कोई खिलाडी या अभिनेता है-यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे उस विषय का ज्ञान हो जिस पर वह बोल रहा हो। इसी कारण सभी प्रकार की बहस बिना किसी परिणाम पर समाप्त हो जाती हैं या वर्षों तक चलती रहती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और बहस भी बढने लगी है और कभी-कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों को लोगों की दृष्टि में अपना प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए विषयों की जरूरत है तो उनमें अपना नाम छपाने के लिए उन्हें यह अवसर सहजता से प्रदान करते हैं।</p>
<p>अन्य विषयों पर बहस होती है तो आम आदमी कम ही ध्यान देता है पर अगर धर्म पर बहस चल रही है तो वह खिंचा चला आता है। धर्म में भी अगर भगवान् राम श्री और श्री कृष्ण का नाम आ रहा तो बस चलता-फिरता आदमी रूक कर उसे सुनने, देखने और पढने के लिए तैयार हो जाता है। मैं कुछ लोगों की इस बात से सहमत हूँ कि भगवान श्री राम और श्री कृष्ण इस देश में सभी लोगों के श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं। लोग उनके प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि उनकी निन्दा या आलोचना से उन्हें ठेस पहुँचती हैं। इसके बावजूद कुछ लोग प्रचार की खातिर ऐसा करते हैं और उसमें सफल भी रहते हैं।</p>
<p>धर्म के संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया पर इसके बावजूद इन्हें श्रद्धा भाव से पढने वालों की कमीं नहीं है। यह अलग बात है कि कोई कम तो कोई ज्यादा पढता है। फिर कुछ पढने वाले हैं तो ऐसे हैं जो इसमें ऐसी पंक्तियों को ढूंढते हैं जिसे उनकी आलोचना करने का अवसर मिले। वह पंक्तिया किस काल और संदर्भ में कही गयी हैं और इस समय क्या भारतीय समाज उसे आधिकारिक रुप से मानता है या नहीं, इस बात में उन्स्की रूचि नहीं होती। मुझे तो आश्चर्य तो तब होता है कि ऐसे लोग अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते-जाहिर है कि उनका उद्देश्य ही वही होता है किसी तरह नकारात्मक विचारधारा का प्रतिपादन करें। मजे की बात तो यह है कि जो उनका प्रतिवाद करने के लिए मैदान में आते हैं वह भी कोई बडे ज्ञानी या ध्यानी नहीं होते हैं केवल भावनाओं पर ठेस की आड़ लेकर वह भी अपने ही लोगों में छबि बनाते हैं-मन में तो यह बात होती है कि सामने वाला और वाद करे तो प्रतिवाद कर अपनी इमेज बनाऊं।</p>
<p>मतलब यह कि धर्म मे विषय में ज्ञान का किसी से कोई वास्ता नहीं दिखता। एक मजेदार बात और है कि अगर किसी ने कोई संवेदनशील बयान दिया है प्रचार माध्यम भी उसके समकक्ष व्यक्ति से प्रतिक्रिया लेने जाते हैं बिना यह जाने कि उसे उस विषय का कितना ज्ञान है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के कई प्रसिद्ध विद्वान है जो इस विषय के जानकार हैं पर उनसे प्रतिक्रिया नहीं लेने जाता जबकि उनके जवाब ज्यादा सटीक होते, पर उससे समाचारों का वजन नही बढ़ता यह भी तय है क्योंकि लोगों के दिमाग में भी यही बात होती है कि प्रतिक्रिया देने का हक केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा से संपन्न लोगों को ही है पंडितों (यहाँ मेरा आशय उस विषय से संबधित ज्ञानियों और विद्वानों से है जो हर वर्ग और जाति में होते हैं) को नहीं। वाद, प्रतिवाद और प्रचार के यह धुरी समाज कोई नयी चेतना जगाने की बजाय लोगों की भावनाओं का दोहन या व्यापार करने के उद्देश्य पर ही केंद्रित है।</p>
<p>इसलिये जब ऐसे मामले उठते हैं तब समझदार लोग इसमें रूचि कम लेते हैं और असली भक्त तो बिल्कुल नहीं। इसे उनकी उदासीनता कहा जाता है पर मैं नहीं मानता क्योंकि प्रचार की आधुनिक तकनीकी ने अगर उसके व्यवसाय से लगे लोगों को तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की हैं तो लोगों में भी चेतना आ गयी है और वह जान गए हैं कि इस तरह के वाद,प्रतिवाद और प्रचार में कोई दम नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शाश्वत सत्य के रुप हैं राम ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%aa-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 14:28:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%aa-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae/</guid>
<description><![CDATA[राम हैं एक काल्पनिक पात्र है
आ रहे रोज ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>राम हैं एक काल्पनिक पात्र है<br />
आ रहे रोज ऐसे बयान<br />
बढ़ रही है जमाने में<br />
फिल्मों के नकली पात्रों का<br />
अभिनय करने वालों की शान<br />
अमीरों के ड्राइंग रूमों में<br />
लगती हैं लगती है तसवीरें<br />
पर फिर भी नहीं पाते<br />
देवताओं जैसी पूजा<br />
उठाया कुछ लोगों ने उन्हें यही दर्जा<br />
दिलाने का बीड़ा<br />
इसलिये रामजी के काल्पनिक<br />
होने का करते एलान</p>
<p>चक दे इंडिया में देश को<br />
विश्व कप जीता दिखाकर<br />
करा रहे लोगों से वाह-वाह<br />
पर सच में क्या भारत ऐसे कहीं जीता<br />
एशिया कम में क्या जीती टीम<br />
पूरे देश में 'चक दे इन्डिया' का ढिंढोरा पीटा<br />
विश्व कप में पिटी हॉकी टीम पर<br />
कभी मंथन नहीं करेंगे<br />
फिल्मों में नकली पात्र गढ़कर<br />
लोगों को भ्रमित करेंगे<br />
देश की बढते दिखाते नकली शान</p>
<p>मुन्ना भाई में गांधी मार्ग का नही<br />
गांधीगिरी का किया प्रचार<br />
गांधीजी का कम नकली पात्र के<br />
गुणों पर ज्यादा किया विचार<br />
रुपहले परदे पर अभिनेताओं की<br />
रामजी जैसी छबि उतारने का<br />
इस तरह प्रयास करेंगे<br />
कि परदे के बाहर की तस्वीर लोग भूलेंगे<br />
जब बाजार में ज्यादा नहीं टिकता झूठ<br />
विज्ञापन पर पलने वालों के उमेठते कान<br />
नकली हीरो के लिए बड़ी लकीर नहीं खींच सकते<br />
तो असली हीरो का कम करो मान</p>
<p>हर फिल्म में ऐक ही हीरो करता है<br />
पूरे समाज का उद्धार<br />
बाकी पब्लिक दिखाते बेकार<br />
अकर्मण्य लोगों की फ़ौज बढाते<br />
जो अपनी दुर्गत से उबरने के लिए<br />
करती हीरो का इन्तजार<br />
कोई नकली हीरो आयेगा जो<br />
अकेले लड़कर उबार जाएगा<br />
रामजी की तरह वानर सेना नहीं जुटाएगा<br />
अगर कोई फिर हुआ अवतार तो<br />
हमें भी लड़ने के लिए बुलाएगा<br />
हमें घरो से निकालकर जंग के<br />
मैदान मे ले जाएगा<br />
इससे तो हीरो अच्छा जो सारा<br />
काम अकेले कर जाएगा<br />
यही सोच लोगों को नही होने<br />
देता सत्यता का भान</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
रामायण में अकेले रामजी ही नही<br />
हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान<br />
और नल-नील भी नायक जैसा सम्मान पाते<br />
रामायण का भी यही है संदेश कि<br />
धर्म के लिए सब मिलकर लड़ो<br />
मर्यादा और भक्ति भाव से रहते हुए<br />
किसी से भी न डरो<br />
मत भूलो अपनी पहचान</p>
<p>कण-कण में राम है<br />
कल्पनाओं से परे उनका काम है<br />
जो लिखते हैं पर वाल्मीकि और<br />
तुलसी जैसा न रच पाते न पाते समान<br />
कुंठा में व्यक्त करते अभिमान<br />
रामजी शाश्वत सत्य का प्रतीक है<br />
सच्चे भक्त ही यह जानते हैं<br />
वह बहकते नही हैं<br />
और हँसते हैं ऐसे सुनकर बयान<br />
----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आंकडो के जाल में मत आओ, तुम लिखते जाओ ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%93-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 03:23:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
 
अपनी हिन्दी भाषा में लिखते जाओ
कतरनो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>अपनी हिन्दी भाषा में लिखते जाओ<br />
कतरनों में लिखे आंकड़ों पर<br />
अपनी दृष्टि मत लगाओ<br />
लिखो कहानी, कविता और व्यंग्य<br />
और लोगों को पढ़ाते जाओ<br />
और दूसरे का लिखा भी पढते जाओ</p>
<p>हिन्दी की दशा कहीं शोचनीय नहीं है<br />
तुम्हार लिखे से वह अंतर्जाल पर<br />
चमक रही है<br />
जिन्हें पढ़ना है वह खुद आएंगे<br />
तुम अपनी रचनाएं<br />
कहीं डालने मत जाओ<br />
अपने ब्लोग पर डटे रहो<br />
हमने देखा है हिन्दी के पाठक<br />
दूर-दूर से उसे पढने आते हैं<br />
हमारी पीठ थपथपाते हैं<br />
लोगों के बहकावे में मत आओ</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
'यहाँ लिख और वहां दिख' जैसे<br />
नारों पर न करो दृष्टिपात<br />
आंकडे हमें झूठ बोलने और भ्रम का<br />
जाल फैलाने के लिए रचे जाते हैं<br />
ताजमहल खड़ा है वहीं पर<br />
बाजार में उसे भी दौड़ता दिखाते हैं<br />
तुम हिन्दी में हास्य-व्यंग्य के दीपक<br />
जलाते जाओ<br />
कबाड़ से निकली कतरन में तो<br />
बस अँधेरे दिखाए जाते हैं<br />
जहाँ नहीं है रोशनी की जरूरत<br />
वहीं अग्नि जलाए जाते हैं<br />
पर सत्य यह है अपने घर की रोशनी से<br />
मेहमानों को को खुश कर पाते हैं<br />
तुम अपनी मातृ भाषा हिन्दी को<br />
अपने ही घर में समृद्ध किये जाओ<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी भाषा के लिये किसी का मोहताज न होना]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 14:48:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिन्दी दिवस पर कई लोग बोले
हिन्दी की द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी दिवस पर कई लोग बोले<br />
हिन्दी की दशा बहुत खराब<br />
अंग्रेजी इलाकों एकदम शोचनीय<br />
यह न बताया कि अपने इलाक़े में<br />
कौनसी अंग्रेजी है पूज्यनीय<br />
तुम उठो -बैठो अंग्रेजी के साथ<br />
कौन करेगा हिन्दी में बात<br />
कैसे हो सकती है हिन्दी वंदनीय</p>
<p>------------------------------</p>
<p>एक लेखक ने दूसरे से कहा<br />
'अंग्रेजी इलाक़े में हिन्दी की हालत<br />
बहुत खराब है<br />
चलो कुछ हिन्दी में पोस्टर<br />
चिपकाये आते हैं<br />
लोग आते - जाते पढेंगे<br />
यहाँ तो हमारा लिखा कोई<br />
पढता नही<br />
जब भी देखो फ्लाप हो जाते हैं</p>
<p>दूसरा बोला<br />
'यार, अपने इलाक़े में भी तो<br />
अंग्रेजी की हालत खराब है<br />
पर अंग्रेज कभी पोस्टर चिपकाने<br />
यहाँ नहीं आते हैं<br />
जो चल रही है, जैसी चल रही है<br />
उसकी डोली भी देशी गुलाम<br />
उठाएँ जाते हैं<br />
फिर अच्छा हो कि हम<br />
करें आत्म मंथन<br />
कुछ अच्छा चिन्तन<br />
यहीं के हिट हमें फलेंगे<br />
वह अंग्रेज कभी हिन्दी नहीं समझेंगे<br />
उनकी उम्मीद पर क्यों हम<br />
अपनी आशाओं का आसमान टिकाये जाते हैं</p>
<p>------------------------------------<br />
भाषा का संबंध रोटी से होता है<br />
और रोटी का पेट से<br />
मातृभाषा के प्रचार का प्रयास है व्यर्थ<br />
पूरी दुनियां में फ़ैल रहा है<br />
 बाजारवाद का दर्शन तुम रहना<br />
अपनी गाँठ के पूरे<br />
रखना अपना धन संभालकर<br />
अपनी भाषा के लिये मोह्ताज न होना<br />
तुम्हारी भाषा के लिये जो वह<br />
कर रहे हैं उसमें हैं उनके अर्थ<br />
हिंदी भाषा के शब्दों के अर्थ से नहीं<br />
नजर में हैं हिंदी भाषी की जेब में अर्थ<br />
-------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ यह मौसम पिकनिक का है? ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/13/%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%b8%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Wed, 12 Sep 2007 16:12:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                हिंदी के मूर्धन्य कवियों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">                हिंदी के मूर्धन्य कवियों ने अपनी काव्य रचनाओं में सदैव श्रृंगार रस की चाशनी में डुबोकर अपने लोकप्रिय रचनाएं प्रस्तुत की हैं। उनको पढने वाले लोगों के मस्तिष्क में वर्षा ऋतू की कल्पना इस तरह स्थापित है कि आज के युग में जब विश्व में पर्यावरण प्रदूषण और कम होते वनों की वजह से जो मौसम का मिजाज बिगडा और उसने इस ऋतू में जो नयी तकलीफें भारी गरमी और उमस के रुप में पैदा की हैं उसको झेलते हुए भी वह उसमें खोया रहता है, उसे यह पता ही नहीं कि जिस वर्षा ऋतू में वह यह सब झेल रहा है जिसकी काव्य कल्पनाएं उसके अंतर्मन में कहीँ आज भी हैं वह अब वैसा नहीं रहा जैसे पहले था।</p>
<p>               उस समय  के कवियों ने वर्षा ऋतू में प्रियतम और प्रेयसी के विरह और मिलन पर ही अपने शब्दों सौन्दर्य को इस तरह प्रस्तुत किया है कि उसकी कल्पना हृदय पटल पर अंकित हो जाती है। जबकि हम देखें तो वर्षा ऋतू अब उतनी सुहावनी नहीं रही जितनी उस समय रही होगी जब यह रचनाएँ हुई। कहीँ अगर वर्षा इतनी हो जाती है कि लोग छत पर चढ़कर नील गगन की छाया में अपने प्राण बचाते हैं तो कहीँ नाम को बरसता है और कहीँ तो वह भी नहीं। अख़बार उठाकर देख लें-इस ऋतू में केवल बाढ़ और कम वर्षा और अवर्षा की खबरों से पटे मिलेंगे।बाकी सब तो ठीक है पर गड़बड़ यह हुई कि हिंदी पढने वालों को यह ऋतू इतनी भाती है कि बस वह इसे इन्जोय करना चाहते हैं।</p>
<p align="justify">          कवियों ने तो प्रियतम और प्रियतमा के विरह और मिलन पर सावन को हरा किया और भादों को सुखाया पर पाठक लोग हर आयु में इसे सुन्दर मानते हुए इसमें आनन्द उठाते हैं।अब जिसे प्यार होगा उसे भला भूख और प्यास से क्या लेना देना? इसलिये न कवियों ने उन्हें खिलाया और न कहीँ पिकनिक पर भेजा। थोडा बहुत इधर-उधर दौडाया और कर दीं अपनी रचना । उस पर फिर इन फिल्म वालों ने भी कम नहीं किया।</p>
<p align="justify">          लोग हिंदी पढने से छूटे तो फिल्म के रंग में रंग गये और हो गयी पूरी वर्ष ऋतू सुहावनी। कई लोग जिन्होंने अपनी युवावस्था में पिकनिक न मनाई न सोचा अब पिकनिक पर निकलने लगे हैं। जब पिकनिक पर जाएँगे तो अनाप-शनाप खाएंगे ही तो पेट बिगडेगा। फिर कुछ युवक पीने-पिलाने में भी लिप्त हो जाते हैं। सब ठीक अगर वर्षा वैसी हो तो जैसी कवियों ने चित्रित की है। वह नहीं होता। और पिकनिक कभी कभी तकलीफ देह भी हो जाती है।</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">                वर्षा ऋतू में हमारे पुराने विज्ञानं के अनुसार ज्यादा घूमना नहीं चाहिऐ। हालांकि कहा जाता है कि पहले पक्की सड़कें नहीं थी इसलिये यह नियम बनाया गया है पर सड़कें अब कौनसी दिखाई देती हैं और कहीँ तो रेल कि पटरियाँ भी डूब जाती हैं। ऐसे में कैसे कहा जाये कि केवल इसी वजह से उन्होने वर्षा ऋतू में पर्यटन को वर्जित किया था। तब हमारे साधूसंत पर्यटन बंद कर देते थे। भारतीय विज्ञानं के अनुसार इस मौसम में खाना भी कम पचता है , इसलिये खाना कम चाहिए। मगर नहीं साहब लोग इसी मौसम में ही अपने पेट से ज्यादा अत्याचार करते हैं। परिणाम स्वरूप आजकल के डॉक्टर इस ऋतू का इतना इन्तजार करते हैं कि प्रीतम और प्रेयसी भी नहीं करते होंगे।</p>
<p align="justify">           इस मौसम मैं ऐक-दो बिमारी ऎसी जरूर फैलती है जिसका नाम पहले नहीं सुना होता और पिछले साल तो हमने अपने शहर में ऐसा कोई घर नहीं देखा जहां का कोई आदमी बीमार न पडा हो। हमारा घर शहर से दूर कालोनी में है इसलिये वहां इसकी चर्चा नहीं थी। हालत यह हुई कि लोगों कि वर्षा ऋतू में मस्ती हुई हो या न हो पर ढंग से दिवाली किसी कि नहीं मनी।मुझे सबसे ज्यादा वह दिन बुरा लगता है जिस दिन किसी पिकनिक पर जाना होता है। मुझे आज तक कोई ऎसी पिकनिक याद नहीं जिसका वास्तविक रुप से मैंने आनन्द लिया हो। अधिकतर पिकनिक सामूहिक होती हैं और उनमें केवल इसलिये जाना पड़ता है क्योंकि हमारा वहां या तो अपना चन्दा किसी न किसी रुप से दिया होता है या ऐसी मित्र मंडली रहती है जिसके दबाव का सामना नहीं कर पाते। पिकनिक का जब कार्यक्रम दस -पन्द्रह दिन पहले बनता है तब मौसम अगर अच्छा न हो तो लोग कहते है कि तब तक तो बरसात बहुत हो जायेगी और इतनी गरमी नहीं होगी और अच्छा होता है तो कहते हैं कि अब तो मौसम भी अच्छा हो गया।</p>
<p align="justify">            जिस दिन पिकनिक हुई है उस दिन तो बस! उस मौसम का वर्णन किसी कवि ने नहीं किया है। सुबह तो सब ठीक लगता है पर जैसे सूर्य की किरणों में तीव्रता आती है वैसे ही जो उमस पड़ती हैं और वह असहनीय कष्ट देती है,वहां लोग बैठ नहाते हैं और उससे फिर उमस होती है तो चीत्कार करते हुए मौसम को गाली देते हैं। कुछ लोग पीते हैं मतलब सब काम उल्टे ही होते हैं। बारह बजे नाश्ता और फिर चार बजे खाना। मतलब जिस मौसम में शरीर को संभालकर चलना चाहिऐ उसी मौसम में सबसे ज्यादा खिलवाड़ लोग करते हैं। इस मौसम में वैसे ही आदमी को मानसिक संताप होता है और उसे जहाँ शांत होना चाहिये वहीँ वह अपनी खुशहाली के लिए आक्रामक हो जाता है। पिकनिक के दौरान नहाते हुए डूबने की घटनाएँ इसलिये भी होती हैं।</p>
<p align="justify">            मेरी जान -पहचान के लोगों में ही ऎसे कम से कम पन्द्रह प्रकरण तो मैं देख चुका हूँ। पिकनिक से जहां मन में प्रसन्नता का भाव लेकर लौटना चाहिऐ वहां से अगर थकावट लेकर लौटे तो फायदा ही क्या?मैं अपने पुराने विद्वानों की मान्यताओं को बहुत महत्व देने लगा हूँ-क्योंकि इस मौसम में अपने शरीर से अगर ज्यादा काम लेने का प्रयास किया तो और आराम किया तो भी वही हालत होगी, ऐसे में कोशिश यही करता हूँ कि इस मौसम में सबसे ज्यादा शारीरिक और मानसिक सतर्कता बरती जाये। भला यह भी क्या बात हुई कि पिकनिक पर ताश खेलते जाएँ और शरीर से इतना पसीना निकले कि उससे पोंछने वाले रुमाल तक इस क़दर भीग जाएँ कि उन्हें निचोडो तो वह पसीना ऐसे निकले जैसे नल बह रहा हो।</p>
<p align="justify">              हालांकि जिन कवियों ने सुन्दर शब्द और व्यल्रण से इस ऋतू को सजाया है उसमें कोई कमी नहीं है पर वह लोग ऐसी पिकनिक नहीं मनाने जाते थे न पीकर जल समूहों में डुबकी लगाते थे। अगर वह ऐसा करते तो ऐसी उत्कृष्ट कवितायेँ नही लिख सकते थे। उन्होने तो लिखकर ख़ूब आनन्द उठाया पर उन्हें पढने वालों का अब वर्षा ऋतू का ऐसा सुहावना मौसम नहीं मिल सकता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हीरो और क्लर्क ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/12/%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Wed, 12 Sep 2007