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	<title>hindi-writing &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-writing/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-writing"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:05:20 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मनुस्मृतिःबिना मांगे मिली वस्तु ही अमृत समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 04:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।<br />
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।<br />
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।<br />
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।<br />
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।<br />
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है।<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःसफलता के मद में उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करना वर्जित]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 04:06:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से पहले उसका महत्व समझ लेना चाहिए। अपना काम प्रारंभ करने से पहले पूरी तरह सूच विचार करना ठीक है। उतावली से कोई भी काम आरंभ नहीं करना चाहिए।<br />
2.घैर्यवान मनुष्य क लिए यह उचित है कि पहले अपने कर्म का उद्देश्य, संभावित परिणाम तथा  उससे होने वाले लाभ से अपने जीवन के विकास का विचार कर कार्य प्रारंभ करे।<br />
3.जो मनुष्य अपनी स्थिति, लाभ,हानि, धन, देश तथा दण्ड का विचार नहीं कर सकता वह कभी अपने जीवन में स्थिर नहीं रह सकता।<br />
4जो मनुष्य उपलब्ध तथ्यों के प्रमाण को सही तरह से जानता है और धर्म अर्थ का जिसे पूर्ण ज्ञान है वही दत्त चित होकर अपना कार्य कर पाता है और विकास की तरफ बढ़ता है।<br />
5.जिसे सफलता प्राप्त हो गयी है उसे अगर गर्व में चूर होकर किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार सपंत्ति तथा उपलब्धि को नष्ट कर देता है जैसे सुंदरता को बुढ़ापा<br />
................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका </a>पर लिखा गया पाठ है।<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःमैले वस्त्रों से स्त्री की रक्षा होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:03:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्रियों के पति बंधु और पति और विद्वानों का रक्षक ज्ञान होता है।<br />
2.सत्य से धर्म, योग से विद्या और सफाई से सुंदर रूप और सदाचार से कुल की रक्षा होती है<br />
3.तोलने से अनाज, फेरने से घोड़े, निरंतर देखभाल से गौऔं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।<br />
4.सदाचार से हीन मनुष्य का कुल ऊंचा हो तो भी उसे प्रतिष्ठित नहीं माना जा सकता है।<br />
5.जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य तथा प्रतिष्ठा से द्वेष करता है उसके रोग का कोई इलाज नहीं होता है।<br />
6.न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद या आलस्य करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही अपना मंत्र प्रकट हो जाने से बचना चाहिए और ऐसे किसी पेय का सेवन नहीं करें जिसे नशा चढ़ता हो।</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">"दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका"</a> पर लिखी गयी है। इसका पता इस प्रकार है। http://rajdpk.wordpress.com<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक: परिवर्तन तो संसार का नियम है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=174</link>
<pubDate>Sat, 19 Jul 2008 01:31:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=174</guid>
<description><![CDATA[परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते<br />
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्<br />
हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के भय से। कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उनके मुखिया उपयोग करते हैं।कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहंा जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा। </p>
<p>ऐसे भाव लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मान लेना चाहिए कि परिवर्तन आयेगा। आज हम जहां हैं वहां कल कोई अन्य व्यक्ति आयेगा। जहां हम आज हैं वह पहले कोई अन्य था। कई परिवर्तनों की अनुभूति तो हमें हो ही नहीं पाती। बचपन के मित्र युवावस्था में नहीं होते। युवावस्था के मित्र नौकरी में साथ नहीं होते। इस संसार में समय का चक्र घूमता है और उसमें परिवर्तन तो होते ही रहना है और हमें उनको दृष्टा होकर देखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 04:50:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</guid>
<description><![CDATA[भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर  के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं। </p>
<p>योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है।  अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते  हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये। </p>
<p>इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।<br />
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।<br />
...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःभक्ति एकांत तथा अध्ययन समूह में करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 04:06:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</guid>
<description><![CDATA[1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, शक्ति से राज्य तथा गुणवान पत्नी से घर की रक्षा होती है।<br />
2.वासना इस संसार का सबसे बड़ा रोग है। वासना से मनुष्य का शरीर अंदर ही अंदर से खोखला होने के साथ बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है।<br />
3.क्रोध एक तरह से अग्नि है जो पूरे संसार को जलाकर राख कर देती है। यह इंसान का पूरी तरह विनाश करता है।<br />
4.जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है वह हमेशा सुखी रहेगा।<br />
5.बुद्धिमान और ज्ञानी स्वर्ग, चोर अपने जीवन और भोगी विलासी मनुष्य सुंदर स्त्री की कामना करते हैं।<br />
6.समुद्र के लिये जिस तरह वर्षा होना या न होना बराबर है उसी तरह जिसका पेट भरा है उसके लिये उत्तम से उत्तम भोजन व्यर्थ है।<br />
7.तपस्या, भक्ति. पूजा तथा साधना हमेशा एकांत में करना चाहिए जबकि विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से अध्ययन करना चाहिए। उसी तरह गायक समूह गान गायें तो प्रभावित करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-सूर्य के सामने दीपक क्या करेगा?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Wed, 16 Jul 2008 04:03:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर सकता है? अमीर आदमी को दान देने से क्या लाभ? जिसके पास पर्याप्त मात्रा में धन हो उसके सामने दान दी गयी वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। दान सदैव निर्धन को दिया जाना चहिए।<br />
2.निर्धन सदा धन की तलाश में भटकते हैं, उनके हृदय में सद धनी बनने की आकांक्षा बनी रहती है<br />
3.प्रत्येक मनुष्य की यह इच्छा रहती है कि वह मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करे। अपनी पूरी आयु इसी इच्छा की पूर्ति में नष्ट कर देता है। सभी इंसान अपनी इच्छाओं के दास बनकर रहे गये हैं।</strong></p></blockquote>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>हमारे देश के लोगों में  दान की प्रवृत्ति जन्मजात रहती है। सामान्य आदमी हमेशा थोड़ा बहुत दान करता है पर यह दान अधिकतर कुपात्रों को मिलता है-यह दान उन भिखारियों को मिलता है जो अधिकतर मंदिरों के बाहर खड़े होते हैं और उनकी यह आदत होती है न कि बाध्यता। इसके अलावा उन तथाकथित गुरुओं और संतों को मिलता है जिनके लिये भक्ति और ज्ञान बेचना एक व्यवसाय है। वह इस धन से तमाम तरह के आश्रम बना लेते हैं और फिर उनका उपयोग भी व्यवसायिक ढंग से धर्म के नाम पर ही करते हैं। </p>
<p>ऐसे अनेक किस्से आते हैं कि अमुक भिखारी मरा तो उसके घर से ढेर सारा धन बरामद हुए। कई लोग तो अच्छा खासा परिवार होते हुए भी भीख मांगते हैं क्योंकि यह एक आदत है जिसे पड़ जाये वह छूटती नहीं है। अतः दान हमेशा ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। वह मांगता न हो पर उसकी आवश्यकता हमारी दृष्टि में आ जाये तो उसकी सहायता करना चाहिए। यह सहायता इस तरह करना चाहिए जैसे कि उसे न लगे कि हम दान कर रहे हैं। यही सच्चा दान है। मांगने पर यह बताकर दान करने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपशुओं  की टांग खाने पर दवा भी लेनी पड़ती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 04:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है कि लोग तो  भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-</strong>वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।</p>
<p>आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिये लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान  कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। हृदय से भक्ति करने के लाभ होते हैं यह अब विज्ञान भी मानने लगा है। भजन भक्ति करते हुए आदमी सांसरिक विषयों से अपने मस्तिष्क को मुक्त कर लेता है और इस कारण उसका शुद्धिकरण हो जाता है। ध्यान को मन खुश करने के लिये एक बहुत बड़ा साधन माना गया है। अगर भगवान का नाम हृदय से स्मरण किया जाये तो अनेक विकार स्वतः परे जायेंगे, इसमें संशय नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 01:17:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल<br />
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।</p>
<p><strong>पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय<br />
वह अक्षर इनमे नहीं हंसि दे भावे रोय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये। </p>
<p>अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए। जब तक मनुष्य को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है तब तक वह गुलामों की भांति विषयों के पीछे भागता है और धन, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठित लोगों की चाटुकारित का अपने का धन्य समझने लगता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:47:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर
श्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर<br />
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप </p>
<p>other web pege<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम तो स्वार्थ का होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:02:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं<br />
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है। </p>
<p>आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःहमारे शरीर में विपत्तियां सहने की क्षमता होती है अधिक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 04:48:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह<br />
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है। </p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।</p>
<p>मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया? </p>
<p>इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:परमात्मा का महत्व स्वीकार करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 05:38:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक</p>
<p>दांत दिखावत दीन है, चलत घिसावत नाक</strong> </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की हाथी के समान किसी में शक्ति नहीं है परन्तु वह भी परमात्मा के महत्त्व को स्वीकार करता है और दोनों दंत दिखाता हुआ पृथ्वी पर नाक रगड़कर चलता है।</p>
<p><strong>रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत</p>
<p>चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की कठोर चिंताओं के से अपने को मुक्त कर अपने चित पर नियंत्रण करो क्योंकि चिता तो प्राणहीन प्राणी को जलाकर राख कर देती है परन्तु चिंता तो जिंदा प्राणी को ही जलाकर भस्म कर देती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>कई लोगों अपने देहाभिमान के साथ अपने दौलत का भी अहंकार होता है और वह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इसके अलावा कुछ लोग भगवान की भक्ति तो करते हैं पर मन में उसके प्रति विश्वास का भाव नहीं होता। भक्ति करने के बाद अपनी दिनचर्या में ऐसे लिप्त हो जाते हैं जैसे कि वह स्वयं ही कर्ता हों। उनकी मान्यता यह है कि ईश्वर ने हाथ पांव दिये हैं बुद्धि दी है तो कर्म तो हमें ही करना है तभी तो फल मिलेगा। यह विचार दर्शाता है कि उनमें ईश्वर के प्रति विश्वास नहीं है। कर्म करना है यह सत्य पर अपने अंदर यह विश्वास भी बनाये रखना है कि दाता तो वही परमात्मा है। कोई अमीर हो या गरीब काम सबके हो जाते हैं पर भ्रम यह रहता है कि अमीर पर भगवान की कृपा है और गरीब पर नहीं। यह भाव भक्ति से परे करता है क्योंकि इससे अहंकार और कुंठा का भाव पैदा होता है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:बन्दर की तरह उछलकूद कर जनसेवा करने वालों से सावधान रहें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=148</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:24:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=148</guid>
<description><![CDATA[
बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="deleteBody">
<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि<br />
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong> आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। यह तो केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।</p>
<p>समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।</p>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे:समय छोटे आदमी को भी बड़ा बना देता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 04:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख<br />
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।<br />
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रसन्नता देने वाले को कुछ न देने वाले पशु समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 03:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत<br />
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।<br />
<strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं। कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 02:56:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>

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