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	<title>hindi-web &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-web"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:03:52 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 16:31:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</guid>
<description><![CDATA[वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो  गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’<br />
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों के बीच खाने का सामान बांट रहा था और उसे लेकर वही भिखारी भी खा रहा था।<br />
लेखक ने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-‘खाना तो मिला नहीं। अब चाय पीकर ही काम चलाऊंगा।<br />
वह हाथ फैलाये उसके सामने खड़ा था। लेखक ने उससे कहा-‘मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा, पर इससे पहले तुम्हं साक्षात्कार देना होगा। आओ मेरे साथ!<br />
थोड़ी दूर जाकर उस लेखक ने उससे पूछा-‘तुम्हारे घर में क्या तुम अकेले हो।’<br />
भिखारी-‘‘नही! मुझे दो लड़के हैं और दो लडकियां हैं। सबका ब्याह हो गया है।’<br />
लेखक-‘फिर तुम भीख क्यों मांगते हो? क्या तुम्हारे लड़के कमाते नहीं हैं।<br />
भिखारी-‘बहुत अच्छा कमाते हैं, पर आजकल बाप को कौन पूछता है? मेरे को सूखी रोटी देते हैं और मैं चिकनी चुपड़ी और माल खाने वाला आदमी हूं।’<br />
लेखक-‘इस उमर में वैसे भी कम चिकनाई खाना चाहिए। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। डाक्टर लोग यही कहते हैं।<br />
भिखारी-‘वह तो सेठों के लिये कहते हैं भिखारियों के लिये नहीं।<br />
लेखक-‘मंदिर में अंदर जाते हो।<br />
भिखारी-‘मंदिर के अंदर हमें आने भी नहीं देते और न हम जाते। हम तो बाहर भक्तों के दर्शन ही कर लेते हैं। भगवान ने कहा भी है कि मेरे से बड़े तो मेरे भक्त हैं।<br />
लेखक-‘रहते कहां हो?<br />
भिखारी-‘एक दयालू सज्जन ने हम भिखारियों के लिये एक मकान किराये पर ले रखा है। उसमें वही किराया भरता है।’<br />
लेखक-‘तुम्हारे लड़के तुम्हें नहीं रखते।’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a> पर मूल रूप से प्रकाशित है। इसके प्रकाशन के लिये अन्य कहीं अनुमति प्रदान नहीं की गयी है।<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>भिखारी-‘वह तो मिन्नतें करते हैं पर वहां कौन उनकी चिकचिक सुनेगा।  मैं तो बचपन से ही आजाद रहने वाला आदमी हूं।  वह क्या खिलायेंगे मुझे? मैंने खाने के मामले में बाप की परवाह नहीं की। वह भी सूखी खिलाता था पर बाहर मुझे भीख मांगने पर जो खाने का मिलता था वह बहुत अच्छा होता था।’<br />
लेखक-‘बचपन से भीख मांग रहे हो। बच्चों की शादी भी भीख मांगते हुए करवाई।<br />
भिखारी-‘नहीं! पहले तो मेरा बाप ही मेरे परिवार को पालता रहा। फिर बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो नौकरी कर वही काम चलाते रहे। मैं अपनी बीबी के लिये ही कुछ सामान घर ले जाता हूं। वह बच्चों के पास ही रहती है। आजकल की औलादें ऐसी हैं उसकी बिल्कुल इज्जत नहीं करतीं। मैं सहन नहीं कर सकता।’<br />
लेखक-तुम्हें भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती।’<br />
भिखारी ने कहा-‘जिसने की शर्म उसकी फूटे कर्म।’<br />
लेखक उसको  घूर कर देख रहा था! अचानक उसने पीछे से आवाज आई-‘बाबूजी, इससे क्या बहस कर रहे हो। भीख मांगना एक आदत है जिसे लग जाये तो फिर नहीं छूटती। कोई मजबूरी में भीख नहीं मांगता। जुबान का चस्का ही भिखारी बना देता है।’<br />
लेखक ने देखा कि थोड़ी दूर ही एक बुढि़या भिखारिन पुरानी चादर बिछाये बैठी थी। उसके पास एक लाठी रखी थी और सामने एक कटोरी । उसके पास रखी पन्नी में कुछ खाने का सामान रखा हुआ था जो शायद दानी भक्त दे गये थे और वह अभी खा नहीं रही थी।<br />
लेखक ने उस भिखारी को दस रुपये दिये और फिर जाने लगा तो वह भिखारिन बोली-‘बाबूजी! कुछ हमको भी दे जाओ। भगवान के नाम पर हमें भी कुछ दे जाओ।’<br />
लेखक ने पांच रुपये उसके हाथ में दे दिये और अपने होठों में बुदबुदाने लगा-‘भीख मांगना मजबूरी नहीं आदत होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम अच्छा हो तो घर पर ही मन जाती है पिकनिक -व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 15:16:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</guid>
<description><![CDATA[ अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया हूं पर कहीं से भी प्रसन्न मन के साथ नहीं लौटा। वजह यह कि बरसात का मौसम चाहे कितना भी सुहाना क्यों न हो अगर दोपहर में पानी नहीं बरस रहा तो विकट गर्मी और उमस अच्छे खासे आदमी  को बीमार बना देती है।<br />
वैसे अधिकतर पिकनिक के कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित होते हैं और उनको उस समय बनाया जाता है जब बरसात हो रही होती है। जिस दिन पिकनिक होती है पता लगा कि बरसात ने मूंह फेर लिया और सूर्य नारायण भी धरती के लालों को पिकनिक बनाते हुए  देखने के लिये विराट रूप में प्रकट हो जाते हैं। वह कितने भी स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखें पर उनका स्परूप दोपहर में विकट होता है। ऐसे में पसीने से तरबतर होते हुए जबरन खुश होने का प्रयास करना बहुत कठिन होता है।</p>
<p>आखिर मैं क्यों इन पिकनिकों पर क्या जाता हूं? होता यह है कि कई लोग तो ऐसे हैं जो वर्ष में एक बार इस बहाने मिल जाते हैं। दूसरा यह कि कई संगठनों और समूहों में मै। इस तरह  सदस्य हूं  कि हमारा पिकनिक का पैसा स्वतः ही जमा हो जाता है और भरना हो हमें होता ही है। सो चले जाते हैं<br />
अब उस दिन भाई लोग भी जबरन पिकनिक मनाते हैं। वहां साथी और मित्र  नहायेंगें, शराब पियेंगे और कभी कभार जुआ खेलेंगे। कहते यही हैं कि ‘ऐसे ही एंजोय(यही शब्द उपयोग वह करते हैं) किया जाता है।’<br />
नाश्ता और खाना होता है। नाश्ता दोपहर में तो भोजन शाम को होता है। हम तो बातचीत करते हैं पर लगता है कि ऐसी जगहों पर शराब और नहाने से परहेज होने के कारण हम अकेले पड़ जाते हैं और फिर वहां अपने जैसे ही लोगों के साथ बतियाते हैं। खाना खाकर शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग में लौट कर आये। आखिर अपने आपसे ही पूछते हैं कि‘ फिर हम पिकनिक मनाने गये ही क्यों थे?’</p>
<p>एक बार नहीं कई बार ऐसा हुआ हैं। इन्हीं दिनों में कई लोगों के जलाशयों में डूब जाने के समाचार आते हैं और कहीं कहीं तो चार-चार लोगों के समूह जलसमाधि ले लेते हैं और फिर उनके परिवारों का विलाप कष्टकारक होता ही। अभी तक मैं जिन पिकनिक में गया हूं वहां कहीं ऐसा हादसा नहीं हुआ पर अपने चार मित्रों की ऐसी ही हृदय विदारक घटना में जान जा चुकी है। उनको याद कर मन में खिन्नता का भाव आ जाता है। </p>
<p>यह मौसम  पिकनिक का मुझे कतई नहीं लगता पर लोग बरसात होते ही जलाशयों की तरफ देखना शूरू कर देते हैं। अक्सर सोचता हूं कि यह पिकनिक की परंपरा शूरू हुई कैसे? अगर हम अपने पुराने विद्वानों की बात माने तो उन्होंने इस मौसम में अपने मूल स्थान से की अन्यत्र जाना निषिद्ध माना है। इस नियम का पालन सामान्य आदमी ही नहीं बल्कि राजा, महाराजा और साधू संत तक करते थे। व्यापारी दूर देश में व्यापार, राजा किसी दूसरे देश पर आक्रमण और साधु संत कहीं धर्मप्रचार के लिये नहीं जाते थे। कहते हैं कि उस समय सड़कें नहीं थी इसलिये ऐसा किया जाता था पर मुझे लगता है कि यह अकेला कारण नहीं था जिसकी वजह से पारगमन को निषिद्ध किया गया। </p>
<p>इस समय आदमी मनस्थिति भी बहुत खराब होती है और सड़क कितनी भी साफ सुथरी हो उमस के माहौल में एक अजीबोगरीब बैचेनी शरीर में रहती है। बहुत पहले एक बार एक पिकनिक में मुझे एक दोस्त ने एक पैग शराब पीने को प्रेरित किया तो मैंने सोचा चलो लेते हैं।  उस दिन  मैंे नहाने की जलाशय में उतरा। मुझे तो बिल्कुल मजा नहीं आया। जब बाहर निकला तो तुरंत पसीना निकलने लगा। घर लौटते हुए ऐसा लग रहा था कि बीमार हो गया हूं।<br />
जलाशयों में उतरने पर एक तो ऊपर की गर्मी और फिर पानी के थपेड़े किसी भी स्वस्थ आदमी को विचलित कर सकते हैं यह मेरा अनुभव है पर लोगों में अति आत्मविश्वास होता है और फिर कुछ लोगों को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है।<br />
आजकल बरसात जमकर हो रही है तो शायद कई लोगों को ऐसा नहीं लगता होगा पर अगर ठंडी हवाओं का आनंद तो कहीं भी लिया जा सकता है। उस दिन सुबह मैं योग साधना कर रहा  था तो कड़े आसनो के बाद भी मुझे पसीना नहीं आया तब मुझे आभास हुआ कि  मौसम अच्छा है। प्राणायम करते हुए नाक के द्वारा अंदर जाती शीतल हवा ऐसा सुखद आभास देती थी कि उसके भाव को व्यक्त करने के  लिये मेरे पास शब्द ही नहीं है। वैसे भी योगसाधना के समय मौसम के अच्छे बुरे होने की तरफ मेरा ध्यान कम ही जाता है।</p>
<p>वहां से निवृत होकर मैं नहाया और फिर अपने नियमित अध्यात्मिक कार्यक्रम के बाद मैंने चाय पी। उस समय घर में बिजली नहीं थी। इसलिये मैं बाहर निकला। बाहर आते ही मैंने देखा कि  आसमान में बादल थे और शीतल हवा बह रही थी। उस सुखद अनुभूति से मेरा मन खिल उठाा और  शरीर में एक प्रसन्नता के भाव का संचार हुआ। तब मैं सोच रहा था कि ‘क्या पिकनिक के लिये इससे कोई बढि़या जगह हो सकती है।’<br />
मैने साइकिल उठाई और अपने घर से थोड़ी देर एक मंदिर में पहुंच कर ध्यान लगाने लगा। मंदिर के आसपास पेड़ और पौघों की हरियाली और शीतल पवन का जो अहसास हुआ तो मुझे नहीं लगा कि कभी किसी पिकनिक में ऐसा हुआ होगा।  उसी दिन एक मित्र का फोन आया कि‘पिकनिक चलोगे?’<br />
उसने पांच दिन आगे की तारीख बताई तो मैंने उससे कहा-‘अगर मौसम अच्छा रहा तो मेरे आसपास अनेक पिकनिक मनाने वाली जगह हंै वहीं जाकर मना लूंगा और अगर उस दिन खराब रहा तो कहीं भी सुखद अहसास नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।’</p>
<p>हमारे अनेक कवियों ने वर्षा पर श्रृंगाार रस से भरपूर रचनाएं कीं पर किसी ने पिकनिक का बखान नहीं किया। सच भी है कि अगर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। ऐसी पिकनिक मनाने से क्या फायदा जो बाद में मानसिक संताप में बदलती हो। घर आकर यह सोचते हों कि‘आज का समय व्यर्थ ही गंवाया’। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 14:01:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</guid>
<description><![CDATA[गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/20r4vw6.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की<br />
तरह सजाये जाते<br />
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते<br />
देखने वाले भी कान बंद कर<br />
आंखों से देखने की बजाय<br />
उससे लेते हैं सुनने का काम<br />
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख<br />
फिल्म का आनंद उठाये जाते<br />
किसे समझायें कि<br />
भक्ति हो या संगीत<br />
एकांत में ही देते हैं आनंद<br />
शोर में तो अपने लिये ही<br />
जुटाते हैं तनाव<br />
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ<br />
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद<br />
जैसे हम उठाते<br />
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर<br />
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते<br />
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं<br />
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं<br />
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही<br />
सब कुछ खत्म हो जाता है<br />
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब<br />
वह दिल में बस जाते<br />
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते<br />
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिंतन शिविर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 16:42:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</guid>
<description><![CDATA[
अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>अपने संगठन का चिंतन शिविर<br />
उन्होंने किसी मैदान की बजाय<br />
अब एक होटल में लगाया<br />
जहां सभी ने मिलकर<br />
अपना समय अपने संगठन के लिये<br />
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया<br />
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का<br />
एक आदर्श बयान आया<br />
तब एक सदस्य ने कहा<br />
-‘कितना आराम है यहां<br />
खुले में बैठकर<br />
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी<br />
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी<br />
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ<br />
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 15:39:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</guid>
<description><![CDATA[हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर इंसान के दिल की पसंद अमन है<br />
पर दुनियां के सौदागरों के लिये<br />
इंसान भी एक शय होता<br />
जिसके जज्बातों पर कब्जा<br />
होने पर ही सौदा कोई तय होता<br />
बिकता है इंसान तभी बाजार में<br />
जब उसके ख्याल दफन होते<br />
अपने ही दिमाग की मजार में<br />
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता<br />
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता<br />
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा<br />
जब उसके दिल में कभी भय होता<br />
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता </p>
<p>चाहते हैं अपने लिये सभी अमन<br />
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं<br />
इसलिये ही सौदागर रोज<br />
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल<br />
बेचने बाजार आते हैं<br />
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ<br />
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ<br />
सब जगह खुशहाली होती<br />
तो सौदागरों की बदहाली होती<br />
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में<br />
हमेशा खौफ का समय होता </p>
<p>बंद कर दो जंग पर बहलना<br />
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना<br />
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ<br />
वह भी बाकी चीजों की तरह<br />
पुराने हो जायेंगे<br />
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर<br />
रोज चले आयेंगे<br />
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते<br />
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश<br />
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी<br />
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता<br />
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये<br />
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये<br />
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता<br />
......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्याल तो हैं जलचर की तरह-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=191</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 12:35:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=191</guid>
<description><![CDATA[
मन का समंदर है गहरा
जहां ख्याल तैरते ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मन का समंदर है गहरा<br />
जहां ख्याल तैरते हैं जलचर की तरह<br />
कुछ मछलियां सुंदर लगती हैं<br />
कुछ लगते हैं खौफनाक मगरमच्छ की तरह</p>
<p>देखने का अपना अपना नजरिया है<br />
मोहब्बत हर शय को खूबसूरत बना देती है<br />
नफरत से फूल भी चुभते हैं कांटे की तरह<br />
इस चमन में बहती है कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा<br />
मन जैसा चाहे नाचे या चीखे<br />
नहीं उसके दर्द की दवा<br />
न एक जगह ठहरते<br />
न एक जैसा रूप धरते<br />
ख्याल तो हैं बहते जलचर की तरह<br />
................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
<p>othrer web pege</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com<br />
http://anantraj.blogspot.com<br />
http://deepkraj.blogspot.com<br />
http://terahdeep.blogspot.com<br />
http://rajlekh.blogspot.com<br />
http://zeedipak.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पाठ का इतना हिट होना मेरे लिये विस्मय का विषय-आलेख]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=189</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 14:30:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=189</guid>
<description><![CDATA[मुझे विस्मय इस बात का है कि कबीरदास जी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे विस्मय इस बात का है कि कबीरदास जी के मात्र दोहे और उनका अनुवाद  प्रस्तुत करने वाले <a href="http://dpkraj.wordpress.com/2008/01/18/man-ke-kalpna-maya-ke-vistar-tak/">उस पाठ पर</a>   पाठकों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। कल उस पर चालीस व्यूज थे। मैंने पाठकों के आने का मार्ग देखा तो पाया कि गूगल के अनुवाद टूल पर अंग्रेजी में पढ़ी गयी थी। दोहे उसमें सही नहीं आ रहे थे।  यह पाठ  मात्र चार दिनों में ही ढाई सौ से अधिक व्यूज जुटा चुका है।</p>
<p>मैंने कबीरदास के इतने दोहे अनुवाद कर प्रकाशित किये कुछ पर अपनी  सीमित बुद्धि से व्याख्याएं लिखी हैं कि उनकी संख्या का अनुमान मुझे भी नहीं है। यह पाठ मैंने उन दिनों लिखा था जब मैं यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखता था और इस कारण सुबह अपनी व्याख्या लिखने का मेरे पास समय नहीं होता था। इस बात का उल्लेख करना ठीक रहेगा कि आजकल इस ब्लाग/पत्रिका पर मैं सामान्य आलेख और कवितायें ही लिखता हूं पर यह पाठ जिस तरह पढ़ा जा रहा है उससे मुझे हैरानी है। एक ने तो नारे में रूप में लिखा है कि हम तो कबीर के दोहे पढ़ना चाहते हैं। हालत यह है कि मेरे नये पाठ जितने व्यूज जुटाते हैं उससे तीन गुना तो यही पाठक जुटा रहा है।</p>
<p>लगता है कि कहीं हिंदी अंग्रेजी टूल के प्रयोग के लिये इसका चयन तो नहीं किया गया कि जिससे सभी प्रकार के दोहे भी अंग्रेजी में अनुवाद हो सकें और इसे देखा जा रहा हो। वैसे इस बीच मुझे यह लग रहा है कि शायद हिंदी अंग्रेजी टूल हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने में थोड़ा सुधार लिया गया है। आजकल वर्डप्रेस के शीर्षक में अंग्रेजी टूल से अनुवाद कर देखता हूं तो ठीकठाक दिखते हैं। मैंने एक अंग्रेजी के जानकार से इसकी पुष्टि भी करवाई थी। हां, अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद ठीक नहीं लगा रहा पर एक बार अगर हिंदी अनुवाद देखकर अंग्रेजी को पढ़ा जाये तो समझने में सुविधा तो होती है।<br />
जिस पाठ की मैं चर्चा कर रहा हूं  एक सामान्य पाठ है और कबीरदास जी के दोहों से तो मेरे अनेक ब्लाग भरे पड़े हैं। ऐसे में इस पाठ के लिये इतना आकर्षण क्यों दिखाई दे रहा है? हालांकि यह दोनों दोहे जीवन के रहस्य को समेटे हुए हैं पर कबीरदास जी के तो अनेक दोहे इसी प्रकार के हैं। कभी कभी तो लगता है कि  अब मुझे अन्य कुछ लिखने की आवश्यकता ही नहीं या दोहे ही शायद मुझे वह ख्याति दिलवा देंगे जिसकी कल्पना मैंने नहीं की है। हालांकि यह मजाक लगता है पर जिस तरह यह पाठ पढ़ा जा रहा है उससे देखकर कोई भी यह कह सकता है। यह क्रम चल रहा है देखना है कब तक चलता है और इसका रहस्य क्या है? यह मेरे लिये दिलचस्पी का विषय बना हुआ है। यह पाठ अभी तक 1115 बार पढ़ा जा चुका है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=188</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 15:07:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=188</guid>
<description><![CDATA[यूं तो चमकता चाँद देखकर
अपना दिल बहला ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो चमकता चाँद देखकर<br />
अपना दिल बहला लेते<br />
पर जब आकाश में नहीं दिखता वह<br />
छोटा चिराग जला लेते हैं<br />
जिन्दगी में अपने<br />
रौशनी के लिए क्यों<br />
किसी एक के आसरे रहें<br />
इसलिए कई इंतजाम  कर लेते हैं<br />
इंसानों का भी क्या भरोसा<br />
उजियाले में करते हैं<br />
हमेशा साथ निभाने का<br />
अँधेरा ही होते मुहँ फेर लेते हैं<br />
---------------------------------------<br />
मांगी थी उनसे कुछ पल के लिए रौशनी उधार<br />
उन्होंने अपना चिराग ही बुझा दिया<br />
हमारा रौशनी में रहना<br />
उनको कबूल नहीं था<br />
अँधेरे को अपने पास इसलिए बुला लिया<br />
इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते यह बता दिया<br />
------------------------<br />
दीपक भारतदीप   </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेजान चीजों की नीलामी, जिंदगी की नीलामी नहीं होती-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=187</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 16:35:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=187</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू तुम्हा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू तुम्हारे हिट होने का<br />
एक नुस्खा लाया हूं<br />
सफलता बतलाने वाले डाक्टर से<br />
सलाह कर आया हूंं<br />
लोग कर रहे हैं अंतर्जाल पर<br />
अपनी जिंदगी नीलाम<br />
बेच रहे अपनी संपत्ति<br />
तुम भी अपने ब्लाग के साथ<br />
यही करो अनोखा  काम<br />
एक बार लोगों से टेंडर (निविदा) मंगवा लो<br />
अपने ब्लाग की बोली लगवा लो<br />
जब हो जायेंगे सब नीलाम<br />
हो जायेगा तुम्हारा भी नाम<br />
लोग अपनी संपत्ति बेचकर<br />
हवा में उड़ जाने का प्लान बना रहे हैं<br />
तुम तो वैसे ही रहते हो हवा में<br />
कोई छद्म नाम से ब्लाग बना लेना<br />
नहीं बिकते तो कोई बात नहीं<br />
हो जाओगे तुम भी हिट<br />
जब पढ़ेंगे सब तुम्हारा नाम<br />
यह सोच विचार कर प्रस्ताव लाया हूं’</p>
<p>कंप्यूटर पर टंकित करने से<br />
हाथ रोकते हुए<br />
अपनी टोपी को सिर पर ढोते हुए<br />
पलट कर गुस्से में लालपीले होकर देखा<br />
फिर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कम्बख्त तुम्हारी हर बात<br />
हमारे ब्लाग पर ही क्यों चली आती है<br />
हम लिखते और पढ़ते हैं<br />
पर तुम्हारी नजर कभी नहीं जाती है<br />
होना चाहिए पागल हमें पर<br />
तुम होते नजर आ रहे हो<br />
जिंदगी की नीलामी तो आसान है<br />
उसमें मकान, फ्रिज, ऐसी, कार और<br />
शानौशौकत का सामान है<br />
भला कोई जिंदा चीज थोड़े ही उसमें शामिल है<br />
लोग आजकल इसी को ही जिंदगी कहते हैं<br />
इसलिये ही इनकी नीलामी को<br />
जिंदगी की नीलामी कहते हैं<br />
ब्लाग में बसते हैं हमारे जिंदा जज्बात<br />
जब चाहे लिखते हैं दिन हो या रात<br />
अंग्रेजी का होता तो सोचते<br />
हिंदी ब्लाग तो<br />
लोग अभी देखना भी पंसद नहीं करते<br />
अंग्रेजी पढ़ने में न आये तो<br />
फोटो देखकर काम चला लेंगे<br />
जिंदगी का सच हिंदी में पढ़ने से लोग डरते<br />
अगर होते भी हैं ब्लाग नीलाम तो समझो<br />
कोई छद्म ताकत कर रही है काम<br />
इसलिये इतना चिंतित न हो<br />
फ्लाप होकर भी हम विचलित नहीं<br />
तुम क्यों डरते हो<br />
ब्लाग कोई जिंदगी नहीं है<br />
भले ही उसके जज्बात हम इसमें लिखते हैं<br />
कभी गंभीर तो कभी हंसते दिखते हैं<br />
नीलामी पर हिट लेकर क्या करेंगे<br />
फ्लाप होकर कुछ तो लिख लेते हैं<br />
बेजान चीजों को जिंदगी मानने वाले लोगों में<br />
जिंदादिल होकर लिखना  ही ठीक है<br />
कम से कम फ्लाप होने पर कोई सवाल तो<br />
नहीं उठाता<br />
मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुंच पाया हूं<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=184</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 17:28:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=184</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में हमेशा खोते रहे
अपने से न मिलन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भीड़ में हमेशा खोते रहे<br />
अपने से न मिलने के गम में रोते रहे<br />
नहीं ढूंढा अपने को अंदर<br />
आदमी होकर भी रहा बंदर<br />
लोगों के शोर को सुनकर ही बहलाया दिल<br />
अपनी अक्ल की आंख बंद कर सोते रहे</p>
<p>जमाने भर का बेजान सामान<br />
जुटाते हुए सभी पल गंवा दिये<br />
दिल का चैन फिर नहीं मिला<br />
जो आज आया था घर में<br />
उसी से ही कल हो गया गिला<br />
उठाये रहे अपने ऊपर भ्रम का बोझ<br />
सच समझ कर उसे ढोते रहे<br />
कब आराम मिले इस पर रोते रहे<br />
झांका नहीं अपने अंदर<br />
मिले नहीं अपने अंदर बैठे शख्स  से<br />
अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी कभी आंखों में आंसू आ जाते हैं-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=182</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 12:44:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=182</guid>
<description><![CDATA[अपने दर्द से भला कहां
हमारे आंखों में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने दर्द से भला कहां<br />
हमारे आंखों में आसू आते हैं<br />
दूसरों के दर्द से ही जलता है मन<br />
उसी में सब सूख जाते हैं</p>
<p>अगर दर्द अपना हो तो<br />
बदन का जर्रा जरौ<br />
जंग में लड् जाता है<br />
तब भला आंखों से आंसु बहाने का<br />
ख्याल भी कब आता है<br />
जो बहते  भी हैं आंखों के कभी तो<br />
वह दूसरों के दर्द का इलाज न कर पाने की<br />
मजबूरी के कारण बह आते हैं</p>
<p>कोई नहीं आया इस पर<br />
कभी रोना नहीं आता<br />
कोई नापसंद शख्स भी आया<br />
तो भी कोई बुरा ख्याल नहीं आता<br />
कोइ वादा कर मुकर गया<br />
इसकी कब की हमने परवाह<br />
हम वादा पूरा नहीं कर पाये<br />
कभी कभी इस पर आंखों से आंसू आ जाते हैं<br />
..................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर भी तुम बरसते रहना-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 13:52:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=181</guid>
<description><![CDATA[सूरज की गर्मी में झुलसते हुए
पानी में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सूरज की गर्मी में झुलसते हुए<br />
पानी में नहा गया था बदन<br />
जलती हवाओं में<br />
गर्म मोम की तरह पिघल रहा था मन<br />
चारों तरफ फैला था क्रंदन<br />
ऐसे में जो आये आकाश पर बादल<br />
बिछ गयी पानी की चादर<br />
जैसे स्वर्ग का अनुभव हुआ जमीन पर<br />
लहराने लगा जलती धूप से  त्रस्त लोगों का बदन </p>
<p>कहैं महाकवि दीपक बापू<br />
तुम सभी जगह बरसते जाना<br />
जल से जीवन बहाते जाना<br />
किसी के भरोसे मत छोड़ना<br />
इस धरती पर विचरने वाले जीवों को<br />
बड़े बांध बनवाये या तालाब<br />
पर किसी की प्यास बुझाये<br />
यह विचार इंसान नहीं करता<br />
ढूंढता है अपनी चाहत के लिये<br />
सोने, चांदी और संगमरमर के पत्थर जैसे निर्जीवों को<br />
अमीरों के आसरे तो बहुत हैं<br />
एक ढूंढें हजार पानी पिलाने वाले जायेंगे<br />
पर गरीब का आसरा हो तुम बादल<br />
शायद इसलिये कहलाते हो पागल<br />
फिर भी तुम बरसते रहना<br />
नहीं तो हमें रहेगा पानी के लिये तरसते रहना<br />
तुम हो आत्मा इस धरा के<br />
जो है हम सबका बदन<br />
....................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिना पूछे रास्ता बताने लगे-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 17:15:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=179</guid>
<description><![CDATA[
लिखे उन्होंने चंद शब्द
और दूसरों को ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>लिखे उन्होंने चंद शब्द<br />
और दूसरों को लिखना सिखाने लगे<br />
मुश्किल है  कि बिना समझे लिखा था<br />
पर दूसरों में समझ के दीप जलाने लगे</p>
<p>खरीद ली चंद किताबें और रट लिये कुछ शब्द<br />
अब दूसरों को पढ़ाने लगे<br />
खुद कुछ नहीं समझा था अर्थ<br />
दूसरों का जीवन का मार्ग बताने लगे</p>
<p>जो भटके हैं अपने रास्ते<br />
अपने लक्ष्य का पता नहीं<br />
पर चले जा रहे सीना तानकर<br />
 सूरज की रोशनी में मशाल  वह जलाने लगे<br />
ज्ञानी रहते हैं खामोश<br />
इसलिये अल्पज्ञानी<br />
शब्दों का मायाजाल बनाने लगे</p>
<p>कहें दीपक बापू<br />
समझदार भटक जाता है<br />
तो पूछते पूछते लक्ष्य तक<br />
पहुंच ही जाता है<br />
पर नासमझ भटके तो<br />
पूछने की बजाय रास्ता बताने लग जाता है<br />
अपनी समझदारी दिखाने के लिये<br />
तमाम नाम लेता है रास्तों का<br />
शायद कोई बिना पूछे रास्ता बताने लगे<br />
नहीं भी बताया तो<br />
अपने जैसा ही रास्ता वह भी भटकने लगे<br />
...............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार कोई कारखाने में बनने वाली चीज नहीं है-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=178</link>
<pubDate>Fri, 13 Jun 2008 17:18:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=178</guid>
<description><![CDATA[मन में प्यास थी प्यार की
एक बूंद भी मिल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मन में प्यास थी प्यार की<br />
एक बूंद भी मिल जाती तो<br />
अमृत पीने जैसा आनंद आता<br />
पर लोग खुद ही तरसे हैं<br />
तो हमें कौन पिलाता</p>
<p>स्वार्थों की वजह से सूख गयी है<br />
लोगों के हृदय में बहने वाली<br />
प्यार की नदी<br />
जज्बातों से परे होती सोच में<br />
मतलब की रेत बसे बीत गईं कई सदी<br />
कहानियों और किस्सों में<br />
प्यार की बहती  है काल्पनिक नदी<br />
कई गीत और शायरी कही जातीं<br />
कई नाठकों का मंचन किया जाता<br />
पर जमीन पर प्यार का अस्तित्व नजर नहीं आता</p>
<p>गागर भर कर कभी हमने नहीं चाहा प्यार<br />
एक बूंद प्यार की ख्वाहिश  लिये<br />
चलते रहे जीवन पथ पर<br />
पर कहीं मन भर नहीं पाता </p>
<p>जमीन से आकाश भी फतह<br />
कर लिया इंसान<br />
प्यार के लिये लिख दिये कही<br />
कुछ पवित्र और कुछ अपवित्र किताबों<br />
जिनका करते उनको पढ़ने वाले बखान<br />
पर पढ़ने सुनने में सब है मग्न<br />
पर सच्चे प्यार की मूर्ति सभी जगह भग्न<br />
लेकर प्यार का नाम सब झूमते<br />
सूखी  आंखों से ढूंढते<br />
पर उनकी प्यास का अंत नजर नहीं आता<br />
प्यार कोई जमीन पर उगने वाली फसल नहीं<br />
कारखाने में बन जाये वह चीज भी नहीं<br />
मन में ख्यालों से बनते हैं प्यार के जज्बात<br />
बना सके तो एक बूंद क्या सागर बन जाता<br />
पर किसी को खुश कोई नहीं कर सकता<br />
इसलिये हर कोई प्यार की एक बूंद के<br />
हर कोई तरसता नजर नहीं आता<br />
......................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तीन क्षणिकाऐं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Wed, 11 Jun 2008 14:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=176</guid>
<description><![CDATA[
किसी को खुश देखकर ही
जब मजा आता हो तब
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
किसी को खुश देखकर ही<br />
जब मजा आता हो तब<br />
कही तारीफें झूठ में भी<br />
लोग कर जाते हैं<br />
सच से फरेब करने में नहीं सकुचाते हैं<br />
.........................</p>
<p>सांप से नेवले से पूछा<br />
‘क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे?’<br />
नेवले ने कहा<br />
‘हां, क्यों नहीं<br />
हम दोनों ही जंगली हैं<br />
जंग का मैदान बन चुके<br />
शहर में अपने लिए<br />
कोई जगह बची नहीं<br />
कुछ जगह मालिक अड़े<br />
तो कहीं मजदूर खड़े<br />
दोनों में दोस्ती कभी संभव नहीं<br />
पर हम दोनों में कोई<br />
शोषक या शोषित नहीं<br />
इसलिये खूब जमेगी जब<br />
मिलकर बैठेंगे दो यार<br />
करेंगे एक दूसरे के लिए शिकार<br />
फिर तुमसे क्यों घबड़ाऊंगा<br />
तुम मुझसे क्यों डरोगे‘<br />
......................</p>
<p>संवेदनहीन हो चुके समाज में<br />
अपनी जिंदगी किसी<br />
दूसरे की दया पर मत छोड़ना<br />
अवसर पाते ही सांप छोड़ दे<br />
पर इंसान नहीं चाहते डसना छोड़ना<br />
..........................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने ददे को बाहर आने दो-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=174</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 14:50:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=174</guid>
<description><![CDATA[कुछ नहीं कह सकते तो कविता ही कह दो
कुछ न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ नहीं कह सकते तो कविता ही कह दो<br />
कुछ नहीं लिख सकते तो कविता ही लिख दो<br />
कुछ पढ़ नहीं सकते तो कविता ही पढ़ लो<br />
कुछ और करने से अच्छा अपने कवित्व का जगा लो<br />
पूजे  जाते हैं यहां बैमौसम राग अलापने वाले भी<br />
क्योंकि सुनने वालों को शऊर नहीं होता<br />
कुछ कहना है पर कह नहीं पाते<br />
अपनी अभिव्यक्ति को बाहर लाने में<br />
सकपकाते लोग<br />
अपने दर्द को हटाने शोर की महफिल में चले जाते<br />
जो सुन लिया<br />
उसे समझने का अहसास दिलाने के लिये ही<br />
तालियां जोर-जोर से बजाते<br />
बाहर से हंसते पर<br />
अंदर से रोते दिल ही वापस लाते<br />
तुम ऐसे रास्तों पर जाने से बचना<br />
जहां बेदिल लोग चलते हों<br />
समझ से परे चीजों पर भी<br />
दिखाने के लिए मचलते हों<br />
खड़े होकर भीड़ में  देखो<br />
कैसे गूंगे चिल्ला रहे हैं<br />
दृष्टिहीन देखे जा रहे हैं<br />
बहरे गीत सुनते जा रहे है<br />
साबुत आदमी दिखता जरूर है<br />
पर अपने अंगों से काम नहीं ले पाता<br />
सभी  लाचारी में वाह-वाह किये जा रहे हैं<br />
सत्य से परे होते लोगों पर<br />
लिखने के लिए बहुत कुछ है<br />
कुछ न लिखो तो कविता ही लिख दो<br />
कोई सुने नहीं<br />
पढ़े नहीं<br />
दाद दे नहीं<br />
इससे बेपरवाह होकर<br />
अपने ददे को बाहर आने दो<br />
और एक कविता लिख दो<br />
.......................................................</p>
<p>समीर लाल जी, आपकी कविताएं पढ़ी। अच्छा लगा। मेरे मन में भी कुछ शब्द आये जो कह डाले।<br />
दीपक भारतदीप </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बस नजर आता है अपना साया-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=173</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 12:14:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=173</guid>
<description><![CDATA[धूप में पसीने से नहाते हुए
जब देखता हू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>धूप में पसीने से नहाते हुए<br />
जब देखता हूं अपना साया<br />
दिल भर आता है<br />
वह जमीन पर गिरा होता है<br />
मैं ढोकर चल  रहा हूं आग में अपनी काया<br />
कहीं राह में फूल की खुशबू आती है<br />
मैं देखता हूं सड़क किनारे<br />
कहीं फूलो का पेड़ है<br />
जो बिखेर रहा है सुगंध की माया </p>
<p>रात में चांद की  रोशनी में भी  मेरे साथ<br />
चलता आ रहा है मेरा साया<br />
मैं उसे देख रहा हूं वह अब भी<br />
जमीन पर गिरा हुआ है<br />
शीतल पवन छू रही मेरे बदन को<br />
पर उठ कर खड़ा नहीं होता मेरा साया<br />
उसे कभी कभी ही देख पाता हूं<br />
अपने ख्यालों में ही गुम हो जाता हूं<br />
खामोश रहता है मेरा साया</p>
<p>कई लोग मिले इस राह पर<br />
बिछड़ गये अपनी मंजिल आते ही<br />
दिल में बसा रहा उनका साया<br />
चंद मुलाकातों में रिश्ता गहरा होता लगा<br />
पर जो बिछड़े तो फिर<br />
उनका चेहरा कभी नजर नहीं आया<br />
तन्हाई में जब खड़ा होकर<br />
इधर-उधर देखता हूं<br />
बस नजर आता है अपना साया<br />
...........................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पाठक रूपी सारथि ही बनाता है लेखक महारथी-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=166</link>
<pubDate>Sun, 25 May 2008 07:26:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=166</guid>
<description><![CDATA[सभी पाठक लेखक हों यह आवश्यक नहीं है पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/4hkqs.jpg[/IMG]' alt='' class='aligncenter' />सभी पाठक लेखक हों यह आवश्यक नहीं है पर सभी लेखकों को पाठक अवश्य होना चाहिए। एक लेखक को कभी किसी अन्य की रचना एक लेखक के रूप में नही बल्कि एक पाठके के रूप में पढ़ना चाहिए। एक लेखक में बैठा उसका पाठक ही उसकी  रचना रूपी  रथ का सारथि हो सकता है। कभी कभी किसी का पाठक ऐसा अमरत्व भी प्राप्त कर लेता है जब वह किसी अन्य लेखक का की रचना को पढ़ने के बाद  फिर उसे अपने रचनाकर्म के लिये  किसी अन्य की पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं पढ़ती। हमारे धर्मग्रंथ कुछ इसी प्रकार की अमर सामग्री से परिपूर्ण हैं जिनको पढ़ने वाले फिर कोई अन्य पुस्तक या रचना न भी पढ़ें तो भी अच्छे लेखक हो सकते हैं। </p>
<p>पाठक की दृष्टि से पढ़ते हुए हर व्यक्ति विषय सामग्री को पढ़ता है और उसके अंतर्मन में उतार चढ़ाव आते हैं और उनके साथ एक धारणा उसके मस्तिष्क में स्थापित होती है। जो लेखक होते हैं उन धारणाओं के आधार पर अपनी रचनाआंें का सृजन हुए अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। कुछ तो लेखक महानता की श्रेणी में आ जाते हैं। जिस तरह सारथि समरांगण में अपने रथ पर बैठे महाराथी के लिए वहां स्थितियों को देखते हुए रथ का संचालन करता है। समरांगण में सारथि  वहां की स्थितियों का अवलोकर   संचालन करते हैं कि ‘कहां  उसकी युद्ध में किस स्थान पर  आवश्यकता है जहां वह अपने महाराथी को ले जाये’, ‘कहां उसके महाराथी के लिए प्रतिकूल स्थितियां  है और वहां से वह उसे हटा ले और  ‘ कहीं उसका महारथी कहीं युद्ध लडते लड़ते घायल तो नहीं हो गया ताकि उसे वहां से दूर ले जाये।’ ऐसे अनेक निर्णय होते हैं जब सारथि अपने महारथी की रक्षा करने के उद्देश्य से अपने विवेक के अनुसार लेते हैं। महारथी का कार्य केवल युद्ध में अपना ध्यान रणनीतिक कौशल के साथ अपने अस्त्रों शस्त्रों का उपयोग करते हुए युद्ध जीतना होता है। यही स्थिति लेखक के अर्तमन में पाठक की है। </p>
<p>एक लेखक को किसी अन्य लेखक की रचना पढ़ते हुए अपने पाठक को एक सारथि की तरह विचरण करने देना चाहिए। एक पाठक के रूप में ही रचना का प्रभाव को ग्रहण किया जा सकता हैं।  अगर किसी अन्य  लेखक की कहानी पढ़ें तो उसके पात्रों के साथ जुड़ जायें और किसी की कविता पढ़े तो उसके भावों को सहजता से अंदर जाने दें। कोई आलेख या निबंध पढ़े तो उसकी विषय वस्तु को आत्मसात करना उसके लिए बेहद आवश्यक है।  </p>
<p>एक महारथी को आक्रामक होना पड़ता है तभी वह युद्ध जीत सकता है। वैसे ही लेखक को अपनी रचना लिखते समय  अपने अंदर आत्मविश्वास स्थापित करना चाहिए कि वह अच्छा लिख रहा है। यह तभी संभव है जब उसके अंदर अपने विचार और विषय सामग्री में प्रति दृढ़ता और प्रतिबद्धता होने के साथ अपना  मौलिक भाव होगा। यह तभी संभव है जब उसने उस विषय का गहन अध्ययन किया हो  जो कि दूसरे लेखकों की रचनाओं से प्राप्त होता है। यह तभी संभव होता है जब उन रचनाओं को एक पाठक की तरह पढ़ा होगा। </p>
<p>अक</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम पर  कविता नहीं लिखेंगे-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 11:55:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, गर्मी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/160oms5.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, गर्मी में हो रही बरसात<br />
जहां रुलाता पसीना, वहां करती बहार अपनी  बात<br />
लिखो कोई जोरदार कविता<br />
बहने लगे श्रृंगार रस की सरिता<br />
शायद तुम्हारे नाम से फ्लाप का लेबल हट जाये<br />
हिट होकर तुम्हारा नाम आकाश पर चमक जाये<br />
कोई कुछ भी कहे तुम करो<br />
अपनी पत्रिका पर मौसम पर कविता की बरसात’</p>
<p>जाने को तैयार खड़े थे<br />
बांध रहे थे धोती<br />
सिर पर रख रहे टोपी<br />
सुनकर पहले देखा फंदेबाज को घूरकर<br />
फिर कहैं दीपक बापू<br />
‘दो दिन पहले  गर्मी पर<br />
लिखने को कह रहे थे हास्य कविता<br />
अब प्रवाहित करवाना चाहते हो<br />
श्रृंगार रस की सरिता<br />
बहुत लिख चुके तुम्हारे विषयों पर<br />
नहीं बनी हमारी पत्रिका के  हिट होने की बात<br />
मौसम का कोई भरोसा नहीं<br />
सर्दी के मौसम में सुबह लिख रहे थे<br />
कंपाकंपाते हुए उस पर गर्म कविता<br />
दोपहर तक  निकलने लगा गर्मी में पसीना<br />
गर्मी में लिखने बैठते हैं शाम को<br />
रात तक पानी बरसता है बनकर नगीना<br />
हवा बंद पर लिखने बैठते हैं तो<br />
आंधी चली आती है<br />
मौसम का कोई भरोसा नहीं<br />
यह अंतर्जाल है मेरे मित्र<br />
सारी दुनियां में एक जैसा मौसम नहीं रहता<br />
कहीं कोई बहार में नहाता<br />
तो कोई धूप में गर्मी में सहता<br />
अब पहले जैसा माहौल नहीं है<br />
जो लिखेंगे यहीं पढ़ा जायेगा<br />
अब तो लिखो अपने शहर में<br />
वह विदेश में भी दिखने में आयेगा<br />
इसलिये समझ में नहीं आती<br />
मौसम पर लिखकर  हिट होने की बात<br />
यहां  हमेशा ही होने लगी है<br />
बेमौसम गर्मी, सर्दी, और बरसात<br />
हमें नहीं जमी तुम्हारी मौसम पर<br />
हास्य कविता लिखने की बात<br />
..................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल बहलाने के लिए देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 17:11:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं
दिल बहलान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/1h5pp2.jpg[/IMG]' alt='' class='alignright' />हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं<br />
दिल बहलाने के लिये दूसरों की<br />
हंसी भी सहारा बन जाती है<br />
किसी के दर्द पर हंसने वाले बहुत हैं<br />
दूसरों को हंसा दें ऐसी सूरतें<br />
कभी कभी नजर आती हैं<br />
नहीं मिलता तो देख लेता हूं<br />
हंसते हुए लोगों तस्वीरें<br />
दर्द से परे जो ले जातीं हैं<br />
......................................................</p>
<p>आंखों से देखने का उम्र से<br />
कभी कोई वास्ता नहीं<br />
अगर बहलता हो मन तस्वीरों से<br />
तो कोई हर्ज नहीं<br />
अपनी उम्र देखकर शर्माने से<br />
भला समय कट पाता है<br />
राह चलते किसी का सौंदर्य देखने पर<br />
अगर घबड़ाते हो तो<br />
देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं<br />
.........................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सदियों से धोखा देता आया चांद-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 16:05:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=162</guid>
<description><![CDATA[ 
आज महक जी  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>आज <a href="http://mehhekk.wordpress.com/2008/05/20/hazaron-naqaab/">महक जी</a>  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छी गजल देखी। ऐसे में मेरा कवित्व मन जाग उठा। कुछ पंक्तियां मेरे हृदय में इस तरह आईं-</p>
<blockquote>
<h4 style="padding-left:30px;">
समंदर किनारे खड़े होकर<br />
चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना<br />
अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं<br />
उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ<br />
वहां  से फिर भी निकल सकते हो<br />
अपनी सोच के दायरे से निकलकर<br />
आगे  चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना<br />
अभी कई गीतों और गजलों के फूल<br />
इस इस जहां* में  तुम्हें है महकाना</h4>
</blockquote>
<h4 style="padding-left:30px;">वहां मैंने "अंतर्जाल" लिखा था पर जहां लिख दिया</h4>
<h4>कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे पाठ आ जाते हैं जिन पर लिखने का मन करता है। तब वहां लिखने के विचार से जब अपना विंडो खोलता हूं और सहजता पूर्वक जो विचार आते हैं लिखता हूं। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अंतर्जाल पर अब मनोरंजक और ज्ञानवद्र्धक मिल जाता है तब उसके लिये कहीं और हाथ पांव क्यों मारे जायें?</h4>
<h4>इसी कविता पर एक फिर कुछ और विचार आये</h4>
<blockquote>
<h3 style="padding-left:30px;">समंदर के किनारे<br />
चमकता चांद पुकारे<br />
ऊपर निहारते हुए<br />
एक कदम उठाए खड़े हो<br />
जैसे तुम उसे पकड़ लोगे<br />
पर अपना दूसरा कदम<br />
तुम आगे मत बढ़ाना<br />
सदियों से धोखा देता आया है चांद<br />
किसी के हाथ नहीं आया<br />
इसने कई प्रेमियों को ललचाया<br />
शायरों को रिझाया<br />
पर कोई उसे छू नहीं पाया<br />
उसकी चमक एक भ्रम है<br />
जो पाता है वह सूर्य से<br />
यह हमारी बात पहले सुनते जाना</h3>
</blockquote>
<h4>महक जी अपने ब्लाग पर कई बार ऐसा पाठ प्रकाशित करतीं है कि मन प्रसन्न हो जाता है। हां, मुझे याद आया एक बार उन्होंने अपने पाठ चोरी होने की शिकायत की थी और मुझे तब बहुत गुस्सा आया और उनके बताये पते जब गया था तो वहां उन्होंने अपनी प्यार भरी टिप्पणी रखी थी जिसमें कहीं गुस्सा नहीं बल्कि स्नेहपूर्ण उलाहना थी। तब लगा कि वह बहुत भावुक होकर लिखतीं हैं। यही कारण है कि उनके लिखे से जहां आनंद प्राप्त होता है वही लिखने की भी प्रेरणा मिलती है।<br />
..............................................</h4>
<p> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द अपनी दुनियां स्वयं बसाते है-आलेख और कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 10:34:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कवित]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कविताएं पढ़ीं, पर मेरे समझ में नही आता था कि वह होता क्या है। आज <a href="http://www.meenakshi-meenu.blogspot.com/">मीनाक्षी जी</a></a>  के ब्लाग पर पढ़ा कि उसे त्रिपदम कहा जाता है। हिंदी में इस विधा के बारे में कहीं लिख गया है तो मुझे पता नहीं पर मुझे लगा कि यह एक मुक्त कविता की तरह ही है। शायद इस विधा को अंग्रेजी से लिया गया होगा और मैं इस आधार पर कोई विरोध करने वाला नहीं हूं। मुख्य बात है कि हम अपनी बात कहना चाहते है और उसके लिये हम गद्य या पद्य किसी में भी लिख सकते हैं।</p>
<p>त्रिपदम(हाइकु) पढ़कर मेरे मन में विचार आया कि आज अपने कुछ विचारों को इस विधा में  लिख कर देखें। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोग अपने मन की हलचल को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते या कभी वह कुछ कहना चाहते है पर कुछ और कह जाते है। हमारा मन बहुत गहरा होता है और हम उसमें डुबकी तो सभी लगा लेते हैं पर वहां से कितने मोती उठा पाते हैं यह एक विचार का विषय है। हम कई बार कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत गहराई से लिखता या विचार करता है। इसका यह आशय  यह कदापि नहीं हैं कि कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। दरअसल जो लोग लिखने या विचार करने मेंे गहराई का संकेत देते हैं वह अपने अंदर से बाहर आ रहे विचार और शब्दों को रोकने का प्रयास नहीं करते। दृष्टा की तरह उनको बाहर लोगों के पास जाते देखते हैं। हां, यह मुझे लगता है। कई बार मेरे साथ ऐसा होता है। जब शब्द और और विचारों के बाह्य प्रवाह के बीच मैं स्वयं खड़ा होने का प्रयास करता हूं तो लगता है कि वह अवरुद्ध हो गया।</p>
<p>मुझे पता नहीं कि मैं अच्छा लिखता हूं कि बुरा? पर कुछ मित्र मेरी कुछ रचनाओं पर फिदा हो जाते हैं और कुछ पर कह देते हैं कि यह क्या लिखा है हमारे समझ में नहीं आया।’ तब मुझे इस बात की अनुभुति होती है कि मैंने खराब कही जा रही रचनाओं के समय अपने विचारों और शब्दों के प्रवाह में अपनी टांग अड़ाई थी। आज जब मेरे मन में हाइकू (त्रिपदम) लिखने का विचार आया तो मैं अपने अ्र्रंर्तमन पर दृष्टिपात कर रहा हूं कि क्या वहां कोई विचार या शब्द हैं जो बाहर आना चाहते है।</p>
<h3 style="padding-left:30px;">मन में उठती कुछ उमंगें<br />
विचारों की बहती तरंगें<br />
आशाओं की उड़ती पतंगें</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">मौसम के खुशनुमा होने का अहसास<br />
किसी का हमदर्द बनने का विश्वास<br />
प्यार में वफादारी की आस</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">अनुभूतियों से भरा तन<br />
अभिव्यक्त होना चाहता मन<br />
शब्द चहक रहे खिलाने को चमन</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">जब तलाशता हूं उनका रास्ता<br />
संदर्भों से जोड़ता हूं उनका वास्ता<br />
सोचता हूं परोसूं जैसे नाश्ता</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">तब असहज हो जाता हूं<br />
अपने को भटका पाता हूं<br />
नयी तलाश में पुराना भूल जाता हूं</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">जब हट जाता हूं उनके पास से<br />
रचना होने की आस से<br />
अपने अस्तित्व के आभास से</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">तब वह कोई कविता बन जाते हैं<br />
या कोई कहानी सजाते हैं<br />
शब्द अपनी दुनिया स्वयं बसाते है</h3>
<p>यह मेरा त्रिपदम(हाइकु) लिखने का एक प्रयास है। मुझे इसे लिखना बहुत अच्छा लगा। यह अलग बात है कि पढ़ने वाले इस पर क्या सोचते है। मेरा प्रयास अपने को अभिव्यक्त करना होता है और प्रयास यही करता हूं कि अपने आपसे दिखावा नहीं करूं। हमेशा ऐसा नहीं कर पाता यह अलग बात है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी किसी का कड़वा सच उसके सामने नहीं कहना चाहिए-आलेख]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 12:15:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[
सच बहुत कड़वा होता है और अगर आप किसी के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>
सच बहुत कड़वा होता है और अगर आप किसी के बारे में कोई विचार अपने मस्तिष्क में  हैं और आपको लगता है कि उसमें कड़वाहट का अश है तो वह उसके समक्ष कभी व्यक्त मत करिये। ऐसा कर आप न  केवल उसे बल्कि उसके चाहने वालों को भी अपना विरोधी बना लेते हैं। हां, मैं इसी नीति पर चलता रहा हूं। केवल एक बार मैंने ऐसी गलती की और उसका आज तक मुझे पछतावा होता है।</h3>
<h3>कई वर्ष पहले की बात है तब मेरा विवाह हुए अधिक समय नहीं हुआ था। ससुराल पक्ष का एक युवक मेरे घर आया। उसके बारे में तमाम तरह के किस्से मैंने सुने थे। वह अपने परिवार के लिये ही आये दिन संकट खड़े करता था। वह सट्टा आदि में अपने पैसे बर्बाद करता था। उसने अपनी युवावस्था में कदम रखते ही ऐसे काम शुरू किये जो उसके माता पिता  के लिए संकट का कारण बनते थे। एक बार उसने सभी लोगों के बिजली और पानी के बिल भरने का जिम्मा लिया। वह सबसे पैसे ले गया और फिर नकली सील लगाकर उसने सबको बिल थमा दिये और उनका पूरा पैसा उसने ऐसे जुआ और सट्टे के  कामों में बर्बाद कर दिया। उसके जेल जाने की नौबत आ सकती थी पर उसके पिताजी ने सबको पैसा देकर उसे बचा लिया। उसके पिताजी के कुछ लोगों पर उधार हुआ करते और वह उनको वसूल कर लाता और घर पर कुछ नहीं बताता। ऐसे बहुत सारे किस्से मुझे पता थे पर उसका मेरे और मेरी पत्नी के प्रति ठीक था।</h3>
<h3>घर पर खाने के दौरान मैंने पता नहीं किस संदर्भ में कहा था-‘पिताजी के पैसो पर सब मजे करते हैं। जब अपना पैसा होता है तब पता चलता है कि कैसे कमाया और व्यय किया जाता है। मैंने  भी पिताजी के पैसे पर खूब मजे किये  और अब पता लग रहा है। अभी तुम कर रहे हो और तुम्हें भी अपना कमाने और विवाह करने के बाद पता लग जायेगां’।</h3>
<h3>मेरी पत्नी ने भी यह बात सुनी थी और यह एक   सामान्य बात  थी। इसमेें कोई नयी चीज नहीं थी। जब वह अपने घर गया तब उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे और मेरी पत्नी को हैरान कर दिया। उसकी मां ने मेरी पत्नी की मां से कहा-‘‘मेरा लड़का अपने पिताजी के पैसे पर मजे कर रहा है कोई उसे दे थोड़े ही जाता है।’</h3>
<h3>लड़के के बाप की भी ऐसी टिप्पणी हम तक पहुंची। हमें बहुत अफसोस हुआ। वह अफसोस  आज तक है क्योंकि हमारे उनसे अब भी रिश्ते हैं उस लड़के के माता पिता दोनों ही उसी की चिंता मेंं स्वर्ग सिधार गये। लड़का आज भी वैसा ही है जैसे पहले था। चालीस की उम्र पार कर चुकने के बाद उसका विवाह हुआ और पत्नी ने विवाह के छह माह बाद ही उसको छोड़ दिया। कहते हैं कि उसके हाथ में जो रकम आती है वह सट्टे में लगा आता है। उसके जेब में कभी दस रुपये भी नहीं होते। हां, उसके बाप ने जो पैसा छोड़ा उस पर बहुत दिनों तक उसका काम चला। उसका बड़ा भाई जैसे तैसे कर अभी तक उसे बचाये हुए है।<br />
मेरा उसका कई बार आमना सामना होता है पर मैं बहुत सतर्क रहता हूं कि कोई ऐसी बात न निकल जाये जो उसे गलत लगे।</h3>
<h3>उसके माता पिता की याद आती है तब लगता है कि लोग दूसरों की कड़वी सच्चाई देखकर उसे बोलना चाहते हैं पर अपनी सच्चाई से मूंह फेर लेते हैं। मेरी बात उसने घर पर इस तरह बताई ताकि उसे वहां पर लोगों की सहानुभूति मिल सके। वह उसमें सफल रहा पर अब वह इस हालत में है कि कोई उसका अपने घर आना भी पसंद नहीं करता। उसकी गलत आदतें अब भी बनीं हुईं हैं। कहने वाले तो यह भी  कहते हैं कि वह जब वह अपना वेतन ले आता है तो उसे एक दिन में ही उड़ा देता है।</h3>
<h3>पिताजी के पैसे पर मजे करने के मुझे ं भी ऐसे ताने मिलते थे पर  विचलित नहीं होता था पर चूंकि किसी गलत काम में अपव्यय नहीं करता था इसलिये कोई गुस्सा नहीं आता था। फिर वह विचलित क्यों हुआ? मेरा विचार है कि वह अपने पिता के पैसे जिस तरह पापकर्म पर खर्च कर रहा था वही उस समय उसके हृदय में घाव करने  लगे, जब मैने यह बात उसके सामने कही थी।<br />
लोग अपने बच्चों को किस तरह बिगाड़ देते हैं यह उसे देखकर समझा जा सकता है। घर में  अपने बच्चों द्वारा पैसे के गबन के मामले  को अक्सर लोग ढंक लेते हैं-जो कि स्वाभाविक भी है-पर बाहर अगर कोई ऐसा करता है तो उसे छिपाना कठिन होता है। अगर अन्य लोगों की बात पर यकीन करें तो उनका कहना है कि ‘आपने जब उससे कहा था तब अगर उसके माता पिता उसे समर्थन नहीं देते तो वह शायद सुधर जाता। क्योंकि आपकी बात सुनने के बाद चार पांच दिन तक वह गलत आदतों से दूर रहा पर जब माता पिता से समर्थन मिला तो वह फिर उसी कुमार्ग पर चला पड़ा।’</h3>
<h3>हमारे अंतर्मन में अपनी छवि एक स्वच्छ व्यक्ति की होती है पर बाहर हमें लोग इसी दृष्टि से देख रहे हैं यह सोचना मूर्खतापूर्ण है। हर आदमी में गुण दोष होते हैं और दूसरे को दिखाई देते हैं। कोई आदमी  सामने ही हमारा दोष प्रकट करता है तो हम उतेजित होते हैं जबकि उस समय हमें आत्ममंथन करना चाहिए। खासतौर से बच्चों के मामले में लोग संवेदनशील होते हैं। अगर कोई कहता है कि आपका लड़का या लड़की कुमार्ग पर जा रहे हैं तो उतेजित हो जाते हैं और अपने अपने लड़के और लड़की के झूठे स्पष्टीकरण पर संतुष्ट होकर कहने वाले की निंदा करते हैं। एक बार उन्हें अपने बच्चे की गतिविधि पर निरीक्षण करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने कहा है उसका आपके बच्चे से कोई लाभ नहीं है पर आपका पूरा जीवन उससे जुड़ा है। हां, संभव है कुछ लोग आपके बच्चे की निंदा कर आपको मानसिक रूप से आहत करना चाहते हों और उसमें झूठ भी हो सकता है पर इसके बावजूद आपको सतर्क होना चाहिए। </h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तंबाकू, एकता और योगसाधना-आलेख]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Fri, 16 May 2008 14:57:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[ 
पिछले वर्ष जुलाई में वृंदावन से हम दो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>पिछले वर्ष जुलाई में वृंदावन से हम दोनों पति-पत्नी अपने शहर  के लिये चले। हमने मथुरा के मार्ग पर पड़ने वाले मंदिरों को देखने का फैसला किया। हम जब बिड़ला मंदिर पहुंचे तो उस समय उमस बहुत थी। हम दोनों अंदर गये और कुछ देर ध्यान लगाने के बाद बाहर निकले। मैंने वहां पानी पिया और फिर अपनी जेब से तंबाकू की डिब्बी निकाली और हाथ में घिसकर उसे मूंह में रख लिया। वहां भीषण उमस से भरी दोपहर में हमने अब अन्य मंदिर देखने की बजाय मथुरा रेल्वे स्टेशन का रुख किया।</p>
<p>पता चला कि गाड़ी आने में आधा घंटा देर है तब हमने वहां अपने साथ लाये खाने के सामान से कुछ नमकीन निकाला और खा लिया। फिर पानी लेकर पिया और हाथ पौंछने के लिए रुमाल निकाला तो तंबाकू की डिब्बी भी मेरे हाथ में आ गयी। मैं उसे रखना चाहता था कि एक तिलक धारी सज्जन आये और बोले-‘जरा तंबाकू की डिब्बी दीजिए। मैंने आपके पास बिड़ला मंदिर में देखी थी पर उस समय खाने का विचार नहीं था। मैं अपनी डिब्बी घर भूल कर आया और यहां कोई दुकान नहीं मिली।’</p>
<p>मैंने उसके हाथ में डिब्बी दी। उसने कहा-‘चूना तो सूखा हुआ हैं। मैं पानी डाल दूं।’</p>
<p>मेरी स्वीकृति के बाद वह पास ही नल पर गया और उसमंे पानी डालकर तंबाकू बनाने लगा। उसी समय वहां से एक कुली गुजर रहा था और बोला-‘साहब, थोड़ी मेरे लिये भी बना लीजिए।’<br />
उन सज्जन ने हंसते हुए कुछ तंबाकू और चूना और निकाला और घिसना शूरू किया। तंबाकू बनते ही जैसे उसने उस कुली को देने के लिए हाथ बढ़ाया तो कोई अन्य एक सज्जन जो खाकी कपड़े पहने हुए थे आये और बिना कुछ कहे ही उनके हाथ से थोड़ी तंबाकू लेकर चलते बने।<br />
सबने अपना अपना हिस्सा ले लिया और डिब्बी मेरी जेब में पहुंच गयी। तंबाकू खाने वालों के लिए ऐसी घटनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। यह घटना भी ऐसी ही थी अगर मेरी पत्नी इस सब पर गौर नहीं कर रही होती। इतने में हमारी गाड़ी आ गयी। हमारे से पहले चूंकि तीन गाडि़यां जा चुकीं थीं इसलिये हमें सामान्य डिब्बे में  बैठने के लिये जगह मिल गयी।<br />
आगरा तक हम आराम से आये और वहां भी गाड़ी से लोग उतरने लगे। खिड़की से एक युवती ने हमसे पूछा-‘यहां क्या कोई बैठा है। अगर नहीं! तो प्लीज हमारे लिए जगह घेर लीजिए।’<br />
मेरी पत्नी ने कहा-‘‘घेरने की कोई जरूरत नहीं है आप इन सबको निकल जाने दीजिए और आराम से अंदर आयें। यह जगह खाली पड़ी रहेगी। अभी इस समय कोई इसमें अंदर आता नहीं दिख रहा।’</p>
<p>वह युवती अंदर आयी तो उसके साथ उसकी माता पिता और भाई भी थे। चारों को आराम से जगह मिल गयी। वह मुस्लिम परिवार था। हम दोनो खिड़की के आमने सामने बैठे थे। मेरी पत्नी मेरे पास में आकर बैठ गयी लड़की सामने की जगह ली।<br />
उसके थोड़ा समय बाद ही हमने चाय लेकर पीना भी शुरू कर दी। उसके बाद मैंने अपने जेब से तंबाकू निकाली और उसे हाथ में घिसने लगा। उस लड़की की पिता ने कहा-‘‘थोड़ा तंबाकू आप देंगे। मेरे दांत में दर्द है।’</p>
<p>लड़की ने कहा-‘‘पापा, आपको तंबाकू खाना है तो  फिर दंात के दर्द का बहाना क्यों कर रहे हैं? कहीं तंबाकू देखी नहीं कि खाने का मन करने लगता है।’</p>
<p>फिर वह हमारी पत्नी की तरफ देखकर हंसते हुए बोली-‘सब आदतें छूट जायें पर तंबाकू की आदत नहीं जाती।’ <br />
हमारी पत्नी ने उससे कहा-‘‘हां, हमारे यह योगसाधना शुरू करने के बाद शराब तो छोड़ चुके हैं पर इससे इनका भी पीछा नहीं छूटता।’<br />
लड़की ने एकदम पूछा-‘‘रोज करते हैं? वही बाबा रामदेव वाली न!<br />
हमारी पत्नी ने कहा-‘‘हां पिछले पांच वर्ष से कर रहे हैं, और यह इन्होंने तब शुरू की जब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था।<br />
मैने बीच में हस्तक्षेप किया-‘‘मैंने भारतीय योग ंसंस्थान के शिविर में योग साधना सीखी थी। हां, अब यह सच है कि भारतीय योग के प्रचार में उनका बहुत योगदान है।’<br />
फिर तो वह कहने लगी-‘हां, हमारे यहां एक औरत को कैंसर हो गया था वह टीवी पर देखकर योग साधना करने लगी और वह ठीक हो गयी। एक आदमी  की तो दोनों किडनी खराब थी वह भी ठीक हो गयीं। कई लोगोंं को इससे लाभ हुआ है।’<br />
उसका भाई बताने लगा-‘उससे कई लोगों का फायदा हुआ है।’<br />
मैंने कहा-‘‘खुश रहने के लिए इसके अलावा कोई और उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता।’</p>
<p>उसकी मां ने कहा-‘‘है तो बहुत काम की चीज, पर लोग करते नहीं है। आलस्य होता है।’<br />
उसके पिताजी ने कहा-‘हां, हमारे यहां कई लोगों की फायदे की बात सुनी है।<br />
लड़की कहने लगी-‘आप कौनसे आसन करते हैं?<br />
मैने उसे थोड़ा इस बारे में बताया। हमारा गंतव्य स्थान आ गया तो फिर हमने उनसे विदा ली।<br />
बाहर निकलकर मेरी पत्नी ने कहा-‘‘हमसे कहा कि एक बात जो मैने वहां नहीं कही कि तंबाकू खाने वाले व्यसनी कोई जातपात या धर्म नहीं देखते। उनके लिए तो तंबाकू  खाने वाले आत्मीय बंधु हो जाते हैं और कभी अधिकार से तो कभी आग्रह से तंबाकू मांग कर खाते है।’<br />
मैने कहा-‘‘हां, पर यह कई बार मैं भी करता हूं। एक विषय और है आजकल जो लोगों में  बंधुत्व की भावना जाग्रत कर रहा है। वह है योग साधना और ध्यान। हां तंबाकू से तो केवल क्षणिक रूप से बंधुत्व का भाव होता है पर देखो मैंने जिनके साथ योग साधना प्रारंभ की उनसे आजतक मेरी मित्रता है। फिर अभी गाडी में  उनसे तंबाकू पर कितनी क्षणिक बातचीत  हुई पर योग साधना पर कितनी देर तक चर्चा हुई।’<br />
 <br />
हमारे देश में एकता और और प्रेम के नारे बहुत लगते है। इनसे कोई मतलब नहीं निकलता। सच तो यह है कि स्वार्थ की वजह से एकता स्वयं ही बन जाती है। अगर आप यह चाहते है कि कोई आपसे एकता करे तो उसके स्वार्थ अपने में फंसाये रहो। आप अगर किसी समूह के नेता है तो केवल एकता करने या उनको अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रेरित कर उसे संगठित नहीं रख सकते। उनके आपस में इस तरह स्वार्थ जोडि़ये। मैं अपने साथ स्वार्थ की वजह से जुड़ने वाले व्यक्तियों पर भी कोई आक्षेप नहीं करता क्योंकि मुझे मालुम है कि समाज में एक दूसरे के स्वार्थ सिद्धि  के लिये कार्य नहीं करेंगे तो फिर उसका औचित्य क्या रह जायेगा? आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपस में जुड़े रहे तो उनके अपने स्वार्थ इस जुड़वा कर रखें ताकि उनका प्रेम बना रहे। हम सब अपने स्वार्थ पूर्ति करने वालों के साथ ही एकता स्थापित करते हैं तब दूसरों से निस्वार्थ एकता की बात करना व्यर्थ है। सभी धर्मों, जातियों, विचारों और वर्गों के लोग आपस में अपने स्वार्थों से मिलते और बिछुड़ते है। जिनको आपस में स्वार्थ नहीं है उसे किसी से मिलने की जरूरत क्या है? हम उस परिवार के साथ अच्छे विषयों पर चर्चा में इतना व्यस्त रहे कि दोनों ने एक दूसरे का परिचय तक नहीं पूछा जबकि  डेढ़ घंटे तक सहयात्री के रूप में एकता और सौहार्द बनाये  रहे।</p>
<p>जरूरत है उन विषयों को प्रोत्साहन देने की जिनसे लोगों में एकता कायम हो सकती है। यहां मैंने तंबाकू का विषय इसलिये उठाया कि लिखते लिखते अब मैं ज्ञानी होता जा रहा हूं-ऐसा आज मेरे एक मित्र ने कहा। मैं सोचता हूं हो सकता है कि लिखने से मेरी यह आदत छूट जाये। तंबाकू खाना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है यह तो सभी जानते है। सोच रहा हूं हो सकता है लिखने से वह छूट जाये।    </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्टार्ट अप को समोसा मान लेते हैं-व्यंग्य चिंतन]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 15:10:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[ 
गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भारत के अनेक क्षेत्रों के प्रतीक्षा थी। भारत मेें भी हिंदी ब्लाग जगत पर इसकी चर्चा कुछ समय से हो रही  थी।मेरे एक ब्लाग पर एक  अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि एसा टूल आ रहा है इससे भाषा की दीवार समाप्त हो जायेगी।  अब इस टूल के प्रयोग ने कई लोगों को निराश कर दिया है। हिंदी में अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी ब्लाग ही नहीं वरन् अनेक वह पाठक भी निराश हुए हैं जिनको अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है पर उसके विषयों को पढ़ने का बहुत आकर्षण है। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी में शायद हिंदी से बेहतर लिखा जाता है। इससे पहले भी अनेक लोग इंटरनेट पर अंग्रेजी वेब साईटों के सामने आंखें लगाकर  अपने को विश्वास दिलाते हैं कि वह उसे पढ़ रहे हैं और फिर अपने मित्रों को बताते हैं। जब उन्होंने अनुवाद टूल  के बारे में सुना तो चेहरे खिल उठे होंगे पर अब तमाम स्त्रोतों से पता चलता है कि वह निराश है।</p>
<p>हिंदी ब्लाग जगत के नियमित सदस्य होने के कारण मेरे पास इस टूल का बहुत शीघ्र पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी और मैंने भी इसके हाथ लगते ही उसके आजमाने का प्रयास किया। मैंने इस टूल को खोला और अग्रेजी के एक ब्लाग की विषय सामग्री की प्रतिलिपि उठाकर अपने ब्लाग पर चिपका दी। फिर परिवर्तित बटन दबाया। कुछ ही सेकण्ड में ही हिंदी में पूरी विषय सामग्री कुछ अस्वीकृत शब्दों साथ  मेरे सामने थी। उसे मैं पढ़ सक पर समझ नहीं सकता था। इसलिये सामने ही अंग्रेजी की सामग्री को पढ़ता और फिर हिंदी को देखता। इस काम में मेहनत कुछ अधिक है पर अंग्रेजी को पूरी तरह नहीं पढ़ने आने की  यह सजा कोई बुरी भी नहीं लगी। मैं अंग्रेजी का पढ़ा समझ पा रहा था इसी से मैं संतुष्ट था। अंग्रेजी व्याकरण की अच्छी जानकारी है इसलिये मुझे पढ़ने और समझने में आ रहा था। हां, शतप्रतिशत नहीं कह सकता पर यह तो अंग्रेजी वाले भी नहीं कह सकते। अंग्रेजी क्या किसी भी भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता।</p>
<p>वह ब्लाग शायद किसी ब्रिटेन या अमेरिकी ब्लाग लेखक का होगा। वह कहीं इजरायल अपने व्यवसायिक कार्य से गया था और स्टार्ट अप(start up) खाने की बात लिख रहा था। अंग्रेजी में तो स्टार्ट अप (start up) जैसा था उसे परिवर्तित टूल ने देवनागरी में करने से मना कर दिया। वह कोई खाने की वस्तु होगी ऐसा मेरा अनुमान है। वह अपने मित्र और उसके परिवार साथ कहीं पिकनिक मनाने गया और वहां के दृश्यों के बारे में लिखा। उसके बारे में लिखते हुए भी स्टार्ट अप (start up)खाने की बात कर रहा था। अनुवाद टूल अगर उसे हिंदी में बता देता तो कोई बात नहीं पर हम अभी मान लेते हैं कि स्टार्ट अप कोई समोसे जैसी चीज होगी। समोसा भी तो खाने के काम आता हैं। अब खाने की कोई भी चीज है चाहे जो नाम दे दो। क्या अंतर पड़ता है? बहरहाल उसका पाठ ठीकठाक और दिलचस्प लगा। उसके ब्लाग पर आठ लाख व्यूज थे और तय बात है कि हम अगल दस वर्ष तक तो इतनी पाठक संख्या में सोच भी नहीं सकते।</p>
<p>फिर एक दूसरे ब्लाग की सामग्री लाया। वह पूर्वी एशिया-चीन, जापान या किसी अन्य देश-की किसी महिला ब्लाग लेखक की थी। उसने भारतीय गेहूं के आटे पर वह पोस्ट लिखी थी और उसमें भारतीय आटे के गेहूं की बोरी का फोटो भी था। उसने ऐसा करना अपने मां से सीखा था और उसने अपनी मां के प्रति बहुत भावुक होकर वैसे ही प्रेम व्यक्त किया था जैसे अपने देश की महिलायें व्यक्त करतीं हैं। हां, अंग्रेजी में कुछ कठिनाई से पढ़ते हुए यह जरूर लगा कि इससे तो हमारे हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाएं बहुत अच्छा लिख लेतीं हैं। उनके विषयों में भी व्यापकता होती है।</p>
<p>फिर एक तीसरा ब्लाग बिना सोचे समझे उठा लाये। पता लगा कि वह तो खाद्य पदार्थ बनाने की विधियों से ही भरा पड़ा था। वह किसी भारतीय का नहीं लगा पर उसमें भारतीय खाद्य पदार्थ बनाने के विधियां ही थीं।</p>
<p>उस समय भारत के लोगों द्वारा अधिक मात्रा में भोजन खाने की बात सब जगह चर्चा का विषय थी और हम सोच रहे थे कि जो आदमी जिस विषय के अधिक अपना दिमाग निकट रखता है उसी पर ही वह लिख सकता है। हिंदी ब्लाग लेखक इस तरह कहां खाने पर अपना पाठ लिखते हैं? इसकी आशय तो  यह कि कि सभी सादा और कम खाने वाले हैं तभी तो इतना इस विषय पर नहीं लिखते। व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख हर विषय पर लिखे जाते हैं। </p>
<p>हम आजकल भी अंग्रेजी ब्लोग देखते हैं पर कोई ऐसा विषय उन पर नहीं दिखता कि उसे पढ़ें। राजनीतिक विषयों कह भरमार है पर वह अपने देश से संबंधित नहीं होत