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	<title>hindi-vews &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-vews/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-vews"</description>
	<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 02:23:03 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीति: जिसका ज्ञान अल्प हो उसे समझाना कठिन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=224</link>
<pubDate>Sun, 24 Aug 2008 01:25:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/24/few-knowledge_chankya-neeti/</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग लिखने में दहाड़ना कहां होता है,पूछों (टैगों)के फटकारने में बहुत दम होता है-व्यंग्य आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 07:15:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/23/teg-and-writing/</guid>
<description><![CDATA[एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उसमें उनकी शिकायत थी कि हमारे पाठ दहाड़ते बिल्कुल नहीं है पर पूंछें (टैग) उनमें अधिक लगी होती हैं। वह वरिष्ठ ब्लागर हैं,और उनके प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। सच तो यह है कि वह एक विद्वान व्यक्ति हैं और कम से कम मैं मानता हूं कि वह अध्ययन करने वाले व्यक्ति हैं। यही कारण है कि उनके सभी पाठ ब्लागवाणी पर तत्काल शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। वह एक सज्जन व्यक्ति हैं और इन हिट के बारे में शायद उनका अधिक अध्ययन नहीं है और इसलिये उन्होंने ऐसे विषय पर लिखा जिसके बारे में उनको विस्तृत रूप से जानकारी लेनी  चाहिए थी। वह अपने पाठ में तमाम तरह के संशय से भरे लगते हैं। एक तरफ वह लिखते हैं कि सुरेश चिपलूनकर आक्रामक लिखते हैं दूसरी तरफ उनको दहाड़ कम दिखाई देती है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो हमेशा ही लिखता आया हूं कि ऐसं दहाड़ने वाले पाठ लिखने का कोई लाभ नहीं है जो फोरमों पर हिट दिलवायें और आम पाठक के लिये किसी मतलब के न हों। वैसे उन वरिष्ठ ब्लागर  के पाठों पर भी बहुत कुछ लिखने लायक मेरे पास है पर वह जल्दी निराश हो जाते हैं, और इसलिये मैं उनका नाम भी नहीं दे रहा।  केवल इस पाठ के माध्यम से अपने ब्लाग मित्रों और पाठकों को समझाना भर है कि अंतर्जाल एक बड़ा व्यापक मायाजाल भी है। ब्लाग स्पाट पर सक्रिय ब्लागर लेखक कभी भी वर्डप्रेस के ब्लाग को नहीं समझ पाते। उनको यह पता ही नहीं कि वहां के लेखक क्या कर रहे हैं और क्यों नहीं उनकी परवाह करते? वर्डप्रेस के ब्लागर फोरमों से जुड़े हैं पर उनके लिखने और पढ़ने का दायरा बहुत व्यापक है। अभी एक अंग्रेजी ब्लागर ने मेरा नाम लिये बिना लिखा था कि हिंदी का एक ब्लागर वहां की श्रेणियों और टैगों का सर्वाधिक उपयोग कर रहा है और अन्य ब्लाग लेखकों को ऐसा ही करना चाहिए था। उसका यह पाठ ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं देख सकते थे क्योंकि वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड के बारे में जानते तक नहीं हैं<br />
............................................................................................</p>
<blockquote><p><strong>मेरे द्वारा उस ब्लाग पर लिखी गयी टिप्पणी<br />
आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। दरअसल मैंने ब्लाग के बारे में सवा दो वर्ष पहले मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था। उस समय कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होने के बावजूद मेरा इरादा ब्लाग बनाने का नहीं था क्योंकि मुझे बनाना ही नहीं आता था। जब बनाया तो जो उसमें पढ़ा था उसकी खास बातें मुझे याद रहीं जो यहां आपको संक्षिप्त में बता देता हूं क्योंकि उसमें बताये गये निर्देशों पर ही मैं चल रहा हूं।<br />
1.अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखते रहें। इस बात की परवाह न करें कि उसकी लंबाई चैड़ाई कितनी है। कुछ पोस्ट पाठकों को नापसंद भी आ सकते हैं, पर आप लिखें।<br />
2.अपने ब्लाग पर अधिक से टैग या श्रेणियां लगायें क्योंकि वही आपके लिखे पाठ को वहां ले जायेंगी जहां आप भेजना चाहते हैं। अगर आप अंग्रेजी में नहीं लिखते तो भी अंग्रेजी के टैग लगायें क्योंकि आम पाठक अंग्रेजी शब्दों से सर्च करता है। जितने आप टैग लगाते हैं उतने ही शब्दों पर आपका ब्लाग खुलता है।<br />
3.टिप्पणियेां की चिंता बिल्कुल न करें न इस बात की परवाह करें कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा। आप तो यह सोचिये कि कितने लोग इसे पढ़ने वाले हैंं।<br />
4.अखबार एक दिन बाद कबाड़ हो जाता है और  किताबें अल्मारी में बंद हो जाती हैं पर आपका ब्लाग हमेशा ही हवा में तैरता रहेगा। यही सोचकर लिखते रहें।<br />
5.आने वाला समय ब्लाग लेखकों के लिये उज्जवल है। </p>
<p>संयोगवश सुरेश चिपलूनकर और मैं मध्य प्रदेश के हैं, और लिखने में कहां हैं यह तो आप मित्र तय करते हैं। मैं तो लकीर का फकीर हूं। जिस बात का मुझे ज्ञान है उस विषय पर मैं किसी की नहीं सुनता और जिस बात का नहीं हैं उसके बारे में    दूसरे का सुनकर या पढ़कर उसी राह पर ही चल पड़ता हूं जब तक कोई विपरीत ज्ञान प्राप्त न हो क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिये इतना तो करना ही पड़ता है।  अधिक टैग लगाने का कोई लाभ नहीं है अगर यह बात आप या कोई अन्य ब्लाग लेखक मुझे समझा दे तों ऐसा नहीं करूंगा। वैसे जिस ब्लाग को आपने दिखाया है उसमें सबसे अधिक टैग और श्रेणियां हैं ओर पाठक भी अधिक यहीं हैं। आपका लिखा बहुत अच्छा लगा। सच तो यह है कि मैं आपसे भी बहुत सीखता हूं। आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p></blockquote>
<p>.................................................................<br />
मार्च में (शायद आठ मार्च) को उन वरिष्ठ ब्लाग लेखक महोदय ने  अपने ब्लाग पर टिप्पणियां न आने पर निराशा व्यक्त की। सारे के सारे ब्लागर टिप्पणी की रस्म अदायगी करने पहुंच गये। आज भी इस समय तक इस 12 टिप्पणियां उनके पास हैं और शाम तक यह संख्या बढ़ जायेगी। यह पाठ जो मै लिख रहा हूं हो सकता है कि एक  टिप्पणी के लिये भी  तरस जाये। ब्लागवाणी पर उनके पाठ को पांच पसंद लगी हुईं हैं और यह शायद मेरा यह  एक को तरस जाये। हां, मैं जाकर एक पसंद का बटन दबाकर आऊंगा। आमतौर से मैं ऐसा नहीं करता।  मतलब साफ है कि हम लोग फ्लाप ब्लागर है इसलिये हिट के लिये अधिक टैग लगाते हैं और वह मिलती भी हैं। मेरे पांच पाठ ऐसे हैं जिन्होंने किसी भी एक फोरम पर एक टिप्पणी भी नहीं पायी वह अब दो हजार पाठक संख्या को पार करने वाले हैं। छह ऐसे ही पाठ 1000 हजार को पार करने वाले है। पूरा देश दहाड़ रहा है। टीवी चेनल दहाड़ रहे हैं। मगर होता क्या है जब तक आदमी के दिलोदिमाग पर प्रभाव न हो। अभी चार दिन पहले तक देश के सब टीवी चैनल दहाड़ रहे थे कि अमुक मुक्केबाज स्वर्ण पदक लायेगा मगर हुआ क्या? दहाड़ने से एनर्जी जाती है भइया! शांति से अपनी बात कहने में जो प्रभाव होता है वह दहाड़ने में नहीं होता।</p>
<p>           यह आश्चर्य की बात है कि कई बार समझाने के बावजूद मेरे महापुरुषों के संदेश वाले ब्लाग से लोग छेड़छाड़ करते हैं आज भी इस ब्लाग का मनस्मृति का पाठ लिया गया है। अब बताईये क्या मैं उनके संदेशों को लेकर दहाड़ता! फिर भई दहाड़ने वाले पाठ लिखता हूं तो लोग कहते हें कि -’आप तो छोडि़ये कहां चक्कर में पड़ गये।<br />
दिलचस्प बात यह है कि मेरे पाठ को उन्होंने लिंक किया एक पाठक  ने उसे पढ़ा है बाकी नौ लोगों ने देखा भी नहीं और टिप्पणी लगा दी। इनमें मेेरे सबसे प्रिय मित्र उड़न तश्तरी ने यह भी नहीं देखा कि वहा क्या पढ़ रहे हैं और क्या लिख रहे हैं। दरअसल मैं पूरे प्रकरण में हंस रहा हूं और ऐसे ही यह पाठ लिख रहा हूं। मैं भी अपनी टिप्पणी लिख कर लौट आया पर बाद में देखा कि मेरे इसी ब्लाग से आठ महीने बाद फिर छेड़छाड़ की गयी है। पिछली जनवरी में जब इस पर पंद्रह पाठ भी नहीं थे इसे पांच अंक की रेटिंग देखकर प्रचारित किया गया था।  अब जब मैंने यह पाठ देखा तो लगा कि  प्रतिवाद आवश्यक हैं वरना तो कोई भी मेरे इन अध्यात्म ब्लाग से छेड़छाड़ कर सकता है। <a href="http://teradeep.blogspot.com"><strong>अंतर्जाल पत्रिका,</strong></a> <a href="http://dpkraj.blogspot.com"><strong>शब्दलेख सारथी </strong></a>और यह शब्दलेख पत्रिका मेरे तीन ऐसे ब्लाग हैं जिन पर मैं बहुत संवेदनशील रहता हूं इसलिये यह सभी अलग रख दिये हैं इन पर अन्य कोई सामग्री नहीं लिखता। शायद यह पाठ पच्चीस पाठक ब्लागवाणी पर जुटा लेगा क्योंकि इससे अधिक तो मुझे भी छद्म और फर्जी लगेंगे। पसंद शायद एक ही मेरा किया होगा। मुझे फोरमों पर नकली हिट की परवाह भी नहीं हैं। हमारे पाठ ब्लागवाणी पर सिंहासन नहीं मांगते इसलिये  अपनी पूंछों पर ही बैठते हैं क्योंकि वह कभी जमीन पर कभी आसमान पर उड़ते है। 195 या 120 हिट प्रतिदिन भला ब्लागवाणी पर कौन दिला सकता है? यह पूंछें ही हैं जो पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। हां देखते हैं जरा उड़न तश्तरी के चरण कमल कहों है? उन्होंने अपनी टिप्पणी में वहां यही मांग रखी थी। फिर उनको यही जवाब है कि महाराज पूंछे अधिक लगाने वाले थोड़े ही दहाडते हैं बल्कि दहाड़ने वाले तो मूंछों को लंबा चैड़ा रखते हैं। मूंछे यानि हिट तो उनके पाठों के पास हैं फिर काहे हमारे पाठों की पूछों से हैरान होते है।</p>
<p>.................................................................<br />
.........</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःबुरे राज्य में जनता सुखी नहीं रहती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=212</link>
<pubDate>Sat, 16 Aug 2008 04:11:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/16/chankya-niti-2/</guid>
<description><![CDATA[1.बुरे राजा के  राज में भला जनता कैसे सु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1.बुरे राजा के  राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है।<br />
2.बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है।<br />
3.बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है।<br />
4.बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।<br />
5.समाज में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा में लगी हुये वाणी पर रोक लगाओ। परनिन्दा में रस लेना दुष्ट लोगों के प्रवृति है । वाणी पर संयम तपस्या है। निंदा न करके दूसरों की प्रशंसा करने वाला ही लोकप्रिय होता है ।<br />
5.विद्वान् व्यक्ति वही माना जाता है जो अपने व्यक्तित्व के अनुसार वार्तालाप करता है। वह वार्तालाप के प्रसंग के अनुसार ही बात करता है। अच्छी से अच्छी बात अप्रासंगिक होकर भी अप्रभावी हो जाते है।<br />
6.यदि कोई अप्रिय बात हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो भी वह  उतना ही प्रदर्शित करना चाहिये जितना अपनी शक्ति के अनुकूल हो।</p>
<p>7.मन का संयम अर्थात शांति और स्थिर भाव के समान कोई दूसरा तप नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं, तृष्णा जैसा दु:ख देने वाला और भयंकर रोग नहीं तथा दया जैसा स्वच्छ और अच्छा दूसरा कोई धर्म नहीं । अत: सुख के इच्छुक व्यक्ति को तृष्णा से बचना चाहिए तथा सफलतम जीवन में शांति,संतोष और दया को अपनाना चाहिए। इसी में महानता है।<br />
-----------------</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का अनादर करते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=210</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 03:22:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/15/vidur-neeti/</guid>
<description><![CDATA[1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निर्भय होना ये किसी मनुष्य के लिए लिये इस लोक में छह सुख हैं।<br />
2. ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, मन में असंतोष रखने वाला, क्रोधी, सदैव संशय में रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन पर निर्भर रहने वाला छह लोग सदा दुखी रहते है।<br />
3. शिक्षा समाप्त कर चुका शिष्य अपने गुरु का, विवाहित पुत्र अपनी मां का, काम भावना शांत होने पर पुरुष स्त्री का, कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का, नदी की धारा पार कर लेने वाला पुरुष नाव का  तथा रोग मुक्त हुआ रोगी अपने चिकित्सक का सदा अपने  अनादर करते हैं<br />
4.स्त्रियों के विषय में आसक्त रहना, जुआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी बोलना, अत्यंत कठोर दंड देना और अपने धन का दुरुपयोग करना यह सात दुर्गुण त्याग देना में ही भलाई है। </strong></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःअर्थ और काम में लिप्त न होने वालों को ही धर्म प्रचार का अधिकार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=197</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 05:53:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/09/manu-smruti-3/</guid>
<description><![CDATA[१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों में आसक्ति रखता उसकी धर्म में रूचि हो ही नहीं सकती और होगी तो दिखावे की। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए धर्म ग्रंथों का ज्ञान ही सर्वोच्च प्रमाण है।<br />
२.वेदों में जहाँ दो कथनों में विरोध हो वहाँ विद्वान लोगों को बराबर महत्व देते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।<br />
३.धर्म के चार लक्षण हैं-१.वेदों द्वारा प्रतिपादित २. स्मृतियों द्वारा अनुमोदित ३. महर्षियों द्वारा आचरित 4. जहाँ किसी विषय में एक से अधिक मत हों वहाँ उस धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय। इन कसौटियों पर सिद्ध होने वाला ही प्रामाणिक धर्म है।</strong></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःस्वामी वही जो नौकर से भी निभाये]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=195</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 01:25:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/08/manu-smruti-2/</guid>
<description><![CDATA[आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषितमादित:।<br />
स: दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम।।</strong><br />
मनु स्मृति के इस श्लोक के अनुसार जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से स्वामी के आदेश का पालन करता है वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित रहे तो भी उसे वेतन प्रदान करना चाहिए। </p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong> आज हम अक्सर ऐसी घटनाएँ देखते हैं जिसमें नौकर द्वारा मालिक के प्रति तमाम तरह के अपराध किये जाते हैं। दरअसल आज के भौतिक युग में सब जगह अविश्वास का माहौल है और ऐसे में किसी का विश्वास जीतना है तो उसकी सहायता कर ही यह संभव है। जो लोग धनी हैं उन्हें अपने नौकरों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि विपति में वह उसकी सहायता करेंगे। कोई भी मालिक जब अपने नौकर को कोई काम कहता है तो वह उसे ईमानदारी से करता है तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए। जब कई लोग बेईमानी से काम करते हैं उनको भी वेतन मिलता है तो और ईमानदार को भी वही तो न्याय कहाँ रह जाता है। </p>
<p>जो धनिक लोग चाहते हैं कि उनके नौकर ईमानदार रहें उन्हें उनके लिए नियत वेतन के साथ उसकी ईमानदारी के लिए एक राशि अपने मन में रख लेना चाहिए जो उसे बीमार पड़ने, बच्चों की शिक्षा और बेटी के विवाह आदि के समय उपहार के रूप में देनी चाहिए। अगर वह कभी स्वयं बीमार पड़ जाता है तो उसका वेतन तो देना चाहिए बल्कि उसका इलाज भी कराना चाहिए। उसे विश्वास दिलाना चाहिऐ कि वह अगर नौकर के रूप में वफादारी निभाएगा तो हम मालिक की तरह भी निभाएंगे। याद रखना श्रम खरीदा जा सकता है पर ईमानदारी नहीं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःकमजोर का मजाक न उड़ायें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=193</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 01:04:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/07/sant-kabir-vani-4/</guid>
<description><![CDATA[अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान<br />
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।</p>
<p><strong>कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय<br />
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
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</item>
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<title><![CDATA[भृतहरि शतकः युवावस्था  में कदम बहकना स्वाभाविक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=185</link>
<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 03:35:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/30/bhruthari-shatak/</guid>
<description><![CDATA[श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि<br />
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।<br />
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ<br />
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ’- </strong>जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें। </p>
<p>यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।</p>
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</item>
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<title><![CDATA[मनुस्मृतिःबिना मांगे मिली वस्तु ही अमृत समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 04:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/26/manu-smruti/</guid>
<description><![CDATA[१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।<br />
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।<br />
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।<br />
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।<br />
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।<br />
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है।<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःसफलता के मद में उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करना वर्जित]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 04:06:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/24/vidur-niti/</guid>
<description><![CDATA[1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से पहले उसका महत्व समझ लेना चाहिए। अपना काम प्रारंभ करने से पहले पूरी तरह सूच विचार करना ठीक है। उतावली से कोई भी काम आरंभ नहीं करना चाहिए।<br />
2.घैर्यवान मनुष्य क लिए यह उचित है कि पहले अपने कर्म का उद्देश्य, संभावित परिणाम तथा  उससे होने वाले लाभ से अपने जीवन के विकास का विचार कर कार्य प्रारंभ करे।<br />
3.जो मनुष्य अपनी स्थिति, लाभ,हानि, धन, देश तथा दण्ड का विचार नहीं कर सकता वह कभी अपने जीवन में स्थिर नहीं रह सकता।<br />
4जो मनुष्य उपलब्ध तथ्यों के प्रमाण को सही तरह से जानता है और धर्म अर्थ का जिसे पूर्ण ज्ञान है वही दत्त चित होकर अपना कार्य कर पाता है और विकास की तरफ बढ़ता है।<br />
5.जिसे सफलता प्राप्त हो गयी है उसे अगर गर्व में चूर होकर किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार सपंत्ति तथा उपलब्धि को नष्ट कर देता है जैसे सुंदरता को बुढ़ापा<br />
................................................</p>
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दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 04:50:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/18/hindi-yog-sadhana/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर  के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं। </p>
<p>योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है।  अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते  हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये। </p>
<p>इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।<br />
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।<br />
...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःभक्ति एकांत तथा अध्ययन समूह में करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 04:06:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/17/chanakya-policy-privacy-and-devotional-study-group-should-be-in/</guid>
<description><![CDATA[1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, शक्ति से राज्य तथा गुणवान पत्नी से घर की रक्षा होती है।<br />
2.वासना इस संसार का सबसे बड़ा रोग है। वासना से मनुष्य का शरीर अंदर ही अंदर से खोखला होने के साथ बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है।<br />
3.क्रोध एक तरह से अग्नि है जो पूरे संसार को जलाकर राख कर देती है। यह इंसान का पूरी तरह विनाश करता है।<br />
4.जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है वह हमेशा सुखी रहेगा।<br />
5.बुद्धिमान और ज्ञानी स्वर्ग, चोर अपने जीवन और भोगी विलासी मनुष्य सुंदर स्त्री की कामना करते हैं।<br />
6.समुद्र के लिये जिस तरह वर्षा होना या न होना बराबर है उसी तरह जिसका पेट भरा है उसके लिये उत्तम से उत्तम भोजन व्यर्थ है।<br />
7.तपस्या, भक्ति. पूजा तथा साधना हमेशा एकांत में करना चाहिए जबकि विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से अध्ययन करना चाहिए। उसी तरह गायक समूह गान गायें तो प्रभावित करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-सूर्य के सामने दीपक क्या करेगा?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Wed, 16 Jul 2008 04:03:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/16/chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर सकता है? अमीर आदमी को दान देने से क्या लाभ? जिसके पास पर्याप्त मात्रा में धन हो उसके सामने दान दी गयी वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। दान सदैव निर्धन को दिया जाना चहिए।<br />
2.निर्धन सदा धन की तलाश में भटकते हैं, उनके हृदय में सद धनी बनने की आकांक्षा बनी रहती है<br />
3.प्रत्येक मनुष्य की यह इच्छा रहती है कि वह मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करे। अपनी पूरी आयु इसी इच्छा की पूर्ति में नष्ट कर देता है। सभी इंसान अपनी इच्छाओं के दास बनकर रहे गये हैं।</strong></p></blockquote>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>हमारे देश के लोगों में  दान की प्रवृत्ति जन्मजात रहती है। सामान्य आदमी हमेशा थोड़ा बहुत दान करता है पर यह दान अधिकतर कुपात्रों को मिलता है-यह दान उन भिखारियों को मिलता है जो अधिकतर मंदिरों के बाहर खड़े होते हैं और उनकी यह आदत होती है न कि बाध्यता। इसके अलावा उन तथाकथित गुरुओं और संतों को मिलता है जिनके लिये भक्ति और ज्ञान बेचना एक व्यवसाय है। वह इस धन से तमाम तरह के आश्रम बना लेते हैं और फिर उनका उपयोग भी व्यवसायिक ढंग से धर्म के नाम पर ही करते हैं। </p>
<p>ऐसे अनेक किस्से आते हैं कि अमुक भिखारी मरा तो उसके घर से ढेर सारा धन बरामद हुए। कई लोग तो अच्छा खासा परिवार होते हुए भी भीख मांगते हैं क्योंकि यह एक आदत है जिसे पड़ जाये वह छूटती नहीं है। अतः दान हमेशा ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। वह मांगता न हो पर उसकी आवश्यकता हमारी दृष्टि में आ जाये तो उसकी सहायता करना चाहिए। यह सहायता इस तरह करना चाहिए जैसे कि उसे न लगे कि हम दान कर रहे हैं। यही सच्चा दान है। मांगने पर यह बताकर दान करने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/12/bhrut-hari-shatak-the-idea-of-heaven-in-vain-to/</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-दीनता के भाव बिना भक्ति का आनंद नहीं मिलता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 04:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/09/rahim-ke-dohednta-aur-bhakti/</guid>
<description><![CDATA[दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहिं<br />
रहिमन चातक रटनि हूँ, सर्वर को कोऊ नाहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों को ही निहारता रहता है पर चातक स्वाती नक्षत्र की बूँद को ही रटता रहता है और तालाब के जल को नहीं पीता। </p>
<p><strong>सक्षिप्त व्याख्या-</strong>इसका  आशय यह कि एक भक्त के लिए भगवान का ही महत्व होता है और वह किसी अन्य की कामना नहीं करता है। किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से वह प्रेम कर ही नहीं सकता। वह तो बस अपनी साधना में लीन रहता है। जो लोग भक्ति करते समय भी अन्य विषयों पर चर्चा करते हैं वह केवल दिखावा करते हैं।</p>
<p><strong>दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु<br />
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि भगवान् के प्रति दैन्य भाव से की गयी भक्ति करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है उसे इस भौतिक जगत से प्रेम करने वाले क्या समझ पाएगे। दीनता अपने आप में एक ऐसा गुण है जिससे दीनबंधु (परमात्मा) से बंधुत्व का आभास होता है।<br />
<strong>संक्षिप्त व्याख्या- </strong>इसका तात्पर्य यह है कि दीनता का भाव रखकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जो लोग अपने पद, पैसे और प्रतिष्टा के अहंकार में हैं उन्हें ईश्वर से क्या वास्ता क्यों कि ईश्वर ने उन्हें पहले ही मोह माया के जंजाल में डाल दिया है। अगर मन में अपने कर्ता होने का अहंकार है तो भक्ति का आनंद कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। भक्ति का आनंद से आशय यह है कि हम अपने सांसरिक कार्य करत हुए कभी कोई तनाव अपने अंदर अनुभव न करें। सच्ची भक्ति से विकास निकल जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/08/editoriyal-on-the-post/</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपशुओं  की टांग खाने पर दवा भी लेनी पड़ती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 04:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/08/dohe-of-rahim-2/</guid>
<description><![CDATA[रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है कि लोग तो  भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-</strong>वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।</p>
<p>आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिये लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान  कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। हृदय से भक्ति करने के लाभ होते हैं यह अब विज्ञान भी मानने लगा है। भजन भक्ति करते हुए आदमी सांसरिक विषयों से अपने मस्तिष्क को मुक्त कर लेता है और इस कारण उसका शुद्धिकरण हो जाता है। ध्यान को मन खुश करने के लिये एक बहुत बड़ा साधन माना गया है। अगर भगवान का नाम हृदय से स्मरण किया जाये तो अनेक विकार स्वतः परे जायेंगे, इसमें संशय नहीं है।</p>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/04/sant-kabir-speech-the-sadhus-do-not-believe-to-pay-respect-jokar/</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पात्र नहीं बने]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:22:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/07/03/rahims-couplets-their-stories-to-the-pain-of-others-does-not-become-a-laughing-stock/</guid>
<description><![CDATA[रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय<br />
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।</p>
<p>कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’</p>
<p>हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम तो स्वार्थ का होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:02:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/30/sant-kabir-speech-the-selfless-love-is/</guid>
<description><![CDATA[प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं<br />
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है। </p>
<p>आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःहमारे शरीर में विपत्तियां सहने की क्षमता होती है अधिक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 04:48:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/26/rahim-ke-dohesharir-aur-vipattiyan/</guid>
<description><![CDATA[जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह<br />
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है। </p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।</p>
<p>मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया? </p>
<p>इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/24/rahim-ke-dohe-2/</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/22/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/07/hindi-poe/</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:किसी के कहने से बड़े लोग छोटे नहीं हो जाते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=141</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 04:10:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/07/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8/</guid>
<description><![CDATA[
जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="deleteBody">
<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं<br />
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।</p>
<p><strong>जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय<br />
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है 