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	<title>hindi-ved &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-ved/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-ved"</description>
	<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 18:15:39 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[इश्क पर लिखते हैं, मुश्क कसते हैं शायर-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</link>
<pubDate>Mon, 18 Aug 2008 16:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने साथ भतीजे को भी
फंदेबाज घर लाया औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने साथ भतीजे को भी<br />
फंदेबाज घर लाया और बोला<br />
‘दीपक बापू, इसकी सगाई हुई है<br />
मंगेतर से रोज होती मोबाइल पर बात<br />
पर अब बात लगी है बिगड़ने<br />
उसने कहा है इससे कि एक ‘प्रेमपत्र लिख कर भेजो<br />
तो जानूं कि तुम पढ़े लिखे<br />
 नहीं भेजा तो समझूंगी गंवार हो<br />
तो पर सकता है रिश्ते में खटास’<br />
अब आप ही से हम लोगों को  आस<br />
इसे लिखवा दो कोई प्रेम पत्र<br />
जिसमें हिंदी के साथ उर्दू के भी शब्द हों<br />
यह बिचारा सो नहीं पाया पूरी रात<br />
मैं खूब घूमा इधर उधर<br />
किसी हिट लेखक के पास फुरसत नहीं है<br />
फिर मुझे ध्यान आया तुम्हारा<br />
सोचा जरूर बन जायेगी बात’</p>
<p>सुनकर बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त यह कौनसी शर्त लगा दी<br />
कि उर्दू में भी शब्द हों जरूरी<br />
हमारे समझ में नहीं आयी बात<br />
वैसे ही हम भाषा के झगड़े में<br />
फंसा देते हैं अपनी टांग ऐसी कि<br />
निकालना मुश्किल हो जाता<br />
चाहे कितना भी जज्बात हो अंदर<br />
नुक्ता लगाना भूल जाता<br />
या कंप्यूटर घात कर जाता<br />
फिर हम हैं तो आजाद ख्याल के<br />
तय कर लिया है कि नुक्ता लगे या न लगे<br />
लिखते जायेंगे<br />
हिंदी वालों को क्या मतलब वह तो पढ़ते जायेंगे<br />
उर्दू वाले चिल्लाते रहें<br />
हम जो शब्द बोले  उसे<br />
हिंदी की संपत्ति बतायेंगे<br />
पर देख लो भईया<br />
कहीं नुक्ते के चक्कर में कहीं यह<br />
फंस न  जाये<br />
इसके मंगेतर के पास कोई<br />
उर्दू वाला न पहूंच जाये<br />
हो सकता है गड़बड़<br />
हिंदी वाले सहजता से नहीं लिखें<br />
इसलिये जिन्हें फारसी लिपि नहीं आती<br />
वह उर्दू वाले ही  करते हैं<br />
नुक्ताचीनी और बड़बड़<br />
प्रेम से आजकल कोई प्यार की भाषा नहीं समझता<br />
इश्क पर लिखते हैं<br />
पब्लिक में हिट दिखते हैं<br />
 इसलिये मुश्क कसते हैं शायर<br />
फारसी  का देवनागरी लिपि से जोड़ते हैं वायर<br />
इसलिये हमें माफ करो<br />
कोई और ढूंढ लो<br />
नहीं बनेगी हम से तुम्हारी बात<br />
.........................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 05:36:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः<br />
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः</p>
<p>जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।</p>
<p>सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक ढूंढो हजार मूर्ख मिलते हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 16:53:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=138</guid>
<description><![CDATA[    कल बिहार में एक स्थान पर एक महिला को ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>    कल बिहार में एक स्थान पर एक महिला को जादूटोना करने के आरोप जिस  बहशी ढंग से अपमानित किया गया हैं वह देश के लिये शर्म की बात है। यह कोई पहली घटना नहीं है जो ऐसा हुआ है और न शायद यह आखिरी अवसर है। पहले भी  ऐसी घटनाएं हो चुकी है। यह कोई अभी नहीं हो रहीं है बल्कि सदियो से हो रहीं हैं यह अलग बात है कि अब सूचना माध्यम के शक्तिशाली होने की वह राष्ट्रीय पटल पर आ जातीं है। ऐसी घटनाओं को देख कर अपने इस समाज के बारे में क्या कहें?</p>
<p>एक तरफ प्रचार माध्यम यह बताते हुए थकते नहीं हैं कि भारतीय संस्कृति को विदेशी लोग अपना रहे है- कहीं कोई विदेशी जोडा+ भारतीय पद्धति से विवाह कर रहा है तो कहीं कोई विदेशी दुल्हन देशी दूल्हे से विवाह कर देशी संस्कृति अपना रही है तो कहीं विदेशी दूल्हा देशी दुल्हन के साथ सात फेरे लेकर भारत की संस्कृति आत्मसात  रहा है। एसी खबरें पढ़कर लोग खुश होते है कि हमारी संस्कृति महान है।</p>
<p>ऐसे प्रसंग केवल विवाह तक ही सीमित रहते है और हम मान लेते हैं कि हमारी संस्कृति और संस्कार महान है। मगर क्या हमारी संस्कृति विवाह तक ही सीमित है या हमारी सोच ही संकीर्ण हो गयी है। हिंदी फिल्मो में  एक प्रेम कहानी जरूर होती है जो तमाम तरह के घुमाव फिराव के बाद विवाह पर समाप्त हो जाती है। फिल्म के लेखक विवाह के आगे इसलिये नहीं सोच पाते कि वह भारतीय समाज से जुड़े है या इन फिल्मों को देखते-देखते हमारे समाज की सोच विवाह के संस्कार तक ही सिमट गयी है यह अलग विचार का विषय है। हां, समाज पर फिल्म का प्रभाव देखकर तो यही लगता है कि अब लोग इससे आगे सोच नहीं पाते।</p>
<p>मैंने जब यह दृश्य देखा तो बहुत क्रोध आ गया। वजह! मेरा मानना है कि महिला चाहे कितनी भी बुरी हो वह क्रूर नहीं होती। उसे गांव का एक बुड्ढा आदमी मार रहा था और अन्य औरतें भी उसे मार रहीं थीं। उसके बाल काटे गये। इस बेरहमी पर उसे बचाने वाला कोई नहीं था। मुझे तो उन गंवारों पर बहुत गुस्सा आ रहा था मेरा तो यह कहना है कि उनमें जो महिलाएं थी उन सबसे खिलाफ भी  कड़ी कार्यवाही होना चाहिए।</p>
<p>ऐसी घटनाऐं देखकर मन में अमर्ष भर जाता है। हम जिस कथित संस्कृति की बात करते हैं उसका स्वरूप क्या है? आज तक कोई स्पष्ट नहीं कर सका। यहां मैं बता दूं कि अध्यात्म अलग मामला है और उसका जबरदस्ती संस्कारों और संस्कृति से जोड्ने की जरूरत नहीं है क्यांकि कोई भी विवाह श्रीगीता का पाठ पढ़कर संपन्न नहीं कराया जाता जो कि हमारे अध्यात्म का मुख्य आधार है। उसे कई लोग अपनी जिन्दगी में नहीं पढ़ते और अपनी औलादों को भी नहीं पढ़ने देते कि कहीं उसे पढ़कर वह विरक्त न हो जायें और बुढ़ापे में हमारी सेवा न करें। अंधविश्वास और रूढियों के कारण इस देश का समाज पूरे विश्व में बदनाम है और हम जबरन कहते हैं कि बदनाम किया जा रहा है। गाव में अनपढ़ तो क्या शहर के पढ़े लोग भी अपनी समस्याओं के लिये जादूटोना करने वाले ओझाओं और पीरों के पास जाते है।<br />
खानपान और रहन-सहन में कमी की वजह से बच्चा बीमार हो गया तो कहते हैं कि किसी की नजर लग गयी। मां.-बाप की लापरवाही की वजह से बच्चा बहुंत समय ठीक नहीं हो रहा है तो लगाते है आरोप लगाते कि किसी ने जादूटोना किया होगा। </p>
<p>कमअक्ली के कारण किसी भी काम में सफल नहीं हो रहे तो दूसरों को दोष देते हैं। गांव और शहर एक बहुंत बड़ा तबका अपने आलस्य और व्यसनों की आदतों की वजह से हमेशा संकट में रहता है। आदमी दारू पीते हैं अपने घर में खर्चा नहीं देते पर घर की महिलांए किसी को अपनी पीड़ा नहीं बतातीं और फिर अपना मन हल्का करने के लिए शुरू होता है जादूटोना वाले ओझाओं के पास जाने को दौर।<br />
वह बताते हैं कि उपरी चक्कर है किसी ने जादूटोना किया है। कभी ‘अ’ से नाम बतायेंगे तो कभी ‘ब’ से। ऐसे में कोई निरीह औरत अगर उनके गांव में हो तो उसकी आफत। गांव में एक.दूसरे के प्रति अंदर ही अंदर दुश्मनी रखने वाले लोग मौके का फायदा उठाते हैं और अगर उस औरत को कोई नहीं है और गांव के बूढ़े जो बाहर से भक्त बनते है और अंदर के राक्षस हैं अपना मौका देखते है। ऐसे में कहना पड़ता हैं कि ‘रावण मरा कहां है’। एक निरीह औरत  को मारती हुई औरतें क्या भली कहीं जा सकतीं है। आखिर ऐसी समस्या किसी पुरुष के साथ क्यों नहीं आती? </p>
<p>एक प्रश्न अक्सर समझदार और जागरुक लोग उठाते है कि  ं हमारे देश में आजकल अनेक साधु संत हैं जिनका प्रचार पूरे देश में है पर इनमें से कोई भी इन चमत्कारों के खिलाफ नहीं बोलता बल्कि ईश्वरीय चमत्कारों की कथा सुनाकर वाहवाही लूटते है। भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम का नाम तो केवल लोग दिखावे के लिये लेते हैं। यह सही हैं कि यज्ञ, हवन, मंत्रजाप  और मूर्ति पूजा से मानसिक लाभ होता है क्योंकि इससे आदमी के मन में विश्वास पैदा होता है और वह  सात्विक कर्म करने के लिये प्रेरित होता है। इसका लाभ भी उसी का होता है जो स्वयं करता है। अगर एसा न होता तो ऋषि विश्वामित्र भगवान श्रीराम को अपने यज्ञ और हवन की रक्षा के लिये नहीं ले जाते और श्रीराम जी बाणों से राक्षसों का वध नहीं करते बल्कि खुद भी मंत्रजाप और यज्ञ-हवन करते। हमारें मनीषियों ने हमेशा ही जादूटोनों और चमत्कारों का विरोध करते हुए सत्कर्म को प्रधानता दी है। जबकि हमारें देश का एक बहंुत बड़ा वर्ग जो उनको मानने और उनके बताये रास्ते पर चलने के जोरशोर से चलने को दावा तो करता है पर वह ढोंगी अधिक है। आत्ममंथन तो कोई करना नहीं चाहता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय अध्यात्म हमारे देश की अनमोल निधि है पर अपने देश में जिस तरह जादूटोना ओर चमत्कारों का प्रचार होते देखते है तो यह कहने में भी संकोच नही होता कि दुनियां के सबसे अधिक बेवकूफ हमारे देश में ही बसते है एक ढूंढो हजार मिलते है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ ब्लोगर लेखक और लेखक ब्लोगर (3)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/blog-lekhak-aur-lekhak-blog/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 14:34:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/18/blog-lekhak-aur-lekhak-blog/</guid>
<description><![CDATA[मैं पिछले कई दिनों से लगातार देख रहा ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं पिछले कई दिनों से लगातार देख रहा हूँ कि कुछ लोग अपने साथ कोई लेबल लगा कर रहना चाहते हैं. यह मानव प्रवृति है कि  वह कोई समूह बनाने के लिए अपने साथ कोई न कोई लेबल लगाना चाहता है ताकि वैसे ही लेबल लगाने वाले उससे जुड़ें. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी यह  स्वाभाविक  प्रवृति है. इधर आजकल ब्लोगरों को एक समूह में पिरोने का विचार चल रहा है. ब्लोगर और साहित्यकार क्या अलग-अलग होंगे?यह प्रश्न मेरे सामने था और मैं उसका उत्तर लिखते ही ढूँढता हूँ-मेरी अक्ल लिखते ही काम करती है. अगर कोई मुझे कोई योजना बनानी होती है तो भले ही लिखने न हो पेन अपने हाथ में ले लेता हूँ और आगे बढ़ता हूँ. </p>
<p>मैं मूलत: एक लेखक हूँ और ब्लोग मेरे लिए कापी और पेन की तरह है. कापी और पेन कई लोगों के पास होती है पर  सभी लेखक नहीं बन जाते. कापी या कागज़ लेकर क्लर्क, अधिकारी, और महाजन भी लिखते हैं पर लेखक नहीं कहलाते. ब्लोग से पहले कंप्यूटर शब्द का विश्लेषण कर लें C= केल्कूलेटर A= घड़ी m= मेज  P= पेन U= अलमारी T= टाईप राईटर E= इलेक्ट्रोनिक R= रजिस्टर. मुझे यह बहुत पहले एक इंजीनियर ने अपनी किताब में दिखाया था और हो सकता है कि इसमें एक दो शब्द मुझे वैसे याद न हो. उसने कहा था कि कंप्यूटर और कुछ नहीं ऐसी चीजों का संग्रह है. मतलब ब्लोग कोई आसमान से टपकी चीज नहीं है, बस ऐसे ही जैसे पहले नौटंकी देखने घर से बाहर जाते थे अब टीवी पर ही देख लेते हैं. इसी तरह ब्लोग पर लेखक हैं पर साहित्यकार उनमें कौन अपने को मानता है यह उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए, पर हाँ इसका उपयोग कुछ लोग डायरी की तरह भी कर सकते हैं तो कुछ मित्र  बनाने के लिए भी कर सकते हैं तो कुछ अपने विज्ञापनों को क्लिक कराने के लिए ऐसी सामग्री रख सकते हैं जो पठनीय है, पर साहित्यकार वही होंगे जो अपनी मौलिक रचना प्रस्तुत  करेंगे. जो मौलिक रचना देंगे वही होंगे साहित्यकार.<br />
जब मैंने ब्लोग बनाना शुरू किया था तो मेरा विचार  यह था कि देखें तो आखिर होता क्या है. मैं एक ईपत्रिका पर नारद को देखता था तब मुझे कभी नहीं लगा कि वहाँ साहित्य लिखने  के लिए कोई जगह है वह तो जब मेरे हाथ ब्लोग लगे तो मैं उस पर अपनी ई-पत्रिका बनाने के लिए मैदान में उतरा था. </p>
<p>   अब यहाँ तमाम  तरह के सवाल आते हैं तो मुझे लगता है कि उनका मुझसे कोइ संबंध सिर्फ इतना है कि मैं एक लेखक हूँ और जब किसी बात का महत्व सार्वजनिक रूप से है तो मुझे उस पर लिखना चाहिए. कोई लिखने की इच्छा से यहाँ आ रहा है और उसे यहाँ आकर पता लगता है कि वह तो ब्लोगिंग कर रहा है पर आम पाठक के लिए एक लेखक है. मेरे दोस्त मुझे बाहर और कंप्यूटर पर एक लेखक के रूप में पढ़ते हैं. अगर ब्लोगरों का एक वर्ग यह चुनौती दे रहा है कि यहाँ ब्लोगर आगे रहेंगे और साहित्यकार नहीं तो वह उनका तर्क है. हकीकत यह है कि अंतरजाल पर पाठक तभी जुडेंगे जब उन्हें वैसा ही रुचिकर, ज्ञानवर्द्धक पढ़ने के मिलेगा और यह केवल साहित्य लिखने वालों के बूते की बात है. मैं इस बात से बहुत खुश हूँ कि यहाँ मैं कई ऐसे ब्लोग पर लिखने  वाले  देख रहा हूँ जो साहित्यकार बनने की संभावना वाले हैं. जिनमें लिखने की साहित्य वृत्ति है वह बहुत जल्दी  परिणाम चाहने वाले नहीं है और वही ब्लोग की विधा को आगे ले जाने वाले  हैं . अगर आगे रहने की बात है और उसका संबंध कमाने से है  तो अभी ब्लोगर आगे रहेंगे. मैं एक साहित्य सृजन करना चाहता हूँ और मुझे पता है कि यहाँ मेरे लिए अर्थार्जन की कोई संभावना है क्योंकि उसमें लिखने के साथ दूसरी गतिविधियों की तरफ ध्यान देना होता है. जो कमाने के लिए उतरेंगे वह ब्लोगर संपादक बनाकर भी अपना ब्लोग चलाएंगे पर  जो खुद लिखने वाले हैं उसके लिए यहाँ रास्ता आसान नहीं है, पर उनके बिना ब्लोगर एक कदम भी नहीं चल पायेंगे.</p>
<p>मेरा लक्ष्य साफ है कि अंतर्जाल पा हिन्दी भाषा   की  श्री वृद्धि करना  और अपना साहित्य लिखना. मेरे जैसे लोगों की कमी नहीं है और जो साहित्य सृजन की दृष्टि से आये हैं उन्हें तमाम तरह के बंटवारों  से दूर रहना चाहिऐ  अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिए क्योंकि साहित्य श्रेणी का कोई बंटवारा तो है ही नहीं भले ही  वह अंतर्जाल तकनीकी के बारे में हो. एक बात जो साहित्य श्रेणी के लेखक  ब्लोगरों को करना चाहिऐ कि वह बाहर भी सक्रिय रहें और अखबार आदि में भी प्रचार करें क्योंकि अभी जो इस बारे में जानकारी वहाँ छप  रही है और कुछ ब्लोगरों के प्रचार तक सीमित है. इतना ही नहीं यहाँ छपने वाले लेखों में भी यह साबित की जा  रही हैं कि बस वहीं है सब कुछ. अब अगर ब्लोगरों और साहित्यकारों में विभाजन हो ही रहा है तो फिर साहित्य श्रेणी  के लेखक ब्लोगरों को एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना होगा. इसलिए अगर अखबार वगैरह में ऐसे लोगों का भी प्रचार करें जो साहित्यक श्रेणी के हों. वर्तमान में कुछ ब्लोगर बाहर लिख रहे  हैं वह पूर्ण नहीं है और जो पत्रिका वगैरह में लेख भेजें  वह साहित्य लेखन से लिखे जा रहे ब्लोग का उल्लेख प्रभावपूर्ण ढंग से करें. अभी तो शुरूआत है और अभी  तय होना बाकी है कि कौन श्रेष्ट है कौन नहीं. </p>
<p> वैसे एक सत्य और भी है कि अभी साहित्यक श्रेणी के लोगों को बहुत बड़ी रचनाएं लिखने से बचना चाहिए और गागर में सागर की नीति अपनानी चाहिए और यह काम केवल साहित्यकार ही कर सकता है. वैसे एक बात और कि अगर सादा हिन्दी फॉण्ट का उपयोग अगर संभव हो जाये तो साहित्य श्रेणी के लेखक ब्लोगर अपनी बढत   बहुत जल्दी कायम कर लेंगे. दिलचस्प बात यह है के एक मेरा ब्लोग है जिस पर केवल साहित्य ही है और वह कई लोगों की पसंद  बना हुआ है. मैं उस पर कम ही लिखता हूँ कि उस पर लिखी पोस्टें तत्काल कोई अधिक नहीं देखी जातीं. उसी ब्लोग को देखकर मेरा यह मानना है कि अच्छा साहित्य लिखने वाले यहाँ सफल होंगे.  इस ब्लोग जगत में मेरे बहुत मित्र हैं और कई लोगों से मैं असहमत होता हूँ पर गुस्सा आने की बजाय  उस पर लिखता हूँ यह बताने के लिए मुझे मत भूलो क्योंकि आप ही लोग मुझे लाये हो. अगर मैं साहित्यकार नही होता और मुझमें साहित्य के प्रति झुकाव नहीं होता तो भला क्या मैं टिकता. सादा हिन्दी फॉण्ट में लिखने  वाला कोई अगर यूनीकोड में लिखने के लिए  तैयार हो सकता है तो वह साहित्यकार ही हो सकता है. </p>
<p>इसलिए मेरे साहित्य श्रेणी के नये और फ्लॉप ब्लोग  लेखकों और लेखक ब्लोगरों तुम अपने लिखने की तरफ ध्यान देते रहो. कई और तरह के बदलाव आने वालें है और उनका सामना तभी कर पाओगे जब खुद लिखोगे. अभी कई तरह की चालाकिया होना शुरू हो गयीं हैं. गुटबंदी साफ दिखाई दे रही है. तुम उस तरह लिखो कि कोई तुम्हारी उपेक्षा नहीं  कर सके. मुझे ऐसा कभी नही लगा था कि लोगों के उसूल किसी के लिए एक तो दूसरे के लिए दूसरे होते हैं. साहित्यकार का मन कोमल होता है और वह छोटी बातों को अनदेखा कर देते हैं पर जब एक सामूह का प्रश्न हो तो उसे उठाते हैं और उनका लिखा साहित्य ही होता है.       </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाणक्य नीति:धन  की शोभा उसके  उपयोग में ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 06:18:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[      1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>      1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है।</p>
<p>     2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।</p>
<p> 3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।   </p>
<p>  4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।</p>
<p>5.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:प्रीति में चालाकी जरूरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/11/203/</link>
<pubDate>Sun, 11 Nov 2007 06:37:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/11/203/</guid>
<description><![CDATA[
 1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<br />
<blockquote><p> 1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</blockquote>
<p>2.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि  हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से  समय पर न विद्या काम आती है न धनं.</p>
<blockquote><p>3.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैंजो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.</p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: विद्वान् के लिए कोई देश पराया नहीं]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/08/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 03:31:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[              1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>              1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दुसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,</p>
<p>        2.   मछली दर्शन से, कछ्वों ध्यान से, पक्षी स्पर्श से अपने बच्चों को पालते हैं, उस प्रकार सज्जनों की भी संगति में मनुष्य पलते हैं।<br />
          3.विद्या कामधेनु के समान गुण वाली है। वह असंभव में भी फल देती है। विदेश में वह भाई के समान है। वह एक प्रकार का गुप्त धन है। इस कारण विद्या और ज्ञान का संचय अवश्य करना चाहिए।<br />
          4.   सामर्थ्य के आगे कोई वस्तु भारी नहीं। व्यापारी के लिए कोई देश दूर नहीं, विद्वान् के लिए कोई देश पराया नहीं और मधुर बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समस्याओं के जंगल में आन्दोलन ]]></title>
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<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:34:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[लोग भीड़ में जाकर
जुलूस सजाते हैं
चीख-]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लोग भीड़ में जाकर<br />
जुलूस सजाते हैं<br />
चीख-चिल्लाकर नारे लगाते हैं<br />
और फिर आश्वासन और वादों का<br />
पुलिंदा लेकर वापस आते हैं<br />
कई बरस से चल रहा है<br />
आंदोलनों का सिलसिला<br />
पर फिर भी किसी को कुछ नहीं मिला<br />
समस्याओं के रोग नित बढते जाते हैं</p>
<p>अभी तक इतने आश्वासनों, वादों और<br />
घोषणाओं के पुलिंदे बंट चुके हैं कि<br />
उनेमें कोई तोहफे होते तो<br />
सब जगह इन्द्रपुरी जिसे दृश्य होते<br />
पर फिर जुलूस के लिए<br />
कहाँ से लोग जुटाए जाते<br />
कमरे के बाहर की राजनीति तो<br />
दिखाई देती है<br />
पर अन्दर के सौदे कौन देखे<br />
इसलिये लोग जहाँ से चलते हैं<br />
फिर लॉट कर वहीं अपने को पाते हैं<br />
समस्याओं के इस जंगल में<br />
आंदोलन रेंगने वाले कीड़े की<br />
तरह शोभा पाते हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समस्याओं के जंगल में आन्दोलन ]]></title>
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<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:34:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[लोग भीड़ में जाकर
जुलूस सजाते हैं
चीख-]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लोग भीड़ में जाकर<br />
जुलूस सजाते हैं<br />
चीख-चिल्लाकर नारे लगाते हैं<br />
और फिर आश्वासन और वादों का<br />
पुलिंदा लेकर वापस आते हैं<br />
कई बरस से चल रहा है<br />
आंदोलनों का सिलसिला<br />
पर फिर भी किसी को कुछ नहीं मिला<br />
समस्याओं के रोग नित बढते जाते हैं</p>
<p>अभी तक इतने आश्वासनों, वादों और<br />
घोषणाओं के पुलिंदे बंट चुके हैं कि<br />
उनेमें कोई तोहफे होते तो<br />
सब जगह इन्द्रपुरी जिसे दृश्य होते<br />
पर फिर जुलूस के लिए<br />
कहाँ से लोग जुटाए जाते<br />
कमरे के बाहर की राजनीति तो<br />
दिखाई देती है<br />
पर अन्दर के सौदे कौन देखे<br />
इसलिये लोग जहाँ से चलते हैं<br />
फिर लॉट कर वहीं अपने को पाते हैं<br />
समस्याओं के इस जंगल में<br />
आंदोलन रेंगने वाले कीड़े की<br />
तरह शोभा पाते हैं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:नीच और उच्च व्यक्ति की पहचान ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%9a-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a-%e0%a4%b5%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 03:05:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li>
<p align="left">जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
</li>
<li>
<p align="left">समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीगीता का ज्ञान ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/09/24/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Mon, 24 Sep 2007 13:51:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बचपन से ही पढते आ रहे
भक्ति भाव से श्री]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बचपन से ही पढते आ रहे<br />
भक्ति भाव से श्रीगीता<br />
फिर भी नही लगता आया हमें ज्ञान<br />
पता नहीं लोग पढते हैं या नहीं<br />
समझ से परे लगता उनका बखान</p>
<p>श्रीगीता का यही संदेश समझ में आता है<br />
'कर्म जैसा ही फल होगा<br />
निष्काम भक्ति से परमात्मा प्रसन्न होंगे<br />
करेंगे जीवात्मा का कल्याण'<br />
ईश निंदा हेतु किसी के शीश पर प्रहार<br />
करने का हमने नहीं देखा उसमें ज्ञान<br />
परमात्मा द्वारा स्वत: ही<br />
निंदकों के लिए किया गया है<br />
कीट योनि में भेजने का विधान<br />
कैसे ले सकता है यह जिम्मा कोई इन्सान</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
हो सकता है हमसे श्रीगीता का श्लोक<br />
आख़िर हम हैं इन्सान और यह है भूलोक<br />
न देवता हैं, न निवास है स्वर्ग लोक<br />
गलतियों के पुतले हैं, देह का नहीं अभिमान<br />
हम तो इतना जानते<br />
युद्ध से विरक्त हो रहे अर्जुन को<br />
वीरता दिखाने के लिए प्रेरित करते हुए भी<br />
दिया था श्री कृष्ण जी ने अहिंसा का संदेश<br />
सबके कर्मों का फल देने का<br />
अपने पास ही रखा विधान<br />
फिर भी महाज्ञानी होने का दवा नहीं करते<br />
हम संशय से जूझ रहे हैं<br />
ढूंढते हैं कोई ज्ञानी-ध्यानी<br />
जो इस विषय पर हमें दे ज्ञान<br />
-------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वार्थी की नम्रता दिखावे की ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/09/23/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%b5/</link>
<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 06:28:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नमन नवां तो क्या हुआ, सुधा चित्त न ताहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>नमन नवां तो क्या हुआ, सुधा चित्त न ताहिं </strong></p>
<p align="center"><strong>पारधिया दूना नवेँ, चीता चोर समान </strong></p>
<p align="left">जिसके हृदय में सरलता और सहजता का भाव उसकी नम्रता और झुकना भी किस काम का? यूँ तो शिकारी भी शिकार करते समय झुक जाता है परन्तु अपने बाणों से मृग को मार देता है। उसी प्रकार स्वार्थ सिद्धि के स्वार्थी व्यक्ति झुक-झुक कर अपना काम निकलता है।</p>
<p align="left"><strong>लेखकीय अभिमत</strong>-हमने जीवन में कई बार देखा होगा कि कुछ लोग व्यवहार में सीमा से अधिक नम्रता दिखाते हैं और वह अपना काम जब निकाल जाते हैं और फ़िर पलट कर भी नहीं देखते तब हमें उनकी वास्तविकता का पत लगता है पर  हम कर कुछ नही सकते। इसलिये जो सीमा से अधिक विनम्रता दिखाते हैं, उनसे सतर्क रहना चाहिये।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परमार्थ है पीपल समान ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 03:42:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
स्वारथ सूका लाकडा, छाँह बिहूना सूल
पी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="post-body entry-content">
<p align="center"><strong>स्वारथ सूका लाकडा, छाँह बिहूना सूल<br />
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल</strong></p>
<p align="left">
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि स्वार्थ तो सूखे लक्कड़ के समान है, जिसमें न तो छाया मिलती है और न ही सुख, बल्कि कांटे के समान कष्टदायी है। परमार्थ और सदाचार पीपल के वृक्ष के समान है जो सदैव सबको सुख-शांति प्रदान करता है। अत परमार्थ के मार्ग का अनुसरण करो।</p>
<p style="clear:both;">
<p class="post-body entry-content">
<p align="center"><strong>आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल<br />
साधू सों झगडा भला, ना साकट सों मेल </strong>
</p>
<p align="left">आंखों से देखा घी का दर्शन भी अच्छा है और तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं है। साधू-संतो से झगडा भी अच्छा है परन्तु निगुरा (जिसका कोई गुरू नहीं है) से मेल-मिलाप कदापि अच्छा नहीं है, क्योंकि साधू से झगडा होने पर निर्णय अच्छा हो सकता है पर निगुरे से मेल-मिलाप कभी भी फलदायी नहीं हो सकता।</p>
<p align="center">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:46:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                     महाभारत ग्रंथ की रचना ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।</p>
<p align="justify">                 श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'<br />
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'</p>
<p align="justify">
              आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
</p>
<p align="justify">श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।</p>
<p align="justify">         महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है<br />
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।</p>
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                गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
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<p align="justify">                      भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।</p>
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<title><![CDATA[प्रात:काल का आनंद ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 10:39:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के लिए अपने सामान के साथ पक्षियों के लिए दाना भी ला जाता हूँ। मुंडेर पर उन दानों को बिखेरने और पानी भर कर रखने के बाद अपनी योग साधना में तल्लीन हो जाता हूँ। उस समय अँधेरा होता है और जैसे ही थोडी रोशनी होनी शुरू होती हैं सबसे पहले गिलहरी का आगमन होता है। मेरे पास से निकलती गिलहरी दाने की तरफ जाती है तो मेरी तरफ देखती जाती है, पता नहीं क्या सोचती है और जैसे-जैसे मेरी तल्लीनता बढती है वैसे वैसे ही चिड़ियाओं के झुंड की आवाजें मेरे कानों में गूंजती है।</p>
<p>वह मुंडेर मेरे से दस फूट की दूरी पर है और वैसे कहते है कि योग साधना में कहीं ध्यान भटकना नहीं चाहिए पर मेरा मानना है कि इन पक्षियों का मेरे सामाजिक जीवन से कोई सरोकार नही है और उनकी तरफ ध्यान लगाना लगभग वैसा ही है जैसे दुनियादारी से ध्यान हटाना। कई बार तो मैं वहाँ पांच-छः प्रकार के पक्षी देखता हूँ, जिसमें तोता और कबूतर भी शामिल हैं। उनको देखकर जो मुझे अनुभूति होती है उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अगर मैं यह कहूं कि मेरा वह हर दिन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिऐ।</p>
<p>पता नहीं उनके मन में भी कुछ चलता है। जब मैं सर्वांगासन के लिए टांगें ऊपर किये होता हूँ तब चिड़ियायेँ बिल्कुल मेरी टांगों की पास से निकल जातीं हैं। उस समय मैं आंखें बंद किये होता हूँ तो डर जाता हूँ। मजे की बात यह है इतने सारे आसनों के बीच नही निकलतीं। उसके तत्काल बाद मैं शवासन करता हूँ , और उस समय भी वह ऐसा ही करतीं है । शवासन के समय कभी कभी गिलहरी भी छूकर भाग जाती है। मुझे उस समय हंसी आती है क्योंकि उनका इस तरह खेलना अच्छा लगता है। वैसे कई वर्ष से ऐसा हो रहा है पर मैं ध्यान नहीं देता था पर पांच-छः महिने पहले ऐक चिड़िया सर्वांगासन के समय मेरी टांग से टकराकर मेरे मुहँ पर गिरी और फिर भाग गयी। उसके बाद से मैंने उनकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। पहले तो दाना डालकर अपनी आँखें बंद कर योग साधना किया करता था। इन पक्षियों की चहचहाने की आवाज में जो माधुर्य है वह किसी संगीत में नहीं मिलता। और यह ऐक एसी फिल्म है जो कभी भी पुरानी होती नजर नहीं आती। ऐक एसा आनंद आता है जो अवर्णनीय है। शेष फिर कभी</p>
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