<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindi-thougnt &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-thougnt/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-thougnt"</description>
	<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 02:13:50 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[हर जगह बैठा है सिद्ध की खाल में गिद्द-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=535</link>
<pubDate>Thu, 02 Oct 2008 16:03:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/02/sab-jagah-sidd-kee-aad-men-gidd-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में
बैठा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
बैठा कोई एक सिद्ध</p>
<p>आरजू लिए कोई वहां<br />
उसे देखता है जैसे शिकार देखता गिद्द<br />
लगाते हैं नारा<br />
"आओ शरण में दरबार के<br />
अपने दु:ख दर्द से मुक्ति पाओ<br />
कुछ चढ़ावा चढ़ाओ<br />
मत्था न टेको भले ही सर्वशक्तिमान के आगे<br />
पर सिद्धों के गुणगान करते जाओ<br />
जो हैं सबके भला करने के लिए प्रसिद्ध</p>
<p>इस किनारे से उस किनारे तक<br />
सिद्धो के दरबार में लगते हैं मेले<br />
भीड़ लगती है लोगों की<br />
पर फिर भी अपना दर्द लिए होते सब अकेले<br />
कदम कदम पर बिकती है भलाई<br />
कहीं सिद्ध चाट जाते मलाई<br />
तो कहीं बटोरते माल उनके चेले<br />
फिर भी ख़त्म नहीं होते जमाने से दर्द के रेले<br />
नाम तो रखे हैं फरिश्तों के नाम पर<br />
फकीरी ओढे बैठे हैं गिद्द<br />
उनके आगे मत्था टेकने से<br />
अगर होता जमाने का दर्द दूर<br />
तो क्यों लगते वहां मेले<br />
ओ! अपने लिए चमत्कार ढूँढने वालों<br />
अपने अन्दर झाँक कर<br />
दिल में बसा लो सर्वशक्तिमान को<br />
बन जाओ अपने लिए खुद ही सिद्ध </strong><br />
--------------------------------</p>
</div>
<blockquote><p align="center"><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<div align="center"></div>
<p>अन्य ब्लाग1.<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a> <a href="http://dprajk.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> 3.<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साहब बनने निकलते गुलाम बन जाते-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Sun, 21 Sep 2008 16:40:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/09/21/sahab-aur-gulam-hindi-poem-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[साहब जैसी जिंदगी जीने का
सपना लिये निक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#660000;">साहब जैसी जिंदगी जीने का<br />
सपना लिये निकलते हैं सब<br />
किताबें-दर-किताबें पढ़ते जाते<br />
अपना पसीना बहाते हुए<br />
कागजों के ढेर के ढेर रंगते जाते<br />
फिर नौकरी पाने की कतार में<br />
बड़ी उम्मीद के साथ खडे हो जाते<br />
पता ही नहीं चलता गुलाम बन जाते कब<br />
.........................................................</p>
<p>साहब क्या जाने गुलाम का दर्द<br />
उनको मालुम रहते अपने हक<br />
याद नहीं रहते फर्ज<br />
उनका किया सब जायज<br />
क्योंकि एक ढूंढो हजार लोग<br />
गुलामी के लिये मिल जातें<br />
साहब बनने की दौड़ में<br />
भला कितने दौड़ पाते<br />
साहब तो टपकते हैं आकाश से<br />
क्या जानेंगे धरती के गुलामों का दर्द<br />
................................<br />
</span></strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[साहित्य लेखन एकांत में करना चाहिये-प्रातःकालीन संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=509</link>
<pubDate>Thu, 18 Sep 2008 04:33:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/09/18/sahitya-lekhan-ekant-men-hee-sanbhav-morning-editoriyal/</guid>
<description><![CDATA[साहित्य लेखन का कार्य नितांत अकेले मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>साहित्य लेखन का कार्य नितांत अकेले में ही बढि़या प्रकार से किया जा सकता है-इसमें कोई संदेह नहीं है। मुझे याद है कि एक संपादक को मैंने अपनी एक कहानी दी थी। वह एक सीमित दायरे में बिकने वाली पत्रिका का संपादक था। उसने मुझे कहानी में कुछ परिवर्तन करने का कहा। मैंने उसे थोड़ा बहुत करके दिया पर वह उससे संतुष्ट नहीं हुआ। बाद में उसने स्वयं ही परिवर्तन किये। तब मैंने उससे कहा कि-‘आप यह कागज मुझे वापस कर दें मैं इसको सही ढंग से लिखकर आपके पास लाऊंगा।’</p>
<p>उसने मुझे वह कागज वापस कर दिये। तय बात थी कि मैं उसके पास फिर वह कागज वापस लेकर जाने वाला नहीं था। यही बात मेरे साथ ब्लाग जगत में हुई। यहां पहले एक लोकप्रिय फोरम था जहां सभी के हिंदी ब्लाग दिखते थे और वहां लेखक ही एक दूसरे को टिप्पणियां देते। फिर उसकी जगह दूसरा फोरम आया तो वहां भी यह प्रक्रिया जारी रही। टिप्पणी के चक्कर में अच्छे खासे लेखक की क्या हालत है यह मैं समझ सकता हूं। कुछ टिप्पणीकर्ताओं का व्यवहार तो संपादकों की तरह हो रहा था। इसलिये मैंने वापस कागज मांगने की तरह  आज मैंने अपने वर्डप्रेस के सभी ब्लाग वर्तमान के लोकप्रिय फोरम से बाहर निकलवा लिये।  ब्लाग लेखकों से यह एक तरह से किनारा करने जैसा है। दरअसल मुझे बहुत दिन से लग रहा था कि मेरा  ध्यान भटक रहा है और उस पर नियंत्रण नहीं हो रहा।  मेरे वर्डप्रेस के ब्लाग जबरदस्त हिट ले रहे हैं और ऐसा लगता है कि आम पाठक में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है पर मैं वैसा नहीं लिख रहा जैसा कि लिखना चाहिये। </p>
<p>बार बार मन ब्लागवाणी के हिट पर चला जाता जहां से कोई अधिक समर्थन मिलने की आशा नहीं थी। फिर अनेक ब्लाग लेखक-जो ब्लाग स्पाट पर लिखते हैं और वर्डप्रेस के बारे में उनका ज्ञान अधिक नहीं है-तमाम तरह की टीका टिप्पणी करने लगे थे। एक ने तो बकायदा पाठ छाप दिया और वहां अनेक बुद्धिमान उसका समर्थन कर आये। इनमें तो एक ऐसे सज्जन भी थे जो वर्डप्रेस पर सक्रिय हैं वह उसमें एक तरह से मेरी शिकायत कर रहे ोि जैसे कि उस पाठ का लेखक मेरे पर नियंत्रण कर लेगा। </p>
<p>हिंदी ब्लाग जगत के कुछ अतिसक्रिय लोग अपने आप को हर पाठ का भाग्यनियंता समझने लगे थे।  एक दूसरे की छीछालेदारी कर हिट पाते हैं। मेरे मन में सभी के प्रति सहृदयता का भाव रहा है और उन पर अगर कुछ लिखा तो केवल दोस्त समझकर लिखा पर पता नहीं वह क्या समझ रहे थे? ऐसा लग रहा था उनकी वजह से मैं और मेरी वजह से वह रास्ते से भटक रहे थे।  ऐसे में अपने वर्डप्रेस के ब्लाग के साथ न्याय नहीं कर पा रहा था। </p>
<p>हां, पाठकों एक बात बता दूं अब मेरे इन वर्डप्रेस के ब्लाग पर टिप्पणियां नहीं होंगी क्योंकि वह लिखने वाले ब्लागर अब इससे दूर हो गये हैं। मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग अभी ब्लागवाणी पर हैं पर मैं उन पर वैसे भी अधिक नहीं लिखता। वह एक जरिया है जो हिंदी ब्लाग जगत से संपर्क बनाये रखने का। जिस तरह से मैं वर्डपे्रस पर लिखता हूं वैसा उन पर नहीं लिखता। कारण यह है कि वर्डप्रेस से अधिक पाठक मिलते हैं और यही लालच इस पर लिखने को प्रेरित करता है। मेरे मित्र ब्लाग लेखकों को शायद यह पता नहीं चल पायेगा कि मैंने अपने ब्लाग ब्लागवाणी से हटवा लिये हैं पर फिर भी कुछ चाहने वाले हैं जो नारद और चिट्ठाजगत पर आकर यह बात जान जायेंगे। </p>
<p>अब सबसे बड़ी अच्छी बात यह है कि आम पाठक के लिये लिखने में कोई बाधा नहीं आयेगी। मैं भले ही महापुरुषों के संदेश लिखता हूं पर इसका मतलब यह नहीं कि कोई ज्ञानी हूं। फिर जानता हूं कि इस देह में पांच तत्वों के साथ तीन प्रकृतियों-मन,बुद्धि और अहंकार-का भी अपना काम होता है।  उन पर नियंतत्रण पाना आसान नहीं है। इसलिये यही तरीका अच्छा लगा कि वहां से अपने ब्लाग हटवा कर इन पर अपने पाठ लिखूं। ब्लागवाणी वालों ने इतनी सहजता ने ब्लाग हटवाये इसके लिये उनकी प्रशंसा तो करना ही चाहिये। वैसे उनके लिये भी अच्छा ही हुआ। वहां मेरे सभी ब्लाग पर पाठकों की संख्या इतनी कम होती है कि उनको भी संकोच होता होगा कि इसके इतने ब्लाग रखने से क्या लाभ? शायद थोड़ा सम्मान करते होंगे इसलिये यह ब्लाग हटाने के लिये नहीं कहा। मेरा संदेश मिलते ही सहजता से हटा दिये। इसके लिये उनको धन्यवाद! आशा करता हूं कि अब जब मुक्त भाव से इन पर लिखूंगा तो अच्छा ही लिखूंगा। साहित्य लेखन एकांत में करना चाहिये इस बात की एक बार पुष्टि हो गयी है। वैसे  हिंदी ब्लाग जगत के सभी लोग सहृदय है पर चूंकि अंतर्जाल पर एक दूसरे से व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं होते इसलिये जो लिखा है उसी पर ही आदमी की पहचान स्थापित करते हैं जिससे  कई तरह के दिमाग में की तरह के भ्रम पैदा होते हैं और यह केवल मैं ही समझ पाता हूं क्योंकि लिखने साथ अध्ययन का होना भी जरूरी है। जहां तक संबंध हैं वह बदलते रहते हैं एक दो पाठ पर उनमें बिगाड़ नहीं आना चाहिये पर चूंकि मुझे लगा कि ध्यान भटक रहा है इसलिये ही ब्लागवाणी से अस्थाई रूप से यह ब्लाग हटवा लिये।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तीस हजार की सफलता पर सभी का आभार ज्ञापन-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=494</link>
<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 16:10:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/29/30-thousand-vews_editoriyal/</guid>
<description><![CDATA[        सुनने में आ रहा है कि मनोरंजन के आधा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        सुनने में आ रहा है कि मनोरंजन के आधार पर वेबसाइटों को पुरस्कार की बात चल रही है। आज शाम को ईमेल खोलते ही पाडकास्ट का जाने क्या मेरे सामने आया और मेरा हाथ क्रास पर चला गया और वह हाथ से निकल गया।  सुबह एक ब्लाग पढ़ा था उसमें भी उसकी चर्चा भी थी और एक  ब्लाग में मेरी एक कविता का लिंक भी था जिसमें उसके शीर्षक के साथ एक किलो का टैग लगाने की शिकायत भी दर्ज थी।<br />
दरअसल इस पाठ के तीस हजार पाठक संख्या पार करने पर कल कविता लिख कर मैंने गलती की थी। आज यह संपादकीय लिखने का मन ही नहीं कर रहा था  क्योंकि हम कोई व्यवसायिक लोग तो हैं नहीं कि लिखना जरूरी है। इसका एक पैसा मिलता नहीं बल्कि गांठ से इंटरनेट कनेक्शन का पैसा और जाता है। हां, अपने गुरूजी के आदेशानुसार जो तस्वीर दिखाई जा रही है उसके पीछे देखने का प्रयास कर रहा हूं। अब समझ में आ गया है कि क्यों ब्लाग लेखकों को एक मजदूर समझा जा रहा है। दरअसल यह गलत फहमी बाहर फैली हुई है कि हिंदी के सभी ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं। हिंदी के चार नियमित फोरमों के अलावा अनेक वेबसाइटों ने हमारे ब्लाग अपने यहां लिंक कर रखे हैं।  यह वेब साइटें दूसरी वेबसाईटों को लिंक नहीं करतीं क्योंकि शिकायत करने पर उनके डोमेन छिनने का खतरा रहता है पर ब्लाग को चाहे जैसे लिंक करतीं हैं। इनके साथ लिंक देख कर लोग यह समझते हैं कि उसी वेबसाइट के लिये यह लिखा गया हैं। अभी आम लोगों में यह समझ नहीं है कि यह ब्लाग एक स्वतंत्र लेखक का है। कुछ ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं पर अधिकांश तो फ्री में लिख रहे हैं। जिन्होंने डोमेन लिया है उनमें में भी सक्रिय लोगों ने  कमाया है वह भी इतना नहीं कि वह उससे अपने परिवार का खर्चा चला सकें।</p>
<p>ऐसा प्रचार हो रहा है कि ब्लाग लेखक तो फ्री में ब्लाग लिख रहे हैं और हालत यह है कि उनको एक मजदूर की तरह देखा जा रहा है। नारद के एक कर्णधार ने कहा लिखा था कि वेबसाइटों को ब्लाग नहीं माना जा सकता है पर हालत यह है कि अब वेबसाईटों को ही ब्लाग कहकर प्रचारित किया जा रहा है।<br />
बहरहाल इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प यादें हैं। मैंने यूनिकोड में सबसे पहले इसी ब्लाग पर क्षणिका लिखी थी और उस पर पहली टिप्पणी मिली थी। दूसरे ब्लाग पर नारद के लिये जद्दोजहद चल रही थी। एक महिला ने दूसरे ब्लाग पर टिप्पणी लिखते हुए पूछा था कि मैं किस फोंट में लिख रहा था-सामान्य देव फोंट में होने के कारण वह उसके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मैंने उसे सामान्य हिंदी फोंट में जवाब भेजा तो रोमन में उसने यही सवाल किया। तब मैंने रोमन में ही उसे अपने इसी ब्लाग का पता दिया, पर इसी बीच उसने एक सवाल किया था ‘आप एक पोस्ट लिखने का कितना पैसा लेते हैं।’<br />
मैंने जवाब दिया कि मेरे एक पोस्ट की कीमत दो हजार रुपये है पर मित्रों के लिये यह काम मैं फ्री में कर देता हूं। आप तो यह बताईये करना क्या है? इसी बीच उसका जवाब आया कि ‘वाह, आपका यह ब्लाग तो पढ़ने में आ रहा है।’<br />
मैंने उसे दूसरा ईमेल किया कि वह क्या चाहती है? पर वह फिर नहीं आयी। बात आयी गयी खत्म हो गयी, पर पिछले कुछ दिनों से हुए वाक्यात ये यह लगने लगा है कि कुछ ब्लाग लेखकों को वाकई पैसे देकर लिखवाया जा रहा है। हम छोटे शहर के हैं इसलिये कोई इस बारे में दांवपैंच नहीं जानते इसलिये फ्री में ही लिखे जा रहे हैं।  पर कोई बात नहीं! मुख्य विषय लिखना है और उससे भी बड़ा मजा स्वतंत्र लेखन में है। जहां आपको विज्ञापन और धन का विचार आता है वहां गुलाम बनकर रह जाते हैं। मैं पत्रकार रह चुका हूं और सारे छलकपटों के बारे में जानता हूं। पर मेरे संस्कार ऐसे हैं कि मैं स्वयं कर नहीं सकता यही कारण है कि पत्रकारिता जगत से बाहर आ गया। चालाकियों को समझने के लिये अधिक समय नहीं लगता।  लिखना मेरा जीवन है इसलिये लिखता हूं-प्रतिदिन आठ सौ पाठ पढ़े जा रहे हैं। हो सकता है कि इसमें कोई धोखा हो पर परवाह किसे है?</p>
<p>यह ब्लाग वर्डप्रेस पर है और इस पर लिखने का मतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर होना। यहां फोरमों से अधिक हिट बाहर से आते हैं। ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये हिंदी फोरमों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।  मेरे वर्डप्रेस के तीन ब्लाग हिंदी के सबसे लोकप्रिय फोरम ब्लागवाणी पर नहीं है पर उन पर भी जमकर पाठक आते हैं। हिंदी फोरमों पर यह ब्लाग आते हैं और वहां मेरे मित्र बन गये हैं इसलिये वहां भी जितना समय मिलता है सक्रिय रहता हूं। वहां से अधिक पाठकों की अपेक्षा तो मैं नहीं करता क्योंकि मेरा लक्ष्य आम पाठक तक पहुंचना है। मेरी सबसे बड़ी ताकत ब्लाग मित्र और मेरे पाठक हैंं। यह और ईपत्रिका मेरे प्रारंभ से ही हिट ब्लाग हैं। इसका कारण यह रहा है कि इनको फोरमों पर बाद में ले गया और लिखना पहले ही शुरू कर चुका था। तीस हजार पाठक संख्या पार कर इस ब्लाग ने अपनी ताकत मुझे बता दी और यही मैं ब्लाग मित्रों और पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। यह ब्लाग आगे चलकर अनेक वेबसाईटों को चुनौती देने वाला है यही कारण कि आलोचक विचलित होकर अनेक ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जो बेसिर पैर के हैं। शेष फिर कभी। सभी पाठकों और ब्लाग लेखकों का इस अवसर पर आभार ज्ञापित करता हूं और आगे आने वाले संभावित संघर्षों मेंें उनसे सहयोग की अपेक्षा करता हूं। आलोचकों से मेरा साफ कहना है कि आप मेरे लिये कोई आर्थिक मदद का स्त्रोत निर्माण करें फिर मुझे लिखना सिखाये। फोकट में खोपड़ी खाने की आवश्यकता नहीं।  आगे चलकर टैग की संख्या हजार भी कर सकता हूं क्योंकि भई हम कोई व्यवसायिक ब्लागर थोड़े ही है।  बिना धनार्जन के भला कोई व्यवसाय होता है। </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शेर ने कहा-‘हमें मारकर सनसनी फैलायेंगे’-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 15:34:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/22/sansani-par-hasya-kavita-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[शेरनी ने शेर से कहा
‘सुना है तू नरभक्ष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शेरनी ने शेर से कहा<br />
‘सुना है तू नरभक्षी हो गया है<br />
शर्म नहीं तुझे ऐसा करने में<br />
अब लोग झूंड बनाकर ढूंढ रहे है<br />
हथियार लेकर<br />
तुझे डर नहीं लगता मरने में<br />
अगर तू इंसान के हाथ से नहीं मरा<br />
तो भी उसका मांस खाकर<br />
बहुत बड़े पाप का भागी हो जायेगा<br />
उसके जहर से जल्दी मर जायेगा<br />
कई जन्म तक चूहे और बकरी<br />
जैसी पिटने वाली यौनियों में<br />
जन्म पायेगा<br />
इससे बहुत समय लगेगा तुझे उबरने में’</p>
<p>शेर ने कहा<br />
‘यह मुझे हमारे खानदान को मिटाने के लिये<br />
इंसानों का रचा गया प्रोपेगंडा<br />
जंगल के सभी  जानवरों को नष्ट करना<br />
उनका खास एजेंडा है<br />
इस समय टीवी चैनलों पर कोई<br />
खास प्रोग्राम नहीं है<br />
खबर बनाना है,ढूंढने का काम नहीं है<br />
निगाहें कहीं<br />
 निशाना और कहीं है<br />
पहले खलनायक बनाते हैं<br />
फिर नायक बताते है<br />
पर हम इंसान नहीं है<br />
जो उनकी भाषा बोल पायेंगे<br />
पहले वह हमें नरभक्षी बताकर<br />
सभी की सहानुभूति जुटायेंगे<br />
फिर आकर हमें मार जायेंगे<br />
खबर सुनाकर  सनसनी फैलायेंगे<br />
इसलिये यह जगह छोड़ कर चलते हैं अन्यत्र<br />
यहां का पानी की बूंदें पीने का<br />
अपना हो गया कोटा पूरा<br />
चलते है दूर यहां से<br />
पानी पियेंगे अब दूसरे झरने में</strong><br />
.............................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला होना चाहिए-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=472</link>
<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 15:44:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/19/pahle-apne-dil-ka-khya/</guid>
<description><![CDATA[यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर
कुदरत का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर<br />
कुदरत का खजाना<br />
बटोरने वाला चाहिए<br />
बेजान चीजों पर दिल लगाने<br />
को सब हो जाते हैं तैयार<br />
जानदार की परवाह<br />
करने वाले होना चाहिए<br />
इस जहां में दूसरों की कदर कौन करेगा<br />
पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला<br />
दिमाग से सोचने वाला इंसान चाहिए<br />
...............................</p>
<p>किसी के पास ज्ञान का<br />
किसी के पास विज्ञान का<br />
किसी की पास शिक्षा का है ठेका<br />
किसी ने लिया है<br />
इंडियन आइडियल बनाने का<br />
किसी के पास है विश्व चैंपियन<br />
बनाने का ठेका<br />
पालक अपने बालकों को<br />
उनसे पास भेजकर सोचते हैं<br />
सब काम अपने आप हो जायेंगे<br />
अब वह सिरमौर ही बनकर घर  आएंगे</p>
<p>जो सफल हो  जाते हैं वह<br />
गाते  हैं ठेकेदारों की महिमा<br />
जो असफल हौं वह अपनी<br />
किस्मत को दोष देकर रह जाते हैं<br />
हर तरह की गारंटी वाला<br />
सब जगह चल रहा है ठेका</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कही पर अनसुनी बात भी अपना काम कर जाती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=467</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 14:51:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/12/hindi-poem-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[कभी-कभी उदास होकर
चला जाता हूँ भीड़ मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कभी-कभी उदास होकर<br />
चला जाता हूँ भीड़ में<br />
सुकून ढूँढने अपने लिए<br />
ढूँढता हूँ कोई हमदर्द<br />
पर वहाँ तो खडा रहता है<br />
हर शख्स अपना दर्द साथ लिए<br />
सुनता हूँ जब सबका दर्द<br />
अपना तो भूल जाता हूँ<br />
लौटता हूँ अपने घर वापस<br />
दूसरों का दर्द साथ लिए</p>
<p>कोई नहीं सुनता पर फिर भी सुनाकर<br />
दिल को तसल्ली तो हो जाती<br />
दूसरे के दर्द की बात भला<br />
अपने दिल में कहां ठहर पाती<br />
कही पर अनसुनी बात भी अपना काम कर जाती<br />
कभी सोचता हूँ कि<br />
अगर इस जहाँ में दर्द न होता<br />
तो हर शख्स कितना बेदर्द होता<br />
फिर क्यों कोई किसी का हमदर्द होता<br />
कौन होता वक्ता, कौन श्रोता होता<br />
तब अकेला इंसान जीवन गुजारता<br />
अपना दर्द पीने के लिए</strong><br />
................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हवाई मुद्दों का सौदा-लघु कथा]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=464</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 13:00:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/09/short-story/</guid>
<description><![CDATA[कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम और तस्करी का सामान लिये हुए थे कुछ लोग अपने हाथ में जमीन के असली और नकली कागज पकड़े हुए थे। यह ऐसे लेनदेन का काम करते थे जिसे दो नंबर का कहा जाता है पर लेबल उस पर एक नंबर का ही होता है। इनको शराब,अफीम और भूमाफिया भी कहा जाता है यह नाम इनको मीडिया वालों ने सम्मान के रूप में दिया है ताकि कोई इनको अपराधी न कहे। </p>
<p>हुआ यू कि एक दिन यह सब  माफिया अपने हाथ में हमेशा की तरह अपने व्यवसाय के अनुसार सारे सामान लिये बाजार में जा रहा था तो देखा कि कोई कलम कागज लिये तो कोई कैमरा लिये अपने भागता हुआ उनके पीछे आ रहा है। सबके माथे की पट्टी पर हुआ था ‘मीडिया’। उनकेा आते देखकर माफिया के सरदार ने कहा-‘भागो,यह मीडिया वाले आ रहे हैं। हम जिन इलैक्ट्रोनिक सामान की तस्करी कर लाते थे उससे यह मीडिया बहुत पावरफुल हो गया है। यह हमारा स्टिंग आपरेशन करने वाला है सो भागो।’<br />
तब उनमें से एक बोला-‘आने दो। हम उनके सरदार से बात कर लेते हैं। अरे, इस जमाने में और भी मामले में हैं। हमें दिखाकर इनको क्या मिलेगा?’</p>
<p>तब तक मीडिया वाले भी वहां पहुंच गये और लगे फोटो खींचने और साक्षात्कार लेने-‘आपको यह धंधा करते हुए कैसा लग रहा है?’<br />
‘क्या आपको कोई पकड़ता नहीं है।’<br />
आपके धंधे के मूल मंत्र क्या हैं?’<br />
एक माफिया ने मीडिया के सरदार से कहा-‘यार, तुम आज हमारी बदौलत ही इतने पावरफुल हुए हो। अगर हमारी भद्द पिटी तो तुम्हारा भी बुरा हाल होगा।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘पर अब बताओ हम करें क्या? दिखाने और छापने के लिये कुछ सनसनीखेज तो चाहिए।’<br />
माफिया सरदार ने कहा-‘यार, इसका मतलब तुम हमें ही निपटा दोगे। समाज ने अगर हमसे डरना बंद कर दिया तो सबसे पहले तुम्हारा ही पता कटेगा। तुम लोग भी कोई दूध को धुले नहीं हो।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘अब तुम्हीं बताओ। हम अपना काम कैसे चलायें। सनसनी खबरें कब तक और कहां से लायें।<br />
समझदार माफिया ने कहा-‘चलो अभी मास्टर माइंड के यहां चलते हैं। वह कोई न कोई रास्ता निकाल देगा। वह हवा में तीर चलाने की कला में माहिर है।’</p>
<p>दोनों मास्टर माइंड के पास पहुंचे। उसने कहा-‘मेरे को माल देते जाओ। माफिया वाले अपना काम करते रहें और मीडिया वालों को भी मुद्दे ढूंढने के लिये कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है। उनके घर पर रोज नये मुद्दे पहुंच जायेंगे, पर उस पर बहस अधिक करना पर मूल विषय पर कभी नहीं जाना क्योंकि वह केवल हवाई मुद्दे होंगें।</p>
<p>मीडिया और माफिया दोनों के सरदारों ने उत्सुकता से पूछा ? कैसे?’<br />
मास्टर माइंड ने कहा-‘यह जमीन खाली पड़ी है। इस पर किसी मकान बनाने का प्रस्ताव पहले उछालेंगे और फिर बहस करवायेंगे। इस पर तुम्हारा समय अच्छा निकल जायेगा। बस यह कहने की कोशिश बिल्कुल मत करना कि इस इमारत बनी तो नहीं बनी तो क्या फर्क पड़ना है क्योंकि इससे विषय बिल्कुल खत्म हो जायेगा। यह देखो पेड़ से पता गिर गया है इसका सीधा प्रसारण करना और पर्यावरण पर भारी संकट घोषित करना। ऐसे दिखाना जैसे कि पूरा पेड़ गिर गया है।  किसी ऐसे विद्वान को मत बुलाना जो कहे कि ऐसे तो पते रोज गिरते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कहीं मंदिर का मामला होगा तो कहीं दहेज का सब जगह अपनी टांग ऐसे फंसाना जैसे वह राष्ट्रीय मामला हो।’</p>
<p>मीडिया के सरदार ने कहा-‘यह तो हम ही कर लेंगे। फिर तुम्हारी क्या जरूरत है?’<br />
 माफिया वाले हमें ही ऐसे मुद्दे बनाने के लिये किराये पर लें तो क्या फर्क पड़ता है।’<br />
मास्टर माइंड हंस पड़ा-‘लोगों को कहां से लाओगे? यह काम तो हम ही कर सकते हैं। यह भीड़ को भेड़ की तरह हांकने वाले सरदार भी हैं जो अपनी ताकत रखते हैं वह हमारी  सलाह ही मानते  हैं भले ही तुम दोनोे की कृपा पर वह भी चलते हैं। जिंदा सांप से अधिक मरे हुए सांप को जीवंत मुद्दा बनाना  इतना आसान नहीं है। इसलिये तुम्हें हमेशा ऐसे हवाई मुद्दों के लिये हम पर निर्भर रहना पड़ेगा।’<br />
इस तरह तीनों के बीच हवाई मुद्दों को बनाये रखने का फैसला हुआ।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मस्तराम के नाम से असत् साहित्य की  लोकप्रियता से हिंदी को लाभ नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=457</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 15:24:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/07/article/</guid>
<description><![CDATA[मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अंतर्जाल पर मस्तराम के नाम से कई लोग लिख रहे हैं यह अलग बात है हर कोई अपने साथ अपना नाम या अपना तख्ल्लुस जोड़ देता है।<br />
मैंने एक बार अपने एक ब्लाग में नाम के साथ ही मस्तराम भी जोड़ दिया। वह मेरा एक फालतू ब्लाग था और गूगल के इंडिक टूल मिलने से पहले उस पर लिखकर वहां से कापी कर दूसरे ब्लाग पर पोस्ट करता था। इस दौरान ब्लाग लेखक मित्रों ने विकिपीडिया का हिंदी टूल दिया। उससे कुछ दिन लिखा तो कंप्यूटर खराब हो गया क्योंकि वह पहले ही वाइरस ग्रस्त था। बाद में जब उसका हिंदी टूल लोड किया तो वह अधिक हिंदीमय हो गया था और इसलिये फिर अपने ब्लाग पर ही लिखने लगा। गूगल का इंडिक टूल आने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही इसलिये मेरे कम से कम चार फालतू ब्लाग ऐसे ही रह गये।  इनमे एक पर उठाकर मस्तराम लिखा और उस पर अपनी रचनाओं पर लेबल लगाने लगा साथ ही कुछ इधर उधर से पोस्ट रखने लगा। </p>
<p>हैरानी की बात यह रही वह मस्तराम नाम धारी ब्लागों में वह हिट पाने लगा। इसी बीच मैंने एक ब्लाग पर मस्तराम के बारे में पढ़ा। पता लगा कि मस्तराम ‘आवारा’ के नाम से  हिंदी फोरमों पर जो दो पंजीकृत ब्लाग हैं का नाम भी उनमें शुमार है और उन्होंने इस संबंध में विवाद उठा जो बाद में शांत हो गया। तब मेरी दिलचस्पी इसमें जागी। इसके बाद मैंने अपने मस्तराम के नामधारी ब्लाग की जांच की तो पाया कि चिट्ठाजगत ने उनको अपने यहां रख कर दिखाना शुरू किया। उनमें मेरा वास्तविक नाम था इसलिये चिट्ठाजगत वालों को यह पता था कि यह किसके ब्लाग हैं। उन्होनें मेरे ब्लाग स्पाट के एक और वर्डप्रेस के दो ब्लाग इस तरह मुझसे पूछे  बिना रख लिये। चूंकि मैं उनको प्रयोग पर जारी रखे हुए हूं और उन पर कोई नयी पोस्ट नहीं रखता पर जो भी रखता हूं वह चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर चला जाता है। इसलिये मैंने उनके नाम से मस्तराम हटा लिया पर उसके बाद अन्य ब्लाग पर लिखा। आज पता लगा कि वह भी चिट्ठाजगत वालों ने ले लिया। </p>
<p>मस्तराम अंतर्जाल पर बिना किसी सहायता के हिट पाने का एक उपाय है पर लोग उस पर कोई साहित्य पढ़ने नहीं आते। ऐसा लगता है कि गूगल से जुड़े या अन्य पुराने ब्लाग लेखकों ने अंतर्जाल पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिये मस्तराम के नाम से लिखना शुरू किया। गूगल के तो विज्ञापनों में ही इतनी गंदी गालियां लिखी हुईं हैं कि उन्हें यहां कोई लिखना ही नहीं चाहेगा। एक ब्लाग लेखक ने यौन साहित्य लिखा उसमेंं कुछ अश्लील नहीं था पर उसके अनुसार  उसके ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है और किसी ने गूगल को इसकी शिकायत की है उसका यह परिणाम है। मैंने उसे समझाया कि उसकी ब्लाग स्पाट की सैटिंग में गड़बड़ी है वह उसे चेक कर ले। मैंने अपने ब्लागस्पाट के एक ब्लाग पर वह कर देखा था जिससे वह चेतावनी अपने आप आने लगती है। मैंने उसे यह भी लिखा कि उसका ब्लाग क्या किसी का भी ब्लाग गूगल केवल इस कारण बैन नहीं कर सकता क्योंकि उसके विज्ञापनों के शीर्षकों में ऐसी गालियां हैं कि उन्हें कोई सामान्य हिंदी ब्लागर अपने अंदर पाठ में भी नहीं लिख सकता। </p>
<p>मस्तराम कोई असली नाम नहीं हैं और कई छद्म नाम के लोग इस पर लिख रहे हैं। हिंदी का कोई फोरम कभी भी उनको अपने यहां नहीं लिंक देता क्योंकि उनको अपनी श्वेत छबि बनाये रखने के लिये उससे दूर रहना ही श्रेयस्कर लगता है। चूंकि मेरे वह ब्लाग अन्य ब्लाग की तरह सामान्य पाठों हैं इसलिये उनको चिट्ठाजगत वाले लिंक देते हैं। संदेह के घेरे में वह इसलिये हैं कि वह मस्तराम शब्द डालकर ही वहां जाते हैं क्योंकि उन ब्लाग पर जितने भी हिट आये वह इसी शब्द से आये। हिंदी फोरमों पर दिख रहे हिंदी ब्लाग पर कभी कभार मस्तराम के नाम से लिखे जा रहे  ऐसे वैसे साहित्य पर चर्चा होती है पर कोई यह नहीं कहता कि हम भी वहां जाते हैं। सच तो यह है कि कई ब्लाग लेखक वह तांक झांक करते हैं नहीं तो मेरे ब्लाग उनके दृष्टिपथ में कैसे आते। </p>
<p>मस्तराम ‘आवारा’ से मैंने जिज्ञासावश एक पूछा था कि उनके ब्लाग पर कितने व्यूज आते हैं। बहुत दिन बाद उन्होंने अपने जवाब में बताया कि प्रतिदिन दोनों ब्लाग पर चालीस से पचास व्यूज आते हैं। जिस दिन पोस्ट नयी होती है उस दिन चारों फोरमों से भी जमकर व्यूज आते हैं। उससे एक बात तो लगी कि मस्तराम वाकई अपने आप में हिट दिलवाने वाला नाम है।  वह ब्लाग चेक किये तो उनका पता ही मस्तराम से शूरू है जबकि मैंने जी वगैरह लगाकर पता बनाया है। इसके बावजूद उस पर इतने हिट तो आ ही जाते हैं जो अन्य सामान्य ब्लाग पर नहीं आते। एक बार ख्याल आया था कि मैं भी ऐसा पता बनाऊं पर <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथी</a> और <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> के व्यूज देखकर मन नहीं माना। वह दोनों ही अध्यात्म के दम पर 20 से 25 व्यूज कभी पचास व्यूज तब भी जुटा लेते हैं जब कोई उन पर पाठ नहीं होता।  फिर वर्डप्रेस पर मस्तराम की श्रेणी में भी मेरे पास व्यूज आते हैं। इससे एक बात पता लगती है कि मस्तराम नामधारी ब्लाग जमकर हिट ले रहे हैं पर जैसे जैसे हिंदी पर लिखा बढ़ता जायेगा सामान्य जन की रुचि बढ़ेगी और अंततःसत्साहित्य ही हिंदी का सारथी बनेग और उसकी ध्वजपताका अंतर्जाल पर फहरायेगा।  मस्तराम आवारा से एक बात और पता लगी कि उन ब्लाग पर  टिप्पणियां तभी आती हैं जब वह फोरमों पर होती है। तब मैंने सोचा कि जब मस्तराम शब्द से ही उसके ब्लाग खुल रहा है तो ब्लाग लेखक इतने तो समझदार हैं कि वह वहां टिप्पणियां नहीं लगायेंगे क्योंकि उससे पता लग जायेगा कि वह मस्तराम के इलाके में गये थे।<br />
वैसे हमारे इलाके में मस्तराम का इतना नाम प्रचलित नहीं है पर उस दिन एक आदमी ने बताया कि उसका नाम ऐसी वैसी रचनाओं के लिये खूब जाना जाता है। यही कारण है कि छद्म नाम से ऐसी वैसी रचनायें लिखने वाले वहां अपनी रचनाएं लिख रहे हैं और कुछ भले लोग भी हैं जो इस बात से बेखबर होकर ठीकठाक भी प्रस्तुति के साथ जुड़े हैं। ऐसा लिखने वालों के पुराने ब्लाग लेखकों होने का संदेह इसलिये भी जाता है कि तकनीकी और विज्ञापन की दृष्टि से वह जितना सुसज्तित हैं वह ज्ञान उन्हीं में संभव है। संभवतः हिंदी में लिखे गये वह पहले ब्लाग भी हो सकते हैं क्योंकि मैंने कई पर पांच वर्ष से अधिक पुरानी तारीखें देखीं हैं। मैं वहां अपने पाठकों के आने के मार्ग देखता हुआ वहां जाता हूं और इस दौरान वहां लिख पढ़ता हूं तो सोचता हूं चाहे कितने भी उन पर हिट हों हिंदी भाषा के समृद्धि करने का उनमें सामथर््य नहीं हैं।  बहरहाल अब मैं अपने नाम से मस्तराम नहीं हटाऊंगा क्योंकि यह मेरे प्रयोग का हिस्सा है। चिट्ठाजगत वाले हर ब्लाग अपने यहां ले जायेंगे तो मैं किस किसका नाम बदलूंगा। कहीं अगर मस्तराम दीपक भारतदीप पर दृष्टिपथ में आ जाये तो बाद वाला ही नाम पढ़ें क्योंकि पहला नाम तो प्रयोग के लिये है। अगर उनको हटाने से  तो मेरे प्रयोग प्रभावित होंगे। बहरहाल अंतर्जाल पर अनेक तरह के नये मसले सामने आते हैं जो केवल यहीं दिख सकते हैं और कहीं नहीं।  </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सही पता बताने वाले बहुत कम हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=449</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 12:24:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/03/hindi-shayri-kavita/</guid>
<description><![CDATA[निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये
प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>निभाने के वादे तो बहुत उन्होंने किये</p>
<p>पर जब आया मौका साथ देने का</p>
<p>कई बहाने सुना दिये</p>
<p>हम आसरा फिर भी करते रहे</p>
<p>यही सोचकर कि कभी तो</p>
<p>उनके बहाने खत्म हो जायेंगे</p>
<p>और वह काम आयेंगे</p>
<p>इस इंतजार में कितने बरस गुजार दिये<br />
.......................................................................</p>
<p>आहिस्ता चलो</p>
<p>राहों पर फिसलन बहुत है</p>
<p>गिरने पर संभालने वाले कम हैं</p>
<p>अपनी मंजिल और राहों को खुद चुनो</p>
<p>भटकाने वाले बहुत हैं </p>
<p>सही पता बताने वाले बहुत बहुत कम हैं<br />
...............................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल और ध्यान-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=443</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 16:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/31/a-hindi-poem-2/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज ने राह चलते हुए
रोक लिया और लग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फंदेबाज ने राह चलते हुए<br />
रोक लिया और लगा गुस्सा होने<br />
‘दीपक बापू यह क्या बात हुई<br />
हम जब भी तुम्हारा मोबाइल खटखटाते<br />
उसका स्विच आफॅ पाते<br />
स्कूटर की डिग्गी में भला<br />
कहीं ऐसे मोबाइल बंदकर क्यों ले जाते<br />
हम तुम्हारे दोस्त हैं<br />
तुम्हारे फ्लाप ब्लाग अगर  हिट हो जायें तो<br />
इसकी खबर पहले सुनने के लिये ही<br />
रोज तुम्हारे मोबाइल की घंटी बजाते<br />
तुम सुबह अपने ब्लाग की दशा<br />
देखकर ही जरूर घर से बाहर जाते<br />
मालुम है मिलते तो वह तुम्हें<br />
हमेशा फ्लाप ही हैं पर<br />
तुम फिर भी कहां बाज  आते<br />
तुम्हारी चिंता कम हुई हो<br />
यह  जानने के लिये ही<br />
हम तुमसे करते हैं सुबह संपर्क<br />
पर तुम्हार रवैया देख कर खफा  हो जाते’</p>
<p>सुनकर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘हमारे फ्लाप होने की चिंता बहुत हैं तुमको<br />
इसलिये सुबह से शाम तक<br />
मिस काल ही लगाते<br />
कभी काम पड़ता है तभी<br />
करते हो मोबाइल पर बात<br />
पर कभी ब्लाग के बारे में पूछते हो<br />
याद हमें नहीं आता<br />
तुम्हें हमारे मोबाइल बंद होने से अधिक<br />
फिक्र इस बात की है कि<br />
हम क्यों नहीं अपने साथ<br />
राह पर यह संकट भी ले जाते<br />
जिससे चाहकर भी तुम निजात नहीं पाते<br />
पर तुमसे नहीं सीखना मोबाइल का उपयोग<br />
दिमाग में नहीं भरना रोग<br />
याद रखना<br />
सारी दुनिया मानती है कि<br />
भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है<br />
मोबाइल वालों को कहां इसका ज्ञान है<br />
राह पर वाहन चलाते हुए<br />
कितने मोबाइल वाले दूसरे की गाडि़यों में<br />
घुस कर दम तोड़ गये<br />
खबरों के लिये सनसनी छोड़ गये<br />
हमें मोबाइल पर पद्मश्री मिलने की<br />
खबर मिलने की संभावना हो तब भी<br />
रास्ते में उसे बंद ही रखेंगे<br />
कहीं तुम्हारे मिस काल पर आया ध्यान<br />
स्कूटर कहां घुस जाये इसका नहीं रहेगा भान<br />
जिंदा रहते तो नहीं फैला सके लिखकर सनसनी<br />
न मिला सम्मान<br />
घुस गये किसी गाड़ी में<br />
तो बन जायेगी एक खबर हमारे नाम की<br />
फैलायेंगे खबरची तमाम सनसनी<br />
इसलिये मोबाइल को खोलकर साथ नहीं ले जाते</strong><br />
................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच और फिल्म से तो अच्छा है ब्लाग लिखना और पढ़ना-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=439</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 13:01:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/26/a-article-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्म के अभिनेत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्म के अभिनेता अभिनेत्रियों के चेहरों और नाम के सहारे ही आजकल देश के सारे समाचार चैनल चल रहे हैं इसमें कोई संदेह नहीं हैं। अगर क्रिकेट का कोई मैच नहीं हो रहा होता है तो भी समाचार चैनल खेलों के समय में खिलाडि़यों की  क्रीड़ेत्तर (खेल से अलग) गतिविधियों के समाचार देते हैं-जैसे वह कहां रैम्प पर गया या उसका अभी तक किस किस से प्रेम का संबंध चला। उसी तरह किसी फिल्म अभिनेता या अभिनेत्री की फिल्म नहीं रिलीज हो रही होती  तो उसके प्रेम प्रसंग या सामाजिक सेवा की जानकारी फिल्म टाईम में दी जाती है।  एक घंटे के समाचार समय में पौन घंटे इन दो क्षेत्रों पर ही व्यय किये जाते हैं। कहते हैं कि बाजार उपभोक्ताओं की मांग पर चलता है पर समाचार चैनल देख ऐसा नहीं लगता कि वह आम दर्शक के भरोसे हैं। उनको विज्ञापन मिल रहे हैं तो वह दर्शकों के कारण नहीं बल्कि अपनी सजावट के कारण मिल रहे हैं। </p>
<p>बहरहाल समाचार चैनलो के लिए खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां एक तरह से प्रचार के लिये माडल हैं। आज भारत से श्रीलंका हार गया तो यह समाचार चैनल (इस लेखक यह जानकारी समाचार चैनलों से ही मिली है) वाले उन पुराने  खिलाडि़यों  पर बरस रहे है जिनको एक सप्ताह पहले वह मील का पत्थर और अनुभवी बता रहा थे। एक माह पहले तक उनको बीस ओवरीय मैच में न खिलाने पर आलोचना कर रहा थे। आज तो बस वही पुराने खिलाड़ी उनके लिये खलनायक बन गये थे।</p>
<p>‘उनको सोचना चाहिए कि वह अब क्रिकेट खेलना चाहिए या नहीं! केवल नाम के सहारे ही बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता।’<br />
‘उन पुराने खिलाडि़यों को अपने आप से पूछना चाहिए कि वह कहां खड़े हैं?’<br />
वगैरह वगैरह। मतलब खिलाड़ी स्वयं तय करें कि उनको आगे खेलना हैं कि नहीं। चयनकर्ता को तो विचार ही नहीं करना चाहिए। यह समाचार चैनल वाले अपीलें कर रहे हैं कि ‘जाओ श्रीमान! आपका खेल पूरा हो गया।‘ </p>
<p>चार दिन बाद फिर वह थोड़ा खेल कर दिखायेंगे तो यही कहेंगे कि ‘ साहब वह तो  पुराने चावल हैं’। आशय यह है कि दर्शक को अपने हाथ में पकड़े रहना चाहते हैं। </p>
<p>कहते हैं कि आदमी की याद्दाश्त कमजोर होती है।‘ सारे मनोरंजक और जन भावना पर आधारित व्यवसाय इसी तर्क पर चलते हैं पर एक बात जो यह लेखक जोड़ता है कि किसी भी आम आदमी की याद्दाश्त कमजोर  होती है पर बुद्धिमानों की नहीं । वैसे आम आदमी की याद्दाश्त भी इतनी कमजोर नहीं होती जितना अपने देश के मीडिया विशेषज्ञ समझते हैे। यह अलग बात है कि नई पीढ़ी के लोग पुराने कारनामों को जान नहीं पाते जबकि वही भावनात्मक रूप से ऐसे ऐसे विषयों से जुड़े होते हैं जो मनोरंजन पर आधारित होते हैं और प्रचार माध्यमों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया हैं।  इसलिये ऐसे लोगों के व्यवसाय चल जाते हैं, पर अब तो हद ही कर दी है लोगों को भुलक्कड़ समझने की। हाल खिलाड़ी को महान और हाल ही घटिया बताने लगते हैं। उसी तरह जब किसी एक्टर की फिल्म रिलीज होती है तो उसे महान अभिनेता और सामाजिक सेवक बताते हैं और जब वह फंस जाता है किसी मामले में तो उसे खलनायक बताने लगते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>आशय यह है कि कि यहां कोई अब स्थाई नायक नहीं बन सकता-जो प्रचार माध्यमों के लिये कमाने के लिये एक माडल है चाहे वह कैसा भी हो उसका नाम तो वह रोज लेंगे। टीम हार गयी तो विलाप में भी आधा घंटा और जीत गयी तो खुशी में पोन घंटा समय लगायेंगे। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको तो उसमें विज्ञापन दिखाने हैं। इसलिये  आज अगर कोई नायक है तो कल ही उसे खलनायक कर भी प्रचारित किया जा सकता है। वैसे आम आदमी सब जानते हैं और आपसी बातचीत में प्रचार माध्यमों को केवल पैसे कमाने में संलग्न मानते हैं। कई लोग तो यह साफ कहते हैं कि समाचारों को सनसनीखेज अनावश्यक रूप से बनाया जा रहा है। </p>
<p>ऐसे में जागरुक और पढ़ने लिखने वाले लोगों के लिये अंतर्जाल ही एक जरिया है। अंतर्जाल पर अनेक लेखकों ने लिखस है कि जब से उन्होंनेे यहां लिखना शुरू किया है तब से बाहर टीवी और अखबार में उनका रुझान कम हो गया है। अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग में कई बार ऐसी घटनायें और विचार पढ़ने को मिल जाते हैं जो बाहर नहीं दिखते। हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों नारद, ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लागस पर सभी हिंदी ब्लाग दिखाये जाते हैं और वहां ऐसे विषय पढ़ने को मिलते हैं जो हम सोच भी नहीं सकते। हालांकि यहां फिल्म और क्रिकेट की चर्चा थोड़ी अजीब लगती है पर लोग उस पर जो  प्रतिक्रिया देते हैं उससे भी यह पता चलता है कि आम लोगों में अब इन विषयों पर कम ही रुचि है यह अलग बात है कि प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं के कारण उसे स्वीकार नहीं कर रहे। वह चाहे जब किसी को भी देश के लोगों का हृदय सम्राट बताने लगते है। अभी तो आप देखना आगे कितने देश के हृदय सम्राट बनते और बिगड़ते हैं।<br />
जो लोग इन माध्यमों से बोर हो चुके हैं उनको अब अंतर्जाल पर लिखे जाने वाले ब्लाग पर जरूर आना चाहिये क्योंकि वह अब उनके सामने एक ऐसा साधन बनता जा रहा है जहां वह अपना मन बहला सकें। यहां मित्रता और विवाद दोनों ही इतने दिलचस्प होते हैं कि कई फिल्म वाले भी ऐसी कहानी नहीं लिख सकते। बिना कैमरे के आपके दिमाग में ऐसे दृश्य बनने लगेंगे कि आप हंसेंगें। अगर आप लेखक हैं तो सोने में सुहागा। अपनी कविता या लेख लिखकर पहुंच जाईये इन फोरमों पर। एक बार आदत हो जायेगी तो फिर कहीं और मन लगाने को मन नहीं करेगा। क्रिकेट मैच देखकर अपने देश की हार से दुःखी होना या फिल्म की काल्पनिक कहानी को कोसने से तो अच्छा है ब्लाग लिखें और पढ़ें।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमें लगाने दो सब तरफ हिट की कील-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=431</link>
<pubDate>Mon, 21 Jul 2008 15:16:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/21/a-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[
घर में घुसते ही बोला फंदेबाज
‘शंका तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
घर में घुसते ही बोला फंदेबाज<br />
‘शंका तो हमें रास्ते में ही हो गयी थी कि<br />
आज होगी तुम्हारे लिये जश्न की शाम<br />
सामने होगी बोतल और  हाथ में होगा जाम<br />
बा ने बताया था फोन पर  कि<br />
ब्लाग चोरी होने के बाद तुम्हारे<br />
पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे<br />
उछल कूद कर रहे हो इतनी कि<br />
सिर के बाकी बाल भी झड़ रहे<br />
क्या किसी अंग्रेज ब्लागर से की थी<br />
अपना ब्लाग चुराने की डील<br />
बड़ा बुरा हो रहा है हमें फील<br />
देश में क्या कम ब्लागर थे<br />
जो विदेश से  ले आये हिट होने के लिये ऊर्जा<br />
अपने लोगों के सीने में ठोक दी कील’</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका"</a> की मूल रचना है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर किसी को यह कहीं अन्य प्रकाशित मिले तो इस ब्लाग http://deepakraj.wordpress.com पर सूचित करे।<br />
दीपक भारतदीप, लेखक संपादक </strong></p></blockquote>
<p>ग्लास को मूंह लगाने के बाद<br />
फिर उसे रखते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कमबख्त आज अच्छे दिन भी<br />
तुम्हारा आना हुआ है<br />
अंतर्जाल पर ब्लाग चोरी होना<br />
सम्मान की बात समझी जाती है<br />
कोई भाग्यशाली ही होता है<br />
जिसके हिस्से यह घटना पेश आती है<br />
यहां सभी हिट होने के लिये मरे जा रहे हैं<br />
नैतिकता और भक्ति का तो बस नाम लेते हैं सब<br />
अपने ऊपर दो नंबर  की गठरी ले जा रहे हैं<br />
पहले लोग अपने यहां छापे पड़वाते थे<br />
अपने यहां इज्जत बढ़ाने के लिये<br />
अब फिर रहे हैं अपना सामान<br />
चोरी कराने के  लिये<br />
कर लेते हैं डील<br />
फिर करवाते हैं अपने हिट होने की फील<br />
चोरी हो जाने पर कोई नहीं रोता<br />
हो जाने  पर ही हिट होने की चैन की नींद सोता<br />
चोरी होने को सामान बहुत है<br />
पर उसे उठाने वाले बहुत कम है<br />
किसका उठायें और किसका नहीं<br />
चोरों को भी यही गम है<br />
देश में भला किससे चोरी करवाते<br />
विदेश में ब्लागर तो छिपा रहेगा<br />
देश का होता तो पता नहीं<br />
कब पाला बदल जाता<br />
और हम अपनी असलियत कब तक छिपाते<br />
हमने नहीं की<br />
हम क्या जाने तकनीकी के बारे में<br />
कोई प्रशंसक ही  कर आया है<br />
हमारा ब्लाग चुराने की डील<br />
किसने की  और कैसे की, इससे क्या मतलब<br />
हमें तो बस गाना है अपना गुड फील<br />
जब तक किसी विदेशी से हाथ न मिलायें<br />
भला इस देश में कौन इज्जत करता है<br />
शादी हो या व्यापार<br />
हर कोई विदेश में डील के लिये मरता है<br />
चोरी हुआ हमारा ब्लाग<br />
जो कि हिट की शर्त पूरी करने के लिये काफी है<br />
अब तुम पर हास्य कवितायें लिखते हुए<br />
हमेशा रहे फ्लाप<br />
तो अपना रुतवा विदेशियों के दम पर दिखायेंगे<br />
सारा जमाना जा रहा है<br />
हम भी जरा चलकर देखें<br />
फिर अपनी असलियत पर लौट आयेंगे<br />
अपने घर का चिराग तेल से नहीं<br />
विदेशी ऊर्जा से जलायेंगे<br />
अभी तो चीयर्स करो<br />
तकनीकी से हम दोनों हैं पैदल<br />
जिसमें अपना फायदा दिखे वही कहो<br />
और हिट पाने में मस्त रहो<br />
चोरी के  मामले में डाल दो ढील<br />
देशभक्ति तुम संभालों<br />
हमें लगाने  दो सब तरफ हिट की कील<br />
..................................................<br />
<strong>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। अगरकिसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार </strong>होगा </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे के कहने पर मार्ग बदलना नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=429</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:12:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/17/a-article/</guid>
<description><![CDATA[जब अपने किसी लक्ष्य या उद्देश्य का पता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब अपने किसी लक्ष्य या उद्देश्य का पता हो और उसी मार्ग पर हमारे कदम बढ़ रहे हों तो किसी के कहने पर आकर वहां से हटना निहायत मूर्खता होती है। संभव है जिस व्यक्ति के कहने पर हम अपना मार्ग या लक्ष्य बदल रहे हैं उसे पूरा पता न हो। संभव है कि वह स्वयं एक भटका हुआ राही हो और उसका लक्ष्य पृथक हो और वह नहीं चाहता हो कि कोई उसके पहले अपने गंतव्य तक पहुंच कर विजय समारोह मनाये।</p>
<p>ययह जीवन एक पथ है जिसमें अनेक छोटे और बड़े लक्ष्य तय करते हुए मनुष्य चलता जाता है। कई बार यह मतिभ्रम हो जाता है कि अमुक व्यक्ति हमसे अधिक ज्ञाता है, और पहले से ही इन राहों पर चल रहा है इसलिये उसे अनुभव है इसलिये अगर वह कह रहा है कि मार्ग बदल लो तो बदल लेना चाहिए। कई ऐसे लोग भी होते हैं जो दूसरे व्यक्ति पर हंसते हुए कहते हैं कि‘तुम जिस लक्ष्य पर निकले हो उसी पर मुझे भी जाना है पर तुम्हारा मार्ग लंबा है और मेरा कम, इसलिये मेरे साथ चलो।’ हो सकता है वह सही हो पर उसकी बातों की सत्यता का परीक्षण किये बिना उसके पीछे चलना अविवेक का परिचायक है। संभव है वह आपको उससे भी अधिक लंबे मार्ग पर चलना पड़े जितना पहली राह पर चलना था।  यहां कई लोग ज्ञानी दिखते हैं पर होते नहीं और जो होते हैं वह बघारते नहीं। ऐसे में अपनी राह से हटने से पूर्व अन्य लोगों से भी विचार करें। </p>
<p>इस संसार में सर्वज्ञानी कोई नहंी है पर मनुष्य स्वभाव ऐसा ही है कि वह अपने को दूसरे के सामने ज्ञान बघारकर सुख उठाना चाहता है। किसी में यह भाव अधिक होता है तो किसी में कम। जिनमें अधिक होता है वह न केवल स्वयं भटकते हैं कि बल्कि दूसरे को भी भटकाते है। भले ही अपना लक्ष्य देर से मिलने और मार्ग लंबा होने की संभावना हो किसी अन्य के कहने पर आकर उसे छोड़ना नहीं चाहिए।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल यानि बकबक-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=428</link>
<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 09:56:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/13/poem-on-mobil-fon/</guid>
<description><![CDATA[मित्र ने घर में घुसते ही
हाथ में मोबाइ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मित्र ने घर में घुसते ही<br />
हाथ में मोबाइल फोन थमाते हुए कहा-<br />
‘दीपक बापू , इसका नाम हिंदी में बताओ<br />
भले ही मैं पढ़ता लिखता नहीं पर<br />
मातृभाषा के प्रति लगाव  है<br />
इसके अंग्रेजी शब्द मोबाइल से अलगाव है<br />
यह नाम लेते ही होती है आत्मग्लानि<br />
जैसे हो रही हो आत्मसम्मान की हानि<br />
इस संकट से निकलने का मार्ग बताओ<br />
अनुवाद की शर्त पर खरा उतरे<br />
ऐसा मातृभाषा का शब्द बताओ’</p>
<p>हाथ से उठाकर पलंग पर मोबाइल को फैंका<br />
फिर मित्र को घूरकर देखा<br />
अपनी टोपी उतारी और गंजे सिर पर<br />
हाथ फिराते हुए गुस्से में करने लगे कविताई<br />
और कहैं महाकवि दीपक बापू-<br />
‘फ्लाप लेखक  हूं इसलिये हमारा मजाक उड़ाते हो<br />
शब्दों का कोई शोरूम बनाने की नहीं शक्ति मेरी<br />
यही अनुभव करवाते हो<br />
फिर भी दोस्ती का कर्तव्य निभाते हुए<br />
समझाता हूं<br />
हर शब्द का शाब्दिक अनुवाद नहीं होता<br />
काम से भी इसका कहीं कही नाम होता<br />
इस भारत में कुल दो सौ से अधिक<br />
बड़े लोग नहीं होंगे जिनके पास<br />
अपने काम से फुर्सत नहीं है<br />
बाकी दिखायें कितना भी स्वयं को व्यस्त<br />
 इसकी जरूरत नहीं है<br />
जब से हमने किया है अपने मोबाइल का स्विच आफ<br />
सारे दुष्ट ग्रह हो गये हैं साफ<br />
तुम पहले करते थे शहर के दूसरे<br />
सिरे पर बैठकर हैरान<br />
अब संकट बढ़ाने के लिये<br />
हमारे पास आते हुए<br />
तुम भी होते हो परेशान<br />
लिखते थे तब  अपनी पत्रिका पर कोई पाठ<br />
तुम्हारी घंटी देती हमारा ध्यान  काट<br />
अब जब तक आये नहीं<br />
तब कर लेते हम अपना काम कहीं<br />
लोगों ने तो इसे समझ लिया खिलौना<br />
पकड़े रहते हैं इसका हर समय हर  कोना<br />
अपने लोगों की परेशानियों की खबर जल्दी मिले<br />
ताकि जल्दी हमदर्दी दिखाने पहुंच जायें<br />
और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढायें<br />
इसलिये इसे अपने दिल के पास<br />
लगाये  फिर रहे हैं<br />
अपने ही पैदा किये तनाव में घिर रहे हैं<br />
इश्कबाजी और फालतू बातें करते देखकर<br />
यह नहीं लगता कि यह कोई काम का है<br />
करते हैं सभी बकबक, वार्तालाप तो नाम का है<br />
इसलिये तुम्हें या जमाने को नहीं जमे<br />
हमने मोबाइल फोन का नाम बकबक रख दिया<br />
इसका न हो भले कोई तार्किक आधार<br />
पर मोबाइल हो गया है बकबक का बाजार<br />
हमारी बात समझ में न आये तो<br />
देश में तो इसका हल संभव नहीं है<br />
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा करवाओ<br />
.....................................................................</p>
<blockquote><p>नोट-यह हास्य व्यंग्य रचना काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से इसका मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे एक मित्र द्वारा मजाक में यह प्रश्न उठाये जाने  पर कवि/लेखक ने इस पर लिखा है।<br />
दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टोपी के व्यापार का शुभारंभ-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=427</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:25:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/12/launching-a-cap-of-trade-comic-satire/</guid>
<description><![CDATA[दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।<br />
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।<br />
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’</p>
<p>इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’<br />
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’<br />
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’</p>
<p>दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।<br />
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र  जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं।  ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के  लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’<br />
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’<br />
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’<br />
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’<br />
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप  कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)<br />
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’<br />
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’<br />
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं।  फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’<br />
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले।  क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’<br />
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।<br />
.......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वयंभू संपादक होने का सुख-व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=426</link>
<pubDate>Fri, 11 Jul 2008 15:59:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/11/the-pleasures-of-self-editor-satire/</guid>
<description><![CDATA[इस देश में संपादक दो प्रकार के होते है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस देश में संपादक दो प्रकार के होते हैं। एक तो वह जो संपादक कहलाते हैं पर जानते ही नहीं कि संपादन आखिर किस बला का नाम है। एक वह हैं जो संपादन का कार्य करते हैं पर उनको पता ही नहीं कि वह संपादक हैं और बाबुओं की तरह अपने काम में जुटे रहते हैं। आपने संपादकों के रूप में  कई बड़े नाम सुने होंगे दरअसल उनमे अनेक तो ऐसे हैं जो अपने पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन प्रतिष्ठानों के मालिक होते हैं और वह शायद ही कभी स्वयं यह कार्य करते हों।  इसके अलावा कुछ नाम आपने ऐसे भी सुने होंगे जो प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादक होते हैं पर उनका भी संपादन से कोई वास्ता नहीं होता। वह कभी कभार अपने प्रकाशनों के लिये कुछ आलेख लिख देते हैं जिसे संपादकीय कहा जाता है। अनेक लोगों के दिमाग में संपादक के स्वरूप को देखकर अनेक कल्पनाऐं और भ्रम पैदा होते हैं जो कि सत्य से परे होते हैंं </p>
<p>अनेक लेखक गाहे बगाहे अपनी रचनायें छपने पर पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों पर बरसते हैं पर उनके नाम जानते हुए भी कहते  नहीं  क्योंकि यह सबको पता है कि काम तो कोई और लोग ही करते हैं। अधिकतर नये और युवा लेखक संपादक शब्द सुनकर ही मंत्र मुग्ध हो जाते हैं और अपने आसपास संपादकों का सम्मान होते देखकर वैसे ही होने की राह पर चलना चाहते हैं।  अनेक ऐसे लोग हैं जिन्होंने प्रतिष्ठित संपादकों को देखकर इसी राह पर चलने का निर्णय लिया, पर बाद में जब असलियत का पता चला तो या हट गये या फिर समझौत कर लिया।  इस आलेख के  लेखक ने तो अपना