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	<title>hindi-story &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-story"</description>
	<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 18:47:13 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=469</link>
<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 15:16:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=469</guid>
<description><![CDATA[घर से निकले ही थे पैदल
देखा फंदेबाज को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>घर से निकले ही थे पैदल<br />
देखा फंदेबाज को भागते हुए आते<br />
इससे पहले कुछ कह पाते<br />
वह हांफते हुए गिर पड़ा आगे<br />
और बोला<br />
’‘दीपक बापू  अभी मुझे बचा लो<br />
चाहे फिर भले ही अपनी हास्य कविता सुनाकर<br />
हलाल कर मुझे पचा लो<br />
रास्ते में उस पंगेबाज को जैसे ही मैंने<br />
कहा बापू से मिलने जा रहा हूं<br />
पत्थर लेकर मारने के लिये मेरे पीछे पड़ा है<br />
सिर फोड़ने के लिये अड़ा है<br />
कह रहा है ‘टीवी पर तमाम समाचार आ रहे है<br />
बापू के नाम से बुरे विचार मन में छा रहे हैं<br />
तू उनका नाम हमारे सामने लेता है<br />
उनको तू इतना सम्मान देता है<br />
अभी तेरा काम तमाम करता हूं<br />
वीरों में अपना नाम करता हूं’<br />
देखो वह आ रहा है<br />
अच्छा होगा आप मुझे बचाते’’</p>
<p>पंगेबाज भी सीना तानकर खड़ा हो गया<br />
हांफते हांफते  बोला फंदेबाज<br />
‘अच्छा होता आप इसे भी<br />
अपनी हास्य कविता सुनाते’</p>
<p>कविता का नाम सुनकर भागा पंगेबाज<br />
उसके पीछे दौडने को हुए<br />
फंदेबाज  का हाथ छोड़ने को हुए<br />
पर अपनी धोती का एक हिस्सा<br />
उसके हाथ में पाया<br />
उनकी टोपी पा रही थी<br />
अपने ही पांव की छाया<br />
अपनी धोती को बांधते<br />
टोपी सिर पर रखते बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कम्बख्त जब भी हमारे पास आना<br />
कोई संकट साथ लाना<br />
क्या जरूरत बताने थी  उसे बताने की कि<br />
हम हास्य कविता रचाते<br />
कविता सुनने से अच्छे खासे तीसमारखां<br />
अपने आपको बचाते<br />
हम उसे पकड़कर अपनी कविता सुनाते<br />
तुम अपने मोबाइल से कुछ दृश्य फिल्माते<br />
वह नहीं भागता तो हम मीडिया में छा जाते<br />
कैसे बचाया एक फंदेबाज को पंगेबाज से<br />
इसका  प्रसारण और प्रकाशन सब जगह करवाते<br />
आजकल सभी जगह हिट हो रहे पंगे<br />
रो रहे है फ्लाप काम करके  भले चंगे<br />
ऐसे ही दृश्य बनते हैं खबर<br />
खींचो चाहे  दृश्य और शब्द<br />
जैसे कोई हो रबड़<br />
पहले बनाते हैं ऐसी योजना जिससे<br />
मशहूर हो जायें पंगे<br />
फिर जिनको  पहले बताओ  बुरा<br />
बाद में बताओ उनको चंगे<br />
पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज<br />
कितना अच्छा होता हम सीधे प्रसारण करते हुए<br />
अपनी हास्य कविता से पंगेबाज को भगाते<br />
हो सकता है उससे हम भी नायक बन जाते<br />
हमारे ब्लाग पर भी छपती वह कविता<br />
शायद इसी बहाने हिट हो जाते<br />
इतने पाठ लिखकर भी कभी हिट नहीं पाते<br />
पंगेबाज कुछ देर खड़ा रहा जाता तो<br />
शायद हम भी कुछ हास्य कविता पका लेते<br />
अपने पाठको का पढ़ाकर सकपका  देते<br />
पर तुमने सब मामला ठंडा कर दिया<br />
अब हम तो चले घर वापस<br />
इस गम में<br />
कोई छोटी मोटी शायरी लिख कर काम  चलाते<br />
...............................................................</strong><br />
<strong>यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसक लिये जिम्मेदार होगा<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</guid>
<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल
सब कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
..........................................</p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी दो जुदाई-हास्य हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=550</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:42:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=550</guid>
<description><![CDATA[माशुका ने शायर से कहा
‘बहुत बुरा समय थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माशुका ने शायर से कहा<br />
‘बहुत बुरा समय था जब मैंने<br />
अपनी सहेलियों के सामने<br />
किसी शायर से शादी करने की कसम खाई<br />
तुमने मेरे इश्क में कितने शेर लिखे<br />
पर किसी मुशायरे में तुम्हारे शामिल होने की<br />
खबर  अखबार में नहीं आई<br />
सब सहेलियां शादी कर मां बन गयीं<br />
पर मैं उदास बैठी देखती हूं<br />
अब तो कोई मशहूर शायर<br />
देखकर शादी करनी होगी<br />
नहीं झेल सकती ज्यादा जगहंसाई’</p>
<p>शायर खुश होकर बोला<br />
‘लिखता बहुत हूं<br />
पर सुनने वाले कहते हैं कि<br />
उसमें दर्द नहीं दिखता<br />
भला ऐसा कैसे हो<br />
जब मैं तुम्हारे प्यार में<br />
श्रृंगार रस में डुबोकर शेर लिखता<br />
अब तो मेरे शेरों में दर्द की<br />
नदिया बहती दिखेगी<br />
जब शराब मेरे सिर पर चढ़कर लिखेगी<br />
अपने प्यार से तुम नहीं कर सकी मुझे रौशन<br />
मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी  दो जुदाई’</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टोपी के व्यापार का शुभारंभ-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=427</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:25:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=427</guid>
<description><![CDATA[दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।<br />
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।<br />
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’</p>
<p>इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’<br />
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’<br />
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’</p>
<p>दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।<br />
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र  जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं।  ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के  लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’<br />
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’<br />
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’<br />
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’<br />
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप  कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)<br />
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’<br />
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’<br />
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं।  फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’<br />
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले।  क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’<br />
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।<br />
.......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान भी अब पालतू होते हैं-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 17:53:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</guid>
<description><![CDATA[कई चेहरे रोज दिखते हैं
पर फिर भी अनजान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई चेहरे रोज दिखते हैं<br />
पर फिर भी अनजाने रह जाते हैं<br />
मिलते हैं रोज कई लोग यहां<br />
पर सभी अपनी महफिलों में आने के<br />
दावतनामे नहीं भिजवाते हैं</p>
<p>आते हैं कई खत हमारे दरवाजे पर<br />
लिखने वाले सभी अपने नहीं हो जाते हैं<br />
सस्ती है दोस्ती<br />
एक जाम पर दोस्त बदल जाते हैं<br />
बेदर्द जमाने में लोग<br />
क्या समझेंगे दिल के इशारे<br />
उनके दिल में तो चमकते पत्थरों के<br />
घर बस जाते हैं</p>
<p>सहारे की उम्मीद किससे करें<br />
मददगार कीमत बताए जाते हैं<br />
जिनकी आंखों पर  है दौलत का पर्दा<br />
वह किसी के बहते पसीने को<br />
भला क्या देख पायेंगे<br />
जिनके कान सुनते है शोर<br />
भला किसी बेसहारे की<br />
सिसकती आवाज कहां सुन पायेंगे<br />
जुबान जिनकी गिरवी है अपने आका के पास<br />
भला सच क्या कह पायेंगे<br />
आपने हाथों रखी है अपनी कलम गुलाम<br />
मालिक के इशारे के बिना<br />
किसका नाम लिख पायेंगे<br />
इंसान  भी  अब पालतू होते हैं<br />
जो अपना  सम्मान बेच आते हैं<br />
हर जगह अपने आका के नाम<br />
लिखते और गाते नजर आते हैं</p>
<p>....................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पास के विद्वान भी बैल बन जाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=381</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 16:31:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=381</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू  मैं
ही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="//i20.tinypic.com/2rhb7g1.jpg[/IMG]" alt="" />आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू  मैं<br />
हीरो का ब्लाग पढ़कर आया<br />
हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती<br />
पर उसका अंग्रेजी ब्लाग पर पढ़कर<br />
मैंने अपने भतीजे से टिप्पणी लिखवाई<br />
पहली बार अंतर्जाल पर  मौज मनाई<br />
सैंकड़ों लोगों के नाम लिखे थे नीचे<br />
मैंने  कर दिया सबको पीछे<br />
तुम इसलिये फ्लाप हो<br />
क्योंकि कुछ बनने से पहले ही अपना ब्लाग बनाया’</p>
<p>नाक पर चश्मा लटकाकर<br />
उसे घूरते हुए देखने लगे<br />
जैसे अभी खा जायेंगे<br />
फिर सोचकर बोले<br />
‘दोष तुम्हारा नहीं हमारा है<br />
बात करते हैं तुमसे इसलिये<br />
क्योंकि अकेला होना हमें नहीं गवारा है<br />
तुम्हारे लिये तो वही हिट है<br />
जिसको समझने में तुम्हारी बुद्धि अनफिट है<br />
दूर बैठा कितना भी ढोल है<br />
तुम्हें  सुहावना लगेगा<br />
बाहर से लगता है आकर्षक<br />
अंदर जिसमें पोल है<br />
वही तुमको फलता लगेगा<br />
दूर होते तुमसे तो<br />
कुछ हम भी तुमको ऊंचे नजर आते<br />
पास के विद्वान भी घर में बैल बन जाते<br />
जो दृश्य आंख से आगे न जाता हो<br />
जो स्वर कान से पार न पाता हो<br />
जिसका स्पर्श ही तुम्हारे लिए अंसभव<br />
वही तुमको भाता है<br />
मेरे  पास हो इसलिये तुम्हारे लिए<br />
अपना यह प्रपंच नहीं रचाया<br />
दुनियां भर में फैले गुणवान और विद्वानों से<br />
बन जायें संपर्क इसलिये यह ब्लाग बनाया<br />
.........................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन के रोग का इलाज तो मन ही में है-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=409</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 07:22:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=409</guid>
<description><![CDATA[
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><br />
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फिर भी उसकी मेरे से मित्रता बरसों पुरानी है। वह आर्केस्टा चलाता है। मैं  कई बार विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर उसका कार्यक्रम सुन चुका हूं। उसने कभी मुझे स्वयं इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि उसकी और मेरी मित्रता ऐसी भी नहीं रही। वह जब कहीं मिलता है तो उससे बड़ी आत्मीयता से बातचीत हेाती हैं। इस तरह  मेरे चार मित्र हैं जो रास्ते पर मिलते हैं और आत्मीय रूप से बातचीत कर अलग हो जाते हैं। यह आर्केस्ट्रा चलाने वाला मेरा मित्र कैसे बना यह तो मै भी नहीं जानता। हां, इतना याद है कि कुछ वर्ष पहले मैं अपनी एक रचना देने अखबार में गया तो वह वहीं काम से खड़ा था तब उसकी और मेरी बातचीत शुरू हुई। बाद में तो वह उस अखबार के दफ्तर में भी आता रहा जहां मैं काम करता था। </p>
<p>एक हिंदी फिल्म का गाना है। शायद पड़ौसन का! इक चतुर नार, बड़ी होशियार....................उस गाने को वह जिस तरह मंत्रमुग्ध ढंग से गाता है वह मन को छू लेता है। वह जब भी कहीं जाता है लोग इस गाने की फरमाइश अवश्य करते है।</p>
<p>उस दिन रास्ते चलते हुए उससे मुलाकात हुई। मुझसे कहने लगा-‘यार आजकल तो ऐसा लगता है कि अधिकतर लोगों को साइकिटिस (मनोचिकित्सक)की आवश्यकता हैं। आजकल लोग क्या बात करते हैं समझ में नहीं आता।’<br />
मनोचिकित्सक शब्द से मैं सतर्क हो गया। मैने उससे पूछा-‘क्या हुंआ।’<br />
वह बताने लगा कि-‘ ‘‘मैं अभी एक आदमी के घर उसके लड़के की शिकायत लेकर गया था। वह मेरे भाई से बेकार में लड़ता रहता है तो वह कहने लगा कि बचपन में उसके लड़के को सिर पर चोट लगी थी तो उसके दिमाग में खराबी पैदा हो गयी थी। अब बताओं भला ऐसा कहीं होता है। अच्छी तरह खाता पीता है, बात करता है। भला ऐसा कहीं ऐसा होता है’’?’<br />
मैंने कहा-‘‘पर उसने जब स्वयं कहा है तो होगा? वह अपने लड़के की इस कमजोरी को स्वयं ही मान रहा है क्या यही कम है।’<br />
उसने कहा-‘‘हां यह बात तो सही है। उस आदमी ने बरसों से स्कूटर तक नहीं चलाया। शायद यही वजह रही होगी, पर मैं उसे अकेले की बात नहीं कर रहा। ऐसा लगता है कि मांबाइल, कंप्यूटर और तथा अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग से अधिकतर  लोग कही मानसिक रोगों का शिकार तो नहीं हो रहे।’</p>
<p>मैंने हंसते हुए कहा-‘आप तो जानते हो कि किसी अन्य व्यक्ति को मनोरोगी बताकर मैं अपने को मनोरोगी घोषित नहीं करना चाहतां।’<br />
वह जोर से हंसा-‘अच्छा! याद आया! वही जो तुमने मानसिक चिकित्सालय के बोर्ड पर लिखी बातों का जिक्र किया था। हां, मैं भी सोचता हूं कि इस तरह दूसरों को मनोरोगी मानना छोड़ दूं।’</p>
<p>मेरा एक अन्य लेखक मित्र है और वह एक दिन मनोचिकित्सालय गया था। वहां उसने एक बोर्ड पढा, जिस पर दस प्रश्न लिखे थे। साथ ही यहा भी लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। मुझे वह सभी प्रश्न याद नहीं है पर जितने याद हैं उतने लिख देता हूं। उस लेखक मित्र की बेटी ने उसे ब्लाग तो बना दिया है पर उसने  अभी उस पर मेरे कहने के बावजूद लिखना शुरू नहीं किया। जब वह लिखेगा तो उससे कहूंगा कि वह दस के दस प्रश्न वैसे ही लिख दे। उनमें से जो प्रश्न मुझे याद हैं वह नीचे लिख देता हूं। </p>
<p>1.क्या आपको लगता है कि आप सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं पर बाकी सबका व्यवहार खराब है।<br />
2.क्या आपको लगता है कि आप हमेशा सही सोचते हैं बाकी लोग गलत सोचते है।<br />
3.क्या आपको लगता है कि आप दूसरों की सफलता देखकर खुश होते हैं और बाकी लोग आपकी सफलता या उपलब्धि से जलते है।<br />
4. आप दूसरों का भला करते हैं पर सभी लोग आपका बुरा करने पर आमादा होते है।<br />
5. क्या आपको लगता है कि आपकी नीयत अच्छी है  अन्य सभी लोगों की  खराब है।<br />
6.आप सबसे अच्छा काम करते हैं पर उसकी कोई सराहना नहीं करता जबकि दूसरों के खराब काम को भी आप सराहते है।</p>
<p>मैने जब अपने मित्र की बात सुनी तबसे अपने आपको यह यकीन दिलाने का प्रयास करता हूं कि मैं मनोरोगी नहीं हूं। कई बार जब तनाव के पल आते है तब मैं सोचता हूं कि कहीं मैं मनोरोगी तो नहीं हूं तक यह प्रश्न अपने मन में दोहरात हूं साथ ही यह उत्तर भी कि नहीं। ताकि मुझे यह न लगे कि मै मनोरोग का शिकार हो रहा हूं।<br />
अगर मैं कहीं ने लौटता हूं और मुझसे कोई पूछता है कि‘आपके साथ वहां कैसा व्यवहार हुआ?’<br />
बुरा भी हुआ हो तो मैं कहता हूं कि‘अच्छा हुआ’<br />
कोई पूछे-‘अमुक व्यक्ति कैसा है?’<br />
मैं कहता हूं-‘ठीक है?’<br />
अंतर्जाल पर कोई बात लिखते हुए  कई बार यह स्पष्ट लिख देता हूं कि मैं कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं हूं जो मेरे विचार में परिवर्तन की संभावना न हो। इसके साथ ही यह भी बता देता हूं कि अपने लिखे का अच्छे या बुरे न होने का भार मै अपने मस्तिष्क पर नहीं डालता।<br />
दूसरो का लिखा अगर समझ में न आये या अच्छा न लगे तब भी वहां नहीं लिखता कि यह ठीक नहीं है। सोचता हूं कि मुझे मुझे ठीक नहीं लगा तो क्या दूसरों को अच्छा लग सकता है। अगर किसी जगह प्रतिवाद स्वरूप टिप्पणी लिखनी तो जरूर लिखता हूं कि भई,  आपके विचार पर मेरा यह विचार है  परं और उससे पहले भी सोच लेता हूं कि वह बात इन प्रश्नों के दायरे ने बाहर है कि नहीं। प्रशंसा करना मनोरोग के दायरे में नहीं आता है पर आलोचना कहीं मनोरोग के प्रश्नों के दायरे में तो नहीं यह अवश्य देख लेता हूं।’</p>
<p>वैसे दूसरे क्या सोचते हैं यह अलग बात है। हां, अपने अंदर जरूर आजकल देखना चाहिए कि कहीं हम मनोरोग का शिकार तो नहीं हो रहे। हम जिस तरह विद्युतीय प्रवाह से चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं उसको देखकर मुझे लगता है कि हमारे अंदर मनोरोगों का होना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं डरा नहीं रहा हूं। हो सकता है कि शुरू में आप डर जायें पर एक बात याद रखें कि मनोरोगों की दवा भी मन में ही है और जब आप जान जायेंगे कि आप में उसका कोई अंश है तो बिना बताये अपना इलाज भी शुरू कर देंगे। जैसे मैंने अपने मित्र की बात सुनकर तय किया कि अब अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करूंगा और कोई करे तो उस  पर नाचूंगा नहीं।  किसी को अपने से कमतर नहीं बताऊंगा । अपनी वस्तु या पाठ को दूसरे के पाठ से श्रेष्ठ बताने का प्रयास से स्वयं परे रहूंगा। मन का इलाज मन से करने का प्रयास किया है अब सफल हुआ कि नहीं यह मुझे भी पता नहीं। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=378</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 13:40:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=378</guid>
<description><![CDATA[लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।</h3>
<h3>मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’</h3>
<h3>मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’</h3>
<h3>इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’</h3>
<h3>मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’<br />
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’<br />
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’</h3>
<h3>मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’<br />
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होने पर विरोधी केवल धुरविरोधी ही हो पाते हैं। उस समय हिंदी ब्लाग जगत में  मैं नया था पर धुरविरोधी के समर्थकों के ब्लाग लेखकों के पाठों   में कई तरह की वैचारिक चुनौतियां होतीं थीं। मैंने उनका प्रतिवाद करने की दृष्टि से एक नहीं तीन जगह कवितायें लिखीं। दो छद्म नाम से थीं। हुआ यूं कि मेरे वास्तविक नाम पर तो मित्रों की  प्रतिक्रिया आई पर दो छद्म ब्लाग पर अलग अलग विपरीत टिप्पणियां आईं वह भी कविताओं के रूप में। एक छद्म नाम से दूसरी असली नाम से। छद्म नाम था आदिविद्रोही। मैंने तय किया कि पहले इस छद्म नाम से निपटूं। उसकी टिप्पणी पर उसके नाम को क्लिक किया तो उसका ब्लाग मिल गया। वहां धुरविरोधी की टिप्पणी भी थी जिनके हिंदी ब्लाग जगत से जाने को लेकर विदाई गीत लिखे जा रहे थे। बहरहाल उस दिन ब्लाग की टिप्पणियों से लिखने वाले के ब्लाग पर जाने का ज्ञान हुंआ। दूसरा यह  कि आदिविद्रोही कौन है मैं समझ गया। आदिविद्रोही ने एक पोस्ट ही लिखी थी और उसमें उसने अपने आने की घोषणा की थी। बाद में उसने दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों पर धमकाने वाले भी कमेंट लिखे। पहली और दूसरी प्रतिकूल टिप्पणी करने वाला एक ही व्यक्ति था। मतलब मुझे एक ही व्यक्ति से भिड़ना था। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरा छद्म ब्लाग है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे एक मित्र ब्लाग ने एक ही दिन तीनों कविताओं को अपने यहां लिंक दिया था और इसलिये वह लोग एकदम हमलावर हो गये थे। बहरहाल उस दिन गुस्सा पी गया जो बाद में कई पाठों को लिखने के लिए ऊर्जा के रूप में काम आया।</h3>
<h3>धुरविरोधी की इस हिंदी ब्लाग जगत से विदाई नहीं होगी यह मैं जानता था क्योंकि मुझे लगा कि यह उनका अपने छद्म ब्लाग से छुटकारा पाने का एक नाटक है। बाद में मेरा यह अनुमान सही निकला। आजकल वह अपने वास्तविक नाम से लिख रहे हैं-उनके अच्छे लेखक होने पर भी किसी को संदेह नहीं है। आदिविद्रोही ने घोषणा नहीं की पर फिर उसका ब्लाग यहां दिखाई नहीं दिया। मैंने उस पर अनेक बार व्यंग्य लिखे पर वह कभी नहीं देख पाया। मेरे कई पाठों का नायक  आदिविद्रोही होता है और वह जबरदस्त हिट लेतीं हैं। न केवल ब्लाग लेखकों  में बल्कि पाठकों में भी उनको बहुत रुचि से पढ़ा जाता है।  मैं उसे धुरविरोधी का शिष्य कहता हूं और उसने एक टिप्पणी से वह दिया जो कोई नहीं दे सकता। ब्लाग पर मेरी सबसे पहले जबरदस्त हिट पाठ को मैं कभी नहीं भूलता जिसका  शीर्षक है‘इस ब्लाग मीट पर हास्य कविता मत लिखना’। उसके बाद व्यंग्य लिखना शुरू किया तो फिर रुका नहीं । हां, अब अगर यह वही लोग हैं जो मैं समझ रहा हूं तो उनसे मेरा झगड़ा नहीं है और वह दोनों भी मेरे प्रति कोई दुर्भाव रखते नह दृष्टिगोचर नहीं होते। धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों अब उन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते है जो वह दूसरों के सामने चुनौती के रूप में पेश करते थे।</h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मै अखबार आज भी क्यों पढ़ता हूं-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=402</link>
<pubDate>Thu, 01 May 2008 15:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=402</guid>
<description><![CDATA[          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुरू किया क्योंकि मोहल्ले का वाचनालय हमारे किराये के घर के पास में ही था। धीरे-धीरे इसकी ऐसी आदत हो गयी कि जब हमने मकान बदले तो भी मैं सुबह वाचनालय अखबार पढ़ने जरूर जाता और धीरे-धीरे शहर बढ़ने के साथ  थोड़ी दूर एक कालोनी में आया और वहां कोई वाचनालय नहीं होने के कारण अखबार मंगवाना शुरू किया। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>इधर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के तेजी से बढ़ने के साथ ही डिस्क कनेक्शन भी लग गया और एक लायब्रेरी भी पास में खुल गयी जहां मैं अपने घर आने वाले अखबार के अलावा अन्य अखबार वहां कभी कभी पढ़ लेता हूं। कई बार सोचता हूं कि अखबार बंद कर दूं पर श्रीमतीजी उसे बड़ी रुचि के साथ पढ़ती हैं और वही हमें बतातीं हैं कि आज अमुक जगह आपको शवयात्रा या उठावनी में जाना है। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>सुबह जब मैं अपने घर के बाहर पेड़ के नीचे योगसाधना करता हूं  तब अखबार वाला फैंक कर चला जाता है और उस समय वह कई बार मेरे ऊपर आकर गिरता है। खासतौर से जब उष्टासन या सर्वांगासन के समय वह आकर गिरता है तब अगर श्रीमतीजी वहां  होती है तो जोर-जोर से  हंसती हैं। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>कई बार देर होने की वजह से अखबार नहीं पढ़ पाता तो श्रीमती जी मोबाइल पर सूचना देतीं हैं ‘आपने आप अखबार नहीं पढ़ा आज उठावनी पर जाना है‘ या ‘आज आप जल्दी निकल गये उधर शवयात्रा पर जाना है’। शहर से बाहर होने के बावजूद आप अपने लोगों से कट नहीं सकते। किसी कि शादी में आप जायें या नहीं या कोई आपको बुलाये या नहीं पर गमी में आपको जाना ही चाहिये और इसी कारण इसकी सूचना कहीं न कहीं से होना जरूरी है। कई बार निकट व्यक्ति होने के कारण सूचना फोन पर आ जाती है, पर अगर थोड़ा दूर का हो तो उस फिर उसके लिये अखबार एक मददगार साबित होता है।</strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>कई बार ऐसे अवसरों पर दूसरे शहर भी जाना पड़ता है। उस समय उस शहर में बस स्टेंड या रेल्वे स्टेशन पर ही अखबार खरीद लेता हूं जिससे पता चल जाता है कि उठावनी कहां है। कई बार तो  ऐसा भी हुआ है कि जिनके घर हम जा रहे हैं उनका पता हमें इसीलिये नहीं होता क्योंकि पहले कभी उनके घर गये नहीं  हैं या उसकी आवश्यकता नहीं  अनुभव की। तब ऐसे ही अखबार से पता लिया है। एक बार तो हम छहः लोग एक साथ एक दूसरे शहर उठावनी में शामिल होने जा रहे थे पर किसी के पास पता नहीं था। तब मैंने ही अखबार का आईडिया सुझाया और मेरा अनुमान सही निकला।  हम समय पर वहां पहुंच गये और वहां किसी को नहीं बताया कि अखबार से पता निकाल कर लायें हैं वरना कोई सुनता तो क्या कहता कि निकटस्थ लोग होकर इनको घर का पता तक नहीं मालुम था। वह समय यह सफाई देने का नहीं होता कि जिसके यहां आये हैं वह हमारे पास कई बार आये पर हम उनके यहां पहली बार आये हैं।</strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>एक बार तो हम एक शोक कार्यक्रम में शामिल होने गये तो जिस व्यक्ति के यहां जा रहे थे उसके घर पर न होने की पक्की संभावना थी क्योंकि उनके पिता का देहांत हुआ था और वह उनसे अलग रहते थे। हम पांच लोग थे और इस बात को लेकर चिंतित थे कि कैसे वहां पहुंचेगे। मैने बस से उतरते ही अखबार खरीद लिया और फिर हमारी समस्या हल हो गयी। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>हालांकि अखबार में कई दिलचस्प खबरे आतीं हैं और वह हमारे जीवन को अभिन्न अंग है पर समय के साथ कुछ ऐसा हो गया है कि उसमें दिलचस्पी तभी होती है जब समय होता है पर फिर भी ऐसे अवसरों पर अखबारों की सहायता मिलती है जो उनके प्रकाशन का उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता।  हालांकि आजकल अखबार इतने सस्ते हैं कि उसका व्यय तो कही गिना भी नहीं जाता पर फिर भी कभी आदमी सोचता है कि क्या फायदा? कहा जाता है कि किसी की शादी में भले मत जाओ पर गमी में जरूर जाना चाहिए। शहरों के बढ़ने के साथ आधुनिक साधन भी आये हैं पर आदमी की सोच और विचार का दायदा सिकुड़ रहा है। कई बार लोग ऐसे अवसरों सूचना नहीं देते या आवश्यकता नहीं अनुभव नहीं करते पर वहां अपना पहुंचना जरूरी होता है तब अखबारों की सहायता मिल जाती है। इसलिये आज भी अखबार पढ़ता हूं तो केवल इसलिये ताकि अन्य सूचनाओं के साथ ऐसी सूचनाएं भी मिलतीं रहें जिससे समाज से सतत संपर्क में रहा जा सके। अन्य सूचनाएं भी मिल जाती है जो महत्वपूर्ण होती हैं और अपने लिखने के साथ जानकारी बढ़ाने के काम भी आतीं हैं। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><br />
<strong></strong></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=365</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:01:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=365</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढिया अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
...........................</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=399</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 15:56:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=399</guid>
<description><![CDATA[आया एक आशिक का ईमेल
लिख था उसमें
‘‘दीप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong>आया एक आशिक का ईमेल<br />
लिख था उसमें<br />
‘‘दीपक बापू, जिसको मैं चाहता हूं<br />
वह पढ़ती है अंतर्जाल पर आपकी हास्य कविताएं<br />
हम उसे ताकते हैं वह नहीं देखती हमारी तरफ<br />
उसके दम पर ही आप हिट पाएं<br />
हमारे सारे अंग उसे देखते हुए शिथिल हो जायें<br />
उसे प्रभावित कर सकूं<br />
ऐसी कोई हास्य कविता हमको भिजवायें’</strong></p>
<p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong>पढ़कर पहले चौंकें दीपकबापू<br />
फिर लड़खड़ाते हुए यह भेजा यह संदेश<br />
‘पहले तो हम तुम्हें यह समझायें<br />
हम तो हिट नहीं बल्कि  हैं फ्लाप<br />
लिख नहीं पाते कुछ और<br />
इसलिये रचते हास्य कविताएं<br />
तुम किस गफलत में हो<br />
नवयौवनाओं को भी भला कब हास्य रस से<br />
सराबोर कविताएं दिल को भाएं<br />
यह अलग बात हैं कि मजाक में<br />
कुछ देर के लिये हंस जाएं<br />
पर उससे कभी दिल न लगायें<br />
तुम तो जाओ<br />
किसी श्रृंगार रस के रचयिता के पास<br />
जो तुम्हें दे सकते हैं कुछ प्रेम कविताएं<br />
अरे, इश्क भी भला कभी बदलता है<br />
हमेशा एक जैसा ही रूप चलता है<br />
पर समय बदल गया है<br />
अब तुम किसी नवयौवना को<br />
ताजमहल जैसा नहीं<br />
किसी कार  की तरह सुंदर बोलना<br />
 चंचल और शोख बताते हुए किसी<br />
मोटर सायकल से उपमा जोड़ना<br />
वाणी को कोयल से नहीं<br />
किसी मोबाइल की ट्यून से तोलना<br />
चाहे कुछ भी हो जाये<br />
हास्य कविता भेजने की मत सोचना<br />
रच डालो श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें<br />
हो सकता है उसको भायें</strong></p>
<p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मशहूर होने से शऊर नहीं आ जाता-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=361</link>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 11:54:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=361</guid>
<description><![CDATA[मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर होने की ललक सबमें होती है और इसके लिये आदमी अपने स्वार्थ के काम भी इस तरह करते हैं कि जैसे वह परमार्थ का कर रहे हैं। और नहीं तो कई काम ऐसे जिन्होंने किए ही नहीं अपने नाम से बताकर आत्मप्रवंचना करते हैं। दूसरों का कम बिना किसी स्वार्थ के करना या अपनी जिंदगी में ही कुछ ऐसा करना जो दूसरे न करते हों यह कोई नहंी करता।  मतलब यह है कि मशहूर होने का आशय यह कतई नहीं है कि जीने का भी शऊर हो।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमारी मुलाकात एक मशहूर आदमी से हुई दूसरे सज्जन के घर हुई थी। उस दिन वह सज्जन एक आम और खास आदमी के एक साथ मेजबान बने थे। हम बिना बुलाये गये थे और वह मशहूर आदमी विशेष आमंत्रित थे।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम जब पहुंचे तो मेजबान ने हमें देखते ही मूंह बना लिया-‘‘यार, तुम्हें भी अभी आना था! कल आ जाते। खैर आ ही गये तो रुक जाओ, और मेरी मदद करना। आखिर इतना मशहूर आदमी हमारे घर आ रहा है।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘ठीक है। अब बताओं हम क्या करें?‘</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह बोले-‘‘आज ड्राइंग रूम में न बैठकर इधर बाहर कुर्सी पर बैठ जाओ।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम वहीं बैठ गये। वह मशहूर आदमी आया। पूरा घर उसके स्वागत के लिए बाहर उमड़ पड़ा। हम अपनी कुर्सी से उठकर वहीं डटे रहे। सम्मान के लिये आगे नहीं गये क्योंकि मेजबान ने हमसे ऐसा कोई आग्रह नहीं किया था। उन मशहूर आदमी को अंदर ले जाया गया। पूरे घर में हलचल मची थी। कोई शरबत बना रहा था तो कोई पानी ला रहा था। उन पर मनमोहक शब्द वर्षा हो रही थी। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम दृष्टा बन कर डट गये। देखें आखिर क्या होता है? इतने में वह मेजबान सज्जन आये और बोले-‘‘आओ, जरा तुम बैठकर उनसे बात करो। मै थोड़ा अपने आपको  अकेला महसूस कर रहा हूं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम समझ गये कि वह भले ही स्वयं भी प्रसिद्ध है पर बोलने को शऊर उनमे भी  नहीं है। बहरहाल हम ड्राइंग रूम में जाकर उस मशहूर आदमी के सामने बैठ गये। वह मेजबान हमारा परिचय कराते हुए बोले-‘यह हमारे मित्र हैं। अच्छे लेखक हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">उन मशहूर सज्जन ने खीसें निपोरते हुए पूछा-‘क्या लिखते हो?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘अधिक कुछ नहीं बस कभी कभार व्यंग्य लिखते है। अधिक मशहूर नहीं है।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह हंसकर बोले-‘चिंता मत करो। कभी हो जाओगे। हां, हम पर व्यंग्य लिखने का दुस्साहस नहीं करना।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने हंसते हुए कहा-‘‘आप तो बहुत गंभीर आदमी हैं। चिंतक और विचारशील हैं। आप पर तो कभी अच्छा आलेख लिखना चाहिए पर हमें लिखना नहीं आता।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">वह एकदम गंभीर होकर बोले-‘वह भी आ जायेगा। कभी हमसे मिलना तो फिर तुम्हें मिलकर अपने बारे में बतायेंगे फिर हम पर लिखना।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने देखा कि  मेजबान उन मशहूर आदमी के स्वागत के लिए परिवार के महिलाएं और बच्चे इधर-उधर  भागमभाग कर रहे थे और हमें इसीलिये वहंा बिठा गये थे कि हम उनको बातचीत में व्यस्त रख सकें। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">इतनी सी बात के बाद दोनों तरफ खामोशी छा गयी। हमने सोचा-‘कौन अपने को इनसे कोई जुगाड़ लगानी है जो अधिक चाटुकारिता करें।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">जब मेजबान अंदर आये तो खामोशी देखकर उनसे बोले-‘हां साहब, आप आये तो हमारा घर पवित्र हो गया।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने देखा कि मशहूर आदमी का उस पर कोई प्रभाव नहंी हुआ वह बोले-‘सुनो यह अधिक तामझाम कर हमें बहलाओ नहीं। साफ-साफ बताओं हमारे पैसे कब लौटा रहे हो। यह तो तुमने हमें बुलाया पर हम तो खुद भी आते। आखिर पैसे का मामला है इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान का मूंह उतर गया और बोले-‘‘अभी तो यह मकान बनाया है। मैने पहले ही बता दिया था कि कम से कम दो वर्ष लगेंगे। फिर उन लोगों ने जितना ब्याज बताया था उसक दूना ले रहे हैं। मेरी तो आपसे सीधे बातचीत हुई थी पर अब वह आपके लोग मुझे तंग कर रहे हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर सज्जन रुखे स्वर में बोले-‘ तुम्हें पता है कि हम अपना काम स्वयं तो देखते नहीं। उन्हीं लोगों पर निर्भर है तो हम तो उनकी बात ही मानेंगे। हां यह मुझे अब ध्यान आया कि तुमने दो साल कहे थे। अभी कितना समय हुआ है?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">‘उसने कहा अभी तो 11 महीने हुए हैं।’’ मेजबान सज्जन ने कहा।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अब मशहूर आदमी ठंडे हुए और बोले-‘‘हो सकता है उन लोगों से कोई कागज पत्र पढ़ने में गलती हुई हो, पर तुमने छह महीने का ब्याज नहीं दिया है वह तो तय हुआ था कि हर महीने दोगे।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान सज्जन ने कहा-‘‘आपके लोग मान कहां रहे हैं। वह तो ब्याज अधिक लगा रहे हैं। जितना आपसे तय हुआ था उससे दूना लगा रहे हैं।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मशहूर आदमी ने कहा-‘‘ठीक है जितनी मेरे से बात हुई थी उतना दे दो फिर मैं उनको समझा दूंगा। नहीं तो वह फिर तुम पर गुस्सा कर बैठेंगे।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान अंदर गये और नोटों की गड्डी ले आये और उनको थमा दी। उसके बाद वह चले गये तो मेजबान ने चैन की सांस ली। फिर हमसे बोले-‘यार, अच्छा ही हुआ तुम थे। वरना जाने क्या-क्या सुनाता?’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘पर यह मशहूर आदमी तो नैतिकता और परोपकार की बातें करता है। अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो यह आदमी सूदखोरी का विरोध भी करता है।’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मेजबान ने कहा-‘‘यार, जो जिस बात के लिये मशहूर हो समझो उस काम का   उसे शऊर भी हो यह जरूरी नहीं है।  इनका सच वही है जो तुमने देखा पर किसी से कहोगे भी तो कौन मानेगा?’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हम भी उठकर चलने को हुए और कहा-‘‘अभी नहीं तो कभी इस पर लिखेंगे तो सही।’<br />
उसने कहा-‘क्या लिखोगे?’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">हमने कहा-‘‘मशहूर होने से शऊर नही आ जाता।’’</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने आप हिट बना देगा-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=396</link>
<pubDate>Fri, 25 Apr 2008 15:46:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=396</guid>
<description><![CDATA[सर्वशक्तिमान के घर से निकलकर
दोनों नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003366;"><strong>सर्वशक्तिमान के घर से निकलकर<br />
दोनों निकले बाहर तो<br />
एक भिखारी ने कहा<br />
‘दे जा, ऊपर वाले के नाम पर<br />
पांच रुपया तो वह<br />
जिंदगी में हिट बना देगा’</strong></span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>दोनों ने अनसुनी कर दी<br />
और आगे बढ़ गये तो<br />
फंदेबाज बोला<br />
‘दीपक बापू,<br />
हम तो हिट फ्लाप के चक्कर से हैं दूर<br />
अंतर्जाल पर न बनाया है कोई ब्लाग<br />
न फिल्म कोई बनाते जो<br />
तरसे हिट के लिये हमारे नूर<br />
तुम चल रहे हो फ्लाप<br />
देते उसको पांच रुपया तो<br />
क्या हो जायेगा<br />
हो सकता है 12 में से एकाध ब्लाग<br />
उसकी दुआ से हिट हो जाये<br />
तो तुम्हारा बेड़ा पार लगा देगा’</strong></span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>खड़े होकर पहले फंदेबाज को घूरा<br />
फिर बोले<br />
‘काहे हमारे ब्लोग देखते तो बहुत हो<br />
पढ़ते कभी नजर नहीं<br />
ऐसे ही उनके हिट होने की फिक्र में मरे जाते<br />
वैसे भी हम सर्वशक्तिमान के घर<br />
हम कुछ मांगने नहीं आते<br />
फिर भी हम आते इतनी दूर से<br />
तब भी वह बिना मांगे झोली<br />
हमारी तो भर देता दुआओं से<br />
फिर यह उसके पास बैठकर मांगता है तो<br />
उसकी कैसे खाली हो सकती हैं खोली<br />
यह भी एक व्यापार है<br />
इसका भी नहीं कोई पार है<br />
वैसे भी ब्लाग पर हिट होकर<br />
हमें कौन रुपया मिलने वाला है<br />
अपने हिसाब से देता सब ऊपर वाला है<br />
पांच रुपये देने से जिंदगी हिट हो जाती<br />
तो फिर क्यों इस देश में गरीबी छाती<br />
अपने लिये हिट मांगकर<br />
क्या मांगने वालों की कतार में<br />
हम भी शामिल हो जाते<br />
कोई मांगे अंदर मत्था टेककर<br />
तो कोई बाहर हाथ फैलाकर<br />
हम तो आते केवल आस्था से मत्था टेकने<br />
यह उसकी समस्या है<br />
कि हमें क्या दे या नहीं<br />
अपने तय समय पर वह<br />
जिंदगी और ब्लाग दोनों को हिट बना देगा<br />
.......................................</strong></span></p>
<p><strong><span style="color:#003366;"> सूचना-इस ब्लाग के कल तक 20 हजार व्यूज का अंक पार करने की संभावना है। अत जो 20 हजारवां पाठक हो अगर वह इस पर नाम लिखे तो अच्छा रहेगा। इसमें कमेंट के कालम में अंग्रेजी या रोमन हिंदी में अपना नाम लिखे तो अच्छा रहेगा। इस ब्लाग के कोने में पाठक संख्या  जिसे 19999 नजर आये तो वह समझे कि वह 20 हजारवां पाठक है और भाग्यशाली है। उसी तरह 20 हजार एक का पाठक भी अपना नात लिख तो अच्छा रहेगा। वह समझे कि वह इसे अब तीस हजार के सफर के लिये छोड़कर जा रहा है। दोनों अपने अपने आपको देख सकते हैं पर मैं उनको नहीं देख पाउंगा पर उनके लिखे से मुझे उसकी सुखद अनुभूति का अहसास होगा। </span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;"><br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तो यह था एक बकरे का बलिदान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=330</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 18:35:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=330</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
दीपक बापू अंतर्जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
दीपक बापू अंतर्जाल पर<br />
"लिखते-लिखते तुम क्या पाओगे सम्मान<br />
कहीं मन्नत मानो और हो जाओ हिट तो<br />
करना किसी बकरे का बलिदान<br />
आजकल भला मेहनत पर भरोसा कौन करता है<br />
सर्वशक्तिमान भी कुछ लेकर काम करता है<br />
अब छोडो अपनी प्रतिभा पर अभिमान<br />
सिखा रहा है क्रिकेट का कप्तान''</p>
<p>कंप्यूटर पर लिखते-लिखते रुक गए हाथ<br />
टोपी को घुमाकर बोले दीपक बापू<br />
'समझ गए अखबार पढ़ कर आ रहे हो<br />
हमारा ब्लोग पढ़ते तो कुछ समझ पाते<br />
माया घुमाती  है आदमी को ऐसा कि<br />
अच्छे खासे लोग शिकारी हो जाते<br />
हम तो समझे थे कि<br />
आस्ट्रेलिया में किला फतह<br />
खिलाडियों के खेल की वजह से हुआ है<br />
या फिर कोई जुआ हुआ है<br />
पर बात आई समझ में<br />
यमदूत भी रहे  होंगे असमंजस में<br />
बकरा रहा होगा  कोई क्रिकेट प्रेमी<br />
पापों की वजह से बकरे की योनि मिली होगी<br />
किसी एक पुण्य की वजह से<br />
अपनी मौत चुनने की छूट उसे होगी<br />
माँगा होगा सर्वशक्तिमान से<br />
 उसने क्रिकेट के कप्तान के हाथों से<br />
कटने का वरदान<br />
इसीलिए हो गया बलिदान </p>
<p>यमदूतों ने ही की होगी मेहनत<br />
सर्वशक्तिमान का हुक्म बजाना था<br />
क्रिकेट की टीम को जितवाना था<br />
ताकि बकरे को मिला<br />
पूरा हो सके वरदान<br />
कोई हलाल करे उसे क्रिकेट का कप्तान<br />
इतनी मेहनत उन्होने  शायद ही किसी<br />
जीव को  लाश   बनाने पर की होगी<br />
जिसने ऐसी कामना की होगी<br />
अगर क्रिकेट की टीम हार जाती<br />
बकरे की इच्छा अधूरी रह जाती<br />
अब खुला है यह राज जाकर<br />
कैसे  चूहे शेर हो गए थे<br />
कंगारू ढेर हो गए थे<br />
यह था एक बकरे का बलिदान<br />
हम क्यों कर रहे थे अपनी जीत पर अभिमान''<br />
---------------------------------------- </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोगर गया अपने गुरु के पास ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/29/blogar-gya-apne-guru-ke-paas/</link>
<pubDate>Sat, 29 Dec 2007 16:03:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/29/blogar-gya-apne-guru-ke-paas/</guid>
<description><![CDATA[एक  ब्लोगर पहुचा अपने
गुरु के पास और
चढ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक  ब्लोगर पहुचा अपने<br />
गुरु के पास और<br />
चढाया प्रसाद उनकी कृपा होने पर</p>
<p>गुरु बहुत खुश हुए और<br />
हालचाल पूछे जब<br />
ब्लोगर ने अपने अपने ब्लोग हिट<br />
होने का आशीर्वाद माँगा<br />
और बोला<br />
महाराज, कोई ऐसा आईडिया बताओ<br />
मैं पहुंच जाऊं टॉप पर''</p>
<p>गुरु ने कहा<br />
''अगर देर से हिट होना है<br />
तो अच्छे सन्देश अपने ब्लोग पर रखना<br />
सर्वशक्तिमान की  तस्वीर लगाकर<br />
हिट होकर भी समाज  के<br />
हित में रहना तत्पर<br />
अगर जल्दी हिट  होना है तो<br />
फिर लगाना फिल्मी हीरोइन की तस्वीर<br />
और गप-शप लिखना उन पर<br />
इस दुनिया में दो ही रास्ते हैं<br />
एक सत्य का जो देर से हिट दिलाता है<br />
दूसरा है माया का<br />
जो शीघ्र पहुंचता है शिखर पर''</p>
<p>ब्लोगर जाने लगा तो<br />
गुरूजी ने पूछा<br />
'तुम चलोगे तो कौनसे रास्ते पर'<br />
ब्लोगर बोला<br />
''महाराज, अपने जो दूसरा रास्ता बताया है<br />
वही मुझको भाया है<br />
मैं चलूँगा उसी पर'</p>
<p>वह चला गया तो<br />
दूसरा चेला बोला<br />
'महाराज यह आपने क्या किया<br />
तो गुरूजी बोले<br />
''ब्लोगर है पहले वह<br />
शिष्य बाद में<br />
अपने हिसाब से पढता है<br />
और उसी हिसाब से लगाता है कमेंट<br />
मैं तो उसे समझा रहा था पर<br />
पर उसने  ऐसे ही सुना  जैसे<br />
ब्लोग पढता और कमेन्ट लगता है<br />
यहाँ हमारे दर्शन कर तो अपने को<br />
समझाने आया था<br />
पर चलेगा तो अपनी समझ पर'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/24/dada-pote-ki-rajniti-aur-manoranjan/</link>
<pubDate>Mon, 24 Dec 2007 15:40:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/24/dada-pote-ki-rajniti-aur-manoranjan/</guid>
<description><![CDATA[पोता घर में घुसा
तो दादा  ने पूछा
&#8216;क्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पोता घर में घुसा<br />
तो दादा  ने पूछा<br />
'क्या  देखकर आया<br />
रिजल्ट आ गया न'<br />
पोता बोली<br />
''हाँ गया<br />
पर अभी पूरी तरह नहीं मालुम<br />
किसको कितनी सीटें मिलीं हैं'</p>
<p>दादा  बोले<br />
''तुम सुबह कहकर निकले थे<br />
मैं रिजल्ट देखने जा रहा हूँ<br />
अगर चुनाव का रिजल्ट देखना  था<br />
तो घर पर ही देख लेते<br />
कुछ हम से भी राजनीति सीख लेते<br />
हम  ही बता  देते<br />
किसकी सूरत हुई फक  और किसकी खिली है''</p>
<p>पोता बोला<br />
''दादाजी आपकी पीढी<br />
मुफ्त में मजे लेने की आदी है<br />
हमारे लिए तो समय की बर्बादी है<br />
फिल्म, क्रिकेट और चुनाव<br />
आपके लिए मनोरंजन और खेल है<br />
पर हम खर्च करने के आदी हैं<br />
दाव जीते तो होती है पार्टी<br />
हारें तो निकल जाता तेल है<br />
फिल्म में आप देखे अभिनेता की सूरत<br />
चुनाव में देखते प्रत्याशी की सीरत<br />
हमने इसने मतलब नहीं<br />
हमें तो अपने दाव जीतने से वास्ता<br />
फ़िदा उसी पर होते हैं<br />
दिखाता है जो दाव जीतने का रास्ता<br />
हम तो अपना खेल भी<br />
साथ-साथ खेलते है<br />
यही शिक्षा नई पीढ़ी को मिली'</p>
<p>पोता चला गया तो दादा ने<br />
अपने बेटे से कहा<br />
''कुछ गलती हमसे ही हुई है<br />
हमने तो ऐसी शिक्षा नही दी<br />
फिर इसे कहाँ मिली<br />
मुझसे तो दूर बचपन गुजारा था इसने<br />
पर तुम्हारे तो पास रहा<br />
फिर बनी संस्कारों से परे रहा<br />
जिसे खेल और मनोरंजन<br />
करना नहीं आता<br />
अपना धन और मन तबाह करना आता है<br />
ऐसी नयी पीढी मिली<br />
--------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बिना पढी पुस्तक और कमाया धन किसी दूसरे को न  दें]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/chankya-neetiapnee-pustak-aur-dhan-kisee-ko-n-den/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 04:14:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/18/chankya-neetiapnee-pustak-aur-dhan-kisee-ko-n-den/</guid>
<description><![CDATA[1.क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है। तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते हैं। विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे को वह कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है। </p>
<p>2.संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दौलत और शौहरत का नशा सिर चढ़कर  बोले]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/daulat-aur-shauharat-ka-nashaa-sir-chadhkar-bole/</link>
<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 16:14:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/daulat-aur-shauharat-ka-nashaa-sir-chadhkar-bole/</guid>
<description><![CDATA[सुबह का भूला शाम को
घर वापस आ जाता है
पर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सुबह का भूला शाम को<br />
घर वापस आ जाता है<br />
पर रात को जो भटका<br />
वह सुबह तक वापस<br />
नहीं आये तो घर में<br />
तूफ़ान मच जाता है<br />
घर में भूख का डेरा<br />
शराब से नशे में चूर<br />
आदमी की आंखों में<br />
मदहोशी का अँधेरा<br />
किसी गटर में गिरकर<br />
या किसी वाहन से कुचलकर<br />
जीवन की जो दे जाता है आहुति<br />
उस पर भला कौन तरस खाता है<br />
शराब मत  पियो यारो  शराब<br />
उसका नशा तुम्हारी जिन्दगी को<br />
खुद ही पी जाता है<br />
-----------------------</p>
<p>शराब का नशा आख़िर<br />
दिमाग से उतर जाता है<br />
पर दौलत, शौहरत और सोहबत का नशा<br />
सिर चढ़कर बोले<br />
आदमी को बेहया बना देता है<br />
ज्ञान के अंधे से बुरा है<br />
किसी का अज्ञान में मदांध होना<br />
जो आदमी को शैतान बना देता है<br />
जो निर्धन हैं और<br />
पूंजी जोडे हैं विनम्रता की<br />
उनसे दोस्ती भली<br />
अपनी अमीरी, पहुंच और सोहबत के<br />
नशे में चूर अहंकारी से दूरी भली<br />
पीठ में छुरा घौपने में<br />
उनमें   तनिक भय नहीं आता है </p>
<p>-------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दौलत और शौहरत का नशा सिर चढ़कर  बोले]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/daulat-aur-shauharat-ka-nashaa-sir-chadhkar-bole/</link>
<pubDate>Mon, 17 Dec 2007 16:14:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/17/daulat-aur-shauharat-ka-nashaa-sir-chadhkar-bole/</guid>
<description><![CDATA[सुबह का भूला शाम को
घर वापस आ जाता है
पर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सुबह का भूला शाम को<br />
घर वापस आ जाता है<br />
पर रात को जो भटका<br />
वह सुबह तक वापस<br />
नहीं आये तो घर में<br />
तूफ़ान मच जाता है<br />
घर में भूख का डेरा<br />
शराब से नशे में चूर<br />
आदमी की आंखों में<br />
मदहोशी का अँधेरा<br />
किसी गटर में गिरकर<br />
या किसी वाहन से कुचलकर<br />
जीवन की जो दे जाता है आहुति<br />
उस पर भला कौन तरस खाता है<br />
शराब मत  पियो यारो  शराब<br />
उसका नशा तुम्हारी जिन्दगी को<br />
खुद ही पी जाता है<br />
-----------------------</p>
<p>शराब का नशा आख़िर<br />
दिमाग से उतर जाता है<br />
पर दौलत, शौहरत और सोहबत का नशा<br />
सिर चढ़कर बोले<br />
आदमी को बेहया बना देता है<br />
ज्ञान के अंधे से बुरा है<br />
किसी का अज्ञान में मदांध होना<br />
जो आ