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	<title>hindi-shayri &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-shayri/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-shayri"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:01:04 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 04:50:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</guid>
<description><![CDATA[भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर  के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं। </p>
<p>योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है।  अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते  हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये। </p>
<p>इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।<br />
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।<br />
...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी दो जुदाई-हास्य हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=550</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:42:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=550</guid>
<description><![CDATA[माशुका ने शायर से कहा
‘बहुत बुरा समय थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माशुका ने शायर से कहा<br />
‘बहुत बुरा समय था जब मैंने<br />
अपनी सहेलियों के सामने<br />
किसी शायर से शादी करने की कसम खाई<br />
तुमने मेरे इश्क में कितने शेर लिखे<br />
पर किसी मुशायरे में तुम्हारे शामिल होने की<br />
खबर किसी अखबार में नहीं आई<br />
सब सहेलियां शादी कर मां बन गयीं<br />
पर मैं उदास बैठी देखती हूं<br />
अब तो कोई मशहूर शायर<br />
देखकर शादी करनी होगी<br />
नहीं झेल सकती ज्यादा जगहंसाई’</p>
<p>शायर खुश होकर बोला<br />
‘लिखता बहुत हूं<br />
पर सुनने वाले कहते हैं कि<br />
उसमें दर्द नहीं दिखता<br />
भला ऐसा कैसे हो<br />
जब मैं तुम्हारे प्यार में<br />
श्रृंगार रस में डुबोकर शेर लिखता<br />
अब तो मेरे शेरों में दर्द की<br />
नदिया बहती दिखेगी<br />
जब शराब मेरे सिर पर चढ़कर लिखेगी<br />
अपने प्यार से तुम नहीं कर सकी मुझे रौशन<br />
मेहरबानी कर तोहफे में जल्दी  दो जुदाई’</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दखोजी और शब्दयोगी-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=434</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 17:02:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=434</guid>
<description><![CDATA[शब्दखोजी ने कहा
‘अब तो मैं नये शब्द रच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शब्दखोजी ने कहा<br />
‘अब तो मैं नये शब्द रचूंगा<br />
फिर कोई जोरदार  रचना करूंगा<br />
पुराने शब्द लिखते हुए अब<br />
मेरा मन नहीं भरता<br />
लिखने बैठता हूं तो<br />
रचना करने से पुराने शब्दों से<br />
पीछा छुड़ाने का मन करता<br />
कई नये शब्द गढ़ लूंगा<br />
फिर कोई अपनी भाषा के ग्रंथ का सृजन करूंगा<br />
जिससे मेरा नाम प्रसिद्ध हो जायेगा’</p>
<p>शब्दयोगी ने कहा<br />
‘खोज शब्द ही तुम्हें असहज बना देती है<br />
अपनी इच्छा ही आदमी को हरा देती है<br />
सहजत से रचना करने के लिये<br />
अपने कदम जब उठ जाते हैं<br />
शब्द अपने आप नया रूप गढ़ते हुए<br />
कागज पर उतर आते हैं<br />
लाखों लोग भी मिलकर बोलें तो<br />
कोई नया शब्द नही बन पाता है<br />
कोई एक सहजता से लिखे और बोले तो<br />
वही भाषा का हिस्सा बन जाता है<br />
कुछ शब्द छोटे करने या मिलाने से<br />
अर्थ तो बना लेते<br />
पर अपना सहज भाव गंवा देते<br />
रचना करने की पहले सोचना<br />
कोई शब्द खोजने की छोड़ो योजना<br />
क्या पता कोई लिख जाये शब्द ऐसा<br />
जिससे तुम और तुम्हारी रचना को<br />
अपने आप अमरत्व मिल जायेगा’<br />
...............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब टूटता है सन्नाटा-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=433</link>
<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 14:32:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=433</guid>
<description><![CDATA[
जब जज्बातों में आता ठहराव
तब शब्द खाम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब जज्बातों में आता ठहराव</p>
<p>तब शब्द खामोश हो जाते</p>
<p>स्तब्ध मन </p>
<p>सन्नाटे में ताकता है</p>
<p>उस समय  न सोचना अच्छा लगता है</p>
<p>न बोलना</p>
<p>तब भी अंतर्मन समेटता है कई  ख्याल  वहां</p>
<p>वही अंदर बनाते हैं आशियाना</p>
<p>जिनमें रहते हुए शब्द होते हैं ताकतवर</p>
<p>जब टूटता है सन्नाटा</p>
<p>बहते चले जाते</p>
<p>कहीं कहानी तो कहीं कविता बन जाते<br />
.............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द  हमेशा हवाओं में लहराते हैं-कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=537</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 17:39:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=537</guid>
<description><![CDATA[हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही<br />
जुबान से बाहर आता है<br />
जो मनभावन हो तो<br />
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता<br />
नहीं तो खलनायक कहलाता है<br />
संस्कृत हो या हिंदी<br />
या हो अंग्रेजी<br />
भाव से शब्द पहचाना जाता है<br />
ताव से अभद्र हो जाता है</p>
<p>बोलते तो सभी है<br />
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है<br />
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो<br />
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो<br />
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते  हैं<br />
पर जो मजदूरी मांगें<br />
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार  टांगें<br />
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं<br />
वातानुकूलित कमरों  में बैठे तो  हो जायें ‘सर‘<br />
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर<br />
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन<br />
जो मजदूर प्यार से बोले<br />
बैठने को भी नहीं देते लोग  उसे आसन<br />
शब्द का मोल समझे जों<br />
बोलने वाले की औकात  देखकर<br />
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता है</p>
<p>शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते<br />
चाहे जहां लिखें और बोले जायें<br />
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं<br />
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते<br />
पर सुनने और पढ़ने वाले<br />
उस समय चाहे जैसा समझें<br />
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते हैं<br />
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों<br />
शब्द ही हैं यहां अमर<br />
बोलने और लिखने वाले<br />
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते हैं<br />
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ<br />
हमेशा हवाओं में लहराते हैं<br />
............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ से अलग पहचान के लिए अकेले हो जाते- व्यंग्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=532</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 16:34:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=532</guid>
<description><![CDATA[
अपनी अलग पहचान के लिये
भीड़ से अलग होन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i23.tinypic.com/2a7shms.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong><br />
अपनी अलग पहचान के लिये<br />
भीड़ से अलग होना ही पड़ता है<br />
जब चुनते हैं अपनी अलग राह<br />
छोड़नी पड़ती है साथी की चाह<br />
तब हो जाते हैं अकेले<br />
यहां  हर कोई यहां ढूंढ रहा है अपनी पहचान<br />
कोई न एक न बने सरताज<br />
इसलिए हर कोई एक दूसरे से लड़ता है</p>
<p>भीड़ मे बाहर से सभी एक लगते हैं<br />
अंदर से सभी एक दूसरे से जलते हैं<br />
बन जाती है भीड भी कभी भेड़ों का समूह<br />
किसी का इशारा मिलता है कहीं<br />
ताज मिलने का<br />
वहीं पूरा समूह भ्रम में उमड़ता है<br />
जो होता हैं भीड़ से अलग<br />
उससे मूंह फेरते लगते हैं लोग<br />
नाम से अनजान होते दिखते<br />
पर फिर भी उस अकेले के शिखर छू लेने का<br />
खौफ उनके दिमाग में घुमड़ता है<br />
.......................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार और नफरत,  दोनों पर यकीन नहीं-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=530</link>
<pubDate>Tue, 27 May 2008 16:15:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=530</guid>
<description><![CDATA[आज  एक फोरम पर घूमते घामते अपने मित्र स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/2aahbhz.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज  एक फोरम पर घूमते घामते अपने मित्र <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html">समीरलाल ‘उड़न तश्तरी"</a> के ब्लाग पर पहुंच गया। उनका ब्लाग मेरे ब्लाग पर लिंक है पर मैं उनको इन्हीं फोरमों पर पढ़ता हूं। आज कुछ मायूस लगे। हां, कल मैं कुछ ब्लाग देखकर सोच रहा था कि अगर वह उनके दृष्टि में आये तो उनको बहुत कष्ट होगा। यह अच्छा ही हुआ कि मेरे एक पाठ  उनकी दृष्टि पथ में नहीं आया  जो इन्हीं विषयों पर था। कल फोरमों पर उस पर एक व्यूज भी नहीं था। मैने उस शीर्षक लगाते हुए ब्लाग का उल्लेख नहीं किया क्योंकि मैंने देखा है कि आम पाठक ब्लाग शब्द देखकर ही मेरी पोस्ट से मूंह फेर लेते है। वैसे भी ब्लाग लेखकों को उसमें अधिक मजा नहीं आता। समीरलाल को जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार ऐसे विवाद उनको तकलीफ देते हैं। मगर इसका कोई उपाय नहीं है। समीरलाल जी मित्र हैं और उनके शब्दों से मेरे पर प्रभाव हो यह संभव नहीं है। ऐसे में मेरा कवि मन कुछ चिंतन करने लगा। जैसा मन में आया अपनी टिप्पणी लिख दी और अपनी पोस्ट बना ली। दुःखी मैं भी होता हूं पर अपने को संभाल भी लेता हूं। मुझे नहीं लगता कि इसके अलावा किसी के पास कोई रास्ता है। पहली  कविता के बाद दूसरी कविता भी इसलिये लिखी ताकि लोग यह न कहें कि ‘अपनी मेहनत बचाता है टिप्पणी को ही पोस्ट बनाता है, दूसरों के दर्द को अपनी दवा बनाता है।’  </p>
<p><strong>जिन रास्तो पर बस्ती है नफरत<br />
वहां से कभी गुजरना नहीं<br />
पर जरूरी हो तो नजरें<br />
फेर कर निकल जाना<br />
कानों से किसी की बात सुनना नहीं<br />
चीखते लोगों के  साथ जंग लड़ने के लिए<br />
मौन से बेहतर हथियार और कोई होता नहीं<br />
फिर भी नजर का खेल है<br />
जहां होती है नफरत की बस्ती<br />
वहां भी  किसी शख्स में होती है शांति की हस्ती<br />
तुम उन्हें ढूंढ सकते हो<br />
अगर तुम्हारे दिल में है प्यार कहीं<br />
नहीं कर सकते अपने अंदर<br />
दर्द को झेलने का जज्बा<br />
तो रास्ता बदल कर चले जाना<br />
पर अगर मन में बैचेनी है तो<br />
तो कोई भी जगह तंग लगेगी<br />
कितनी भी रंगीन हो चादर<br />
नींद नहीं आने पर बेरंग लगेगी<br />
आंखें बंद कर लो<br />
खो जाओ अपनी दुनियां में<br />
बदलती है जो पल-पर अपना रंग<br />
कहीं होते झगड़े, होती शांति कहीं<br />
उस पर मत सोचो कभी<br />
जो तुम्हारे बस में नहीं<br />
...........................<br />
उसने मुझसे पूछा<br />
‘तुमने किसी से प्यार करते हो?'<br />
मैंने कहा-‘नहीं’<br />
उसने पूछा-‘तुम कभी किसी से नफरत करते हो ?’<br />
मैंने कहा-‘नहीं’<br />
उसने मुझे घूर कर देखा<br />
तुम फरिश्ते तो दिखते नहीं<br />
इंसान से तुम्हारा वास्ता कैसे हो सकता है<br />
तुम कहीं शैतान तो नहीं’<br />
मैंने कहा<br />
‘प्यार और नफरत<br />
दोनो में मैंने धोखा खाया है<br />
जिनका प्यार दिया<br />
उनसे पाई नफरत और<br />
जिनको दी नफरत उनसे प्यार पाया<br />
यकीन अब किसी पर इसलिए रहा नहीं<br />
----------------------------</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 19:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</guid>
<description><![CDATA[कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कलम और दवात लेकर<br />
जब निकले थे घर से तो<br />
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है<br />
लिखने बैठे बचपन  से<br />
अपने गुजारे लम्हों की कहानी<br />
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी<br />
भूल गए रोना क्या होता है<br />
देखा है बस एक ही सच<br />
काटता  है वही आदमी जो उसने बोया होता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता<br />
पर इसके लिए कोई काबिल भी  तो नजर आता<br />
जो बेचते हैं सम्मान<br />
उनको लिखना नहीं आता<br />
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर<br />
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता<br />
ऐसा लगता है कि<br />
पहले सम्मान की सोचते हैं<br />
बाद में लिखा होता है<br />
हम तो अपने  लिखे को कभी<br />
सम्मान के योग्य नहीं पाते<br />
तो सम्मान कहाँ से जुटाते<br />
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता<br />
होता समय नष्ट<br />
फिर हम दूसरों का लिखा  कहाँ पढ़ पाते<br />
और बिना पढे भला क्या लिख पाते<br />
जो पढ़ते बिलकुल  नहीं लिखते हैं जरूर<br />
उनमें आ जाता है गुरुर<br />
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं<br />
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ<br />
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते<br />
अपनी कमअक्ली का पता था<br />
इसलिए लिखना किया शुरू<br />
 शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु<br />
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है<br />
--------------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:38:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</guid>
<description><![CDATA[अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय<br />
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान<br />
कही जश्न के लिए पीता है  शराब<br />
ताकत के लिए खाता  कबाब<br />
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब<br />
पर अकेले में होता है<br />
अपने कर्मों  से ही होता  परेशान  </p>
<p>इन्तजार करता है त्योहारों का<br />
कुछ मिलने के व्यवहारों का<br />
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान<br />
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान<br />
सिद्धि के लिए करता है यत्न<br />
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न<br />
अपने से  भागता रहता है इंसान </p>
<p>सीख लो हर पल जीना<br />
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना<br />
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता<br />
देने से किसी को नाम आगे जाता<br />
गले में हार पड़ने से<br />
पीठ पर चाल डालने से<br />
मिलता है थोडी देर का सम्मान<br />
अपने बोलों में भर दो रस<br />
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान<br />
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस<br />
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है<br />
देने वाला ही खुशी भी लूटता है<br />
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं<br />
मरने या पीठ पीछे हो<br />
वही कहलाता है असली सम्मान<br />
-----------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग पर  हिट्स:कितने सच्चे और कितने फर्जी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=476</link>
<pubDate>Mon, 17 Mar 2008 16:32:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=476</guid>
<description><![CDATA[मेरे लिए  कोई भी हिन्दी ब्लोग का फोरम ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे लिए  कोई भी हिन्दी ब्लोग का फोरम खास नहीं है और मुझे इनके किसी कर्णधार से कोई शिकायत भी नहीं है, पर हाँ पिछले कुछ दिनों से ब्लोग वाणी  पर कुछ ब्लोगरों के अधिक हिट देखकर कुछ ब्लोगरों को विचलित होते  देख  मुझे लगा की आज अपनी बात कहनी चाहिए -क्योंकि  मुझे भी इस फोरम से हिट मिलते हैं पर वह मेरे लिए अधिक मायने नहीं रखते.</p>
<p>बात हिन्दी  ब्लोग दिखाने में पहल करने वाले  नारद फोरम  से ही शुरू करें. अपना ब्लोग शुरू करने के  चार माह बाद मैं  वहाँ पर आया था, वह भी कुछ ब्लोगरों के सन्देश मिलने  के बाद. आप यकीन करिये जहाँ मैंने पहले खुद वहाँ पंजीकृत कराने  के लिए असफल प्रयास किया था और बाद में जब कुछ मित्रों के कहने पर अपना ईमेल भेज रहा था तो अधिक खुश नहीं था पर समय बलवान है और वहाँ मित्र मिलते गए और अब ४ अप्रैल को इस सफत को एक वर्ष पूरा होना है. ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग के बनने के बावजूद भी ब्लोगर नारद से कहीं और जाना नही चाहते थे. नारद खराब तो सबके मूड खराब. एक दिन नारद से परेशानी आई तो एक महिला ब्लोगर ने उसमें अपनी पोस्ट न दिखने की शिकायत की जबकि मैंने  उसकी पोस्ट को  ब्लोगवाणी पर देखा. नारद फोरम  वाले नाराज न हों इसलिए मैंने एक पोस्ट लिखी''नाराद का मोह न छोड पर पर अन्य चौपालों पर भी जाएं''. इसका प्रभाव हुआ और ब्लोगर इधर-उधर फैले पर इसके लिए मैं कोई श्रेय  नहीं लूगा   क्योंकि वहाँ फिर दोष भी मुझे लेना पडेगा.  नारद के कर्णधार चूंकि हिन्दी ब्लोग जगत में एक अच्छा माहौल बनाए रखना चाहते थे इसलिए उन्होने अपने यहाँ पोस्ट के हिट दिखाना बंद कर दिए और यह था ब्लोग वाणी के अभ्युदय का कारण. शायद कुछ इस पर सहमत न हों पर इसके अलावा और  कोई तर्क नहीं हैं. अधिकतर ब्लोग पने हिट्स देखने के इरादे से ब्लोग वाणी पर आते हैं. </p>
<p>ब्लोगवाणी पर हिट्स दिखते हैं और कल यह कहीं अन्य फोरम ने शुरू कर दिए तो? नारद फिर चमक जायेगा और उनको ऐसा करना नहीं चाहिए. नारद के हिट्स पर चर्चा जरूरी है. हम तो वहाँ भी हिट नहीं थे. आजकल  मेरे परम प्रिय मित्र परमजीत बाली बहुत अच्छा लिख रहे हैं पर उस समय उनकी चार लाईने नंबर वन पर चली जातीं थी. वह मुझे कमेन्ट देते पर जब मैं देने जाता तो लौट आता सोचता यार यह आदमी भी अजीब है और ब्लोगर भी अजीब हैं. मैं इतनी मेहनत से लिखता हूँ और पांच भी हिट्स नहीं मिलते. एक समय तो मैं चिढ गया कि  यार बेकार अपना ब्लोग यहाँ दिखाने के लिए  लाये. अंतर्जाल को फोरमों तक ही  सिमटा मान लिया था. आज जो आप अनेक ब्लोग देख रहे हैं वह उसी समय की देन हैं. मेरे दो ब्लोग तो बिअना किसे चौपाल  की सहायता से वर्डप्रेस में नंबर वन पर चले गए क्योंकि उसमें कवितायेँ  और व्यंग्य थे जो मैंने चौपालों के ब्लोग पर कभी नहीं लिखे थे क्योंकि वहाँ इस तरह की पोस्ट के लिए आज भी अधिक हिट नहीं मिलते और जब मैं लिखता हूँ तो मेरा लक्ष्य आम पाठक होता है.  </p>
<p>  नारद पर एक दिन एक ब्लोग लेखक ने अपनी पोस्ट में अपनी हैरानी  जताते हुए  लिखा कि  मुझे आधे घंटे में चालीस हिट्स मिल गए तो  उस पोस्ट पर कुछ ब्लोगरों ने लिखा कि 'हमारे चार गिन लेना' और हमारे पांच गिन लेना''. तब मैंने   समझ लिया कि यह हिट्स दोस्तों की  कृपा से भी अधिक  मिलते हैं. अगर जरूरत पडी तो माने  उस ब्लोग और उस पर कमेन्ट लिखने के नाम भी बता सकता हूँ हालांकि वह सब मेरे मित्र हैं पर इस तरह हिट्स देने के लिए नहीं. लिखते अच्छा है और मेरे को आज भी कमेन्ट देते हैं.<br />
इन सबसे मेरा उत्साह ख़त्म भी हो गया था और कम ही लिख रहा था पर धीरे-धीरे  मुझे लगने लगा कि मैं तो आम पाठक के लिए लिखने आया हूँ और वह इन चौपालों पर नहीं आएगा बल्कि उसके आने के रास्ते और भी हैं. यह सोचकर फिर मैंने लिखना शुरू किया और आज इन चौपालों से जितने भी हिट्स आते हैं और उनसे मैं संतुष्ट हूँ और दूसरों से काम होने का मतलब यह नहीं है  कि अपने को फ्लॉप  समझ लूं. अगर आपके पास कमेन्ट कम है तो इसके लिए खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि उसके लिए आपको भी पहल करनी होगी. मेरे को कुछ मेरे चुनींदा मित्र ही कमेन्ट देते हैं और वह अच्छा लिखते हैं. आप यकीन मानिए जिन परमजीत बाली से मैं चिढ़ता था पर अब  उनके हिट्स अधिक देखूं तो मुझे हार्दिक  प्रसन्नता होगी. वजह वही खुद लिखने के अलावा दूसरों को प्रेरित भी करते हैं. हाँ मैं अपने मित्रों से यह अपेक्षा कभी नहीं करता कि वह चार-पांच बार आनाव्श्यक रूप से  ब्लोग खोलकर ब्लोग वाणी पर मेरे हिट बढाएं-क्योंकि इसमें मेरी दिलचस्पी न के बराबर हैं. अगर मेरे लिखे से स्वत: आयें तो मुझे अच्छा लगता है. अन्य लोग भी जो इन हिट्स को देखर कर राय बनाते हैं इस बात को समझ लें. </p>
<p>हिन्दी ब्लोग जगत में कई अच्छा लिख रहे हैं यह देखकर मुझे खुशी होती है और ब्लोग वाणी के हिट्स कोई अब अच्छे बुरे का प्रमाण नहीं हैं. ब्लोग  या ब्लोगर के विषय पर लिखने तो खूब हिट्स आयेंगे. मैंने कई बार लिए हैं पर वह मेरी पोस्ट आम पाठक के लिए एक कोडी की भी नहीं होती. निजी मित्र नाराज होते हैं कि यार तुम कहाँ फालतू विषय पर लिखते हो और उनका कथन एक आम पाठक के मनोभाव का प्रतीक  होता है. नारद पर जो पोस्टें औंधे मुहँ गिरीं वह आज तक पढी जा रहीं हैं. अधिक दूर क्यों जाएं. हाकी पर लिखी गयी पोस्ट पर चौपालों पर केवल एक व्युज था पर  आज उस पर पांच हैं कल उस पर सात थे.  </p>
<p>अंतर्जाल एक बहुत बड़ा मायाजाल है. इन चौपालों का महत्व हमारे मनोबल बनाए रखने और आपस में मैत्री  भाव रखने  के लिए बहुत अच्छा है पर यह हमारी पोस्ट की भाग्य विधाता नहीं है और यहाँ के हिट्स मैं बता चुका हूँ कि अधिक भरोसे लायक नहीं हैं. कुछ ब्लोगर लेखक बहुत अच्छा लिखते हैं और उनको यहाँ के हिट्स के परवाह नहीं है इसलिए वह सदाबहार विषय पर  लिखते हैं और उनका हिन्दी ब्लोग जगत में अपना मुकाम रहेगा चाहे भले ही इन चौपालों पर फ्लॉप हो. एक आम पाठक चाहता है कुछ पढ़ना और ब्लोगरों के प्रिय विषय उनके लिए महत्वहीन हैं. मैंने एक विषय पर दो लेख देखे थे. इसमें एक बहुत छोटा और अधिक प्रभावशाली भी  नहीं था पर हिट्स और कमेंट अधिक  थे और उसके मुकाबले एक लेख बहुत बड़ा  और प्रभावशाली  था उस पर उसके चौथाई भी नहीं थे. इसलिए  नये और फ्लॉप ब्लोगर अपनी पोस्टों का मुहँ आम पाठक की तरफ खोलकर लिखें मतलब यह कि वह पंद्रह दिन बाद भी किसी पाठक के पास से गुजरे तो उसे  ताजा लगे चाहे वह क्षणिकाएँ  ही क्यों न हों?यहाँ जिन ब्लोगरों को अधिक हिट्स मिलते हैं उसके चार कारण है<br />
१. वह अपने स्वभाव के कारण लोकप्रिय हैं<br />
२.वह पुराने हैं और अच्छा लिखते हैं<br />
३.वह खुद अधिक से अधिक कमेन्ट लिख कर दूसरों को प्रेरित करते हैं<br />
४.वह खुद और उनके मित्र उनको हिट दिखाने के लिए मेहनत करते हैं<br />
मगर यह सब वह हैं जो तबसे आपसे में जुडे हैं जब हिन्दी ब्लोग जगत में कम लोग थे  और ऐसे में व्यक्तिगत संपर्क आसान से विकसित किये जा सकते हैं. अब यह क्षेत्र  व्यापक हो गया है जो संपर्क संयोग से बन जाये वह ठीक है पर उसके लिए प्रयास करने का मतलब है अपने रचनाकर्म से परे होना और वह अंतर्जाल पर हिन्दी के बढ़ते क़दमों के साथ तुम्हारे कदम मिलाकर चलने से  वह रोकेगा. इन हिट्स में कितना सच है और कितना फर्जीवाडा यह तो कहना मुश्किल है पर है  जरूर! नहीं तो नारद ने यह हिट्स बंद कर ब्लोग वाणी को बढ़ने का अवसर क्यों दिया था. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल का  राज, सिर का  ताज -हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=107</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 17:38:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=107</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल में ही बने रहें
राज बस वही राज ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने दिल में ही बने रहें<br />
राज बस वही राज रहते हैं<br />
दूसरे के सिर पर सजे किसे अच्छे लगते हैं<br />
खुद पहनकर सजें<br />
वही ताज अच्छे रहते हैं<br />
अपने दिल के राज ही होते हैं ताज<br />
अगर किसी को दे दिए तोहफे में<br />
तो वही नश्तर  चुभोने लगते हैं<br />
---------------------------------</p>
<p>अपने दिल की बात अगर किसी को<br />
बता दी तो भड़क सकती हैं चिंगारी<br />
जो वह फ़ैली चारों और लग सकती हैं आग<br />
आयेगी सबसे पहले  अपने जलने की बारी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल से सम्मान करे वही है सच्चा  वीर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 14:18:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</guid>
<description><![CDATA[फटे हुए कपडे पहने
चक्षुओं से अश्रु प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फटे हुए कपडे पहने<br />
चक्षुओं से अश्रु प्रवाहित करता हुआ<br />
फंदेबाज आ पहुंचा और  बोला<br />
''दीपक बापू आज हमारी बात मान लो<br />
हम पत्नी पीडितों का दर्द भी जान लो<br />
लिखो  महिला दिवस पर हास्य कविता<br />
करो हमारे दर्द का हरण<br />
नहीं तो हम मर  जायेंगे''</p>
<p>घर के बाहर पहुंचे थे उसी समय<br />
धूप में सायकल चलाकर<br />
पोंछ रहे थे पसीना बीडी जलाकर <br />
और धुआं छोड़ते  हुए बोले दीपक बापू<br />
''अभी तो घर में घुसे और तुम आ गए<br />
कहते हो हास्य कविता लिखो<br />
भूल गए कितने उस पर व्यंग्यबाण चला गए<br />
फिर भी बताओ माजरा क्या है<br />
लिखने की सोचेंगे अगर समझ जायेंगे''</p>
<p>बोला फंदेबाज<br />
''दीपक बापू<br />
आज है महिला दिवस<br />
हमने रास्ते  में दी अपनी<br />
एक पढी-लिखी  पडोसन को उसकी बधाई<br />
बीबी तो कम पढी लिखी है<br />
क्या जानती है इस बारे में<br />
इसलिए हमने इस बारे में<br />
कोई बात नहीं बताई<br />
पडोसन ने जाकर  बता दिया घर पर<br />
सास भी थी वहीं<br />
हुआ घमासान<br />
हमारी हो गयी  पिटाई<br />
आज है तुम्हारी हास्य कविता का सहारा<br />
तुम लिखो तभी हम घर जायेंगे<br />
नहीं तो कही भाग जायेंगे''</p>
<p>पहले ही थे पसीना और निकलने लगा<br />
अपनी धोती कसते  और टोपी संभालते<br />
और हँसते हुए बोले-<br />
''तुम भी हो नालायक<br />
भला क्या जरूरत थी जो दी बधाई<br />
शैतान भी दस घर छोड़  देता है<br />
मूर्ख ही है वह जो  पड़ोस में पंगा लेता है   <br />
वैसे तुम्हारी पत्नी कम पढी-लिखी है<br />
पर समझदार है<br />
मेरी तरफ से उनको देना बधाई<br />
हम उनको मानते हैं<br />
तुम्हारी  नालायकी को भी हम जानते हैं<br />
इसलिए पुरुष दिवस की बात तुमको नहीं बताई <br />
तुम्हें पडी  मार भी असरदार है<br />
 जिन हास्य कविताओं पर हँसते थे<br />
उसी की शरण में आये हो<br />
मगर गलत समय पर आये हो<br />
हम हास्य कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
समझदार महिलाओं पर हम क्या लिख पायेंगे</p>
<p>सुना है कहीं<br />
पत्नी पीड़ित अपना दर्द सुनाने के लिए<br />
महिलाओं को बाँट रहे हैं फूल<br />
हम नहीं बरसा सकते शब्द रूपी शूल<br />
वैसे भी क्या गम जमाने में<br />
जो बैठे बिठाए मुसीबत बुलाएं<br />
महिला दिवस पर कविता आजमाने में<br />
हमारे घर पर ऐसे लफड़े नहीं होते<br />
कि  तुम्हारी तरह रोते<br />
इधर-उधर मुहँ से कहने की बजाय<br />
लिखकर ही कविता में सजाते हैं बधाई<br />
यही है हमारी कमाई<br />
अब तुम निकल लो यहाँ से <br />
घर पर सुन लिया कि  तुम<br />
हास्य कविता लिखवाने आये हो<br />
तुम्हारे साथ हम भी फंस जायेंगे <br />
 यहाँ से भी कट जायेगा तुम्हारा  पता<br />
फिर हम तुम्हें चाय भी नहीं पिला पायेंगे<br />
वैसे ही है महिलाओं के अधिकार का प्रश्न गंभीर<br />
महिलाओं का स्वभाव होता है कोमल और  धीर<br />
कह गए हैं बडे-बडे विद्वान<br />
महिला का  दिल से सम्मान करे<br />
वही  है सच्चा  वीर<br />
जो अब तक संसार  नहीं समझ पाया  <br />
तुम और हम क्या समझ पायेंगे<br />
हम इस पर हास्य  कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
------------------------------------------<br />
 <strong>नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना नाम भी होगा-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 15:27:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखने वाले एक
कविनुमा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर लिखने वाले एक<br />
कविनुमा ब्लोगर को भी<br />
आयोजकों ने कविसम्मेलन में बुलाया<br />
जब वह भी पहुंचा मंच पर तो<br />
कवियों को बहुत गुस्सा आया<br />
एक बोला<br />
''इसे उतारों यहाँ से<br />
यह यहाँ क्यों आया<br />
यह जमीनी कवियों का सम्मेलन में<br />
अंतर्जाल पर लिखने वाला क्यों बुलाया''</p>
<p>आयोजक ने कहा<br />
''अब साहित्य अंतर्जाल पर छा जायेगा<br />
आप लोगों की रचनाएं यही वहाँ पहुंचा पाएगा<br />
एक-दो कविता  सुना लेने दो<br />
कौन लोग याद रखेंगे<br />
अखबारों में कल कवियों के रूप में<br />
आप के ही नाम छपेंगे<br />
बाद में यह हमारे कार्यक्रम की<br />
खबर अपने ब्लोग पर लिखेगा<br />
इसका नाम तो है छद्म और वह भी<br />
ऐसी जगह पर जहाँ कोई नहीं पढेगा<br />
इसके लेख में हमारा नाम ही दिखेगा<br />
इसलिए इसे बुलवाया''</p>
<p>सुनकर ब्लोगर को गुस्सा आया<br />
और चिल्लाकर बोला-<br />
''इतना सस्ता समझ लिया है<br />
एक कविता सुनाने के लिए यह सब<br />
कैसे  कर जाऊंगा<br />
अरे, मैं तो लिखता हूँ वहाँ रोज नया<br />
यह एक कविता लिखते हैं<br />
उसे कई-कई बार अनेक जगह पर<br />
सुनाते दिखते हैं<br />
जब अंतर्जाल पर साहित्य छा जायेगा<br />
तब मेरा नाम भी आएगा<br />
नहीं छपेगी किताब मेरी तो क्या<br />
मेरा लिखा आसमान में तो लहरायेगा<br />
वैसे भी मैं  यहाँ सुनाने नहीं सुनने आया<br />
पर लगता है की अभी इनको कोई इल्म नही है<br />
अंतर्जाल ने अपनी रचनाएं  छपने के लिए<br />
दूसरों के आगे झुकने से बचाया<br />
 दूसरी जगह जाकर भीड़ में<br />
जाकर शब्दों का मेले लगाने से हटाया<br />
कभी-कभी होते हैं साहित्य और कवि  सम्मेलन<br />
नारद, ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग्स ने<br />
हमें रोज साहित्यकारों से मिलने का मौका दिलाया<br />
अब मैं जाता हूँ क्योंकि उससे कीमती वक्त<br />
निकालकर  यहाँ किसी तरह आया.''    </p>
<p>नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो उसके लिए वही जिम्मेदार होगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:कितना भी कष्ट हो मूर्ख से मित्रता न करें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=88</link>
<pubDate>Mon, 11 Feb 2008 03:48:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=88</guid>
<description><![CDATA[गिरिये परवत शिखर ते, परिये धरनि मंझार
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गिरिये परवत शिखर ते, परिये धरनि मंझार<br />
मूरख  मित्र न कीजिए, बूडो काली धार </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  चाहे पर्वत के शिखर से गिरना पड़े, मझधार में फंसे हों या कीचड में धंसना पड़े तब भी मूर्ख से मित्र मत कीजिए। </p>
<p><strong>स्त्रोता तो घर ही नहीं, वक्ता बकै सो बाद<br />
स्त्रोता वक्ता  एक घर, तब कथनी को स्वाद </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि सुनने वाला अपना कान ही नहीं धरे तो वक्ता के बकते रहने का क्या लाभ। किसी को उपदेश तो तभी दिया जा सकता है जब वह सुनने वाला हो। अगर श्रोता और वक्ता का आपस में सामंजस्य न हो तो वार्तालाप निरर्थक हो जाता है।</p>
<p><strong>बसन्त पंचमी की समस्त साथियों, पाठकों और मित्रों को बधाई </p>
<p>दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=86</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 16:28:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=86</guid>
<description><![CDATA[इंसानों की भीड़ में
कभी दर्द. कभी प्रे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इंसानों की भीड़ में<br />
कभी दर्द. कभी प्रेम<br />
और हास्य से सुसज्जित<br />
शब्दों से रचनाएं बरसाने वाले<br />
कवि अकेले क्यों हो जाते<br />
शायद इसलिए कि  पुराने भ्रमों में<br />
चलते हुए लोगों को<br />
वह कभी रास नहीं आते<br />
समाज के   लिए हमेशा  जूझते<br />
पर यकीन नहीं जीत पाते<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते  </p>
<p>भ्रम के निवारण की कोशिश<br />
अपराध क्यों माना जाता<br />
शायद इससे स्वर्ग का टिकट<br />
बेचने वालों   का धधा मारा जाता<br />
और उनकी ताकत पर चलता<br />
सारा यह गुलाम ज़माना<br />
जिसे हैं सर्वशक्तिमान की दुआ कमाना<br />
कवि का शब्द<br />
जिन्दगी के सच से उपजा<br />
भ्रम का शत्रु हो जाता<br />
भेड़ की तरह भेड़ियों के पीछे जाते लोग<br />
अपने अगुआ के कथन से<br />
अपने को आजाद करने से घबडाते<br />
बनाते सच्चे  शब्दों से दूरियां<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते </p>
<p>कोई कवि नहीं बेचता<br />
सर्वशक्तिमान के घर पहुंचाने का दावा<br />
स्वर्ग में सुरक्षित पहुंचाने का छलावा<br />
सुनकर कविता लोग खुश हो जाते<br />
जमकर तालियाँ बजाते<br />
पर फिर भ्रम के रास्ते जाते<br />
फिर पुराने किताबों में लिखे<br />
संदेशों को सुनाने वाले<br />
अपने ही आकाओं के जाल में फंस जाते<br />
तब  कवि के सच्चे शब्द ही<br />
सबसे बड़ा भ्रम नजर आते<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते     </p>
<p>फिर भी भाषा रचती है<br />
अपने लिए कुछ शब्दवीर<br />
जो अपने शब्दों से भले ही<br />
जमाने की बदल नहीं पाते तस्वीर<br />
पर सच के साथ ही चलते<br />
भले ही कैसी भी हो तकदीर<br />
अस्तित्वहीन भ्रम भले ही<br />
बढ़ता लगता<br />
पर  कवि के शब्दों के आईने में<br />
उनका असली चेहरा दिखता<br />
डरते हैं लोग जीवन के सच  से<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते<br />
---------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शायद ही लोग समझ पाएं-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=74</link>
<pubDate>Wed, 30 Jan 2008 15:24:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=74</guid>
<description><![CDATA[जो हमसे रूठ जाएं
उन्हें हम कैसे समझाएं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो हमसे रूठ जाएं<br />
उन्हें हम कैसे समझाएं<br />
पहले खुद को ही तो   समझ पाएं<br />
पल-पल बदलता मन<br />
एक पल जो अच्छा लगे<br />
दूसरे पल ही पछ्ताएं<br />
जब लगता है सभी को<br />
हमने पहचान लिया है<br />
अगले पल ही वह  अजनबी बन जाएं </p>
<p>इधर-उधर भटकते हुए<br />
किसी की तलाश है<br />
पर रूप हम कभी जान न पाएं<br />
कभी दोस्त बनते हैं लोग<br />
कब वही दुश्मन बन जाएं<br />
प्यार का जो वादा करें<br />
सबले पहले वही साथ छोड़ जाएं </p>
<p>बेहतर है तन्हाई में ही<br />
तलाशे पहले खुद को<br />
फिर निकल का बाहर आयें<br />
अपने मन के हाल को<br />
पहले खुद ही समझ लें<br />
फिर दूसरों को कुछ बताएं<br />
पर सबके हाल हैं ऐसे जैसे<br />
शायद ही लोग समझ पाएं</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ बाप-बेटे का होता झगडा-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=73</link>
<pubDate>Tue, 29 Jan 2008 15:42:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=73</guid>
<description><![CDATA[एक आदमी ने दूसरे से पूछा
&#8221;क्या टीवी प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक आदमी ने दूसरे से पूछा<br />
''क्या टीवी पर सास-बहु के सीरियल से<br />
तुम्हारी माँ-और पत्नी के बीच भी<br />
कभी झगडा होता<br />
दूसरे ने जवाब दिया<br />
''घर में हैं दो ही टीवी<br />
मेरी पत्नी और माँ ही<br />
बैठकर देखती<br />
दोनों के पसंद<br />
अलग-अलग धारावाहिक<br />
मुझे और पिताजी को तो<br />
कभी भी  अपनी पसंद का धारावाहिक<br />
देखना कहाँ नसीब होता<br />
शोर से दूर तीसरे कमरे में<br />
अपने पिताजी के पास बैठता<br />
इस वजह से सास-बहु का तो नहीं<br />
हम बाप-बेटे के ही बीच<br />
रोज  किसी बात पर  झगडा होता<br />
----------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कब कौन सा रंग सामने आयेगा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/13/kab-kaunsaa-rang-saamne-aayegaa/</link>
<pubDate>Sun, 13 Jan 2008 17:12:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/13/kab-kaunsaa-rang-saamne-aayegaa/</guid>
<description><![CDATA[जो तुम चाहते हो देखना
वही तो सामने आये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो तुम चाहते हो देखना<br />
वही तो सामने आयेगा<br />
इस दुनिया में जो भी<br />
तस्वीर बनती  है<br />
उसे बनाता है सर्वशक्तिमान<br />
या आदमी की सोच से बनती है<br />
मुश्किल यहीं से शुरू होती हैं<br />
बचता है आदमी अपनी बुद्धि विलास से<br />
और फंसता जाता है दूसरों के जाल  में<br />
देखता वही जो दूसरा दिखाए<br />
समझे वही जो दूसरा समझाए<br />
हमेशा नया और अच्छा देखने की चाह<br />
पर जब सोच में नहीं जो आदमी के<br />
वह सच बनकर आंखों के सामने<br />
कहाँ से आएगा<br />
---------------------------------------------<br />
पल-पल रंग बदलती इस दुनिया  में<br />
कब कौन सा रंग सामने आयेगा<br />
कोई नहीं जानता<br />
देख लेता है जो पल जिन्दगी के<br />
उसे ही हमेशा बने रहने की आशा में<br />
हो जाता है विलासी<br />
खो देता है सब उसे बिताने में<br />
भूल जाता है यह<br />
फिर कोई अगला पल भी<br />
होगा उसके सामने प्रस्तुत जो<br />
रंग बदल कर आयेगा<br />
-----------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह भूत-भूत कर चिल्लाते ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/09/vah-bhut-bhut-kar-chillate/</link>
<pubDate>Wed, 09 Jan 2008 16:39:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/09/vah-bhut-bhut-kar-chillate/</guid>
<description><![CDATA[इधर जाएँ कि उधर
यह कभी तय नहीं कर पाए
जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इधर जाएँ कि उधर<br />
यह कभी तय नहीं कर पाए<br />
जिस माया को पाने की चाहत है<br />
उसके आदि और अंत को समझ नहीं पाए</p>
<p>चारों और फैली दिखती है रोशनी<br />
पर कभी हाथ से पकड़ नहीं पाए<br />
कहीं इस घर मे मिलेगी<br />
कहीं उस दर पर सजेगी<br />
और कहीं किसी शहर में दिखेगी<br />
उसके पीछे दौडे जाते लोग<br />
जितना उसके पास जाओ<br />
वह उतनी दूर नजर आये<br />
सौ से हजार<br />
हजार से लाख<br />
लाख से करोड़<br />
गिनते-गिनते मन की भूख बढती जाये</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
माया की जगह जेब में ही है<br />
उसे सिर मत चढ़ाओ<br />
इधर-उधर देख क्यों चकराये<br />
पीछे जाओगे तो आगे भागेगी<br />
बेपरवाह होकर अपनी राह चलोगे<br />
तो पीछे-पीछे आयेगी<br />
जितना खेलोगे उससे<br />
उतना ही इतरायेगी<br />
मुहँ फेरोगे तो खुद चली आयेगी<br />
आदमी के पास जाना  उसका है धर्म<br />
करते रहो समर्पण भाव से अपना कर्म<br />
सत्य का यही है मर्म<br />
जीवन के खेल में वही विजेता होते<br />
जो सत्य के साथ ही चल पाए<br />
---------------------------<br />
वह भूत-भूत कर चिल्लाते<br />
तंत्र-मन्त्र कर भगाने का<br />
नाटक करते नजर आते<br />
बीमारी चिंताओं से बढ़े<br />
वह हवाओं की बताते<br />
हरकते करे दीवानों जैसी<br />
असर शैतानों का जताते </p>
<p>विश्वास की कमी अविश्वास करती पैदा<br />
फसल काटने के लिए सभी जगह<br />
सर्वशक्तिमान की कृपा का दावा<br />
करने  वाले दलालों के ठिकाने मिल जाते<br />
अशिक्षितों का क्या<br />
शिक्षित भी उनके यहाँ हाजरी लगाते<br />
मरीज कहाँ जाएँ बिचारे<br />
डाक्टर तक वहाँ लाईन लगाते ह</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
वह बैठा अन्दर मुस्कराता<br />
जिसे इधर-उधर ढूँढने जाते<br />
उसकी कृपा वह क्या दिलाएंगे<br />
जो उसके नाम पर रोटियाँ सेंके जाते<br />
एक हाथ उठाएं दुआ के लिए<br />
दूसरे से पैसा लिए जाते</p>
<p>बहुत सारे मन्त्र हैं<br />
खुद ही जप कर<br />
अपनी दवा खुद ही कर लो<br />
भला जादू के मन्त्र से कभी<br />
विश्वास और प्यार जीते जाते<br />
नाम कोई भी हो उसे पुकारो दिल से<br />
तभी उसके अपने पास होने की<br />
सहज अनुभूति पाते है<br />
--------<br />
-----------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कवि ब्लोगर आवेदन न करें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/29/kavi-blogar-aavedn-n-karen/</link>
<pubDate>Sat, 29 Dec 2007 15:01:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/29/kavi-blogar-aavedn-n-karen/</guid>
<description><![CDATA[ब्लोगश्री के सम्मान के लिए
मांगे थे उन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लोगश्री के सम्मान के लिए<br />
मांगे थे उन्होने आवेदन<br />
आध्यात्म और साहित्य वर्ग के<br />
ब्लोगर संपर्क न करें<br />
किया विनम्र निवेदन </p>
<p>वजह बताई उन्होने<br />
सारे फ्लॉप ब्लोगर  इसी श्रेणी में घुस जायेंगे<br />
आपस में ही एक  दूसरे को पढेंगे और पढाएंगे<br />
और श्रेणी के ब्लागर  भी लिखते  हैं<br />
इस विषय पर<br />
उनके लिए पाठक<br />
पढ़ने के लिए नहीं मिल पायेंगे<br />
कई कवि भी इसमें घुस आयेंगे<br />
इस श्रेणी के ब्लोगर हमारे लिए<br />
किसी विज्ञापन के मतलब के नहीं<br />
समाज में भी उनकी पूछ नहीं<br />
अन्य श्रेणियों के ब्लोगर<br />
सम्मान पाते<br />
भले ही कविता वह भी लिख जाते<br />
हमारी  तकनीकी  कमेटी ने<br />
ऐसा ही प्रस्तुत किया है प्रतिवेदन</p>
<p><strong>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा </strong><br />
--------------------------------------<br />
<strong>नोट- पूर्व में प्रसारित एक अन्य रचना यहाँ प्रस्तुत है<br />
------------------------------------</strong>एक ब्लोगर ने दूसरे से कहा<br />
''यार, तुम उम्मीद करते हो कि<br />
कभी हमारे लिए भी पुरस्कार<br />
घोषित किये जायेंगे'<br />
दूसरे ने कहा<br />
'ख्याल तो अच्छा है पर<br />
यह भी सोच लो<br />
जब ऐसी संभावना बनी भी<br />
तो अपुन तो बाहर हो जायेंगे<br />
ढेर सारे छद्म ब्लोग आसमान से<br />
जमीन पर  उतर आयेंगे<br />
औरों का तो छोडो<br />
अपने ब्लोग के नाम भी हम भूल जायेंगे<br />
और जो इनाम देने वाले होंगे<br />
वह पहले अपने ब्लोगर मैदान में लायेंगे<br />
पढ़ना-पढाना तो हो जायेगा दूर<br />
अभी तो पुरस्कार की संभावना नहीं है<br />
तब यह हाल है और अगर बनी भी तो<br />
ब्लोगर एक दूसरे पर बरसते नजर आयेंगे<br />
--------------------------------------------------        </p>
<p>*इंटरनेट पर लिखने वाले </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Shayri]]></title>
<link>http://prakashsh1.wordpress.com/2007/10/26/shayri-6/</link>
<pubDate>Fri, 26 Oct 2007 06:53:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>prakashsh1</dc:creator>
<guid>http://prakashsh1.wordpress.com/2007/10/26/shayri-6/</guid>
<description><![CDATA[दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे
ऐसे माह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे<br />
ऐसे माहौल मे अब किस को पराया समझु<br />
ज़ुल्म ये है कि है यकता तेरी बेगनारावी<br />
लुफ्त ये है कि मै अब तक तुझे अपना समझु</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
