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	<title>hindi-shairi &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-shairi"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:05:51 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 04:50:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर  के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं। </p>
<p>योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है।  अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते  हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये। </p>
<p>इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।<br />
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।<br />
...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपरोपकार करने वाले को बीच में मत छोड़ो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 02:59:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच<br />
मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की मित्रता को बीच में ही नहीं छोड़ देना चाहिए। राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस काटकर कबूतर के वजन के बराबर करने के लिए दान दिया  था और ऋषि दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अपनी हड्डियां दान में दे दी थीं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-</strong>इस दुनियां में परोपकार करने वाले मित्र वैसे ही बहुत कम मिलते हैं ऐसे में अगर कोई हमारा ऐसा संगी साथ है जो एक बार हमारा काम कर देता है तो फिर हमें उससे मूंह नहीं फेरना चाहिए क्योंकि फिर कभी कोई परेशानी आई तो उसके सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।<br />
वैसे आजकल लोगों की परेशानियों का कारण यह भी है कि उन्हेंं अच्छे-बुरे व्यक्ति की पहचान नहीं रही। अगर किसी में कोई काम फंस जाता है तो उससे वह करवाकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो पर बाद में जब विपत्ति आती है तो स्वयं ही दोबारा अपना काम कहने में उन्हें शर्म आती है। आजकल लोग अपने मित्रों के साथ भी ‘उपयोग करो और फैंक दो’ (यूज एंड थ्रो) की नीति पर चलते हैं पर याद रखने लायक बात यह  है कि पग-पग पर परोपकारी लोग नहीं मिलते पर विपत्तियों का दौर शुरू होता है तो पग-पग पर आतीं हैं। इसलिये संयोग से कोई परोपकारी साथी मिल जाये तो फिर उसे नहंी छोड़ना चाहिए। हालांकि ‘उपयोग करो और फैंक दो’ की नीति कहने सुनने में हमारी बुद्धिमानी का परिचायक लगती है पर पश्चिम से आयातित यह नीति अपने देश के लिए अनुपयुक्त है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: शरीर के अंगों में सिर श्रेष्ठ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=104</link>
<pubDate>Tue, 11 Mar 2008 03:18:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=104</guid>
<description><![CDATA[
सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code></p>
<blockquote><p><strong>सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्छा है, सभी सुखों में सबसे श्रेष्ठ सुख भोजन  पाना है, ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान है, शरीर  के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है। शिरोभाग में ही समस्त ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान हैं। शरीर के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है क्योंकि उसमें ही सभी ज्ञानेन्द्रियाँ  होती हैं।</strong></p></blockquote>
<p></code></p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>कुछ लोग कहते हैं कि विश्व का सारा आधुनिक ज्ञान  अंग्रेजी में है इसलिए उसे पढ़ना जरूरी है। आप देखें  हमारे देश के विद्वान भी अपनी भाषाओं में बहुत सारा ज्ञान  प्रदान कर गए हैं पर पाश्चात्य रहन-सहन के अंधानुकरण ने हमें हर तरह से तनाव की हालत में पहुंचा दिया है।  आयुर्वेद में गिलोय रसायन सभी प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए उत्तम कहा जाता है। आजकल लोग अपना पेट भरने के लिए फास्ट फ़ूड के नाम पर जो खा रहे हैं वह हमारे देश के लोगों के लिए बीमारियों का कारण है। लोग समय पर भोजन नहीं करते और बाजार की चीजों से ही पेट भरते हैं और उससे शरीर में  विकार भर जाते हैं। अगर हमारे शरीर को ऊर्जा पेट से मिलती है तो रोग भी वही देता है। अत: ऐसे भोज्य पदार्थों का सेवन  नहीं करना चाहिए जिनसे पेट में विकार पैदा होते हैं। में यहाँ भोजन  से आशय अन्न से-गेहूँ और चावल- बने पदार्थों को ही मानता हूँ। इनसे बाजार में बने पदार्थ जिस तरह खुले में रखे जाते हैं वह विष की तरह हो जाते हैं।अत: वह ग्रहण करने से बचना चाहिऐ.  </p>
<p>लोग आजकल अपनी आंखों की परवाह न कर जिस तरह टीवी, कंप्यूटर  और फिल्में देखने में उनको  लगा रहे हैं वह उनके लिए हानिकारक होता है-इनके प्रयोग के जो नियम हैं उनका पालन करना चाहिए। जिस तरह हम इनका इस्तेमाल कर रहे हैं उसे देखते हुए तो हमें सुबह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए इससे  आंखों में स्फ्रूर्ति  आती है।मैंने जगह पढा था कि आइब्रों करने से आंखों पर दुष्प्रभाव होता है इसका विश्लेषण भी किया जाना चाहिऐ।  </p>
<p>सिर की महिमा सब जानते हैं पर उस पर अन्याय भी सभी करते हैं। सरकार ने दो पहिया चालकों के लिए हेल्मेंट अनिवार्य कर रखा है पर कुछ लोग इस नियम  के विपरीत चलकर बहुत खुश होते है और देश में बढ़ती हुई दुर्घटनाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि आजकल के युवा अपने सिर के महत्व को नहीं समझते। अधिकतर मामलों में यह माना जाता है कि अगर वाहन चालक हेलमेट पहने होता तो वह शारीरिक हानि नहीं उठाता।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामजी लगायेंगे बेडा पार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 03:50:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विश्वास धारण कर हृदय में
रामजी करेंगे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विश्वास धारण कर हृदय में<br />
रामजी करेंगे बेड़ा पार<br />
जलमार्ग हो या थल मार्ग या<br />
करना हो आकाश में<br />
बिना पंख विचरण<br />
कोई अगर बाधा होगी तो<br />
हृदय से स्मरण कर नाम का<br />
हो जाओगे उसके पार<br />
उनकी भक्ति में शक्ति अपार<br />
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार</p>
<p>तुम चाहोगे कि<br />
काम सब रामजी करें<br />
नाम तुम्हारा हो<br />
दूसरों के यकीन और भक्ति की<br />
परवाह नहीं<br />
बढाना चाहते अपना व्यापार<br />
दिखाते है लोगों को सपने<br />
लक्ष्य का पता नहीं अपने<br />
रामजी के नाम से बड़ा नामा<br />
क्या करेंगे लोगों का भला<br />
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार</p>
<p>रामजी ने कहा<br />
'मुझसे बडे हैं भक्त मेरे<br />
बिना लालच और लोभ<br />
मेरी भक्ति के भाव में पडे'<br />
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार<br />
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार<br />
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा<br />
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने<br />
पर हम तो उनकी शक्ति को माने<br />
भक्त तो नाम लेते हैं<br />
अभक्त भी लगाते पुकार<br />
पर उनसे भी क्या कहें<br />
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया<br />
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार<br />
रामजी की माया है अपरंपार<br />
अपने भक्तों के दें भक्ति<br />
और अभक्तों को माया के चक्कर में<br />
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार<br />
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह<br />
अपनी देह के अमर होने का भ्रम<br />
व्यापार ही जिनका धर्म<br />
भक्तों की भावनाओं बेखबर<br />
जिन्होंने तय कर लिया है कि<br />
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे<br />
रामजी के अलावा उन्हें<br />
कौन समझा सकता है कि<br />
यकीन कर लो<br />
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो<br />
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे</p>
<p>----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:46:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                     महाभारत ग्रंथ की रचना ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।</p>
<p align="justify">                 श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'<br />
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'</p>
<p align="justify">
              आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
</p>
<p align="justify">श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।</p>
<p align="justify">         महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है<br />
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।</p>
<p align="justify">
                गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
</p>
<p align="justify">                      भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रात:काल का आनंद ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 10:39:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के लिए अपने सामान के साथ पक्षियों के लिए दाना भी ला जाता हूँ। मुंडेर पर उन दानों को बिखेरने और पानी भर कर रखने के बाद अपनी योग साधना में तल्लीन हो जाता हूँ। उस समय अँधेरा होता है और जैसे ही थोडी रोशनी होनी शुरू होती हैं सबसे पहले गिलहरी का आगमन होता है। मेरे पास से निकलती गिलहरी दाने की तरफ जाती है तो मेरी तरफ देखती जाती है, पता नहीं क्या सोचती है और जैसे-जैसे मेरी तल्लीनता बढती है वैसे वैसे ही चिड़ियाओं के झुंड की आवाजें मेरे कानों में गूंजती है।</p>
<p>वह मुंडेर मेरे से दस फूट की दूरी पर है और वैसे कहते है कि योग साधना में कहीं ध्यान भटकना नहीं चाहिए पर मेरा मानना है कि इन पक्षियों का मेरे सामाजिक जीवन से कोई सरोकार नही है और उनकी तरफ ध्यान लगाना लगभग वैसा ही है जैसे दुनियादारी से ध्यान हटाना। कई बार तो मैं वहाँ पांच-छः प्रकार के पक्षी देखता हूँ, जिसमें तोता और कबूतर भी शामिल हैं। उनको देखकर जो मुझे अनुभूति होती है उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अगर मैं यह कहूं कि मेरा वह हर दिन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिऐ।</p>
<p>पता नहीं उनके मन में भी कुछ चलता है। जब मैं सर्वांगासन के लिए टांगें ऊपर किये होता हूँ तब चिड़ियायेँ बिल्कुल मेरी टांगों की पास से निकल जातीं हैं। उस समय मैं आंखें बंद किये होता हूँ तो डर जाता हूँ। मजे की बात यह है इतने सारे आसनों के बीच नही निकलतीं। उसके तत्काल बाद मैं शवासन करता हूँ , और उस समय भी वह ऐसा ही करतीं है । शवासन के समय कभी कभी गिलहरी भी छूकर भाग जाती है। मुझे उस समय हंसी आती है क्योंकि उनका इस तरह खेलना अच्छा लगता है। वैसे कई वर्ष से ऐसा हो रहा है पर मैं ध्यान नहीं देता था पर पांच-छः महिने पहले ऐक चिड़िया सर्वांगासन के समय मेरी टांग से टकराकर मेरे मुहँ पर गिरी और फिर भाग गयी। उसके बाद से मैंने उनकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। पहले तो दाना डालकर अपनी आँखें बंद कर योग साधना किया करता था। इन पक्षियों की चहचहाने की आवाज में जो माधुर्य है वह किसी संगीत में नहीं मिलता। और यह ऐक एसी फिल्म है जो कभी भी पुरानी होती नजर नहीं आती। ऐक एसा आनंद आता है जो अवर्णनीय है। शेष फिर कभी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कवितायेँ और क्षनिकाएं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/04/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%81-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Tue, 04 Sep 2007 11:08:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर
वह लोग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 class="post-title entry-title"><a href="http://deepakbapu.blogspot.com/2007/07/blog-post_11.html"></a></h3>
<p class="post-body entry-content">आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर<br />
वह लोगों को हंसाते हैं<br />
अपने नाम के आगे<br />
हंसी के बादशाह की<br />
पदवी लगाते हैं<br />
मुझे नहीं आती हँसी<br />
हंसने के लिए हम चाहे<br />
जब हंस लेते हैं<br />
जो नही जानते हँसना<br />
वही उनकी महफ़िल सजाते हैं<br />
————————–<br />
क्रिकेट टीम जब से हारी है<br />
हमें चैन आ गया है<br />
अब कोई क्रिकेट की न चर्चा करता<br />
न कोइ स्कोर पूछता<br />
न कोई अपना ज्ञान बघारता<br />
न कोइ चैपल कथा सुनाता<br />
ऐसा लगता है जैसे<br />
चमन में अमन आ गया है<br />
-------------------------<br />
रात के अँधेरे से वही घबरातें हैं<br />
जिनके दिन पाप के साथ कट जाते हैं<br />
जो जीते हैं अपने विश्वासों के साथ<br />
उनके चेहरे अँधेरे में भी<br />
चमकते नज़र आते हैं<br />
—————————-<br />
उसने अपने घर के बाहर लगा<br />
एक वृक्ष काटा और बना ली दुकान<br />
अब तम्बाकू के पौच और सिगरेट<br />
बेचकर घर चलाता है<br />
वह और उसके ग्राहक<br />
धुआं उड़ाते और हुए<br />
पर्यावरण में प्रदूषण<br />
पर चिन्ता जताते हैं<br />
————</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[चीन ने आख़िर अपनी जनसँख्या नीति बदली]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/04/%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Tue, 04 Sep 2007 11:03:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 class="post-title entry-title"></h3>
<p class="post-body entry-content">चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में बदलाव करते हुए अब शहरी क्षेत्रो में लोगों के ले लिए बच्चों के जन्म की सीमा एक से बढ़ाकर दो करने का निर्णय लिया है-पहले शहरी क्षेत्रों में एक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में दो बच्चे पैदा करने की छूट थी। चीन की तथाकथित विकसित तथा शक्तिशाली राष्ट्र की छबि से प्रभावित लोग उसकी जनसँख्या नीति के प्रशंसक रहे हैं, उनके लिए इसमें संदेश है पर वह शायद ही कोई इसे समझ पाए -क्योंकि तानाशाही के तले दबी वहाँ की जनता की आवाज विदेशों कें कभी नहीं पहुंची और वहां की सरकार ने जो प्रचार विश्व भर में कर रखा है उसके प्रतिवाद में कोई तथ्य बाहर निकलना मुश्किल है।</p>
<p>भारत में तो स्थिति और भी ज्यादा विचित्र है। चीन के समर्थक तो ठीक उसके विरोधी भी उसकी प्रगति का लोहा मानते हैं। हालंकि चीन के तथाकथित विकास और शक्तिशाली होने के दावे को कई विशेषज्ञ उंगली उठाते हैं पर उनके पास तथ्य कम अनुमान ज्यादा होते हैं। एक दिलचस्प बात यह है अपने विकास के दावे चीनी खुद कभी नहीं करते नजर आते जितने अन्य देश के लोग करते हैं। चीन में अभी भी जनसँख्या में कोई कमी नहीं आयी है उस पर सरकार के इस बदलाव से यह संकेत तो मिल गया है कि सरकार के समाज की जबरन जनसँख्या रोकने के कुछ ऐसे दुष्परिणाम जरूर हुए हैं जिसकी जानकारी बाहर के देशों को नहीं है।</p>
<p align="center"><strong>चीनी रिश्तों के नाम तक भूलने लगे थे<br />
-------------------------------------------</strong>
</p>
<p align="left">बहुत समय पहले मैं एक पत्रिका में पढा था कि चीन लोग तो अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं और वहां कई लडकिया ऎसी हैं जो भाई का मतलब भी नही जानती तो कई ऐसे लड़के भी हैं जो बहिन का मतलब भी नहीं जानते। ताऊ-ताई, चाचा-चाची,मामा-मामी, फूफा-फूफी और अन्य रिश्तों का नाम तक भूल चुके हैं। दुनिया भर के गरीबों और मजदूरों को अमीर बनाने के नाम पर वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति करने वाले लोगों ने वहाँ की परानी संस्कृति को नष्ट कर ही कर डाला। धर्म को अफीम बताते हुए उन्होने समूचे चीन में धन -संपति के अंबार लगाने का सामना दिखाकर वहाँ अपना राज्य कायम कर लिया-साथ ही बोलने और कहने की आजादी भी छीन ली।</p>
<p align="left">फिर शुरू हुआ चीन में एक ऐसा दौर कि वहाँ लिखने-पढने की आजादी मांगने वाले को सरेआम मार दिया गया या जेल में सड़ा दिया गया। एक अमेरिकी विशेषज्ञ का कहना है कि चीन एक बंद गुफा की तरह है वहां क्या है कोई नहीं कह सकता-क्योंकि क्षेत्रफल की दृष्टि से अति विशाल चीन में केवल कुछ ही भागों में विदेशियों को जाने के अनुमति है, और सरकार के व्यवस्था ऎसी है कि आप आम आदमी से मिल नहीं पायेंगे और मिलेंगे तो वह इतना सहमा रहता है कि वह अपनी सरकार की भाषा ही बोलता है। इतना ही नहीं बल्कि चीन से बाहर भी आये चीनी अपनी बात कहने से कतराते हैं-क्योंकि उनमें कहीं न कहीं अकेलेपन का बोध होता है जो शायद वहाँ की जनसँख्या नीति का परिणाम भी हो सकता है।</p>
<p align="left">चीन के आर्थिक विकास पर भी कई लोग उंगली उठाते हैं-उनका कहना है कि वहाँ के जो भी आंकडे हैं वह सरकारी है और उनकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। सामजिक विशेषज्ञ भी उसके इस बाते को चुनौती देते हैं कि वहां कोई जातिवाद नहीं बचा है-कुछ का कहना है इस तानाशाही में कुछ खास समुदायों के लोगों को अपना वर्चस्व जमाने का अवसर मिल गया और वहां अब भी कहीं कहीं जातीय तनाव की स्थिति बन जाती है। एक बात पर सभी एकमत है कि एक बच्चे की जनसँख्या की नीति ने वहाँ के समाज को खोखला किया ! वजह साफ है कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से रिश्तेदार और और रिश्तेदार से समाज के जो बनने का क्रम है उसमे रिश्तेदार की कडी कमजोर हो गयी थी और एशियाई देशों में सबसे सशक्त समाजों वाला चीन अपनी पहचान खो बैठा। उनकी सरकार तो यह मानती है कि आदमी को बस रोटी, कपड़ा और मकान चाहिऐ और वह यह भूल गयी की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके मन में अन्य लोगों से जुड़ने की प्रवृति होती है- यही कारण है आर्थिक रुप से तथाकथित शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिकों के चेहरे पर जो हंसी दिखती हैं वह खोखली साबित होने लगी है। वहां के किसी वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, लेखक, अभिनेता, या समाज सेवा में नाम कमाने वाले किसी व्यक्ति का नाम कभी भी चर्चा का विषय नहीं बना। वहाँ के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम ही चर्चा में आता है।</p>
<p align="left">शायद चीन की नयी पीढ़ी में बगावत के कोई ऐसे तत्व मौजूद हैं जिसे अलग दिशा में मोड़ने के यह कदम उठाया गया या वाकई चीन के लोगों की मनोदशा में अपने समाज के कमजोर पड़ने की कोई असहनीय पीडा है जिसे दूर करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह तो अलग से अध्ययन का विषय है जो पूरी जानकारी मिलने पर ही चर्चा योग्य होगा।</p>
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