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	<title>hindi-sakchharta-chhattisgarh-india-bharat-bhasha &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-sakchharta-chhattisgarh-india-bharat-bhasha"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 10:22:55 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चार धाम (रामेश्वरम्)]]></title>
<link>http://sahebali.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Sun, 11 May 2008 14:18:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>sahebali</dc:creator>
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<description><![CDATA[ 
रामेश्वरम् हिंदुओं का पवित्र तीर्थ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>रामेश्वरम् हिंदुओं का पवित्र तीर्थ है। रामेश्वरम् चेन्नैइ से कोई सवा चार सौ मील दक्षिण-पूरब में है। रामेश्वरम् एक सुन्दर टापू है। हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी इसको चारों ओर से घेरे हुए है। इस हरे-भरे टापू की शकल शंख जैसी है। कहते हैं, पुराने जमाने में यह टापू भारत के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इस मिलाने वाली कड़ी को काट डाला, जिससे वह चारों और पानी से घिरकर टापू बन गया।<br />
जिस स्थान पर वह जुडा हुआ था, वहां इस समस ढाई मील चौड़ी एक खाड़ी है। शुरू में इस खाड़ी को नावों से पार किया जाता था। बाद में आज से लगभग चार सौ बरसय पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक छोटे से राजा ने उसे पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया।<br />
अंग्रेजो के आने के बाद उस पुल की जगह पर रेल का पुल बनाने का विचार हुआ। उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्कर से हिलकर टूट चूका था। एक जर्मन इंजीनियर की मदद से उस टूटे पुल का रेल का एक सुंदर पुल बनवाया गया। इस समय यही पुल रामेश्वरम् को भारत से जोड़ता है।<br />
इस स्थान पर दक्षिण से उत्तर की और हिंद महासागर का पानी बहता दिखाई देता है। समुद्र में लहरे बहुत कम होती है। शांत बहाव को देखकर यात्रियों को ऐसा ल<a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/rameshwaram.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-35" src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/rameshwaram.jpg?w=157" alt="" width="157" height="157" /></a>गता है, मानो वह किसी बड़ी नदी को पार कर रहे हों।<br />
रामेश्वरम् शहर और रामनाथजी का मशहूर मंदिर इस टापू के उत्तर के छोर पर है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ है, जहां हिंद महासागर से बंगाल की खाड़ी मिलती है। इसी स्थान को सेतुबंध कहते है। लोगों का विश्वास है कि श्रीराम ने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर जो पुल या सेतु बांधा था, वह इसी स्थान से आरंभ हुआ। इस कारण धनुष-कोटि का धार्मिक महत्व बहुत है। यही से कोलम्बो को जहाज जाते थे। अब यह स्थान बहकर समाप्त हो गया है।<br />
रामेश्वरम् शहर से करीब डेढ़ मील उत्तर-पूरब में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी-सी पहाड़ी है। कहते है, हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुंदर मंदिर बना हुआ है, जहां श्रीराम के चरण-चिन्हों की पूजा की जाती है।<br />
रामेश्वरम् की यात्रा करनेवालों को हर जगह राम-कहानी की गूंज सुनाई देती है। रामेश्वरम् के विशाल टापू को चप्पा-चप्पा भूमि राम की कहानी से जुड़ी हुई है। अमुक जगह पर राम ने सीता जी की प्यास बुझाने के लिए धनुष की नोंक से कुआं खोदा था। अमुक जगह पर उन्होनें सेनानायकों से सलाह की थी। अमुक जगह पर सीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया था। किसी अन्य स्थान पर श्रीराम ने जटाओं से छुट्टी ली थी। ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित है।<br />
रामेश्वरम् के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में यह रोचक कहानी कही जाती है। सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने लड़ाई के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न किया, पर जबराम झरोखा सफलता न मिली तो विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध में रावण और उसके सब साथी राक्षस मारे गये। रावण मारा तो गया ; लेकिन उसका भी प्रभाव कम नहीं था।वह पुलस्त्य महर्षि का नाती था। चारों वेदों का जाननेवाला था और था शिवजी का बड़ा भक्त। इस कारण राम को उसे मारने के बाद बड़ा खेद हुआ । ब्रह्मा-हत्या का पाप उन्हें लग गया। इस पाप को धोने के लिए उन्होने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करने का निश्चय किया।यह निश्चय करने के बाद श्रीराम ने हनुमान को आज्ञा दी कि काशी जाकर वहां से एक शिवलिंग ले आओ। हनुमान पवन-सुत थे। बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े। लेकिन शिवलिंग की स्थापना की नियत घड़ी पास आ गई। हनुमान का कहीं पता न था। जब सीताजी ने देखा कि हनुमान के लौटने मे देर हो रही है, तो उन्होने समुद्र के किनारे के रेत को मुट्ठी में बांधकर एक शिवलिंग बना दिया। यह देखकर राम बहुत प्रसन्न हुए और नियम समय पर इसी शिवलिंग की स्थापना कर दी। छोटे आकार का सही शिवलिंग रामनाथ कहलाता है। बाद में हनुमान के आने पर पहले छोटे प्रतिष्ठित छोटे शिवलिंग के पास ही राम ने काले पत्थर के उस बड़े शिवलिंग को स्थापित कर दिया।<br />
रामेश्वर के मंदिर में जिस प्रकार शिवजी की दो मूर्तियां है, उसी प्रकार देवी पार्वती की भी मूर्तिया अलग-अलग स्थापित की गई है। देवी की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी कहलाती है, दूसरी विशालाक्षी। मंदिर के पूर्व द्वार के बाहर हनुमान की एक विशाल मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है।<br />
रामेश्वरम् का मंदिर है तो शिवजी का, परन्तु उसके अंदर कई अन्य मंदिर भी है। सेतुमाधव का कहलानेवाले भगवान विष्णु का मंदिर इनमें प्रमुख है<br />
रामनाथ के मंदिर के अंदर और बाहर अनेक पवित्र तीर्थ है। इनमें प्रधान तीर्थो की संख्यां बाईस बताई जाती है। ये वास्तव में मीठे जल के अलग-अलग कुंए है। ‘कोटि तीर्थ’ जैसे एक दो तालाब भी है। इन तीर्थो में स्नान करना बड़ा फलदायक पाप-निवारक समझा जाता है। वैज्ञानिक का कहना है कि इन तीर्थो में अलग-अलग धातुएं मिली हुई है। इस कारण उनमें नहाने से शरीर के रोग दूर हो जाते है और नई ताकत आ जाती है।<br />
रामेश्वरम् के मंदिर के बाहर भी दूर-दूर तक कई तीर्थ है। प्रत्येक तीर्थ के बारें में अलग-अलग कथाएं है। ऐसे तीर्थो में ‘विल्लूरणि तीर्थ’ नामक कुआं दर्शनीय है।<br />
रामेश्वरम् से करीब तीन मील पूरब में एक गांव है, जिसका नाम तंगचिमडम है। यह गांव रेल के किनारे हो बसा है। वहां स्टेशन के पास समुद्र में एक तीर्थकुंड है, जो विल्लूरणि तीर्थ कहलाता है। समुद्र के खारे पानी बीच में से मीठा जल निकलता है, यह बड़े ही अचंभे की बात है। कहा जाता है कि एक बार सीताजी को बड़ी प्यास लगी। पास में समुद्र को छोड़केर और कहीं पानी न था, इसलिए राम ने अपने धनुष की नोक से कुंड खोदा था।<br />
तंगचिडम स्टेशन के पास एक जीर्ण मंदिर है। उसे ‘एकांत’ राम का मंदिर कहते है। इस मंदिर का अब बहुत बुरा हाल है। रामनवमी के पर्व पर यहां कुछ रौनक रहती है। बाकी दिनों में बिलकुल सूना रहता है। मंदिर के अंदर श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान और सीता की बहुत ही सुंदर मूर्तिया है। धुर्नधारी राम की एक मूर्ति ऐसी बनाई गई है, मानो वह हाथ मिलाते हुए कोई गंभीर बात कर रहे हो। दूसरी मूर्ति में राम सीताजी की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ कुछ कह रहे है। ये दोनों मूर्तियां बड़ी मनोरम है।<br />
रामेश्वरम् के टापू के दक्षिण भाग में, समुद्र के किनारे, एक और दर्शनीय मंदिर है। रमानाथ के मंदिर से करीब पांच मील दूर पर यह मंदिर बना है। यह कोदंड ‘स्वामी को मंदिर’ कहलाता है। कहा जाता है कि विभीषण ने यहीं पर राम की शरण ली थी। रावण-वध के बाद राम ने इसी स्थान पर विभीषण का राजतिलक कराया था। इस मंदिर में राम, सीता औरलक्ष्मण की मूर्तियां देखने योग्य है। विभीषण की भी मूर्ति अलग स्थापित है।<br />
रामेश्वरम् को घेरे हुए समुद्र में भी कई विषेश स्थान ऐसे बताये जाते है, जहां स्नान करना पाप-मोचक माना जाता है। रामनाथजी के मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने बना हुआ सीताकुंड इनमें मुख्य है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्व करने के लिए आग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्नि-कुंड से जल उमड़ आया। वही स्थान अब ‘सीताकुंड’ कहलाता है। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है । सागर एकदम शांत है। उसमें लहरें बहुत कम उठती है। इस कारण देखने में वह एक तालाब-सा लगता है। यहां पर बिना किसी खतरें के स्नान किया जा सकता है।<br />
रामेश्वरम् से दक्षिण में कन्याकुमारी नामक प्रसिद्ध तीर्थ है। रत्नाकर कहलानेवाली बंगाल की खाडी यहीं पर हिंद महासागर से मिलती है। रामेश्वरम् और सेतु बहुत प्राचीन है। परंतु रामनाथ का मंदिर उतना पुराना नहीं है। दक्षिण के कुछ और मंदिर डेढ़-दो हजार साल पहले के बने है, जबकि रामनाथ के मंदिर को बने अभी कुलआठ सौ वर्ष से भी कम हुए है । इस मंदिर के बहुत से हिस्से पचास-साठ साल पहले के है।<br />
रामनाथ के मंदिर में जो ताम्रपट है, उनसे पता चलता है कि ११७३ ईस्वी में लंका के राजा पराक्रमबाहु ने रामेश्वरम् मे शिवजी का एक मंदिर बनवाया था। उस मंदिर में अकेले शिवलिंग की स्थापना की गई थी। देवी की मूर्ति नहीं रक्खी गई थी, इस कारण वह नि:संगेश्वर का मंदिर कहलाया। यही मंदिर आगे चलकर वर्तमान दशा को पहुंचा है।<br />
रामनाथ के मंदिर के साथ सेतुमाधव का जो मंदिर है, वह आज से पांव सो वर्ष पहले रामनाथपुरम् के राजा उडैयान सेतुपति और एक धनी वैश्य ने मिलकर बनवाया था। रामनाथजी के मंदिर का पश्चिमी गोपुर-द्वार भी इन्हीं दोनों महानुभावों ने १४५० ईस्वीं में बनवाया था। मंदिर का तीसरा प्राकार, पूर्वी द्वार और अन्य भाग, बहुत समय बादबने।<br />
रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। प्रवेश-द्वार पर ही चालीस-चालीस फुट ऊंचे दो पत्थरों पर चालीस फुट पत्थर को इस खूबी के साथ लगाया गया है कि देखने वाले दंग रह जाते है। प्राकार में और मंदिर के अंदर सैकड़ौ विशाल खंभें है, जो देखने में एक-जैसे लगते है ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाय तो मालूम होगा कि बेल-बूटै को कारीगरी हर खंभे पर अलग-अलग है।<br />
रामनाथ की मूर्ति के चारों और परिक्रमा करने के लिए तीन प्राकार बने हुए है। इनमें तीसरा प्राकार सौ साल पहले पूरा हुआ। इस प्राकार की लंबाई चार सौ फुट से अधिक है। दोनों और पांच फुट ऊंचा और करीब आठ फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। चबूतरों के एक ओर पत्थर के बड़े-बड़े खंभो की लम्बी कतारे खड़ी है। प्राकार के एक सिरे पर खडे होकर देखने पर ऐसा लगता है मारो सैकड़ौ तोरण-द्वार का स्वागत करने के लिए दंग बनाए गये है। इन खंभों की अद्भुत कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते है।<br />
रामनाथ के मंदिर के चारों और दूर तक कोई पहाड़ नहीं है, जहां से पत्थर आसानी से लाये जा सकें। गंधमादन पर्वत तो नाममात्र का है। वास्तव में एक टीला और उसमें से एक विशाल मंदिर के लिए जरूरी पत्थर नहीं निकल सकते। रामेश्वरम् के मंदिर में जो कई लाख टन के पत्थर लगे है, वे सब बहुत दूर-दूर से नावों में लादकर लाये गये है। रामनाथ जी के मंदिर के भीतरी भग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहते है, ये सब पत्थर लंका से लाये गये थे।<br />
रामेश्वरम् के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम् नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा हाथ रहा। अब तो यह रियासत मद्रास राज्य में शामिल हो गई। रामनाथपुरम् के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रक्खा हुआ है। कहा जाता है, यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम् की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिए रामनाथपुरम् जाते है। रामनाथपुरम् रामेश्वरम् से लगभग तैंतीस मील दूर है।<br />
रामेश्वरम् से सात मील दक्षिण में एण्क स्थान है, जिसे ‘दर्भशयनम्’ कहते है ; पर यही राम ने पहले समुद्र में सेतु बांधना शुरू किया था। इस कारण यह स्थान आदि सेतु भी कहलाता है।<br />
रामेश्वरम् के समुद्र में तरह-तरह की कोड़ियां, शंख और सीपें मिलती है। कहीं-कहीं सफेद रंग का बड़ियास मूंगा भी मिलता है। रामेश्वरम् केवल धार्मिक महत्व का तीर्थ ही नहीं, प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी दर्शनीय है।<br />
तीर्थ धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व वाले स्थानों को कहते हैं जहाँ जाने के लिए लोग लम्बी और अकसर कष्टदायक यात्राएँ करते हैं। हिन्दू धर्म के तीर्थ प्रायः देवताओं के निवास-स्थान होते हैं। मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना महत्त्वपूर्ण तीर्थ हैं और इन जगहों पर जीवन में एक बार जाना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है। इसके अतिरिक्त कई तीर्थ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन से भी सम्बन्धित हो सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, मास्को में लेनिन की समाधि साम्यवादियों के लिए एक तीर्थ है।<br />
श्रोत- विकी</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[चार धाम (केदार नाथ)]]></title>
<link>http://sahebali.wordpress.com/?p=26</link>
<pubDate>Thu, 08 May 2008 12:44:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>sahebali</dc:creator>
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<description><![CDATA[1- केदारनाथ धाम की कुल उंचाई 3581 मीटर
2-गंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1- केदारनाथ धाम की कुल उंचाई 3581 मीटर</p>
<p style="text-align:left;">2-गंगोत्री  कुल उचाई 3200 मीटर</p>
<p style="text-align:left;">3-यमुनोत्री कुल उंचाई 4421 मीटर</p>
<blockquote>
<p style="text-align:center;"><strong>केदारनाथ धाम</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align:center;">भगवान शिव के 12 ज्योतिरलिगों में सबसे महत्वपूर्ण पर्वत-मण्डलों के मध्य एकचित ध्यान लीन केदारनाथ तीर्थ 3581 मी. की ऊँचाई पर मंदाकिनी के तट पर स्तिथ है। हिन्दु धर्म में केदारनाथ की आस्था और मान्यता का कोई पार नहीं है। इस पावन तीर्थ स्थल का उद़गम महाभारत के पृष्ठों में अंकित है। पौराणिक मीन्यतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रूद्रनाथ में मुख, पदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप में पंचकेदार में शिव अर्चना की जाती है। 8 वीं सदी में आदिगुरू शंकाराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पाण्डवों के प्राचीन मंदिर के समीप है। मंदिर की दीवारों पर देवताओं और पौराणिक गथाओं के चित्रण बड़े सजीव ढंग से अंकित हैं। <a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/kedarnath3.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/kedarnath3.jpg?w=142" alt="" width="142" height="115" class="alignright size-medium wp-image-27" /></a>मुख्य प्रवेश द्वार पर नन्दी बैल की मूर्ती, पूजा के लिए गर्वगृह, श्रद्धालुओं और आगन्ततुकों के लिए मण्डप, यही केदारनाथ मंदिर का स्वरूप है। सर्दियों में केदारनाथ बर्फ से ढके होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है। मई से अक्टूवर के बीच केदारनाथ मंदिर के दर्शनों के लिये उपयुक्त समय है। आदिगुरू शंकाराचार्य की समाधि केदारनाथ मंदिर के पीछे है।<br />
पौराणिक मतानुसार पांडव ने कुरूक्षेत्र महायुद्ध के पश्चात हस्तिनापुर का राज्य, राजा परिक्षित को सौंप कर अपने परिजनों की मृत्यु का प्रायश्चित करने के लिए उत्तराखण्ड की ओर चल दिये। पर्वत-मण्डल के मध्य इस पावन स्थल पर पहुँचने के बाद पांडवों ने यहाँ पर केदारनाथ मंदिर की स्थापना की।<br />
केदारनाथ मंदिर के प्रमुख देव शिव का सर्दियों का निवास उखीमठ है जो केदारनाथ के पुजारी (रावल) का स्थान भी है। ऋषिकेश से केदारनाथ 223 कि. मी. दूरी पर है। केदारनाथ के पावन दर्शनों के लिए 14 कि. मी. की पद-यात्रा गौरीकुण्ड से आरंभ होती है। यंहा के मुख्य आकर्षक गौरी देवी का मंदिर और गर्म पानी के कुंड हैं। हरे भरे जंगलों के बीच मनमोहक प्राकृतिक दृष्य के अलौकिक आनन्द के साथ श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं, चार-पांच कि. मी. के बाद चट्टीयाँ आती हैं जहाँ पर खाने-पीने की चीजें उपलब्ध होती हैं। जब तीर्थयात्री पहाड़ से निकलते झरनों का अद्भुत दृश्य देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वास्तव में हम स्वर्ग में पहुँच गये हैं। अंत में गरूड़ चटटी आती है जहाँ से केदारनाथ मंदिर के पीछे की बर्फीली श्रृखलाएं नजर आने लगती हैं और अपनी मंजील तक पहुंचने का सुख प्राप्त होता है।<br />
<strong>पंच केदार<br />
श्री केदारनाथः</strong> यह सोन प्रयाग से 19 कि.मी. की दुरी पर स्थित है।<br />
श्री तुंगनाथः गोपेश्वर से 19 कि. मी. की दूरी पर तुगंनाथ का मन्दिर है। इसके निकट आकाश गंगा नामक श्रोत है। तुंगनाथ शिखर तीन जलधाराओं का उद्गम स्थल है।<br />
मद महेश्वरः माला चट्टी से 25 कि. मी. की दूरी पर मद महेश्वर महादेव का मन्दिर है। चौखम्भा की तलहटी पर 3289 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह एक अद्वितीय मन्दिर है। यहां के जल की कुछ बूदें ही मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयाप्त मानी जाती है।<br />
<strong>कल्पेश्वरः</strong> हेलंग से 9 कि. मी. की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव का मन्दिर है। यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। ऋषि अधर्य ने यहां पर कठिन तपस्या करके सुप्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी का सृजन किया था।<br />
रूद्रनाथः मण्डल चट्टी से 24 कि.मी. की ऊंचाई पर भगवान रूद्रनाथ का मन्दिर है। अपने पूर्वजों के क्रिया-कर्म, तर्पण आदी तथा उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए धर्मावलंबी यहां आते हैं।</p>
<p style="text-align:center;">भारत के उत्तर-पश्चिम में हिमालय की चोटी में बसे केदारनाथ मंदिर की अपनी अलग ही गरिमा है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिन्गों में से एक है। मंदाकिनी नदी के शीर्ष के नजदीक 3584 मीटर की उंचाई पर बसा ये मंदिर एक पवित्र तीर्थस्थान है। हर साल भारी संख्या में तीर्थयात्री और संसार के पर्यटक भक्ति-भाव और रोमांच लिए यहां घूमने आते हैं।</p>
<p style="text-align:center;">महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे। पर भगवान शिव इस भेंट के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि पांडव गोत्र हत्या के दोषी थे। उन्हें आते देख शिव ने बैल का भेष धारण कर लिया। पर जब उन्हें लगा कि उनके बदले भेष ने कोई काम नहीं किया, तो बैल जमीन के नीचे कूदने की कोशिश करने लगा।</p>
<p style="text-align:center;">भीम ने फुर्ती से बैल के पीछे के पैर पकड़ लिए। इस जद्दोजहद में भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से केदारनाथ में अलग-अलग जगह फैल गए। नाभि सहित धड़ मद्महेश्वर में, भुजाऐं तुंगनाथ में, चेहरा रुद्रनाथ में और जटाऐं कप्लेश्वर में। भारत पंच केदार ट्रैक इन पांचों तीर्थस्थानों का ही भ्रमण है।</p>
<p style="text-align:center;">केदारनाथ की यात्रा गौरीकुंड से 14 किमी की पैदल यात्रा है। जंगलचट्टी, रामबाड़ा और गरुड़ की खूबसूरती से होते हुए यहां पहुंचा जाता है। यात्रा में रामबाड़ा से 1 किमी पहले एक अनुपम भव्य झरना भी मिलता है।</p>
<p style="text-align:center;">मंदिर का ऐश्वर्य उसकी वास्तुकला में दिखता है। 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गए मंदिर के पास ही है। मंदिर के पूजागृह में कई देवी-देवताओं और भारतीय पौराणिक दृष्य दिखते हैं। मंदिर के दरवाजे के बाहर नंदी बैल की प्रतिमा भी है।</p>
<p style="text-align:center;"> </p>
<p><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/83R8NFCsohY'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/83R8NFCsohY&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span>&#60;</p>
<p style="text-align:center;"><strong>यमुनोत्री</strong></p>
<p style="text-align:center;">उत्तरकाथी जिले में समुद्रतल से 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है, देवी यमुना का मंदिर- यमुनोत्री। यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलारिया ने कराया था। चार धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी ) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है। गढ़वाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यमुना पावन नदी का स्त्रोत कालिंदी पर्वत है। तीर्थ स्थल से एक कि. मी. दूर यह स्थल 4421 मी. ऊँचाई पर स्थित है। दुर्गम चढ़ाई होने के कारण श्रद्धालू इस उद्गम स्थल को देखने से वंचित रह जाते हैं। यमुनोत्री का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनी का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। भूकम्प से एक बार इसका विध्वंस हो चुका है, जिसका पुर्ननिर्माण कराया गया। यहाँ पर श्रधालु अविभूत हो जाते हैं और अपनी सारी थकान को भूल जाते हैं।<br /><a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/pic_yamunotri.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/pic_yamunotri.jpg?w=250" alt="" width="250" height="150" class="alignleft size-medium wp-image-28" /></a><a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/gangotritemple.jpg"><img src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/gangotritemple.jpg?w=300" alt="" width="300" height="214" class="alignright size-medium wp-image-29" /></a><br />
सूर्यकुण्ड गरम पानी के मुख्य स्त्रोतों में से एक है जिसका तापमान भी काफी अधिक होता है। श्रधालु कपड़े में चावल या आलू बाँधकर इस कुण्ड में डालते है जो थोड़ी देर में पक कर उपर आ जाते है इसी का भोग मंदिर मे लगता है और यही यहाँ का प्रसाद भी है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिशर 3235 मी. उँचाई पर स्थित है। यँहा भी मई से अक्टूबर तक श्रद्धालुओं का अपार समूह हरवक्त देखा जाता है। शीतकाल मे यह स्थान पूर्णरूप से हिमाछादित रहता है। मोटर मार्ग का अंतिम विदुं हनुमान चट्टी है जिसकी ऋषिकेश से कुल दूरी 200 कि. मी. के आसपास है। हनुमान चट्टी से मंदिर तक 14 कि. मी. पैदल ही चलना होता था किन्तु अब हलके वाहनों से जानकीचट्टी तक पहुँचा जा सकता है जहाँ से मंदिर मात्र 5 कि. मी. दूर रह जाता है। <strong>गंगोत्री</strong><br />
 हिमालय की गोद उत्तरकाशी से 104 कि. मी. की दूरी पर स्थित यह तीर्थ स्थल श्रद्धालुऔं के लिए अति महत्वपूर्ण है। मान्यता यह है कि इसी स्थान पर अवतरित होकर माँ गंगा ने धरती माता को कृतार्थ किया था। यह स्थल समुद्रतल से 3140 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। युगों-युगों से मई से अक्टूबर तक लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं। शीतकाल में यह स्थल पूर्ण रूप से बर्फ से ढक जाता है। पुराणों में कहा है कि स्वर्ग की बेटी गंगा देवी ने गंगा का रूप लेकर राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्घार किया था। शताब्दियों की कड़ी तपस्या के बाद ही गंगा देवी ने भागीरथ की मनोकामना पूरी की थी। गंगा को इसी लिये भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है। भागीरथी के दाएँ तट पर गंगा देवी को समर्पित गंगोत्री मंदिर है। 18वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा इसका निर्माण हुवा था। भागीरथी या गंगा का मुख्य स्त्रोत गौमुख है जो गंगोत्री से 18 कि. मी. दूर पैदल यात्रा के रास्ते पर है। कई श्रद्धालु गौमुख को ही पूरी यात्रा मानते हुए वहाँ जाना आवश्यक समझते हैं और वहाँ पर स्नान कर अपने भाग्य को धन्य समझते हैं। जलमग्न शिवलिंग दिव्य शक्ति और आलौकिक आस्था का लजीव चित्रण है। पुराणों के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था। पूर्ण शिवलिंग केवल शीत ऋतु में ही दिखाई देता है जब पानी का स्तर कम हो जाता है।</p>
<p>हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्य की बेटे यामा ने कहा था कि जो व्यक्ति उसकी बहिन यमुना के नदी स्वरूप में स्नान करेगा, उसे वह कभी परेथान नहीं करेगा।</p>
<p>हनुमानचट्टी से 13 किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है। मंदिर के दर्शन से पहले चट्टान से बनी दिव्य शिला की पूजा होती है। मुख्य पूजा से पहले जमुनाबाई कुंड में पवित्र स्नान होता है।</p>
<p>यमुनोत्री में बर्फीले ग्लेशियर के पास ही खौलते कुंड भी हैं, जिनमें प्रमुख सूर्य कुण्ड है। इस कुण्ड में पोटली में चावल या आलू बांधकर पानी में डालकर पकाया जाता है। ये ही मंदिर का प्रसाद माना जाता है।</p>
<p>यात्रा का रूट- हरिद्वार से चम्बा, टिहरी, उत्तरकाशी होते हुए चार धाम कैम्प गंगोत्री।</p>
<p>कुल दूरी- हरिद्वार से 295 किमी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चार धाम (द्वारिका)]]></title>
<link>http://sahebali.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:25:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>sahebali</dc:creator>
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<description><![CDATA[प्रमुख  तिर्थस्थल
 
• बद्रीनाथ
• केदा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Times New Roman;"><strong>प्रमुख  तिर्थस्थल</strong></span></span></div>
<p class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"> </p>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">• बद्रीनाथ<br />
• केदारनाथ<br />
• गंगोत्री<br />
• यमुनोत्री<br />
• द्वारका<br />
• जग्गनाथ पुरी<br />
• वाराणसी<br />
• प्रयाग<br />
• ऋषिकेष<br />
• हरिद्वार<br />
• वैष्णो देवी</div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"><strong>प्रमुख चार धाम</strong></div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">1. बद्रीनाथ<br />
2. द्वारिका<br />
3. जगन्नाथ पुरी<br />
4. रामेश्वरम्</div>
<p class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"> </p>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"><strong>अन्य धाम</strong></div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">1. विश्वनाथ मन्दिर्<br />
2. अन्नपुर्णा मन्दिर<br />
3. काल भेरव मन्दिर<br />
4. तुलसी मानस मन्दिर<br />
5. संकट मोचन मन्दिर<br />
6. दुर्गा मन्दिर , दुर्गाकुण्ड<br />
7. भारत माता मन्दिर<br />
<strong>बौद्ध धर्म में भी चार तीर्थ सबसे महत्त्वपूर्ण हैं:<br />
</strong>• कपिलवस्तु जहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ<br />
• बोधगया जहाँ उन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई<br />
• सारनाथ जहाँ उन्होंने सबसे पहला उपदेश दिया <a href="http://sahebali.files.wordpress.com/2008/05/dwarika.jpg"><img class="alignright alignnone size-medium wp-image-25" style="float:right;" src="http://sahebali.wordpress.com/files/2008/05/dwarika.jpg?w=188" alt="" width="162" height="241" /></a><br />
• कुशीनगर जहाँ उनका परिनिर्वाण हुआ</div>
<p class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"> </p>
<div class="style10style28" style="text-align:center;margin:auto 0;"><strong>द्वारिका</strong></div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">द्वारिका हमारे देश के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। आज से हजारों साल पहले भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। द्वारिकाधीश मदिंर कांकरोली में राजसमंद झील के किनारे पाल पर स्थित है। कृष्ण मथुरा में पैदा हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे।</div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">मेवाड के चार धाम में से एक द्वारिकाधीश मदिंर भी आता है, द्वारिकाधीश काफी समय पुर्व संवत 1726-27 में यहां ब्रज से कांकरोली पधारे थे । कहा जाता है कि उस समय भारत में बाहर से आए आक्रमणकारियों का सर्वत्र भय व्याप्त था, क्योंकि वे आक्रमणकारी न सिर्फ मंदिरों कि अतुल धन संपदा को लूट लेते थे बल्कि उन भव्य मंदिरों व मुर्तियों को भी तोड कर नष्ट कर देते थे । तब मेवाड यहां के पराक्रमी व निर्भीक राजाओं के लिये प्रसिद्ध था । सर्वप्रथम प्रभु द्वारिकाधीश को आसोटिया के समीप देवल मंगरी पर एक छोटे मंदिर में स्थापित किया गया, ततपश्चात उन्हें कांकरोली के ईस भव्य मंदिर में बडे उत्साह पूर्वक लाया गया ।<br />
आज भी द्वारका की महिमा है। यह चार धामों में एक है। सात पुरियों में एक पुरी है। इसकी सुन्दरता बखानी नहीं जाती। समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरें उठती है और इसके किनारों को इस तरह धोती है, जैसे इसके पैर पखार रही हो</div>
<p class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"> </p>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">पहले तो मथुरा ही कृष्ण की राजधानी थी। पर मथुरा उन्होने छोड़ दी और द्वारका बसाई।<br />
द्वारका एक छोटा-सा-कस्बा है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है। द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे गोमती तालाब कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है।<br />
इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है। बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करतें है।<br />
गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते है। तब रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते है। रास्तें में कितने ही छोटे मन्दिर पड़ते है-कृष्णजी, गोमती माता और महालक्ष्मी के मन्दिर। रणछोड़जी का मन्दिर द्वारिका का सबसे बड़ा और सबसे बढ़िया मन्दिर है। भगवान कृष्ण को उधर रणछोड़जी कहते है। सामने ही कृष्ण भगवान की चार फुट ऊंची मूर्ति है। यह चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मूर्ति काले पत्थर की बनी है। हीरे-मोती इसमें चमचमाते है। सोने की ग्यारह मालाएं गले में पड़ी है। कीमती पीले वस्त्र पहने है। भगवान के चार हाथ है। एक में शंख है, एक में सुदर्शन चक्र है। एक में गदा और एक में कमल का फूल । सिर पर सोने का मुकुट है। लोग भगवान की परिक्रमा करते है और उन पर फूल और तुलसी दल चढ़ाते है। चौखटों पर चांदी के पत्तर मढ़े है। मन्दिर की छत में बढ़िया-बढ़िया कीमती झाड़-फानूस लटक रहे है। एक तरफ ऊपर की मंमें जाने के लिए सीढ़िया है। पहली मंजिल में अम्बादेवी की मूर्ति है-ऐसी सात मंजिले है और कुल मिलाकर यह मन्दिर एक सौ चालीस फुट ऊंचा है। इसकी चोटी आसमान से बातें करती है।<br />
रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा सके । यही परिक्रमा का रास्ता है।रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा १०० फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी पांच मंजिलें है और इसमें ६0 खम्बे है। रणछोड़जी के बाद इसकी परिक्रमा की जाती है। इसकी दीवारे भी दोहरी है।<br />
दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है।और कपड़े-गहने कीमती है।त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।<br />
कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।<br />
शारदा-मठ को गुरू शंकराचार्य ने बनबाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों मे चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की बैठक। आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।<br />
संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है। इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।<br />
इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड़ का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड़ के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है। इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नही होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है और जमीन के रास्ते भी।<br />
जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते है। यहां मोर बहुत होते है। गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मन्दिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते है। कहते है, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है। कितने ही भंडारे है। धर्मशालाएं है और सदावर्त्त लगते है। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।<br />
बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा मलह श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है। इल पांचों महलो की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचोंध हो जाती है। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े है। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए है। सच्ची जरी के कपड़ो से उनको सजाया गया है।<br />
रणछोड़जी के मन्दिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य है। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे है। इन पांचों मन्दिरों के अपने-अलग भण्डारे है। मन्दिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते है। बारह बजे बन्द हो जाते है। फिर चार बजे खुल जाते है। और रात के नौ बजे तक खुले रहते है। इन पांच विशेष मन्दिरों के सिवा और भी बहुत-से मन्दिर इस चहारदीवारी के अन्दर है। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरूषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी अम्बाजी और गरूड़ के मन्दिर है। इनके सिवाय साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मन्दिर है। ये सब मन्दिर भी खूब सजे-सजाये है। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है।<br />
बेट-द्वारका में कई तालाब है-रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब । इनमें रणछोड तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़िया पत्थर की है। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने है। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मन्दिर है। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचन्द्रजी और शंख-नारायण के मन्दिर खास है। लोगा इन तालाबों में नहाते है और मन्दिर में फूल चढ़ाते है।<br />
रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। शंख-तालाब में नाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है। द्वारिकाधीश के रोजाना आठ मुख्य दर्शन होते हैं जिनमें मंगला, शंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती एवं शयन हैं । कुछ विशेष दर्शन भी होते है, जैसे कृष्ण जन्माष्टमी, दिपावली, होली, अन्नकूट एवं छप्पनभोग आदि । दर्शनों का समय विशेष मनोरथ के दर्शन या अलग अलग मौसम के अनुरुप बदला जाता है, जैसे सर्दियों में भगवान के शयन के  दर्शन जल्दी होते हैं। प्रभु द्वारिकाधीश के मंदिर में ही अन्य दर्शनीय स्थल भी है जेसे मथुराधीश जी, लड्डु गोपाल, परिकृमा, मंदिर का समयसूचक घंटा, मंदिर का बगीचा, पुस्तकालय, तुलसी क्यारा,  मंदिर की ध्वझा व प्रसादघर  आदि ।<br />
बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।<br />
कस्बे से करीब एक मील पश्चिम मे चलने पर एक और तीर्थ आता है। यहां जरा नाम के भील ने कृष्ण भगवान के पैर में तीर मारा था। इसी तीर से घायल होकर वह परमधाम गये थे। इस जगह को बाण-तीर्थ कहते है। यहां बैशाख मे बड़ा भारी मेला भरता है।बाण-तीर्थ से डेढ़ मील उत्तर में एक और बस्ती है। इसका नाम भालपुर है। वहां एक पद्मकुण्ड नाम का तालाब है।हिरण्य नदी के दाहिने तट पर एक पतला-सा बड़ का पेड़ है। पहले इस सथान पर बहुत बड़ा पेड़ था। बलरामजी ने इस पेड़ के नीचे ही समाधि लगाई थी। यहीं उन्होनें शरीर छोड़ा थासोमनाथ पट्टन बस्ती से थोड़ी दूर पर हिरण्य नदी के किनारे एक स्थान है, जिसे यादवस्थान कहते हैं। यहां पर एक तरह की लंबी घास मिलती है, जिसके चौड़े-चौड़ पत्ते होते है। यही वही घास है, जिसको तोड़-तोडकर यादव आपस में लड़े थे और यही वह जगह है, जहां वे खत्म हुए थे।<br />
इस सोमनाथ पट्टन कस्बे में ही सोमनाथ भगवान का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर को महमूद गजनवी ने तोड़ा था। यह समुद्र के किनारे बना है इसमें काला पत्थर लगा है। इतने हीरे और रत्न इसमें कभी जुडे थे कि देखकर बड़े-बड़े राजाओं के खजाने भी शरमाजायं। शिवलिंग के अन्दर इतने जवाहरात थे कि महमूद गजनवी को ऊंटों पर लादकर उन्हें ले जाना पड़ा। महमूद गजनवी के जाने के बाद यह दुबारा न बन सका। लगभग सात सौ साल बाद इन्दौर की रानी अहिल्याबाई ने एक नया सोमनाथ का मन्दिर कस्बे के अन्दर बनबाया था। यह अब भी खड़ा है।</div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;">श्रोत</div>
<div class="style10style28" style="text-align:left;margin:auto 0;"><a class="alignleft" title="द्वारका" href="http://rajsamanddistrict.com/?m=2006" target="_self"></a><a class="alignleft" title="चार धाम" href="//hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE" target="_blank">राजसंमद<br />
</a><a class="alignleft" title="चार धाम" href="//hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE" target="_blank">विकी</a></div>
<p> </p>
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<p><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/dI_yc1KcJDo'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/dI_yc1KcJDo&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/dI_yc1KcJDo'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/dI_yc1KcJDo&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span></p>
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<title><![CDATA[हम कितने साक्षर हैं ]]></title>
<link>http://sahebali.wordpress.com/2007/09/08/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sat, 08 Sep 2007 17:30:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>sahebali</dc:creator>
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17 जुलाई को समाचार पत्र में पढ़ा था कि अ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><!--chitthajagat claim code--><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=z1gdv2yuw0dl" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"><img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"></a><br />
<!--chitthajagat claim code-->17 जुलाई को समाचार पत्र में पढ़ा था कि अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के दिन नव गठित राज्य छत्तीसगढ़ का नाम गीनीज बुक आफ वल्ड रीकार्ड अथवा लिम्का बुक मे शामिल हो सकता है, यह कोशिश प्रदेशव्यापी पुस्तक वाचन अभीयान के जरिये की जा रही थी। छत्तीसगढ़ के 14 जिलों में कुल 20,००० (बीस हजार) पुस्तक वाचन केन्द्र बनाये गये, जिसके तहत प्रदेश के १.३० करोड़ किशोर, युवा, वृद्ध, सुबह ८ बजे से रात ८ बजे तक बारी-बारी से ज्ञानवर्धक पुस्तकों का पठन-पाठन करेंगें।<br />
वैसे तो प्रदेश की साक्षरता दर औसतन लगभग 75 है।<br />
प्रदेश की सरकार और मीडिया कुछ भी कहे पर मै जिस-जिस वाचन केन्द्र गया पाठकों की सर्वथा कमी पाई गई, और हिन्दी पुस्तकों की कमी अत्यधिक खली, स्कुली छात्रों की स्वयं की पुस्तकें भी नादारत,<br />
क्योंकि सरकार द्वारा कक्षा 1 से कक्षा 12 तक की सभी पुस्तकें निशुल्क उपलब्ध कराना था पर आज तक सभी पुस्तकें उपलब्ध नहीं हो सकी, ईसके विपरीत शिक्षा विभाग कार्यालय में किताबें दीमक चाटती दीखीं।<br />
चिन्तन का विषय यह है कि एक ओर हिन्दी के प्रयोग, साक्षरता कार्यक्रमों में सरकार द्वारा करोड़ो रुपये खर्च किये जाते हैं। किन्तू जनता इतनी साक्षर है कि उसे साक्षरता कार्यक्रमो की जरुरत ही नहीं।</p>
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