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	<title>hindi-sahity &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-sahity"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 10:55:12 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 16:31:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</guid>
<description><![CDATA[वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो  गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’<br />
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों के बीच खाने का सामान बांट रहा था और उसे लेकर वही भिखारी भी खा रहा था।<br />
लेखक ने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-‘खाना तो मिला नहीं। अब चाय पीकर ही काम चलाऊंगा।<br />
वह हाथ फैलाये उसके सामने खड़ा था। लेखक ने उससे कहा-‘मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा, पर इससे पहले तुम्हं साक्षात्कार देना होगा। आओ मेरे साथ!<br />
थोड़ी दूर जाकर उस लेखक ने उससे पूछा-‘तुम्हारे घर में क्या तुम अकेले हो।’<br />
भिखारी-‘‘नही! मुझे दो लड़के हैं और दो लडकियां हैं। सबका ब्याह हो गया है।’<br />
लेखक-‘फिर तुम भीख क्यों मांगते हो? क्या तुम्हारे लड़के कमाते नहीं हैं।<br />
भिखारी-‘बहुत अच्छा कमाते हैं, पर आजकल बाप को कौन पूछता है? मेरे को सूखी रोटी देते हैं और मैं चिकनी चुपड़ी और माल खाने वाला आदमी हूं।’<br />
लेखक-‘इस उमर में वैसे भी कम चिकनाई खाना चाहिए। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। डाक्टर लोग यही कहते हैं।<br />
भिखारी-‘वह तो सेठों के लिये कहते हैं भिखारियों के लिये नहीं।<br />
लेखक-‘मंदिर में अंदर जाते हो।<br />
भिखारी-‘मंदिर के अंदर हमें आने भी नहीं देते और न हम जाते। हम तो बाहर भक्तों के दर्शन ही कर लेते हैं। भगवान ने कहा भी है कि मेरे से बड़े तो मेरे भक्त हैं।<br />
लेखक-‘रहते कहां हो?<br />
भिखारी-‘एक दयालू सज्जन ने हम भिखारियों के लिये एक मकान किराये पर ले रखा है। उसमें वही किराया भरता है।’<br />
लेखक-‘तुम्हारे लड़के तुम्हें नहीं रखते।’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a> पर मूल रूप से प्रकाशित है। इसके प्रकाशन के लिये अन्य कहीं अनुमति प्रदान नहीं की गयी है।<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>भिखारी-‘वह तो मिन्नतें करते हैं पर वहां कौन उनकी चिकचिक सुनेगा।  मैं तो बचपन से ही आजाद रहने वाला आदमी हूं।  वह क्या खिलायेंगे मुझे? मैंने खाने के मामले में बाप की परवाह नहीं की। वह भी सूखी खिलाता था पर बाहर मुझे भीख मांगने पर जो खाने का मिलता था वह बहुत अच्छा होता था।’<br />
लेखक-‘बचपन से भीख मांग रहे हो। बच्चों की शादी भी भीख मांगते हुए करवाई।<br />
भिखारी-‘नहीं! पहले तो मेरा बाप ही मेरे परिवार को पालता रहा। फिर बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो नौकरी कर वही काम चलाते रहे। मैं अपनी बीबी के लिये ही कुछ सामान घर ले जाता हूं। वह बच्चों के पास ही रहती है। आजकल की औलादें ऐसी हैं उसकी बिल्कुल इज्जत नहीं करतीं। मैं सहन नहीं कर सकता।’<br />
लेखक-तुम्हें भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती।’<br />
भिखारी ने कहा-‘जिसने की शर्म उसकी फूटे कर्म।’<br />
लेखक उसको  घूर कर देख रहा था! अचानक उसने पीछे से आवाज आई-‘बाबूजी, इससे क्या बहस कर रहे हो। भीख मांगना एक आदत है जिसे लग जाये तो फिर नहीं छूटती। कोई मजबूरी में भीख नहीं मांगता। जुबान का चस्का ही भिखारी बना देता है।’<br />
लेखक ने देखा कि थोड़ी दूर ही एक बुढि़या भिखारिन पुरानी चादर बिछाये बैठी थी। उसके पास एक लाठी रखी थी और सामने एक कटोरी । उसके पास रखी पन्नी में कुछ खाने का सामान रखा हुआ था जो शायद दानी भक्त दे गये थे और वह अभी खा नहीं रही थी।<br />
लेखक ने उस भिखारी को दस रुपये दिये और फिर जाने लगा तो वह भिखारिन बोली-‘बाबूजी! कुछ हमको भी दे जाओ। भगवान के नाम पर हमें भी कुछ दे जाओ।’<br />
लेखक ने पांच रुपये उसके हाथ में दे दिये और अपने होठों में बुदबुदाने लगा-‘भीख मांगना मजबूरी नहीं आदत होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आखिर उसने इस ब्लाग के पूर्व पाठ की कापी क्यों नहीं की-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=560</link>
<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 08:27:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=560</guid>
<description><![CDATA[उसने कल मेरा इसी ब्लाग पर लिखा गया आले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उसने कल मेरा इसी ब्लाग पर लिखा गया आलेख पढ़ा और इसलिये उसने उसकी कापी नहीं की क्योंकि इसमें उसी पर आक्षेप किया गया था। इसका मतलब साफ है कि वह एक सक्रिय ब्लाग लेखक है। उसने मेरे पाठ की कापी अपने ब्लाग पर रखकर एक तरह से अपराधिक कृत्य किया है। वह शायद अनुमान नहीं कर सकता कि मैं उसे ढूंढ लूंगा। उसे कोई अधिकार नहीं है कि मुझे पैसे का भुगतान किये बिना अपनी वेबसाईट पर मेरे पाठ रखे। </p>
<p>उसने मेरे कल तीन ऐसे ब्लाग की पोस्टें कापी कीं जो हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों नारद, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लाग पर ही दिखते हैं ब्लागवाणी पर नहीं। इनके नाम हैं <a href="http://rajraj.wordpress.com">साहित्य पत्रिका,</a> <a href="http://rajdpk2.wordpress.com">अभिव्यक्ति पत्रिका,</a> और <a href="http://rajdpk1.wordpresss.com">अनुभूति पत्रिका।</a> इन तीनों के नाम मैं अक्सर बदलता रहता हूं और कल ही इनका यह नाम रखा था, पर वह इनसे पहले से ही पाठ उठा रहा है।  इन पर मैं कभी कभी अपनी पुराने पाठ रखता हूं। जो 12 ब्लाग सभी फोरमों पर दिखते हैं उन पर अपनी नये पाठ रखता हूं। कल के व्यूज देखने से पता चलता है कि उसने नारद और चिट्ठाजगत से ही यह ब्लाग देखे हैं।  वह इन्हीं फोरमों से यह कापी करता होगा क्योंकि ब्लागवाणी से उसे पकड़े जाने का भय भी है। ब्लागवाणी पर पसंद का बटन किसी भी कंप्यूटर से एक बार ही दबता है और यह संदेह पैदा करता है कि कहीं वहां उसकी पकड़ न हो। नारद और चिट्ठाजगत से उसे ऐसा भय नहीं है। मतलब वह पुराना आदमी है और यहां से पूरी तरह जानकार है। </p>
<p>सवाल यह है कि उसने विनय प्रजापति ‘नजर’ और मेरे ब्लाग से ही कापी इस क्यों की? इसका उत्तर यह है उसमें साहित्य जैसे विषय होते हैं जो कि आम पाठक के लिये एक अच्छी सामग्री होती है। उसका यह ब्लाग किसी फोरम पर नहीं है। उसने डोमेन लिया है और वह पैसे कमाना चाहता है। वह यहां भी सक्रिय है एक सभ्य ब्लागर के रूप में।  उसकी कार्यशैली को मैं जानता हूं उसे इस पाठ के माध्यम से यही समझा रहा हूं।<br />
इससे साहित्यक ब्लाग लेखक हताश होंगे। डोमेन के पैसे का भुगतान तो लोग कर रहे हैं पर हमारे पाठों को वह फ्री का माल नहीं समझ सकते। यह अपने ब्लाग लेखकों और मित्रों को बता दूं यहां डोमेन होना या फ्री ब्लाग होना कोई मायने नहीं रखता। यहां महत्व है लिखे गये विषय का! चुराने वाले तो वेब साइट से भी चुरा सकते हैं और ब्लाग से भी! वह मुझसे चिढ़ा हुआ है और फायदा भी उठाना चाहता है। उसने पेैसे खर्च कर डौमेन तो ले लिया पर लिखे क्या? ताउम्र छलकपट में निकाल दी। लिखने के लिये सरल हृदय होना आवश्यक है। उसने ब्लाग बनाया पर लिखता क्या होगा? उसने विनय प्रजापति ‘नजर’, अचेत, रेवा स्मृति तथा मेरे साहित्यक पाठों की कापी अपने यहां रखी क्योंकि वह ऐसा नहीं लिख सकता।<br />
वह अपने कमाने के लिये मेरा मुफ्त में उपयोग नहीं कर सकता है। मेरे एक पाठ की कीमत है 2500 रु.। उसे अधिक लग सकती है। वह कह सकता है कि यह तो फालतू पड़ी थी। नहीं, उसे यह बात समझनी होगी कि शोरुम में सोने के अनेक कीमती गहने पड़े रहते हैंं पर उससे उनकी कीमत कम नहीं हो जाती। मेरे उसने ढाई लाख रुपये से अधिक के पाठों की कापी की है और उसका भुगतान वह कर नहीं सकता। अगर कोई उस ब्लाग को देखेगा तो कहेगा कि यह तो दीपक भारतदीप का ब्लाग है। वह मेरे नाम को भी भुनाना चाहता है। भले ही फोरमों पर मुझे उस जैसे हिट नहीं मिलते पर आम पाठक की पहुंच मेरे ब्लाग पर बढ़ती जा रही है इसलिये वह मेरे नाम को भी लिख रहा है। यह उसकी चाल है। वह कथित रूप से इन फोरमों पर हिट ब्लागर ही हो सकता है। वह तकनीकी ब्लागर नहीं हैं पर प्रयोक्ता के रूप में वह इसका उपयोग अच्छी तरह जानता है। </p>
<p>उसकी सक्रियता का प्रमाण यह है कि कल उसने मेरे पाठ को अपने कापी कर अपने यहां चिपकाने का काम नहीं किया। आज मेरे कमेंट को माडरेट नहीं कर रहा है। शायद वह अपने उस ईमेल को भी नहीं खोलता होगा जिससे यह ब्लाग संबंद्ध है। वह देख चुका है कि इस पर बवाल मच रहा है। मैंने तकनीकी मित्रों से सलाह की है उनका कहना है कि उसे ढूंढना कोई मुश्किल काम नहीं है। मैं गुस्से में हूं पर अपना विवेक कभी नहीं खोता। यहां अनेक ब्लाग लेखकों ने मुझे कभी न कभी सहयोग और प्रेरणा दी है इसलिये नहीं चाहता कि किसी को इतना मानसिक  अधिक आघात पहुंचा दूं कि  फिर मुझे पैर वापस खींचने का अवसर ही न रहे। यहां अनेक ब्लाग लेखक है, और पिछले पौने दो वर्षों से अनेक ब्लाग लेखकों से मेरी मित्रता है और करीब करीब सभी सहृदय हैं। कई तो बहुत भोले हैं और मुझे उनके किसी की चाल में फंसने पर दुःख होता है। जिस ब्लाग लेखक पर संदेह है उसे पता नहीं क्यों मैं शुरू से संशय से देखता आया हूं। वह सक्रिय ब्लाग लेखकों है पर उसने टिप्पणी अधिक से अधिक तीन बार दी होगी और उसके प्रिय विषय देखकर मुझे यह समझते देर नहीं लगती कि बेकार की बातें भी कर सकता है। </p>
<blockquote><p><strong>किसी भी ब्लाग लेखक का पाठ कापी कर अपने ब्लाग पर रखना अपराधिक कृत्य है। इसके लिये उसकी पूर्व अनुमति आवश्यक है।<br />
दीपक भारतदीप, लेखक और संपादक </strong></p></blockquote>
<p>आज मैं राजीव तनेजा जी की शिकायत पर उस ब्लाग पर गया जहां उनकी कहानी कापी कर रखी गयी थी। उसका भी मैंने विश्लेषण किया तो लगा कि अधिक से अधिक दो लोग ही ऐसे हैं जो ऐसा काम कर रहे हैं। उस पर जो देखकर आया उसे पर आगे लिखूंगा। हां, इतना तय है कि यह ब्लाग पर साहित्य लिखने वाले ब्लाग लेखकों को हतोत्साहित करने वाला कदम है। वैसे अगर नारद और चिट्ठा जगत के पास ऐसा कोई साफ्टवेयर हो कि पता चले कि कल मेरे इन तीन ब्लाग को किस ईमेल से देखा गया तो पता चला सकता है कि वह कौन है क्योंकि कुछ लोगों के पास ऐसे साफ्टवेयर हैं जिससे ईमेल से फोन नंबर पता किया जा सकता है-ऐसा । कल मेरे ब्लाग पर वहां से दो-दो व्यूज आये उनमें एक तो सहृदय ब्लाग लेखक अपनी टिप्पणी दे गये। इसका मतलब दूसरा देखने वाला ही संदेह के घेरे में हो सकता है। अधिक व्यूज होते तो मैं नहीं कहता। वैसे एक बात और है कि वर्डप्रेस के ब्लाग कम व्यूज ही बताते हैं इसलिये मैं इस पर दावे से कुछ नहीं कह सकता कि अन्य व्यूज नहीं होंगे। मै ऐसे ही किसी का नाम नहीं लूंगा जब तक मुझे कोई प्रमाण नहीं मिलेगा।  बाकी अभी मैं उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं उसे रोकना तो होगा ही नहीं तो यहां मौलिक लेखक  करना बेकार ही लगने लगेगा।</p>
<p><strong>लेख प्रकाशित करने के  चिट्ठकार समूह की चर्चा देखी तो पता चला कि आई डी तो ढूंढ निकाला है।  नाम कुछ अंग्रेजी में है पर इससे क्या? वह हिंदी जानता है या कोई ऐसा उसका सहायक है। उसने कल मेरी पाठ की कापी नहीं की इसका आशय यह है कि उसका मतलब वह समझ गया है। वैसे जिस ब्लाग लेखक पर मेरा संदेह है वह न हो तो अच्छा ही है। कम से कम मुझे इस बात की प्रसन्नता होगी कि कि हमारे अपने लोगों पर कभी कोई ऐसा आक्षेप नहीं करेगा।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्यालों का बंधन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:21:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</guid>
<description><![CDATA[ख्यालों के बंधन में फंसकर
उनके इशारों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ख्यालों के बंधन में फंसकर<br />
उनके इशारों पर नाचते रहे<br />
जिंदगी मेंं इसलिये हर कदम पर हारते रहे<br />
जो आजाद होकर सोचा<br />
तो सामने हमारे  यह बात आई<br />
क्यों हमने उनको अपना सबकुछ माना<br />
जब हमेशा की उन्होंने बेवफाई<br />
दिल की गुलामी से<br />
अच्छा है आजाद ख्याल से जीना<br />
हम क्यों अपना जिस्म<br />
इतने समये से अपने हाथों ही मारते रहे<br />
............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों की बहुतायत-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=548</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 13:04:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=548</guid>
<description><![CDATA[भारत में कदम कदम पर विद्वान मिल जायेंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में कदम कदम पर विद्वान मिल जायेंगे। अगर देखा जाये तो हर तीसरे आदमी को अपना ज्ञान बघारने की आदत होती है। फिर अब तो अंग्रेजी से पढ़े लिखे लोगों का कहना ही क्या? यहां भाषा का ऐसा कबाड़ा हुआ है कि हिंदी वाले ही सही शुद्ध हिंदी नहीं समझ पाते और इसलिये अंग्रेजी वालों का भाव अधिक बढ़ा ही रहता है। ऐसे में उनको अपने ज्ञान के अंतिम होने का आभास-जिसे भ्रम भी कहा जा सकता है-कि अपने विचार के प्रतिवाद करने पर हायतौबा मचा देते हैं। ऐसे में मेरा कई ऐसे विद्वानों से वास्ता पढ़ता है जो अपनी बात को अंतिम कहते हैं और  सिर हिलाकर सहमति देता हूं। अगर  देखता हूं कि वह सहनशील है तो प्रतिवाद करता हूं हालांकि यह भी एक बात है कि जो वास्तव में जो ज्ञानी होते है वह गलत प्रतिवाद पर भी उत्तेजित नहीं हेाते। </p>
<p>जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे से विचार या ज्ञान लेने की आवश्यकता पड़ जाती है। ऐसे में संबंधित विषय की जानकारी रखने वाले की शरण लेने में कोई संकोच भी नहीं करना चाहिए। मुश्किल तब आती है जब हम ज्ञानी समझकर किसी के पास जाते हैं और वह अल्पज्ञानी होता है। हम उसकी राय से सहमत नहीं होते  तो वह उग्र हो जाता है‘-तुम मेरे पास आये ही क्यों?’<br />
फिर अंग्रेजों ने इस देश में अनेक विभाजन स्थापित कर दिये। चाहे<br />
वह समाज हो या शिक्षा सभी क्षेत्रों के अलग अलग स्वरूप कर दिये। उनको इस देश पर राज्य करना था इसलिये फूट डालो और राज्य करो की नीति अपनाई तो शिक्षा में भी अलग-अलग विषय स्थापित किये। अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, हिंदी, राजनीति शास्त्र, विज्ञान, और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में शिक्षा का विभाजन कर इस देश में अधिकाधिक विद्वानों का अस्तित्व बनाये रखने का मार्ग प्रशस्त किया ताकि विवाद खड़े होते रहें पर समाधान न हो।  वैसे अर्थशास्त्र में दर्शनशास्त्र को छोड़कर सारे शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है-इसमें भारत के प्राचीन शास्त्र शामिल नहीं है। इस शिक्षा पद्धति से विद्वानों के झुंड के झंड इस देश में पैदा हो गये और आजकल सभी जगह बहसों में उन विद्वानों को बुलाया जाता है जो कहीं अपनी ख्याति अपनी शिक्षा की बजाय अपने धन, पद, और प्रतिष्ठा के कारण अर्जित कर चुके होते हैं। </p>
<p>अब विद्वानों की बात करें तो अर्थशास्त्र के विद्वान केवल अर्थ के धन और ऋण से अधिक नहीं जानते। वह मांग और आपूर्ति की बात करते हैं वह विश्व बाजार में से अपने देश के बाजार की तुलना करते  हैं पर कभी अपने समाज के बारे में वह नहीं बोलते। समाज के नियमित क्रिया कलापों का किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता पर किसी अर्थशास्त्री को उसका जिक्र करते हुए नहीं देखते होंगे। अर्थशास्त्र के अध्ययन में भारत के पिछड़े होने का कारण यहां के लोगों के अंधविश्वास और रूढियों को भी बताया जाता है। सगाई शादी और मृत्यु  के अवसर पर उनके द्वारा दिखावे के लिये धन व्यय करना गांवों में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। इसके लिये लोग अपनी जमीन गिरवी रखकर सगाई, शादी और  मुत्यु के अवसर पर समाज में अपनी साख बनाये रखने के लिये भोज का आयोजन करते हैं और कई लोग तो इतना कर्जा लेते हैं कि उनकी पीढि़यां भी उबर नहीं पाती। पहले भारत के किसान साहूकारों से कर्जा लेते थे और उनकी ब्याज दर बहुत अधिक होती थी। आजकल कई जगह बैंकों से भी कर्जा दिया जाने लगा है पर वह धन वास्तव में कृषि पर होता है या अनुत्पादक कार्यों-जैसा सगाई, शादी या मुत्यु भोज- पर  इस कोई चर्चा नहीं करता। आपने कई जगह किसानों द्वारा आत्महत्या की बात सुनी होगी। नित-प्रतिदिन ऐसी घटनायें प्रचार माध्यमों से आती हैं। आखिर वह किसके कर्ज से त्रस्त हो कर आत्म हत्या कर रहे हैं और वह कर्ज किस काम के लिये लिया और किस काम पर किया-यह कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। अर्थशास्त्र के विद्वान तो समाज शास्त्र का मुद्दा होने के कारण इस पर प्रकाश नहीं डालते और समाज शास्त्री अर्थशास्त्र का विषय मानकर मूंह फेर जाते हैं। वर्तमान में पश्चिमी प्रभावित संस्कृति ने जिस तरह इस देश में पांव फैलाये हैं और भौतिकता के  प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है उससे समाज में तमाम तरह के आर्थिक तनाव है पर यह बात कोई नहीं लिखता।<br />
मैंने इस पर अनेक लंबी चैड़ी बहसें सुनी हैं पर यह सच्चाई सामने नहीं आ पाती कि आखिर किसानों के कर्ज के  आत्महत्या के मूल में कारण क्या है? क्या किसी समाज शास्त्र ने इस पर अपना विचार रखा है। यह एक चिंता का विषय है। यह आत्महत्यायें देश के लिये शर्म की बात है पर हमारे अर्थ और समाज शास्त्री इसके मूल कारणों पर प्रकाश डालने की बजाय ऐसी बहसों में ही लगे रहते हैं जिनका कोई हल नहीं निकलाता।<br />
  अर्थशास्त्र में यह भी पढ़ाया जाता है कि यहां रूढि़वादिता है। अगर किसी किसान के छह बेटे हैं तो उसके बाद उसकी जमीन के छह विभाजन हो जाते हैं और यह विभाजन आगे बढ़ता जाता है और धीरे-धीरे कृषि योग्य जमीन कम होती जाती है। जनसंख्या वृद्धि के चलते यह समस्या बढ़ती जाती है और इसका अंत भी अभी तो नजर नहीं आता। देश के अर्थशास्त्री विश्व बाजार में उथल पुथल के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की बात तो करते हैं जो कि जो केवल औद्योगिक क्षेत्र पर ही पड़ता है। भारत की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है और उसके साथ ऐसी समस्यायें जो अन्य देशों में कम ही पायी जातीं है-जिनका निराकरण केवल कर्जे माफी से नहीं बल्कि देश में रूढि़वादिता के विरुद्ध लोगों में जागृति कर ही लाया जा सकता है।<br />
किसान-उद्योगपति, मजदूर-मालिक, स्त्री-पुरुष, जवान बालक-वृद्ध और अधिकारी-कर्मचारी जैसे भेद  कर सब पर अलग-अलग चर्चा करते हुए ढेर सारे विद्वानों के तर्क सुनिये और फिर भूल जाईये। कोई घटना हो तो तैयार हो जाईये प्रचार माध्यमों पर फिर वही बहस सुनने के लिये।<br />
बहसें भी ऐसी होती हैं कि किसान, मजदूर, स्त्री, बालक-वृद्ध के कल्याण पर ऐसे तर्क सुनाये जाते हैं कि दिल खुश हो जाता है। उद्योगपति, मालिक, पुरुष  और जवान की जैसे कोई समस्या नहीं है जबकि यह अभी तक इस भारतीय समाज में अपनी सक्रियता के कारण प्रभाव बनाये हुए हैं।<br />
आखिर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सारी बहसें होने के बावजूद कोई निष्कर्ष क्यों नहीं स्थापित हो पाता है। कुछ लोग कहते हैं कि अगर निष्कर्ष निकलने लगे तो फिर बहस के लिये बच क्या जायेगा? अर्थशास्त्र में मनोविज्ञान का  अध्ययन  किया जाता है जो कि सारे शास्त्रों का आधार स्तंभ होता है पर विद्वान लोग इस पर कभी चर्चा नहीं करते। वैसे मैंने मनोविज्ञान नहीं पढ़ा पर अपने मन को एक दृष्टा की तरह उसके उतार चढ़ाव देखकर कई अनुभूतियां होती हैं उस पर कविता और आलेख लिखता हूं। इसलिये मैं कभी भेदात्मक दृष्टि से कहीं नहीं देखता।<br />
ऐसा अनेक बार होता है कि कहीं दो समुदायों में दंगे होते हैं तो वहां पर कुछ सज्जन लोग दूसरे समुदाय वाले को न बल्कि बचाते हैं बल्कि उसकी अन्य प्रकार से सहायता भी करते हैं। वह लोग प्रशंसनीय हैं पर देखने वाले लोग इसमें भी भेद देखते हुए उसकी कहानी बयान इस तरह बताते हैं कि जैसे कोई अस्वाभाविक बात हुई हो। तमाम तरह के कसीदे पढ़े जाते हैं और बताया जाता है कि ऐसे में भी कुछ लोग हैं जो दुर्भावना में नहीं बहते। </p>
<p>आप जरा इस पर गहराई से दृष्टि डालें तो यह समझ में आयेगा कि मनुष्य का मन ही उसे ऐसे काम के लिये प्रेरित करता हैं हर मनुष्य में क्रूरता और उदारता का भाव होता है। कुछ लोगों में जब क्रूरता का भाव पैदा होता है तो कुछ में दया भाव भी होता है। अगर कहीं कोई मनुष्य तकलीफ में है तो और इधर उधर कातर भाव से देखता है तो उसकी भाषा न जानने वाला व्यक्ति सामथर्य होने पर उसकी सहायता करता हैं-कोई भी मनुष्य अपने पास पानी या भोजन होने पर किसी को प्यासा या भूखा करने नहीं दे सकता क्योंकि उसका मन नहीं मानता। अगर किसी व्यक्ति को किन्हीं व्यक्तियों से खतरा उत्पन्न हो गया है तो उसके निकट उस समय मौजूद कोई अनजान आदमी भी उसे छिपा सकता है क्योंकि किसी आदमी को संकट में फंसे होने पर मूंह फेरने के  लिये उसका मन नहीं मानता। यह मन है जो मनुष्य को चलाता है मगर देखने और सुनने वाले भी उसमें धर्म, जाति और भाषा के भेद कर उस पर लिखते हैं और वाहवाही बटोरते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई मनुष्य किसी की सहायता करता है तो वह उसकी प्रकृति न कि उसे जाति, धर्म या प्रदेश से जोड़ना चाहिये। </p>
<p>वाद और नारों पर बनी अनेक विचाराधाराओं के मानने वाले विद्वान इस देश में हैं और वह अपनी भेदात्मक बुद्धि के कारण विश्व में कोई सम्मान नहीं बना पाये उल्टे वह विदेशी विद्वानों के कथनों को यहां लिखकर ऐसे दिखाते हैं जैसे तीर मार लिया हो। अगर आप देखें तो निश्चयात्मक और भेद रहित होकर संत कबीर, रहीम और तुलसी ने पूरे विश्व में ख्याति अर्जित की और अब तो विदेशों में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। मूर्धन्य हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया और इसलिये उनको पूरे विश्व में ख्याति मिली। बाद में हुए विद्वान वाह वाही बटोरने के लिये अंग्रेजों द्वारा सुझाये गये भेदात्मक मार्ग पर चले तो फिर किसी ने विश्व में अपनी ख्याति नहीं बनायी। हां, तमाम तरह के शास्त्रों के अध्ययन के नाम पर उनको धन और सम्मान जरूर मिला पर यहां वह लोगों के हृदय में स्थान नहीं मना सके। यही कारण है कि पुराने विद्वान आज भी प्रासंगिक है और वर्तमान विद्वान भेदात्मक मार्ग के कारण आपस में झगड़े कर वहीं गोल-गोल चक्कर लगाते हैं। </p>
<p>इसका कारण यह है कि वाद और नारों पर चलते रहने से एक छवि बन जाती है और उससे विद्वान लोगों को यह लगता है कि उसे भुनाया जाये। वैसे अधिकतर लोग किसान, नारी,गरीब, बालक, शोषित, वृद्ध और अन्य तमाम तरह के वह वर्ग जिनके नाम पर शब्दों का संघर्ष कर अपनी छवि बनायी जा सकती है उनका उपयोग करते हैं। अब ऐसा भी नहीं है किसी एक वर्ग का नारा लगाकर काम करते हों वह समय के अनुसार अपने अभियानों में वर्ग बदलते रहते है ताकि लोग उनके वाद और नारों से उकतायें नहीं। कभी किसान की बात करेंगे तो कभी गरीब और कभी नारी कल्याण की बात करेंगे। यह सब केवल अपनी छवि बनाये रखने के लिये करते है। यही कारण है कि कोई समग्र विकास में समस्त  लोगों के हित देखने की बात कोई नहीं करता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 14:01:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=194</guid>
<description><![CDATA[गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/20r4vw6.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><strong>गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की<br />
तरह सजाये जाते<br />
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते<br />
देखने वाले भी कान बंद कर<br />
आंखों से देखने की बजाय<br />
उससे लेते हैं सुनने का काम<br />
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख<br />
फिल्म का आनंद उठाये जाते<br />
किसे समझायें कि<br />
भक्ति हो या संगीत<br />
एकांत में ही देते हैं आनंद<br />
शोर में तो अपने लिये ही<br />
जुटाते हैं तनाव<br />
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ<br />
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद<br />
जैसे हम उठाते<br />
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर<br />
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते<br />
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं<br />
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं<br />
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही<br />
सब कुछ खत्म हो जाता है<br />
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब<br />
वह दिल में बस जाते<br />
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते<br />
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिंतन शिविर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 16:42:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</guid>
<description><![CDATA[
अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>अपने संगठन का चिंतन शिविर<br />
उन्होंने किसी मैदान की बजाय<br />
अब एक होटल में लगाया<br />
जहां सभी ने मिलकर<br />
अपना समय अपने संगठन के लिये<br />
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया<br />
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का<br />
एक आदर्श बयान आया<br />
तब एक सदस्य ने कहा<br />
-‘कितना आराम है यहां<br />
खुले में बैठकर<br />
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी<br />
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी<br />
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ<br />
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्याल तो हैं जलचर की तरह-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=191</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 12:35:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=191</guid>
<description><![CDATA[
मन का समंदर है गहरा
जहां ख्याल तैरते ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मन का समंदर है गहरा<br />
जहां ख्याल तैरते हैं जलचर की तरह<br />
कुछ मछलियां सुंदर लगती हैं<br />
कुछ लगते हैं खौफनाक मगरमच्छ की तरह</p>
<p>देखने का अपना अपना नजरिया है<br />
मोहब्बत हर शय को खूबसूरत बना देती है<br />
नफरत से फूल भी चुभते हैं कांटे की तरह<br />
इस चमन में बहती है कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा<br />
मन जैसा चाहे नाचे या चीखे<br />
नहीं उसके दर्द की दवा<br />
न एक जगह ठहरते<br />
न एक जैसा रूप धरते<br />
ख्याल तो हैं बहते जलचर की तरह<br />
................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
<p>othrer web pege</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com<br />
http://anantraj.blogspot.com<br />
http://deepkraj.blogspot.com<br />
http://terahdeep.blogspot.com<br />
http://rajlekh.blogspot.com<br />
http://zeedipak.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कबीर साहित्य के पाठ की पाठक संख्या एक हजार  के पार]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=185</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 13:51:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=185</guid>
<description><![CDATA[मेरे इस ब्लाग/पत्रिका पर संत शिरोमणि क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे इस ब्लाग/पत्रिका पर संत शिरोमणि कबीरदास के दोहों वाला एक पाठ आज एक हजार की पाठक संख्या पार गया। इसको मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं और मूल पाठ को पढ़ने के लिये यहां क्लिक भी कर कर सकते हैं। जिस समय में इस पाठ को लिख रहा हूं तब उस पर पाठक संख्या 1029 है। </p>
<p>मुझे जैसे अस्त पस्त लेखक के लिये यह बहुत महत्वपूर्ण बात है क्योंकि कोई काम व्यवस्थित ढंग से न करने की वजह से मुझे अधिकतर  सफलता इतनी आसानी से नहीं मिल जाती। इस पाठ के एक हजार पाठक संख्या पार करने में कोई विशेष बात नहीं है पर इस छोटे पाठ की इस सफलता में जो संदेश मेरे को मिलते हैं उसकी चर्चा करना जरूरी लगता है। इस हिंदी ब्लाग जगत पर तमाम तरह के विश्लेषण करने वाले लोग उसमें रुचि लेंगे इसकी मुझे पूरी जानकारी है और जो संदेश मिल रहे हैं वह कई  धारणाओं का बदलाव का संकेत हैं वह समाज शास्त्र के विद्वानों के लिये भी दिलचस्पी का विषय हो सकते हैं कि आखिर अंतर्जाल पर भी आधुनिक युग में लोग  कबीर साहित्य के रुचि ले रहे हैं।  </p>
<p>सबसे पहली बात तो यह कि दो दोहों और उनका भावार्थ प्रस्तुत करना मेरे लिये इस समय आसान है क्योंकि मैं अब पहले देवनागरी फोंट कृतिदेव में टाइप कर उस पर अपनी कभी छोटी तो कभी बड़ी व्याख्या भी प्रस्तुत करता हूं पर जब यह पाठ लिखा गया था तब मुझे अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड में टाईप करना पड़ता था। यह काम मेरे लिये कठिन ही नहीं अस्वाभाविक भी था। सुबह इतना संक्षिप्त पाठ लिखना ही बहुत बड़ी उपलब्धि होता था-आज भले ही मुझे भी लगता है कि इतने छोटे पाठ- जिसमें मेरा टंकक से अधिक योगदान नहीं है- की सफलता पर क्या इतना बड़ा आलेख लिखना। </p>
<p>कुछ पाठक  कहते थे कि आप अपनी व्याख्या भी दीजिये क्योंकि उन्होंने कुछ जगह मेरी ऐसी व्याख्यायें देखीं थीं जो मैं एक दिन पहले ही टाईप कर रखता था। संत शिरोमणि कबीरदास के दोहे वैसे अपने आप ही कई गूढ रहस्यों को प्रकट कर देते हैं पर लोग यह भी चाहते हैं कि जो इनको प्रस्तुत कर रहा है वह भी अपनी बात कहे। इस ब्लाग को मैंने पहले अध्यात्मिक विषयों के रखा था पर बाद में ब्लागस्पाट पर अंतर्जाल पत्रिका पर यही  विषय लिखने के कारण मैंने इसे अन्य विषयों के लिये सुरक्षित कर दिया। वर्डप्रेस का शब्दलेख पत्रिका इस समय अध्यात्म विषयों के लिये है और उसी पर ही लिख रहा हूं। इसके अलावा ब्लागस्पाट का शब्दलेख सारथी  है जो अध्यात्मिक विषयों से संबंधित है। अब सोच रहा हूं कि इस ब्लाग को भी अध्यात्मिक विषयों के लिये रख दूं।</p>
<p>सभी ब्लाग एक जैसे दिखते हैं पर मेरे लिये सभी के परिणाम एक जैसे नहीं हैं। वर्डप्रेस में विविध श्रेणियां पाठ के लिए अधिक पाठक जुटातीं हैं इसलिये अब मैं ब्लागस्पाट के अच्छे पाठ यहां लाने वाला हूं। मुझे ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस के ब्लाग दो अलग अलग स्थान दिखते हैं। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमो पर उनको एक जैसा देखा जाता है पर मेरे लिये स्थिति वैसी नहीं है।<br />
मैंने शुरूआती दिनों में कई लोगों को ब्लाग लिखने के बारे में अनेक भ्रांत धारणायें फैलाते देखा था जिसमें यह बताया  गया था कि आप ढाई सौ अक्षर अवश्य लिखें वरना लोग आपके बारे में यह कहेंगे कि यह लिख नहीं रहा बल्कि मेहनत बचा रहा है। इसके प्रत्युत्तर में मैंने हमेशा ही लिखा है कि मुख्य विषय है आपका कथ्य न कि शब्दों की संख्या। हालांकि मैने हमेशा बड़े ही पाठ लिखे हैं पर दूसरों को इस बात के लिये प्रेरित किया है कि वह अपने मन के अनुसार लिखें पर प्रभावी विषय और शब्दों का चयन इस तरह करें कि गागर में सागर भर जाये। संत कबीरदास और रहीम के दोहों पर तो ऐसी कोई शर्त लागू हो भी नहीं सकती। </p>
<p>एक जो महत्वपूर्ण बात कि आज भी संत कबीर और रहीम इतने प्रासंगिक हैं कि उनका लिखा अपने आप पाठक जुटा लेता है-यह बात मुझे बहुत अचंभित कर देती है। हिंदी के भक्ति काल को स्वर्णिम काल कहा जाता है जिसे वर्तमान में अनेक कथित संत आज भी भुना रहे हैं और मैं अनजाने मेंे ही वह कर बैठा जिसके लिये में उन पर आरोप लगाता हूं कि वह ज्ञान का व्यापार कर रहे हैं। हां, इतना अंतर है कि वह लोग अपने भक्तों को कथित ज्ञान देकर दान-दक्षिणा वसूल करते हैं और मैं इंटरनेट के साढ़े छहः सौ रुपये व्यय करने के साथ ही अपना पसीना भी लिखने में बहाता हूं। इसमें कोई संशय नहीं है कि ऐसे प्रयासों से मेरी लोकप्रियता बनी होगी। लोग कह नहीं पाते पर जिस तरह पाठक अध्यात्मिक विषयों को पढ़ रहे हैं वह मुझे अचंम्भित कर देता है। सुबह लिखते समय मेरे मन में कोई भाव नहीं होता। न तो मुझे पाठ के हिट या फ्लाप होने की चिंता होती है और न कमेंट की परवाह। मैंने आध्यात्मिक विषय पर तो पहले ही दिन से लिखना आरंभ किया और हिंदी में दिखाये जाने वाले फोरमों पर तो मेरे ब्लाग बाद में दिखने के लिये आये  अगर उन्मुक्त और सागरचंद नाहर मुझे प्रेरित नहीं करते तो ब्लाग लेखक मेरे मित्र नहीं बनते और आज की तारीख में जिस तरह मेरे ब्लाग कुछ वेबसाईट लिंक कर रहीं हैं उस पर झगड़ा और कर बैठता। नारद फोरम पर मैं उन दिनों भी प्रतिदिन जाता था पर मुझे अपना ब्लाग पंजीकृत कराना नहीं आ रहा था। मतलब यह है कि मैंने कई चीजें अपने ब्लाग मित्रों से सीखीं हैं और वह नहीं सीखता तो अल्पज्ञानी रहता और सब जानते हैं कि जिस विषय में कम जानता है वहां उसमें अहंकार आ जाता है। प्रसंगवश इस पोस्ट को इतने पाठक इसलिये भी मिले कि मैंने ब्लाग पर नवीनतम पाठों और पाठकों की पसंद के स्तंभ स्थापित किये  और वहां यह पाठ लंबे समय से बना हुआ है और इतने सारे पाठक मिलने के पीछे यह भी एक वजह हो सकती है। इसका श्रेय श्री सागरचंद नाहर जी को जाता है जिनकी एक पाठ से मैंने यह बात सीखी थी। मैं अगर किसी से कुछ सीखता हूं तो उसका दस बार नाम लेता हूं क्योंकि ऐसा न करने वाला कृतघ्न होता है।</p>
<p>इस पाठ पर किसी ब्लाग लेखक की कमेंट नहीं है और किसी पाठक ने कल ही इस पर अपनी टिप्पणी लिखी। 18 जनवरी 2008 को यह पोस्ट उस समय लिखी गयी थी जब हिंदी ब्लाग जगत में मैं हास्य कविताओं की बरसात कर रहा था और उस समय लोगों ने शायद इस पर कम ही ध्यान दिया कि मैं प्रातः अध्यात्मिक विषयों पर लिखने के बाद चला जाता हूं और शाम को होता है वह समय जब मैं अन्य विषयों पर लिखता हूं। इसलिये लोग सुबह के लिखे इस पाठ पर ध्यान नहीं दे पाये और उनको इंतजार करते होंगे उस दिन शाम को मेरी हास्य कविताओं का जो आज किसी भी मतलब की नहीं है। एक बात मैंने अनुभव की है कि अब मैं पिछले कई दिनों से शाम को भी लिखते समय संयम बरतने का विचार करता हूं क्योकि  अध्यात्मिक विषय पर लिखने से लोग थोड़ा सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और मुझे यह सोचना चाहिये कि इस कारण कोई मेरी गुस्से में कही बात का प्रतिकार न करते हों। वैसे सच यह है कि मैंने अपने महापुरुषों का संदेश लिखते समय कुछ भी विचार नहीं किया और न मेरे को ऐसा लगता था कि इससे मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं को लोकप्रियता मिलेगी। अन्य विषयों में हास्य कविता भी मेरे लिये कोई प्रिय विषय नहीं रही पर ताज्जुब है कि उससे भी अनेक पाठकों तक पहुंचने में सहायता की। सुबह लिखते समय मैं अपने को लेखक नहीं बल्कि एक टंकक की तरह देखता हूं पर कहते हैं कि आप आपके परिश्रम का कोई न कोई अच्छा परिणाम निकलता है।<br />
कुल मिलाकर साफ संदेश यही है कि आम पाठकों के लिये रुचिकर लिखकर ही उन्हें अपने ब्लाग पर आने के लिये बाध्य किया जा सकता है। इसके लिये त्वरित हिट और टिप्पणियों का मोह तो त्यागना ही होता है किसी सम्मान आदि से वंचित होने की आशंका भी साथ लेकर चलनी पड़ती है और मुझे अधिक से अधिक आम पाठकों तक पहुंचना है इसलिये ऐसे विषयों पर लिखने का प्रयास करता हूं जो सार्वजनिक महत्व के हों। फोरमों पर अपने चार-पांच हिट देखकर अगर विचलित हो जाता तो शायद इतना नहीं लिख पाता। मेरी स्मृति में यह बात आज तक है कि उस दिन इस पाठ पर सभी तरफ से केवल 19 हिट थे जिसमें वर्डप्रेस के डेशबोडे से ही अधिक थे। विभिन्न फोरमों से संभवतः 8  हिट थे। वहां अधिक हिट न लेने वाला यह पाठ 1000 से अधिक पाठकों तक पहुंच गया क्या यह विश्लेषण करने का विषय नहीं है। कबीर साहित्य पर एक अन्य ब्लाग एक अन्य पाठ भी हजार की संख्या के पास पहुंच रहा है और यह जानकारी चर्चा का विषय हो सकती है।<br />
आज मुझे भी लगता है कि मैंने कोई मेहनत नहीं की है पर उस समय इतनी पोस्ट लिखने में ही मुझे बहुत समय लग जाता था। इसलिये मैं अपने उन सभी ब्लाग लेखक मित्रों का आभारी हूं जिन्होंने हमेशा मुझे नये नयी जानकारियां और टूल देकर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया है और इस पाठ की सफलता के लिये उनको श्रेय देने में मुझे कोई संकोच भी नहीं है। हां, मुझे अपने को श्रेय लेने में संकोच बना हुआ है।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिना पूछे रास्ता बताने लगे-कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 17:15:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=179</guid>
<description><![CDATA[
लिखे उन्होंने चंद शब्द
और दूसरों को ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>लिखे उन्होंने चंद शब्द<br />
और दूसरों को लिखना सिखाने लगे<br />
मुश्किल है  कि बिना समझे लिखा था<br />
पर दूसरों में समझ के दीप जलाने लगे</p>
<p>खरीद ली चंद किताबें और रट लिये कुछ शब्द<br />
अब दूसरों को पढ़ाने लगे<br />
खुद कुछ नहीं समझा था अर्थ<br />
दूसरों का जीवन का मार्ग बताने लगे</p>
<p>जो भटके हैं अपने रास्ते<br />
अपने लक्ष्य का पता नहीं<br />
पर चले जा रहे सीना तानकर<br />
 सूरज की रोशनी में मशाल  वह जलाने लगे<br />
ज्ञानी रहते हैं खामोश<br />
इसलिये अल्पज्ञानी<br />
शब्दों का मायाजाल बनाने लगे</p>
<p>कहें दीपक बापू<br />
समझदार भटक जाता है<br />
तो पूछते पूछते लक्ष्य तक<br />
पहुंच ही जाता है<br />
पर नासमझ भटके तो<br />
पूछने की बजाय रास्ता बताने लग जाता है<br />
अपनी समझदारी दिखाने के लिये<br />
तमाम नाम लेता है रास्तों का<br />
शायद कोई बिना पूछे रास्ता बताने लगे<br />
नहीं भी बताया तो<br />
अपने जैसा ही रास्ता वह भी भटकने लगे<br />
...............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी गलतियों से सिखाता हुआ  बीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया यह ब्लोग]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=534</link>
<pubDate>Thu, 05 Jun 2008 15:23:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=534</guid>
<description><![CDATA[मेरे यह ब्लाग/पत्रिका भी आज बीस हजार क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/2zjie4j.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />मेरे यह ब्लाग/पत्रिका भी आज बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। ऐसा करने वाला यह तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इस ब्लाग का नाम गंभीरता से नहीं लिखा गया। पता तो केवल प्रयोग करने के लिये डाला गया इसी कारण इतना लंबा है। इस ब्लाग से मेरी ऐसी यादें जुड़ीं हुईं है जो मेरा आत्म विश्वास बढ़ाती हैं। कभी कभी मेरे दिमाग में उग्रता का भाव आता है तो मैं इसके लिये ही लिखने लगता हूं। अंतर्जाल पर अपने लिखने के लिऐ एक लेखक जब तकनीकी ज्ञान से रहित हो तब पर किन हालतों से गुजरता है और किस तरह अपनी गलतियों से सीखता है यही संदेश यह ब्लाग मुझे देता है।</p>
<p>आज से सात वर्ष पूर्व मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। तब मुझे लगा कि मैं जब भी अध्यात्म और लेखन से दूर जाता हूं मेरे अंदर अनेक शारीरिक विकार उत्पन्न होते है।  ऐसे में मैंने लिखने में अपना मन लगाने के साथ ध्यान में अपना मन लगाने  का विचार किया। चूंकि यह दोनों मनोवृत्तियां मेरे अंदर प्रारंभ से ही है इसलिये अनेक लोगों से व्यक्तिगत संपर्क में इस पर चर्चा होती रहती है। उन्हीं दिनों एक भक्त किस्म के व्यक्ति को मैं अपनी एक अध्यात्म संबंधी रचना दिखा रहा था तो उसने मुझसे कहा ‘तुम तो दीपक बापू हो‘। फिर वह जब भी मिलते मुझे इसी नाम से बुलाते हैं। उन्हीं दिनों मैं एक रजिस्टर खरीद लाया और उस पर ऐसे ही शीर्षक लिख दिया ‘दीपक बापू कहिन’। अकेले बैठकर उस पर चिंतन वगैरह लिखता और कभी कभी पत्रिकाओं के लिए व्यंग्य वगैरह लिखता तो वह अलग से लिखता। उस रजिस्टर पर मैंने कविताएं भीं लिखीं। </p>
<p>जब अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो वह रजिस्टर मेरे पास ही था क्योंकि मैं कृतिदेव से पाठ लिखकर इस प्रकाशित करने वाला था। अक्षरग्राम से मेरा संपर्क जम नहीं रहा था। पता नहीं कैसे वर्डप्रेस पर जब दीपक बापू कहिन लिखा कर हाथ पांव मारे तो अक्षरग्राम जैसा कुछ सामने आता लगा-तब मैं नहीं जानता था कि यह एक दरवाजा है जहां से मैं दाखिल हो रहा हूं। फिर नारद से भी संपर्क नहीं जम रहा था तब चल पड़ा था अपनी अकेली राह। हां, मुझे याद है उन्मुक्त का वह संदेश ‘आपका ब्लाग तो कूड़ा दिख रहा है।’ हतप्रभ होकर मैंने दूसरा ब्लाग बनाया जिसे आज <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘शब्द पत्रिका’</a> फिर तीसरा <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘हिंदी पत्रिका’ </a>के नाम से जाना जाता है। ‘हिंदी पत्रिका’ पर यूनिकोड में एक क्षणिका टाईप कर प्रकाशित की और उस पर मिली थी मुझे पहली टिप्पणी। मगर मुझे आगे लेकर निकली थी उन्मुक्त जी और सागरचंद नाहर की टिप्पणियां। मैं उन्मुक्त जी का प्रशंसक हूं। कभी भ्रमित नहीं करते और तकनीकी ब्लाग लेखकों में उनको और अनुनादजी  को मैं बहुत मानता हूं। श्रीश शर्मा जी की बहुत याद आती है पर वह दिखते ही नहीं।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों ने प्रेरित किया और समय समय पर टूल भी बताये पर ब्लाग की तकनीकी के बारे में मुझे किसी ने कुछ नहीं सिखाया। अगर मैं सीखा तो अपनी गलतियों से। अभी दोतीन दिनों से चिट्ठाकार चर्चा में बहस इस बात पर चल रही है कि किसी के ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है। तमाम बड़े ब्लाग लेखक उसके साथ सहानुभूति जता रहे हैं पर यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि ब्लाग स्पाट की सैटिंग में उसने व्यस्क सामग्री पर ‘हां‘ पर क्लिक कर रखा है। मैंने दो दिन पहले भी बताया था और आज भी लिख रहा हूं। पहले मेरा लिखा अगर पढ़ा होता तो शायद आज उनको इतने सारे शब्द खर्च नहीं करना पड़ता। इससे एक बात तो पता लगती है कि जो तकनीकी श्रेणी का छलावा है वह भी कम नहीं है। </p>
<p>चिट्ठा चर्चा में श्री समीरलाल ‘उड़न तश्तरी’ ने लिखा था कि ‘दीपक बापू कहिन इस ब्लाग जगत में नया अलख जगायेगा‘। मैं आज भी सोचता हूं कि उन्होंने केवल तुक्का मारा था या पढ़कर प्रभावित हुए थे। क्योंकि मुझे लगता है कि वह अब कहीं जाकर बेहतर लिख रहे हैं। उस समय तो मुझे उनके पाठों में अधिक रुचि नहीं रहती थी। उस समय मैं उनकी परवाह भी नहीं करता था पर आज देखकर लगता है कि वह वाकई प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक हैं। उस समय उनके अधिकतर पाठ ब्लाग लेखकों को ही प्रभावित करने वाले लगते थे।  अब उनके लेखक में जो गंभीरता आ रही उससे ही लगता है कि वह न केवल अच्छे लेखक भी हैं बल्कि पाठक भी हैं। वैसे अच्छे पाठक अच्छे लेखक हो यह जरूरी नहीं है पर अच्छे लेखक जरूर अच्छे पाठक होते हैं। आप देखिये तीन दिन पहले मैंने ही ब्लाग स्पाट के ब्लाग लेखक को व्यस्क सामग्री संबंधी जानकारी दी  पर किसी ने नहीं पढ़ी और आज सभी लोग फिर उसी बहस में लगे रहे। यह इस बात का प्रमाण है कि लोग कम पढ़ते हैं और लिखने का प्रयास अधिक करते हैं। मैं आज यह सोचता हूं कि मैं एक ब्लाग लेखक होकर वेबसाइट धारकों सलाह लेने की गलती करता था इसी कारण हमेशा परेशान रहा-यह  संदेश मुझे इसी ब्लाग पर मिलता है। इस ब्लाग को विलंब इसलिये भी लगा कि मैंने इस पर रचनाएं भी एक अंतराल के बाद ही दोबारा प्रकाशित करना शुरू कीं। </p>
<p>आने वाले समय में भी मैं सोच रहा हूं कि थोड़ा अधिक बेपरवाह होकर लिखा जाये। अभी कुछ बातें स्पष्ट करने में थोड़ा संकोच होता है पर अब उसे भी छोड़ना होगा। अंतर्जाल पर लटके-झटके और भ्रमजाल का विस्तार हो रहा है। फिर अब यह भी अनुभव हो रहा है कि वेबसाइट बनाने वाले ब्लाग लेखक एक तरह से अपने को अलग समझ रहे हैं। वह अपने को ऐसा ही समझ रहे हैं जैसे अधिक पैसा खर्च कर विशिष्ट कक्ष में बैठे हैं। इनमें कुछ मेरे मित्र है और वाकई भोले हैं पर कुछ चालाक हैं और उनकी मित्रता केवल दिखावा है। लिखने के मामले में अधिक प्रभाव नहीं छोड़ते भले ही टिप्पणियां उनके पास अधिक होती हैं। वेबसाइट का मालिक होने के बावजूद वह ब्लाग जगत में इसलिये सक्रिय हैं कि उनके कुछ निहितार्थ हैं। मैं मूलतः अल्हड आदमी हूं पर  चालाकियां मेरे सामने छिपतीं नहीं है। बहरहाल मैं अपने पाठको, मित्रों और हितचिंतकों का आभारी हूं। यह मेरा सेनापति ब्लाग है और ब्लाग लेखकों के साथ ही अनेक वेबसाइटें इस पर मेहरबान हैं। हां, पाठकों का समर्थन अधिक नहीं मिल पा रहा है इसलिये यह विलंब से इस मुकाम पर आया। अब मेरा सोचना है कि मुझे लिखना कम कर यहां हिंदी ब्लाग जगत पर साहित्य लिखने वालों पर प्रेरणा देन का काम भी टिप्पणियां उनके ब्लाग पर रखकर करना चाहिए। यहां ऐसा लिखने वाले कई हैं पर उनको प्रेरित करने वालों में समीरलाल और दो तीन अन्य लोग ही इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते हैं पर  यह संख्या पर्याप्त नहीं है।<br />
<strong>विभिन्न प्रमुख स्थानों से आये पाठक </strong></p>
<p>narad.akshargram.com 965<br />
blogvani.com 819<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 334<br />
google.co.in/ig?hl=hi 296<br />
chitthajagat.in 146<br />
blogvani.com/?mode=new 75<br />
blogvani.com/Default.aspx?count=100 63<br />
anantraj.blogspot.com 48<br />
rajlekh.blogspot.com 43<br />
narad.akshargram.com/page/2 38<br />
rajlekh.wordpress.com 36<br />
parikalpnaa.blogspot.com 36<br />
gwaliortimes.com 35<br />
blogvani.com/Default.aspx?mode=new 32<br />
narad.akshargram.com/?show=all 31<br />
blogvani.com/Default.aspx?count=50 28 </p>
<p><strong>पाठकों के पसंद से विभिन्न पाठ </strong><br />
Title Views<br />
रहीम के दोहे: सं 423<br />
पुराने ताजमहल ़/a&#62; 212<br />
चाणक्य नीति:अस़/a&#62; 211<br />
तन में तंत्र मन  193<br />
पति-पत्नी और चो༯a&#62; 192<br />
वर्षा ऋतु:कहीं ༯a&#62; 169<br />
फिर करना अभिमा़/a&#62; 168<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 166<br />
भजन करते-करते भ༯a&#62; 148<br />
गर्मी पर लिखी ग༯a&#62; 147<br />
निष्काम और सहज ༯a&#62; 139<br />
चाणक्य नीति:कु़/a&#62; 136<br />
इस ब्लोगर मीट प༯a&#62; 135<br />
अपना नाम भी होग༯a&#62; 128<br />
काहेका भला आदमॼ/a&#62; 127<br />
रहीम के दोहे: जा 127<br />
उसने मोबाइल की ༯a&#62; 126<br />
गीत-संगीत का मो༯a&#62; 118<br />
रहीम के दोहे: वा 115<br />
मूर्ति पूजा से ༯a&#62; 113<br />
रहीम के दोहे:मा༯a&#62; 112<br />
अंग्रेजी की लत़/a&#62; 111<br />
रहीम के दोहे:मे 104<br />
शेयर बाजार के उ༯a&#62; 104 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भ्रम का सिंहासन-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=171</link>
<pubDate>Mon, 02 Jun 2008 17:02:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=171</guid>
<description><![CDATA[एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक सपना लेकर<br />
सभी लोग आते हैं सामने<br />
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन</p>
<p>कहते हैं<br />
‘तुम उस पर बैठ सकते हो<br />
और कर सकते हो दुनियां पर शासन</p>
<p>उठाकर देखता हूं दृष्टि<br />
दिखती है सुनसार सारी सृष्टि<br />
न कहीं सिंहासन दिखता है<br />
न शासन होने के आसार<br />
कहने वाले का कहना ही है व्यापार<br />
वह दिखाते हैं एक सपना<br />
‘तुम हमारी बात मान लो<br />
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो<br />
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे<br />
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’</p>
<p>उनको देता हूं अपने पसीने का दान<br />
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं<br />
रहने देता अपने मन में निशान<br />
मतलब निकल जाने के बाद<br />
वह मुझसे नजरें फेरें<br />
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं<br />
मुझे पता है<br />
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन<br />
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इसलिए आज हमने कोई व्यंग्य नहीं लिखा ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=531</link>
<pubDate>Fri, 30 May 2008 16:35:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कृतिदेव को यूनिकोड के बदलने वाला  टूल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i24.tinypic.com/2mq6ych.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />कृतिदेव को यूनिकोड के बदलने वाला  टूल आने पर मैंने सोचा था कि प्रतिदिन व्यंग्य लिखा करूंगा। जब यूनिकोड में  लिखता था तो मुझे कुछ नहीं सूझता था और व्यंग्य कविता लिख कर काम चलाता था उससे जो नाम कमाया आज तक मेरे साथ चल रहा  है। तब मन ही मन गुंस्सा भी होता था कि यार यह कहां फंस गये। लिखने का कुछ सोचते मगर लिख कुछ और जाते।  अब तो कृतिदेव सीधे लिखने की सुविधा है तो लगता है कि बकवास अधिक लिख रहे हैं, व्यंग्य वगैरह तो गया तेल लेने। पहले फ्लाप थे और  कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल आया तो सोचा कि अब तो हिट होकर ही दम लेंगे। मगर आत्ममुग्धता की स्थिति बहुत खराब होती है और भले ही सबको सलाह खूब देते हैं पर स्वयं उसका शिकार जरूर होते है। यह तो गनीमत है कि यूनिकोड मेंं मजबूर होकर लिखने की वजह से कुछ ऐसे पाठ लिख गये जो आज तक हमारा नाम चला रहे हैं।  </p>
<p>आज हमने सोचा चलो पाठ लिखने को विराम देते है। कुछ आत्ममंथन करें। दूसरों के ब्लाग देखें और फिर शुरू करें। फोरम पर चलते हुऐ हम <a href="http://ashishanshu.blogspot.com/2008/05/blog-post_5881.html">आशीष कुमार अंशु</a> के ब्लाग पर पहुंच गये। उनके ब्लाग पर किसी टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज दिखाई जा रही थी। वह तो अपनी पोस्ट डाल कर बैठ गये और हम पढ़ते हुए चिंतन में आ गये। भई याह क्या है? कमिश्नर का कुत्ता मिला! वह कुता जो लापता हो गया था! हमने उल्टा पुल्टा विचार किया और सोचते रहे आखिर यह क्या हो रहा है? आखिर पोस्ट डालकर वह कहना क्या चाहते है? कुछ लिखा ही नहीं। मगर क्या लिखते ‘अंशु जी’। जब ऐसे व्यंग्य चित्रों के रूप में हास्य व्यंग्य के जीवंत दृश्य  प्रकट होते हैं तो भला कौन अपने  शब्द लिखकर  हिट हो सकता है। बना बनाया हुआ व्यंग्य सामने आ जाये तो लिखा हुए व्यंग्य कौन पढ़ना चाहेगा? </p>
<p>हमारे व्यंग्यकार मित्र <a href="http://www.shiv-gyan.blogspot.com">श्री शिवकुमार मिश्र</a> ढेर सारे शब्द लिखकर कर व्यंग्य लिखते हैं। उनको देखकर ही मैं सोचता हूं कि अगर व्यंग्य लिखूं तो उन जैसा नहीं तो लिखना  बेकार है-ऐसे ही अपनी छवि बनी हुई। अगर हम व्यंग्य लिखें तो उनसे लोग तुलना करेंगे और हम क्या उनका मुकाबला करेंगे।  मगर आज पोस्ट देखकर  मैं सोच रहा ं कि व्यंग्य लिखकर तो मैं तो क्या मेरे फरिश्ते भी हिट नहीं हो सकते।  एक तो श्री शिवकुमार मिश्र की चुनौती का सामना करने में मैं संक्षम नहीं फिर अगर यह टीवी चैनल वाले ऐसी खबरें देते रहे और आशीष कुमार ‘अंशु’ जैसे लोग उनको लाकर यहां ब्लाग रखते रहे तो भला हम कहां लिख पायेंगे। इससे तो अच्छा है चिंतन लिखकर अपना रुतवा झाड़ते रहें। लोग सोचें कि  कोई बड़ा भारी विद्वान है जिसका ब्लाग पढ़ रहे हैं।<br />
कुछ दिनों बाद टीवी पर चैनलों पर ऐसी ही खबरे आयेंगीं कि अमुक हीरो का कुत्ता खो गया। चारों तरफ रेड अलर्ट घोषित किया गया है। तलाशा जारी है। कभी ऐसी खबरें आयेंगी कि अमुक हीरोइन की बिल्ली बीमार है उसके लिये पूरे देश में प्रार्थना की जा रही है। एक फिल्मी हस्ती के घर के बाहर एक चूहे को दौरा करते देखा गया। एक हीरो ने अपनी बिल्ली का आज नामकरण किया और जोरदार पार्टी रखी। आईये हम आपको सीधे वहां ले चलते हैं। वगैरह... वगैरह........<br />
लोग हंसते हुए कभी कभी रोने भी लगेंगे। हंसेगा कौन मैं, उड़न तश्तरी और श्री शिवकुमार मिश्र और अन्य व्यंग्यकार ब्लाग लेखक। रोएगा कौन? ताकतवर हस्तियों को देखकर उनमें अपने जजबात जोड़ने वालों की संख्या का अनुमान मेरे पास नहीं। </p>
<p>अभी हमारे हिंदी ब्लाग जगत  के सबसे लोकप्रिय ब्लाग लेखक उड़न तश्तरी के समर्थकों ने एक सुपर स्टार का ब्लाग नहीं देखा। नहीं तो उनमें से कई उनसे मूंह फेर लेते और कहते कि अब यह ब्लाग जगत के  सुपर स्टार नहीं है।  उस सुपर स्टार के ब्लाग पर 294 टिप्पणियां तों मैंने देखी थी। उस समय मैं सोच रहा था कि  हमारे हिंदी ब्लाग जगत में शायद अभी तो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जो अपने ब्लाग लेखक मित्रों के अलावा कहीं से इतनी टिप्पणियां  जुटा सके। मेरा दावा कि कई लोगों ने उस ब्लाग को पढ़ा ही नहीं होगा क्योंकि वह अंग्रेजी में था दूसरा उसका विवरण पहले ही अखबारों में छप चुका थां। आखिर मुझे उस समय उड़न तश्तरी जी की याद क्यों आयी? मैं उस अंग्रेजी में लिखने वाले सुपर स्टार के मुकाबले अपने ही मित्र और हिंदी भाषा के सेवक  समीरलाल उड़न तश्तरी को कमतर क्यों बता रहा हूं? इसलिये कि उस ब्लाग को मैं हिंदी-अंग्रेजी टूल से पढ़ रहा था तो मेरे लिए तो हिंदी में ही हुआ न!सच तो यह है कि लोग आकर्षण का जबरदस्त शिकार हैं और वह ऐसे आनंद में खोना चाहते हैं जिसमें उनकी बुद्धि का व्यय न हो। यह मान लिया गया है कि कला और साहित्य में सृजन  भी केवल प्रसिद्ध और शक्तिशाली लोगों से ही चमकता है। पढ़ना समझ में आये या नहीं पर पढ़ने का गौरव हर कोई चाहता है और इसलिय जरूरी है कि कोई बड़ा नाम लिखने वाले से जोड़ा जाये। </p>
<p>आम लोग शायद इसी तरह के खबरें पसंद करते हैं जिसमें कोई बड़ी हस्ती का नाम जुड़ा हो-मीडिया जगत में यही एक विचार है। विद्वान कहते है कि निजी क्षेत्र मांग और पूर्ति के आधार पर कार्य करता है। मुझे लगता है कि कई बार यह सिद्धांत नहीं करता बल्कि  अपनी पूर्ति के लिये मांग बनाता है। अब कई ऐसे तत्व हैं जो हमारी नजर में नहीं आते। समाचार चैनलों पर समाचार तो हैं ही नहीं। मैं घर में सवा (सात, आठ और कभी कभी नौं) के टाईम पर आता हूं। दस पंद्रह मिनट शवासन और ध्यान कर जब टीवी खोलता हूं तो जबरन क्रिकेट की खबरें मेरे सामने होतीं हैं। मुझे नहीं लगता कि क्रिकेट प्रेमियों का टीवी की खबरों में रुचि होती है।  हां हम भी तब ही देखते हैं जब अपना देश जीत जाता है। यहां कोई भी टीम इतनी लोकप्रिय नहीं है जिसके लिये इतना समय बर्बाद किया जाये। मगर निजी टीवी चैनल जबरन खबरें थोपे जा रहे हैं। सरकारी दूरदर्शन आज भी समाचारों की दृष्टि से सवौपरि है-हो सकता है मेरी यह बात कुछ लोगों का बुरी लगे पर जब खबरें देखनी हैं तो वही देखने में मजा आता है। मनोरंजक चैनल हों या समाचार चैनल लोगों को मूर्ख मानकर अपने कार्यक्रम पेश किये जा रहे है। 14 वर्ष की एक लड़की की हत्या और उसके आरोप में उसके पिता की गिरफ्तारी के मामले में इस मीडिया का रवैया संवेदनहीन रहा है। जिस तरह खबर को एक फिल्म की तरह प्रस्तुत किया गया उसके आगे तो कई कहानियां भी फ्लाप है और अगर ऐसे ही खबरे आईं तो फिल्म वालों की भी स्थिति खराब हो जायेंगी। </p>
<p>बहरहाल जब मैंने यह ब्लाग देखा तो तय किया कि आज तो कोई व्यंग्य नहीं लिखेंगे। इससे अधिक हिट तो मिल ही नहीं सकते। हां, अगर यह पाठ पढ़कर हमारे मित्र श्री शिवकुमार मिश्र वहां यह ब्लाग न पढ़ने न चले जायें हो सकता है कि वह भी कहीं ऐसा निर्णय न ले बैठें। तब हम कहां जायेंगे। ऐसी खबरों पर हंस सकते हैं पर अधिक देर तक नहीं और हमें मजबूर होकर उनका ब्लाग तो पढ़ना ही है। अब कुछ दिन तक देखकर ही व्यंग्य लिखेंगे। इतनी मेहनत से  व्यंग्य लिखो और फ्लाप हो जाओं तो क्या फायदा? यकीन मानिए कुछ लोग इस खबर पर यह भी कह रहे होंगे कि ‘भगवान की कृपा हो तो आपका खोया कुत्ता भी वापस आ सकता है। इसलिए भगवान को भजना चाहिए।<br />
<strong>नोट-यहां मैंने अपने कुछ  मित्र ब्लाग लेखकों के नाम उनके प्रति सद्भावना के कारण लिखे है। उनको इंगित करते हुए जो मैंने शब्द लिखें हैं उसका अन्य कोई आशय नहीं है। उससे पाठकों को यह समझाना है कि उनकी बौद्धिक चेतना का हरण किया जाकर उन्हें मूर्ख बनाया जा रहा है। </strong></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[अपनी मूल भाषा में लिखने से पाठ में आती है स्वाभाविक मौलिकता-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=526</link>
<pubDate>Fri, 23 May 2008 16:27:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मेरे विचार से अब हमें यह तय करना चाहिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/1zybp6q.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />मेरे विचार से अब हमें यह तय करना चाहिए कि हम अपनी भाषा के साथ अपना मौलिक जीवन जीना चाहते है या अंग्रेजी के साथ बनावटी रूप रखकर अपने आपको धोखा देना चाहते हैं। मैं हिंदी में कई बरसों से लिखता आया हूं । बीच बीच में मेरे मस्तिष्क में यह विचार आता था कि अंग्रेजी में लिखूं। मैंने शैक्षणिक जीवन मेंे तीन माह तक अंग्रेजी की शिक्षा निजी रूप से एक शिक्षक से प्राप्त की थी। इस कारण अंग्रेजी के  व्याकरण का ज्ञान है इसलिये अगर कठिन शब्द न हों तो मैं अंग्रेजी भी पढ़ लेता हूं। सीखने के बाद ऐसे  हालात नहीं मिले कि मैं अंग्रेजी का अभ्यास करता और फिर हिंदी में ही पढ़ने को बहुत था तो अंग्रेजी के अभ्यास के लिये उससे परे रहने का विचार तक नहीं किया। हां, अंग्रेजी के कई मशहूर उपन्यास हिंदी में अनुवाद होकर छपते थे तो उनको पढ़ लेता था। हिंदी के साथ अंग्रेजी टाइप का ज्ञान मेरे काम आया और मुझे एक अखबार में तब फोटो कंपोजिंग के रूप में कार्य करने का अवसर मिला।<br />
जी हां, जो कंप्यूटर घर घर में पहुंच रहा है उसे  मैंने आत्म निर्भरता के लिये उठाये कदम के रूप में 1982 में कार्य किया था। उस समय विंडो नहीं था। अगर इस पाठ को पढ़ने वाला कोई व्यक्ति  इससे पुराना इस पर काम करने वाला हो तो इस पाठ पर टिप्पणी  जरूर लिखे।  </p>
<p>उस समय  अक्सर लोग कहते थे कि सारा तकनीकी ज्ञान अंग्रेजी में है इसलिये उसका ज्ञान जरूरी है।  उस समय जब कंप्यूटर की किताब हमें पढ़ने के लिऐ दी गयी   वह मेरी समझ में नहीं आयी फिर भी मैं कंप्यूटर सीखा। उस समय मैं कंप्यूटर पर काम करने वाली  लड़कियो या लड़कों  के पास बैठा रहता। मेरे साथ तीन अन्य लोग भी थे और वह भी वहां ऐसे ही प्रशिक्षण ले रहे थे। मैं उनको की बोर्ड पर अक्षरों के अलावा अन्य बटन दबाकर देखता था कि वह उसका क्या उपयोग कर रहे हैं। अक्षरों के साइज, बनावट और अन्य विशेष काम एफ-1 से एफ-300 तक होता था। मतलब सारा काम कीबोर्ड से होता था। हम चारों दूसरों का कम देख नोट बनाते और फिर रात को कमरे पर उसे आपस में बांटते। मात्र एक माह में हम वहां कार्य करने योग्य हो गये थे। मतलब किसी ज्ञान के लिये भाषा नहीं बल्कि आदमी में लगन होना बहुत आवश्यक है। </p>
<p>उसके बाद जब दोबारा कंप्यूटर पर आया तो हिंदी में एक किताब खरीद लाया। मतलब आज तक मुझे अंग्रेजी का पूरा ज्ञान न होने के बावजूद कंप्यूटर पर काम करते देख कोई भी कह सकता है कि अंग्रेजी का महत्व है पर उतना नहीं कि आप आदमी उसके बिना विकास न कर सके। मुझे याद है जब मैं हिंदी टाईप सीख रहा था तब लोग मुझ पर हंसते थे कि देखो सारी दुनियां अंग्रेजी की तरफ जा रही है और यह हिंदी की तरफ जा रहा है। मैंने पहले हिंदी में टाईप मध्यप्रदेश बोर्ड से पास की और फिर अंग्रेजी टाईप सीखी। बेरोजगारी के दिनों में मुझे यह लगता था कि इसका ज्ञान भी होना चाहिए।  हालांकि उसमें अधिक प्रवीणता कभी नहीं रही पर कई बार उसकी अभ्यास कर लेता। जब मैंने अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो मुझे आज भी वह दिन याद आते हैं जब मैंने अपने आपको उन दिनों हिंदी और अंग्रेजी को लेकर अपने को मानसिक अंतद्वंद्व में अनुभव किया था। उस समय कई बार लगता था कि बेकार ही हिंदी में उपन्यास आदि पढ़ने में नष्ट किया इससे अंग्रेजी ही पढ़ लेता। समय के साथ धीरे-धीरे यह भी लगने लगा कि मुख्य बात है अपनी लगन और परिश्रम। हिंदी में लिखने पर जब लोगों से प्रशंसा मिलने लगी तो भी मुझे यही लगता था कि भला इससे क्या होने वाला है?</p>
<p>मैं पिछले दो वर्ष से अंतर्जाल पर लिख रहा हूं। ब्लाग बनाने में मुझे परेशानी आयी पर इसका कारण अंग्रेजी के अज्ञान का अभाव नहीं बल्कि उतावलापन था। जब मैं ब्लाग बना रहा था तब भी यह आत्मविश्वास था कि जब मैं इस पर लिखना शूरू करूंगा तो अपने लिये मित्रों और पाठकों की संख्या बहुत अंिधक  संख्या में जुटा लूंगा। जिस दिन गूगल पर हिंदी में शीर्षक के रूप  में टंकित शब्द  मुझे हिंदी में कुछ दूसरा  नजर आया और फिर उसके हिंदी टूल पर पहला अक्षर टाईप किया तो मैंने अनुभव किया कि हिंदी पूरे विश्व पर भी छा सकती है। आज रोमन से हिंदी में शब्द कर रहा है कल हिंदी को भी अंग्रेजी अनुवाद करने वाला टूल भी आ सकता है। तब हो सकता है कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी में पढ़ा भी जा सके। </p>
<p>उस समय यह केवल एक विचार था पर आज उसे इतनी जल्दी साकार होते देख मुझे आश्चर्य होता है। एक लेखक के रूप में मेरी सफलता या असफलता का मूल्यांकन करने का कोई आधार मेरे पास नहीं है पर इतना तय है कि मुझे अपने हिंदी लेखक होने को लेकर कोई ग्लानि नहीं है। मेरे सारी अंतर्जाल पर हिंदी को लेकर लगाये अनुमार एक के बाद एक साकार होते गये। मेरे से पुराने ब्लाग लेखक यह बता सकते हैं कि मेरा कृतिदेव या देव में लिखे गये हिंदी लेख उनको समझ में न आने पर मुझे किस तरह रोमन लिपि में यूनिकोड टूल से हिंदी लिखने का प्रेरित किया। इन्हीं ब्लाग लेखक मित्रों से ही फिर वापस अपने रास्ते पर आ गया। </p>
<p>अगर मेरे ब्लाग की कुल पोस्टें देखें तो अभी भी नब्बे प्रतिशत के आसपास रोमन लिपि से  टूल के द्वारा हिंदी में परिवर्तित हैं। अभी शायद एक या डेढ़ महीने से ही देव और कृतिदेव का उपयोग कर रहा हूं। यह कथा तो मैं कई बार लिख चुका हूं पर अपनी यह बात बताने के लिये लोगो को यह समझाना जरूरी है कि दोनों के बीच में अंतर क्या है?<br />
सीधे यूनिकोड में लिखने वाले लेखक मेरे बात को अन्यथा न लें और अगर उनको हिंदी टाईप नहीं आती तो वह रास्त भी न बदलें पर यह वास्तविकता है कि कृतिदेव में लिखते हुए जितनी सहयता लगती है उतनी यूनिकोड मेंे नहीं होती। भाषा का भाव से गहरा संबंध हैं। अगर मुझे क लिखना है तो मेरे दिमाग में शूरू से क होना चाहिए। यूनिकोड में पाठ लिखते हुए मस्तिष्क से निकलने वाले विचार में कहीं न कहीं अवरोध अनुभव होता है। मैंने कई बार कई सुधार इसलिये नहीं किये क्योंकि मुझे लगता कि दोबारा मेहनत हो जायेगी। कई बार विचारों का क्रम टूटकर कहीं अन्यत्र जाता दिखा। आज जब कृतिदेव से लिखता हूं तो इतना सहज होकर लिखता हूं कि लगता है कि ब्लाग पर लिखना अभी कुछ दिनों से ही शूरु किया है। </p>
<p>मैं यह नहीं कह रहा कि अंग्रेजी के दिन लद गये हैं बल्कि कहता हूं कि हिंदी के ऐसे  दिन आ रहे है जब उसका लिखा बिना किसी मध्यस्थ के दूसरी भाषाओं को पाठकों द्वारा पढ़ा जायेगा और हिंदी का लेखक जिसे अपने ही लोग सस्ता समझते हैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर सकता है। भाषा केवल भाव संप्रेक्षण के लिये होती है और उसका उपयोग अन्य व्यक्ति से संपर्क करने के लिए है। रोटी के लिए कोई भाषा सीखने का कोई अर्थ नहीं है रोटी अपने आप वह भाषा सिखा देती है जहां से वह आती है। ऐसे एक नहीं सैंकड़ों उदाहरण है जो इस देश से कम पढ़े लिखे लोग विदेश गये और आज फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे हैं। देश के अंग्रेजी जानने वालों को गुस्सा आ सकता है और मैं भी अपने सौ प्रतिशत सही होने का दावा नहीं करता पर मुझे अपने देश और विदेश के अंग्रेजी लेखकों में कुछ गड़बड़ लगती है। मैंने अंग्रेजी के ब्लाग लेखकों के पाठ अनुवाद टूल से हिंदी में किये तो उनको थोड़ी कम कठिनाई से पढ़ा जबकि भारत के अंग्रेजी ब्लाग लेखकों को पाठ पढ़ने और समझने में उससे कहीं अधिक कठिनाई आती है। इसका मतलब यह है कि कहीं न कहीं भारत के अंग्रेजी लेखकों की भाषा में अस्वाभाविकता है।<br />
यह जरूरी नहीं कि सब मेरी बात मानें पर अब अंग्रेजी कोई रोटी दिलाने की गारंटी नहीं देती। अंग्रेजी ब्लाग किस हालत में यह तो उसके ब्लाग लेखक मेरे ब्लाग पर टिप्पणी बता गये हैं। हां, हो सकता है कि हिंदी से रोजी रोटी कमाने की सुविधा पहले से कहीं अधिक  मिल सकती है। आजकल हिंदी शुद्ध लिखने और टाईप करने वालों की कमी है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोजी रोटी कमाने की अनिवार्यता भी समाप्त हो रही है। दूरियां कम हो रहीं है ऐसे में हो सकता है कि विदेशों में लोग भारत के लोगों पर इस बात पर हंसें कि उनकी अंग्रेजी शुद्ध नहीं है। वैसे मैने अपने कुछ पाठ-जिनको सभी शब्द अंग्रेजी टूल से सही कर प्रस्तुत किया था-अंग्रेजी के जानकार मित्र को पढ़ाये उसने कहा कि‘ हां, इसे वैसे ही समझा जा सकता है जैसे तुम चाहते हो।’ </p>
<p>मतलब यह कि मेरा हिंदी में लिखा  अंग्रेजी का कोई पाठक पढ़ सकता है जबकि मैं अंग्रेजी में लिख नहीं पाता। भाषा की दीवा