<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindi-megzine &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-megzine/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-megzine"</description>
	<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 18:33:12 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सौदा होता है सब जगह-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=280</link>
<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 14:59:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=280</guid>
<description><![CDATA[दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>दिन के उजाले में</p>
<p>लगता है बाजार</p>
<p>कहीं शय तो कहीं आदमी</p>
<p>बिक जाता है</p>
<p>पैसा हो जेब में तो</p>
<p>आदमी ही खरीददार हो जाता है</p>
<p>चारों तरफ फैला शोर</p>
<p>कोई किसकी सुन पाता है</p>
<p>कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर</p>
<p>कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है</p>
<p>भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख</p>
<p>सौदे में अपना देखता अपना अस्त्तिव</p>
<p>भ्रम से भला कौन मुक्त हो पाता है</p>
<p>रात की खामोशी में भी डरता है</p>
<p>वह आदमी जो</p>
<p>दिन में बिकता है</p>
<p>या खरीदकर आता है सौदे में किसी का ईमान</p>
<p>दिन के दृश्य रात को भी सताते हैं</p>
<p>अपने पाप से रंगे हाथ</p>
<p>अंधेरे में भी चमकते नजर आते है</p>
<p>मयस्सर होती है जिंदगी उन्हीं को</p>
<p>जो न खरीददार हैं न बिकाऊ</p>
<p>सौदे से पर आजाद होकर जीना</p>
<p>जिसके नसीब में है</p>
<p>वह जिंदगी का मतलब समझ पाता है<br />
................................<br />
दीपक भारतदीप </strong></div>
<p>hasya kavita, mastram, कविता, मस्तराम, मस्ती, व्यंग्य, शब्द, शेर</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरी नजर में आयी सामने असलियत-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=496</link>
<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 14:41:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=496</guid>
<description><![CDATA[लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला
वह लड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला<br />
वह लड़का शहर की फुटपाथ<br />
पर चला जा रहा था<br />
सामने एक सुंदर गौरवर्ण लडकी<br />
चली आ रही थी<br />
यह सड़क बायें थी वह दायें था<br />
पास आते ही दोनों के कंधे टकराये<br />
पहली नजर में दोनों एक दूसरे को भाये<br />
दृश्य फिल्म का हो गया<br />
दोनों को ही इसका इल्म हो गया<br />
लड़की चल पड़ी उसके साथ<br />
अब वह बायें से दायें चलने लगी</p>
<p>चलते चलते बरसात भारी हो गयी<br />
सड़क अब नहर जैसी नजर आने लगी<br />
लड़की ने कहा-<br />
‘यह क्या हुआ<br />
यह कैसी मेरी और तुम्हारी इश्क की डील हुई<br />
जिस सड़क से निकली थी<br />
वह डल झील हो गयी<br />
पर मैं तो चल रही थी बायें ओर<br />
दायें कैसे चलने लगी<br />
तुम अब पलट कर मेरे साथ बायें चलो’<br />
ऐसा कहकर वह पलटने लगी </p>
<p>लड़के ने कहा<br />
‘मेरे घर में अंधेरा है<br />
एक ही बल्ब था फुक गया है<br />
खरीद कर जा रहा हूं<br />
मां बीमार है उसके लिये<br />
दवायें भी ले जानी है<br />
यह तो पहली नजर का प्यार था<br />
जो शिकार हो गया<br />
वरना तो दुनियां भर की<br />
मुसीबतें मेरे ही पीछे लगी<br />
तुम जाओ बायें रास्ते<br />
मैं तो दाएं ही जाऊंगा<br />
अब नहीं करूंगा दिल्लगी’</p>
<p>लड़की ने कहा<br />
‘तो तुम भी मेरी तरह फुक्कड़ हो<br />
तुम्हारे कपड़े देखकर<br />
मुझे गलतफहमी हो गयी थी<br />
जो पहली नजर के प्यार का<br />
सजाया था सपना<br />
दूसरी नजर में तुम्हारी सामने आयी असलियत<br />
वह न रहा अपना<br />
इसलिये यह पहले नजर के प्यार की डील<br />
करती हूं कैंसिल’<br />
ऐसा कहकर वह फिर बायें चलने लगी।<br />
----------------------<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आखिर महादानव क्यों बना रहे हो भई-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 08:25:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=176</guid>
<description><![CDATA[वैसे तो पश्चिम के लोग पूर्व के लोगों क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे तो पश्चिम के लोग पूर्व के लोगों की खूब मजाक उड़ाते हैं कि वह शैतान और सर्वशक्तिमान के स्वरूपों की काल्पनिक व्याख्याओं में ही खोऐ रहते हैं पर स्वयं तो सचमुच में शैतान बनाते हैं जो कहीं न कहीं विध्वंस पैदा करता है,अलबत्ता ऐसा कोई सर्वशक्तिमान नहीं बना सके जो जीवन की धारा को सतत प्रवाहित करता हो।</p>
<p>अभी कहीं उन्होंनें कोई महामशीन बनाई है जिससे वह ब्रह्माण्ड की रचना का रहस्य जान सकें। पश्चिम के कुछ वैज्ञनिकों ने इसे बनाया है तो कुछ कह रहे हैं कि अगर यह प्रयोग विफल रहा तो पूरी धरती नष्ट हों जायेगी। इसको कहीं अदालत में चुनौती भी दी गयी है।  अब सवाल यह है कि आखिर उन्हें इस ब्रह्माण्छ के रहस्य जानने की जरूरत क्या पड़ी। आखिर वह शैतान फिर क्यों बुलाया लिया जिसे पूर्व के लोग रोज भगाने के लिये सर्वशक्तिमान को याद करते हैं।  </p>
<p>भारतीय दर्शन को जानने वाला हर आदमी इस ब्रह्माण्ड का रहस्य जानता है। यह सब  मिथ्या है-यहां हर आदमी बता देगा। दृष्टिगोचर विश्व तो माया का ऐसा रूप है जो समय के साथ बनता बिगड़ता है।   कुछ है ही नहीं फिर उसका रहस्य क्या जानना।  अरे, अगर यह पश्चिम के लोग अगर अंग्रेजी की बजाय हिंदी पढ़ते तो जान जाते कि ब्रह्माण्ड में कुछ है ही नहीं तो रहस्य किस बात का जान रहे हैं।<br />
यह जगत सत्य और माया दो में ही व्याप्त है। जो माया नश्वर है वह बढ़ती जाती है और फिर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वह फिर प्रकट होती है पर उसमें सत्य की सांसें होती हैं।  सत्य का कोई स्वरूप है ही नहीं जिसे देखा जा सके। </p>
<p>भारतीय पुरातन ग्रथों में इसका वर्णन हैं उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस दुनिया के विस्तार में इस तरह की कहानी रही होगी। जिसे हम अपने शब्दों में इस तरह व्यक्त कर सकते हैं।   सत्य कई बरसों तक पड़ा रहा। न हिला न डुला न चला बस उसे आभास था कि वह है।  उसके पांच तत्व निष्क्रिय पड़े हुए थे-आकाश,जल,प्रथ्वी,अग्नि और वायु। यह छोटे कणों के रूप में पड़े हुए थे।  सत्य को पता नहीं यह भ्रम हो गया कि वह स्वयं ही असत्य है सो परीक्षण करने के लिये इन तत्वों में प्रवेश कर गया। उसके प्रवेश करते ही इन तत्वों में  प्राण आ गये और वह बृहद आकार लेने लगे। सत्य को भी इने गुण प्राप्त हुए। उसे आंख,कान,नाक तथा देह का आभास होने लगा। वह बाहर निकला पर यह सभी तत्व बृहद रूप लेते गये। सत्य को हैरानी हुई उसने ध्यान लगाया तो माया प्रकट हो गयी। उसने बताया कि उसके अंश इन तत्वों में रह गये हैं और वह अब इस सृष्टि का निर्माण करेंगे जहां वह विचरण करेगी। सत्य सोच में पड़ गया पर उसने यह सोचकर तसल्ली कर ली कि माया का कोई स्वरूप तो है नहीं उसके जो अंश इन तत्वों में रह गये हैं वह कभी न कभी उसके पास वापस आयेंगे।<br />
माया मुस्करा रही थी तो सत्य ने पूछा-‘आखिर तुम में भी प्राण आ गये।<br />
उसने कहा-‘मुझे बरसों से इसी बात की प्रतीक्षा थी कि कब तुम इन तत्वों में प्रवेश करो और मैं आकार लेकर इस संसार में विचरण करूं।’<br />
सत्य ने कहा-‘तो क्या? यह तो मेरे अंश हैं। मैं चाहे इन्हें खींच लूंगा।’<br />
माया ने कहा-‘पर जब तक मेरी शक्ति से बंधे हैं वह तुम्हारे पास नहीं आयेंगे पर जब उससे बाहर होंगे तो तुम्हारे पास आयेंगे।’<br />
सत्य सोच में पड़ गया। उसने देखा कि धीरे धीरे अन्य जीव भी प्रकट होते जा रहे हैं। इनमें कई छटपटा रहे थे कि वह सत्य के अंश हैं और वहां से बिछड़ गये हैं तो कुछ इस बात से खुश थे कि वह अपनी इंद्रियों का पूरा आनंद उठा रहे हैं।’<br />
कई जीव सत्य का स्मरण करते थे तो सत्य की उनकी दृष्टि जाती थी और जो नहीं करते उन पर भी उसका ध्यान था। इस तरह यह सृष्टि चल पड़ी। माया तो प्रकट थी पर उसमें शक्ति अपनी नहीं थी इसलिये वह रूप बदलती रही पर सत्य का स्वरूप नहीं है इसलिये वह स्थिर है।’ सत्य ने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया। </p>
<p>देवता और दानव दोनों ही इस संसार में विचरण करते हैं पर माया सभी को भाती है।  जिन पर माया की अधिक कृपा हो जाती है वह बेकाबू हो जाते हैं और दानवत्व को प्राप्त होते हैं।  पश्चिम के लोगों के पास अनाप शनाप धन है और इसलिये वह इस ब्रह््माण्ड का रहस्य जानने के लिये उतावले हैं और एक ऐसा दानव खड़ा कर रहे हैं जो अगर फैल गया तो इस धरती पर कोई देवता उसे बचाने वाला नहीं है।<br />
रहस्य जानना है। अरे भाई, हमारे पौराणिक ग्रंथ ले जाओ सब सामने आयेगा। पश्चिम के वैज्ञानिक जीवन के लिये जो आधार आज बता रहे हैं उसे हमारे ग्रंथ पहले ही बता चुके हैं कि आकाश, प्रथ्वी,र्अिग्न,जल और वायु के संयोग से ही जीवन बन सकता है पर उसे पढ़ा ही नहीं अरबों डालर खर्च कर जो निष्कर्ष निकाला वहा हमारे विशेषज्ञ पहले ही निकाल चुके हैं। पेड़ पोधों में जीवन होता है यह कोई आज की खोज नहीं है बरसों पहले की है, पर पश्चिम के लोग ऐसी खोजों को बताकर अपना नाम कर लेते है। परमाणु बम बनाया तो उसका क्या नतीजा रहा। आजकल कई देश बना रहे हैं और पश्चिम के लोग उनको रेाकने का प्रयास कर रहे हैं। नये नये हथियार बनाते हैं और इधर शांति का प्रयास भी करते दिखते हैं। </p>
<p>बहरहला दानव को खड़ा कर वह जिस सत्य को ढूंढ रहे हैं वह तो अस्तित्व हीन है। वहां क्या है? हमसे पूछो। जहां तक दिख रहा है माया है और जहां दिखना बंद हो जाये समझ लो सत्य है। इसके लिये पूरी दुनियां का व्यर्थ ही खतरे में क्यों डालते हो।<br />
-------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://shablekh.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</a></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या सामान्य ब्लाग लेखकों का कोई धणीसांईं नहीं हैं-संपादकीय]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=275</link>
<pubDate>Sun, 31 Aug 2008 07:52:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=275</guid>
<description><![CDATA[आज यह ब्लाग बीस हजार की पाठक संख्या पा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज यह ब्लाग बीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह संख्या पार करने वाला यह चैथा ब्लाग है। अगर वर्डप्रेस के ब्लागों की कुल संख्या को ही देखा जाये तो वह 135000 के करीब है और मेरा मानना है कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग भी करीब 40-50 हजार के पाठक तो जुटा ही चुके होंगे-उस पर मैंने काउंटर देर से ही लगाया था और वर्तमान में ही उन पर 30 हजार पाठक संख्या का आंकड़ा दर्ज है जो छहः महीने से अधिक का नहीं है। </p>
<p>एक बात तय है कि वर्डप्रेस के ब्लाग ब्लागस्पाट के ब्लागों से अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिये यहां लिखते रहने को मन सदैव तत्पर रहता है। इस ब्लाग से जो आत्म विश्वास मिलता है वह नया लिखने को प्रेरित करता है।<br />
हां, आज मुझे इस हिंदी ब्लाग जगत के एक मित्र उन्मुक्त जी का नाम लेने का मन है। अक्सर वह ऐसे मौके पर टिप्पणी करते हैं जब प्रसन्न्ता का अवसर होता है। अभी जब मैंने एक पाठ पर कुछ  ब्लागरो द्वारा पैसे लेकर लिखने का मामला उठाया था तो उन्होंने बताया कि उनको कोई पैसा नहीं मिलता वह तो अपने विचार लोगों तक पहंुंचाने के लिये लिखते हैं।</p>
<p>उन्मुक्त जी के पाठ ही यह बता देते हैं कि उनका यह काम निष्काम भाव से किया जा रहा है और यही कारण है कि उनके लिये मेरे मन में मैत्रीभाव है  वह यह भी कहते हैं कि आप तो लिखते रहें किसी की परवाह न करें। यह तो मैं करता हूं पर कुछ मामले ऐसे मेरे सामने आ रहे हैं जो मेरे अंदर ब्लाग लेखकों के हितों की रक्षा का प्रश्न उठा देते हैं।<br />
आज ही एक वेबवाइट@ब्लाग प्रकट हुआ है जहां मेरा ब्लाग लिंक हो गया है।  उसे चोरी कहें या चालाकी! चोरी कहना इसलिये ठीक नहीं होगा क्योकि<br />
1.वहां ब्लाग में पाठ के नीचे जो मैं अपने लिंक लगाता हूं वह दिखाई दे रहे हैं।<br />
2.ब्लाग का नाम दिखाई नहीं दे रहा पर लेखक के रूप में मेरा नाम दिखाई दे रहा है।<br />
3.मैं एक टैग नहीं लगाता तो यह ब्लाग वहां नहीं जाता।<br />
यह चालाकी है<br />
1.उसने वर्डप्रेस के टैग को इस तरह सैट कर दिया है कि जिस ब्लाग पर वह टैग होगा वहां चला जायेगा।<br />
2.उस पर विज्ञापन है और वहां किसी का मौलिक लेखन नहीं है।<br />
3.वह आराम से बैठकर कमाने के लिये बनाया गया है।</p>
<p>एक प्रश्न मेरे दिमाग में आया था कि आखिर एक ब्लागर ने वर्डप्रेस के ब्लाग पर ही अंसबद्ध टैग लगाने का मामला क्यों उठाया? कुछ लोगों का अगर यह लग रहा है कि यह उनके और मेरी बीच का मामला है तो वह गलती कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि कोई दो व्यवसायिक गुट सक्रिय हैं और यह द्वंद्व उनके बीच का है। इन दोनों गुटों का नेतृत्व करने वाले लिखना नहीं जानते इसलिये ब्लागरों से ही लिखवा रहे हैं और यह द्वंद्व ब्लाग जगत का लग रहा है। इन गुटों को रहस्य इसलिये पूरी तरह यहां उजागर नहीं हो पा रहा क्योंकि वह एक दूसरे के विरुद्ध वहीं तक ही हमले करवा रहे हैं जहां तक उनका स्वयं का व्यवसायिक अस्तित्व समाप्त न हो । एक दूसरे के अस्तित्व की पोल वह नहीं खोल रहे।<br />
जिस दिन मेरे ब्लाग पर असंबद्ध  टैग लगाने की की आलोचना करता हुआ पाठ आया तो उसके प्रतिवाद स्वरूप मैंने भी लिखा। दोनों के पाठ हिट हो गये। उसी शाम एक ब्लागर का एक ब्लाग भी आया जिसमें इस बात का उल्लेख था कि वर्डप्रेस के टैगों के सहारे कुछ वेबसाइटें अपना काम चला रही हैं। उसने यह भी बताया कि ब्लागसपाट के लेबल उस तरह ब्लाग को नहीं ले जाते जैसे वर्डप्रेस के।  पहले मुझे लगा कि वह मेरे आलोचक ब्लागर के समर्थन में लिखा गया है पर आज लग रहा है कि ऐसा लिखने वाला ब्लागर  ऐसे किसी गुट का जानता है पर उसका रहस्य उसने नहीं खोला? पक्का नहीं कह सकता पर ऐसा लगता है कि वह दूसरे गुट के  प्रतिनिधि के रूप में ही उसका पाठ लग रहा था। </p>
<p>मुख्य बात यह है कि हिंदी ब्लाग जगत का धणीसांईं कौन है? हिंदी ब्लाग जगत के कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल हिंदी टैग लगाने की वकालत करते हैं और दूसरे वह हैं जो पाठक संख्या बढ़ाने के लिये अंग्रेजी टैग की वकालत करते हैं। सच कोई क्यों नही बताता? क्या इन व्यवसायिक गुटो के सदस्य ही ब्लाग लिख रहे हैं और हम जैसे कुछ शौकिया लोग उनके लिये भीड़ की भेड़ की तरह हैं। </p>
<p>मेरा लक्ष्य साफ है। मुझे पैसा मिले या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं हैं पर आम ब्लाग लेखक के हित और आत्मसम्मान की रक्षा होना चाहिये।   मैं चाहता हूं कि यह कुछ लोगों के लिये रोजगार का अवसर बने। ऐसा न हो कि उन बिचारों को बुलाकर लिखवाया जाये और फिर वह बोर होकर छोड़ जायें तो दूसरे आयें। इस देश में लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे और ऐसे में व्यवसायिक गुटों का काम चलता रहेगा। क्या व्यवसायिक कौशल ने अनजान लेखकों को ऐसे ही घसीट कर काम चलाया जायेगा।  इससे लिखा जरूर जायेगा पर अंतर्जाल पर हिंदी को वह सम्मान नहीं मिल पायेगा जिसकी आशा कुछ लोग कर रहे हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि गूगल का एडसेंस खाता केवल डोमेन बिकवाने के लिये बनाया गया है। क्या ऐसे इंतजाम किये गये हैं कि जो डोमेन पर पैसा खर्च न करे उसे एक भी पैसा कमाने का अवसर न मिले। ‘डोमेन माफिया’वह शब्द है जो वर्डप्रेस पर लिखने वाले एक ब्लागर ने उपयोग किया था। क्या यह डोमेन माफिया और ब्लागर माफिया मिलकर यहां इसी तरह कमाने की योजना बना चुके हैं?’<br />
सच बात तो यह है कि इस विषय में मैं जो पाठ लिखता हूं वह किसी को पढ़ाने के लिये नहीं बल्कि उन रहस्यों को पढ़ने के लिये करता हूं जो छिपाये जा रहे हैं। सच तो यह है कि बहुत मन करता है कि अच्छे पाठ लिखूं पर समयाभाव के कारण छोटी रचनायें लिखता हूं क्योंकि यहां चोरी चकारी के डर तो है ही दादागिरी से भी जूझना है। आखिर कोई मुझसे पूछे बगैर मेरे ब्लाग लिंक कर सकता है? यह डोमेन वालों के साथ क्यों नहीं है। लोग यह क्यों कहते हैं कि अपने ब्लाग की सुरक्षा  के लिये डोमेन लो। अगर कोई ब्लाग लेखक नहीं चाहता कि उसका ब्लाग लिंक हो तो क्या कोई जबरदस्ती लिंक कर सकता है? इस दादागिरी से मुकाबला करने का कोई उपाय तो होगा? क्या अधिक टैगों का विरोध करने वाले अपने प्रतिद्वंदी गुट के हाथ मेरे पाठ जाने से बचाना चाहते हैं? ब्लागरों के हितों की रक्षा पर कानूनविदों को के विषय में अवश्य सोचना चाहिए।</p>
<p>जहां तक टैग विवाद पर मेरे द्वारा लिखे गये पाठों की बात है। मुझे आश्चर्य इस बात का है कि किसी ने मेरी बात का खंडन नहीं किया। इससे यह तो लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी के लेखकों के शोषण की पूरी तैयारी की है और लिखने  से अधिक चाटुकारिता में ही आर्थिक फायदा मिलता नजर आ रहा है। ऐसे में उन्मुक्त जी जैसे ब्लाग लेखकों से सहारे की आशा की जा सकती है। डोमेन और ब्लाग माफिया मेरे द्वारा लिये जा रहे शब्द नहीं है यह उन्हीं ब्लागरों ने लिखे हैं जो शायद अपने से हुई किसी बेईमानी से क्षुब्ध थे। यह अलग बात है कि उन्होंने अपने नाम छिपाये।  अभी तक छद्म नाम से ही लोग लिखते जा रहे हैं। ऐसे में असली नाम से लिखने वालों को भ्रम तो रहता ही है। कभी कभी रौद्र रूप से लिखने के लिये मुझे इसलिये भी तैयार रहना पड़ता है क्योंकि लोग अपने को सम्मनित कराने के लिये मेरे ब्लाग को नीचा दिखाना चाहते हैं। दीपक भारतदीप को दो कुछ नहीं पर उसे ऐसे खेल में पराजित दिखाओं जो वह खेला ही नहीं। उनके इन्हीं प्रयासोंं को नाकाम करने की ताकत मेरे शब्दों में है जो मैंने अपने गुरूओं से प्राप्त की है और अब उन्मुक्त जी जैसे मित्रों के विश्वास के सहारे लिख रहा हूं।<br />
अभी बस इतना ही। ऐसे अवसर पर अपने साथ ब्लाग मित्रों और पाठकों का आभारी हूं। आशा करता हूं कि आम ब्लाग लेखकों के हितों की रक्षा में उनका यही प्यार काम आयेगा। वही मेरे धणीसांईं हैं।</p>
<p>क्या सामान्य ब्लाग लेखकों का कोई धणीसांईं नहीं हैं-संपादकीय</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पाठक संख्या बीस हजार पार करने की पूर्व संध्या पर कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=272</link>
<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 16:58:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=272</guid>
<description><![CDATA[मैं अंतर्जाल को एक मायाजाल ही मानता हू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं अंतर्जाल को एक मायाजाल ही मानता हूं। इसमें मेरे अनुभव अजीब तरह के हैं। अनेक लोग मुझसे मेरे बारे में जानना चाहते हैं पर मेरी दिलचस्पी केवल अपने शब्द लेखन तक ही सीमित है। कल मेरा यह ब्लाग बीस हजार की पाठक संख्या पार कर सकता है। दरअसल लोगों का प्यार इतना है कि मैं लिखता चला जाता हूं। कभी कभी मैं हिंदी ब्लाग जगत के विषय पर लिखता हूं तो पाठक कहते हैं कि आप तो अपनी बात लिखते रहें। जिस गति से यह ब्लाग बढ़ रहा है मुझे लगता है कि यह हिंदी पत्रिका की तरह हिट हो जायेगा। यह दोनों ब्लाग मैं बहुत लापरवाह होकर मनमर्जी से लिखता हूं। कमाल है जिन ब्लाग पर मैंने परवाह कर लिखा वह उतने हिट नहीं ले पाये जितना इन दोनों ने लिया। आज दरअसल इस पर मैं एक व्यंग्य लिखना चाहता था पर उसे शब्द ज्ञान पत्रिका पर प्रयोग के लिये डाल दिया। </p>
<p>वर्डप्रेस के ब्लाग पर अधिक टैग और श्रेणियां बनाने की सुविधा है इसलिये यहां पाठक के पास पहुंचने का व्यापक दायरा हो जाता है। एक तरह से इस पर लिखना अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर होना है, पर अंततः आपको लिखना तो अच्छा पड़ता ही है। आज पूर्व संध्या पर पंक्तियां लिखने का मन है।<br />
---------------<br />
पीड़ाओं को अपनी पीकर<br />
हंसने की कोशिश करना<br />
कठिन होता है<br />
कोई विरला ही सिद्ध ऐसा होता है<br />
जीवन का अर्थ भी समझना चाहिए</p>
<p>कहें दीपक बापू<br />
हमने कभी कोशिश नहीं की<br />
दूसरे का घाव उभारने की<br />
अपने लिये झूठा दाव जुटाने की<br />
जीत कभी नहीं<br />
पर हार भी कभी नहीं मानी<br />
तीर उड़ाये हवा में ताकि किसी को लगे नहीं<br />
लग गये तो अपनी गलती मानी<br />
हम तो है दिल के मरीज<br />
कब छोड़ जायें यह दुनियां<br />
क्या करना किसी से बैर<br />
भगवान करे सब की खैर<br />
दोस्त सभी को बनायें<br />
दुश्मनी का भाव किसी के लिये नहीं रखना चाहिए।<br />
...................................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःक्षमाशील क्रोध रोककर अभद्रता करने वाले को नष्ट कर डालता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=228</link>
<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 01:28:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=228</guid>
<description><![CDATA[1.दूसरों के अभद्र शब्द  सुनकर भी स्वयं उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.दूसरों के अभद्र शब्द  सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतमीजी करने  वाले को नष्ट कर  और उसके पुण्य भी स्वयं प्राप्त कर लेता है।<br />
2.दूसरों से न तो अपशब्द कहे न किसी का अपमान करें, मित्रों से विरोध तथा नीच पुरुषों की सेवा न करें।सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करं।<br />
3.इस जगत में रूखी या शुष्क वाणी,  बोलने वाले मनुष्य के ही मर्मस्थान हड्डी तथा प्राणों को दग्ध करती रहती है। इस कारण धर्मप्रिय लोग जलाने वाली रूखी वाणी का उपयोग कतई न करें।<br />
4.जिसकी वाणी रूखी और शुष्क है, स्वभाव कठोर होने के साथ ही वह जो दूसरों को मर्म कटु वचन बोलकर दूसरों के मन पर आघात और मजाक उड़ाकर पीड़ा पहुंचाता है वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने साथ दरिद्रता और मृत्यु को बांधे घूम रहा है।<br />
5.कोई मनुष्य आग और सूर्य के समान दग्ध करने वाले तीखे वाग्बाणों से बहुत चोट पहुंचाए तो  विद्वान व्यक्ति को चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी यह समझना  कि बोलने वाला  अपने ही पुण्यों को नष्ट कर रहा है।</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अकेलापन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</link>
<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 16:43:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</guid>
<description><![CDATA[

जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>
<div align="center">
जब याद आती है अकेले में किसी की<br />
खत्म हो जाता है एकांत<br />
जिन्हें भूलने की कोशिश करो<br />
उतना ही मन होता क्लांत<br />
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन<br />
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन<br />
पर अकेलेपन की चाहत में<br />
बैठे होते उसका आनंद<br />
जब किसी का चेहरा मन में घुमड़ता<br />
हो जाता अशांत</p>
<p>अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये<br />
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये<br />
आंखे बंद कर लेता हूं<br />
बहुत कोशिश करता हूं<br />
मन की आंखें बंद करने की<br />
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा<br />
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत पैदा<br />
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत<br />
.................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तीस हजार की सफलता पर सभी का आभार ज्ञापन-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=494</link>
<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 16:10:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=494</guid>
<description><![CDATA[        सुनने में आ रहा है कि मनोरंजन के आधा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        सुनने में आ रहा है कि मनोरंजन के आधार पर वेबसाइटों को पुरस्कार की बात चल रही है। आज शाम को ईमेल खोलते ही पाडकास्ट का जाने क्या मेरे सामने आया और मेरा हाथ क्रास पर चला गया और वह हाथ से निकल गया।  सुबह एक ब्लाग पढ़ा था उसमें भी उसकी चर्चा भी थी और एक  ब्लाग में मेरी एक कविता का लिंक भी था जिसमें उसके शीर्षक के साथ एक किलो का टैग लगाने की शिकायत भी दर्ज थी।<br />
दरअसल इस पाठ के तीस हजार पाठक संख्या पार करने पर कल कविता लिख कर मैंने गलती की थी। आज यह संपादकीय लिखने का मन ही नहीं कर रहा था  क्योंकि हम कोई व्यवसायिक लोग तो हैं नहीं कि लिखना जरूरी है। इसका एक पैसा मिलता नहीं बल्कि गांठ से इंटरनेट कनेक्शन का पैसा और जाता है। हां, अपने गुरूजी के आदेशानुसार जो तस्वीर दिखाई जा रही है उसके पीछे देखने का प्रयास कर रहा हूं। अब समझ में आ गया है कि क्यों ब्लाग लेखकों को एक मजदूर समझा जा रहा है। दरअसल यह गलत फहमी बाहर फैली हुई है कि हिंदी के सभी ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं। हिंदी के चार नियमित फोरमों के अलावा अनेक वेबसाइटों ने हमारे ब्लाग अपने यहां लिंक कर रखे हैं।  यह वेब साइटें दूसरी वेबसाईटों को लिंक नहीं करतीं क्योंकि शिकायत करने पर उनके डोमेन छिनने का खतरा रहता है पर ब्लाग को चाहे जैसे लिंक करतीं हैं। इनके साथ लिंक देख कर लोग यह समझते हैं कि उसी वेबसाइट के लिये यह लिखा गया हैं। अभी आम लोगों में यह समझ नहीं है कि यह ब्लाग एक स्वतंत्र लेखक का है। कुछ ब्लाग लेखक पैसा लेकर लिख रहे हैं पर अधिकांश तो फ्री में लिख रहे हैं। जिन्होंने डोमेन लिया है उनमें में भी सक्रिय लोगों ने  कमाया है वह भी इतना नहीं कि वह उससे अपने परिवार का खर्चा चला सकें।</p>
<p>ऐसा प्रचार हो रहा है कि ब्लाग लेखक तो फ्री में ब्लाग लिख रहे हैं और हालत यह है कि उनको एक मजदूर की तरह देखा जा रहा है। नारद के एक कर्णधार ने कहा लिखा था कि वेबसाइटों को ब्लाग नहीं माना जा सकता है पर हालत यह है कि अब वेबसाईटों को ही ब्लाग कहकर प्रचारित किया जा रहा है।<br />
बहरहाल इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प यादें हैं। मैंने यूनिकोड में सबसे पहले इसी ब्लाग पर क्षणिका लिखी थी और उस पर पहली टिप्पणी मिली थी। दूसरे ब्लाग पर नारद के लिये जद्दोजहद चल रही थी। एक महिला ने दूसरे ब्लाग पर टिप्पणी लिखते हुए पूछा था कि मैं किस फोंट में लिख रहा था-सामान्य देव फोंट में होने के कारण वह उसके पढ़ने में नहीं आ रहा था। मैंने उसे सामान्य हिंदी फोंट में जवाब भेजा तो रोमन में उसने यही सवाल किया। तब मैंने रोमन में ही उसे अपने इसी ब्लाग का पता दिया, पर इसी बीच उसने एक सवाल किया था ‘आप एक पोस्ट लिखने का कितना पैसा लेते हैं।’<br />
मैंने जवाब दिया कि मेरे एक पोस्ट की कीमत दो हजार रुपये है पर मित्रों के लिये यह काम मैं फ्री में कर देता हूं। आप तो यह बताईये करना क्या है? इसी बीच उसका जवाब आया कि ‘वाह, आपका यह ब्लाग तो पढ़ने में आ रहा है।’<br />
मैंने उसे दूसरा ईमेल किया कि वह क्या चाहती है? पर वह फिर नहीं आयी। बात आयी गयी खत्म हो गयी, पर पिछले कुछ दिनों से हुए वाक्यात ये यह लगने लगा है कि कुछ ब्लाग लेखकों को वाकई पैसे देकर लिखवाया जा रहा है। हम छोटे शहर के हैं इसलिये कोई इस बारे में दांवपैंच नहीं जानते इसलिये फ्री में ही लिखे जा रहे हैं।  पर कोई बात नहीं! मुख्य विषय लिखना है और उससे भी बड़ा मजा स्वतंत्र लेखन में है। जहां आपको विज्ञापन और धन का विचार आता है वहां गुलाम बनकर रह जाते हैं। मैं पत्रकार रह चुका हूं और सारे छलकपटों के बारे में जानता हूं। पर मेरे संस्कार ऐसे हैं कि मैं स्वयं कर नहीं सकता यही कारण है कि पत्रकारिता जगत से बाहर आ गया। चालाकियों को समझने के लिये अधिक समय नहीं लगता।  लिखना मेरा जीवन है इसलिये लिखता हूं-प्रतिदिन आठ सौ पाठ पढ़े जा रहे हैं। हो सकता है कि इसमें कोई धोखा हो पर परवाह किसे है?</p>
<p>यह ब्लाग वर्डप्रेस पर है और इस पर लिखने का मतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर होना। यहां फोरमों से अधिक हिट बाहर से आते हैं। ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये हिंदी फोरमों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।  मेरे वर्डप्रेस के तीन ब्लाग हिंदी के सबसे लोकप्रिय फोरम ब्लागवाणी पर नहीं है पर उन पर भी जमकर पाठक आते हैं। हिंदी फोरमों पर यह ब्लाग आते हैं और वहां मेरे मित्र बन गये हैं इसलिये वहां भी जितना समय मिलता है सक्रिय रहता हूं। वहां से अधिक पाठकों की अपेक्षा तो मैं नहीं करता क्योंकि मेरा लक्ष्य आम पाठक तक पहुंचना है। मेरी सबसे बड़ी ताकत ब्लाग मित्र और मेरे पाठक हैंं। यह और ईपत्रिका मेरे प्रारंभ से ही हिट ब्लाग हैं। इसका कारण यह रहा है कि इनको फोरमों पर बाद में ले गया और लिखना पहले ही शुरू कर चुका था। तीस हजार पाठक संख्या पार कर इस ब्लाग ने अपनी ताकत मुझे बता दी और यही मैं ब्लाग मित्रों और पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। यह ब्लाग आगे चलकर अनेक वेबसाईटों को चुनौती देने वाला है यही कारण कि आलोचक विचलित होकर अनेक ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जो बेसिर पैर के हैं। शेष फिर कभी। सभी पाठकों और ब्लाग लेखकों का इस अवसर पर आभार ज्ञापित करता हूं और आगे आने वाले संभावित संघर्षों मेंें उनसे सहयोग की अपेक्षा करता हूं। आलोचकों से मेरा साफ कहना है कि आप मेरे लिये कोई आर्थिक मदद का स्त्रोत निर्माण करें फिर मुझे लिखना सिखाये। फोकट में खोपड़ी खाने की आवश्यकता नहीं।  आगे चलकर टैग की संख्या हजार भी कर सकता हूं क्योंकि भई हम कोई व्यवसायिक ब्लागर थोड़े ही है।  बिना धनार्जन के भला कोई व्यवसाय होता है। </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पत्रिका की पाठक संख्या तीस हजार पार करने की पूर्व संध्या पर छंटाक भर कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=491</link>
<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 18:01:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=491</guid>
<description><![CDATA[        मुझे पाठकों ने अवसर ही नहीं दिया। य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        मुझे पाठकों ने अवसर ही नहीं दिया। यह कविता मैंने इसकी पाठक संख्या तीस हजार पार करने के पूर्व संध्या पर लिखी थी। इससे पहले कि  इसे लिख पाता बिजली चली गयी। उसके बाद  घर से बाहर चला गया और बिजली आयी तो पता लगा कि यह ब्लाग तीस हजार की संख्या को पार कर गया। अब रात हो गयी है इसलिये विशेष संपादकीय लिखना तो संभव नहीं है पर जो कविता लिखी थी। वही लिख रहा हूं। विशेष संपादकीय कल लिखूंगा क्योंकि उसमें बहुत कुछ कहना है।</p>
<p><strong>गुरू ने चलायमान शिखर पर बैठाकर<br />
अपने यहां से धकियाया<br />
उससे उतरना नहीं सिखाया<br />
सो चल पड़े जिंदगी के मैदान में<br />
नीचे आना  हमें उससे याद भी नहीं आया<br />
ऐसे में कौन हमें अपने साथ शिखर पर बैठाता<br />
या हमारे लिये कोई दूसरा सजाता<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
कोई उधारी का लिये बैठा था<br />
तो कोई लूट के बैठा था<br />
ऊंचे से हमसे उनके शिखर<br />
स्टील के साथ हाड़मांस के बने<br />
चमचों से सजे थे उनके घर<br />
कौन हमें अपने शिखर से उतर कर<br />
आने का प्रस्ताव सुनाता </p>
<p>पैसा लिखकर लिखते हैं<br />
चंद किताबें पढ़कर लिखना सीख गये<br />
तो जमकर रचते हैं पाठ<br />
भले ही हों उनके कितने भी ठाठ<br />
पर आजादी की सांस उनके नसीब में कहां आता<br />
गाते हैं वह<br />
अभी तो ली अंगड़ाई है<br />
आगे और लड़ाई है<br />
पर फिर उनका चेहरा नजर नहीं आता<br />
हमने तो बिना नारा लगाये<br />
हमेशा की शुरु लड़ाई है<br />
समझा समझा कर परेशान है<br />
काहे हमारे सामने चले आते हो<br />
अपने आकाओं के नाम छिपाकर<br />
अपना चेहरा क्यों दिखाते हो<br />
फिर सोचते हैं<br />
गुलामों से क्या लड़ना<br />
आकाओं की दम पर उनको है पलना<br />
किसी की रोटी से डाह करें<br />
यह भला हमें कहां आता </p>
<p>देख रहे हैं उनके चेहरों पर खौफ<br />
हिट होकर भी नहीं झाड़ पाते रोब<br />
पिछड़े प्रदेश और छोटे शहर के हैं बाशिंद तो क्या<br />
प्रतिभा का भी होता कोई ठिकाना क्या<br />
तुम्हारी नकली हिट<br />
और कमाने के राज नहीं जानते हम क्या<br />
जेब खाली है तो क्या<br />
लोगों से मिल रहे प्यार की भी कीमत होती क्या<br />
तुम एक किलो का ही लिखना<br />
हमारे छंटाक भर शब्दों का भी प्रहार देखना<br />
अपने को फरिश्ता दिखाने के लिये<br />
किसी शैतान का होना जरूरी है<br />
तुमने हमें बताया<br />
हम तुम्हें बतायेंगे<br />
तुम समझे क्या<br />
हमें लड़ना नहीं आता </p>
<p>जब खड़े थे गुलामों के बाजार में<br />
बिकने के लिये खड़े थे<br />
तब कोई खरीद लेता तो हम भी बिक जाते<br />
बहुत सारे गुलामों में हम भी दिख जाते<br />
मगर मुश्किल होगा हम कोई सौदा<br />
हमारी सद्इच्छा को रौंदा<br />
नहीं चाहिए तुम्हारा घरौंदा<br />
हमें अपनी फ्लाप झौंपड़ी में ही रहना आता</p>
<p>बोलते बहुत हैं<br />
पर भाषण हर कोई नहीं कर पाता<br />
लिखने वाला हर शब्द रचना नहीं हो जाता<br />
नहीं हैं अब कोई सहारा<br />
आकाश में तैरेंगे जब शब्द<br />
तब मदद नहीं कर पायेगा कोई बिचारा<br />
आओ चलते हैं वहां<br />
शब्दों की जंग है जहां<br />
अपनी सभी विद्यायें<br />
हम भी दिखलायेंगे<br />
तुम भी आजमाना<br />
शब्दों को फूलों की तरह सजाने की इच्छा रही है<br />
पर तुम्हें बता देंगे<br />
उनको हथियार की तरह हमें उपयोग करना आता<br />
दिल नहीं मानता पर<br />
दिमाग इसके लिये हमेशा तैयार हो जाता</strong><br />
................................................................................</p>
<p>कल इस ब्लाग/पत्रिका पर विशेष संपादकीय लिखा जायेगा। जिसमें हिंदी ब्लाग जगत के बारे में प्रकाश डालने का प्रयास भी होगा।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दों के फूल कभी नहीं मुरझाये-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</link>
<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 14:36:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</guid>
<description><![CDATA[कुछ पाने के लिये
दौड़ता है आदमी इधर से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>कुछ पाने के लिये</p>
<p>दौड़ता है आदमी इधर से उधर</p>
<p>देने का ख्याल कभी उसके</p>
<p>अंदर नहीं आता</p>
<p>भरता है जमाने का सामान अपने घर में</p>
<p>पर दिल से खाली हो जाता</p>
<p>दूसरे के दिलों में ढूंढता प्यार</p>
<p>अपना तो खाली कर आता</p>
<p>कोई बताये कौन लायेगा</p>
<p>इस धरती पर हमदर्दी का दरिया</p>
<p>नहाने को सभी तैयार खड़े हैं</p>
<p>दिल से बहने वाली गंगा में</p>
<p>पर किसी को खुद भागीरथ<br />
बनने का ख्याल नहीं आता<br />
.....................................<br />
अपने नाम खुदवाते हुए</p>
<p>कितने इंसानों ने पत्थर लगवाये</p>
<p>पर फिर भी अमर नहीं बन पाये</p>
<p>जिन्होंने रचे शब्द </p>
<p>बहते रहे वह समय के दरिया में</p>
<p>गाते हैं लोग आज भी उनका नाम</p>
<p>कुछ पत्थरों पर धूल जमी</p>
<p>कुछ टूट कर कंकड़ हो गये</p>
<p>पर </strong></div>
<div align="center"> </div>
<div align="center"><strong><br />
............................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असली फूल, नकली फूल-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=488</link>
<pubDate>Wed, 27 Aug 2008 15:01:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=488</guid>
<description><![CDATA[अब करते हैं लोग शिकायत
असली फूलों में  ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अब करते हैं लोग शिकायत<br />
असली फूलों में  वैसी<br />
सुगंध नहीं आती<br />
नकली फूलों में ही<br />
इसलिये असली खुशबू छिड़की जाती<br />
दौलत के कर रहा है खड़े, नकली पहाड़ आदमी<br />
पहाड़ों को रौदता हुआ<br />
नैतिकता के पाताल की तरफ जा रहा आदमी<br />
सुगंध बिखेर कर खुश कर सके उसे<br />
यह सोचते हुए भी फूल को शर्म आती<br />
...............................</p>
<p>नकली रौशनी में मदांध आदमी<br />
नकली फूलों में सुगंध भरता आदमी<br />
अब असली फूलों की परवाह नहीं करता<br />
पर फिर भी उसके मरने पर अर्थी में<br />
हर कोई असली फूल भरता<br />
भला कौन मरने पर उसकी सुगंध का<br />
आनंद उठाना है<br />
यही सोचकर असली फूलों की<br />
आत्मा सुंगध से खिलवाड़ करता<br />
..............................<br />
धूप में खड़े असली फूल  ने<br />
कमरे में सजे असली फूल की<br />
तरफ देखकर कहा<br />
‘काश मैं भी नकली फूल होता<br />
दुर्गंधों  ने ली मेरी खुशबू<br />
इसलिये कोई कद्र नहीं मेरी<br />
मै भी उसकी तरह आत्मा रहित होता’<br />
फिर उसने डाली<br />
नीचे अपने साथ लगे कांटो पर नजर<br />
और मन ही मन कहा<br />
‘जिन इंसानों ने कर दिया है<br />
मुझे इतना बेबस<br />
फिर भी मेरे साथ है यह दोस्त<br />
क्या मै इनसे दूर नहीं होता</strong><br />
........................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे के दर्द में अपनी तसल्ली ढूंढता आदमी-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=265</link>
<pubDate>Wed, 27 Aug 2008 14:35:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=265</guid>
<description><![CDATA[शहर-दर-शहर घूमता रहा 


इंसानों में इंसा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>शहर-दर-शहर घूमता रहा </strong></div>
<p><strong>
<div align="center">
इंसानों में इंसान का रूप ढूंढता रहा </div>
<div align="center">
चेहरे और पहनावे एक जैसे</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
पर करते हैं फर्क  एक दूसरे को देखते</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
आपस में ही एक दूसरे से</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
अपने बदन को रबड़ की तरह खींचते</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
हर पल अपनी मुट्ठियां भींचते</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
अपने फायदे के लिये सब जागते मिले</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
नहीं तो हर शख्स ऊंघता रहा</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
अपनी दौलत और शौहरत का</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
नशा है</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
इतराते भी उस बहुत</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
पर भी अपने चैन और अमन के लिये</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
दूसरे के दर्द से मिले सुगंध तो हो दिल को तसल्ली</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
हर इंसान इसलिये अपनी</div>
<div align="center"><span class=""></span><br />
नाक इधर उधर घुमाकर सूंघता रहा<br />
.................................</strong></div>
<div align="center"><strong>दीपक भारतदीप </strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःदिल में छल रहे तो भक्ति से कोई फायदा नहीं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=226</link>
<pubDate>Tue, 26 Aug 2008 03:57:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=226</guid>
<description><![CDATA[हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय
आप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय<br />
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान के भजन और गुण तो नाचते हुए गाते तो बहुत लोग हैं पर उनके हृदय से कपट नहीं जाता। इसलिये उनमे भक्ति भाव और ज्ञान नहीं होता परंतु वह दूसरों के सामने अपना केवल शाब्दिक ज्ञान बघारते है।</p>
<p><strong>पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान<br />
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और गुनते हुए आदमी का अभिमान बढ़ता गया। उसके अंतर्मन में जेा तृष्णाओं और इच्छाओं की अग्नि जलती है उसके ताप से उसे मन में कभी शांति नहीं मिलती है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>वर्तमान काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार तो बहुत हुआ है पर अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण आदमी को मानसिक अशांति का शिकार हुआ है। वर्तमान काल में जो  लोग भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनका उद्देश्य उससे नौकरी पाना ही होता है-उसमें रोजी रोटी प्राप्त करने के साधन ढूंढने का ज्ञान तो दिया जाता है पर अध्यात्म का ज्ञान न होने के कारण भटकाव आता है। बहुत कम लोग हैं जो शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की तलाश नहीं करते-इनमें वह भी उसका उपयोग अपने निजी व्यवसायों में करते हैं। कुल मिलाकर शिक्षा का संबंध किसी न किसी प्रकार से रोजी रोटी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आदमी के पास सांसरिक ज्ञान तो बहुत हो जाता है पर अध्यात्मिक ज्ञान से वह शून्य रहता है। उस पर अगर किसी के पास धन है तो वह आजकल के कथित संतों की शरण में जाता है जो उस ज्ञान को बेचते हैं जिससे उनके आश्रमों और संस्थानों के अर्थतंत्र का संबल मिले। जिसे अध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य के मन को शांति मिल सकती है वह उसे इसलिये नहीं प्राप्त कर पाता क्योंकि वह अपनी इच्छाओं और आशाओं की अग्नि में जलता रहता है। कुछ पल इधर उधर गुजारने के बाद फिर वह उसी आग में आ जाता है।<br />
जिन लोगों को वास्तव में शांति चाहिए उन्हें अपने प्राचीन ग्रंथों में आज भी प्रासंगिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यह अध्ययन स्वयं ही श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए ताकि ज्ञान प्राप्त हो। हां, अगर उन्हें कोई योग्य गुरू इसके लिये मिल जाता है तो उससे ज्ञाना भी प्राप्त करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई गेहुंए वस्त्र पहने हुए संत हो। कई लोग ऐसे भी भक्त होते हैं और उनसे चर्चा करने से भी बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिये सत्संग में जाते रहना चाहिये।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आओ लिखें-छटांक भर कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=262</link>
<pubDate>Mon, 25 Aug 2008 17:06:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=262</guid>
<description><![CDATA[सागर की लहरे कितनी पास हों
किसी की प्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सागर की लहरे कितनी पास हों<br />
किसी की प्यास नहीं बुझती<br />
गागर की बूंदें ही काम आयें<br />
दस दिशाऐं हैं धरती पर<br />
जब चलें पांव एक ही दिशा में जायें<br />
हाथी बड़ा बहुत है<br />
महावत उस पर अंकुश की नौक से काबू पायें<br />
बड़ा होने से क्या होता है<br />
अगर कोई जमाने के का काम का न हो<br />
छोटा है मजदूर तो क्या<br />
उसी हाथ से बड़े-बड़े महल बन जायें<br />
इतिहास में दर्ज है<br />
बड़ों-बड़ों के पतन की कहानी<br />
पढ़कर लोग भूल जाते<br />
पर कवियों की छोटी छोटी<br />
दिल को सहलाने वाले शब्द<br />
कभी लोग भूल न पायें<br />
बड़े बड़े ग्रंथ लिखकर भी<br />
अगर जमाने को खुश न कर सके तो क्या फायदा<br />
लिखे का असर दूर तो हो यही है कायदा<br />
किलो की किताब लिखने से अच्छा है<br />
आओ लिखें छटांक  भर कवितायें<br />
लोगों के दिमाग से उतरकर वापस न लौटें<br />
उनके दिल में उतर जायें<br />
बड़ी न हो, भले छोटी हो रचनायें</strong><br />
....................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तोलमोल के बोल-छटांक भर की कविताएं]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=485</link>
<pubDate>Mon, 25 Aug 2008 15:52:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=485</guid>
<description><![CDATA[तोल मोल कर बोल
अपने लिये खरीदने में फा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>तोल मोल कर बोल<br />
अपने लिये खरीदने में फायदा हो तो<br />
किलो की चीज को  छटांक बोल<br />
बेचना हो बाजार में तो<br />
अपनी छटांक की चीज का लगा एक किलो के मोल<br />
................................................................................</p>
<p>आजादी में सांस लेने वालों के<br />
अंदाजे-बयां कुछ और होता है<br />
उनकी गुलामी से अपने अपने को मत तोल<br />
सौदागर हो तो बाजार में करो सौदा<br />
गलियों से हो जा गोल<br />
बुलंद आवाज नहीं हो सकती<br />
गुलामी में बहुत जल्दी थकती<br />
अपनी सोच की गुलामी को कब तक<br />
छिपाओगे<br />
दूसरे की भाषा बोलते जाओगे<br />
जंजीरे साफ नजर आ जाती हैं<br />
गुलामों के बंधे हाथ देख जंजीरों से<br />
खुल जायेगी पोल</strong><br />
..................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: जिसका ज्ञान अल्प हो उसे समझाना कठिन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=224</link>
<pubDate>Sun, 24 Aug 2008 01:25:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=224</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता। </p>
<p>*लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे- हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 17:04:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</guid>
<description><![CDATA[जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नहीं है<br />
उनके पास वफा बेचने का कोई एक  तरीका नहीं है<br />
भीड़ में मचायें शोर अपनी जिंदगी के तजूर्बे का<br />
पर उससे कभी कुछ खुद सीखा नही है<br />
ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे<br />
आवाजें हैं उनकी बहुत तेज,पर शब्द तीखा नहीं है<br />
बेअसर बोलते हैं पर जमाना फिर भी मानता है<br />
उनको परखने का खांका किसी ने खींचा नहीं है<br />
ईमानदार के ईमान को ही देते हैं चुनौती<br />
खुद कभी उसका इस्तेमाल करना सीखा  नही है<br />
फिर भी नाम चमक रहा है इसलिये आकाश में<br />
जमीन पर लोगों ने अपनी अक्ल से चलना सीख नहीं है<br />
........................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के मचे तूफानों का कौन पता लगा सकता ह-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 17:37:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</guid>
<description><![CDATA[
मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे<br />
................................<br />
दीपक भारतदीप</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शेर ने कहा-‘हमें मारकर सनसनी फैलायेंगे’-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 15:34:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=479</guid>
<description><![CDATA[शेरनी ने शेर से कहा
‘सुना है तू नरभक्ष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शेरनी ने शेर से कहा<br />
‘सुना है तू नरभक्षी हो गया है<br />
शर्म नहीं तुझे ऐसा करने में<br />
अब लोग झूंड बनाकर ढूंढ रहे है<br />
हथियार लेकर<br />
तुझे डर नहीं लगता मरने में<br />
अगर तू इंसान के हाथ से नहीं मरा<br />
तो भी उसका मांस खाकर<br />
बहुत बड़े पाप का भागी हो जायेगा<br />
उसके जहर से जल्दी मर जायेगा<br />
कई जन्म तक चूहे और बकरी<br />
जैसी पिटने वाली यौनियों में<br />
जन्म पायेगा<br />
इससे बहुत समय लगेगा तुझे उबरने में’</p>
<p>शेर ने कहा<br />
‘यह मुझे हमारे खानदान को मिटाने के लिये<br />
इंसानों का रचा गया प्रोपेगंडा<br />
जंगल के सभी  जानवरों को नष्ट करना<br />
उनका खास एजेंडा है<br />
इस समय टीवी चैनलों पर कोई<br />
खास प्रोग्राम नहीं है<br />
खबर बनाना है,ढूंढने का काम नहीं है<br />
निगाहें कहीं<br />
 निशाना और कहीं है<br />
पहले खलनायक बनाते हैं<br />
फिर नायक बताते है<br />
पर हम इंसान नहीं है<br />
जो उनकी भाषा बोल पायेंगे<br />
पहले वह हमें नरभक्षी बताकर<br />
सभी की सहानुभूति जुटायेंगे<br />
फिर आकर हमें मार जायेंगे<br />
खबर सुनाकर  सनसनी फैलायेंगे<br />
इसलिये यह जगह छोड़ कर चलते हैं अन्यत्र<br />
यहां का पानी की बूंदें पीने का<br />
अपना हो गया कोटा पूरा<br />
चलते है दूर यहां से<br />
पानी पियेंगे अब दूसरे झरने में</strong><br />
.............................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</link>
<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 16:51:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</guid>
<description><![CDATA[कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाचार<br />
अपनी वेदना का प्रदर्शन करते हैं सरेआम<br />
लुटते हैं लोगों की संवेदना और प्यार<br />
छद्म आंसू बहाते<br />
कभी कभी दर्द से दिखते मुस्कराते<br />
डाल दे झोली में कोई तोहफा<br />
तो पलट कर फिर नहीं देखते<br />
उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार </p>
<p>घर हो या बाहर<br />
अपनी ताकत और पराक्रम पर<br />
इस जहां में जीने से कतराते<br />
सजा लेते हैं आंखों में आंसु<br />
और चेहरे पर झूठी उदासी<br />
जैसे अपनी  जिंदगी से आती हो उबासी<br />
खाली झोला लेकर आते हैं बाजार<br />
लौटते लेकर घर  दानों भरा अनार </p>
<p>गम तो यहां सभी को होते हैं<br />
पर बाजार में बेचकर खुशी खरीद लें<br />
इस फन में होता नहीं हर कोई माहिर<br />
कामयाबी आती है उनके चेहरे पर<br />
जो दिल  में गम न हो फिर भी कर लेते हैं<br />
सबके सामने खुद को गमगीन जाहिर<br />
कदम पर झेलते हैं लोग वेदना<br />
पर बाहर कहने की सोच नहीं पाते<br />
जिनको चाहिए लोगों से संवेदना<br />
वह नाम की ही वेदना पैदा कर जाते<br />
कोई वास्ता नहीं किसी के दर्द से जिनका<br />
वही  बाजार में करते वेदना बेचने और<br />
संवेदना खरीदने का व्यापार<br />
.........................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःअधिकारियों के सामने प्रजा लुटे,वह राज्य निरर्थक है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=220</link>
<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 03:23:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=220</guid>
<description><![CDATA[१.उस राजा को जीवित रहते हुए भी मृतक समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.उस राजा को जीवित रहते हुए भी मृतक समान समझना चाहिए जिसके स्वयं या राज्य के अधिकारियों के सामने चीखती-चिल्लाती प्रजा डाकुओं  द्वारा लूटी जाती है।<br />
२.प्रजा का पालन करना ही राजा का धर्म होता है। जो इस धर्म का पालन करता है वही राज्य सुखों को भोगने का धिकारी है।</p>
<p>३.यदि राजा रोग आदि या किसी अन्य कारण से राज्य के सभी विषयों का निरीक्षण करने में समर्थ न हो तो उसे अपनी जगह धर्मात्मा , बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभी और श्रेष्ट व्यक्ति को मुख्य अमात्य(मंत्री) का पदभार सौंपना चाहिऐ।</p>
<p>४.मूर्ख, अनपढ़(जड़बुद्धि वाले व्यक्ति),गूंगे-बहरे आदि हीन भावना की ग्रंथि से पीड़ित होने के कारण, पक्षी स्वभाव से ही(तोते आदि पक्षी रटी-रटाई बोलने वाले) अभ्यस्त होने के कारण मन्त्र(मंत्रणा) को प्रकट कर देते हैं। कुछ  स्त्रियाँ स्वभाववश (चंचल मन और बुद्धि के कारण) मंत्रणा को प्रकट कर सकती हैं। इसके अलावा अन्य व्यक्ति भी जिन पर राजा को अपनी मंत्रणा प्रकट करने का संदेह हो उन्हें मंत्रणा स्थल से हटा देना चाहिऐ।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['काश! हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=477</link>
<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 15:21:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=477</guid>
<description><![CDATA[ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की<br />
चाहत किसमें नहीं होती<br />
पर परिंदों जैसी<br />
किस्मंत सभी की नहीं होती<br />
उड़ते हैं आसमान में<br />
पर उसे छू कर देखने की<br />
ख्वाहिश उनमें नहीं होती<br />
उड़ नहीं सकता आसमान में<br />
फिर भी इंसान की<br />
नजरें उसी पर होती<br />
उड़ते हुए परिंदे<br />
आसमान से जमीन पर भी आ जाते<br />
पर इंसान के कदम जमीन पर होते<br />
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते<br />
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें<br />
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए<br />
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें<br />
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती<br />
अपने पैर में जंजीरें डालकर<br />
आदमी फिर भी कहता है<br />
'काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'<br />
-----------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिट की परवाह की तो ब्लाग पर लिखना कठिन होगा-संपादकीय]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=253</link>
<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 14:49:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=253</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है। हिंदी के समस्त ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर आपस में संपर्क रखने की जो सुविधा है वह एक अनूठी है। जिन लोगोंे ने नारद फोरम के साथ अपने ब्लाग जीवन की शुरुआत की है वह उसे भूल नहीं सकते। वहां पर दूसरों को हिट और स्वयं को फ्लाप ब्लागर देखकर कुछ लेखकों को अपनी तौहीन लगती थी क्योंकि ऐसा लगता  कि  हिंदी के अंतर्जाल की दुनियां यहीं सिमटी हुई है।  अनेक लोग यहां हिट प्राप्त करते रहे  इसी कारण उन विषयों पर लिखने के आदी हो गये जिससे ब्लाग लेखकों में हिट मिलें। इनमें तो कई गजब के लेखक हैं और आज भी उनको जमकर हिट मिलते हैं। उनको पढ़ना बुरा नहीं है क्योंकि उनसे ही यही सीखा जा सकता है कि आपको क्या पसंद नहीं है और जो आपको पंसद नहीं है वह आम पाठक को भी पसंद नहीं आयेगा। ऐसे में अपने अंदर कुछ अलग लिखने के प्रेरणा पैदा होती है।<br />
पहले ब्लाग लेखकों को यह पता ही नहीं था कि आखिर उनके ब्लाग की पहुंच कहां तक है? धीरेधीरे यह स्पष्ट हो गया है कि एच.टी.एम.एल से लिखी गयी सामग्री ही ब्लाग की ताकत होती है। इन फोरमों पर फ्लाप रहने के बावजूद कई लोग लिख रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि अंततः उनके लिखे पाठों का महत्व ही उनको प्रचार दिला सकता है। सच तो यह है कि ब्लाग लेखकों में हिट दिलाने वाली सामग्री केवल उसी दिन के लिये महत्वपूर्ण है जिस दिन लिखी गयी है। उसके बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। ब्लाग लेखकों से लेखक ब्लागरों का सामंजस्य बैठ पाना कठिन है। मेरे कई ब्लाग लेखक मित्र है और उनकी सदाशयता ने मुझे प्रेरित किया है उनकी हिंदी ब्लाग जगत के प्रति निष्ठा भी असंदिग्ध है पर यहां  कुछ ऐ से लोग भी हैं जो लिखने के बावजूद गंभीर नहीं हैं। बंदरों की तरह उछलकूद कर वह यह जताते हैं कि वह यहां के श्रेष्ठ ब्लागर हैं पर उनका लेखन एक ब्लागर लेखक के रूप में मुझे पसंद आता है पाठक के रूप में नहीं।   इन फोरमों पर हिट और फ्लाप का खेल नकली है इस बात को समझ लेना चाहिए। कभी तो ऐसा लगता है कि यहां कुछ लोगों को हिट इतने न मिलें तो वह लिखना ही बंद कर देंगे। संभवतः यही कारण है ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है पर दूसरे लोग हतोत्साहित न हों इसलिये मैं प्रतिवाद स्वरूप अपने कुछ पाठ लिख देता हूं जो मेरे मित्र ब्लागरों को पसंद नहीं आते। जिन लोगों को गंभीर और सोद्देश्य लेखक करना है उन्हें यहंा हिट का मोह त्यागना होगा।  यहां अपनी सुविधा और विचार से पसंद और हिट हैं पर किसी भी तरह से आम पाठक का प्रतिनिधित्व यहां नहीं है।  यहां कुछ ऐसे ब्लाग लेखक जबरदस्त हिट पा रहे हैं जिनके लेखन को आम पाठक के लिये तो कभी भी मतलब का नहीं माना जा सकता। जिन लोगों ने अपने आपको यहां का नेता समझा है वह बड़े शहरों रहते हैं और प्रचार माध्यमों में अपनी पहुंच का लाभ उठाकर कर अपने ऐसे ब्लाग लेखकों को प्रचार दिलवाते हैं जिनका लेखक आम पाठक के रूप में प्रभावित नहीं करता। हालांकि मैं उनको स्वयं बहुत दिलचस्पी से पढ़ता हूं। एक दिलचस्प बात यह है कि जिन ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है उनमें अधिकांशतः ब्लाग स्पाट पर ही लिखते हैं जिनको प्रोत्साहित करने की आवश्यकता होती है।  ब्लागस्पाट के ब्लाग तकनीकी कारणों से अधिक पाठक नहीं जुटा पाते। जिस दिन पाठ लिखो उस दिन हिट आते हैं पर फिर शांति छा जाती है। इसके विपरीत वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटाते हैं। यही कारण है कि यहां लिखते हुए कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी की परवाह की जाये। ब्लाग स्पाट पर लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे अपनी डायरी में लिख रहा हूं। यहां से उठाकर वर्डप्रेस पर रखे गयी कम से कम दस पाठ ऐसे हैं जो पांच सौ से अधिक बार पढ़े जा चुके हैं जबकि यहां उनको बीस से अधिक लोग नहीं पढ़ पाये। ऐसे में मेरा हौसला बढ़ता है। इसके पीछे तकनीकी कारण है जिसका अनुसंधान मैं कर उसका निष्कर्ष भी प्रस्तुत 