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	<title>hindi-media &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-media/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-media"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:06:32 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मनुस्मृतिःबिना मांगे मिली वस्तु ही अमृत समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 04:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।<br />
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।<br />
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।<br />
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।<br />
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।<br />
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है।<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःमैले वस्त्रों से स्त्री की रक्षा होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:03:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</guid>
<description><![CDATA[1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्रियों के पति बंधु और पति और विद्वानों का रक्षक ज्ञान होता है।<br />
2.सत्य से धर्म, योग से विद्या और सफाई से सुंदर रूप और सदाचार से कुल की रक्षा होती है<br />
3.तोलने से अनाज, फेरने से घोड़े, निरंतर देखभाल से गौऔं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।<br />
4.सदाचार से हीन मनुष्य का कुल ऊंचा हो तो भी उसे प्रतिष्ठित नहीं माना जा सकता है।<br />
5.जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य तथा प्रतिष्ठा से द्वेष करता है उसके रोग का कोई इलाज नहीं होता है।<br />
6.न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद या आलस्य करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही अपना मंत्र प्रकट हो जाने से बचना चाहिए और ऐसे किसी पेय का सेवन नहीं करें जिसे नशा चढ़ता हो।</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">"दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका"</a> पर लिखी गयी है। इसका पता इस प्रकार है। http://rajdpk.wordpress.com<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-दीनता के भाव बिना भक्ति का आनंद नहीं मिलता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 04:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</guid>
<description><![CDATA[दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहिं<br />
रहिमन चातक रटनि हूँ, सर्वर को कोऊ नाहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों को ही निहारता रहता है पर चातक स्वाती नक्षत्र की बूँद को ही रटता रहता है और तालाब के जल को नहीं पीता। </p>
<p><strong>सक्षिप्त व्याख्या-</strong>इसका  आशय यह कि एक भक्त के लिए भगवान का ही महत्व होता है और वह किसी अन्य की कामना नहीं करता है। किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से वह प्रेम कर ही नहीं सकता। वह तो बस अपनी साधना में लीन रहता है। जो लोग भक्ति करते समय भी अन्य विषयों पर चर्चा करते हैं वह केवल दिखावा करते हैं।</p>
<p><strong>दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु<br />
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि भगवान् के प्रति दैन्य भाव से की गयी भक्ति करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है उसे इस भौतिक जगत से प्रेम करने वाले क्या समझ पाएगे। दीनता अपने आप में एक ऐसा गुण है जिससे दीनबंधु (परमात्मा) से बंधुत्व का आभास होता है।<br />
<strong>संक्षिप्त व्याख्या- </strong>इसका तात्पर्य यह है कि दीनता का भाव रखकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जो लोग अपने पद, पैसे और प्रतिष्टा के अहंकार में हैं उन्हें ईश्वर से क्या वास्ता क्यों कि ईश्वर ने उन्हें पहले ही मोह माया के जंजाल में डाल दिया है। अगर मन में अपने कर्ता होने का अहंकार है तो भक्ति का आनंद कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। भक्ति का आनंद से आशय यह है कि हम अपने सांसरिक कार्य करत हुए कभी कोई तनाव अपने अंदर अनुभव न करें। सच्ची भक्ति से विकास निकल जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 01:17:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल<br />
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।</p>
<p><strong>पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय<br />
वह अक्षर इनमे नहीं हंसि दे भावे रोय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये। </p>
<p>अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए। जब तक मनुष्य को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है तब तक वह गुलामों की भांति विषयों के पीछे भागता है और धन, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठित लोगों की चाटुकारित का अपने का धन्य समझने लगता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पात्र नहीं बने]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:22:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</guid>
<description><![CDATA[रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय<br />
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।</p>
<p>कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’</p>
<p>हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:47:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</guid>
<description><![CDATA[श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर
श्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर<br />
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप </p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम तो स्वार्थ का होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:02:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं<br />
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है। </p>
<p>आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःहमारे शरीर में विपत्तियां सहने की क्षमता होती है अधिक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 04:48:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह<br />
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है। </p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।</p>
<p>मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया? </p>
<p>इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:समय छोटे आदमी को भी बड़ा बना देता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 04:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</guid>
<description><![CDATA[
छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख<br />
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।<br />
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रसन्नता देने वाले को कुछ न देने वाले पशु समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 03:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत<br />
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।<br />
<strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं। कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 02:56:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःगुणहीन व्यक्ति पशु के समान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 05:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</guid>
<description><![CDATA[रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन
सहि ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन<br />
सहि के सोच बेसाहियो, गया हाथ को चैन<br />
</strong>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों को नयनों के माध्यम से प्रेम संबंध हो जाता है, वह दुनियां का कोई विचार नहीं करते। जो लोग ऐसा प्यार करते हैं उनको यह समझ लेना चाहिए कि उनके जीवन का चैन गया और सब कुछ सहकर इस झगड़े को मोल लेना चाहिए।</p>
<p><strong>रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान<br />
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिन पूंछ बिषान </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों में विद्या, बुद्धि, धर्म, यश और दान जिस व्यक्ति में नहीं है उनका इस धरती पर जन्म लेना ही व्यर्थ हो जाता है। वह लोग पशु के समान हैं।</p>
<p><strong>रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार<br />
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि  पाप के धन को नष्ट होने में अधिक देर नहीं लगती-जैसे चोरी कर होली की लकड़ी लायी जाती है* और वह कुछ ही पल में जल जाती है।<br />
*पहले होलिकोत्सव पर लकड़ी लाने के लिए चोरी की जाती थी। समय के अनुसार अब यह परंपरा लुंप्त होती जा रही थी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 06:36:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही  नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की  धार  नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन  करता हूँ  वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है। </p>
<p>अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती  है कि  दीपावली पर सूर्य नारायण  दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि  होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम  कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों  का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग  बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं। </p>
<p>इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि  इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब  ऐसे में अपने घर के बाहर खडे  उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह  गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां  थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।</p>
<p>पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित  सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे  दूसरे सज्जन बोले-''हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।''<br />
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित  सज्जन ने उससे कहा--'तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि  भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच  है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।''<br />
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित  सज्जन से  विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना  चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल  रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:38:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय<br />
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान<br />
कही जश्न के लिए पीता है  शराब<br />
ताकत के लिए खाता  कबाब<br />
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब<br />
पर अकेले में होता है<br />
अपने कर्मों  से ही होता  परेशान  </p>
<p>इन्तजार करता है त्योहारों का<br />
कुछ मिलने के व्यवहारों का<br />
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान<br />
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान<br />
सिद्धि के लिए करता है यत्न<br />
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न<br />
अपने से  भागता रहता है इंसान </p>
<p>सीख लो हर पल जीना<br />
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना<br />
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता<br />
देने से किसी को नाम आगे जाता<br />
गले में हार पड़ने से<br />
पीठ पर चाल डालने से<br />
मिलता है थोडी देर का सम्मान<br />
अपने बोलों में भर दो रस<br />
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान<br />
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस<br />
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है<br />
देने वाला ही खुशी भी लूटता है<br />
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं<br />
मरने या पीठ पीछे हो<br />
वही कहलाता है असली सम्मान<br />
-----------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: शरीर के अंगों में सिर श्रेष्ठ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=104</link>
<pubDate>Tue, 11 Mar 2008 03:18:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code></p>
<blockquote><p><strong>सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्छा है, सभी सुखों में सबसे श्रेष्ठ सुख भोजन  पाना है, ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान है, शरीर  के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है। शिरोभाग में ही समस्त ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान हैं। शरीर के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है क्योंकि उसमें ही सभी ज्ञानेन्द्रियाँ  होती हैं।</strong></p></blockquote>
<p></code></p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>कुछ लोग कहते हैं कि विश्व का सारा आधुनिक ज्ञान  अंग्रेजी में है इसलिए उसे पढ़ना जरूरी है। आप देखें  हमारे देश के विद्वान भी अपनी भाषाओं में बहुत सारा ज्ञान  प्रदान कर गए हैं पर पाश्चात्य रहन-सहन के अंधानुकरण ने हमें हर तरह से तनाव की हालत में पहुंचा दिया है।  आयुर्वेद में गिलोय रसायन सभी प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए उत्तम कहा जाता है। आजकल लोग अपना पेट भरने के लिए फास्ट फ़ूड के नाम पर जो खा रहे हैं वह हमारे देश के लोगों के लिए बीमारियों का कारण है। लोग समय पर भोजन नहीं करते और बाजार की चीजों से ही पेट भरते हैं और उससे शरीर में  विकार भर जाते हैं। अगर हमारे शरीर को ऊर्जा पेट से मिलती है तो रोग भी वही देता है। अत: ऐसे भोज्य पदार्थों का सेवन  नहीं करना चाहिए जिनसे पेट में विकार पैदा होते हैं। में यहाँ भोजन  से आशय अन्न से-गेहूँ और चावल- बने पदार्थों को ही मानता हूँ। इनसे बाजार में बने पदार्थ जिस तरह खुले में रखे जाते हैं वह विष की तरह हो जाते हैं।अत: वह ग्रहण करने से बचना चाहिऐ.  </p>
<p>लोग आजकल अपनी आंखों की परवाह न कर जिस तरह टीवी, कंप्यूटर  और फिल्में देखने में उनको  लगा रहे हैं वह उनके लिए हानिकारक होता है-इनके प्रयोग के जो नियम हैं उनका पालन करना चाहिए। जिस तरह हम इनका इस्तेमाल कर रहे हैं उसे देखते हुए तो हमें सुबह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए इससे  आंखों में स्फ्रूर्ति  आती है।मैंने जगह पढा था कि आइब्रों करने से आंखों पर दुष्प्रभाव होता है इसका विश्लेषण भी किया जाना चाहिऐ।  </p>
<p>सिर की महिमा सब जानते हैं पर उस पर अन्याय भी सभी करते हैं। सरकार ने दो पहिया चालकों के लिए हेल्मेंट अनिवार्य कर रखा है पर कुछ लोग इस नियम  के विपरीत चलकर बहुत खुश होते है और देश में बढ़ती हुई दुर्घटनाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि आजकल के युवा अपने सिर के महत्व को नहीं समझते। अधिकतर मामलों में यह माना जाता है कि अगर वाहन चालक हेलमेट पहने होता तो वह शारीरिक हानि नहीं उठाता।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:स्वार्थ के लिए दूसरी जगह जाने पर सम्मान काम होता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=97</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 04:28:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=97</guid>
<description><![CDATA[१.प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ उपलब्ध नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ उपलब्ध नहीं होता, यदि ऐसा होता तो मनुष्य के लिए पृथ्वी ही स्वर्ग की तरह हो जाती. कई चीजें जीवन में भाग्य से मिलती हैं.<br />
२.चद्रमा अमृत का भंडार है. औषधियों में रस डालें वाला है, लक्ष्मे के साथ समुद्र से उत्पन्न होने के कारण लक्ष्मी का भाई है और अत्यंत शीतल, चमकीला, और शोभायुक्त है परन्तु सूर्य के निकट पहुँचते ही एकदम निस्तेज हो जाता. चंद्रमा की यह दशा इस बात का प्रमाण है कि दूसरे के घर जान से मनुष्य का बड़प्पन बना नहीं रहता खासतौर से जब अपने काम के लिए किसी के घर जाते हैं तो गृहस्वामी  के समक्ष छोटे हो जाते हैं.<br />
३.अपने स्थान पर रहते हुए भंवरा कमलिनी के पराग के रस को पीकर मस्त रहता पर कुछ समय पश्चात उस स्थान पर चला गया वहाँ करील के फूल पैदा होते थे जिनमें न रस था न गंध. बाध्य होकर उसे वहाँ संतोष करना पडा वहाँ उन्हीं का रस पीकर  उनको ही गौरव देने लगा-कुछ न मिलने से तो कुछ मिलना ही अच्छा है.</p>
]]></content:encoded>
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