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	<title>hindi-life &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-life/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-life"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:05:59 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःसफलता के मद में उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करना वर्जित]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 04:06:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से पहले उसका महत्व समझ लेना चाहिए। अपना काम प्रारंभ करने से पहले पूरी तरह सूच विचार करना ठीक है। उतावली से कोई भी काम आरंभ नहीं करना चाहिए।<br />
2.घैर्यवान मनुष्य क लिए यह उचित है कि पहले अपने कर्म का उद्देश्य, संभावित परिणाम तथा  उससे होने वाले लाभ से अपने जीवन के विकास का विचार कर कार्य प्रारंभ करे।<br />
3.जो मनुष्य अपनी स्थिति, लाभ,हानि, धन, देश तथा दण्ड का विचार नहीं कर सकता वह कभी अपने जीवन में स्थिर नहीं रह सकता।<br />
4जो मनुष्य उपलब्ध तथ्यों के प्रमाण को सही तरह से जानता है और धर्म अर्थ का जिसे पूर्ण ज्ञान है वही दत्त चित होकर अपना कार्य कर पाता है और विकास की तरफ बढ़ता है।<br />
5.जिसे सफलता प्राप्त हो गयी है उसे अगर गर्व में चूर होकर किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार सपंत्ति तथा उपलब्धि को नष्ट कर देता है जैसे सुंदरता को बुढ़ापा<br />
................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका </a>पर लिखा गया पाठ है।<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे की लड़की के भागने की फिक्र-लघुकथा ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=434</link>
<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 17:05:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=434</guid>
<description><![CDATA[‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भाग गयी’<br />
‘किसके साथ’’<br />
‘अरे, भागी किसके साथ होगी? तुम्हारे अंदर इतनी अक्ल भी नहीं है। किसी लड़के के साथ भाग गयी। बहुत बनती थी न! मेरी लड़की कंप्यूटर सीख रही है। चित्रकारी सीख रही हैं। सब दिखावा था। अब तो उसका मूंह उतरा हुआ है।’<br />
‘अरे, सब दिखावे की बात है। मन ही मन खुश हो रही होगी कि बिना दहेज के लड़की से पीछा छूटा।’<br />
‘लड़की को बहुत छूट दे रखी थी!’<br />
मोहल्ले की औरतें इसी तरह की बातें कर रही थी। 13 नंबर वाली को कुछ पता ही नहीं। वह अपने काम में लगी रही । दो दिन तक वह बाहर नहीं निकली। अब तो कालोनी की उस लाईन के लोगों का सब्र टूट गया था। आखिर तीस नंबर वाली ताई ने सबका प्रतिनिधत्व करने का निर्णय करते हुए उसके पास जाने का निर्णय किया। बड़ी उमर के कारण उनको अपने मान-सम्मान पर किसी खतरे की आशंका नहीं थी।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a> की मूल रचना है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। कहीं अन्यत्र प्रकाशन होने की सूचना इस <a href="http://dpkraj.wordpress.com"><strong>पते</strong></a> पर दें।<br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक</a> </strong></p></blockquote>
<p>वह 13 नंबर वाली के पास पहुंची। वह घर का काम कर थकी होने के कारण सो रही थी। 30 नंबर वाली ताई ने उससे कहा-‘बड़ी बुरा किया तुम्हारी लड़की ने। इस तरह माता पिता का अपमान कर घर से नहीं भागना चाहिये था। अरे, तुम क्या उसकी शादी में दहेज देने की हैसियत नहीं रखते क्या? उसने अपने जन्म देने वाले माता पिता की इज्जत का ख्याल नहीं किया।<br />
13 नंबर वाली ने पूछा-‘मेरी लड़की भाग गयी? कब? किसके साथ?<br />
30 नंबर वाली ने कहा-‘अब छिपाने से क्या फायदा? सबको पता चल गया है। पूरे शहर में हवा फैली है। उस दिन रात को 11 बजे तुम्हारी लड़की घर से अकेली सामान लेकर जाते हमने देखी है। भला कोई जवान लड़की अटैची लेकर रात को जाती है दौड़ती हुई घर से जाती है क्या? तुम भी घर से शर्म के मारे दो दिन से बाहर नहीं निकली।<br />
13 नंबर वाली बोली-अच्छा! अब मैं समझी। उस दिन मेरा भाई रात को दस बजे आया था। वह केवल एक घंटे के लिये इस शहर में आया और मेरी लड़की को साथ ले जाने के लिये यहां रुका था। 12 बजे की उसकी ट्रेन थी। इधर भानजी तैयार हो रही थी वह बाहर आटो कराने के लिये सामान सहित निकल गया। वहां उसने मोबाइन कर अपनी भानजी को कहा  कि आटो दूर सड़क पर खड़ा है जल्दी आओ। इसलिये वह सामान लेकर दौड़ती हुई गयी। लड़की ननिहाल में लड़का ताऊ के पास गया हुआ हैं घर में अकेली सारा काम कर रही हूं । पहले दोनों थोड़ हाथ बंटाते थे पर अब अकेले होने के कारण दो दिन से बाहर नहीं निकल रही और अब तो निकलूंगी भी नहीं। बच्चों के जाने पर अकेले में उदासी नहीं आयेगी तो क्या जश्न मनाऊंगी?</p>
<p>30 नंबर वाली ताई का चेहरा उतर गया। वह बोली-‘मुझे क्या पता? बीस नंबर वाली बुआ सबसे यही कह रही है।’<br />
13 नंबर वाली ने कहा-‘ बीस नंबर वाली के पास जाऊंगी तो वह कहेगी कि चालीस नंबर वाली चाची कह रही थी। यहां तो सब ऐसे ही हैं कि दूसरों की लड़की घर से भागे और उस पर चर्चा कर मजे लें। मैंने सबको देखा है और सबको इसलिये मना भी करती हूं कि वह समझ लें कि बच्चे सबके हैं ओर किसी में दोष देखने से अपने बच्चे में भी दोष आ सकता है। यहां तो लोग अपनी कम दूसरे की लड़की के लड़की के भागने की  फिक्र अधिक करते हैं।’<br />
30 नंबर वाली ताई अपना मूंह लेकर लौट गयी।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमें लगाने दो सब तरफ हिट की कील-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=431</link>
<pubDate>Mon, 21 Jul 2008 15:16:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=431</guid>
<description><![CDATA[
घर में घुसते ही बोला फंदेबाज
‘शंका तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
घर में घुसते ही बोला फंदेबाज<br />
‘शंका तो हमें रास्ते में ही हो गयी थी कि<br />
आज होगी तुम्हारे लिये जश्न की शाम<br />
सामने होगी बोतल और  हाथ में होगा जाम<br />
बा ने बताया था फोन पर  कि<br />
ब्लाग चोरी होने के बाद तुम्हारे<br />
पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे<br />
उछल कूद कर रहे हो इतनी कि<br />
सिर के बाकी बाल भी झड़ रहे<br />
क्या किसी अंग्रेज ब्लागर से की थी<br />
अपना ब्लाग चुराने की डील<br />
बड़ा बुरा हो रहा है हमें फील<br />
देश में क्या कम ब्लागर थे<br />
जो विदेश से  ले आये हिट होने के लिये ऊर्जा<br />
अपने लोगों के सीने में ठोक दी कील’</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका"</a> की मूल रचना है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर किसी को यह कहीं अन्य प्रकाशित मिले तो इस ब्लाग http://deepakraj.wordpress.com पर सूचित करे।<br />
दीपक भारतदीप, लेखक संपादक </strong></p></blockquote>
<p>ग्लास को मूंह लगाने के बाद<br />
फिर उसे रखते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कमबख्त आज अच्छे दिन भी<br />
तुम्हारा आना हुआ है<br />
अंतर्जाल पर ब्लाग चोरी होना<br />
सम्मान की बात समझी जाती है<br />
कोई भाग्यशाली ही होता है<br />
जिसके हिस्से यह घटना पेश आती है<br />
यहां सभी हिट होने के लिये मरे जा रहे हैं<br />
नैतिकता और भक्ति का तो बस नाम लेते हैं सब<br />
अपने ऊपर दो नंबर  की गठरी ले जा रहे हैं<br />
पहले लोग अपने यहां छापे पड़वाते थे<br />
अपने यहां इज्जत बढ़ाने के लिये<br />
अब फिर रहे हैं अपना सामान<br />
चोरी कराने के  लिये<br />
कर लेते हैं डील<br />
फिर करवाते हैं अपने हिट होने की फील<br />
चोरी हो जाने पर कोई नहीं रोता<br />
हो जाने  पर ही हिट होने की चैन की नींद सोता<br />
चोरी होने को सामान बहुत है<br />
पर उसे उठाने वाले बहुत कम है<br />
किसका उठायें और किसका नहीं<br />
चोरों को भी यही गम है<br />
देश में भला किससे चोरी करवाते<br />
विदेश में ब्लागर तो छिपा रहेगा<br />
देश का होता तो पता नहीं<br />
कब पाला बदल जाता<br />
और हम अपनी असलियत कब तक छिपाते<br />
हमने नहीं की<br />
हम क्या जाने तकनीकी के बारे मेें<br />
कोई प्रशंसक ही  कर आया है<br />
हमारा ब्लाग चुराने की डील<br />
किसने की  और कैसे की, इससे क्या मतलब<br />
हमें तो बस गाना है अपना गुड फील<br />
जब तक किसी विदेशी से हाथ न मिलायें<br />
भला इस देश में कौन इज्जत करता है<br />
शादी हो या व्यापार<br />
हर कोई विदेश में डील के लिये मरता है<br />
चोरी हुआ हमारा ब्लाग<br />
जो कि हिट की शर्त पूरी करने के लिये काफी है<br />
अब तुम पर हास्य कवितायें लिखते हुए<br />
हमेशा रहे फ्लाप<br />
तो अपना रुतवा विदेशियों के दम पर दिखायेंगे<br />
सारा जमाना जा रहा है<br />
हम भी जरा चलकर देखें<br />
फिर अपनी असलियत पर लौट आयेंगे<br />
अपने घर का चिराग तेल से नहीं<br />
विदेशी ऊर्जा से जलायेंगे<br />
अभी तो चीयर्स करो<br />
तकनीकी से हम दोनों हैं पैदल<br />
जिसमें अपना फायदा दिखे वही कहो<br />
और हिट पाने में मस्त रहो<br />
चोरी के  मामले में डाल दो ढील<br />
देशभक्ति तुम संभालों<br />
हमें लगाने  दो सब तरफ हिट की कील<br />
..................................................<br />
<strong>नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। अगरकिसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार </strong>होगा </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-दीनता के भाव बिना भक्ति का आनंद नहीं मिलता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 04:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</guid>
<description><![CDATA[दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहिं<br />
रहिमन चातक रटनि हूँ, सर्वर को कोऊ नाहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों को ही निहारता रहता है पर चातक स्वाती नक्षत्र की बूँद को ही रटता रहता है और तालाब के जल को नहीं पीता। </p>
<p><strong>सक्षिप्त व्याख्या-</strong>इसका  आशय यह कि एक भक्त के लिए भगवान का ही महत्व होता है और वह किसी अन्य की कामना नहीं करता है। किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से वह प्रेम कर ही नहीं सकता। वह तो बस अपनी साधना में लीन रहता है। जो लोग भक्ति करते समय भी अन्य विषयों पर चर्चा करते हैं वह केवल दिखावा करते हैं।</p>
<p><strong>दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु<br />
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि भगवान् के प्रति दैन्य भाव से की गयी भक्ति करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है उसे इस भौतिक जगत से प्रेम करने वाले क्या समझ पाएगे। दीनता अपने आप में एक ऐसा गुण है जिससे दीनबंधु (परमात्मा) से बंधुत्व का आभास होता है।<br />
<strong>संक्षिप्त व्याख्या- </strong>इसका तात्पर्य यह है कि दीनता का भाव रखकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जो लोग अपने पद, पैसे और प्रतिष्टा के अहंकार में हैं उन्हें ईश्वर से क्या वास्ता क्यों कि ईश्वर ने उन्हें पहले ही मोह माया के जंजाल में डाल दिया है। अगर मन में अपने कर्ता होने का अहंकार है तो भक्ति का आनंद कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। भक्ति का आनंद से आशय यह है कि हम अपने सांसरिक कार्य करत हुए कभी कोई तनाव अपने अंदर अनुभव न करें। सच्ची भक्ति से विकास निकल जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पात्र नहीं बने]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:22:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</guid>
<description><![CDATA[रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय<br />
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।</p>
<p>कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’</p>
<p>हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काला और सफेद बाजार-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 15:49:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</guid>
<description><![CDATA[अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’<br />
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया<br />
‘जब कारखाने में चीज बनती हो<br />
पर बाजार में नहीं दिखती हो<br />
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है<br />
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो<br />
समझ लो आपूर्ति है कम<br />
सफेद बाजार को उन्होंने<br />
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया<br />
.............................................</p>
<p>बाजार भी भला कभी<br />
काले और सफेद होते<br />
सौदागर की नीयत जैसी<br />
वैसे ही उसके नाम होते<br />
छिपकर कोई नहीं करता अब<br />
हर शय के सौदे सरेआम होते<br />
खरीददार की मजी नहीं चलती<br />
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता<br />
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते<br />
चाहे दूने और चौगुने दाम होते<br />
.....................................<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम तो स्वार्थ का होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:02:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं<br />
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है। </p>
<p>आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्रह्ममूहुर्त सपने देखने का नहीं-व्यंग्य हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=400</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 13:57:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=400</guid>
<description><![CDATA[
सपने तो सपने हैं
कभी अपने नहीं होते
जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
सपने तो सपने हैं<br />
कभी अपने नहीं होते<br />
जो दिन में कभी सच नहीं हो सकता<br />
उसी का नींद में दिखा  रहे होते<br />
आधी रात को देखा हो या ब्रह्ममुहूर्त में<br />
कभी उसे अपना नहीं समझना<br />
वरना पड़ेगा रोज कलपना<br />
बेसिर पैर के ख्यालात ही<br />
रात के सपने मे बदल रहे होते</p>
<p>कहैं महाकवि दीपक बापू<br />
दिन को जागता है जो दिमाग<br />
उसमे सोने पर<br />
रात वाला जागता है<br />
सच से नहीं होता उसका कोई रास्ता<br />
जिंदगी के संघर्षों से नहीं जिसका वास्ता<br />
वही दिमाग नींद में भी  सपने  लादता<br />
जिन पर जागने पर भी हम<br />
विचरण कर रहे होते<br />
अगर रात का सपना<br />
सुबह भी याद रहे तो<br />
समझो  सोये नहीं<br />
अपनी तकलीफें साथ लिये ही<br />
जागते हुए चल रहे हो<br />
भले ही रोये नहीं<br />
रात के सपने पर खुश होने का मतलब<br />
हम अपनी जिंदगी से हार रहे होते</p>
<p>सुलाने के लिये उनको<br />
सपनो की जरूरत होती<br />
जिनकी नीयत अपने में ही मगरूर होती<br />
सपने कोई अलग से<br />
चुनकर फूल नहीं लाते<br />
कभी देखे दिन में अपनी आंखों से<br />
लोग और जगहों को ही<br />
चुनकर नींद में उल्टे सीधे ढंग से सजाते<br />
जिन्हें दिन के दिमाग से हम भुला जाते<br />
रात के सपनों का ख्याल कर  हम<br />
दिन में भी बैचेनी के बीज बोते</p>
<p>मन है गहरा समंदर<br />
इसकी लहरों की कोई  थाह नहीं<br />
भटकाता है रात हो या दिन<br />
गुलामों की तरह भटकते उसके साथ<br />
भर सकते कभी आह नहीं<br />
अपने सच की जगह पराये सच में<br />
खोकर अपना मानसिक संतुलन खो रहे होते<br />
बना देता है सपना एक गधा<br />
जिसका बोझ हम ढो रहे होते</p>
<p>आसक्ति और विरक्ति के बीच  फंसा मन<br />
आता है ध्यान से काबू<br />
निकल जाते हैं जब विकार<br />
तब नहीं होते उस पर<br />
दुनियां के नियम लागू<br />
रात का सपना दिन में याद रहे<br />
समझो तुमने नींद में भी दिन के दर्द सहे<br />
ब्रह्ममूहुर्त सपने देखने का नहीं<br />
योग साधना, प्राणायम और प्रार्थना का है<br />
उसी राह पर चल सकते हो निश्चिंत होकर<br />
जिसे सच समझकर डर रहे होते<br />
रास्ते में पड़े कांटे भी  फूल दृष्टिगोचर होते<br />
जिन्हें देख सकते हो सपने में<br />
सच में वही तुम्हारे कदमों मे बिछे होते<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:समय छोटे आदमी को भी बड़ा बना देता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 04:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</guid>
<description><![CDATA[
छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख<br />
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।<br />
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रसन्नता देने वाले को कुछ न देने वाले पशु समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 03:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत<br />
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।<br />
<strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं। कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=391</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 15:23:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=391</guid>
<description><![CDATA[ 14 बरस की वह लड़की
रात को बिस्तर पर सोई थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong> 14 बरस की वह लड़की<br />
रात को बिस्तर पर सोई थी<br />
सुबह एक लाश हो गयी<br />
सवाल उठते हैं ढेर सारे<br />
मिलता नहीं कोई जवाब<br />
पिता पर लगा है आरोप<br />
पर मां क्यों खामोश हो गयी</p>
<p>एक पुरुष के अत्याचार  की शिकार बच्ची<br />
हैरान है परेशान है<br />
एक बच्ची आती है उसके जिस्म में<br />
अपने जीवन की सांस ढूंढती हुई<br />
पर नानी इंतजार में थी शायद<br />
भले ही अनैतिक होगा<br />
लड़का हुआ तो अपना ही होगा<br />
पर कोख से बाहर निकलते ही<br />
नानी ने मचाया बवाल<br />
बच्ची का गला घोंट दिया<br />
जन्म लेते ही जननी ने<br />
जेल ही उसकी आरामगाह हो गयी </p>
<p>हजारों खबरे हैं ऐसीं हैं<br />
तब सोचता हूं क्यों लाचार हो जाती है औरत<br />
क्यों औरत को ही बेबस बनाती औरत<br />
आदमी के अनाचारों के हजारों किस्से हैं<br />
पर औरत खुद भी क्यों बदनाम हो गयी</p>
<p>मां की ममता<br />
बहिन का स्नेह<br />
पत्नी का प्रेम<br />
आदमी की होता है मन की पूंजी<br />
कितने बदनसीब होते हैं<br />
जो इससे वंचित हो जाते हैं<br />
और फिर कहानी में जगह पाते हैं<br />
जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी<br />
...........................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 02:56:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=143</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=378</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 13:40:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=378</guid>
<description><![CDATA[लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।</h3>
<h3>मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’</h3>
<h3>मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’</h3>
<h3>इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’</h3>
<h3>मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’<br />
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’<br />
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’</h3>
<h3>मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’<br />
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होने पर विरोधी केवल धुरविरोधी ही हो पाते हैं। उस समय हिंदी ब्लाग जगत में  मैं नया था पर धुरविरोधी के समर्थकों के ब्लाग लेखकों के पाठों   में कई तरह की वैचारिक चुनौतियां होतीं थीं। मैंने उनका प्रतिवाद करने की दृष्टि से एक नहीं तीन जगह कवितायें लिखीं। दो छद्म नाम से थीं। हुआ यूं कि मेरे वास्तविक नाम पर तो मित्रों की  प्रतिक्रिया आई पर दो छद्म ब्लाग पर अलग अलग विपरीत टिप्पणियां आईं वह भी कविताओं के रूप में। एक छद्म नाम से दूसरी असली नाम से। छद्म नाम था आदिविद्रोही। मैंने तय किया कि पहले इस छद्म नाम से निपटूं। उसकी टिप्पणी पर उसके नाम को क्लिक किया तो उसका ब्लाग मिल गया। वहां धुरविरोधी की टिप्पणी भी थी जिनके हिंदी ब्लाग जगत से जाने को लेकर विदाई गीत लिखे जा रहे थे। बहरहाल उस दिन ब्लाग की टिप्पणियों से लिखने वाले के ब्लाग पर जाने का ज्ञान हुंआ। दूसरा यह  कि आदिविद्रोही कौन है मैं समझ गया। आदिविद्रोही ने एक पोस्ट ही लिखी थी और उसमें उसने अपने आने की घोषणा की थी। बाद में उसने दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों पर धमकाने वाले भी कमेंट लिखे। पहली और दूसरी प्रतिकूल टिप्पणी करने वाला एक ही व्यक्ति था। मतलब मुझे एक ही व्यक्ति से भिड़ना था। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरा छद्म ब्लाग है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे एक मित्र ब्लाग ने एक ही दिन तीनों कविताओं को अपने यहां लिंक दिया था और इसलिये वह लोग एकदम हमलावर हो गये थे। बहरहाल उस दिन गुस्सा पी गया जो बाद में कई पाठों को लिखने के लिए ऊर्जा के रूप में काम आया।</h3>
<h3>धुरविरोधी की इस हिंदी ब्लाग जगत से विदाई नहीं होगी यह मैं जानता था क्योंकि मुझे लगा कि यह उनका अपने छद्म ब्लाग से छुटकारा पाने का एक नाटक है। बाद में मेरा यह अनुमान सही निकला। आजकल वह अपने वास्तविक नाम से लिख रहे हैं-उनके अच्छे लेखक होने पर भी किसी को संदेह नहीं है। आदिविद्रोही ने घोषणा नहीं की पर फिर उसका ब्लाग यहां दिखाई नहीं दिया। मैंने उस पर अनेक बार व्यंग्य लिखे पर वह कभी नहीं देख पाया। मेरे कई पाठों का नायक  आदिविद्रोही होता है और वह जबरदस्त हिट लेतीं हैं। न केवल ब्लाग लेखकों  में बल्कि पाठकों में भी उनको बहुत रुचि से पढ़ा जाता है।  मैं उसे धुरविरोधी का शिष्य कहता हूं और उसने एक टिप्पणी से वह दिया जो कोई नहीं दे सकता। ब्लाग पर मेरी सबसे पहले जबरदस्त हिट पाठ को मैं कभी नहीं भूलता जिसका  शीर्षक है‘इस ब्लाग मीट पर हास्य कविता मत लिखना’। उसके बाद व्यंग्य लिखना शुरू किया तो फिर रुका नहीं । हां, अब अगर यह वही लोग हैं जो मैं समझ रहा हूं तो उनसे मेरा झगड़ा नहीं है और वह दोनों भी मेरे प्रति कोई दुर्भाव रखते नह दृष्टिगोचर नहीं होते। धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों अब उन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते है जो वह दूसरों के सामने चुनौती के रूप में पेश करते थे।</h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःगुणहीन व्यक्ति पशु के समान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 05:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</guid>
<description><![CDATA[रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन
सहि ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन<br />
सहि के सोच बेसाहियो, गया हाथ को चैन<br />
</strong>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों को नयनों के माध्यम से प्रेम संबंध हो जाता है, वह दुनियां का कोई विचार नहीं करते। जो लोग ऐसा प्यार करते हैं उनको यह समझ लेना चाहिए कि उनके जीवन का चैन गया और सब कुछ सहकर इस झगड़े को मोल लेना चाहिए।</p>
<p><strong>रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान<br />
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिन पूंछ बिषान </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों में विद्या, बुद्धि, धर्म, यश और दान जिस व्यक्ति में नहीं है उनका इस धरती पर जन्म लेना ही व्यर्थ हो जाता है। वह लोग पशु के समान हैं।</p>
<p><strong>रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार<br />
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि  पाप के धन को नष्ट होने में अधिक देर नहीं लगती-जैसे चोरी कर होली की लकड़ी लायी जाती है* और वह कुछ ही पल में जल जाती है।<br />
*पहले होलिकोत्सव पर लकड़ी लाने के लिए चोरी की जाती थी। समय के अनुसार अब यह परंपरा लुंप्त होती जा रही थी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुख अनुभूति की शक्ति भी होना चाहिए-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=377</link>
<pubDate>Fri, 16 May 2008 17:23:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=377</guid>
<description><![CDATA[ 
सुख सभी चाहते हैं पर क्या उसकी कभी अन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> </p>
<p>सुख सभी चाहते हैं पर क्या उसकी कभी अनुभूति कोई कर पाता है? कर पाता है तो कितनी? यह प्रश्न अक्सर मेरे मस्तिष्क में आता है।<br />
सुबह सैर को निकले लोग आपस में बाते कर रहे हैं-‘वह मेरा किरायेदार बहुत बदमाश है। उसकी बीबी ढंग से मकान की सफाई नहीं करती।<br />
इस गर्मी में सुबह कुछ पल चलती ठंडी हवा का अहसास तक वह चारों लोग नहीं कर पा रहे। ताजी हवा  उनके अंदर जा रही है पर वह उसके आनंद की अनुभूति उनसे कोसों दूर है।</p>
<p>एक कह रहा है कि-‘‘यार, आजकल के किरायेदार होते ही ऐसे है। हम इतनी मेहनत के मकान बनवाते हैं और वह लोग थोड़ा पैसा क्या देते हैं जैसे अपने आपको मकान मालिक समझने लगते हैं’।</p>
<p>इस समय वह एक ऐसे पेड़ के पास से निकले जहां गुलाब के फूल लगे हैं।  मगर वह उसकी तरफ देख नहीं पाये। उनका मकान उनका पीछा करता हुआ चल रहा है। पक्षियों के चहचहाने की आवाज उनके कानों में जा रही है पर वह क्या उसे सुनकर उसका सुख क्या उठाते है?</p>
<p>सुबह के जो कीमती पल हैं जिसमें पूरे दिन के लिये अपने तन, मन और विचारों के लिऐ ऊर्जा ऐकत्रित की जा सकती है वह उसे गंवाते जा रहे है। सबके चेहरे बुझे हैं क्योंकि चिंताएं सुबह से ही उनके साथ हो गयी है।</p>
<p>वह पार्क में खड़ा है। मै भी खड़ा होकर सुबह की हवा का आनंद ले रहा हूं।  उससे थोड़ा परिचय है। मैं उसे देखकर मूंह फेरने का प्रयास करता हूं। मुझे वहां तालाब के किनारे शांति से घूमने की इच्छा है। वह मेरे पास आता है।</p>
<p>‘आप उधर ही रहते है’? उसने सवाल किया<br />
‘हां’-मैंने संक्षिप्त जवाब दिया।<br />
‘आप यहां घूमने रोज आते होंगे।’उसने फिर पूछा<br />
मैंने कहा-‘नहीं केवल छुट्टी के दिन आता हूं।’<br />
वह बोला-हां, अच्छा करते हैं। लोग कहते हैं कि सुबह घूमने से लाभ होता है, पर मुझे नहीं लगता। मैं रोज हवा खाने निकलता हूं पर मेरा मन नहीं लगता।’</p>
<p>मैंने कहा-‘‘मैं भी पहले रोज आता था। मुझे शांति मिलती थी। हां, अब योग साधना की वजह से देर हो जाती है और अब नहा धोकर मंदिर जाते हुए कभी कभी यहां आता हूं।’<br />
उसने उत्सुकता से पूछा-‘‘योग साधना से मन को शांति मिलती है।<br />
मैने कहा-‘नहीं! बिल्कुल नहीं।<br />
वह हैरान होकर मुझे देखने लगा। मैंने कहा-‘‘दरअसल मैं पूरे दिन शांति और अशांति और दुःख और सुख से परे हो जाता हूं। अपने काम करता रहता हूं। शांति का पता तो तब चले जब अशांति का अनुभव हो। सुख तो तब लगे जब दुःख ने छू लिया हो। मै तो तब भी विचलित नहीं होता जब बुखार मुझे घेर लेता है। मुझे पता है कि यह थोड़ी देर बाद अपने आप उतर जायेगा।</p>
<p>मै चल पड़ा। वह कहने लगा-‘आजकल गर्मी बहुत है। पानी की परेशानी है।’<br />
मैने उससे कहा-‘तुम गर्मी की चिंता इस समय मत करो। इंतजार करा,े सूर्य का ताप बढ़ने वाला है। अभी तो इस ठंडी हवा को अपने मन में आने की जगह दो।<br />
उसने पूछा-‘‘कैसे?’<br />
मैने कहा-‘कल सुबह साढ़े पांच बजे उधर पार्क में चले जाना। वहां लोग योग साधना करते हैं। वह तुम्हें सिखा देंगे। अगर तुम आना चाहो तो मैं भी कल आ जाऊंगा।’</p>
<p>उसने कहा-‘नहीं रात को हम देर से सोते हैं। हालांकि आठ बजे घर आ जाते हूं, पर आपस में बातें करते हुए रात का एक बज जाता है। सुबह सात बजे से पहले मै उठ नहीं पाता। अभी देखिये आठ बजने को हैं।’<br />
मैं उससे कहना चाहता हूं कि जब रात को इतना सुख उठा चुके हो तो फिर सुबह किस सुख की तलाश में यहां आये हो, पर नहीं कह पाता। सोचा बहस ख्वाख्वाह बढ़ जायेगी।<br />
मैं चलते चलते मंदिर की तरफ मुड़ जाता हूं। उससे और अधिक बात करना मुझे ऐसे  लगा जैसे कि वह मेरे को सुबह ही थका देगा। अपनी थकावट वह अपने साथ लेकर निकला है।</p>
<p>कभी फूलों के पास खड़े होकर खुशबू को सूंघ कर देखें। अगर वह नाक से होती हुई पूरे शरीर में घूमती अनुभव न हो, पक्षियों के चहचहाने की आवाज अगर कान से होकर मस्तिष्क के अंतिम छोर तक जाती न लगे और जब हरे-भरे पेड़ों का दृश्य अगर हृदय को प्रभावित न करता लगे तो समझ लो कि सुख तुम्हारी अनुभूति से परे है।</p>
<p>कई बार मन में आता है कि ‘मेरा अमुक काम हो जाये तो मन को शांति मिलेगी‘ या ‘मेरे को अमुक वस्तु मिल जाये तो जीवन सुखमय हो जायेगा‘। बेकार की सोच है। ऐसा होता तो इस समय धरती पर ही स्वर्ग होता। अगर तुम्हारे अंदर  सुख की अनुभूति शक्ति नहीं है तुम्हें कोई सुखी नहीं बना सकता। नाक से आगे सुंगध, आंख से आगे दृश्य और कान से आगे स्वर अगर नही बढ़ता तो इसका मतलब यह है कि आदमी में सुख अनुभव करने की शक्ति नहीं है। इन अंगों को सफाई करने की आवश्यकता है और प्राणायाम के अलावा कोई इस सुख की अनुभूति करने की शक्ति नहीं पा सकता है।</p>
<p>सुबह उठो और पद्मासन में बैठकर सांस को खींचो। अपनी दृष्टि (ध्यान) भृकुटि पर रखो और सांस धीरे-धीरे लेकर छोड़ते रहो। अनुभव करो कि तुम्हारे तन, मन और विचारों के विकास निकल रहे हैं। सुख की अनुभूति की शक्ति अर्जित करने का यही इकलौता साधन है। </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुनीम के ब्लाग कौन पढ़ता-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=376</link>
<pubDate>Thu, 15 May 2008 15:06:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=376</guid>
<description><![CDATA[(यह इस ब्लाग की 300 वीं पोस्ट है)

आया फंदे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h2>(यह इस ब्लाग की 300 वीं पोस्ट है)</h2>
<h3 style="padding-left:30px;">
आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, <br />
तुम्हें देखकर फ्लाप मेरा  कलेजा फटता<br />
सोचता हूं  तो पढ़ना पसंद नहीं करता<br />
पर तुम्हें अन्य कोई क्यों नहीं पढ़ता<br />
हमारे भतीजे ने मांगा है<br />
फिल्मी अभिनेताओं के ब्लाग का पता<br />
किसी तरह पता कर हमें बता दो<br />
वह कुछ पढ़ना और सीखना चाहता है<br />
बहुत कहते हैं पर तुम्हारा लिख नहीं पढ़ता</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">सुनकर पहले टोपी उतारी<br />
और फिर सिर पर हाथ घुमाया<br />
और टोपी को सिर पर चढ़ाते हुए<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘हमारे फ्लाप होने पर<br />
तुम क्यों शर्माते हो<br />
फिर अभिनेताओं  के ब्लाग का पता  पूछकर<br />
हमारे दिमाग को गरमाते हो<br />
इतने दिन हो गये हमारे पास बैठते<br />
यह  भी नहीं जान पाये कि<br />
अभिनेता के नाम या प्यारे नाम से ढूंढो<br />
सब सामने आ जायेगा<br />
सच भी यही है<br />
सब सीख रहे हैं अभिनेता और अभिनेत्रियों से<br />
तुम्हारा भतीजा भी सीख ले तो<br />
उससे हम पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता<br />
जो जमीन पर चमक रहे हैं<br />
अभिनेता, अभिनेत्री, संपादक और धनपति<br />
सितारे बनकर<br />
अंतर्जाल पर भी छायेंगे<br />
हमें चलाता है ब्लाग<br />
वह ब्लाग को चलायेंगे<br />
फिर भी सदैव जो शब्द बने रहें चमकदार<br />
हमारे ब्लाग पर आयेंगे<br />
हम मिट जायें पर वह चमक नहीं गंवायेंगे<br />
इसलिये हम भी लिख रहे है<br />
यह तो हम भी जानते हैं कि<br />
बड़े नाम वालों को ढूंढते हैं सभी<br />
हम जैसे मुनीम का ब्लाग कौन पढ़ता<br />
लिखते हैं इसलिये हम<br />
शब्दों की पालिश से<br />
दूर हो जाये मस्तिष्क से<br />
दो और दो चार से उपजी जड़ता<br />
...............................</h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग (पत्रिका) की पाठक संख्या बीस हजार के पार]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 14:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=371</guid>
<description><![CDATA[12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>12 दिसंबर 2007 को इस हजार की संख्या पार कर चुके इस ब्लाग ने कल बीस हजार की पाठक संख्या को पार कर लिया। इस संख्या को पार करने वाला यह मेरा  दूसरा ब्लाग है।<br />
इस ब्लाग के साथ मेरी दिलचस्प याद जुड़ी हुई है। ब्लागस्पाट पर टाईप करते हुए यूनिकोड में अपनी पहली पोस्ट छोटी कविता के रूप  में इसी पर रखी-क्योंकि मुझे उसमें बड़ी पोस्ट लिखने में दिक्कत आ रही थी-और सबसे पहला कमेंट भी इस पर आया। उससे पहले मैंने सभी तीनों ब्लाग पर कृतिदेव की पोस्ट रखी थी और मैं मानकर चल रहा था कि अब उसी से आगे जाना है। जब कुछ ब्लाग  लेखक उन ब्लाग पर मुझसे यूनिकोड में लिखने को कह रहे थे तो भी मैं उसकी परवाह नहीं कर रहा था। ऐसे में कोई महिला ब्लाग लेखिका (जिससे  बाद में  फिर संपर्क नहीं हो सका) ने मुझे इस  बारे में ईमेल भेजकर रोमन हिंदी में लिख रही थी कि मेरे ब्लाग पढ़ने मेंे नही आ रहे तब मैंने उसे इस ब्लाग का पता दिया। उसने लिखा-‘वहां तो सब पढ़ने में आ रहा है। वाह,वाह बढ़िया  । मगर उसने कोई कमेंट इस पर नहीं लिखी। हां, मैने तब यूनिकोड में लिखने का निर्णय लिया।</p>
<p>नारद पर उसी समय इसे पंजीकृत नहीं कराया पर ब्लागवाणी के अभ्युदय के साथ ही दोनों जगह इसे पहुंचाया और हिंदी ब्लाग पर तो यह पहले से ही था। यह मेरा ऐसा ब्लाग रहा है जो बिना फोरम पर दिखे भी वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर नंबर एक पर आया था। फोरमों पर दिखने से पहले ही यह ब्लाग अपने लिये तीन  हजार पाठक जुटा चुका था। तब अनुभव की कमी के कारण मुझे समझ में कुछ नहीं आता था पर बाद में यह बात समझ में आयी कि ब्लाग का मार्ग फोरमों से आगे भी जाता है। ब्लाग की डालरों में बताने वाली वेब साईट के मुताबिक यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग है। हालांकि फिर भी यह अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग के मुकाबले बहुत सस्ता है पर फिर भी मैं इससे संतुष्ट हूं। मुझे इस ब्लाग से एक ही संदेश मिलता है‘डटे रहो, तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो उससे विचलित नहीं हो’। जिस तरह से पिछले पंद्रह दिन से यह ब्लाग व्यूज ले रहा था उससे मुझे लग रहा था कि  आज शाम तक यह जादूई आंकड़ा पार करेगा पर कल इसने अपने पुराने तेवर दिखाये जब मैं इस पर पोस्ट डालने लगा तो उसी समय यह इस आंकड़े को पार करने की तैयारी में लग रहा  था और आज तो यह उससे भी आगे जा रहा है।</p>
<p>नीचे इस ब्लाग की प्रथम बीस पोस्ट जिन्हें अधिक पाठकों ने देखा और विभिन्न फोरमों से मिलने वाले व्यूज की संख्या। यह स्पष्ट संदेश कि अध्यात्म और व्यंग्य पर ही मुझे लिखते रहना चाहिए। अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और समय समय पर तकनीकी विषय पर सहायता देने वाले मित्रों का मैं हृदय से आभारी रहूंगा। दूसरों को बहुत लघु लगने वाली यह उपलब्धि मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>प्रथम बीस पोस्ट</strong></p>
<p><strong>------------------</strong><br />
रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुं 244 <br />
चाणक्य नीति:विद्या की शोभा उसकी सिद्धि  205 <br />
मेरा परिचय=दीपक भारतदीप, ग्वालियर  202 <br />
चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें  175 <br />
पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण  175 <br />
रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं  146 <br />
रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय  142 <br />
चाणक्य नीति: कुत्ते और कौवे से गुण ग्रहण 126 <br />
चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता  123 <br />
चलना ज़रा संभल कर-हास्य कविता  119 <br />
आज नवमी-भक्तों के रक्षक हैं भगवान् श्रीर 117 <br />
रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें  115 <br />
चाणक्य नीति:पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य 115 <br />
चाणक्य नीति:बेमौसम राग अलापना हास्यास्पद 115 <br />
दादा-पोते की राजनीति और मनोरंजन  112 <br />
मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना  111 <br />
चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभ 104 <br />
दिल हुआ इधर से उधर  103 <br />
असल पर नक़ल का राज  101 <br />
चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले १००<br />
चाणक्य नीति:मनुष्य को हर विधा में पारंगत 100</p>
<p><strong>Referrer Views (पाठकों के आने के मार्ग)</strong></p>
<p><strong>---------------------------------</strong><br />
blogvani.com 718<br />
narad.akshargram.com 369<br />
hi.wordpress.com/tag/%E0%A4%9A%E0%A4%… 223<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 187<br />
botd.wordpress.com 165<br />
chitthajagat.in 151<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की बजाय  लिखना  पसंद है संघर्ष पर]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=370</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी  करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने  के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।  </p>
<p>मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले  को बेचारा या गरीब कहना शायद  कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं।  दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।</p>
<p>मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता  होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें  अपने भी पीछे हट जाते हैं।  अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।<br />
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द  के रस में प्रफुल्लित  होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता। </p>
<p>मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’</p>
<p>यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला  एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील  हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर  देखना।<br />
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता  हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित  हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ कम दर्शकों द्वारा फिल्म देखने की शिकायत बेमानी-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 12:11:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=368</guid>
<description><![CDATA[आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज मैने एक अंग्रेजी ब्लाग पर पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिये’ के बारे में चर्चा पढ़ी। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के जरिये पढ़ी इस चर्चा में भारत में इसे अधिक दर्शकों द्वारा न देखने का उल्लेख किया गया। इसकी तारीफ में बहुत सारे कसीदे भी पढ़े गये। मुझे वहां एक अनाम व्यक्ति की टिप्पणी भी दिखी जिसमें उसने इस बात का उल्लेख किया कि फिल्म में कोई बड़ा भाई है जो अपने एक गोरे  छात्र को बता रहा है कि ताजमहल का निर्माण हम मुसलमानों ने किया है। उस टिप्पणी देने वाले ने यह बात भी स्पष्ट की कि यह पाकिस्तान की फिल्म न होकर एक धर्म के लोगों को संदेश देती है कि वह अपने धार्मिक भावनाओं को अपने देश से अधिक महत्व दें।  साथ ही यह भी दर्शाती है कि पाकिस्तान का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी भ्रम का शिकार है। उस टिप्पणीकार ने लिख कि ताजमहल क निर्माण में आगरा और उसके आसपास के लोगों ने काम किया इसलिये उसे किसी विशेष से जोड़ना ठीक नहीं है। मै उसकी इस बात से सहमत था।</p>
<p>इसमें अमित नाम के व्यक्ति की टिप्पणी भी थी कि जिसने इसका उल्लेख किया गया था। मतलब यह है कि भारत के बुद्धिजीवी भी बहुत सारे भ्रमों के शिकार हैं। वह इस बात को नहीं समझ रहे कि जिस तरह विदेशों से आयातित विचारधाराओं और नारों से पूर्वाग्रहों से ग्रसित   हैं वैसे ही पाकिस्तानी भी मजहब की भावनाओं से बंधे हैं। दोनों तरफ एकता के नाम पर पाकिस्तानी ऐसी सामग्री इस देश में लायेंगे जो उनके पूर्वाग्रहों से सुसज्जित होंगी। </p>
<p>पहले ताजमहल की बात कर लें। ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था-हालांकि कुछ लोग इस पर भी विवाद खड़ा करते हैं-ऐसा कहा जाता है पर उसमें खून पसीना बहाया था मजदूरों ने और उसकी कीमत चुकाई थी इस देश के किसानों और व्यापारियों ने। उस समय कोई उद्योग नहीं थे और न कोई आयकर था। सर्वाधिक वसूली किसानों की उपज और बाहर से आने वाले व्यापारियों से होती थी। शाहजहां ने कोई घर से पैसा नहीं लगाया बल्कि इस देश की गरीब जनता की खून पसीने से लगान के रूप में या जमीदारों और साहूकारों से कर उसे इस एतिहासिक इमारत में लगाया गया। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि ताजमहल पर बहुत अधिक व्यय से भी राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो रही थी इसलिये उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता को हटाकर राज्य अपने कब्जे में ले लिया। मतलब उसे अपनी माता की स्मृति में बनाये गये इस स्मारक से अधिक अपने राज्य की दुर्दशा ने कष्ट पहुंचाया और उसने राज्य हथिया लिया।</p>
<p>पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की अगर ऐसी हालत है तो उनसे किसी प्रकार का संपर्क इस देश के लिये लाभदायक नहीं रहने वाला है। जो इतिहास ( जिसे कुछ विद्वान झूठ का पुलिंदा भी मानते हैं) का बोझ अपने सिर पर रखकर चलते हैं वह चिंतन और अध्ययन से परे होते हैं। पाकिस्तान के फिल्मकार और बुद्धिजीवियों भी इसका शिकार हैं। अगर वह विदेश में भारत की एतिहासिक इमारतों के निर्माण का गौरव अपने मजहब के नाम से दिखाते हैं तो फिर उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह इस देश के आम लोगों के सच्चे सहानुभूति प्रदान करने वाले हैं।</p>
<p>मैंने वह फिल्म नहीं देखी। न उसमें मेरी रुचि है क्योंकि इस तरह की फिल्में मुझे किसी तरह का मनोरंजन नहीं देतीं। जहां तक ज्ञान की बात है तो अभी बहुत सारी किताबें हैं जिससे पढ़ना है और मनोरंजन तो साहित्य  या संगीत ही से हो पाता है और हिंदी में लिखा अभी पूरा पढ़ा भी नहीं हैं सो एक पाकिस्तानी फिल्म क्या दिखायेगी जबकि भारतीय फिल्में भी इससे परे हैं। इसी ब्लाग में मैंने पढ़ा कि उसमें कोई प्रेम कहानी है। भारत हो या पाकिस्तान की कोई भी फिल्म प्रेम कहानी के बिना बनती नहीं। हां कुछ फिल्मकार उसकी आड़ में अपने  के धनदाता के  विचारों के  के अनुसार कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक पुट डालते हैं ताकि वह प्रसन्न रहें। यह भी कोई ऐसी फिल्म रही होगी। भारतीय दर्शक अगर उसमें कम रुचि ले रहे हैं तो इसका कारण यही है कि उनको पता चल गया था कि इस फिल्म में कला के नाम पर कुछ नहीं है। अब इस तरह कुछ लोग हमारे देश की मानसिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं तो पहले उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस देश में सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और उनसे भरपूर मनोरंजन होता है तब क्यों वह ऐसी साधारण फिल्म को देखना चाहेगा जिसका प्रचार केवल इसलिये हो रहा है कि उसे एक पाकिस्तानी ने बनाया है। जहां तक मेरी जानकारी है पाकिस्तान में भी भारतीय फिल्में इस पर भारी पड़ीं हैं। ऐसे में क्यों केवल भारत में इसको कम देखे जाने की शिकायत हो रही है। वैसे भी भारत के आम लोग इस बात को समझ गये हैं कि फिल्मों की आड़ में किस तरह उस पर  ऐसी संस्कृति और काल्पनिक घटनायें प्रस्तुत की जा रही है जो उसकी समझ से परे है और जो कथित विद्वान उस पर दाद चाहते है वह स्वयं भ्रमित हैं.</p>
<p><strong>it transtalshan by googl tool</strong></p>
<div id="result_box" dir="ltr"><strong>The complaint by the audience could reduce redundant - Stories</strong></div>
<div id="result_box" dir="ltr">
<div id="result_box" dir="ltr">Today I on an English Blog Pakistani film 'for God' read about. Hindi translation from English to read through this discussion in India in more viewers by not see it mentioned. It also praised the many embroidered were read. There's an anonymous person I see a comment which he also noted that this is a film in a big brother who is a student tell the Europeans is that we Muslims have done to build the Taj Mahal. He made the comment it's also clear that this is Pakistan's film and not a religion of the people is that it gives a message to his religious feelings of more importance to his country. It also shows that a large section of Pakistan is still a victim of confusion. Has been a commentator writing that the construction of the Taj Mahal, Agra and nearby people have worked so it is not proper to link a particular. I ag