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	<title>hindi-kahani &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-kahani"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 10:25:16 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[शेर ने कहा-‘हमें मारकर सनसनी फैलायेंगे’-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 15:34:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शेरनी ने शेर से कहा
‘सुना है तू नरभक्ष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शेरनी ने शेर से कहा<br />
‘सुना है तू नरभक्षी हो गया है<br />
शर्म नहीं तुझे ऐसा करने में<br />
अब लोग झूंड बनाकर ढूंढ रहे है<br />
हथियार लेकर<br />
तुझे डर नहीं लगता मरने में<br />
अगर तू इंसान के हाथ से नहीं मरा<br />
तो भी उसका मांस खाकर<br />
बहुत बड़े पाप का भागी हो जायेगा<br />
उसके जहर से जल्दी मर जायेगा<br />
कई जन्म तक चूहे और बकरी<br />
जैसी पिटने वाली यौनियों में<br />
जन्म पायेगा<br />
इससे बहुत समय लगेगा तुझे उबरने में’</p>
<p>शेर ने कहा<br />
‘यह मुझे हमारे खानदान को मिटाने के लिये<br />
इंसानों का रचा गया प्रोपेगंडा<br />
जंगल के सभी  जानवरों को नष्ट करना<br />
उनका खास एजेंडा है<br />
इस समय टीवी चैनलों पर कोई<br />
खास प्रोग्राम नहीं है<br />
खबर बनाना है,ढूंढने का काम नहीं है<br />
निगाहें कहीं<br />
 निशाना और कहीं है<br />
पहले खलनायक बनाते हैं<br />
फिर नायक बताते है<br />
पर हम इंसान नहीं है<br />
जो उनकी भाषा बोल पायेंगे<br />
पहले वह हमें नरभक्षी बताकर<br />
सभी की सहानुभूति जुटायेंगे<br />
फिर आकर हमें मार जायेंगे<br />
खबर सुनाकर  सनसनी फैलायेंगे<br />
इसलिये यह जगह छोड़ कर चलते हैं अन्यत्र<br />
यहां का पानी की बूंदें पीने का<br />
अपना हो गया कोटा पूरा<br />
चलते है दूर यहां से<br />
पानी पियेंगे अब दूसरे झरने में</strong><br />
.............................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मकानों की छत बड़ी नहीं बनानी थी-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=171</link>
<pubDate>Wed, 13 Aug 2008 15:25:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=171</guid>
<description><![CDATA[वर्षा ऋतु का की पहली फुहार
प्रेमी को म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वर्षा ऋतु का की पहली फुहार<br />
प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार<br />
‘चले आओ,<br />
घर पर अकेली हूं<br />
चंद लम्हे सुनाओ अपनी बात<br />
आज से शुरू हो गयी बरसात<br />
मन में जल रही है तन्हाई की ज्वाला<br />
आओ  अपने मन भावन शब्दों से<br />
इस मौसम में बैठकर करें कुछ अच्छी बात<br />
अगर वक्त निकल गया तो<br />
तुम्हें दिल से निकालते हुए दूंगी दुत्कार’</p>
<p>प्रेमी पहुंचा मोटर सायकिल पर<br />
दनादनाता हुआ उसके घर के बाहर<br />
चंद लोग खड़े थे वहां<br />
बरसात से बचने के लिये<br />
प्रेमिका के घर की छत का छाता बनाकर<br />
जिसमें था उसका चाचा भी था शामिल<br />
जिसने भतीजे को रुकते देखकर कहा<br />
‘तुम हो लायक भतीजे जो<br />
चाचा को देखकर रुक गये<br />
लेकर चलना मुझे अपने साथ<br />
जब थम जाये बरसात<br />
आजकल इस कलियुग में ऐसे भतीजे<br />
कहां मिलते हैं<br />
मुझे आ रहा है तुम पर दुलार’</p>
<p>प्रेमी का दिल बैठ गया<br />
अब नहीं हो सकता था प्यार<br />
जिसने उकसाया था वही बाधक बनी<br />
पहली बरसात की फुहार<br />
उधर से मोबाइल पर आई प्रेमिका की फिर पुकार<br />
प्रेमी बोला<br />
‘भले ही मौसम सुहाना हो गया<br />
पर इस तरह मिलने का फैशन भी पुराना हो गया है<br />
करेंगे अब नया सिलसिला शुरू<br />
तुम होटल में पहुंच जाओ यार<br />
इस समय तो तुम तो घर में हो<br />
मैं नीचे  छत को ही छाता बनाकर<br />
अपने चाचा के साथ खड़ा हूं<br />
बीच धारा में अड़ा हूं<br />
जब होगी बरसात मुझे भी जाना होगा<br />
फिर लौटकर आना होगा<br />
करना होगा तुम्हें  इंतजार’</p>
<p>प्रेमिका इशारे में समझ गयी और बोली<br />
‘जब तक चाचा को छोड़कर आओगे<br />
मुझे अपने से दूर पाओगे<br />
कहीं मेरे परिवार वाले भी इसी तरह फंसे है<br />
करती हूं मैं अपने वेटिंग में पड़े<br />
नंबर एक  को पुकार<br />
तुम मत करना अब मेरे को दुलार’</p>
<p>थोड़ी देर में देखा प्रेमी ने<br />
वेटिंग में नंबर वन पर खड़ा उसका विरोधी<br />
कंफर्म होने की खुशी में कार पर आया<br />
और सीना तानकर दरवाजे से प्रवेश पाया<br />
उदास प्रेमी ने चाचा को देखकर कहा<br />
‘आप भी कहां आकर खड़े हुए<br />
नहीं ले सकते थे भीगने का मजा<br />
इस छत के नीचे खड़े होने पर<br />
ऐसा लग रहा है जैसे पा रहे हों सजा<br />
झेलना चाहिए थी आपको<br />
बरसात की पहली फुहार’</p>
<p>चाचा ने कहा<br />
‘ठीक है दोनों ही चलते हैं<br />
मोटर सायकिल पर जल्दी पहुंच जायेंगे<br />
कुछ भीगने का मजा भी उठायेंगे<br />
आखिर है बरसात की पहली फुहार’</p>
<p>प्रेमी भतीजे ने मोटर साइकिल<br />
चालू करते हुए आसमान में देखा<br />
और कहा-<br />
‘ऊपर वाले बरसात बनानी तो<br />
मकानों की छत बड़ी नहीं बनाना था<br />
जो बनती हैं किसी का   छाता<br />
तो किसी की छाती पर आग बरसाती हैं<br />
चाहे होती हो बरसात की पहली  फुहार<br />
.........................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://rajraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हवाई मुद्दों का सौदा-लघु कथा]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=464</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 13:00:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=464</guid>
<description><![CDATA[कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम और तस्करी का सामान लिये हुए थे कुछ लोग अपने हाथ में जमीन के असली और नकली कागज पकड़े हुए थे। यह ऐसे लेनदेन का काम करते थे जिसे दो नंबर का कहा जाता है पर लेबल उस पर एक नंबर का ही होता है। इनको शराब,अफीम और भूमाफिया भी कहा जाता है यह नाम इनको मीडिया वालों ने सम्मान के रूप में दिया है ताकि कोई इनको अपराधी न कहे। </p>
<p>हुआ यू कि एक दिन यह सब  माफिया अपने हाथ में हमेशा की तरह अपने व्यवसाय के अनुसार सारे सामान लिये बाजार में जा रहा था तो देखा कि कोई कलम कागज लिये तो कोई कैमरा लिये अपने भागता हुआ उनके पीछे आ रहा है। सबके माथे की पट्टी पर हुआ था ‘मीडिया’। उनकेा आते देखकर माफिया के सरदार ने कहा-‘भागो,यह मीडिया वाले आ रहे हैं। हम जिन इलैक्ट्रोनिक सामान की तस्करी कर लाते थे उससे यह मीडिया बहुत पावरफुल हो गया है। यह हमारा स्टिंग आपरेशन करने वाला है सो भागो।’<br />
तब उनमें से एक बोला-‘आने दो। हम उनके सरदार से बात कर लेते हैं। अरे, इस जमाने में और भी मामले में हैं। हमें दिखाकर इनको क्या मिलेगा?’</p>
<p>तब तक मीडिया वाले भी वहां पहुंच गये और लगे फोटो खींचने और साक्षात्कार लेने-‘आपको यह धंधा करते हुए कैसा लग रहा है?’<br />
‘क्या आपको कोई पकड़ता नहीं है।’<br />
आपके धंधे के मूल मंत्र क्या हैं?’<br />
एक माफिया ने मीडिया के सरदार से कहा-‘यार, तुम आज हमारी बदौलत ही इतने पावरफुल हुए हो। अगर हमारी भद्द पिटी तो तुम्हारा भी बुरा हाल होगा।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘पर अब बताओ हम करें क्या? दिखाने और छापने के लिये कुछ सनसनीखेज तो चाहिए।’<br />
माफिया सरदार ने कहा-‘यार, इसका मतलब तुम हमें ही निपटा दोगे। समाज ने अगर हमसे डरना बंद कर दिया तो सबसे पहले तुम्हारा ही पता कटेगा। तुम लोग भी कोई दूध को धुले नहीं हो।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘अब तुम्हीं बताओ। हम अपना काम कैसे चलायें। सनसनी खबरें कब तक और कहां से लायें।<br />
समझदार माफिया ने कहा-‘चलो अभी मास्टर माइंड के यहां चलते हैं। वह कोई न कोई रास्ता निकाल देगा। वह हवा में तीर चलाने की कला में माहिर है।’</p>
<p>दोनों मास्टर माइंड के पास पहुंचे। उसने कहा-‘मेरे को माल देते जाओ। माफिया वाले अपना काम करते रहें और मीडिया वालों को भी मुद्दे ढूंढने के लिये कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है। उनके घर पर रोज नये मुद्दे पहुंच जायेंगे, पर उस पर बहस अधिक करना पर मूल विषय पर कभी नहीं जाना क्योंकि वह केवल हवाई मुद्दे होंगें।</p>
<p>मीडिया और माफिया दोनों के सरदारों ने उत्सुकता से पूछा ? कैसे?’<br />
मास्टर माइंड ने कहा-‘यह जमीन खाली पड़ी है। इस पर किसी मकान बनाने का प्रस्ताव पहले उछालेंगे और फिर बहस करवायेंगे। इस पर तुम्हारा समय अच्छा निकल जायेगा। बस यह कहने की कोशिश बिल्कुल मत करना कि इस इमारत बनी तो नहीं बनी तो क्या फर्क पड़ना है क्योंकि इससे विषय बिल्कुल खत्म हो जायेगा। यह देखो पेड़ से पता गिर गया है इसका सीधा प्रसारण करना और पर्यावरण पर भारी संकट घोषित करना। ऐसे दिखाना जैसे कि पूरा पेड़ गिर गया है।  किसी ऐसे विद्वान को मत बुलाना जो कहे कि ऐसे तो पते रोज गिरते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कहीं मंदिर का मामला होगा तो कहीं दहेज का सब जगह अपनी टांग ऐसे फंसाना जैसे वह राष्ट्रीय मामला हो।’</p>
<p>मीडिया के सरदार ने कहा-‘यह तो हम ही कर लेंगे। फिर तुम्हारी क्या जरूरत है?’<br />
 माफिया वाले हमें ही ऐसे मुद्दे बनाने के लिये किराये पर लें तो क्या फर्क पड़ता है।’<br />
मास्टर माइंड हंस पड़ा-‘लोगों को कहां से लाओगे? यह काम तो हम ही कर सकते हैं। यह भीड़ को भेड़ की तरह हांकने वाले सरदार भी हैं जो अपनी ताकत रखते हैं वह हमारी  सलाह ही मानते  हैं भले ही तुम दोनोे की कृपा पर वह भी चलते हैं। जिंदा सांप से अधिक मरे हुए सांप को जीवंत मुद्दा बनाना  इतना आसान नहीं है। इसलिये तुम्हें हमेशा ऐसे हवाई मुद्दों के लिये हम पर निर्भर रहना पड़ेगा।’<br />
इस तरह तीनों के बीच हवाई मुद्दों को बनाये रखने का फैसला हुआ।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=454</guid>
<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल
सब कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
..........................................</p>
<blockquote><p><strong>href="http://deepak.raj.wordpress.com"&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले प्रेमपत्र से दूसरा भाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 13:21:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=445</guid>
<description><![CDATA[लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये<br />
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और<br />
अपना नाम लिखा प्रेमी<br />
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया<br />
लड़की ने  पत्र बिना  उत्तर के वापस लौटाया<br />
दूसरे में उसने लिखी शायरी<br />
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया<br />
लड़की को आशुका बताया<br />
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया</p>
<p>पहली मुलाकात में<br />
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा<br />
तो उसने बताया<br />
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है<br />
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है<br />
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं<br />
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं<br />
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं<br />
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं<br />
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं<br />
वैसे तो मुझे कविता और शायरी<br />
दोनों की की समझ नहीं है<br />
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है<br />
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और<br />
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा<br />
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम<br />
तुम्हारा आशिक होना और<br />
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा<br />
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ<br />
इसलिये मुझे  दूसरा प्रेम पत्र भाया<br />
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया<br />
.........................................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 17:07:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</guid>
<description><![CDATA[एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक श्रोता ने कवि से कहा<br />
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो<br />
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा  दो’<br />
कवि ने उदास होते हुए कहा<br />
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं<br />
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी<br />
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर<br />
नींद नहीं आयेगी<br />
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी<br />
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो<br />
अब पहले की तरह कांव-कांव कर<br />
कहां नजर आते<br />
दिख जायें तो इंसानों की<br />
बुरी नजर का शिकार हो जाते<br />
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें<br />
 तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’<br />
......................................................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस सप्ताह के चुनींदा फ्लाप पाठ इस पत्रिका पर प्रस्तुत हैं]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 11:39:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य</strong></p></blockquote>
<p>जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!<br />
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’<br />
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’<br />
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीं रख लेती।’<br />
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।<br />
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’<br />
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की साहित्य पत्रिका’ </a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन क लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेख के अन्य ब्लाग।<br />
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’</p>
<p>मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’<br />
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’<br />
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’<br />
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’</p>
<p>बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।<br />
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’<br />
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’<br />
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे। </p>
<p>एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’<br />
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’</p>
<p>उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।<br />
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’<br />
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।<br />
मैंने हंसते हुए कहा-‘तो रख लो।’<br />
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।<br />
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफादारी  से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’<br />
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’</p>
<p>मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफादारी  से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’<br />
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’<br />
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम </p>
<blockquote><p><strong>मिट्टी और मांस की मूर्ति-लघुकथा</strong></p></blockquote>
<p>मूर्तिकार फुटपाथ पर अपने हाथ से बनी मिट्टी की भगवान के विभिन्न रूपों वाली छोटी बड़ी मूर्तियां बेच रहा था तो एक प्रेमी युगल उसके पास अपना समय पास करने के लिये पहुंच गया।<br />
लड़के ने तमाम तरह की मूर्तियां देखने के बाद कहा-‘अच्छा यह बताओ। मैं तुम्हारी महंगी से महंगी मूर्ति खरीद लेता हूं तो क्या उसका फल मुझे उतना ही महंगा मिल जायेगा। क्या मुझे भगवान उतनी ही आसानी से मिल जायेंगे।’</p>
<p>ऐसा कहकर वह अपनी प्रेमिका की तरफ देखकर हंसने लगा तो मूर्तिकार ने कहा-‘मैं मूर्तियां बेचता हूं फल की गारंटी नहीं। वैसे खरीदना क्या बाबूजी! तस्वीरें देखने से आंखों में बस नहीं जाती और बस जायें तो दिल तक नहीं पहुंच पाती। अगर आपके मन में सच्चाई है तो खरीदने की जरूरत नहीं कुछ देर देखकर ही दिल में ही बसा लो। बिना पैसे खर्च किये ही फल मिल जायेगा, पर इसके लिये आपके दिल में कोई कूड़ा कड़कट बसा हो उसे बाहर निकालना पड़ेगा। किसी बाहर रखी मांस की मूर्ति को अगर आपने दिल में रखा है तो फिर इसे अपने दिल में नहीं बसा सकेंगे क्योंकि मांस तो कचड़ा हो जाता है पर मिट्टी नहीं।’<br />
लड़के का मूंह उतर गया और वह अपनी प्रेमिका को लेकर वहां से हट गया</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की साहित्य पत्रिका’</a> पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन क लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेख के अन्य ब्लाग।<br />
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>  प्यार में भी भला कभी वादे किये जाते हैं-हिंदी शायरी</strong></p></blockquote>
<p>जन्नत में बिताने के लिये सुहानी रात<br />
आसमान से चांद सितारे तोड़कर लाने की बात<br />
प्यार के संदेश देने वाले ऐसे ही<br />
किये जाते हैं<br />
बातों पर कर ले भरोसा<br />
शिकार यूं ही फंसाये जाते हैं<br />
प्यार किस चिडिया का नाम<br />
कोई नहीं जान पाया<br />
रोया वह भी जिसने प्यार का फल चखा<br />
तरसा वह भी जिसने नहीं खाया<br />
प्यार का जो गीत गाते<br />
कोई ऊपर वाले का तो<br />
कोई जमीन पर बसी सूरतों के नाम<br />
अपनी जुबान पर लाते<br />
कोई नाम को योगी<br />
तो कोई दिल का रोगी<br />
धोखे को प्यार की तरह तोहफे में देते सभी<br />
जो भला दिल में बसता है<br />
किसी को कैसे दिया जा सकता है<br />
सर्वशक्तिमान से ही किया जा सकता है<br />
उस प्यार के में भी भला<br />
कभी वादे किये जाते हैं<br />
....................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की साहित्य पत्रिका’ </a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन क लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेख के अन्य ब्लाग।<br />
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<blockquote><p><strong>  चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी</strong></p></blockquote>
<p>शाम होते ही<br />
सूरज के डूबने के बाद<br />
काली घटा घिर आयी<br />
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी<br />
मन उदास था बहुत<br />
घर पहुंचते हुए<br />
छोटे चिराग ने दिया<br />
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास<br />
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी<br />
.........................................</p>
<blockquote><p><strong>अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से निकल जातीं-हिन्दी शायरी<br />
यूं</strong></p></blockquote>
<p> तो वक्त गुजरता चला जाता<br />
पर आदमी साथ चलते पलों को ही<br />
अपना जीवन समझ पाता<br />
गुजरे पल हो जाते विस्मृत<br />
नहीं हिसाब वह रख पाता</p>
<p>कभी दुःख तो कभी होता सुख<br />
कभी कमाना तो कभी लुट जाना<br />
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से<br />
निकल जातीं<br />
जिसमें जी रहा है<br />
वही केवल सत्य नजर आती<br />
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता<br />
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही<br />
अपने को लड़ता पाता </p>
<p>हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये<br />
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये<br />
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका<br />
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर<br />
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश सोने की लंका<br />
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता<br />
तो कभी कुछ पाकर बहकता<br />
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता </p>
<p>तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं<br />
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही<br />
मुक्त नजर आता<br />
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया<br />
चलाती है वह चारों तरफ<br />
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता<br />
.....................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 16:31:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</guid>
<description><![CDATA[वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो  गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’<br />
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों के बीच खाने का सामान बांट रहा था और उसे लेकर वही भिखारी भी खा रहा था।<br />
लेखक ने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-‘खाना तो मिला नहीं। अब चाय पीकर ही काम चलाऊंगा।<br />
वह हाथ फैलाये उसके सामने खड़ा था। लेखक ने उससे कहा-‘मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा, पर इससे पहले तुम्हं साक्षात्कार देना होगा। आओ मेरे साथ!<br />
थोड़ी दूर जाकर उस लेखक ने उससे पूछा-‘तुम्हारे घर में क्या तुम अकेले हो।’<br />
भिखारी-‘‘नही! मुझे दो लड़के हैं और दो लडकियां हैं। सबका ब्याह हो गया है।’<br />
लेखक-‘फिर तुम भीख क्यों मांगते हो? क्या तुम्हारे लड़के कमाते नहीं हैं।<br />
भिखारी-‘बहुत अच्छा कमाते हैं, पर आजकल बाप को कौन पूछता है? मेरे को सूखी रोटी देते हैं और मैं चिकनी चुपड़ी और माल खाने वाला आदमी हूं।’<br />
लेखक-‘इस उमर में वैसे भी कम चिकनाई खाना चाहिए। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। डाक्टर लोग यही कहते हैं।<br />
भिखारी-‘वह तो सेठों के लिये कहते हैं भिखारियों के लिये नहीं।<br />
लेखक-‘मंदिर में अंदर जाते हो।<br />
भिखारी-‘मंदिर के अंदर हमें आने भी नहीं देते और न हम जाते। हम तो बाहर भक्तों के दर्शन ही कर लेते हैं। भगवान ने कहा भी है कि मेरे से बड़े तो मेरे भक्त हैं।<br />
लेखक-‘रहते कहां हो?<br />
भिखारी-‘एक दयालू सज्जन ने हम भिखारियों के लिये एक मकान किराये पर ले रखा है। उसमें वही किराया भरता है।’<br />
लेखक-‘तुम्हारे लड़के तुम्हें नहीं रखते।’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a> पर मूल रूप से प्रकाशित है। इसके प्रकाशन के लिये अन्य कहीं अनुमति प्रदान नहीं की गयी है।<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>भिखारी-‘वह तो मिन्नतें करते हैं पर वहां कौन उनकी चिकचिक सुनेगा।  मैं तो बचपन से ही आजाद रहने वाला आदमी हूं।  वह क्या खिलायेंगे मुझे? मैंने खाने के मामले में बाप की परवाह नहीं की। वह भी सूखी खिलाता था पर बाहर मुझे भीख मांगने पर जो खाने का मिलता था वह बहुत अच्छा होता था।’<br />
लेखक-‘बचपन से भीख मांग रहे हो। बच्चों की शादी भी भीख मांगते हुए करवाई।<br />
भिखारी-‘नहीं! पहले तो मेरा बाप ही मेरे परिवार को पालता रहा। फिर बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो नौकरी कर वही काम चलाते रहे। मैं अपनी बीबी के लिये ही कुछ सामान घर ले जाता हूं। वह बच्चों के पास ही रहती है। आजकल की औलादें ऐसी हैं उसकी बिल्कुल इज्जत नहीं करतीं। मैं सहन नहीं कर सकता।’<br />
लेखक-तुम्हें भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती।’<br />
भिखारी ने कहा-‘जिसने की शर्म उसकी फूटे कर्म।’<br />
लेखक उसको  घूर कर देख रहा था! अचानक उसने पीछे से आवाज आई-‘बाबूजी, इससे क्या बहस कर रहे हो। भीख मांगना एक आदत है जिसे लग जाये तो फिर नहीं छूटती। कोई मजबूरी में भीख नहीं मांगता। जुबान का चस्का ही भिखारी बना देता है।’<br />
लेखक ने देखा कि थोड़ी दूर ही एक बुढि़या भिखारिन पुरानी चादर बिछाये बैठी थी। उसके पास एक लाठी रखी थी और सामने एक कटोरी । उसके पास रखी पन्नी में कुछ खाने का सामान रखा हुआ था जो शायद दानी भक्त दे गये थे और वह अभी खा नहीं रही थी।<br />
लेखक ने उस भिखारी को दस रुपये दिये और फिर जाने लगा तो वह भिखारिन बोली-‘बाबूजी! कुछ हमको भी दे जाओ। भगवान के नाम पर हमें भी कुछ दे जाओ।’<br />
लेखक ने पांच रुपये उसके हाथ में दे दिये और अपने होठों में बुदबुदाने लगा-‘भीख मांगना मजबूरी नहीं आदत होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे की लड़की के भागने की फिक्र-लघुकथा ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=434</link>
<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 17:05:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=434</guid>
<description><![CDATA[‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भाग गयी’<br />
‘किसके साथ’’<br />
‘अरे, भागी किसके साथ होगी? तुम्हारे अंदर इतनी अक्ल भी नहीं है। किसी लड़के के साथ भाग गयी। बहुत बनती थी न! मेरी लड़की कंप्यूटर सीख रही है। चित्रकारी सीख रही हैं। सब दिखावा था। अब तो उसका मूंह उतरा हुआ है।’<br />
‘अरे, सब दिखावे की बात है। मन ही मन खुश हो रही होगी कि बिना दहेज के लड़की से पीछा छूटा।’<br />
‘लड़की को बहुत छूट दे रखी थी!’<br />
मोहल्ले की औरतें इसी तरह की बातें कर रही थी। 13 नंबर वाली को कुछ पता ही नहीं। वह अपने काम में लगी रही । दो दिन तक वह बाहर नहीं निकली। अब तो कालोनी की उस लाईन के लोगों का सब्र टूट गया था। आखिर तीस नंबर वाली ताई ने सबका प्रतिनिधत्व करने का निर्णय करते हुए उसके पास जाने का निर्णय किया। बड़ी उमर के कारण उनको अपने मान-सम्मान पर किसी खतरे की आशंका नहीं थी।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a> की मूल रचना है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। कहीं अन्यत्र प्रकाशन होने की सूचना इस <a href="http://dpkraj.wordpress.com"><strong>पते</strong></a> पर दें।<br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक</a> </strong></p></blockquote>
<p>वह 13 नंबर वाली के पास पहुंची। वह घर का काम कर थकी होने के कारण सो रही थी। 30 नंबर वाली ताई ने उससे कहा-‘बड़ी बुरा किया तुम्हारी लड़की ने। इस तरह माता पिता का अपमान कर घर से नहीं भागना चाहिये था। अरे, तुम क्या उसकी शादी में दहेज देने की हैसियत नहीं रखते क्या? उसने अपने जन्म देने वाले माता पिता की इज्जत का ख्याल नहीं किया।<br />
13 नंबर वाली ने पूछा-‘मेरी लड़की भाग गयी? कब? किसके साथ?<br />
30 नंबर वाली ने कहा-‘अब छिपाने से क्या फायदा? सबको पता चल गया है। पूरे शहर में हवा फैली है। उस दिन रात को 11 बजे तुम्हारी लड़की घर से अकेली सामान लेकर जाते हमने देखी है। भला कोई जवान लड़की अटैची लेकर रात को जाती है दौड़ती हुई घर से जाती है क्या? तुम भी घर से शर्म के मारे दो दिन से बाहर नहीं निकली।<br />
13 नंबर वाली बोली-अच्छा! अब मैं समझी। उस दिन मेरा भाई रात को दस बजे आया था। वह केवल एक घंटे के लिये इस शहर में आया और मेरी लड़की को साथ ले जाने के लिये यहां रुका था। 12 बजे की उसकी ट्रेन थी। इधर भानजी तैयार हो रही थी वह बाहर आटो कराने के लिये सामान सहित निकल गया। वहां उसने मोबाइन कर अपनी भानजी को कहा  कि आटो दूर सड़क पर खड़ा है जल्दी आओ। इसलिये वह सामान लेकर दौड़ती हुई गयी। लड़की ननिहाल में लड़का ताऊ के पास गया हुआ हैं घर में अकेली सारा काम कर रही हूं । पहले दोनों थोड़ हाथ बंटाते थे पर अब अकेले होने के कारण दो दिन से बाहर नहीं निकल रही और अब तो निकलूंगी भी नहीं। बच्चों के जाने पर अकेले में उदासी नहीं आयेगी तो क्या जश्न मनाऊंगी?</p>
<p>30 नंबर वाली ताई का चेहरा उतर गया। वह बोली-‘मुझे क्या पता? बीस नंबर वाली बुआ सबसे यही कह रही है।’<br />
13 नंबर वाली ने कहा-‘ बीस नंबर वाली के पास जाऊंगी तो वह कहेगी कि चालीस नंबर वाली चाची कह रही थी। यहां तो सब ऐसे ही हैं कि दूसरों की लड़की घर से भागे और उस पर चर्चा कर मजे लें। मैंने सबको देखा है और सबको इसलिये मना भी करती हूं कि वह समझ लें कि बच्चे सबके हैं ओर किसी में दोष देखने से अपने बच्चे में भी दोष आ सकता है। यहां तो लोग अपनी कम दूसरे की लड़की के लड़की के भागने की  फिक्र अधिक करते हैं।’<br />
30 नंबर वाली ताई अपना मूंह लेकर लौट गयी।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल यानि बकबक-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=428</link>
<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 09:56:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=428</guid>
<description><![CDATA[मित्र ने घर में घुसते ही
हाथ में मोबाइ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मित्र ने घर में घुसते ही<br />
हाथ में मोबाइल फोन थमाते हुए कहा-<br />
‘दीपक बापू , इसका नाम हिंदी में बताओ<br />
भले ही मैं पढ़ता लिखता नहीं पर<br />
मातृभाषा के प्रति लगाव  है<br />
इसके अंग्रेजी शब्द मोबाइल से अलगाव है<br />
यह नाम लेते ही होती है आत्मग्लानि<br />
जैसे हो रही हो आत्मसम्मान की हानि<br />
इस संकट से निकलने का मार्ग बताओ<br />
अनुवाद की शर्त पर खरा उतरे<br />
ऐसा मातृभाषा का शब्द बताओ’</p>
<p>हाथ से उठाकर पलंग पर मोबाइल को फैंका<br />
फिर मित्र को घूरकर देखा<br />
अपनी टोपी उतारी और गंजे सिर पर<br />
हाथ फिराते हुए गुस्से में करने लगे कविताई<br />
और कहैं महाकवि दीपक बापू-<br />
‘फ्लाप लेखक  हूं इसलिये हमारा मजाक उड़ाते हो<br />
शब्दों का कोई शोरूम बनाने की नहीं शक्ति मेरी<br />
यही अनुभव करवाते हो<br />
फिर भी दोस्ती का कर्तव्य निभाते हुए<br />
समझाता हूं<br />
हर शब्द का शाब्दिक अनुवाद नहीं होता<br />
काम से भी इसका कहीं कही नाम होता<br />
इस भारत में कुल दो सौ से अधिक<br />
बड़े लोग नहीं होंगे जिनके पास<br />
अपने काम से फुर्सत नहीं है<br />
बाकी दिखायें कितना भी स्वयं को व्यस्त<br />
 इसकी जरूरत नहीं है<br />
जब से हमने किया है अपने मोबाइल का स्विच आफ<br />
सारे दुष्ट ग्रह हो गये हैं साफ<br />
तुम पहले करते थे शहर के दूसरे<br />
सिरे पर बैठकर हैरान<br />
अब संकट बढ़ाने के लिये<br />
हमारे पास आते हुए<br />
तुम भी होते हो परेशान<br />
लिखते थे तब  अपनी पत्रिका पर कोई पाठ<br />
तुम्हारी घंटी देती हमारा ध्यान  काट<br />
अब जब तक आये नहीं<br />
तब कर लेते हम अपना काम कहीं<br />
लोगों ने तो इसे समझ लिया खिलौना<br />
पकड़े रहते हैं इसका हर समय हर  कोना<br />
अपने लोगों की परेशानियों की खबर जल्दी मिले<br />
ताकि जल्दी हमदर्दी दिखाने पहुंच जायें<br />
और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढायें<br />
इसलिये इसे अपने दिल के पास<br />
लगाये  फिर रहे हैं<br />
अपने ही पैदा किये तनाव में घिर रहे हैं<br />
इश्कबाजी और फालतू बातें करते देखकर<br />
यह नहीं लगता कि यह कोई काम का है<br />
करते हैं सभी बकबक, वार्तालाप तो नाम का है<br />
इसलिये तुम्हें या जमाने को नहीं जमे<br />
हमने मोबाइल फोन का नाम बकबक रख दिया<br />
इसका न हो भले कोई तार्किक आधार<br />
पर मोबाइल हो गया है बकबक का बाजार<br />
हमारी बात समझ में न आये तो<br />
देश में तो इसका हल संभव नहीं है<br />
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा करवाओ<br />
.....................................................................</p>
<blockquote><p>नोट-यह हास्य व्यंग्य रचना काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से इसका मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे एक मित्र द्वारा मजाक में यह प्रश्न उठाये जाने  पर कवि/लेखक ने इस पर लिखा है।<br />
दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[काला और सफेद बाजार-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 15:49:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=406</guid>
<description><![CDATA[अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’<br />
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया<br />
‘जब कारखाने में चीज बनती हो<br />
पर बाजार में नहीं दिखती हो<br />
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है<br />
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो<br />
समझ लो आपूर्ति है कम<br />
सफेद बाजार को उन्होंने<br />
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया<br />
.............................................</p>
<p>बाजार भी भला कभी<br />
काले और सफेद होते<br />
सौदागर की नीयत जैसी<br />
वैसे ही उसके नाम होते<br />
छिपकर कोई नहीं करता अब<br />
हर शय के सौदे सरेआम होते<br />
खरीददार की मजी नहीं चलती<br />
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता<br />
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते<br />
चाहे दूने और चौगुने दाम होते<br />
.....................................<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेजान चीजों की नीलामी, जिंदगी की नीलामी नहीं होती-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=187</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 16:35:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=187</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू तुम्हा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू तुम्हारे हिट होने का<br />
एक नुस्खा लाया हूं<br />
सफलता बतलाने वाले डाक्टर से<br />
सलाह कर आया हूंं<br />
लोग कर रहे हैं अंतर्जाल पर<br />
अपनी जिंदगी नीलाम<br />
बेच रहे अपनी संपत्ति<br />
तुम भी अपने ब्लाग के साथ<br />
यही करो अनोखा  काम<br />
एक बार लोगों से टेंडर (निविदा) मंगवा लो<br />
अपने ब्लाग की बोली लगवा लो<br />
जब हो जायेंगे सब नीलाम<br />
हो जायेगा तुम्हारा भी नाम<br />
लोग अपनी संपत्ति बेचकर<br />
हवा में उड़ जाने का प्लान बना रहे हैं<br />
तुम तो वैसे ही रहते हो हवा में<br />
कोई छद्म नाम से ब्लाग बना लेना<br />
नहीं बिकते तो कोई बात नहीं<br />
हो जाओगे तुम भी हिट<br />
जब पढ़ेंगे सब तुम्हारा नाम<br />
यह सोच विचार कर प्रस्ताव लाया हूं’</p>
<p>कंप्यूटर पर टंकित करने से<br />
हाथ रोकते हुए<br />
अपनी टोपी को सिर पर ढोते हुए<br />
पलट कर गुस्से में लालपीले होकर देखा<br />
फिर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कम्बख्त तुम्हारी हर बात<br />
हमारे ब्लाग पर ही क्यों चली आती है<br />
हम लिखते और पढ़ते हैं<br />
पर तुम्हारी नजर कभी नहीं जाती है<br />
होना चाहिए पागल हमें पर<br />
तुम होते नजर आ रहे हो<br />
जिंदगी की नीलामी तो आसान है<br />
उसमें मकान, फ्रिज, ऐसी, कार और<br />
शानौशौकत का सामान है<br />
भला कोई जिंदा चीज थोड़े ही उसमें शामिल है<br />
लोग आजकल इसी को ही जिंदगी कहते हैं<br />
इसलिये ही इनकी नीलामी को<br />
जिंदगी की नीलामी कहते हैं<br />
ब्लाग में बसते हैं हमारे जिंदा जज्बात<br />
जब चाहे लिखते हैं दिन हो या रात<br />
अंग्रेजी का होता तो सोचते<br />
हिंदी ब्लाग तो<br />
लोग अभी देखना भी पंसद नहीं करते<br />
अंग्रेजी पढ़ने में न आये तो<br />
फोटो देखकर काम चला लेंगे<br />
जिंदगी का सच हिंदी में पढ़ने से लोग डरते<br />
अगर होते भी हैं ब्लाग नीलाम तो समझो<br />
कोई छद्म ताकत कर रही है काम<br />
इसलिये इतना चिंतित न हो<br />
फ्लाप होकर भी हम विचलित नहीं<br />
तुम क्यों डरते हो<br />
ब्लाग कोई जिंदगी नहीं है<br />
भले ही उसके जज्बात हम इसमें लिखते हैं<br />
कभी गंभीर तो कभी हंसते दिखते हैं<br />
नीलामी पर हिट लेकर क्या करेंगे<br />
फ्लाप होकर कुछ तो लिख लेते हैं<br />
बेजान चीजों को जिंदगी मानने वाले लोगों में<br />
जिंदादिल होकर लिखना  ही ठीक है<br />
कम से कम फ्लाप होने पर कोई सवाल तो<br />
नहीं उठाता<br />
मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुंच पाया हूं<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=391</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 15:23:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=391</guid>
<description><![CDATA[ 14 बरस की वह लड़की
रात को बिस्तर पर सोई थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong> 14 बरस की वह लड़की<br />
रात को बिस्तर पर सोई थी<br />
सुबह एक लाश हो गयी<br />
सवाल उठते हैं ढेर सारे<br />
मिलता नहीं कोई जवाब<br />
पिता पर लगा है आरोप<br />
पर मां क्यों खामोश हो गयी</p>
<p>एक पुरुष के अत्याचार  की शिकार बच्ची<br />
हैरान है परेशान है<br />
एक बच्ची आती है उसके जिस्म में<br />
अपने जीवन की सांस ढूंढती हुई<br />
पर नानी इंतजार में थी शायद<br />
भले ही अनैतिक होगा<br />
लड़का हुआ तो अपना ही होगा<br />
पर कोख से बाहर निकलते ही<br />
नानी ने मचाया बवाल<br />
बच्ची का गला घोंट दिया<br />
जन्म लेते ही जननी ने<br />
जेल ही उसकी आरामगाह हो गयी </p>
<p>हजारों खबरे हैं ऐसीं हैं<br />
तब सोचता हूं क्यों लाचार हो जाती है औरत<br />
क्यों औरत को ही बेबस बनाती औरत<br />
आदमी के अनाचारों के हजारों किस्से हैं<br />
पर औरत खुद भी क्यों बदनाम हो गयी</p>
<p>मां की ममता<br />
बहिन का स्नेह<br />
पत्नी का प्रेम<br />
आदमी की होता है मन की पूंजी<br />
कितने बदनसीब होते हैं<br />
जो इससे वंचित हो जाते हैं<br />
और फिर कहानी में जगह पाते हैं<br />
जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी<br />
...........................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सारी पीड़ाऐ बाहर ले आता है पसीना-कविता एवं आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=385</link>
<pubDate>Tue, 03 Jun 2008 16:21:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=385</guid>
<description><![CDATA[आज  आजश्री जयप्रकाश मानस का एक आलेख पढ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/mkabfd.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज <a href="http://jayprakashmanas.blogspot.com/2008/06/blog-post.html"> आजश्री जयप्रकाश मानस का एक आलेख</a> पढ़कर यह विचार मेरे हृदय में आया कि आजकल हमारे समाज में परिश्रम में बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है और इसी कारण हमारा विकास चहुंमुखी नहीं हो पाता। ऐसे एक नहीं अनेक किस्से  मेरे सामने आते है जब  जब लगता है कि लोग न केवल स्वयं ही परिश्रम करने में अपने को छोटा समझते हैं बल्कि दूसरे को भी हेय व्यक्ति  मानकर उससे घृणा तक करते हैंं। यही कारण है कि हमारे समाज में जो श्रमिक वर्ग है वह अपने को अपेक्षित अनुभव करता है।<br />
अभी कुछ दिने पहले मेरे सामने एक रोचक किस्सा आया था। एक जगह जगह शादी के रिश्ते में हमें भी मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर मिला। लड़के को लड़की पसंद थी पर लड़की को बात पसंद नहीं आ रही थी तो लड़की के पिता ने उसे समझाते हुए कहा-‘देखो बेटी! तुम काम से जी चुराने की आदी हो। सुबह नौ बजे उठती हो। यह ऐसा घर है जिसमें सारे काम नौकर करते हैं। लड़का अधिक सुंदर नहीं है पर घर ठीक है। ऐसा धनाढ्य घर मिलना कठिन है। तुम्हें घर में कामकाज अधिक नहीं करना पड़ेगा।’<br />
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की लड़की को खाना बनाना भी नहीं आता था-यह उसके साथ आयी एक महिला ने बताई। वह लोग ऐसा घर ढूंढ रहे थे जहां लड़की को काम कम करना पड़े। जिस तरह उसके पिताजी उससे अपनी बात कह रहे थे उससे तो यह लगता था कि वह स्वयं भी ऐसी ही परिश्रम को छोटा समझते होंगे तभी तो उनकी लड़की में यह बात आयी। </p>
<p>परिश्रम करने वाले लड़कों को कोई लड़की ही नहीं  देना चाहता भले ही वह परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम हो। इसलिये हर कोई कुर्सी पर बैठने की नौकरी चाहता है। मेरी पत्नी को अन्य महिलायें कहतीं हैं कि ‘सारा काम स्वयं ही क्यों करती हो? कोई नौकरानी क्यों नहीं रख लेती। तुम तो पैसा बचा रही हो।’<br />
मैं कई बार सायकल पर बाहर जाता हूं तो भी यही लोग कहते हैं कि पैसा बचा रहे हो। यह श्रम को हेय दृष्टि से देखने जाने की प्रवृति इस समाज में है और इसे छोड़ना चाहिए। इसी पर कुछ पंक्तियां हैं। </p>
<p>लोग तरस खाने लग जाते हैं<br />
देखकर मेरे बदन से बहता पसीना<br />
मुझे बिल्कुल नहीं आती शर्म<br />
यह पसीना है जिससे जीवन में<br />
मिल पाता है सत्य का नगीना<br />
तन और मन की बहुत सारी पीड़ाऐ<br />
बाहर ले आता है पसीना<br />
जो डरते हैं श्रम करने से<br />
उनका भी क्या जीना<br />
लाइलाज दर्द पालकर<br />
ढूंढते हैं उसका इलाज इधर-उधर<br />
रुका पानी विष हो जाता है<br />
सभी जानते हैं<br />
फिर भी शरीर में पालते है<br />
जिनकी देह से निकला पसीना<br />
उनको भला दवायें क्यों पीना<br />
श्रमेव जयते इसलिये कहा गया है<br />
यही है सच में जीवन जीना<br />
............................<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग ने भी पार  की दस हजार पाठको की संख्या-विशेष संपादकीय ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 14:26:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/30bepg8.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के अनुसार दस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। सच तो यह है इस बात लिखने का मेरा आज मन नहीं था, पर कई लोग विश्लेषणों दिलचस्पी रखते हैं। ब्लाग जगत में अंसख्य मित्र हैं वह शायद इस पाठ से बोर हों-यह सोचकर कि हर चौथे  दिन अपने ब्लाग के आंकड़ों को सामने रख देता है- पर फिर भी कुछ हैं जो अनुसंधान की दृष्टि से आंकड़ों में दिलचस्पी रखते है। इस ब्लाग को लेकर एक बार मेरे मन में कड़वाहट भर गयी थी और सोचा था कि इसके दस हजार पाठक संख्या पार कर दिखा दूंगा। दो दिन पहले भी यह ख्याल था पर फिर लगा कि यह सब तो चलता रहेगा। आपसी वाद विवादों पर क्या मन मैला करना? केवल संदेशों से सुसज्जित इस ब्लाग के लिए  एक टंकक हूं और मुझे अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों के व्यूज कम हैं पर वह मेरे प्रेरक हैं। टिप्पणियां नगण्य हैं पर जितनी हैं वह किसी भी भारी भरकम ब्लाग पर अधिक लगने वाली टिप्पणियों से कम नहीं है। जैसा कि मेरे हर ब्लाग के साथ है समीर लाल, ममता श्रीवास्तव, मीनाक्षी जी, परमजीत बाली, विस्फोट (यही नाम मुझे याद आ रहा है) और महक जैसे कुछ नाम यहां अधिक है। आम पाठकों की संख्या (अगर उनमें मुझे कोई भ्रम नहीं है तो ) नब्बे प्रतिशत से अधिक है। मेरे तीन ब्लाग <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथि</a> और यह शब्दलेख पत्रिका अध्यात्म विषयों के लिए सुरक्षित हैं इसलिये इन पर ऐसा लिखना मुझे ठीक नहीं लगता कि किसी पर प्रहार होता लगे। यह मेरे सुबह लिखे जाने ब्लाग हैं तब मैं केवल इसी विषय पर सोचता हूं। ज्ञानी दिखने के लिए नहीं बल्कि लिखकर उसे धारण करने का प्रयास करता हूं।  इसका प्रभाव भी देखता हूं कि क्षमा और दया भाव में शक्ति है वह यहां से ही पता लगती है। चाणक्य से कहा है कि वक्त पड़े तो चतुराई भी दिखाओ पर उसका आशय यह कदापि नहीं है कि हमेशा छलकपट कर काम चलाओ। चाणक्य से कहा कि कभी क्रोध का प्रदर्शन करो-हां मुझे याद आ रहा है कि इस पाठ के रखने के दो दिन बाद मुझे ऐसा भी करना पड़ा था।<br />
एक कोने में पड़े इस शांत ब्लाग धीमी गति से चलता दिखत अवश्य है पर प्रतिदिन इस पर बड़ी संख्या में व्यूज होते हैं। कई बार तो पाठ लिखे हुए ब्लाग की संख्या इनसे पीछे रहती है और वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर वह इससे पिछड़ जाते हैं। </p>
<p>अधिक विश्लेषण करने के लिए और भी लोग हैं। केवल 101 पाठों में इतनी संख्या जुटाने वाला यह मेरा अकेला ब्लाग हैं।  भले ही ब्लाग लेखकों की संख्या इस पर कम है पर फिर भी उसके लेखक को अन्य ब्लाग पर तो वही प्रेरित करते है। समस्त ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को मेरी तरफ से शुभकामनाएं। साथ ही स्पष्ट बता देना चाहता हूं कि मेरे मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं हैं। जब हम आपस में एक जगह खड़े होते हैं तो वाद विवाद भी होते है। अगर मैं कुछ कभी किसी के लिए लिखता हूं तो उसे अपना समझकर लिखता हूं। शेष फिर कभी।</p>
<p>दीपक भारतदीप  </p>
<p><strong>१० हजार की संख्या में विभिन्न फोरमों से आये व्युज की संख्या जो कुल का दस प्रतिशत भी नहीं है.</strong><br />
Reffer Views<br />
blogvani.com 265<br />
narad.akshargram.com 84<br />
chitthajagat.in 27<br />
narad.akshargram.com/?show=all 23<br />
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blogvani.com/Default.aspx?count=100 16 </p>
<p><strong>विभिन्न पाठों को को पढने वालों की संख्या </strong></p>
<p>कबीर के दोहे:जह༯a&#62; 644<br />
चाणक्य नीति:प़्/a&#62; 305<br />
चाणक्य नीति:सम़/a&#62; 249<br />
रहीम के दोहे-कि༯a&#62; 224<br />
बाप-बेटे का होत 204<br />
दिल का राज, सिर ༯a&#62; 179<br />
चाणक्य नीति: वि༯a&#62; 172<br />
रहीम के दोहे:ह्༯a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:बु़/a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 156<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 147<br />
श्री गणेश जी को  145<br />
जो कार लायक नही༯a&#62; 144<br />
चाणक्य नीति:कप़/a&#62; 143<br />
रहीम के दोहे:चत༯a&#62; 132<br />
सच-झूठ का अंतर्༯a&#62; 129<br />
परिचय  127<br />
चाणक्य नीति: शर༯a&#62; 118<br />
मेरा परिचय  115<br />
कुछ न पढा, रौनक ़/a&#62; 111<br />
विदुर नीति:जिस़/a&#62; 110<br />
रहीम के दोहे:गो༯a&#62; 106<br />
संत कबीर वाणी:ख༯a&#62; 102<br />
चीन ने आख़िर अप༯a&#62; 99<br />
चाणक्य नीति:अप़/a&#62; 97<br />
कवितायेँ और क़्/a&#62; 96<br />
रहीम के दोहे:व्༯a&#62; 93<br />
विदुर नीति:धनि़/a&#62; 92<br />
चाणक्य नीति-जरॼ/a&#62; 89<br />
चाणक्य नीति:सा़/a&#62; 87<br />
विदुर नीति:विदॼ/a&#62; 87<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 87<br />
मन के खोखलेपन क༯a&#62; 83<br />
प्रात:काल का आन༯a&#62; 81<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 81<br />
पापा ब्लोगर नं़/a&#62; 81<br />
विदुर नीति:अधरॼ/a&#62; 77<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 76<br />
क्या ब्लोग जगत ༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:श༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 74<br />
चाणक्य नीति:हमॼ/a&#62; 73<br />
रामजी लगायेंगे 70<br />
नीयत पर भरोसा न༯a&#62; 68<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 67<br />
कब कौन सा रंग सा 67<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 66<br />
चाणक्य नीति:दु़/a&#62; 65<br />
मनुस्मृति:अपनी 62<br />
वह भूत-भूत कर चि 60<br />
चाणक्य नीति:सभॼ/a&#62; 60<br />
ऐसा भी क्या अक्༯a&#62; 58<br />
चाणक्य नीति:स़्/a&#62; 57<br />
चाणक्य नीति:शा़/a&#62; 56<br />
मनुस्मुतिःस्त༯a&#62; 55<br />
रहीम के दोहेःप़/a&#62; 54<br />
चाणक्य नीति:अल 54<br />
चाणक्य नीतिःतप 53<br />
कैसे करते हैं व༯a&#62; 53<br />
क्रिकेट भी अब फ༯a&#62; 53<br />
कतिपय सम्मान प़/a&#62; 52<br />
मनु स्मृतिःधन ़/a&#62; 50<br />
चाणक्य नीति:इस ༯a&#62; 49<br />
चजइ-ब्लोगरों मॼ/a&#62; 48<br />
चाणक्य नीतिःसं 47<br />
इसलिए कवि हमेश़/a&#62; 46<br />
चाणक्य नीति:सु़/a&#62; 46<br />
कवि ब्लोगर आवे़/a&#62; 45<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 45<br />
संत कबीर वाणी:व༯a&#62; 45<br />
वही कहलाता है अ༯a&#62; 45<br />
मनुस्मृति: मां़/a&#62; 44<br />
संत कबीर वाणी:म༯a&#62; 42<br />
मनुस्मृतिःपरि༯a&#62; 41<br />
फ्लॉप हैं तो बे༯a&#62; 41<br />
एक बेकार खबर को  40<br />
चाणक्य नीति:असॼ/a&#62; 39<br />
शब्द बोलते जगह ༯a&#62; 39<br />
चजई-चिट्ठा जगत ༯a&#62; 38<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 36<br />
मनुस्मृतिःविष༯a&#62; 36<br />
संत कबीर वाणी:ब༯a&#62; 35<br />
आस्ट्रेलिया का 35<br />
चाणक्य नीति:सं़/a&#62; 35<br />
मैं बिकने लायक ༯a&#62; 34<br />
क्रिकेट बहुत द़/a&#62; 34<br />
मनुस्मृति:ढोंग 33<br />
माफ़ी दी कि क़दम 33<br />
रहीम के दोहेःगॼ/a&#62; 32<br />
मनुस्मृतिःईमा༯a&#62; 32<br />
चाणक्य नीति:पै़/a&#62; 32<br />
शायद ही लोग समझ  32<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 32<br />
क्या लिखूं 'ब्ल༯a&#62; 30<br />
या इसे भ्रमवश ल༯a&#62; 28<br />
मनु स्मृतिःपर् 25<br />
संत कबीर वाणीः़/a&#62; 24<br />
होली के रंग फीक༯a&#62; 23<br />
अपनी मनस्थिति ༯a&#62; 22<br />
मनुस्मृतिःसदा༯a&#62; 19<br />
चजई- क्या सब चलॼ/a&#62; 17<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 14<br />
अंतर्जाल पर प़्/a&#62; 14  </p>
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<title><![CDATA[पास के विद्वान भी बैल बन जाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=381</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 16:31:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू  मैं
ही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="//i20.tinypic.com/2rhb7g1.jpg[/IMG]" alt="" />आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू  मैं<br />
हीरो का ब्लाग पढ़कर आया<br />
हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती<br />
पर उसका अंग्रेजी ब्लाग पर पढ़कर<br />
मैंने अपने भतीजे से टिप्पणी लिखवाई<br />
पहली बार अंतर्जाल पर  मौज मनाई<br />
सैंकड़ों लोगों के नाम लिखे थे नीचे<br />
मैंने  कर दिया सबको पीछे<br />
तुम इसलिये फ्लाप हो<br />
क्योंकि कुछ बनने से पहले ही अपना ब्लाग बनाया’</p>
<p>नाक पर चश्मा लटकाकर<br />
उसे घूरते हुए देखने लगे<br />
जैसे अभी खा जायेंगे<br />
फिर सोचकर बोले<br />
‘दोष तुम्हारा नहीं हमारा है<br />
बात करते हैं तुमसे इसलिये<br />
क्योंकि अकेला होना हमें नहीं गवारा है<br />
तुम्हारे लिये तो वही हिट है<br />
जिसको समझने में तुम्हारी बुद्धि अनफिट है<br />
दूर बैठा कितना भी ढोल है<br />
तुम्हें  सुहावना लगेगा<br />
बाहर से लगता है आकर्षक<br />
अंदर जिसमें पोल है<br />
वही तुमको फलता लगेगा<br />
दूर होते तुमसे तो<br />
कुछ हम भी तुमको ऊंचे नजर आते<br />
पास के विद्वान भी घर में बैल बन जाते<br />
जो दृश्य आंख से आगे न जाता हो<br />
जो स्वर कान से पार न पाता हो<br />
जिसका स्पर्श ही तुम्हारे लिए अंसभव<br />
वही तुमको भाता है<br />
मेरे  पास हो इसलिये तुम्हारे लिए<br />
अपना यह प्रपंच नहीं रचाया<br />
दुनियां भर में फैले गुणवान और विद्वानों से<br />
बन जायें संपर्क इसलिये यह ब्लाग बनाया<br />
.........................................</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=378</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 13:40:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।</h3>
<h3>मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’</h3>
<h3>मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’</h3>
<h3>इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’</h3>
<h3>मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’<br />
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’<br />
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’</h3>
<h3>मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’<br />
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होन