<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindi-friends &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-friends/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-friends"</description>
	<pubDate>Mon, 08 Sep 2008 18:22:33 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[सौदा होता है सब जगह-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=280</link>
<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 14:59:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=280</guid>
<description><![CDATA[दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>दिन के उजाले में</p>
<p>लगता है बाजार</p>
<p>कहीं शय तो कहीं आदमी</p>
<p>बिक जाता है</p>
<p>पैसा हो जेब में तो</p>
<p>आदमी ही खरीददार हो जाता है</p>
<p>चारों तरफ फैला शोर</p>
<p>कोई किसकी सुन पाता है</p>
<p>कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर</p>
<p>कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है</p>
<p>भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख</p>
<p>सौदे में अपना देखता अपना अस्त्तिव</p>
<p>भ्रम से भला कौन मुक्त हो पाता है</p>
<p>रात की खामोशी में भी डरता है</p>
<p>वह आदमी जो</p>
<p>दिन में बिकता है</p>
<p>या खरीदकर आता है सौदे में किसी का ईमान</p>
<p>दिन के दृश्य रात को भी सताते हैं</p>
<p>अपने पाप से रंगे हाथ</p>
<p>अंधेरे में भी चमकते नजर आते है</p>
<p>मयस्सर होती है जिंदगी उन्हीं को</p>
<p>जो न खरीददार हैं न बिकाऊ</p>
<p>सौदे से पर आजाद होकर जीना</p>
<p>जिसके नसीब में है</p>
<p>वह जिंदगी का मतलब समझ पाता है<br />
................................<br />
दीपक भारतदीप </strong></div>
<p>hasya kavita, mastram, कविता, मस्तराम, मस्ती, व्यंग्य, शब्द, शेर</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अकेलापन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</link>
<pubDate>Fri, 29 Aug 2008 16:43:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=270</guid>
<description><![CDATA[

जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>
<div align="center">
जब याद आती है अकेले में किसी की<br />
खत्म हो जाता है एकांत<br />
जिन्हें भूलने की कोशिश करो<br />
उतना ही मन होता क्लांत<br />
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन<br />
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन<br />
पर अकेलेपन की चाहत में<br />
बैठे होते उसका आनंद<br />
जब किसी का चेहरा मन में घुमड़ता<br />
हो जाता अशांत</p>
<p>अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये<br />
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये<br />
आंखे बंद कर लेता हूं<br />
बहुत कोशिश करता हूं<br />
मन की आंखें बंद करने की<br />
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा<br />
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत पैदा<br />
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत<br />
.................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दों के फूल कभी नहीं मुरझाये-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</link>
<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 14:36:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=267</guid>
<description><![CDATA[कुछ पाने के लिये
दौड़ता है आदमी इधर से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>कुछ पाने के लिये</p>
<p>दौड़ता है आदमी इधर से उधर</p>
<p>देने का ख्याल कभी उसके</p>
<p>अंदर नहीं आता</p>
<p>भरता है जमाने का सामान अपने घर में</p>
<p>पर दिल से खाली हो जाता</p>
<p>दूसरे के दिलों में ढूंढता प्यार</p>
<p>अपना तो खाली कर आता</p>
<p>कोई बताये कौन लायेगा</p>
<p>इस धरती पर हमदर्दी का दरिया</p>
<p>नहाने को सभी तैयार खड़े हैं</p>
<p>दिल से बहने वाली गंगा में</p>
<p>पर किसी को खुद भागीरथ<br />
बनने का ख्याल नहीं आता<br />
.....................................<br />
अपने नाम खुदवाते हुए</p>
<p>कितने इंसानों ने पत्थर लगवाये</p>
<p>पर फिर भी अमर नहीं बन पाये</p>
<p>जिन्होंने रचे शब्द </p>
<p>बहते रहे वह समय के दरिया में</p>
<p>गाते हैं लोग आज भी उनका नाम</p>
<p>कुछ पत्थरों पर धूल जमी</p>
<p>कुछ टूट कर कंकड़ हो गये</p>
<p>पर </strong></div>
<div align="center"> </div>
<div align="center"><strong><br />
............................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></div>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://dpkraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे- हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 17:04:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=259</guid>
<description><![CDATA[जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल  सलीका नहीं है<br />
उनके पास वफा बेचने का कोई एक  तरीका नहीं है<br />
भीड़ में मचायें शोर अपनी जिंदगी के तजूर्बे का<br />
पर उससे कभी कुछ खुद सीखा नही है<br />
ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे<br />
आवाजें हैं उनकी बहुत तेज,पर शब्द तीखा नहीं है<br />
बेअसर बोलते हैं पर जमाना फिर भी मानता है<br />
उनको परखने का खांका किसी ने खींचा नहीं है<br />
ईमानदार के ईमान को ही देते हैं चुनौती<br />
खुद कभी उसका इस्तेमाल करना सीखा  नही है<br />
फिर भी नाम चमक रहा है इसलिये आकाश में<br />
जमीन पर लोगों ने अपनी अक्ल से चलना सीख नहीं है<br />
........................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग लिखने में दहाड़ना कहां होता है,पूछों (टैगों)के फटकारने में बहुत दम होता है-व्यंग्य आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 23 Aug 2008 07:15:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=222</guid>
<description><![CDATA[एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उसमें उनकी शिकायत थी कि हमारे पाठ दहाड़ते बिल्कुल नहीं है पर पूंछें (टैग) उनमें अधिक लगी होती हैं। वह वरिष्ठ ब्लागर हैं,और उनके प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। सच तो यह है कि वह एक विद्वान व्यक्ति हैं और कम से कम मैं मानता हूं कि वह अध्ययन करने वाले व्यक्ति हैं। यही कारण है कि उनके सभी पाठ ब्लागवाणी पर तत्काल शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। वह एक सज्जन व्यक्ति हैं और इन हिट के बारे में शायद उनका अधिक अध्ययन नहीं है और इसलिये उन्होंने ऐसे विषय पर लिखा जिसके बारे में उनको विस्तृत रूप से जानकारी लेनी  चाहिए थी। वह अपने पाठ में तमाम तरह के संशय से भरे लगते हैं। एक तरफ वह लिखते हैं कि सुरेश चिपलूनकर आक्रामक लिखते हैं दूसरी तरफ उनको दहाड़ कम दिखाई देती है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो हमेशा ही लिखता आया हूं कि ऐसं दहाड़ने वाले पाठ लिखने का कोई लाभ नहीं है जो फोरमों पर हिट दिलवायें और आम पाठक के लिये किसी मतलब के न हों। वैसे उन वरिष्ठ ब्लागर  के पाठों पर भी बहुत कुछ लिखने लायक मेरे पास है पर वह जल्दी निराश हो जाते हैं, और इसलिये मैं उनका नाम भी नहीं दे रहा।  केवल इस पाठ के माध्यम से अपने ब्लाग मित्रों और पाठकों को समझाना भर है कि अंतर्जाल एक बड़ा व्यापक मायाजाल भी है। ब्लाग स्पाट पर सक्रिय ब्लागर लेखक कभी भी वर्डप्रेस के ब्लाग को नहीं समझ पाते। उनको यह पता ही नहीं कि वहां के लेखक क्या कर रहे हैं और क्यों नहीं उनकी परवाह करते? वर्डप्रेस के ब्लागर फोरमों से जुड़े हैं पर उनके लिखने और पढ़ने का दायरा बहुत व्यापक है। अभी एक अंग्रेजी ब्लागर ने मेरा नाम लिये बिना लिखा था कि हिंदी का एक ब्लागर वहां की श्रेणियों और टैगों का सर्वाधिक उपयोग कर रहा है और अन्य ब्लाग लेखकों को ऐसा ही करना चाहिए था। उसका यह पाठ ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं देख सकते थे क्योंकि वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड के बारे में जानते तक नहीं हैं<br />
............................................................................................</p>
<blockquote><p><strong>मेरे द्वारा उस ब्लाग पर लिखी गयी टिप्पणी<br />
आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। दरअसल मैंने ब्लाग के बारे में सवा दो वर्ष पहले मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था। उस समय कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होने के बावजूद मेरा इरादा ब्लाग बनाने का नहीं था क्योंकि मुझे बनाना ही नहीं आता था। जब बनाया तो जो उसमें पढ़ा था उसकी खास बातें मुझे याद रहीं जो यहां आपको संक्षिप्त में बता देता हूं क्योंकि उसमें बताये गये निर्देशों पर ही मैं चल रहा हूं।<br />
1.अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखते रहें। इस बात की परवाह न करें कि उसकी लंबाई चैड़ाई कितनी है। कुछ पोस्ट पाठकों को नापसंद भी आ सकते हैं, पर आप लिखें।<br />
2.अपने ब्लाग पर अधिक से टैग या श्रेणियां लगायें क्योंकि वही आपके लिखे पाठ को वहां ले जायेंगी जहां आप भेजना चाहते हैं। अगर आप अंग्रेजी में नहीं लिखते तो भी अंग्रेजी के टैग लगायें क्योंकि आम पाठक अंग्रेजी शब्दों से सर्च करता है। जितने आप टैग लगाते हैं उतने ही शब्दों पर आपका ब्लाग खुलता है।<br />
3.टिप्पणियेां की चिंता बिल्कुल न करें न इस बात की परवाह करें कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा। आप तो यह सोचिये कि कितने लोग इसे पढ़ने वाले हैंं।<br />
4.अखबार एक दिन बाद कबाड़ हो जाता है और  किताबें अल्मारी में बंद हो जाती हैं पर आपका ब्लाग हमेशा ही हवा में तैरता रहेगा। यही सोचकर लिखते रहें।<br />
5.आने वाला समय ब्लाग लेखकों के लिये उज्जवल है। </p>
<p>संयोगवश सुरेश चिपलूनकर और मैं मध्य प्रदेश के हैं, और लिखने में कहां हैं यह तो आप मित्र तय करते हैं। मैं तो लकीर का फकीर हूं। जिस बात का मुझे ज्ञान है उस विषय पर मैं किसी की नहीं सुनता और जिस बात का नहीं हैं उसके बारे में    दूसरे का सुनकर या पढ़कर उसी राह पर ही चल पड़ता हूं जब तक कोई विपरीत ज्ञान प्राप्त न हो क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिये इतना तो करना ही पड़ता है।  अधिक टैग लगाने का कोई लाभ नहीं है अगर यह बात आप या कोई अन्य ब्लाग लेखक मुझे समझा दे तों ऐसा नहीं करूंगा। वैसे जिस ब्लाग को आपने दिखाया है उसमें सबसे अधिक टैग और श्रेणियां हैं ओर पाठक भी अधिक यहीं हैं। आपका लिखा बहुत अच्छा लगा। सच तो यह है कि मैं आपसे भी बहुत सीखता हूं। आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p></blockquote>
<p>.................................................................<br />
मार्च में (शायद आठ मार्च) को उन वरिष्ठ ब्लाग लेखक महोदय ने  अपने ब्लाग पर टिप्पणियां न आने पर निराशा व्यक्त की। सारे के सारे ब्लागर टिप्पणी की रस्म अदायगी करने पहुंच गये। आज भी इस समय तक इस 12 टिप्पणियां उनके पास हैं और शाम तक यह संख्या बढ़ जायेगी। यह पाठ जो मै लिख रहा हूं हो सकता है कि एक  टिप्पणी के लिये भी  तरस जाये। ब्लागवाणी पर उनके पाठ को पांच पसंद लगी हुईं हैं और यह शायद मेरा यह  एक को तरस जाये। हां, मैं जाकर एक पसंद का बटन दबाकर आऊंगा। आमतौर से मैं ऐसा नहीं करता।  मतलब साफ है कि हम लोग फ्लाप ब्लागर है इसलिये हिट के लिये अधिक टैग लगाते हैं और वह मिलती भी हैं। मेरे पांच पाठ ऐसे हैं जिन्होंने किसी भी एक फोरम पर एक टिप्पणी भी नहीं पायी वह अब दो हजार पाठक संख्या को पार करने वाले हैं। छह ऐसे ही पाठ 1000 हजार को पार करने वाले है। पूरा देश दहाड़ रहा है। टीवी चेनल दहाड़ रहे हैं। मगर होता क्या है जब तक आदमी के दिलोदिमाग पर प्रभाव न हो। अभी चार दिन पहले तक देश के सब टीवी चैनल दहाड़ रहे थे कि अमुक मुक्केबाज स्वर्ण पदक लायेगा मगर हुआ क्या? दहाड़ने से एनर्जी जाती है भइया! शांति से अपनी बात कहने में जो प्रभाव होता है वह दहाड़ने में नहीं होता।</p>
<p>           यह आश्चर्य की बात है कि कई बार समझाने के बावजूद मेरे महापुरुषों के संदेश वाले ब्लाग से लोग छेड़छाड़ करते हैं आज भी इस ब्लाग का मनस्मृति का पाठ लिया गया है। अब बताईये क्या मैं उनके संदेशों को लेकर दहाड़ता! फिर भई दहाड़ने वाले पाठ लिखता हूं तो लोग कहते हें कि -’आप तो छोडि़ये कहां चक्कर में पड़ गये।<br />
दिलचस्प बात यह है कि मेरे पाठ को उन्होंने लिंक किया एक पाठक  ने उसे पढ़ा है बाकी नौ लोगों ने देखा भी नहीं और टिप्पणी लगा दी। इनमें मेेरे सबसे प्रिय मित्र उड़न तश्तरी ने यह भी नहीं देखा कि वहा क्या पढ़ रहे हैं और क्या लिख रहे हैं। दरअसल मैं पूरे प्रकरण में हंस रहा हूं और ऐसे ही यह पाठ लिख रहा हूं। मैं भी अपनी टिप्पणी लिख कर लौट आया पर बाद में देखा कि मेरे इसी ब्लाग से आठ महीने बाद फिर छेड़छाड़ की गयी है। पिछली जनवरी में जब इस पर पंद्रह पाठ भी नहीं थे इसे पांच अंक की रेटिंग देखकर प्रचारित किया गया था।  अब जब मैंने यह पाठ देखा तो लगा कि  प्रतिवाद आवश्यक हैं वरना तो कोई भी मेरे इन अध्यात्म ब्लाग से छेड़छाड़ कर सकता है। <a href="http://teradeep.blogspot.com"><strong>अंतर्जाल पत्रिका,</strong></a> <a href="http://dpkraj.blogspot.com"><strong>शब्दलेख सारथी </strong></a>और यह शब्दलेख पत्रिका मेरे तीन ऐसे ब्लाग हैं जिन पर मैं बहुत संवेदनशील रहता हूं इसलिये यह सभी अलग रख दिये हैं इन पर अन्य कोई सामग्री नहीं लिखता। शायद यह पाठ पच्चीस पाठक ब्लागवाणी पर जुटा लेगा क्योंकि इससे अधिक तो मुझे भी छद्म और फर्जी लगेंगे। पसंद शायद एक ही मेरा किया होगा। मुझे फोरमों पर नकली हिट की परवाह भी नहीं हैं। हमारे पाठ ब्लागवाणी पर सिंहासन नहीं मांगते इसलिये  अपनी पूंछों पर ही बैठते हैं क्योंकि वह कभी जमीन पर कभी आसमान पर उड़ते है। 195 या 120 हिट प्रतिदिन भला ब्लागवाणी पर कौन दिला सकता है? यह पूंछें ही हैं जो पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। हां देखते हैं जरा उड़न तश्तरी के चरण कमल कहों है? उन्होंने अपनी टिप्पणी में वहां यही मांग रखी थी। फिर उनको यही जवाब है कि महाराज पूंछे अधिक लगाने वाले थोड़े ही दहाडते हैं बल्कि दहाड़ने वाले तो मूंछों को लंबा चैड़ा रखते हैं। मूंछे यानि हिट तो उनके पाठों के पास हैं फिर काहे हमारे पाठों की पूछों से हैरान होते है।</p>
<p>.................................................................<br />
.........</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के मचे तूफानों का कौन पता लगा सकता ह-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 17:37:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=257</guid>
<description><![CDATA[
मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे<br />
................................<br />
दीपक भारतदीप</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार-हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</link>
<pubDate>Thu, 21 Aug 2008 16:51:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=255</guid>
<description><![CDATA[कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कुछ लोग कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाचार<br />
अपनी वेदना का प्रदर्शन करते हैं सरेआम<br />
लुटते हैं लोगों की संवेदना और प्यार<br />
छद्म आंसू बहाते<br />
कभी कभी दर्द से दिखते मुस्कराते<br />
डाल दे झोली में कोई तोहफा<br />
तो पलट कर फिर नहीं देखते<br />
उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार </p>
<p>घर हो या बाहर<br />
अपनी ताकत और पराक्रम पर<br />
इस जहां में जीने से कतराते<br />
सजा लेते हैं आंखों में आंसु<br />
और चेहरे पर झूठी उदासी<br />
जैसे अपनी  जिंदगी से आती हो उबासी<br />
खाली झोला लेकर आते हैं बाजार<br />
लौटते लेकर घर  दानों भरा अनार </p>
<p>गम तो यहां सभी को होते हैं<br />
पर बाजार में बेचकर खुशी खरीद लें<br />
इस फन में होता नहीं हर कोई माहिर<br />
कामयाबी आती है उनके चेहरे पर<br />
जो दिल  में गम न हो फिर भी कर लेते हैं<br />
सबके सामने खुद को गमगीन जाहिर<br />
कदम पर झेलते हैं लोग वेदना<br />
पर बाहर कहने की सोच नहीं पाते<br />
जिनको चाहिए लोगों से संवेदना<br />
वह नाम की ही वेदना पैदा कर जाते<br />
कोई वास्ता नहीं किसी के दर्द से जिनका<br />
वही  बाजार में करते वेदना बेचने और<br />
संवेदना खरीदने का व्यापार<br />
.........................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क पर लिखते हैं, मुश्क कसते हैं शायर-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</link>
<pubDate>Mon, 18 Aug 2008 16:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ भतीजे को भी
फंदेबाज घर लाया औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने साथ भतीजे को भी<br />
फंदेबाज घर लाया और बोला<br />
‘दीपक बापू, इसकी सगाई हुई है<br />
मंगेतर से रोज होती मोबाइल पर बात<br />
पर अब बात लगी है बिगड़ने<br />
उसने कहा है इससे कि एक ‘प्रेमपत्र लिख कर भेजो<br />
तो जानूं कि तुम पढ़े लिखे<br />
 नहीं भेजा तो समझूंगी गंवार हो<br />
तो पर सकता है रिश्ते में खटास’<br />
अब आप ही से हम लोगों को  आस<br />
इसे लिखवा दो कोई प्रेम पत्र<br />
जिसमें हिंदी के साथ उर्दू के भी शब्द हों<br />
यह बिचारा सो नहीं पाया पूरी रात<br />
मैं खूब घूमा इधर उधर<br />
किसी हिट लेखक के पास फुरसत नहीं है<br />
फिर मुझे ध्यान आया तुम्हारा<br />
सोचा जरूर बन जायेगी बात’</p>
<p>सुनकर बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त यह कौनसी शर्त लगा दी<br />
कि उर्दू में भी शब्द हों जरूरी<br />
हमारे समझ में नहीं आयी बात<br />
वैसे ही हम भाषा के झगड़े में<br />
फंसा देते हैं अपनी टांग ऐसी कि<br />
निकालना मुश्किल हो जाता<br />
चाहे कितना भी जज्बात हो अंदर<br />
नुक्ता लगाना भूल जाता<br />
या कंप्यूटर घात कर जाता<br />
फिर हम हैं तो आजाद ख्याल के<br />
तय कर लिया है कि नुक्ता लगे या न लगे<br />
लिखते जायेंगे<br />
हिंदी वालों को क्या मतलब वह तो पढ़ते जायेंगे<br />
उर्दू वाले चिल्लाते रहें<br />
हम जो शब्द बोले  उसे<br />
हिंदी की संपत्ति बतायेंगे<br />
पर देख लो भईया<br />
कहीं नुक्ते के चक्कर में कहीं यह<br />
फंस न  जाये<br />
इसके मंगेतर के पास कोई<br />
उर्दू वाला न पहूंच जाये<br />
हो सकता है गड़बड़<br />
हिंदी वाले सहजता से नहीं लिखें<br />
इसलिये जिन्हें फारसी लिपि नहीं आती<br />
वह उर्दू वाले ही  करते हैं<br />
नुक्ताचीनी और बड़बड़<br />
प्रेम से आजकल कोई प्यार की भाषा नहीं समझता<br />
इश्क पर लिखते हैं<br />
पब्लिक में हिट दिखते हैं<br />
 इसलिये मुश्क कसते हैं शायर<br />
फारसी  का देवनागरी लिपि से जोड़ते हैं वायर<br />
इसलिये हमें माफ करो<br />
कोई और ढूंढ लो<br />
नहीं बनेगी हम से तुम्हारी बात<br />
.........................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्दों की पंक्तियां उनके पांव में बेड़ियाँ  नजर आ रही हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 09:08:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</guid>
<description><![CDATA[किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां
सल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां<br />
सलाखों की तरह नजर आ रही हैं<br />
कुछ चेहरे छिपे हैं उसके पीछे<br />
जिनकी आंखें बुझी जा रही हैं </p>
<p>पाठ है आजादी का<br />
जिसमें कई कहानियां हैं<br />
लोग उन्हें सुनाये जा रहे हैं<br />
पर उससे आगे नहीं जा पा रहे ं<br />
क्योंकि किताब एक कैद की तरह हो गयी है<br />
कोई दूसरी मिल जाये तो<br />
शायद वह उससे निकल पायें<br />
पर वह भी एक दूसरी कैद होगी<br />
जिसमें वह फिर बंद हो जायें<br />
संभव है उसी में लिखा पढ़कर सभी को सुनायें<br />
अपनी सोच बंद है आलस्य के पिंजरे में कैद<br />
दूसरों के ख्याल पर जली मोमबत्तियों पर<br />
पढ़ने वाले कैदी रौशनी पा रहे हैं<br />
आजादी के गीत गा रहे हैं<br />
पुरानी कहानियों के दायरों से बाहर<br />
कौन बाहर आयेगा<br />
शब्दों का पहरेदार फिर<br />
उनको अंदर भगायेगा<br />
शहीदों के समाधि पर लगाकर<br />
हर वर्ष मेले<br />
नयी सूरतें अपना मूंह छिपा रहीं हैं<br />
किताब में लिखी शब्दों की पंक्तियों<br />
उनके पांव बेड़ी की तरह तरह नजर आ रही हैं<br />
.............................................................<br />
..............................................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का अनादर करते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=210</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 03:22:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=210</guid>
<description><![CDATA[1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निर्भय होना ये किसी मनुष्य के लिए लिये इस लोक में छह सुख हैं।<br />
2. ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, मन में असंतोष रखने वाला, क्रोधी, सदैव संशय में रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन पर निर्भर रहने वाला छह लोग सदा दुखी रहते है।<br />
3. शिक्षा समाप्त कर चुका शिष्य अपने गुरु का, विवाहित पुत्र अपनी मां का, काम भावना शांत होने पर पुरुष स्त्री का, कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का, नदी की धारा पार कर लेने वाला पुरुष नाव का  तथा रोग मुक्त हुआ रोगी अपने चिकित्सक का सदा अपने  अनादर करते हैं<br />
4.स्त्रियों के विषय में आसक्त रहना, जुआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी बोलना, अत्यंत कठोर दंड देना और अपने धन का दुरुपयोग करना यह सात दुर्गुण त्याग देना में ही भलाई है। </strong></p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चमन की बागडोर है जिसके हाथ वही दुश्मन हो जाता-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 14:18:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</guid>
<description><![CDATA[लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लुट जाने का खतरा अब<br />
गैरो से नहीं सताता<br />
अपनों को ही यह काम<br />
अच्छी तरह अब करना आता</p>
<p>पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे<br />
यकीन किसी पर नहीं आता<br />
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को<br />
अपनों का हाथ नजर आता<br />
कई बाग उजड़ गये हैं<br />
माली के हाथों जब<br />
जोअब फूल नहीं लगाता<br />
इंतजार रहता है उसे<br />
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो<br />
वह उसे बेच आये बाजार में<br />
इस तरह अपना घर सजाता<br />
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत<br />
बेईमानी से उनकी है सोहबत<br />
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा<br />
लूट में उनको ही मजा आता<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
मन में है उथलपुथल तो<br />
अमन कहां से आयेगा यहां<br />
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की<br />
किसी और से क्या खतरा होगा<br />
वही उसका दुश्मन हो जाता</strong><br />
..................................<br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौन करे सच का इजहार-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 15:14:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</guid>
<description><![CDATA[आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आँख के अंधे अगर हाथी को<br />
पकड कर उसके अंगों को<br />
अंगों का देखें अपनी अंतदृष्टि से<br />
अपनी बुद्धि के अनुसार<br />
करें उसके अंगों का बयान<br />
कुछ का कुछ कर लें<br />
तो चल भी सकता है<br />
पर अगर अक्ल के अंधे<br />
रबड़ के हाथी को पकड़ कर<br />
असल समझने लगें तो<br />
कैसे हजम हो सकता है</p>
<p>कभी सोचा भी नहीं था कि<br />
नकल इतना असल हो जायेगा<br />
आदमी की अक्ल पर<br />
विज्ञापन का राज हो जायेगा<br />
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर<br />
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा<br />
कौन कहता है कि<br />
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है<br />
छिपा हो परदे में तो ठीक<br />
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में<br />
सच तन्हाँ लगता है<br />
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी<br />
नकली हो गया है<br />
काले रंग से भी काला हो गया सौदागरों का मन<br />
अपनी खुली आंखों से देखने से<br />
कतराता आदमी उनके<br />
चश्में से दुनियां देखने लगता है<br />
........................................................</p>
<p>आंखें से देखता है दृश्य आदमी<br />
पर हर शय की पहचान के लिये<br />
होता है उसे किसी के इशारे का इंतजार<br />
अक्ल पर परदा किसी एक पर पड़ा हो तो<br />
कोई गम नहीं होता<br />
यहां तो जमाना ही गूंगा हो गया लगता है<br />
सच कौन बताये और करे इजहार</strong><br />
..................................................................</p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तब तक अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 16:51:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</guid>
<description><![CDATA[जो सरल और  सहज हैं
जिन के दिल में हैं ने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जो सरल और  सहज हैं<br />
जिन के दिल में हैं नेकनीयति<br />
करते हैं वही रचना का सृजन<br />
जिन पर खुद  की ख्वाहिशों और<br />
अरमानों को पूरा करने का बोझ है<br />
समाज में तनाव का करते हैं वही विसर्जन </p>
<p>दूसरे के दर्द को अपने दिल की<br />
आंखों से देखकर जो करते हैं विचार<br />
सृजक  वही बन पाते हैं<br />
जो सतह पर तैरते हुए केवल<br />
दिखाने के लिए बनते हैं हमदर्द<br />
वह तो शब्द के सौदागर हैं<br />
बेच लें बाजार में ढेर सारी रचनाएं<br />
पर फिर भी सृजक नहीं कहलाते हैं<br />
प्रसिद्धि और प्रशंसा के ढेर सारे शब्द<br />
अपने खजाने में जमा करते लेते<br />
पर सृजन की उपाधि का नहीं कर पाते  अर्जन</p>
<p>कहने से कोई सृजक नहीं हो जाता<br />
चंद शब्द लिखने से कोई सृजन नहीं हो पाता<br />
आखों से पढ़कर<br />
कानों से सुनकर<br />
हाथों से स्पर्श कर<br />
जब तक अपनी अनुभूतियों को<br />
दिल में डुबोया न जाए<br />
तब तक रस और श्रृंगार के बिना<br />
अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन<br />
-------------------------</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ की भेड़ नहीं शेर बनो-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 17:17:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि को]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भीड़ में सबको भेड़ की तरह<br />
हांकने कि कोशिश में हैं सब<br />
चलते जाते हैं आगे ही आगे<br />
सीना तानकर अपना चलते<br />
पर कोई शेर आ जाये सामने<br />
तो कायरता का भाव उनमें जागे </p>
<p>भेड़ों की तरह भीड़ में चलते<br />
अब में थक गया हूँ<br />
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी<br />
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं<br />
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे<br />
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह<br />
जो कभी सामने नहीं आते<br />
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते<br />
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं पर भागे-भागे </p>
<p>मन नहीं चाहता किसी को<br />
अपने पंजों से आहत करूं<br />
पर फिर सोचता हूँ कि<br />
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ<br />
चल पडा हूँ<br />
जिन्दगी की उस दौर में<br />
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे<br />
------------------------------------------<br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 17:07:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</guid>
<description><![CDATA[एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक श्रोता ने कवि से कहा<br />
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो<br />
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा  दो’<br />
कवि ने उदास होते हुए कहा<br />
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं<br />
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी<br />
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर<br />
नींद नहीं आयेगी<br />
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी<br />
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो<br />
अब पहले की तरह कांव-कांव कर<br />
कहां नजर आते<br />
दिख जायें तो इंसानों की<br />
बुरी नजर का शिकार हो जाते<br />
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें<br />
 तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’<br />
......................................................................</p>
<blockquote><p>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकः युवावस्था  में कदम बहकना स्वाभाविक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=185</link>
<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 03:35:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=185</guid>
<description><![CDATA[श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि<br />
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।<br />
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ<br />
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ’- </strong>जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें। </p>
<p>यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1.शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blgospot.com">3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 16:31:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</guid>
<description><![CDATA[वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो  गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’<br />
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों के बीच खाने का सामान बांट रहा था और उसे लेकर वही भिखारी भी खा रहा था।<br />
लेखक ने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-‘खाना तो मिला नहीं। अब चाय पीकर ही काम चलाऊंगा।<br />
वह हाथ फैलाये उसके सामने खड़ा था। लेखक ने उससे कहा-‘मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा, पर इससे पहले तुम्हं साक्षात्कार देना होगा। आओ मेरे साथ!<br />
थोड़ी दूर जाकर उस लेखक ने उससे पूछा-‘तुम्हारे घर में क्या तुम अकेले हो।’<br />
भिखारी-‘‘नही! मुझे दो लड़के हैं और दो लडकियां हैं। सबका ब्याह हो गया है।’<br />
लेखक-‘फिर तुम भीख क्यों मांगते हो? क्या तुम्हारे लड़के कमाते नहीं हैं।<br />
भिखारी-‘बहुत अच्छा कमाते हैं, पर आजकल बाप को कौन पूछता है? मेरे को सूखी रोटी देते हैं और मैं चिकनी चुपड़ी और माल खाने वाला आदमी हूं।’<br />
लेखक-‘इस उमर में वैसे भी कम चिकनाई खाना चाहिए। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। डाक्टर लोग यही कहते हैं।<br />
भिखारी-‘वह तो सेठों के लिये कहते हैं भिखारियों के लिये नहीं।<br />
लेखक-‘मंदिर में अंदर जाते हो।<br />
भिखारी-‘मंदिर के अंदर हमें आने भी नहीं देते और न हम जाते। हम तो बाहर भक्तों के दर्शन ही कर लेते हैं। भगवान ने कहा भी है कि मेरे से बड़े तो मेरे भक्त हैं।<br />
लेखक-‘रहते कहां हो?<br />
भिखारी-‘एक दयालू सज्जन ने हम भिखारियों के लिये एक मकान किराये पर ले रखा है। उसमें वही किराया भरता है।’<br />
लेखक-‘तुम्हारे लड़के तुम्हें नहीं रखते।’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a> पर मूल रूप से प्रकाशित है। इसके प्रकाशन के लिये अन्य कहीं अनुमति प्रदान नहीं की गयी है।<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>भिखारी-‘वह तो मिन्नतें करते हैं पर वहां कौन उनकी चिकचिक सुनेगा।  मैं तो बचपन से ही आजाद रहने वाला आदमी हूं।  वह क्या खिलायेंगे मुझे? मैंने खाने के मामले में बाप की परवाह नहीं की। वह भी सूखी खिलाता था पर बाहर मुझे भीख मांगने पर जो खाने का मिलता था वह बहुत अच्छा होता था।’<br />
लेखक-‘बचपन से भीख मांग रहे हो। बच्चों की शादी भी भीख मांगते हुए करवाई।<br />
भिखारी-‘नहीं! पहले तो मेरा बाप ही मेरे परिवार को पालता रहा। फिर बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो नौकरी कर वही काम चलाते रहे। मैं अपनी बीबी के लिये ही कुछ सामान घर ले जाता हूं। वह बच्चों के पास ही रहती है। आजकल की औलादें ऐसी हैं उसकी बिल्कुल इज्जत नहीं करतीं। मैं सहन नहीं कर सकता।’<br />
लेखक-तुम्हें भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती।’<br />
भिखारी ने कहा-‘जिसने की शर्म उसकी फूटे कर्म।’<br />
लेखक उसको  घूर कर देख रहा था! अचानक उसने पीछे से आवाज आई-‘बाबूजी, इससे क्या बहस कर रहे हो। भीख मांगना एक आदत है जिसे लग जाये तो फिर नहीं छूटती। कोई मजबूरी में भीख नहीं मांगता। जुबान का चस्का ही भिखारी बना देता है।’<br />
लेखक ने देखा कि थोड़ी दूर ही एक बुढि़या भिखारिन पुरानी चादर बिछाये बैठी थी। उसके पास एक लाठी रखी थी और सामने एक कटोरी । उसके पास रखी पन्नी में कुछ खाने का सामान रखा हुआ था जो शायद दानी भक्त दे गये थे और वह अभी खा नहीं रही थी।<br />
लेखक ने उस भिखारी को दस रुपये दिये और फिर जाने लगा तो वह भिखारिन बोली-‘बाबूजी! कुछ हमको भी दे जाओ। भगवान के नाम पर हमें भी कुछ दे जाओ।’<br />
लेखक ने पांच रुपये उसके हाथ में दे दिये और अपने होठों में बुदबुदाने लगा-‘भीख मांगना मजबूरी नहीं आदत होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</link>
<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 04:50:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=169</guid>
<description><![CDATA[भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर  के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं। </p>
<p>योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है।  अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते  हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये। </p>
<p>इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।<br />
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।<br />
...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्यालों का बंधन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:21:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</guid>
<description><![CDATA[ख्यालों के बंधन में फंसकर
उनके इशारों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ख्यालों के बंधन में फंसकर<br />
उनके इशारों पर नाचते रहे<br />
जिंदगी मेंं इसलिये हर कदम पर हारते रहे<br />
जो आजाद होकर सोचा<br />
तो सामने हमारे  यह बात आई<br />
क्यों हमने उनको अपना सबकुछ माना<br />
जब हमेशा की उन्होंने बेवफाई<br />
दिल की गुलामी से<br />
अच्छा है आजाद ख्याल से जीना<br />
हम क्यों अपना जिस्म<br />
इतने समये से अपने हाथों ही मारते रहे<br />
............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-सूर्य के सामने दीपक क्या करेगा?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Wed, 16 Jul 2008 04:03:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर सकता है? अमीर आदमी को दान देने से क्या लाभ? जिसके पास पर्याप्त मात्रा में धन हो उसके सामने दान दी गयी वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। दान सदैव निर्धन को दिया जाना चहिए।<br />
2.निर्धन सदा धन की तलाश में भटकते हैं, उनके हृदय में सद धनी बनने की आकांक्षा बनी रहती है<br />
3.प्रत्येक मनुष्य की यह इच्छा रहती है कि वह मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करे। अपनी पूरी आयु इसी इच्छा की पूर्ति में नष्ट कर देता है। सभी इंसान अपनी इच्छाओं के दास बनकर रहे गये हैं।</strong></p></blockquote>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>हमारे देश के लोगों में  दान की प्रवृत्ति जन्मजात रहती है। सामान्य आदमी हमेशा थोड़ा बहुत दान करता है पर यह दान अधिकतर कुपात्रों को मिलता है-यह दान उन भिखारियों को मिलता है जो अधिकतर मंदिरों के बाहर खड़े होते हैं और उनकी यह आदत होती है न कि बाध्यता। इसके अलावा उन तथाकथित गुरुओं और संतों को मिलता है जिनके लिये भक्ति और ज्ञान बेचना एक व्यवसाय है। वह इस धन से तमाम तरह के आश्रम बना लेते हैं और फिर उनका उपयोग भी व्यवसायिक ढंग से धर्म के नाम पर ही करते हैं। </p>
<p>ऐसे अनेक किस्से आते हैं कि अमुक भिखारी मरा तो उसके घर से ढेर सारा धन बरामद हुए। कई लोग तो अच्छा खासा परिवार होते हुए भी भीख मांगते हैं क्योंकि यह एक आदत है जिसे पड़ जाये वह छूटती नहीं है। अतः दान हमेशा ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। वह मांगता न हो पर उसकी आवश्यकता हमारी दृष्टि में आ जाये तो उसकी सहायता करना चाहिए। यह सहायता इस तरह करना चाहिए जैसे कि उसे न लगे कि हम दान कर रहे हैं। यही सच्चा दान है। मांगने पर यह बताकर दान करने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 13:36:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</guid>
<description><![CDATA[बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे
हमेशा र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे<br />
हमेशा रहा जल का अकाल<br />
हम पानी की बूंद बूंद को तरसे<br />
बहुत सारी शायरी प्यास पर लिखी<br />
तो कई कवितायें गर्र्मी पर रच डाली<br />
पसीने में नहाते हुए मेघों पर<br />
अपने व्यंग्य शब्दों से हम  अधिक बरसे</p>
<p>इस बार राशन पानी लेकर आसमान में मेघ आये<br />
लगता है ढूंढ रहे थे हमको<br />
अपनी बरसात से नहलाने को<br />
घर लौटने से ऐसे बरस जाते हैं<br />
कि तालाब बनी सड़कों से<br />
घर पहुंचने का रास्ता निकालने के लिये<br />
 अब तो रोज तरसे</p>
<p>उस दिन साइकिल समेत<br />
मझधार में फंसे थे<br />
आगे कार तो पीछे टूसीटर अड़े थे<br />
आसमान से बरसते मेघों को देखकर<br />
हमें अपने पर ही रहम आया<br />
एक मेघ अपना कोटा पूरा कर<br />
हमारे सामने आया<br />
और बोला<br />
‘और गर्मी पर कविता लिख<br />
हमारी मजाक उड़ाता दिख<br />
जब भी देख गर्मी में नहाते हुए ही<br />
अपनी कविता लिखता है<br />
सारे जमाने को कार की बजाय<br />
साइकिल पर चलता दिखता है<br />
भला! इसमे हमारा क्या दोष<br />
जो हम पर दिखाता है रोष<br />
कार और पैट्रोल का खर्च बचाता है<br />
इसलिये साइकिल में तेरा तेल निकल जाता है<br />
पिछली बार गर्मी पर कविता लिखकर<br />
अपने ब्लाग पर हिट हुआ था<br />
हास्य कविता के रूप में फिट हुआ था<br />
अब हम पर  हास्य कविता लिख<br />
पर हमारे संदेश के साथ खड़ा दिख<br />
सुन हम क्यों नहीं बरसों से, जो अब  ऐसे बरसे<br />
सारे नाले और नालियां बंद कर<br />
हमारे जल का मार्ग अवरुद्ध कर दिया<br />
तुम इंसानों ने<br />
धरती पुत्र पेड़ पौद्यों का कत्ल किया<br />
तुम्हारे बीच बरसे शैतानों ने<br />
एक तरफ बरसी दौलत तो<br />
दूसरी और हरियाली को लोग तरसे<br />
अपने विनाश का खुद ही किया इंतजाम<br />
इसलिये कई बरसों  ऐसे नहीं बरसे</p>
<p>इस बार जमकर बरस कर बता दिया<br />
जमकर बरसते हुए   पग-पग पर<br />
सड़कों और पंगडंडियों को<br />
जलमग्न बना दिया<br />
प्रकृति से छेडछाड़ का नतीजा दिखा दिया<br />
अगर चाहते हो कि हर बरस बरसें तो<br />
हास्य कविता पर हम लिख<br />
प्रकृति को प्यार करने का<br />
इंसानों को संदेश देता दिख<br />
लोगों को बता दे कि<br />
अपने ही भूलों से जो किया विनाश इस धरती का<br />
इसलिये ही पहले पानी को<br />
अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे<br />
..................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपशुओं  की टांग खाने पर दवा भी लेनी पड़ती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 04:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है कि लोग तो  भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-</strong>वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।</p>
<p>आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिये लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान  कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। हृदय से भक्ति करने के लाभ होते हैं यह अब विज्ञान भी मानने लगा है। भजन भक्ति करते हुए आदमी सांसरिक विषयों से अपने मस्तिष्क को मुक्त कर लेता है और इस कारण उसका शुद्धिकरण हो जाता है। ध्यान को मन खुश करने के लिये एक बहुत बड़ा साधन माना गया है। अगर भगवान का नाम हृदय से स्मरण किया जाये तो अनेक विकार स्वतः परे जायेंगे, इसमें संशय नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खबरों की खबर देने वाले-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 16:08:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</guid>
<description><![CDATA[खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>खबरों की खबर वह रखते हैं<br />
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं<br />
दुनियां भर के दर्द को अपनी<br />
खबर बनाने वाले<br />
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं</p>
<p>आंखों पर चश्मा चढ़ाये<br />
कमीज की जेब पर पेन लटकाये<br />
कभी कभी हाथों में माइक थमाये<br />
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर<br />
स्वयं से होते बेखबर<br />
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे<br />
कभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसे<br />
दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं<br />
मुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैं</p>
<p>लाख चाहे कहो<br />
आदमी से जमाना होता है<br />
खबरची भी होता है आदमी<br />
जिसे पेट के लिये कमाना होता है<br />
दूसरों के दर्द की खबर देने के लिये<br />
खुद का पी जाना होता है<br />
भले ही वह एक क्यों न हो<br />
उसका पिया दर्द भी<br />
जमाने के लिए गरल होता<br />
खबरों से अपने महल सजाने वाले<br />
बादशाह चाहे<br />
अपनी खबरों से जमाने को<br />
जगाने की बात भले ही करते हों<br />
पर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैं</p>
<p>कभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरची<br />
खोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल<br />
पर फिर भी नहीं देते खबर<br />
अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं<br />
----------------------------<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 01:17:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल<br />
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।</p>
<p><strong>पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय<br />
वह अक्षर इनमे नहीं हंसि दे भावे रोय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये। </p>
<p>अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए। जब तक मनुष्य को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है तब तक वह गुलामों की भांति विषयों के पीछे भागता है और धन, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठित लोगों की चाटुकारित का अपने का धन्य समझने लगता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
