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	<title>hindi-family &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-family/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-family"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:02:16 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[विदुर नीतिःमैले वस्त्रों से स्त्री की रक्षा होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:03:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्रियों के पति बंधु और पति और विद्वानों का रक्षक ज्ञान होता है।<br />
2.सत्य से धर्म, योग से विद्या और सफाई से सुंदर रूप और सदाचार से कुल की रक्षा होती है<br />
3.तोलने से अनाज, फेरने से घोड़े, निरंतर देखभाल से गौऔं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।<br />
4.सदाचार से हीन मनुष्य का कुल ऊंचा हो तो भी उसे प्रतिष्ठित नहीं माना जा सकता है।<br />
5.जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य तथा प्रतिष्ठा से द्वेष करता है उसके रोग का कोई इलाज नहीं होता है।<br />
6.न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद या आलस्य करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही अपना मंत्र प्रकट हो जाने से बचना चाहिए और ऐसे किसी पेय का सेवन नहीं करें जिसे नशा चढ़ता हो।</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">"दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका"</a> पर लिखी गयी है। इसका पता इस प्रकार है। http://rajdpk.wordpress.com<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:47:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</guid>
<description><![CDATA[श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर
श्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर<br />
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप </p>
<p>other web pege<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार कार्य करना ही बुद्धिमानी]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Wed, 04 Jun 2008 03:40:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</guid>
<description><![CDATA[१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा  कभी-कभी अपने  बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
२.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।<br />
३.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है। पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पसु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।<br />
४.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग ने भी पार  की दस हजार पाठको की संख्या-विशेष संपादकीय ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 14:26:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/30bepg8.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के अनुसार दस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। सच तो यह है इस बात लिखने का मेरा आज मन नहीं था, पर कई लोग विश्लेषणों दिलचस्पी रखते हैं। ब्लाग जगत में अंसख्य मित्र हैं वह शायद इस पाठ से बोर हों-यह सोचकर कि हर चौथे  दिन अपने ब्लाग के आंकड़ों को सामने रख देता है- पर फिर भी कुछ हैं जो अनुसंधान की दृष्टि से आंकड़ों में दिलचस्पी रखते है। इस ब्लाग को लेकर एक बार मेरे मन में कड़वाहट भर गयी थी और सोचा था कि इसके दस हजार पाठक संख्या पार कर दिखा दूंगा। दो दिन पहले भी यह ख्याल था पर फिर लगा कि यह सब तो चलता रहेगा। आपसी वाद विवादों पर क्या मन मैला करना? केवल संदेशों से सुसज्जित इस ब्लाग के लिए  एक टंकक हूं और मुझे अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों के व्यूज कम हैं पर वह मेरे प्रेरक हैं। टिप्पणियां नगण्य हैं पर जितनी हैं वह किसी भी भारी भरकम ब्लाग पर अधिक लगने वाली टिप्पणियों से कम नहीं है। जैसा कि मेरे हर ब्लाग के साथ है समीर लाल, ममता श्रीवास्तव, मीनाक्षी जी, परमजीत बाली, विस्फोट (यही नाम मुझे याद आ रहा है) और महक जैसे कुछ नाम यहां अधिक है। आम पाठकों की संख्या (अगर उनमें मुझे कोई भ्रम नहीं है तो ) नब्बे प्रतिशत से अधिक है। मेरे तीन ब्लाग <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथि</a> और यह शब्दलेख पत्रिका अध्यात्म विषयों के लिए सुरक्षित हैं इसलिये इन पर ऐसा लिखना मुझे ठीक नहीं लगता कि किसी पर प्रहार होता लगे। यह मेरे सुबह लिखे जाने ब्लाग हैं तब मैं केवल इसी विषय पर सोचता हूं। ज्ञानी दिखने के लिए नहीं बल्कि लिखकर उसे धारण करने का प्रयास करता हूं।  इसका प्रभाव भी देखता हूं कि क्षमा और दया भाव में शक्ति है वह यहां से ही पता लगती है। चाणक्य से कहा है कि वक्त पड़े तो चतुराई भी दिखाओ पर उसका आशय यह कदापि नहीं है कि हमेशा छलकपट कर काम चलाओ। चाणक्य से कहा कि कभी क्रोध का प्रदर्शन करो-हां मुझे याद आ रहा है कि इस पाठ के रखने के दो दिन बाद मुझे ऐसा भी करना पड़ा था।<br />
एक कोने में पड़े इस शांत ब्लाग धीमी गति से चलता दिखत अवश्य है पर प्रतिदिन इस पर बड़ी संख्या में व्यूज होते हैं। कई बार तो पाठ लिखे हुए ब्लाग की संख्या इनसे पीछे रहती है और वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर वह इससे पिछड़ जाते हैं। </p>
<p>अधिक विश्लेषण करने के लिए और भी लोग हैं। केवल 101 पाठों में इतनी संख्या जुटाने वाला यह मेरा अकेला ब्लाग हैं।  भले ही ब्लाग लेखकों की संख्या इस पर कम है पर फिर भी उसके लेखक को अन्य ब्लाग पर तो वही प्रेरित करते है। समस्त ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को मेरी तरफ से शुभकामनाएं। साथ ही स्पष्ट बता देना चाहता हूं कि मेरे मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं हैं। जब हम आपस में एक जगह खड़े होते हैं तो वाद विवाद भी होते है। अगर मैं कुछ कभी किसी के लिए लिखता हूं तो उसे अपना समझकर लिखता हूं। शेष फिर कभी।</p>
<p>दीपक भारतदीप  </p>
<p><strong>१० हजार की संख्या में विभिन्न फोरमों से आये व्युज की संख्या जो कुल का दस प्रतिशत भी नहीं है.</strong><br />
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<p><strong>विभिन्न पाठों को को पढने वालों की संख्या </strong></p>
<p>कबीर के दोहे:जह༯a&#62; 644<br />
चाणक्य नीति:प़्/a&#62; 305<br />
चाणक्य नीति:सम़/a&#62; 249<br />
रहीम के दोहे-कि༯a&#62; 224<br />
बाप-बेटे का होत 204<br />
दिल का राज, सिर ༯a&#62; 179<br />
चाणक्य नीति: वि༯a&#62; 172<br />
रहीम के दोहे:ह्༯a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:बु़/a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 156<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 147<br />
श्री गणेश जी को  145<br />
जो कार लायक नही༯a&#62; 144<br />
चाणक्य नीति:कप़/a&#62; 143<br />
रहीम के दोहे:चत༯a&#62; 132<br />
सच-झूठ का अंतर्༯a&#62; 129<br />
परिचय  127<br />
चाणक्य नीति: शर༯a&#62; 118<br />
मेरा परिचय  115<br />
कुछ न पढा, रौनक ़/a&#62; 111<br />
विदुर नीति:जिस़/a&#62; 110<br />
रहीम के दोहे:गो༯a&#62; 106<br />
संत कबीर वाणी:ख༯a&#62; 102<br />
चीन ने आख़िर अप༯a&#62; 99<br />
चाणक्य नीति:अप़/a&#62; 97<br />
कवितायेँ और क़्/a&#62; 96<br />
रहीम के दोहे:व्༯a&#62; 93<br />
विदुर नीति:धनि़/a&#62; 92<br />
चाणक्य नीति-जरॼ/a&#62; 89<br />
चाणक्य नीति:सा़/a&#62; 87<br />
विदुर नीति:विदॼ/a&#62; 87<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 87<br />
मन के खोखलेपन क༯a&#62; 83<br />
प्रात:काल का आन༯a&#62; 81<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 81<br />
पापा ब्लोगर नं़/a&#62; 81<br />
विदुर नीति:अधरॼ/a&#62; 77<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 76<br />
क्या ब्लोग जगत ༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:श༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 74<br />
चाणक्य नीति:हमॼ/a&#62; 73<br />
रामजी लगायेंगे 70<br />
नीयत पर भरोसा न༯a&#62; 68<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 67<br />
कब कौन सा रंग सा 67<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 66<br />
चाणक्य नीति:दु़/a&#62; 65<br />
मनुस्मृति:अपनी 62<br />
वह भूत-भूत कर चि 60<br />
चाणक्य नीति:सभॼ/a&#62; 60<br />
ऐसा भी क्या अक्༯a&#62; 58<br />
चाणक्य नीति:स़्/a&#62; 57<br />
चाणक्य नीति:शा़/a&#62; 56<br />
मनुस्मुतिःस्त༯a&#62; 55<br />
रहीम के दोहेःप़/a&#62; 54<br />
चाणक्य नीति:अल 54<br />
चाणक्य नीतिःतप 53<br />
कैसे करते हैं व༯a&#62; 53<br />
क्रिकेट भी अब फ༯a&#62; 53<br />
कतिपय सम्मान प़/a&#62; 52<br />
मनु स्मृतिःधन ़/a&#62; 50<br />
चाणक्य नीति:इस ༯a&#62; 49<br />
चजइ-ब्लोगरों मॼ/a&#62; 48<br />
चाणक्य नीतिःसं 47<br />
इसलिए कवि हमेश़/a&#62; 46<br />
चाणक्य नीति:सु़/a&#62; 46<br />
कवि ब्लोगर आवे़/a&#62; 45<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 45<br />
संत कबीर वाणी:व༯a&#62; 45<br />
वही कहलाता है अ༯a&#62; 45<br />
मनुस्मृति: मां़/a&#62; 44<br />
संत कबीर वाणी:म༯a&#62; 42<br />
मनुस्मृतिःपरि༯a&#62; 41<br />
फ्लॉप हैं तो बे༯a&#62; 41<br />
एक बेकार खबर को  40<br />
चाणक्य नीति:असॼ/a&#62; 39<br />
शब्द बोलते जगह ༯a&#62; 39<br />
चजई-चिट्ठा जगत ༯a&#62; 38<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 36<br />
मनुस्मृतिःविष༯a&#62; 36<br />
संत कबीर वाणी:ब༯a&#62; 35<br />
आस्ट्रेलिया का 35<br />
चाणक्य नीति:सं़/a&#62; 35<br />
मैं बिकने लायक ༯a&#62; 34<br />
क्रिकेट बहुत द़/a&#62; 34<br />
मनुस्मृति:ढोंग 33<br />
माफ़ी दी कि क़दम 33<br />
रहीम के दोहेःगॼ/a&#62; 32<br />
मनुस्मृतिःईमा༯a&#62; 32<br />
चाणक्य नीति:पै़/a&#62; 32<br />
शायद ही लोग समझ  32<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 32<br />
क्या लिखूं 'ब्ल༯a&#62; 30<br />
या इसे भ्रमवश ल༯a&#62; 28<br />
मनु स्मृतिःपर् 25<br />
संत कबीर वाणीः़/a&#62; 24<br />
होली के रंग फीक༯a&#62; 23<br />
अपनी मनस्थिति ༯a&#62; 22<br />
मनुस्मृतिःसदा༯a&#62; 19<br />
चजई- क्या सब चलॼ/a&#62; 17<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 14<br />
अंतर्जाल पर प़्/a&#62; 14  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:खुद पढ़कर समझें नहीं दूसरे को समझाएं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/24/sant-kabir-vani/</link>
<pubDate>Mon, 24 Dec 2007 01:31:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/24/sant-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार
आपन त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार<br />
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़-लिखकर दूसरों को पढाने और उपदेश देने लगे पर अपने को नहीं समझा पाए तो कोई अर्थ नहीं है क्योंकि अपना खुद का जीवन तो व्यर्थ ही जा रहा है। </p>
<p>भावार्थ- आज के संदर्भ में भी उनके द्वारा यह सत्य हमें साफ दिखाई देता है, अपने देखा होगा कि दूसरों को त्याग और परोपकार का उपदेश देने वाले पाखंडी साधू अपने और अपने परिवार के लिए धन और संपत्ति का संग्रह करते हैं और अपनी गद्दी भी अपने किसी शिष्य को नहीं बल्कि अपने खून के रिश्ते में ही किसी को सौंपते हैं। ऐसे लोगों की शरण लेकर भी किसी का उद्धार नहीं हो सकता।</p>
<p>पढ़त गुनत रोगी भया, बडा बहुत अभिमान<br />
भीतर ताप जू जगत का, बड़ी न पड़ती सान<br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोग किताबें पढ़, सुन और गुनकर रोगी हो गये और उन्हें अभिमान हो जाता है। जगत को विषय-कामनाओं का ताप भीतर ताप रहा है, घड़ी भर के लिए शांति नहीं मिलती है।<br />
भावार्थ-आपने देखा होगा कि कुछ लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़कर दूसरों को समझाने लगते हैं। दरअसल उनको इस बात का अहंकार होता है कि हमें ज्ञान हो गया है जबकि वह केवल शाब्दिक अर्थ जानते हैं पर उसके भावार्थ को स्वयं अपने मन में उन्होने धारण नहीं किया होता है।<br />
<strong><br />
नोट- थके हारे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेख अवश्य पढें उसका पता नीचे लिखा हुआ है ।</strong>http://dpkraj.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट बहुत दिन बाद जनचर्चा का विषय बना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 16:36:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल बीस ओवरीय विश्वकप प्रतियोगिता के सेमी फाइनल में आस्ट्रेलिया को हारने के बाद शुरू हुई। पहले ऎसी चर्चा १९८३ में शुरू हुई थी बाजार में लोगों को जमकर भुनाया गया और विश्व में आर्थिक रुप से गरीब कहे जाने वाला भारत क्रिकेट का आर्थिक आधार बन गया। फिर एक दौर एसा आया कि भारतीय टीम अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर तो अच्छा प्रदर्शन करती पर प्रतियोगिताओं में पिट कर आ जाती। क्रिकेट के कर्ण धारों को लगता कि अन्तराष्ट्रीय दौरों के सफलता से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बरकरार रहेगी और उन्होने प्रतियोगिताओं को भी सामान्य रुप से लिया और पिछले विश्व कप के बाद भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो गयी भले ही क्रिकेट से जुडे लोग इसे नही मानते हैं पर इसके आर्थिक पक्ष से जुडे विशेषज्ञ इस पहलू को जानते हैं कि लोगों में अगर लगाव अधिक नहीं है तो उसका फ़ायदा नही उठाया जा सकता है।</p>
<p>बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि'कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना'।</p>
<p>कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।</p>
<p>बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामजी लगायेंगे बेडा पार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 03:50:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[विश्वास धारण कर हृदय में
रामजी करेंगे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विश्वास धारण कर हृदय में<br />
रामजी करेंगे बेड़ा पार<br />
जलमार्ग हो या थल मार्ग या<br />
करना हो आकाश में<br />
बिना पंख विचरण<br />
कोई अगर बाधा होगी तो<br />
हृदय से स्मरण कर नाम का<br />
हो जाओगे उसके पार<br />
उनकी भक्ति में शक्ति अपार<br />
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार</p>
<p>तुम चाहोगे कि<br />
काम सब रामजी करें<br />
नाम तुम्हारा हो<br />
दूसरों के यकीन और भक्ति की<br />
परवाह नहीं<br />
बढाना चाहते अपना व्यापार<br />
दिखाते है लोगों को सपने<br />
लक्ष्य का पता नहीं अपने<br />
रामजी के नाम से बड़ा नामा<br />
क्या करेंगे लोगों का भला<br />
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार</p>
<p>रामजी ने कहा<br />
'मुझसे बडे हैं भक्त मेरे<br />
बिना लालच और लोभ<br />
मेरी भक्ति के भाव में पडे'<br />
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार<br />
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार<br />
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा<br />
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने<br />
पर हम तो उनकी शक्ति को माने<br />
भक्त तो नाम लेते हैं<br />
अभक्त भी लगाते पुकार<br />
पर उनसे भी क्या कहें<br />
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया<br />
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार<br />
रामजी की माया है अपरंपार<br />
अपने भक्तों के दें भक्ति<br />
और अभक्तों को माया के चक्कर में<br />
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार<br />
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह<br />
अपनी देह के अमर होने का भ्रम<br />
व्यापार ही जिनका धर्म<br />
भक्तों की भावनाओं बेखबर<br />
जिन्होंने तय कर लिया है कि<br />
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे<br />
रामजी के अलावा उन्हें<br />
कौन समझा सकता है कि<br />
यकीन कर लो<br />
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो<br />
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे</p>
<p>----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
