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	<title>hindi-epatrika &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-epatrika/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-epatrika"</description>
	<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 22:58:28 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[हिट की परवाह की तो ब्लाग पर लिखना कठिन होगा-संपादकीय]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=253</link>
<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 14:49:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=253</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है। हिंदी के समस्त ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर आपस में संपर्क रखने की जो सुविधा है वह एक अनूठी है। जिन लोगोंे ने नारद फोरम के साथ अपने ब्लाग जीवन की शुरुआत की है वह उसे भूल नहीं सकते। वहां पर दूसरों को हिट और स्वयं को फ्लाप ब्लागर देखकर कुछ लेखकों को अपनी तौहीन लगती थी क्योंकि ऐसा लगता  कि  हिंदी के अंतर्जाल की दुनियां यहीं सिमटी हुई है।  अनेक लोग यहां हिट प्राप्त करते रहे  इसी कारण उन विषयों पर लिखने के आदी हो गये जिससे ब्लाग लेखकों में हिट मिलें। इनमें तो कई गजब के लेखक हैं और आज भी उनको जमकर हिट मिलते हैं। उनको पढ़ना बुरा नहीं है क्योंकि उनसे ही यही सीखा जा सकता है कि आपको क्या पसंद नहीं है और जो आपको पंसद नहीं है वह आम पाठक को भी पसंद नहीं आयेगा। ऐसे में अपने अंदर कुछ अलग लिखने के प्रेरणा पैदा होती है।<br />
पहले ब्लाग लेखकों को यह पता ही नहीं था कि आखिर उनके ब्लाग की पहुंच कहां तक है? धीरेधीरे यह स्पष्ट हो गया है कि एच.टी.एम.एल से लिखी गयी सामग्री ही ब्लाग की ताकत होती है। इन फोरमों पर फ्लाप रहने के बावजूद कई लोग लिख रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि अंततः उनके लिखे पाठों का महत्व ही उनको प्रचार दिला सकता है। सच तो यह है कि ब्लाग लेखकों में हिट दिलाने वाली सामग्री केवल उसी दिन के लिये महत्वपूर्ण है जिस दिन लिखी गयी है। उसके बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। ब्लाग लेखकों से लेखक ब्लागरों का सामंजस्य बैठ पाना कठिन है। मेरे कई ब्लाग लेखक मित्र है और उनकी सदाशयता ने मुझे प्रेरित किया है उनकी हिंदी ब्लाग जगत के प्रति निष्ठा भी असंदिग्ध है पर यहां  कुछ ऐ से लोग भी हैं जो लिखने के बावजूद गंभीर नहीं हैं। बंदरों की तरह उछलकूद कर वह यह जताते हैं कि वह यहां के श्रेष्ठ ब्लागर हैं पर उनका लेखन एक ब्लागर लेखक के रूप में मुझे पसंद आता है पाठक के रूप में नहीं।   इन फोरमों पर हिट और फ्लाप का खेल नकली है इस बात को समझ लेना चाहिए। कभी तो ऐसा लगता है कि यहां कुछ लोगों को हिट इतने न मिलें तो वह लिखना ही बंद कर देंगे। संभवतः यही कारण है ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है पर दूसरे लोग हतोत्साहित न हों इसलिये मैं प्रतिवाद स्वरूप अपने कुछ पाठ लिख देता हूं जो मेरे मित्र ब्लागरों को पसंद नहीं आते। जिन लोगों को गंभीर और सोद्देश्य लेखक करना है उन्हें यहंा हिट का मोह त्यागना होगा।  यहां अपनी सुविधा और विचार से पसंद और हिट हैं पर किसी भी तरह से आम पाठक का प्रतिनिधित्व यहां नहीं है।  यहां कुछ ऐसे ब्लाग लेखक जबरदस्त हिट पा रहे हैं जिनके लेखन को आम पाठक के लिये तो कभी भी मतलब का नहीं माना जा सकता। जिन लोगों ने अपने आपको यहां का नेता समझा है वह बड़े शहरों रहते हैं और प्रचार माध्यमों में अपनी पहुंच का लाभ उठाकर कर अपने ऐसे ब्लाग लेखकों को प्रचार दिलवाते हैं जिनका लेखक आम पाठक के रूप में प्रभावित नहीं करता। हालांकि मैं उनको स्वयं बहुत दिलचस्पी से पढ़ता हूं। एक दिलचस्प बात यह है कि जिन ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है उनमें अधिकांशतः ब्लाग स्पाट पर ही लिखते हैं जिनको प्रोत्साहित करने की आवश्यकता होती है।  ब्लागस्पाट के ब्लाग तकनीकी कारणों से अधिक पाठक नहीं जुटा पाते। जिस दिन पाठ लिखो उस दिन हिट आते हैं पर फिर शांति छा जाती है। इसके विपरीत वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटाते हैं। यही कारण है कि यहां लिखते हुए कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी की परवाह की जाये। ब्लाग स्पाट पर लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे अपनी डायरी में लिख रहा हूं। यहां से उठाकर वर्डप्रेस पर रखे गयी कम से कम दस पाठ ऐसे हैं जो पांच सौ से अधिक बार पढ़े जा चुके हैं जबकि यहां उनको बीस से अधिक लोग नहीं पढ़ पाये। ऐसे में मेरा हौसला बढ़ता है। इसके पीछे तकनीकी कारण है जिसका अनुसंधान मैं कर उसका निष्कर्ष भी प्रस्तुत करूंगा। वैसे जिस तरह ब्लाग स्पाट तेजी से अपने स्वरूप में बदलाव ला रहा है उससे अनेक लाभ भी होना है। </p>
<p>ब्लाग लेखकों का एक समूह हिंदी ब्लाग जगत को अपनी जागीर समझ रहा है। यह लोग अपने को मिली सुविधाओं का उपयोग इस तरह कर रहे हैं जैसे कि वह बहुत बड़े लेखक हैं। अगर उनके हिट की लेखक ब्लागर परवाह करेंगे तो फिर वह उस भीड़ में खो जायेंगे जिसकी पहचान कभी नहीं बनती। मैं उन कवि और लेखक ब्लागरों की तारीफ करूंगा जो इन ब्लाग लेखकों के हिट की परवाह किये बिना लिख रहे हैं। सच तो यह है कि लेखक ब्लागरों में ही वह ताकत है जो वह अंतर्जाल में प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। पिछले कई दिनों से वर्डप्रेस पर लिखी गयी हास्य और गंभीर कविताओं, चिंतन और आलेखों की बढ़ते पाठकों की संख्या देखकर मुझे ऐसा लगता है कि उनमें और अधिक वृद्धि होगी।  यह एक दिलचस्प तथ्य है कि ब्लाग के विषय में लिखे गये विषयों को इन फोरमों पर ठीकठाक हिट मिले पर फिर बाद में उनका कोई पाठक नहीं मिला। कई हास्य गंभीर कवितायें तो इतने हिट जुटा लेती हैं कि मुझे स्वयं पर ही यकीन नहीं होता जबकि कहा जाता है कि लोग कविताएं पढ़ना नहीं चाहते। ईपत्रिका ने एक दिन में 253 पाठक जुटाये जो जबकि मेरे एक दूसरे ब्लाग पर सर्वाधिक 215 पाठकों की संख्या थी।<br />
एक बात तय है कि अंतर्जाल पर बेहतर साहित्य लिखने वालों का भविष्य उज्जवल है पर उसके लिये उनको धैर्य धारण करना होगा।  इन फोरमों पर अपने ब्लाग अवश्य पंजीकृत करवायें पर हिट के लिये आम पाठक की दृष्टि से ही लिखने का विचार करें। ब्लाग लेखकों से संपर्क रखना आवश्यक है क्योंकि इनमें कई लोग तकनीकी रूप से बहुत कुछ सीख गये हैं और उनके ब्लाग पढ़ते रहना चाहिए। अभी मैंने एक ब्लाग लेखक का पाठ पढ़कर ही  अपने ब्लागस्पाट के पाठ में सुधार किया और उससे वह आकर्षक बन गया। इसके बावजूद इन ब्लाग लेखकों के हिट की परवाह की तो आम पाठक के लिये लिखना कठिन हो जायेगा। इस ब्लाग के एक दिन में 250 से अधिक पाठक जुटाने पर बस इतना ही। यह ब्लाग बीस हजार की संख्या की तरफ बढ़ रहा है और उस समय शेष बात लिखी जायेगी। </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क पर लिखते हैं, मुश्क कसते हैं शायर-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</link>
<pubDate>Mon, 18 Aug 2008 16:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=249</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ भतीजे को भी
फंदेबाज घर लाया औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने साथ भतीजे को भी<br />
फंदेबाज घर लाया और बोला<br />
‘दीपक बापू, इसकी सगाई हुई है<br />
मंगेतर से रोज होती मोबाइल पर बात<br />
पर अब बात लगी है बिगड़ने<br />
उसने कहा है इससे कि एक ‘प्रेमपत्र लिख कर भेजो<br />
तो जानूं कि तुम पढ़े लिखे<br />
 नहीं भेजा तो समझूंगी गंवार हो<br />
तो पर सकता है रिश्ते में खटास’<br />
अब आप ही से हम लोगों को  आस<br />
इसे लिखवा दो कोई प्रेम पत्र<br />
जिसमें हिंदी के साथ उर्दू के भी शब्द हों<br />
यह बिचारा सो नहीं पाया पूरी रात<br />
मैं खूब घूमा इधर उधर<br />
किसी हिट लेखक के पास फुरसत नहीं है<br />
फिर मुझे ध्यान आया तुम्हारा<br />
सोचा जरूर बन जायेगी बात’</p>
<p>सुनकर बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त यह कौनसी शर्त लगा दी<br />
कि उर्दू में भी शब्द हों जरूरी<br />
हमारे समझ में नहीं आयी बात<br />
वैसे ही हम भाषा के झगड़े में<br />
फंसा देते हैं अपनी टांग ऐसी कि<br />
निकालना मुश्किल हो जाता<br />
चाहे कितना भी जज्बात हो अंदर<br />
नुक्ता लगाना भूल जाता<br />
या कंप्यूटर घात कर जाता<br />
फिर हम हैं तो आजाद ख्याल के<br />
तय कर लिया है कि नुक्ता लगे या न लगे<br />
लिखते जायेंगे<br />
हिंदी वालों को क्या मतलब वह तो पढ़ते जायेंगे<br />
उर्दू वाले चिल्लाते रहें<br />
हम जो शब्द बोले  उसे<br />
हिंदी की संपत्ति बतायेंगे<br />
पर देख लो भईया<br />
कहीं नुक्ते के चक्कर में कहीं यह<br />
फंस न  जाये<br />
इसके मंगेतर के पास कोई<br />
उर्दू वाला न पहूंच जाये<br />
हो सकता है गड़बड़<br />
हिंदी वाले सहजता से नहीं लिखें<br />
इसलिये जिन्हें फारसी लिपि नहीं आती<br />
वह उर्दू वाले ही  करते हैं<br />
नुक्ताचीनी और बड़बड़<br />
प्रेम से आजकल कोई प्यार की भाषा नहीं समझता<br />
इश्क पर लिखते हैं<br />
पब्लिक में हिट दिखते हैं<br />
 इसलिये मुश्क कसते हैं शायर<br />
फारसी  का देवनागरी लिपि से जोड़ते हैं वायर<br />
इसलिये हमें माफ करो<br />
कोई और ढूंढ लो<br />
नहीं बनेगी हम से तुम्हारी बात<br />
.........................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भला कहां  हमें कच्चे धागों का बंधन निभाना है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=243</link>
<pubDate>Sat, 16 Aug 2008 13:23:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=243</guid>
<description><![CDATA[उसने घर में घुसते ही
अपने  चारों मोबाइ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>उसने घर में घुसते ही<br />
अपने  चारों मोबाइल का स्विच आफ कर<br />
अल्मारी में रख दिये<br />
फिर अपनी टांगें सोफे पर फैलाई<br />
पास ही बैठा देख रहा था छोटा भाई</p>
<p>उसने बड़े भाई से पूछा<br />
‘यह क्या किया<br />
जान से प्यारे<br />
मोबाइलों  का स्विच आफ किया<br />
सभी को अल्मारी की कैद में डाल दिया<br />
अब  वह चारों जानूं जानूं कहकर<br />
किसे पुकारेंगी<br />
बैठे तुम्हारे नंबरों को निहारेंगी<br />
क्या उन सबसे बोर हो गये हो<br />
यह इश्क से परेशान घोर हो गये हो<br />
या कोई पांचवीं पर दिल आ गया है<br />
तुम  मोबाइल भी  साथ रखकर सोते हो<br />
उसकी घंटी और तुम्हारी आवाजें सुनकर<br />
तो लगता नहीं कि कभी नींद तुम्हें आई<br />
ऐसा क्या हो गया<br />
कहीं तुमने इश्क से सन्यास की कसम तो नहीं खाई’</p>
<p>बड़ा भाई बोला<br />
‘आज तो था आजादी की दिन<br />
खूब जमकर बनाया<br />
मैं तो निकला था घर से  खरीदने का किराना<br />
वह भी चारों अलग अलग आई<br />
कोई निकली थी कालिज में फंक्शन का<br />
कोई सहेली के साथ पिकनिक का<br />
कोई निकली थी स्पेशल क्लास का बनाकर बहाना<br />
लक्ष्य एक ही था इश्क करते हुए<br />
मोटर सायकिल पर घूमते हुए<br />
इस बरसात में नहाना<br />
सभी के परिवार वाले घर में बंद थे<br />
अपने कामों के पाबंद थे<br />
इसलिये कहीं किसी का डर नहीं था<br />
सचमुच हमने आजादी मनाई<br />
पर कमबख्त यह राखी भी कल आई<br />
भाईयों को राखी बांधकर वह<br />
फिर मोबाइल पर देंगी आवाज<br />
हो जायेगा में मेरे लिये मुसीबत का आगाज<br />
फिर तो मुझे जाना पड़ेगा<br />
नहीं तो पछताना पड़ेगा<br />
कल अगर गया तो फिर<br />
आज जैसे ही घुमाना पड़ेगा<br />
मेरे दोस्त भी बहुत है<br />
किसी कि बहिन है इधर<br />
तो किसी की उधर<br />
सभी कल चहलकदमी सड़कों पर करेंगे<br />
मेरे साथ किसी को देख लिया तो<br />
माशुका की जगह बहिन समझेंगे<br />
चारों में से किसी के साथ तो<br />
परमानेंट टांका भिड़ेगा<br />
पर बाद में दोस्तों की फब्तियों से<br />
कौन घिरेगा<br />
आज तो सभी की आंख<br />
वैसे ही पवित्र देखने लग जाती हैं<br />
अक्ल माशुका को भी बहिन समझ पाती है<br />
ऐसे में अच्छा है बाद के लफड़ों से<br />
एक दिन के लिये इश्क से  दूर हो जाऊं<br />
क्यों मैं किसी के भाई की उपाधि पाऊं<br />
किसी को जिंदगी का हमसफर तो बनाना है<br />
भला कहां  हमें कच्चे धागों का बंधन निभाना है<br />
इसलिये मैंने राखी के दिन को ही<br />
पूर्ण आजादी की तरह  मनाने की अक्ल पाई<br />
...............................................<br />
नोट-यह कविता पूरी तरह काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा<br />
भला कहां कच्चे धागों का बंधन निभाना है-हास्य कविता</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्दों की पंक्तियां उनके पांव में बेड़ियाँ  नजर आ रही हैं-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 09:08:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=240</guid>
<description><![CDATA[किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां
सल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां<br />
सलाखों की तरह नजर आ रही हैं<br />
कुछ चेहरे छिपे हैं उसके पीछे<br />
जिनकी आंखें बुझी जा रही हैं </p>
<p>पाठ है आजादी का<br />
जिसमें कई कहानियां हैं<br />
लोग उन्हें सुनाये जा रहे हैं<br />
पर उससे आगे नहीं जा पा रहे ं<br />
क्योंकि किताब एक कैद की तरह हो गयी है<br />
कोई दूसरी मिल जाये तो<br />
शायद वह उससे निकल पायें<br />
पर वह भी एक दूसरी कैद होगी<br />
जिसमें वह फिर बंद हो जायें<br />
संभव है उसी में लिखा पढ़कर सभी को सुनायें<br />
अपनी सोच बंद है आलस्य के पिंजरे में कैद<br />
दूसरों के ख्याल पर जली मोमबत्तियों पर<br />
पढ़ने वाले कैदी रौशनी पा रहे हैं<br />
आजादी के गीत गा रहे हैं<br />
पुरानी कहानियों के दायरों से बाहर<br />
कौन बाहर आयेगा<br />
शब्दों का पहरेदार फिर<br />
उनको अंदर भगायेगा<br />
शहीदों के समाधि पर लगाकर<br />
हर वर्ष मेले<br />
नयी सूरतें अपना मूंह छिपा रहीं हैं<br />
किताब में लिखी शब्दों की पंक्तियों<br />
उनके पांव बेड़ी की तरह तरह नजर आ रही हैं<br />
.............................................................<br />
..............................................................</strong><br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जुबान अंदाज हालातों का नहीं करती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=238</link>
<pubDate>Thu, 14 Aug 2008 17:06:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=238</guid>
<description><![CDATA[सपने सजाता है
उनको बिखरता देख
टूट जाता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सपने सजाता है<br />
उनको बिखरता देख<br />
टूट जाता है मन<br />
कहीं लगाने के लिये ढूंढो जगह<br />
वहीं शोर बच जाता है<br />
जैसे जल रहा हो चमन</p>
<p>भला आस्तीन में सांप कहां पलते हैं<br />
इंसानों करते हैं धोखा<br />
नाम लेकर का खुद ही जलते हैं<br />
क्या दोष दें आग को<br />
जब अपने चिराग से घर जलते हैं<br />
वही सिर पर चढ़ आता है<br />
जिसे करो पहले नमन<br />
जब बोलने को मचलती है जुबान<br />
 हालातों अंदाज का नहीं करती<br />
चंद प्यार भरे अल्फाज भी<br />
नहीं दिला पाते वह कामयाबी<br />
जो खामोशी दिला देती है<br />
सपनों में जीना अच्छा लगता है<br />
पर हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन<br />
.........................................</strong></p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=236</link>
<pubDate>Wed, 13 Aug 2008 14:56:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=236</guid>
<description><![CDATA[हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमने देखा था उगता सूरज<br />
उन्होने देखा डूबता हुआ<br />
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में<br />
जश्न मनाने की तैयारी<br />
पर हमने बिताया था पूरा दिन<br />
सूरज की तपती किरणों में<br />
अपने पसीने में नहाते<br />
हमारा मन भी था डूबा हुआ</p>
<p>वह आसमान में टिमटिमाते तारों की<br />
बात करते रहे<br />
उनकी रात<br />
खुशियों की कहानी कह रही थी<br />
जबकि हमारे बदन से पसीने की<br />
बदबू बह रही थी<br />
सबकी जमीन और आसमान<br />
अलग-अलग होते हैं<br />
किसी को रात डराती है तो  किसी को दिन<br />
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है<br />
इसलिए सब होते हैं अकेले<br />
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ<br />
-----------------------------<br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चमन की बागडोर है जिसके हाथ वही दुश्मन हो जाता-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 14:18:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=230</guid>
<description><![CDATA[लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लुट जाने का खतरा अब<br />
गैरो से नहीं सताता<br />
अपनों को ही यह काम<br />
अच्छी तरह अब करना आता</p>
<p>पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे<br />
यकीन किसी पर नहीं आता<br />
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को<br />
अपनों का हाथ नजर आता<br />
कई बाग उजड़ गये हैं<br />
माली के हाथों जब<br />
जोअब फूल नहीं लगाता<br />
इंतजार रहता है उसे<br />
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो<br />
वह उसे बेच आये बाजार में<br />
इस तरह अपना घर सजाता<br />
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत<br />
बेईमानी से उनकी है सोहबत<br />
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा<br />
लूट में उनको ही मजा आता<br />
कहें महाकवि दीपक बापू<br />
मन में है उथलपुथल तो<br />
अमन कहां से आयेगा यहां<br />
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की<br />
किसी और से क्या खतरा होगा<br />
वही उसका दुश्मन हो जाता</strong><br />
..................................<br />
<strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौन करे सच का इजहार-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</link>
<pubDate>Mon, 11 Aug 2008 15:14:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=227</guid>
<description><![CDATA[आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आँख के अंधे अगर हाथी को<br />
पकड कर उसके अंगों को<br />
पकड लें<br />
अपने बुद्धि के अनुसार<br />
उसके अंगों का बयान<br />
कुछ का कुछ कर लें<br />
तो चल भी सकता है<br />
पर अगर अक्ल के अंधे<br />
रबड़ के हाथी को पकड़ कर<br />
असल समझने लगें तो<br />
कैसे हजम हो सकता है</p>
<p>कभी सोचा भी नहीं था कि<br />
नकल इतना असल हो जायेगा<br />
आदमी की अक्ल पर<br />
विज्ञापन का राज हो जायेगा<br />
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर<br />
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा<br />
कौन कहता है कि<br />
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है<br />
छिपा हो परदे में तो ठीक<br />
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में<br />
सच तन्हाँ लगता है<br />
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी<br />
नकली हो गया है<br />
काले रंग से भी काला हो गया सौदागरों का मन<br />
अपनी खुली आंखों से देखने से<br />
कतराता आदमी उनके<br />
चश्में से दुनियां देखने लगता है<br />
........................................................</p>
<p>आंखें से देखता है दृश्य आदमी<br />
पर हर शय की पहचान के लिये<br />
होता है उसे किसी के इशारे का इंतजार<br />
अक्ल पर परदा किसी एक पर पड़ा हो तो<br />
कोई गम नहीं होता<br />
यहां तो जमाना ही गूंगा हो गया लगता है<br />
सच कौन बताये और करे इजहार</strong><br />
..................................................................</p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</link>
<pubDate>Sun, 10 Aug 2008 12:55:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=225</guid>
<description><![CDATA[कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान
अपने व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान<br />
अपने व्यापार को नाम देते अभियान<br />
चार दिशाओं के चौराहे पर खड़े होकर<br />
देते हैं हांका<br />
समाज की भीड़ भागती है भेड़ों की तरह<br />
नाम लेते हैं शांति का<br />
पहले कराते हैं सिद्धांतों के नाम पर झगड़ा<br />
बह जाता है खून सड़कों पर<br />
उनका नहीं होता बाल बांका<br />
कोई तनाव से कट जाता<br />
कोई गोली से उड़ जाता<br />
पर किसी ने उनके घर में नहीं झांका<br />
कहीं नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान<br />
....................................................</p>
<p>हमें मंजिल का पता बताकर<br />
खुद वह जंगल में अटके हैं<br />
कहने वाले सच कह गये<br />
जो सबको  बताते  हैं<br />
नदिया के पार जाने का रास्ता<br />
वह स्वयं  कभी पार नहीं हुए हैं<br />
कहैं  महाकवि दीपक बापू<br />
उन्मुक्त भाव से जीते हैं जो लोग<br />
मुक्त कहां हो पाते हैं स्वयं<br />
दुनियां भर के झंझट उनके मन के बाहर लटके हैं<br />
.................................................</strong></p>
<p><strong><br />
<blockquote>यह पाठ/कविता इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तब तक अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 16:51:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=222</guid>
<description><![CDATA[जो सरल और  सहज हैं
जिन के दिल में हैं ने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जो सरल और  सहज हैं<br />
जिन के दिल में हैं नेकनीयति<br />
करते हैं वही रचना का सृजन<br />
जिन पर खुद  की ख्वाहिशों और<br />
अरमानों को पूरा करने का बोझ है<br />
समाज में तनाव का करते हैं वही विसर्जन </p>
<p>दूसरे के दर्द को अपने दिल की<br />
आंखों से देखकर जो करते हैं विचार<br />
सृजक  वही बन पाते हैं<br />
जो सतह पर तैरते हुए केवल<br />
दिखाने के लिए बनते हैं हमदर्द<br />
वह तो शब्द के सौदागर हैं<br />
बेच लें बाजार में ढेर सारी रचनाएं<br />
पर फिर भी सृजक नहीं कहलाते हैं<br />
प्रसिद्धि और प्रशंसा के ढेर सारे शब्द<br />
अपने खजाने में जमा करते लेते<br />
पर सृजन की उपाधि का नहीं कर पाते  अर्जन</p>
<p>कहने से कोई सृजक नहीं हो जाता<br />
चंद शब्द लिखने से कोई सृजन नहीं हो पाता<br />
आखों से पढ़कर<br />
कानों से सुनकर<br />
हाथों से स्पर्श कर<br />
जब तक अपनी अनुभूतियों को<br />
दिल में डुबोया न जाए<br />
तब तक रस और श्रृंगार के बिना<br />
अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन<br />
-------------------------</strong><br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक टुकड़ा बरफी-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=218</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 13:46:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=218</guid>
<description><![CDATA[एक पड़ौसन ने दूसरी से कहा
‘तुम्हें बधा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक पड़ौसन ने दूसरी से कहा<br />
‘तुम्हें बधाई हो बधाई<br />
तुम्हारे पतिदेव जहां करते हैं<br />
मदद का काम<br />
वहां आई जमकर भारी बाढ़<br />
वहां बरसात हुई है जाम<br />
अब तो तुम्हारे घर लक्ष्मी बरसेगी<br />
सारी दुनियां तुम्हें देखकर<br />
अपने अच्छे भाग्य को तरसेगी<br />
यह खबर आज अखबार में आई<br />
तुम हमें खिलाना अब अच्छी मिठाई‘</p>
<p>सुनकर दूसरी पड़ौसन भड़की और बोली<br />
‘मैं क्यों खिलाऊं तुम्हें मिठाई<br />
तुम्हारे जहां  करते हैं<br />
लोगों की सेवा का काम<br />
वहां भी तो पड़ा था भारी सूखा<br />
तुम्हारे घर में यहां बन रहे थे पकवान<br />
वहां खाने को तरसे थे लोग रूखा सूखा<br />
तब तो तुमने किसी को यह<br />
खबर तक नहीं बताई<br />
मिठाई मांगने के लिये तो<br />
बिना टिकट चली आई<br />
पर जब आ रहा था सूखे के समय<br />
रोज घर में नया सामान<br />
तब तुमने एक टुकड़ा बरफी भी नहीं भिजवाई<br />
इसलिये तुम भूल जाओ मिठाई<br />
........................................................</strong><br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ की भेड़ नहीं शेर बनो-हिदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 17:17:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=215</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि को]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भीड़ में सबको भेड़ की तरह<br />
हांकने कि कोशिश में हैं सब<br />
चलते जाते हैं आगे ही आगे<br />
सीना तानकर अपना चलते<br />
पर कोई शेर आ जाये सामने<br />
तो कायरता का भाव उनमें जागे </p>
<p>भेड़ों की तरह भीड़ में चलते<br />
अब में थक गया हूँ<br />
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी<br />
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं<br />
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे<br />
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह<br />
जो कभी सामने नहीं आते<br />
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते<br />
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं पर भागे-भागे </p>
<p>मन नहीं चाहता किसी को<br />
अपने पंजों से आहत करूं<br />
पर फिर सोचता हूँ कि<br />
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ<br />
चल पडा हूँ<br />
जिन्दगी की उस दौर में<br />
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे<br />
------------------------------------------<br />
<strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अमीरी का यहां बसेरा बसाया-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=211</link>
<pubDate>Sun, 03 Aug 2008 12:15:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=211</guid>
<description><![CDATA[एक धनी परिवार के लोगों ने अपने  मुखिया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक धनी परिवार के लोगों ने अपने  मुखिया की स्मृति में कार्यक्रम आयोजन करना चाहते थे। आमंत्रण पर कविता छपवानेे के लिये उन्होंने एक हास्य कवि से संपर्क किया और उसे अपने मुखिया के जीवन का संक्षिप्त परिचय देते हुए एक कविता लिखने का आग्रह किया। बदले में कार्यक्रम के दौरानं उसको सम्मानित करने का लोभ भी दिया। वह कवि तैयार हो गया। उसने कविता लिखी और देने पहुंच गया। उस कविता मे कुछ इस तरह भी था।</p>
<p><strong>पहले उन्होंने गरीबों के पुराने<br />
घरों के येनकेन प्रकरेण हथियाया<br />
जो नहीं हट रहे थे उनको<br />
अपनी ताकत से हटवाया<br />
अपना निजी बुलडोजर  चलाया<br />
जमकर बरपाया कहर<br />
पर  लगन से किसी भी तरह<br />
अपनी कल्पानाओं का  नया शहर बसाया<br />
इतने महान थे वह कि<br />
एक गरीब जो अपने मकान से<br />
निकलने के बाद बीमारी में मर गया<br />
उसके नाम पर नये शहर का<br />
नामकरण करवाया<br />
शहर के लिये देखा था जो सपना<br />
उन्होंने पूरा कर दिखाया </strong><br />
उसकी कविता पढ़कर परिवार वाले हास्य कवि पर बहुत बिफरे और उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया। जब उसके प्रतिद्वंद्वी कवि को यह पता लगी तो उनके पास अपनी कविता बेचने को पहुंच गया। उसने जो कविता लिखी उसमे कुछ सामग्री इस तरह थी।</p>
<p><strong>शहर से गरीबी हटाने का<br />
उनका एक ख्वाब था<br />
जो उन्होंने पूरा कर बताया<br />
कैसे अपनी सोच को जमीन पर<br />
लायें यह  उन्होंने बताया<br />
कभी यहां फटेहाल और कंगाल लोगों की<br />
बस्ती हुआ करती थी<br />
चारों तरफ गंदगी और बीमारी<br />
बसेरा करती थी<br />
उस पर जो डाली उन्होंने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि<br />
सब साफ हो गयी<br />
उनके तेज का यह परिणाम था कि<br />
गरीबी की रेखा यहां आफ हो गयी<br />
आज खड़े हैं यहां महल और कारखाने<br />
पेड़ पौधो के थे यहां कभी जमाने<br />
आज पत्थरों और ईंट के बुत खड़े हैं<br />
उनके विकास की धारा का परिणाम है<br />
अब यहां आदमी नहीं मिलता<br />
लोग देते हैं घर के नौकरों के लिये विज्ञापन<br />
देखो अब यहां कितना काम है<br />
उन्होंने इस तरह गरीबी को भगाकर<br />
अमीरी का यहां बसेरा बसाया</strong><br />
उसकी कविता से उस धनी परिवार के सदस्य प्रसन्न हो गये और उसे स्मृति कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ  कवि का सम्मान दिया।<br />
...........................</p>
<p><strong><br />
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<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वफा मुफ्त में नहीं मिलती-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</link>
<pubDate>Fri, 01 Aug 2008 16:05:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=208</guid>
<description><![CDATA[वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती
अगर दाम दे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वफा  अब मुफ्त में नहीं मिलती<br />
अगर दाम देने की ताकत हो पास तो<br />
बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती<br />
ओ बाजार में खड़े इंसान<br />
अपने मन में कोई खुशफहमी में आकर<br />
किसी से बिना मतलब वफा की<br />
उम्मीद कभी न करना<br />
वफा के सौदागर तरक्की में लगे हैं<br />
उन्हें भी यह कभी मुफ्त में नहीं मिलती<br />
कौड़ी के भाव भले ही खरीद लें वह<br />
पर आम इंसान को सोने के भाव मिलती<br />
.....................................................................</strong></p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</link>
<pubDate>Thu, 31 Jul 2008 17:07:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=206</guid>
<description><![CDATA[एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक श्रोता ने कवि से कहा<br />
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो<br />
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा  दो’<br />
कवि ने उदास होते हुए कहा<br />
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं<br />
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी<br />
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर<br />
नींद नहीं आयेगी<br />
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी<br />
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो<br />
अब पहले की तरह कांव-कांव कर<br />
कहां नजर आते<br />
दिख जायें तो इंसानों की<br />
बुरी नजर का शिकार हो जाते<br />
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें<br />
 तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’<br />
......................................................................</p>
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 16:31:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=204</guid>
<description><![CDATA[वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो  गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’<br />
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों के बीच खाने का सामान बांट रहा था और उसे लेकर वही भिखारी भी खा रहा था।<br />
लेखक ने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-‘खाना तो मिला नहीं। अब चाय पीकर ही काम चलाऊंगा।<br />
वह हाथ फैलाये उसके सामने खड़ा था। लेखक ने उससे कहा-‘मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा, पर इससे पहले तुम्हं साक्षात्कार देना होगा। आओ मेरे साथ!<br />
थोड़ी दूर जाकर उस लेखक ने उससे पूछा-‘तुम्हारे घर में क्या तुम अकेले हो।’<br />
भिखारी-‘‘नही! मुझे दो लड़के हैं और दो लडकियां हैं। सबका ब्याह हो गया है।’<br />
लेखक-‘फिर तुम भीख क्यों मांगते हो? क्या तुम्हारे लड़के कमाते नहीं हैं।<br />
भिखारी-‘बहुत अच्छा कमाते हैं, पर आजकल बाप को कौन पूछता है? मेरे को सूखी रोटी देते हैं और मैं चिकनी चुपड़ी और माल खाने वाला आदमी हूं।’<br />
लेखक-‘इस उमर में वैसे भी कम चिकनाई खाना चाहिए। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। डाक्टर लोग यही कहते हैं।<br />
भिखारी-‘वह तो सेठों के लिये कहते हैं भिखारियों के लिये नहीं।<br />
लेखक-‘मंदिर में अंदर जाते हो।<br />
भिखारी-‘मंदिर के अंदर हमें आने भी नहीं देते और न हम जाते। हम तो बाहर भक्तों के दर्शन ही कर लेते हैं। भगवान ने कहा भी है कि मेरे से बड़े तो मेरे भक्त हैं।<br />
लेखक-‘रहते कहां हो?<br />
भिखारी-‘एक दयालू सज्जन ने हम भिखारियों के लिये एक मकान किराये पर ले रखा है। उसमें वही किराया भरता है।’<br />
लेखक-‘तुम्हारे लड़के तुम्हें नहीं रखते।’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a> पर मूल रूप से प्रकाशित है। इसके प्रकाशन के लिये अन्य कहीं अनुमति प्रदान नहीं की गयी है।<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>भिखारी-‘वह तो मिन्नतें करते हैं पर वहां कौन उनकी चिकचिक सुनेगा।  मैं तो बचपन से ही आजाद रहने वाला आदमी हूं।  वह क्या खिलायेंगे मुझे? मैंने खाने के मामले में बाप की परवाह नहीं की। वह भी सूखी खिलाता था पर बाहर मुझे भीख मांगने पर जो खाने का मिलता था वह बहुत अच्छा होता था।’<br />
लेखक-‘बचपन से भीख मांग रहे हो। बच्चों की शादी भी भीख मांगते हुए करवाई।<br />
भिखारी-‘नहीं! पहले तो मेरा बाप ही मेरे परिवार को पालता रहा। फिर बच्चे थोड़े बड़े हो गये तो नौकरी कर वही काम चलाते रहे। मैं अपनी बीबी के लिये ही कुछ सामान घर ले जाता हूं। वह बच्चों के पास ही रहती है। आजकल की औलादें ऐसी हैं उसकी बिल्कुल इज्जत नहीं करतीं। मैं सहन नहीं कर सकता।’<br />
लेखक-तुम्हें भीख मांगते हुए शर्म नहीं आती।’<br />
भिखारी ने कहा-‘जिसने की शर्म उसकी फूटे कर्म।’<br />
लेखक उसको  घूर कर देख रहा था! अचानक उसने पीछे से आवाज आई-‘बाबूजी, इससे क्या बहस कर रहे हो। भीख मांगना एक आदत है जिसे लग जाये तो फिर नहीं छूटती। कोई मजबूरी में भीख नहीं मांगता। जुबान का चस्का ही भिखारी बना देता है।’<br />
लेखक ने देखा कि थोड़ी दूर ही एक बुढि़या भिखारिन पुरानी चादर बिछाये बैठी थी। उसके पास एक लाठी रखी थी और सामने एक कटोरी । उसके पास रखी पन्नी में कुछ खाने का सामान रखा हुआ था जो शायद दानी भक्त दे गये थे और वह अभी खा नहीं रही थी।<br />
लेखक ने उस भिखारी को दस रुपये दिये और फिर जाने लगा तो वह भिखारिन बोली-‘बाबूजी! कुछ हमको भी दे जाओ। भगवान के नाम पर हमें भी कुछ दे जाओ।’<br />
लेखक ने पांच रुपये उसके हाथ में दे दिये और अपने होठों में बुदबुदाने लगा-‘भीख मांगना मजबूरी नहीं आदत होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख्यालों का बंधन-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 17:21:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=202</guid>
<description><![CDATA[ख्यालों के बंधन में फंसकर
उनके इशारों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ख्यालों के बंधन में फंसकर<br />
उनके इशारों पर नाचते रहे<br />
जिंदगी मेंं इसलिये हर कदम पर हारते रहे<br />
जो आजाद होकर सोचा<br />
तो सामने हमारे  यह बात आई<br />
क्यों हमने उनको अपना सबकुछ माना<br />
जब हमेशा की उन्होंने बेवफाई<br />
दिल की गुलामी से<br />
अच्छा है आजाद ख्याल से जीना<br />
हम क्यों अपना जिस्म<br />
इतने समये से अपने हाथों ही मारते रहे<br />
............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इसलिये अमन के फरिश्ते वहां नहीं बसते-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=201</link>
<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 11:53:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=201</guid>
<description><![CDATA[बादशाह और अमीर दौलत खर्च कर
पत्थरों के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बादशाह और अमीर दौलत खर्च कर<br />
पत्थरों के बनवाते महल और घर<br />
तिनके तिनके जोड़कर अपनी झौंपड़ी<br />
बनाता है गरीब बसाता है शहर<br />
बसा कर होता है दर-ब-दर </p>
<p>रहकर महलों और और बड़े मकानों में<br />
नहीं चैन से रह पाते बड़े लोग<br />
लग जाते हैं उनको राजरोग<br />
अपने पसीने से नहाया<br />
अपनी ही कमाई का खाया<br />
गरीब जीवन गुजारता चैन से<br />
नहीं सह पाते ऊंचे लोग यह सब तो<br />
कभी शहर की रौनक के नाम पर<br />
कभी तरक्की के पाने की दाम पर<br />
उजाड़ देते हैं उनके आशियाने<br />
तिनके-तिनके घर हो जाता दाने-दाने<br />
बेहयाई होती है हमेशा बेकदर </p>
<p>इस दुनियां में मच गया है चारों और<br />
तरक्की करो का शोर<br />
हमदर्दी के नाम पर आंसू बहाने वाले<br />
सब तरफ मिल जाते हैं<br />
टीवी और फिल्मों में बिकता दर्द<br />
खरीदने वाले मिल जाते हैं<br />
जमीन पर उतर कर कौन किसका<br />
दर्द समझता है<br />
अमीर तो सब खरीद लेता है<br />
सिवाय अपने चैन के<br />
पर गरीब का दर्द सभी को नाटक लगता है<br />
बुलंद इमारते टिकी हैं कई लोगों की आहों पर<br />
इसलिये अमन के फरिश्ते वहां नहीं बसते हैं<br />
जमीन पर गरीब के घर में रहते वह<br />
उनके उजड़ने पर वह भी हटते हैं<br />
आसमान में अमन और प्यार ढूंढने वालों<br />
वहां से कुछ टपकने वाला नहीं है<br />
तक तक तरसते रहोगे<br />
जब तक नहीं करोगे<br />
जमीन पर बसने वाले मेहनतकशों की कदर<br />
तक दुनियां ही रहेगी दर-ब-दर<br />
....................................<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्वयं पढ़ा कुछ नहीं, दूसरों को लिखना सिखाते हैं-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=200</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 16:09:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=200</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और एक
किताब हाथ में थमाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज और एक<br />
किताब हाथ में थमाते हुए बोला<br />
‘दीपक बापू, लो पकड़ लो यह किताब<br />
‘लिखने के नुस्खें सीखें’<br />
एक दोस्त के घर से उठायी<br />
इसे देखकर तुम्हारी याद आयी<br />
हमारा तो न पढ़ने से वास्ता<br />
न लिखने का जाने रास्ता<br />
तुम ही अंतर्जाल पर लिखते<br />
थक गये लगते हो<br />
फ्लाप की जमात में बैठे<br />
हिट होने की जगह तकते हो<br />
तुम पर तरस आया<br />
इसलिये ले आया<br />
इसे पढ़कर कुछ सीख लो<br />
शायद लेखक की सलाह काम कर जाये<br />
तुम्हारा नाम भी चमक जाये<br />
यही इच्छा हमारी अभी पूरी नहीं हो पायी’</p>
<p>आपनी टोपी उतारकर गंजी खोपड़ी पर<br />
हाथ फेरते हुए<br />
कुछ देर किताब देखी<br />
फिर उठाकर जोर से फैंकी और<br />
कहैं  महाकवि दीपक बापू<br />
‘कमबख्त तुम हमारी अक्ल भी हर लेते हो<br />
कभी कभी करारा झटका  देते हो<br />
हमने थोड़ी पढ़ी तो<br />
लेखक का नाम पढ़ने का विचार आया<br />
यह कभी हमारे सुनने में नहीं आया<br />
यहां जो कुछ नहीं सीखता वही<br />
दूसरों को सिखाने में जुट जाता है<br />
जो पड़े उनके चक्कर में<br />
कुछ मिलना तो दूर<br />
गांठ से और लुट जाता है<br />
यह लिखता है ऐसा मत लिखो<br />
और ऐसे मत दिखो<br />
खुद ही अभी लिखना शुरू किया लगता है<br />
अगर इसका लिखा देखें तो<br />
अभी पढ़ना शुरू किया ऐसा भी लगता है<br />
यहां जमाने का उसूल है<br />
कुछ सीखे बिना ही<br />
दूसरों को सिखाना शुरू कर दो<br />
शिष्य हुए बिना गुरू का आवेदन कर दो<br />
लिखना हो जिंदगी में<br />
या दिखना हो<br />
हर विषय पर वही लोग<br />
बोलते हैं पहले<br />
जो कुछ सीखने से पहले ही दहले<br />
कोई उनकी अक्ल पर शक न करे<br />
प्रसिद्धि के शिखर पर पहला हक न करे<br />
तमाम गुर उठाकर बाजार में बेचने आ जाते हैं<br />
शक्ल के हों आकर्षक<br />
ख्याल से हों ढीठ<br />
चाल मस्त और मतवाली   हों<br />
अदायें दिल बहलाने वाली हों<br />
अपनी तरफ खींचते हैं पहले लोगों का ध्यान<br />
फिर शब्दों का बघारते हैं ज्ञान<br />
ऐसे लोग लिखना सिखाते हैं<br />
भीड़ में दिखने के बहाने जिनको आते हैं<br />
कई लोगों को पढ़ते हैं हम भी<br />
पर वह कुछ पढ़ते हैं भी  कि नहीं<br />
हमें यह बात समझ में नहीं आयी<br />
हिट और फ्लाप का खेल तो है निराला<br />
अपने गुरु के आदेश पर हमने कभी मोह नहीं पाला<br />
अब कोई दूसरा गुरु कुछ सिखा दे<br />
ऐसा नजर नहीं आता भ्<br />
उठा लो किताब यह हमें नहीं चाहिये<br />
जो सीखा है वह भी भूल जायेंगे भाई’<br />
.......................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 13:36:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=199</guid>
<description><![CDATA[बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे
हमेशा र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे<br />
हमेशा रहा जल का अकाल<br />
हम पानी की बूंद बूंद को तरसे<br />
बहुत सारी शायरी प्यास पर लिखी<br />
तो कई कवितायें गर्र्मी पर रच डाली<br />
पसीने में नहाते हुए मेघों पर<br />
अपने व्यंग्य शब्दों से हम  अधिक बरसे</p>
<p>इस बार राशन पानी लेकर आसमान में मेघ आये<br />
लगता है ढूंढ रहे थे हमको<br />
अपनी बरसात से नहलाने को<br />
घर लौटने से ऐसे बरस जाते हैं<br />
कि तालाब बनी सड़कों से<br />
घर पहुंचने का रास्ता निकालने के लिये<br />
 अब तो रोज तरसे</p>
<p>उस दिन साइकिल समेत<br />
मझधार में फंसे थे<br />
आगे कार तो पीछे टूसीटर अड़े थे<br />
आसमान से बरसते मेघों को देखकर<br />
हमें अपने पर ही रहम आया<br />
एक मेघ अपना कोटा पूरा कर<br />
हमारे सामने आया<br />
और बोला<br />
‘और गर्मी पर कविता लिख<br />
हमारी मजाक उड़ाता दिख<br />
जब भी देख गर्मी में नहाते हुए ही<br />
अपनी कविता लिखता है<br />
सारे जमाने को कार की बजाय<br />
साइकिल पर चलता दिखता है<br />
भला! इसमे हमारा क्या दोष<br />
जो हम पर दिखाता है रोष<br />
कार और पैट्रोल का खर्च बचाता है<br />
इसलिये साइकिल में तेरा तेल निकल जाता है<br />
पिछली बार गर्मी पर कविता लिखकर<br />
अपने ब्लाग पर हिट हुआ था<br />
हास्य कविता के रूप में फिट हुआ था<br />
अब हम पर  हास्य कविता लिख<br />
पर हमारे संदेश के साथ खड़ा दिख<br />
सुन हम क्यों नहीं बरसों से, जो अब  ऐसे बरसे<br />
सारे नाले और नालियां बंद कर<br />
हमारे जल का मार्ग अवरुद्ध कर दिया<br />
तुम इंसानों ने<br />
धरती पुत्र पेड़ पौद्यों का कत्ल किया<br />
तुम्हारे बीच बरसे शैतानों ने<br />
एक तरफ बरसी दौलत तो<br />
दूसरी और हरियाली को लोग तरसे<br />
अपने विनाश का खुद ही किया इंतजाम<br />
इसलिये कई बरसों  ऐसे नहीं बरसे</p>
<p>इस बार जमकर बरस कर बता दिया<br />
जमकर बरसते हुए   पग-पग पर<br />
सड़कों और पंगडंडियों को<br />
जलमग्न बना दिया<br />
प्रकृति से छेडछाड़ का नतीजा दिखा दिया<br />
अगर चाहते हो कि हर बरस बरसें तो<br />
हास्य कविता पर हम लिख<br />
प्रकृति को प्यार करने का<br />
इंसानों को संदेश देता दिख<br />
लोगों को बता दे कि<br />
अपने ही भूलों से जो किया विनाश इस धरती का<br />
इसलिये ही पहले पानी को<br />
अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे<br />
..................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खबरों की खबर देने वाले-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 16:08:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=198</guid>
<description><![CDATA[खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>खबरों की खबर वह रखते हैं<br />
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं<br />
दुनियां भर के दर्द को अपनी<br />
खबर बनाने वाले<br />
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं</p>
<p>आंखों पर चश्मा चढ़ाये<br />
कमीज की जेब पर पेन लटकाये<br />
कभी कभी हाथों में माइक थमाये<br />
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर<br />
स्वयं से होते बेखबर<br />
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे<br />
कभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसे<br />
दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं<br />
मुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैं</p>
<p>लाख चाहे कहो<br />
आदमी से जमाना होता है<br />
खबरची भी होता है आदमी<br />
जिसे पेट के लिये कमाना होता है<br />
दूसरों के दर्द की खबर देने के लिये<br />
खुद का पी जाना होता है<br />
भले ही वह एक क्यों न हो<br />
उसका पिया दर्द भी<br />
जमाने के लिए गरल होता<br />
खबरों से अपने महल सजाने वाले<br />
बादशाह चाहे<br />
अपनी खबरों से जमाने को<br />
जगाने की बात भले ही करते हों<br />
पर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैं</p>
<p>कभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरची<br />
खोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल<br />
पर फिर भी नहीं देते खबर<br />
अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं<br />
----------------------------<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मौसम अच्छा हो तो घर पर ही मन जाती है पिकनिक -व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</link>
<pubDate>Sat, 05 Jul 2008 15:16:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=196</guid>
<description><![CDATA[ अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया हूं पर कहीं से भी प्रसन्न मन के साथ नहीं लौटा। वजह यह कि बरसात का मौसम चाहे कितना भी सुहाना क्यों न हो अगर दोपहर में पानी नहीं बरस रहा तो विकट गर्मी और उमस अच्छे खासे आदमी  को बीमार बना देती है।<br />
वैसे अधिकतर पिकनिक के कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित होते हैं और उनको उस समय बनाया जाता है जब बरसात हो रही होती है। जिस दिन पिकनिक होती है पता लगा कि बरसात ने मूंह फेर लिया और सूर्य नारायण भी धरती के लालों को पिकनिक बनाते हुए  देखने के लिये विराट रूप में प्रकट हो जाते हैं। वह कितने भी स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखें पर उनका स्परूप दोपहर में विकट होता है। ऐसे में पसीने से तरबतर होते हुए जबरन खुश होने का प्रयास करना बहुत कठिन होता है।</p>
<p>आखिर मैं क्यों इन पिकनिकों पर क्या जाता हूं? होता यह है कि कई लोग तो ऐसे हैं जो वर्ष में एक बार इस बहाने मिल जाते हैं। दूसरा यह कि कई संगठनों और समूहों में मै। इस तरह  सदस्य हूं  कि हमारा पिकनिक का पैसा स्वतः ही जमा हो जाता है और भरना हो हमें होता ही है। सो चले जाते हैं<br />
अब उस दिन भाई लोग भी जबरन पिकनिक मनाते हैं। वहां साथी और मित्र  नहायेंगें, शराब पियेंगे और कभी कभार जुआ खेलेंगे। कहते यही हैं कि ‘ऐसे ही एंजोय(यही शब्द उपयोग वह करते हैं) किया जाता है।’<br />
नाश्ता और खाना होता है। नाश्ता दोपहर में तो भोजन शाम को होता है। हम तो बातचीत करते हैं पर लगता है कि ऐसी जगहों पर शराब और नहाने से परहेज होने के कारण हम अकेले पड़ जाते हैं और फिर वहां अपने जैसे ही लोगों के साथ बतियाते हैं। खाना खाकर शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग में लौट कर आये। आखिर अपने आपसे ही पूछते हैं कि‘ फिर हम पिकनिक मनाने गये ही क्यों थे?’</p>
<p>एक बार नहीं कई बार ऐसा हुआ हैं। इन्हीं दिनों में कई लोगों के जलाशयों में डूब जाने के समाचार आते हैं और कहीं कहीं तो चार-चार लोगों के समूह जलसमाधि ले लेते हैं और फिर उनके परिवारों का विलाप कष्टकारक होता ही। अभी तक मैं जिन पिकनिक में गया हूं वहां कहीं ऐसा हादसा नहीं हुआ पर अपने चार मित्रों की ऐसी ही हृदय विदारक घटना में जान जा चुकी है। उनको याद कर मन में खिन्नता का भाव आ जाता है। </p>
<p>यह मौसम  पिकनिक का मुझे कतई नहीं लगता पर लोग बरसात होते ही जलाशयों की तरफ देखना शूरू कर देते हैं। अक्सर सोचता हूं कि यह पिकनिक की परंपरा शूरू हुई कैसे? अगर हम अपने पुराने विद्वानों की बात माने तो उन्होंने इस मौसम में अपने मूल स्थान से की अन्यत्र जाना निषिद्ध माना है। इस नियम का पालन सामान्य आदमी ही नहीं बल्कि राजा, महाराजा और साधू संत तक करते थे। व्यापारी दूर देश में व्यापार, राजा किसी दूसरे देश पर आक्रमण और साधु संत कहीं धर्मप्रचार के लिये नहीं जाते थे। कहते हैं कि उस समय सड़कें नहीं थी इसलिये ऐसा किया जाता था पर मुझे लगता है कि यह अकेला कारण नहीं था जिसकी वजह से पारगमन को निषिद्ध किया गया। </p>
<p>इस समय आदमी मनस्थिति भी बहुत खराब होती है और सड़क कितनी भी साफ सुथरी हो उमस के माहौल में एक अजीबोगरीब बैचेनी शरीर में रहती है। बहुत पहले एक बार एक पिकनिक में मुझे एक दोस्त ने एक पैग शराब पीने को प्रेरित किया तो मैंने सोचा चलो लेते हैं।  उस दिन  मैंे नहाने की जलाशय में उतरा। मुझे तो बिल्कुल मजा नहीं आया। जब बाहर निकला तो तुरंत पसीना निकलने लगा। घर लौटते हुए ऐसा लग रहा था कि बीमार हो गया हूं।<br />
जलाशयों में उतरने पर एक तो ऊपर की गर्मी और फिर पानी के थपेड़े किसी भी स्वस्थ आदमी को विचलित कर सकते हैं यह मेरा अनुभव है पर लोगों में अति आत्मविश्वास होता है और फिर कुछ लोगों को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है।<br />
आजकल बरसात जमकर हो रही है तो शायद कई लोगों को ऐसा नहीं लगता होगा पर अगर ठंडी हवाओं का आनंद तो कहीं भी लिया जा सकता है। उस दिन सुबह मैं योग साधना कर रहा  था तो कड़े आसनो के बाद भी मुझे पसीना नहीं आया तब मुझे आभास हुआ कि  मौसम अच्छा है। प्राणायम करते हुए नाक के द्वारा अंदर जाती शीतल हवा ऐसा सुखद आभास देती थी कि उसके भाव को व्यक्त करने के  लिये मेरे पास शब्द ही नहीं है। वैसे भी योगसाधना के समय मौसम के अच्छे बुरे होने की तरफ मेरा ध्यान कम ही जाता है।</p>
<p>वहां से निवृत होकर मैं नहाया और फिर अपने नियमित अध्यात्मिक कार्यक्रम के बाद मैंने चाय पी। उस समय घर में बिजली नहीं थी। इसलिये मैं बाहर निकला। बाहर आते ही मैंने देखा कि  आसमान में बादल थे और शीतल हवा बह रही थी। उस सुखद अनुभूति से मेरा मन खिल उठाा और  शरीर में एक प्रसन्नता के भाव का संचार हुआ। तब मैं सोच रहा था कि ‘क्या पिकनिक के लिये इससे कोई बढि़या जगह हो सकती है।’<br />
मैने साइकिल उठाई और अपने घर से थोड़ी देर एक मंदिर में पहुंच कर ध्यान लगाने लगा। मंदिर के आसपास पेड़ और पौघों की हरियाली और शीतल पवन का जो अहसास हुआ तो मुझे नहीं लगा कि कभी किसी पिकनिक में ऐसा हुआ होगा।  उसी दिन एक मित्र का फोन आया कि‘पिकनिक चलोगे?’<br />
उसने पांच दिन आगे की तारीख बताई तो मैंने उससे कहा-‘अगर मौसम अच्छा रहा तो मेरे आसपास अनेक पिकनिक मनाने वाली जगह हंै वहीं जाकर मना लूंगा और अगर उस दिन खराब रहा तो कहीं भी सुखद अहसास नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।’</p>
<p>हमारे अनेक कवियों ने वर्षा पर श्रृंगाार रस से भरपूर रचनाएं कीं पर किसी ने पिकनिक का बखान नहीं किया। सच भी है कि अगर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। ऐसी पिकनिक मनाने से क्या फायदा जो बाद में मानसिक संताप में बदलती हो। घर आकर यह सोचते हों कि‘आज का समय व्यर्थ ही गंवाया’। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 14:15:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=195</guid>
<description><![CDATA[
समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
समाज के शिखर पर बैठे लोग<br />
हांकते हैं ऐसे आदमी को<br />
जैसे भेड़-बकरी हों<br />
जो न बोले<br />
न कहे<br />
न देखे<br />
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी<br />
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान<br />
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान<br />
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली<br />
फिर भी समाज की गलियों में<br />
गोल-गोल घूमता है<br />
चाहे वह कितनी भी संकरी हों<br />
........................................................</p>
<p>अब तो मुद्दे जमीन पर नहीं बनते<br />
हवा में लहराये जाते<br />
राई से विषय पहाड़ बताये जाते<br />
मसले अंदर कमरे में कुछ और होते<br />
बाहर कुछ और बताये जाते<br />
चर्चा होती रहे पब्लिक में<br />
पर समझ में न आये किसी के<br />
ऐसे ही विषय उड़ाये जाते </p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘कई बार विषयों का पहाड़ खोदा<br />
कविता जैसी निकली चुहिया<br />
भाई लोग उस पर हंसी उड़ाये जाते<br />
बहुत ढूंढा पढ़ने को मिला नहीं<br />
होती कहीं कोई व्यापार की डील<br />
करता कोई तो कोई और लगाता सील<br />
कुछ को होता  गुड फील<br />
तो किसी को  लगती  पांव में कील है<br />
कोई समझा देता तो<br />
न लिखने का होता गिला नहीं<br />
कोई खोजी पत्रकार नहीं<br />
जैसा मिला वैसा ही चाप (छाप) दें<br />
हम तो खोदी ब्लागर ठहरे<br />
विषयों का पहाड़ खोदते पाताल तक पहुंच जाते<br />
कोई जोरदार पाठ बनाये जाते<br />
पर पहले कुछ  बताता<br />
या फिर हमारे समझ में आता<br />
तो कुछ लिख पाते<br />
इसलिये केवल हास्य कविता ही लिखते जाते<br />
क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से<br />
जब केवल निकले चुहिया<br />
उसे भी हम पकड़ नहीं पाते<br />
....................................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चिंतन शिविर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 16:42:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=193</guid>
<description><![CDATA[
अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>अपने संगठन का चिंतन शिविर<br />
उन्होंने किसी मैदान की बजाय<br />
अब एक होटल में लगाया<br />
जहां सभी ने मिलकर<br />
अपना समय अपने संगठन के लिये<br />
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया<br />
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का<br />
एक आदर्श बयान आया<br />
तब एक सदस्य ने कहा<br />
-‘कितना आराम है यहां<br />
खुले में बैठकर<br />
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी<br />
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी<br />
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ<br />
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’<br />
.................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 15:39:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=192</guid>
<description><![CDATA[हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर इंसान के दिल की पसंद अमन है<br />
पर दुनियां के सौदागरों के लिये<br />
इंसान भी एक शय होता<br />
जिसके जज्बातों पर कब्जा<br />
होने पर ही सौदा कोई तय होता<br />
बिकता है इंसान तभी बाजार में<br />
जब उसके ख्याल दफन होते<br />
अपने ही दिमाग की मजार में<br />
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता<br />
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता<br />
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा<br />
जब उसके दिल में कभी भय होता<br />
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता </p>
<p>चाहते हैं अपने लिये सभी अमन<br />
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं<br />
इसलिये ही सौदागर रोज<br />
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल<br />
बेचने बाजार आते हैं<br />
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ<br />
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ<br />
सब जगह खुशहाली होती<br />
तो सौदागरों की बदहाली होती<br />
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में<br />
हमेशा खौफ का समय होता </p>
<p>बंद कर दो जंग पर बहलना<br />
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना<br />
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ<br />
वह भी बाकी चीजों की तरह<br />
पुराने हो जायेंगे<br />
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर<br />
रोज चले आयेंगे<br />
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते<br />
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश<br />
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी<br />
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता<br />
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये<br />
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये<br />
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता<br />
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