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	<title>hindi-education &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-education/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-education"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 10:28:29 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपरोपकार करने वाले को बीच में मत छोड़ो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 02:59:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच<br />
मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की मित्रता को बीच में ही नहीं छोड़ देना चाहिए। राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस काटकर कबूतर के वजन के बराबर करने के लिए दान दिया  था और ऋषि दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अपनी हड्डियां दान में दे दी थीं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-</strong>इस दुनियां में परोपकार करने वाले मित्र वैसे ही बहुत कम मिलते हैं ऐसे में अगर कोई हमारा ऐसा संगी साथ है जो एक बार हमारा काम कर देता है तो फिर हमें उससे मूंह नहीं फेरना चाहिए क्योंकि फिर कभी कोई परेशानी आई तो उसके सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।<br />
वैसे आजकल लोगों की परेशानियों का कारण यह भी है कि उन्हेंं अच्छे-बुरे व्यक्ति की पहचान नहीं रही। अगर किसी में कोई काम फंस जाता है तो उससे वह करवाकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो पर बाद में जब विपत्ति आती है तो स्वयं ही दोबारा अपना काम कहने में उन्हें शर्म आती है। आजकल लोग अपने मित्रों के साथ भी ‘उपयोग करो और फैंक दो’ (यूज एंड थ्रो) की नीति पर चलते हैं पर याद रखने लायक बात यह  है कि पग-पग पर परोपकारी लोग नहीं मिलते पर विपत्तियों का दौर शुरू होता है तो पग-पग पर आतीं हैं। इसलिये संयोग से कोई परोपकारी साथी मिल जाये तो फिर उसे नहंी छोड़ना चाहिए। हालांकि ‘उपयोग करो और फैंक दो’ की नीति कहने सुनने में हमारी बुद्धिमानी का परिचायक लगती है पर पश्चिम से आयातित यह नीति अपने देश के लिए अनुपयुक्त है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःईमानदारी से धन कमाना ही है सबसे बड़ी पवित्रता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 03:35:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्<br />
योऽथेंशुचिहिं स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः</strong></p>
<p>जीवन में पवित्रता जरूरी है पर इनमें ईमानदारी से धन कमाने की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह सदा ही पवित्र समझा जाना चाहिए। अगर धनोपर्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी पानी आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय टिप्पणी-</strong> अब धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि क्यों लोग मनुस्मृति की कुछ जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनकी आलोचना करते हैं और उसमें वर्णित अन्य ज्ञानपूर्ण वचनों का अनदेखा करते हैं। समाज में बेईमान, चालाकी और धोखे से धन कमाने वालों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और सारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में चले गये हैं। उन्हें मनुस्मृति के संदेश कटु लगते होंगे और इसलिये ही वह नहीं चाहते कि मनुस्मृति की चर्चा एक धार्मिक पुस्तक के रूप में हो।<br />
मनु महाराज के अनुसार तो अनुचित रूप से धन कमाने वाला कभी पवित्र नहीं हो सकता और उसे देखते हुए तो केवल मजदूर, गरीब और मध्यम वर्ग के कुछ  लोग ही पवित्र रह जाते हैं। अगर उचित  तरीके से धन कमाने की बात करें तो हमें निचले वर्ग के लोगों  के अलावा अन्य कहीं मिल ही नहीं सकते। ऐसे लोग मनुस्मृति नहीं पढ़ते वरना वह तो अपनी पवित्रता का दावा करते तब तो धनाढ्य लोगों के लिए मुश्किल हो जाती। इस समय जो चमक सब तरफ दिख रही है वह क्या उचित प्रकार से धन कमाने की वजह से है? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। इतना ही नहीं हमारे कर्मकांडों में पवित्रता के अनेक रूप गढ़े गये हैं और वह काल्पनिक ही लगते हैं। मनु महाराज की पवित्रता की  सबसे बड़ी शर्त ईमानदारी से धन कमाने की है और कितने लोग इस समाज के इस कसौटी पर खरे उतरेंगे यह विचार का विषय है। तमाम तरह के लोग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोई शांति के लिये यज्ञ करा रहा है कोई वर्षा के लिये यज्ञ करा रहा है तो कोई  खेलों में देश की टीमों को जितवाने के लिये टोटका करा रहा है पर प्रश्न एक ही क्या उनमें ईमानदारी से कमाया धन लग रहा है?</p>
<p>यह आश्चर्य का विषय है कि मनुस्मृति के बारे में  लोगों में शायद भ्रांत धारण इसीलिये भरी गयी है ताकि वह कहीं अधिक ज्ञानी न हो जायें और उनकी बुद्धि को भ्रमित कर उनका दोहन कठिन न हो जाय। अगर मनु महाराज के इस श्लोक पर विचार किया जाये तो यह समझ में आ सकता है कि ईमानदार होना ही सबसे अधिक पवित्र होना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मुतिःस्त्रियों का सम्मान न हो तो शुभकर्मों का फल भी नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=130</link>
<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 03:41:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;"> पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा<br />
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">विवाह के समय अपने कल्याण पिता, भाई, पति और देवर कन्या को वस्त्र और आभूषण से संसज्जित कर सकते हैं। कन्य इस तरह सुसज्जित करना पूजा करना कहलाता है।</span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः<br />
यत्रेतास्तु न पूज्यन्त सर्वास्तात्राफलसः क्रियाः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवता भ्रमण करते है और जहां उनका इसके विपरीत होता   वहां शुभ प्रकार के कर्मों का भी कोई फल नहीं होता</span></p>
<p><span style="color:#003300;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वर्तमान समाज में दहेज एक विकट समस्या है और देखा जाये तो मनु जी के अनुसार उसका एक तरह से विरोध ही किया गया है। उनका कहना है कि विवाह के समय कन्या को पति और भाई के साथ पति और देवर भी वस्त्र और आभूषण दे सकते हैं। एक श्लोक में उन्होंने कन्या के पिता द्वारा अपनी कन्या के लिये वर पक्ष से धन लेना वर्जित बताया  है पर यह कहीं नहीं कहा कि कन्या को वह दहेज दें। हालांकि आजकल ससुराल वाले कन्या के लिये गहने और वस्त्र तो करते हैं पर पहले उसके लिये कन्या पक्ष वालों से भारी राशि वसूल करते हैं। यह अनुचित और मनु द्वारा स्थापित पंरपराओं के विपरीत है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जातिवाद को आधार मानकर मनु स्मृति को समाज से विस्मृत करने का प्रयास इसीलिये  किया गया है ताकि कर्मकांडों को समाज पर लादकर उसे बैल की तरह उसे ढोते रहने को बाध्य किया जाये। मनु जी का कहना है कि स्त्रियों का जहां सम्मान नहीं होता वहां शुभकर्मों का भी फल नहीं मिलता। जबकि अनेक धर्मकर्म करने वाले अपनी स्त्रियों को दासी की तरह समझते हैं। एक बात तय है कि मनु स्त्री और पुरुष का जीवन के एक सिक्के की तरह मानते हैं इसलिये वह स्त्री के सम्मान की बात करते हैं। मनु के समय में भी मनुष्य समाज पुरुष प्रधान समाज था और आज भी है और भले ही स्त्रियां आजकल नौकरी और व्यापार में काम कर रहीं है पर वह भी अपने पति और बच्चों को उतना ही प्यार करतीं हैं जितना मनु के समय में करतीं रहीं होंगी। इस प्यार के कारण वह पति का सहयोग नहीं  मिलने पर भी परिवार के कार्यों का समूचा बोझ अपने सिर पर ले लेतीं हैं। इसके बावजूद कई परिवारों में उनको सम्मान नहीं मिलता। जहां स्त्रियां कामकाजी नहीं है तो वहां तो उन्हें और भी परेशान होना पड़ता है। स्त्रियां बहुत सहनशील होतीं हैं और अपने घर की इज्जत को ढंकने के लिये बाहर अपनी घर-परिवार की व्यथाएं नहीं कहतीं पर मनु महाराज के अनुसार पुरुषों को यह समझना चाहिए कि उनके मन से उठी आह उनके शुभकर्मों-यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार से मिलने वाले लाभों से वंचित कर सकतीं है।</span></p>
<p> </p>
<p><span style="color:#003300;"><br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःसदाचारी को अतिथि सत्कार में भेदभाव नहीं करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=128</link>
<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 07:15:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना<br />
संविभागश्च भूतेभ्यःकर्तव्योऽनुपरोधतः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">सदाचार गृहस्थ को अपनी सामथ्र्यानुसार ब्रह्मचारी और सन्यासी को भिक्षा देनी चाहिए तथा बिना किसी भेदभाव से अतिथि बनकर आये सभी जीवों को उनके भाग का भोजन और पानी देना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्<br />
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्</strong><br />
जो व्यक्ति पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला दूसरो को मूर्ख बनाकर पैसे एंठने वाला वेदों में श्रद्धा रहित पर ऊपर से सहृदय दिखने वाला है उसको गृहस्थ कभी भी अपना अतिथि नहीं बनाये। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong> हमारे अध्यात्मिक दर्शन में दान और अतिथि सत्कार की बड़ी महिमा है पर उसके लिये मनु ने कई बंधन रखे हैं। अक्सर लोग मनु स्मृति पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते है पर वास्तविकता यह है कि तत्कालीन समय में बने हुए समाजों के दृष्टिगत ही उनका उल्लेख उन्होंने किया है और अगर थोड़ा गौर से देखें तो स्पष्टतः भेदभाव को अधिक प्रधानता नहीं दी बल्कि चरित्र को दी है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वह स्पष्टतः कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को दें और आपके घर जो अतिथि आता है उसका बिना किसी भेदभाव के स्वागत करें। जिन लोगों का आतिथ्य सत्कार वर्जित किया है उनमें किसी भी जाति का आदमी हो सकता है और जिनके सत्कार की बात कही है उसमें भी कोई बंधन नही लगाया।<br />
एक सहृदय सज्जन ने मेरे से पूछा था कि आपको नहीं लगता कि दान के कुपात्र के नाम पर लोग  समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि इसमें मनु का क्या दोष? </span></p>
<p><span style="color:#003366;">आजकल दान के नाम पर कथित संत अपना घर भर रहे है तो इसमें मनु के संदेश नहीं बल्कि लोगो का अज्ञान जिम्मदार है। मैं तो कहता हूं कि लोगों को अपने दान के लिये सुपात्र ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">अरे हमारे आसपास अनेक गरीब मजदूरों के बच्चे रहते हैं, चुपचाप जाकर उनको कपड़े, किताबें दे आओ। बीमार पड़ने पर उनका इलाज कराओ।<br />
हमारे घरों और व्यापारिक संस्थानों में अनेक युवक-युवतियां काम करते हैं। उनकी ऐसे ही पगार बढ़ा दो। उनको बोनस दे दो। यह क्यों उनसे कहते हो कि हम दान दे रहे हैं। यह तो अपने मन में रखना चाहिए। हमने अनेक विचाराधाराओं के नाम पर वाद और नारे लगाकर समाज को भ्रमित किया है जो वैसे ही अपने ज्ञान से दूर रहता आया है। हमारे मनीषी इस समाज की वास्तविकताओं से परिचित थे इसीलिये लोगों को दान करने के लिये उकसाते थे। यह कहना गलत है कि वह किसी जाति विशेष को दान करने के लिये कहते थे। ब्राह्मणों को कर्मकांड करने के बाद दान-दक्षिणा देने का प्रावधान किया गया है पर यह तो उनके लिए एक तरह से मेहनताना हुआ।<br />
स्पष्टतः दान का आशय यही है कि आपके आसपास जो उसके पाने के  पात्र है उसे ही दिया जाना चाहिए और आतिथ्य सत्कार में भी कोई भेद नहंी करना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 05:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</guid>
<description><![CDATA[यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये<br />
अधिकं वापि विद्येत  सः सोम पातुमर्हति</strong> </span></p>
<p><span style="color:#003300;">जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज<br />
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-</strong>हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है।  अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं।  आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया  संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</guid>
<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःविषयी लोग कभी सिद्ध नहीं होते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 06:01:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</guid>
<description><![CDATA[इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्यसंशयम्<br />
सन्न्यिम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति </span></strong></p>
<p><strong>इस विश्व में सभी प्रकार के जीव इंद्रियों के विषयों में बुरी  तरह फंस जाते हैं इसलिये उनमे एक नहीं अनेक दोष आ जाते हैं। जो व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं वही सिद्धि प्राप्त कर पाते है।</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्तवा घ्रात्वा च यो नरः<br />
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितन्द्रियः</span></strong></p>
<p><strong>जो  व्यक्ति अपने जीवन में अपनी निंदा-प्रशंसा, प्रिय-अप्रिय वचन सुनने, सुंदर और भद्दा दिखने, छूने में सख्त और कोमल, खाने में मीठे या कड़वे स्वाद,  अच्छी या बुरी गंध को सूंघने  तथा जो सुख और दुख से परे हो जाता है है वही सच्चा सिद्ध है।</strong></p>
<p><strong><span style="color:#993366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</span></strong>आजकल हमारे सामने कई सिद्ध लोग  आते हैं जो अपने पास अनेक प्रकार की चमत्कारी सिद्धि  होने का दावा करते है। उनके कई मानने वाले भी भ्रमवश उनका प्रचार करते है। सच तो यह है कि आजकल सच्चा सिद्ध मिलना  मुश्किल है। सच्चा सिद्ध तो वही है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। आजकल के सिद्ध तो काले पैसे को सफेद करने और अन्य चमत्कार करने में जुटे रहते हैं। सच्चे सिद्ध का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह किसी प्रपंच में नही फंसते। वह स्वयं किसी के पास जाते ह और न किसी को अपने यहंा आने के लिये प्रेरित करते हैं।</p>
<p>सिद्ध होने के लिये कोई सांसरिक कार्य छोड़ने की जरूरत नहीं होती। जिसे सब  त्याग कहते हैं वह वास्तव में भाव का त्याग है। हमारे पास अनेक वस्तुऐं हैं उनका उपयोग तो हमें करना चाहिए पर उसके प्रति स्वामित्व का बोध नहीं रखना चाहिए। हम कोई कार्य करते हैं तो उससे हमें जिस धन की प्राप्ति होती है उसे फल नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हम उस धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। वह धन लेना तो हमारे कर्तव्य का ही हिस्सा है न कि फल है। फल का आशय  है मन की शांति और अगर वह नहीं है तो इसका मतलब यह कि हम अपने मन के  प्रति कर्तव्यविमुख हो रहे हैं। उसको प्रसन्नता तभी मिलती है जब इद्रियों को वश में रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं। धन हो या अन्य भौतिक साधन  हमारे लिये फल नहीं हो सकते बल्कि वह हमारे कर्तव्य पूर्ति का हिस्सा होते हैं। जो यही विचार करते हैं उनको इस संसार के प्रति निष्काम भाव प्राप्त हो जाता है और वह जीवन का आनंद उठा पाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:अधर्म से प्राप्त धन छिपाने से अन्य दोष भी प्रकट होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=121</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 03:37:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है.<br />
२. अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरु हैं. दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपकर अधर्म और पाप कार्य करने वालों के शासक यमराज हैं.<br />
३.सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक युवावस्था  बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं.<br />
४.पहली  अवस्था  में वह काम करें जो वृद्धावस्था में सुखपूर्वक रह सकें और जीवन भर वह कार्य करें जिसको मरने पर भी लोग याद करें.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सुपात्र को दान देने वाला ही सच्चा वीर ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=117</link>
<pubDate>Mon, 24 Mar 2008 03:17:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.अर्थ कार्यों का मूल होता है 
राज्यश्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>१.अर्थ कार्यों का मूल होता है </strong><br />
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए<br />
<strong>२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती. </strong><br />
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.<br />
<strong>३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.<br />
</strong>अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 06:36:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही  नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की  धार  नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन  करता हूँ  वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है। </p>
<p>अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती  है कि  दीपावली पर सूर्य नारायण  दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि  होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम  कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों  का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग  बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं। </p>
<p>इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि  इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब  ऐसे में अपने घर के बाहर खडे  उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह  गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां  थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।</p>
<p>पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित  सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे  दूसरे सज्जन बोले-''हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।''<br />
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित  सज्जन ने उससे कहा--'तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि  भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच  है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।''<br />
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित  सज्जन से  विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना  चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल  रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परनिंदा न करने वाले ही लोकप्रिय होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=114</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 02:52:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप्त नहीं  होता। सामान्यत: सुख-दुख के प्राप्ति मनुष्य के हाथ में न होकर परमात्मा के हाथ में हैं।<br />
2.जिस तरह बछड़ा हजारों पहुसों के बीच में अपनी माता को ढूंढ कर उसके निकट पहुंच जाता है और उसका स्तनपान करने लगता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसका पीछा करता है और उसका फल उसे अवश्य मिलता है।<br />
3.जो वास्तविक तत्व ज्ञान   कर उपदेश करने वाले गुरु को सम्मान नहीं देता वह शिष्य पहले कुत्ते की योनि में जन्म लेने के चांडाल की योनि में उत्पान होता है।<br />
4.अगर आप समाज में लोगों की समक्ष अपनी लोकप्रियता पाना चाहते हैं तो दूसरों की निंदा करना बंद कर दो। परनिंदा करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है और इसकी वजह से वह दूसरे को छोटा साबित कर अपने को बड़ा साबित करना चाहता है। जो दूसरों के निंदा नहीं करते वह लोगों में लोकप्रिय होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सावधानी से काम लें तो मिट्टी का घड़ा भी होता है दीर्घायु ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=113</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 02:30:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखें   और भूतकाल की परवाह न करें तथा वर्तमान में जीने  का प्रयास करें. परमात्मा में विश्वास करें.<br />
२. मनुष्य के जीवन में सब दुखों के जड़ स्नेह है. जिस  मनुष्य से स्नेह होता है उसके दुख की चिंता हमेशा मन में बनी रहती है.<br />
३.हर मनुष्य के  मन में  ही सुख-दुख और अन्य विषय मूल रूप से मौजूद रहते हैं जिसने मन को वश में कर लिए वही सुखी है.<br />
४.मनुष्य  का शरीर मिटटी के कच्चे घडे के समान एक ही क्षण में टूटकर बिखर सकता है पर जिस तरह कच्चे  घडे का सावधानी से उपयोग करें तो वह लंबे समय तक चल सकता है वैसे ही अगर इंसान अपनी शरीर का अत्यंत  सावधानी का उपयोग करे तो लंबे समय तक स्वस्थ  रहते हुए जीवित रह सकता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अपनी बातें यथासंभव गुप्त रखना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=111</link>
<pubDate>Mon, 17 Mar 2008 03:38:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन की हानि, अपने मानसिक संताप, अपने घर-परिवार के सदस्यों के दोष तथा  किसी दुष्ट द्वारा अपने पर किये गए प्रहार और अपमान की भूलकर  भी  किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा न करे। इन सब बातों को यथासंभव गुप्त रखना चाहिए।</strong></p></blockquote>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या-लोग अक्सर अपनी बात अपने मन में नहीं रखते और दूसरों को अपनी बात बता देते हैं जो की बाद में उनके लियी हानिकारक होती है। हम नित-प्रतिदिन कई लोगों के संपर्क में रहते हैं और ऐसा लगता है कि वह हमारे लिए विश्वसनीय हैं यह हमारा भ्रम होता है। घर, कार्यालय, दूकान या किसी अन्य ऐसे स्थान पर जहाँ निय्मिति जाते हैं वहाँ हमसे रोज मिलने वाले लोग होते हैं और हमें यह भ्रम हो जाता है कि बस वह हमारे विश्वस्त हैं और हम उनके। इस चक्कर में हम उनको अपने परिवार, संताप और उपलब्धियों के बारे में बता देते हैं कि वह भला दूसरे को क्यों बताएगा? भावनात्मक प्रबाह में हम उनको ऐसी बाते भी बता देते हैं जो नहीं बताना चाहिऐ और वह जाकर सबको बता देता और हमें फिर संताप होता है।</p>
<p>इसलिए पाने घर-परिवार, संपदा और तकलीफों की जानकारी जहाँ तक हो सके गुप्त रखना चाहिए। जब तक आवश्यक न लगे किसी के सामने उसका बखान नहीं करना चाहिऐ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:इस अस्थिर संसार में धर्म ही अपना होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</link>
<pubDate>Sat, 15 Mar 2008 05:21:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की  गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। </p>
<p><strong>व्याख्या-</strong> बाल्यावस्था, युवावस्था  और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही  अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों से -घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो - की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी जा सकती। अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।<br />
<strong>*व्याख्या-</strong> अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:प्रेम में  चालाकी करने वाले सुखी]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=108</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 03:48:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=108</guid>
<description><![CDATA[१.  नीच  प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.  नीच  प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वचनों  द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
<p>2.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। </p>
<p>3.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।<br />
4. हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-जरूरत हो तो दिखावा भी करें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=101</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 04:41:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=101</guid>
<description><![CDATA[
सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह अपना फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<li>
<blockquote><p><strong><code>सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह अपना फन फैला देता है, जिससे अन्य जीव डरकर पीछे हट जाते हैं। अगर वह  ऐसा न करे तो कोई भी उसे मार डालेगा। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली  प्रदर्शित  करना भी जरूरी है।</code></strong></p></blockquote>
<p><strong>आज के संदर्भों में व्याख्या-</strong>चाणक्य के इस कथन का आशय यह है की हमें सांसरिक जीवन में कई बार दिखावे की आवश्यकता होती है क्योंकि यहाँ लोगों में देवत्व और राक्षसत्व दोनों का ही भाव  होता है। हमारे साथ अच्छे और बुरे लोगों का संपर्क होता है पर किसके दिल में क्या है यह पता नहीं लगता। ऐसे में थोडी चतुराई जरूरी है। हमें अपनी कमजोरी किसी को नहीं बताना चाहिए और और अनावश्यक रूप से अधिक विनम्रता का भाव दिखाने से लोग कमजोर समझने लगते हैं। कभी किसी से वाद-विवाद हो तो अपने क्रोध और विवेक शक्ति का पूरा उपयोग करना चाहिए और ऐसा प्रदर्शित करना चाहिए कि हम शक्तिशाली हैं। </p>
<p>धन दौलत तो किस्मत का खेल है पर अगर जरूरी न हो तो अपनी आर्थिक तंगी का जिक्र  सबके सामने नहीं करना चाहिऐ। कई बार तो ऐसे दिखाना चाहिए कि  हमारे पास भी पर्याप्त मात्रा में  धन है। समाज में धनवान का सम्मान होता है पर गरीब को समाज कुछ देता भी नहीं है। अगर पर्याप्त मात्रा में धन नहीं है तो परिवार और उसका मुखिया ही उसका सामना करता है। अगर अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन करेंगे तो अपना और अपने परिवार का सम्मान समाज में काम होगा। इसका अर्थ यह भी कदापि नहीं है कि इस दिखावे के  लिए हम अनाप-शनाप खर्च करें। अगर कोई दिखावे की वस्तु हम नहीं खरीद सकते तो हमें उसके प्रति लोगों के सामने नापसंदगी का भाव दिखाना चाहिऐ- भले ही यह उसी  तरह हो जैसे लोमडी अंगूर न मिलने पर कहती हैं कि खट्टे हैं। ऐसे दिखावे करना जरूरी हैं पर इसमें अनावश्यक प्रदर्शन से बचना चाहिए। </li>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी  मनस्थिति के अनुसार लिखता है आदमी-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=100</link>
<pubDate>Thu, 06 Mar 2008 16:08:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=100</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी बृहद भारत की एक मात्र भाषा है औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी बृहद भारत की एक मात्र भाषा है और उसको लिखने वाले चारों तरफ  फैले हुए हैं. ऐसे में अंतर्जाल पर जो लोग लिख रहे हैं उनमें सबके साथ भौतिक संपर्क रखना कठिन है और बिना उसके किसी पर भरोसा करना भी आसान नहीं है. हाँ, यहाँ लिखते-लिखते जो भावनात्मक संपर्क बन रहे हैं उनका बहुत महत्व है.<br />
हिन्दी ब्लोग जगत में जो ब्लोग लेखक  सक्रिय हैं वह शायद इस बात का अनुमान नहीं कर सकते कि मैं बचपन से ही शब्दों की दुनिया में आ गया. मैं किसी का लिखा पढ़ते हुए उसके व्यक्तित्व की कल्पना भी  करता जाता हूँ. आमतौर से मैं गुस्सा नहीं होता और जब होता हूँ तो फिर ठंडा जल्दी होता हूँ पर अपने गुस्से को सही दिशा देने के लिए. मुझे अपने साथ की गयी चालाकियों का प्रतिकार करने का भाव है पर अपने जैसे अल्हड़ लोगों के लिए सदभावना भी बहुत हैं और कोई ऐसा व्यक्ति मुझसे गुस्सा होता है तो उसे मनाने में कोई कोर कसर  नहीं उठा रखता. जो प्रसंग मुझे छूते  हैं उन पर लिखता हूँ क्योंकि वह मेरे लिए विचार और अनुसंधान का विषय होते हैं.  </p>
<p>आज सुबह एक कमेन्ट एक ब्लोग पर आयी. रहीम के दोहे पर कमेन्ट आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है पर उसमें  दूसरे ब्लोगर की शिकायत दर्ज  थी. छद्म नाम से लिखी गयी कमेन्ट में एक कवि ब्लोगर की शिकायत थी कि वह अपने पास मोडरेट करने का अधिकार रखे हुए हैं और उन्होने मेरी कमेन्ट को हटा दिया है. </p>
<p>           अब इन महानुभाव ने कमेन्ट में उनकी कविता पर फबती कसी थी कि मेरा भतीजा छोटा था तो उसे कविता लिखने का शौक चर्राया था और मैंने उनको पढा था और आपको उसके स्तर तक पहुँचने के लिए प्रयास करना होगा-ऐसा उन्होने अपनी कमेन्ट में लिखा था. </p>
<p>मैं सोच में पड़ गया. मैंने मोडरेट का अधिकार नहीं रखा था और वह कमेन्ट मेरे ब्लोग पर थी. उस समय मैं  विदुर नीति पढ़ रहा था  और मुझे थोडा गुस्सा यूं आया कि उनके कमेन्ट का मेरे लिखे से कोई संबंध नहीं था और फिर दूसरे ब्लोगर की आलोचना के लिए मेरे ब्लोग का इस्तेमाल और वह भी अकारण मुझे ठीक नहीं लगा. पर मुझे ब्लागस्पाट के ब्लोग से कमेन्ट को हटाना नहीं आता तो अब मेरे लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि उनसे असहमति वाली कमेन्ट रखूँ. मैंने उस कमेन्ट में लिखा कि आप छद्म नाम से अनावश्यक कमेन्ट लिखते हैं तो उनसे बचने के लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है क्योंकि हमें उनको हटाना नहीं आता और कविता की आलोचना तो मुझे भी बर्दाश्त नहीं क्योंकि आप वैसा लिख कर बता दो. </p>
<p>इसके बाद उस ब्लोग पर में मोडरेट करने का अधिकार अपने हाथ मी ले लिया ताकि ऐसे प्रसंगों से बचा जा सके. कुछ देर बाद वह महानुभाव फिर कमेन्ट लेकर आये और एक अन्य  ब्लोगर का ब्लोग रखकर उसे  पढ़ने की सलाह दे गए. मैं वहाँ गया  तो वहाँ भी मोडरेट विरोधी स्वर मुखर थे. मुझे हंसी आ गई और तय किया कि आज लगाते है फिर हास्य कविताओं का मेला. इस बार खुल कर लिखेंगे ताकि लोगों को इशारे से पता लग जाये कि किस तरह के लोगों पर लिख रहे हैं. थोडी देर बाद वह महाशय फिर आये और इस बार अवांछित टिप्पणियों को ''डस्टबीन'' (कूड़ेदान) का पता दे गए जो टिप्पणियों के ठीक नीचे ही होता है. साथ ही यह भी बता गए कि आप अपनी टिप्पणी दूसरे ब्लोग से भी हटा सकते हैं.<br />
यह उनके द्वारा ऐसी जानकारी दी गई जो धन्यवाद के योग्य थी. मैंने अपनी कमेन्ट में लिखी भी और अपने ब्लागस्पाट के सब ब्लोग से मोडरेट का अधिकार हटा लिया. मगर यह तो बात जो पढी और जो समझी वह भी कम नहीं है. वह भले आदमी होंगे इसमें संशय नहीं है और जिस कवि की कविता पर प्रतिकूल कमेन्ट लिखने गए थे उसके भी यह मित्र होंगे, इसलिए तो छद्म नाम से वहाँ लिखने गए.<br />
भारत में कई ब्लोगर अभी नये हैं और कई लोगों को यह पता नहीं कि मोडरेट और वर्ड वेरीफिकेशन क्या  होता है. छः महीने से अधिक समय  तक यह मेरे ब्लोग पर थे. लोग इनको हटाने के लिए  लिखते तो समझ में नहीं आता कि क्या लिख रहे हैं. ऐसे में एक-एक को समझाना जरूरी है और इसे मुद्दा बनाकर किसी को कमेन्ट न देने की प्रतिज्ञा करना मेरे हिसाब से गलत है. मुझे ब्लोग स्पॉट का ब्लोग बनाने के चौदह माह आज  बाद पता चला कि कोई अपने कमेन्ट हटा भी सकता है. हिन्दी के ब्लोगर अपने देश की वास्तविक स्थितियों को समझें तभी वह कहीं आगे बढ़ पायेंगे. </p>
<p>बहरहाल आज मैंने कोई इस विषय पर हास्य कविता नहीं लिखी क्योंकि वह उनकी तरफ जातीं लगतीं. वैसे इस विषय पर कविताओं का विषय सदाबहार है और कभी भी लिख सकते हैं.  कविता लिखना कोई आसन नहीं है तो उन्हें समझना भी आसान नहीं है. मुझे याद हैं कि शुरूआती दिनों में परमजीत बाली जी कि कविताओं पर लोग हँसते थे पर में उनके कथ्यों को पढता था और सोचता था कि अभी भी कई लोगों को  कविताओं को समझने की जरूरत है. प्रसंगवश आज रहीम जी के दोहे पर वह कमेन्ट आयी थी उसमें भी कविता का सूक्ष्म अर्थ समझने की प्रेरणा थी. बहरहाल आज की इस घटना ने मुझे हंसा दिया और जब मैं खुद हंस लिया तो व्यंग्य लिखने का इरादा खो बैठा. हालांकि मैं आज कोई रद्दी कविता लिखने का विचार भी कर रहा हूँ जिससे वह ब्लोगर फिर आये जो कुछ दिन पहले मेरी कविता पर बदतमीजी भरी कमेन्ट रख गया था और मैंने उसे हटा दिया था. मैं उसके ब्लोग पर गया था तो तो उसकी कुंठाएं भी समझ में  आयीं और मैं   गलती नहीं कर रहा तो उसने ऐसा दूसरी बार किया था. वह इधर-उधर किताबों से उठाकर लिखते हैं  और अपने विद्वान होने का भ्रम फैला रखा है. अगर उस दिन मैंने उनके कमेन्ट  प्रमाण के रूप में रखे  होते तो शायद मेरे लिए अवसर थे. एक संदेह मेरे को होता है कि उन्होने अपनी कमेन्ट देर रात को रखी  थी और शायद पिए होंगे. वैसे हो सकता है कि अनजाने में मेरी कुछ कवितायेँ उनको भी निशाने पर लेती हों. पर यह अंतर्जाल है कुछ पता नहीं चलता कौन क्या है?हालांकि में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह मन में नहीं रखता क्योंकि इससे आदमी खुद ही धोखा खाता है. फिर हर कोई अपनी मनस्थिति के अनुसार लिखता है और वह बदलती भी रहती है और इसलिए किसी के लिखे पर हमेशा एक राय रखना भी कठिन है.<br />
इस ब्लोग का पता<br />
http://rajdpk.wordpress.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:गोत्र की  वृद्धि पर हिरन भी उछलते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=99</link>
<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 03:32:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन ठहरी धूरि  की, रही पवन ते पुरि
गाँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रहिमन ठहरी धूरि  की, रही पवन ते पुरि<br />
गाँठ युक्ति की खुलि गयी, अंत धूरि को धूरि<br />
कविवर रहीम  कहते हैं की ठहरी हुई धूल जब हवा के सहारे  ऊपर उठती हैं तो कष्ट कारक होती है. उसी तरह अगर कोई हमारे रहस्य की गाँठ है वह खुल जाती हैं तो कीं जगह नीचा देखना पड़ता है. </p>
<p>रहिमन अपने गोट को, सबै चहत उत्साह<br />
मृग उछरत आकाश को, भूमि खनत कराह </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की सब लोग  अपने गोत्र की वृद्धि के इच्छुक होते हैं. हिरन आकाश तक उछलते हैं और सूअर पृथ्वी को खोदने लगते हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:धनियों में नहीं होती भोजन करने की शक्ति ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=98</link>
<pubDate>Tue, 26 Feb 2008 04:15:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.संसार में धनियों को प्राय: भोजन करने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.संसार में धनियों को प्राय: भोजन करने की शक्ति नहीं होती किन्तु दरिद्रों के पेट में लकडी भी पच जाती है.<br />
२.अधम पुरुषों को जीविका न होने का भय रहता है. मध्यम पुरुषों को मृत्यु का भय होता है  परन्तु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही बहुत भय लगता है.<br />
३.यों तो मदिरा के पीने का नशा भी होता है किन्तु धन-दौलत  और एश्वर्य का नशा  तो बहुत ही बुरा है.धन-दौलत और ऐश्वर्ष का नशा जिस व्यक्ति को होता है वह बहुत जल्दी भ्रष्ट हो जाता है.<br />
४.वश में  न होने के कारण विषय में रमने वाले इन्द्रियों से यह संसार उसी भांति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं.<br />
५.जो जीवों को वश में करने वाले सहज पांच इन्द्रियों से जीत लिया गया उसकी आपत्तियां शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भांति बढ़ती है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चाणक्य नीति:स्वार्थ के लिए दूसरी जगह जाने पर सम्मान काम होता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=97</link>
<pubDate>Mon, 25 Feb 2008 04:28:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ उपलब्ध नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ उपलब्ध नहीं होता, यदि ऐसा होता तो मनुष्य के लिए पृथ्वी ही स्वर्ग की तरह हो जाती. कई चीजें जीवन में भाग्य से मिलती हैं.<br />
२.चद्रमा अमृत का भंडार है. औषधियों में रस डालें वाला है, लक्ष्मे के साथ समुद्र से उत्पन्न होने के कारण लक्ष्मी का भाई है और अत्यंत शीतल, चमकीला, और शोभायुक्त है परन्तु सूर्य के निकट पहुँचते ही एकदम निस्तेज हो जाता. चंद्रमा की यह दशा इस बात का प्रमाण है कि दूसरे के घर जान से मनुष्य का बड़प्पन बना नहीं रहता खासतौर से जब अपने काम के लिए किसी के घर जाते हैं तो गृहस्वामी  के समक्ष छोटे हो जाते हैं.<br />
३.अपने स्थान पर रहते हुए भंवरा कमलिनी के पराग के रस को पीकर मस्त रहता पर कुछ समय पश्चात उस स्थान पर चला गया वहाँ करील के फूल पैदा होते थे जिनमें न रस था न गंध. बाध्य होकर उसे वहाँ संतोष करना पडा वहाँ उन्हीं का रस पीकर  उनको ही गौरव देने लगा-कुछ न मिलने से तो कुछ मिलना ही अच्छा है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:व्यक्ति के अवगुण नष्ट नहीं होते ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=95</link>
<pubDate>Thu, 21 Feb 2008 04:10:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन रीति सराहिए, जो घाट सुन सम होय
भा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन रीति सराहिए, जो घाट सुन सम होय<br />
भांति आप पै डारी के, सबै पियावै तोय</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि कलश के सदगुण के समान परोपकार की प्रशंसा करनी चाहिए घडा अपने पर पर्दा डालकर सबको मीठा जल पिलाता है. </p>
<p><strong>रहिमन लाख भली करो, अगुनी अगुन न जाय<br />
राग सुनत पथ पिअत हूँ, सांप सहज धरि खाय </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि असंख्य भलाई करे, परन्तु गुणहीन व्यक्ति का अवगुण नष्ट नहीं होता. जैसे--संगीत सुनते हुए और दूध पीते हुए भी सर्प सहज भाव से व्यक्ति को काट लेता  है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:वर्णमाला का शोधन कर भक्ति में लीन हो जाओ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=85</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 04:00:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पढि पढि तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढि पढि तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो चोर<br />
जिस पढ़ने साहिब मिले, सो पढ़ना कछु  और</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं पुस्तकें पढ़-पढ़कर तो पत्थर के समान जड़ अज्ञानी  होते गए और लिख-लिख कर भी चोर बनते गए। जिसे पढ़ने से स्वामी मिलता है वह तो कुछ और ही है।<br />
*यहाँ आशय यह है कि कोई किताबें पढ़कर अहंकारी हो जाता है कि हमें तो सब आता है और वह कुछ नया सीखना नहीं चाहता , या वह उसमें से उठाकर कुछ लिखने लगता पर अपना कोई दृष्टिकोण उसमें नहीं आता और न उस पढे हुए की राह पर चलता पर दूसरों को  उपदेश देता फिरता है. </p>
<p><strong>कबीर पढ़ना  दूर करू, पोथी देहु बहाय<br />
बावन अक्षर सोधि के, राम नाम लौ लाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं यह बहुत अधिक पढना तो दूर करो और इन पोथियों को पानी में बहा दो। बावन अक्षरों (हिन्दी वर्णमाला) को शोधकर उसके सार को ग्रहण कर और उससे राम की भक्ति में लग जाओ।<br />
*यहाँ कबीर दास जी का आशय यह है कि अपनी शिक्षा प्राप्त कर अपने व्यवसाय के साथ भक्ति भाव भी रखना चाहिऐ। आजकल हमने दिखा होगा जो आधुनिक शिक्षा प्राप्त करते हैं वह विदेशी लेखकों के हवाले से संदर्भ देकर अधिक बात करते हैं और उनको अपने देश का अध्यात्म एकदम पुराना विषय और अंध विश्वास की तरह लगता है जबकि हम देखे तो अब विदेशों में भी कबीर दर्शन पर चर्चा होने लगी है। इस दोहे में उन्होने स्पष्ट सन्देश दिया है कि आप शिक्षा प्राप्त करें जरूर और अपने अन्दर अध्यात्म चेतना भी जागृत करें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:बिना देह के कौतुक देखा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=84</link>
<pubDate>Wed, 06 Feb 2008 04:06:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरु मिले शीतल भया, मिति मोह तन पाया
नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गुरु मिले शीतल भया, मिति मोह तन पाया<br />
निशि वासर सुख निधि लहूँ, अन्तर प्रगटे आप</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की सदगुरु मिले तो मन में शीतलता  आ गई और तन और मन का जो मोह था वह मिट गया. हृदय में परमात्मा प्रगट हो गए और दिन-रात  का हर पल सुखमय हो गया</p>
<p><strong>कौतुक देखा देह बिन, रवि शशि बिना उजास<br />
साहिब सेवा माहिं हैं, बेपरवाही दास </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बिना देह ऐसा महान आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखा की वहाँ पर सूर्य-चंद्रमा के बिना ही उजाला है. उस स्थिति में वहाँ साहेब परमात्मा के सेवा में भक्त बेपरवाह होकर लगे हुए हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मैं बिकने लायक नहीं लिख सकता-चिंतन और कहानी ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=77</link>
<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 16:33:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=77</guid>
<description><![CDATA[उसने कहा-&#8221;तुम अच्छा लिखो!&#8221;
मैंने पू]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उसने कहा-''तुम अच्छा लिखो!''<br />
मैंने पूछा-''क्या अच्छा लिखूं<br />
उसने कहा-''वह जो लोगों को अच्छा लगे.''<br />
मैंने पूछा-लोगों को क्या अच्छा लगता है.''<br />
उसने कहाँ-''ऐसा जिससे मजा आये.''<br />
मैंने पूछा-''मजा कैसे आता है.''<br />
उसने कहा-''जैसे लगा हो कि कुछ लिखा है!''<br />
मैंने कहा-''कैसे लगेगा!''<br />
उसने कहा-''अगर सब मैंने बताया तो तुम्हारे लेखक  होने का क्या मतलब रह जायेगा?''<br />
मैंने कहा-''मैं तो बिना मतलब का लेखक हूँ.<br />
उसने कहा-''इसलिए तुम्हें कोई पूछता नहीं है.<br />
मैंने कहाँ-''पर मैंने कब चाहा कि कोई मुझे पूछे.<br />
उसने पूछा-''फिर लिखते क्यों हो?<br />
मैंने कहा-''क्योंकि मैं  लिख सकता हूँ.<br />
उसने कहा-''इससे तुम्हें क्या फायदा?<br />
मैंने कहा-''फायदा यानि क्या?''<br />
उसने कहा-''तुम्हें कुछ पैसे मिलते हैं?''<br />
मैंने कहा-'' मुझे पैसे चाहिए क्यों?''<br />
उसने कहा-''तुम जानते हो पैसे बिना सम्मान नहीं होता."<br />
मैंने कहा-''पर जिनके पास पैसा हैं उनका क्या सम्मान है?''<br />
उसने कहा--''सारी दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती हैं. सब उनको सलाम करते हैं.<br />
मैंने कहा-''पर मैं नहीं चाहता कि दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूमे, सब मुझको सलाम करें.<br />
उसने कहा-''फिर तुम पैदा क्यों हुए?''<br />
मैंने कहा-''मरने के लिए.''<br />
उसकी बौखलाहट बढ़ गयी-''तुम कुछ नहीं कर सकते. जैसा चाहते हो लिखो. मेरा विचार था कि मेरे कहे अनुसार लिखो तो कुछ तुम्हें पैसे दूं.''<br />
मैंने कहा-''तुम क्लर्क कम लेखक  ढूंढ लो, वही सिर्फ तुम्हारे कहे अनुसार लिख सकते हैं.<br />
उसने कहा-''तुम क्यों नहीं लिखते?''<br />
मैंने कहा''अगर तुमने या तुम जैसे किसी शब्द की व्यापारी ने ही  ही कुछ पैसे दिए होते तो तुम्हारे कहे अनुसार लिखता. अब आजाद लिखते-लिखते गुलामों जैसा लेखन मेरे बस का नहीं.''<br />
उसके चेहरे पर हताशा के भाव थे, उसने पूछा-''तुम्हें भूख नहीं लगती. तुम नहीं चाहते रोटी कमाना.''<br />
मैंने कहा-''तुम मेरी फिक्र क्यों करते हो.''<br />
उसने कहा-''तुम अच्छा लिखते हो, पर कुछ लोगों के पढ़ने के  लिए लिखो.ताकि मैं  उसे बाजार मैं  बेच सकूं.<br />
मैंने कहा-'' बिकने लायक लिख पाता तो तुम मुझसे बात कर सकते थे? क्या तुम मुझसे बिना तय किये मिल सकते थे? तब मैं तय करता था कि किसको मुझसे मिलना चाहिऐ कि नहीं. और यकीनन तुम्हारा नाम उसमें नहीं होता. तुम जैसे धनपति तो सड़क पर  कारों  में मारे-मारे  पर फिर रहे हैं.<br />
उसने खामोशी  ओढ़ ली.<br />
मैंने कहा-''तुम जाओ, बहुत लोगों को तुम्हारी जरूरत है? बिकने वाले लोगों की भीड़ तुम्हारा इन्तजार कर रही है  मैं बिकने लायक भी लिख सकता हूँ पर तुम उसकी कीमत नहीं चुका सकते. मुझे प्यार की भूख है, जो तुम्हारे दिल में कभी नहीं हो सकता. तुम उसका भी व्यापार कर सकते हो. तुम चाहते हो कि मैं कोई लड़के-और लडकी के प्यार पर लिखूं और तुम उसे बेच सके. तुम्हें बहुत लिखने वाले मिल जायेंगे. ''<br />
जाते हुए उसने कहा-''तुम लिखते तो अच्छा था, पर मैं भी शब्दों का व्यापारी हूँ और तुम्हारे कहे अनुसार पैसे नहीं दे सकता.<br />
मैंने कहा-''तुम मेरे कहे अनुसार पैसे नहीं दे सकते और मैं तुम्हारे कहे अनुसार लिख नहीं सकता. फिर मेरे पास आये क्यों?''</p>
<p>उसने मेरी तरह देखा और फिर मैंने उसके वापस जाते हुए क़दमों की आहट सुनीं.</p>
]]></content:encoded>
</item>

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