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	<title>hindi-duniya &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-duniya/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-duniya"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:02:08 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[विदुर नीतिःसफलता के मद में उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करना वर्जित]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 04:06:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</guid>
<description><![CDATA[1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से पहले उसका महत्व समझ लेना चाहिए। अपना काम प्रारंभ करने से पहले पूरी तरह सूच विचार करना ठीक है। उतावली से कोई भी काम आरंभ नहीं करना चाहिए।<br />
2.घैर्यवान मनुष्य क लिए यह उचित है कि पहले अपने कर्म का उद्देश्य, संभावित परिणाम तथा  उससे होने वाले लाभ से अपने जीवन के विकास का विचार कर कार्य प्रारंभ करे।<br />
3.जो मनुष्य अपनी स्थिति, लाभ,हानि, धन, देश तथा दण्ड का विचार नहीं कर सकता वह कभी अपने जीवन में स्थिर नहीं रह सकता।<br />
4जो मनुष्य उपलब्ध तथ्यों के प्रमाण को सही तरह से जानता है और धर्म अर्थ का जिसे पूर्ण ज्ञान है वही दत्त चित होकर अपना कार्य कर पाता है और विकास की तरफ बढ़ता है।<br />
5.जिसे सफलता प्राप्त हो गयी है उसे अगर गर्व में चूर होकर किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार सपंत्ति तथा उपलब्धि को नष्ट कर देता है जैसे सुंदरता को बुढ़ापा<br />
................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका </a>पर लिखा गया पाठ है।<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःभक्ति एकांत तथा अध्ययन समूह में करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 04:06:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</guid>
<description><![CDATA[1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, शक्ति से राज्य तथा गुणवान पत्नी से घर की रक्षा होती है।<br />
2.वासना इस संसार का सबसे बड़ा रोग है। वासना से मनुष्य का शरीर अंदर ही अंदर से खोखला होने के साथ बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है।<br />
3.क्रोध एक तरह से अग्नि है जो पूरे संसार को जलाकर राख कर देती है। यह इंसान का पूरी तरह विनाश करता है।<br />
4.जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है वह हमेशा सुखी रहेगा।<br />
5.बुद्धिमान और ज्ञानी स्वर्ग, चोर अपने जीवन और भोगी विलासी मनुष्य सुंदर स्त्री की कामना करते हैं।<br />
6.समुद्र के लिये जिस तरह वर्षा होना या न होना बराबर है उसी तरह जिसका पेट भरा है उसके लिये उत्तम से उत्तम भोजन व्यर्थ है।<br />
7.तपस्या, भक्ति. पूजा तथा साधना हमेशा एकांत में करना चाहिए जबकि विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से अध्ययन करना चाहिए। उसी तरह गायक समूह गान गायें तो प्रभावित करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-दीनता के भाव बिना भक्ति का आनंद नहीं मिलता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</link>
<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 04:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=162</guid>
<description><![CDATA[दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहैं धन माहिं<br />
रहिमन चातक रटनि हूँ, सर्वर को कोऊ नाहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों को ही निहारता रहता है पर चातक स्वाती नक्षत्र की बूँद को ही रटता रहता है और तालाब के जल को नहीं पीता। </p>
<p><strong>सक्षिप्त व्याख्या-</strong>इसका  आशय यह कि एक भक्त के लिए भगवान का ही महत्व होता है और वह किसी अन्य की कामना नहीं करता है। किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से वह प्रेम कर ही नहीं सकता। वह तो बस अपनी साधना में लीन रहता है। जो लोग भक्ति करते समय भी अन्य विषयों पर चर्चा करते हैं वह केवल दिखावा करते हैं।</p>
<p><strong>दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु<br />
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि भगवान् के प्रति दैन्य भाव से की गयी भक्ति करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है उसे इस भौतिक जगत से प्रेम करने वाले क्या समझ पाएगे। दीनता अपने आप में एक ऐसा गुण है जिससे दीनबंधु (परमात्मा) से बंधुत्व का आभास होता है।<br />
<strong>संक्षिप्त व्याख्या- </strong>इसका तात्पर्य यह है कि दीनता का भाव रखकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जो लोग अपने पद, पैसे और प्रतिष्टा के अहंकार में हैं उन्हें ईश्वर से क्या वास्ता क्यों कि ईश्वर ने उन्हें पहले ही मोह माया के जंजाल में डाल दिया है। अगर मन में अपने कर्ता होने का अहंकार है तो भक्ति का आनंद कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। भक्ति का आनंद से आशय यह है कि हम अपने सांसरिक कार्य करत हुए कभी कोई तनाव अपने अंदर अनुभव न करें। सच्ची भक्ति से विकास निकल जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपशुओं  की टांग खाने पर दवा भी लेनी पड़ती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 04:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है कि लोग तो  भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-</strong>वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।</p>
<p>आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिये लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान  कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। हृदय से भक्ति करने के लाभ होते हैं यह अब विज्ञान भी मानने लगा है। भजन भक्ति करते हुए आदमी सांसरिक विषयों से अपने मस्तिष्क को मुक्त कर लेता है और इस कारण उसका शुद्धिकरण हो जाता है। ध्यान को मन खुश करने के लिये एक बहुत बड़ा साधन माना गया है। अगर भगवान का नाम हृदय से स्मरण किया जाये तो अनेक विकार स्वतः परे जायेंगे, इसमें संशय नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःहमारे शरीर में विपत्तियां सहने की क्षमता होती है अधिक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 04:48:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह<br />
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है। </p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।</p>
<p>मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया? </p>
<p>इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:समय छोटे आदमी को भी बड़ा बना देता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 04:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</guid>
<description><![CDATA[
छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख<br />
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।<br />
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग ने भी पार  की दस हजार पाठको की संख्या-विशेष संपादकीय ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 14:26:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/30bepg8.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के अनुसार दस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। सच तो यह है इस बात लिखने का मेरा आज मन नहीं था, पर कई लोग विश्लेषणों दिलचस्पी रखते हैं। ब्लाग जगत में अंसख्य मित्र हैं वह शायद इस पाठ से बोर हों-यह सोचकर कि हर चौथे  दिन अपने ब्लाग के आंकड़ों को सामने रख देता है- पर फिर भी कुछ हैं जो अनुसंधान की दृष्टि से आंकड़ों में दिलचस्पी रखते है। इस ब्लाग को लेकर एक बार मेरे मन में कड़वाहट भर गयी थी और सोचा था कि इसके दस हजार पाठक संख्या पार कर दिखा दूंगा। दो दिन पहले भी यह ख्याल था पर फिर लगा कि यह सब तो चलता रहेगा। आपसी वाद विवादों पर क्या मन मैला करना? केवल संदेशों से सुसज्जित इस ब्लाग के लिए  एक टंकक हूं और मुझे अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों के व्यूज कम हैं पर वह मेरे प्रेरक हैं। टिप्पणियां नगण्य हैं पर जितनी हैं वह किसी भी भारी भरकम ब्लाग पर अधिक लगने वाली टिप्पणियों से कम नहीं है। जैसा कि मेरे हर ब्लाग के साथ है समीर लाल, ममता श्रीवास्तव, मीनाक्षी जी, परमजीत बाली, विस्फोट (यही नाम मुझे याद आ रहा है) और महक जैसे कुछ नाम यहां अधिक है। आम पाठकों की संख्या (अगर उनमें मुझे कोई भ्रम नहीं है तो ) नब्बे प्रतिशत से अधिक है। मेरे तीन ब्लाग <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथि</a> और यह शब्दलेख पत्रिका अध्यात्म विषयों के लिए सुरक्षित हैं इसलिये इन पर ऐसा लिखना मुझे ठीक नहीं लगता कि किसी पर प्रहार होता लगे। यह मेरे सुबह लिखे जाने ब्लाग हैं तब मैं केवल इसी विषय पर सोचता हूं। ज्ञानी दिखने के लिए नहीं बल्कि लिखकर उसे धारण करने का प्रयास करता हूं।  इसका प्रभाव भी देखता हूं कि क्षमा और दया भाव में शक्ति है वह यहां से ही पता लगती है। चाणक्य से कहा है कि वक्त पड़े तो चतुराई भी दिखाओ पर उसका आशय यह कदापि नहीं है कि हमेशा छलकपट कर काम चलाओ। चाणक्य से कहा कि कभी क्रोध का प्रदर्शन करो-हां मुझे याद आ रहा है कि इस पाठ के रखने के दो दिन बाद मुझे ऐसा भी करना पड़ा था।<br />
एक कोने में पड़े इस शांत ब्लाग धीमी गति से चलता दिखत अवश्य है पर प्रतिदिन इस पर बड़ी संख्या में व्यूज होते हैं। कई बार तो पाठ लिखे हुए ब्लाग की संख्या इनसे पीछे रहती है और वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर वह इससे पिछड़ जाते हैं। </p>
<p>अधिक विश्लेषण करने के लिए और भी लोग हैं। केवल 101 पाठों में इतनी संख्या जुटाने वाला यह मेरा अकेला ब्लाग हैं।  भले ही ब्लाग लेखकों की संख्या इस पर कम है पर फिर भी उसके लेखक को अन्य ब्लाग पर तो वही प्रेरित करते है। समस्त ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को मेरी तरफ से शुभकामनाएं। साथ ही स्पष्ट बता देना चाहता हूं कि मेरे मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं हैं। जब हम आपस में एक जगह खड़े होते हैं तो वाद विवाद भी होते है। अगर मैं कुछ कभी किसी के लिए लिखता हूं तो उसे अपना समझकर लिखता हूं। शेष फिर कभी।</p>
<p>दीपक भारतदीप  </p>
<p><strong>१० हजार की संख्या में विभिन्न फोरमों से आये व्युज की संख्या जो कुल का दस प्रतिशत भी नहीं है.</strong><br />
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<p><strong>विभिन्न पाठों को को पढने वालों की संख्या </strong></p>
<p>कबीर के दोहे:जह༯a&#62; 644<br />
चाणक्य नीति:प़्/a&#62; 305<br />
चाणक्य नीति:सम़/a&#62; 249<br />
रहीम के दोहे-कि༯a&#62; 224<br />
बाप-बेटे का होत 204<br />
दिल का राज, सिर ༯a&#62; 179<br />
चाणक्य नीति: वि༯a&#62; 172<br />
रहीम के दोहे:ह्༯a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:बु़/a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 156<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 147<br />
श्री गणेश जी को  145<br />
जो कार लायक नही༯a&#62; 144<br />
चाणक्य नीति:कप़/a&#62; 143<br />
रहीम के दोहे:चत༯a&#62; 132<br />
सच-झूठ का अंतर्༯a&#62; 129<br />
परिचय  127<br />
चाणक्य नीति: शर༯a&#62; 118<br />
मेरा परिचय  115<br />
कुछ न पढा, रौनक ़/a&#62; 111<br />
विदुर नीति:जिस़/a&#62; 110<br />
रहीम के दोहे:गो༯a&#62; 106<br />
संत कबीर वाणी:ख༯a&#62; 102<br />
चीन ने आख़िर अप༯a&#62; 99<br />
चाणक्य नीति:अप़/a&#62; 97<br />
कवितायेँ और क़्/a&#62; 96<br />
रहीम के दोहे:व्༯a&#62; 93<br />
विदुर नीति:धनि़/a&#62; 92<br />
चाणक्य नीति-जरॼ/a&#62; 89<br />
चाणक्य नीति:सा़/a&#62; 87<br />
विदुर नीति:विदॼ/a&#62; 87<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 87<br />
मन के खोखलेपन क༯a&#62; 83<br />
प्रात:काल का आन༯a&#62; 81<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 81<br />
पापा ब्लोगर नं़/a&#62; 81<br />
विदुर नीति:अधरॼ/a&#62; 77<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 76<br />
क्या ब्लोग जगत ༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:श༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 74<br />
चाणक्य नीति:हमॼ/a&#62; 73<br />
रामजी लगायेंगे 70<br />
नीयत पर भरोसा न༯a&#62; 68<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 67<br />
कब कौन सा रंग सा 67<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 66<br />
चाणक्य नीति:दु़/a&#62; 65<br />
मनुस्मृति:अपनी 62<br />
वह भूत-भूत कर चि 60<br />
चाणक्य नीति:सभॼ/a&#62; 60<br />
ऐसा भी क्या अक्༯a&#62; 58<br />
चाणक्य नीति:स़्/a&#62; 57<br />
चाणक्य नीति:शा़/a&#62; 56<br />
मनुस्मुतिःस्त༯a&#62; 55<br />
रहीम के दोहेःप़/a&#62; 54<br />
चाणक्य नीति:अल 54<br />
चाणक्य नीतिःतप 53<br />
कैसे करते हैं व༯a&#62; 53<br />
क्रिकेट भी अब फ༯a&#62; 53<br />
कतिपय सम्मान प़/a&#62; 52<br />
मनु स्मृतिःधन ़/a&#62; 50<br />
चाणक्य नीति:इस ༯a&#62; 49<br />
चजइ-ब्लोगरों मॼ/a&#62; 48<br />
चाणक्य नीतिःसं 47<br />
इसलिए कवि हमेश़/a&#62; 46<br />
चाणक्य नीति:सु़/a&#62; 46<br />
कवि ब्लोगर आवे़/a&#62; 45<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 45<br />
संत कबीर वाणी:व༯a&#62; 45<br />
वही कहलाता है अ༯a&#62; 45<br />
मनुस्मृति: मां़/a&#62; 44<br />
संत कबीर वाणी:म༯a&#62; 42<br />
मनुस्मृतिःपरि༯a&#62; 41<br />
फ्लॉप हैं तो बे༯a&#62; 41<br />
एक बेकार खबर को  40<br />
चाणक्य नीति:असॼ/a&#62; 39<br />
शब्द बोलते जगह ༯a&#62; 39<br />
चजई-चिट्ठा जगत ༯a&#62; 38<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 36<br />
मनुस्मृतिःविष༯a&#62; 36<br />
संत कबीर वाणी:ब༯a&#62; 35<br />
आस्ट्रेलिया का 35<br />
चाणक्य नीति:सं़/a&#62; 35<br />
मैं बिकने लायक ༯a&#62; 34<br />
क्रिकेट बहुत द़/a&#62; 34<br />
मनुस्मृति:ढोंग 33<br />
माफ़ी दी कि क़दम 33<br />
रहीम के दोहेःगॼ/a&#62; 32<br />
मनुस्मृतिःईमा༯a&#62; 32<br />
चाणक्य नीति:पै़/a&#62; 32<br />
शायद ही लोग समझ  32<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 32<br />
क्या लिखूं 'ब्ल༯a&#62; 30<br />
या इसे भ्रमवश ल༯a&#62; 28<br />
मनु स्मृतिःपर् 25<br />
संत कबीर वाणीः़/a&#62; 24<br />
होली के रंग फीक༯a&#62; 23<br />
अपनी मनस्थिति ༯a&#62; 22<br />
मनुस्मृतिःसदा༯a&#62; 19<br />
चजई- क्या सब चलॼ/a&#62; 17<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 14<br />
अंतर्जाल पर प़्/a&#62; 14  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःहमारे घट में है ज्ञान का भंडार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=136</link>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 05:00:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=136</guid>
<description><![CDATA[(यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवीं पोस्ट है)
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong>(यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवीं पोस्ट है)</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong></strong><br />
<strong>सहकामी तू घट में करै, घट ही में करतार<br />
घट ही भीतर पाइये, सुरति शब्द भण्डार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीर दास हृदय को जो धारण किये है वही सबका करतार है। इसी हृदय के भीतर ज्ञान और सत्य का अपार भंडार है अगर हम उसे पा लें तो जीवन सफल हो जायेगा।<br />
 <br />
<strong>सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम<br />
निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो कामना रखकर परमात्मा का भजन करते हैं उनको उत्तम फल की प्राप्ति होती है परंतु जो निष्काम भाव से भगवान श्रीराम का स्मरण करते है उन्हें अविनाशी परमात्मा के अवश्य दर्शन होते हैं।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>संत कबीरदास जी ने यहां सकाम भक्ति का भी फल बताया है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि बिना हृदय में धारण किये उसमें भी सफलता मिल जायेगी। वह अपने दोहों के निरंतर इस बात पर जोर देते हैं कि हृदय में ही परमात्मा का ढूंढो तभी ज्ञान और सत्य के भंडार की प्राप्ति होगी। आजकल हम देखते हैं कि सकाम भक्ति के नाम पर भी ढोंग का बोलबाला है।  लोग तमाम तरह की मूर्तियों की पूजा करने को अलावा कथित ढोंगी संतों को अपना गुरू बनाते है। कबीर दास यह भी कहते हैं कि जो केवल रटकर ज्ञान सुनाते हैं उनको अपना गुरू बनाने से कोई भी लाभ नहीं होता। वह उन्हें सकाम भक्ति का वह रास्ता बताते हैं जिसमें परमात्मा की जगह गुरू की मूर्ति घरों में रखवाकर उसकी पूजा करवाते हैं। तमाम तरह की दक्षिण और दान मांगते हैं। सांसरिक पदार्थ इस तरह भेजते हैं जैसे उनका नाम लिख जाने से वह पवित्र हो गये हों। यह कथित सकाम भक्ति भी किसी काम की नहीं है। उसके लिये भी यह आवश्यक है कि भगवान को हृदय में धारण किया जाये।<br />
<strong>नोट-यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवी पोस्ट है और इसके लिये ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई क्योंकि उनकी प्रेरणा से ही यह कार्य संभव हो सका&#60;</strong></p>
<p><strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपरोपकार करने वाले को बीच में मत छोड़ो]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 02:59:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=132</guid>
<description><![CDATA[रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच<br />
मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की मित्रता को बीच में ही नहीं छोड़ देना चाहिए। राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस काटकर कबूतर के वजन के बराबर करने के लिए दान दिया  था और ऋषि दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अपनी हड्डियां दान में दे दी थीं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-</strong>इस दुनियां में परोपकार करने वाले मित्र वैसे ही बहुत कम मिलते हैं ऐसे में अगर कोई हमारा ऐसा संगी साथ है जो एक बार हमारा काम कर देता है तो फिर हमें उससे मूंह नहीं फेरना चाहिए क्योंकि फिर कभी कोई परेशानी आई तो उसके सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।<br />
वैसे आजकल लोगों की परेशानियों का कारण यह भी है कि उन्हेंं अच्छे-बुरे व्यक्ति की पहचान नहीं रही। अगर किसी में कोई काम फंस जाता है तो उससे वह करवाकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो पर बाद में जब विपत्ति आती है तो स्वयं ही दोबारा अपना काम कहने में उन्हें शर्म आती है। आजकल लोग अपने मित्रों के साथ भी ‘उपयोग करो और फैंक दो’ (यूज एंड थ्रो) की नीति पर चलते हैं पर याद रखने लायक बात यह  है कि पग-पग पर परोपकारी लोग नहीं मिलते पर विपत्तियों का दौर शुरू होता है तो पग-पग पर आतीं हैं। इसलिये संयोग से कोई परोपकारी साथी मिल जाये तो फिर उसे नहंी छोड़ना चाहिए। हालांकि ‘उपयोग करो और फैंक दो’ की नीति कहने सुनने में हमारी बुद्धिमानी का परिचायक लगती है पर पश्चिम से आयातित यह नीति अपने देश के लिए अनुपयुक्त है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःईमानदारी से धन कमाना ही है सबसे बड़ी पवित्रता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 03:35:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=131</guid>
<description><![CDATA[सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्<br />
योऽथेंशुचिहिं स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः</strong></p>
<p>जीवन में पवित्रता जरूरी है पर इनमें ईमानदारी से धन कमाने की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह सदा ही पवित्र समझा जाना चाहिए। अगर धनोपर्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी पानी आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय टिप्पणी-</strong> अब धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि क्यों लोग मनुस्मृति की कुछ जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनकी आलोचना करते हैं और उसमें वर्णित अन्य ज्ञानपूर्ण वचनों का अनदेखा करते हैं। समाज में बेईमान, चालाकी और धोखे से धन कमाने वालों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और सारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में चले गये हैं। उन्हें मनुस्मृति के संदेश कटु लगते होंगे और इसलिये ही वह नहीं चाहते कि मनुस्मृति की चर्चा एक धार्मिक पुस्तक के रूप में हो।<br />
मनु महाराज के अनुसार तो अनुचित रूप से धन कमाने वाला कभी पवित्र नहीं हो सकता और उसे देखते हुए तो केवल मजदूर, गरीब और मध्यम वर्ग के कुछ  लोग ही पवित्र रह जाते हैं। अगर उचित  तरीके से धन कमाने की बात करें तो हमें निचले वर्ग के लोगों  के अलावा अन्य कहीं मिल ही नहीं सकते। ऐसे लोग मनुस्मृति नहीं पढ़ते वरना वह तो अपनी पवित्रता का दावा करते तब तो धनाढ्य लोगों के लिए मुश्किल हो जाती। इस समय जो चमक सब तरफ दिख रही है वह क्या उचित प्रकार से धन कमाने की वजह से है? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। इतना ही नहीं हमारे कर्मकांडों में पवित्रता के अनेक रूप गढ़े गये हैं और वह काल्पनिक ही लगते हैं। मनु महाराज की पवित्रता की  सबसे बड़ी शर्त ईमानदारी से धन कमाने की है और कितने लोग इस समाज के इस कसौटी पर खरे उतरेंगे यह विचार का विषय है। तमाम तरह के लोग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोई शांति के लिये यज्ञ करा रहा है कोई वर्षा के लिये यज्ञ करा रहा है तो कोई  खेलों में देश की टीमों को जितवाने के लिये टोटका करा रहा है पर प्रश्न एक ही क्या उनमें ईमानदारी से कमाया धन लग रहा है?</p>
<p>यह आश्चर्य का विषय है कि मनुस्मृति के बारे में  लोगों में शायद भ्रांत धारण इसीलिये भरी गयी है ताकि वह कहीं अधिक ज्ञानी न हो जायें और उनकी बुद्धि को भ्रमित कर उनका दोहन कठिन न हो जाय। अगर मनु महाराज के इस श्लोक पर विचार किया जाये तो यह समझ में आ सकता है कि ईमानदार होना ही सबसे अधिक पवित्र होना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःधन और अन्न न हो तो जल का दान भी पुण्य देना वाला ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=129</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 03:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=129</guid>
<description><![CDATA[भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्<br />
वेदतत्त्वर्थविदूषे, ब्राहणानापादयेत,</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">यदि अपने घर में खाद्यान्न न हो तो एक ग्रास भर भिक्षा या दान देने के लिये उसे स्वादिष्ट बना कर और यदि वह भी न हो तो वेद के तत्व और अर्थ को जानने वाले आदरपूर्वक जल पिलाने वाले गृहस्थ को भी पुण्य की प्राप्त होती है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा तो कि धर्म निभाना तो अमीरों के बस का है और गरीब को तो बस अपनी रोटी कमाने से फुरसत भी नहीं है। अमीरों को दान करते देखकर गरीब भी यह सोचते हैं कि जिसके पास माया है उसे ही दान देने का अधिकार भगवान ने दिया है हम तो बिना कुछ दान किये ऐसा पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते। दरअसल यह केवल अपने आप को दुःख देने के अलावा कुछ नहीं है। मनुष्य योनि में दान की महता इसलिये बताई गयी है क्योंकि वही एक ऐसा जीव है जिसके पास बुद्धि है और वह किसी को दे सकता है। भिक्षा या दान देकर पुण्य कमाने का मूल आशय यह नहीं है कि आपने क्या और कितना दान किया है बल्कि आपने अपने पास से कुछ दान दिया यह महत्वपूर्ण है। अगर धन नहीं है तो अन्न और वह भी पर्याप्त नहीं है तो केवल एक ग्रास और वह भी नहीं है तो दर पर आये किसी सहृदय सज्जन को जल पिला दें तो वह भी पुण्य प्रदान करता है।</span></p>
<p><span style="color:#003366;">हो सकता है कि कुछ लोग गंभीर  चिंतन करते हुए या मजाक में कह दें कि पानी भी न हो तो फिर काहे का दान? इतना तय है कि जल बिना जीवन नहीं है और अगर कोई जीव है तो वहां जल-कही अधिक तो कहीं कम-उपलब्ध होता है और अगर किसी प्यासे को पानी पिलाता है वह स्वयं प्यासा नही तड़पता। तात्पर्य यह है कि अपने हाथ से कुछ किसी को देना ही भिक्षा या दान है और हम अगर किसी को अधिक धन नहीं दे पा रहे तो थोड़ा सा उसमें से किसी को देकर अपने मनुष्य होने की अनुभूति तो कर ही सकते है।</p>
<p></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःविषयी लोग कभी सिद्ध नहीं होते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 06:01:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्यसंशयम्<br />
सन्न्यिम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति </span></strong></p>
<p><strong>इस विश्व में सभी प्रकार के जीव इंद्रियों के विषयों में बुरी  तरह फंस जाते हैं इसलिये उनमे एक नहीं अनेक दोष आ जाते हैं। जो व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं वही सिद्धि प्राप्त कर पाते है।</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्तवा घ्रात्वा च यो नरः<br />
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितन्द्रियः</span></strong></p>
<p><strong>जो  व्यक्ति अपने जीवन में अपनी निंदा-प्रशंसा, प्रिय-अप्रिय वचन सुनने, सुंदर और भद्दा दिखने, छूने में सख्त और कोमल, खाने में मीठे या कड़वे स्वाद,  अच्छी या बुरी गंध को सूंघने  तथा जो सुख और दुख से परे हो जाता है है वही सच्चा सिद्ध है।</strong></p>
<p><strong><span style="color:#993366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</span></strong>आजकल हमारे सामने कई सिद्ध लोग  आते हैं जो अपने पास अनेक प्रकार की चमत्कारी सिद्धि  होने का दावा करते है। उनके कई मानने वाले भी भ्रमवश उनका प्रचार करते है। सच तो यह है कि आजकल सच्चा सिद्ध मिलना  मुश्किल है। सच्चा सिद्ध तो वही है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। आजकल के सिद्ध तो काले पैसे को सफेद करने और अन्य चमत्कार करने में जुटे रहते हैं। सच्चे सिद्ध का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह किसी प्रपंच में नही फंसते। वह स्वयं किसी के पास जाते ह और न किसी को अपने यहंा आने के लिये प्रेरित करते हैं।</p>
<p>सिद्ध होने के लिये कोई सांसरिक कार्य छोड़ने की जरूरत नहीं होती। जिसे सब  त्याग कहते हैं वह वास्तव में भाव का त्याग है। हमारे पास अनेक वस्तुऐं हैं उनका उपयोग तो हमें करना चाहिए पर उसके प्रति स्वामित्व का बोध नहीं रखना चाहिए। हम कोई कार्य करते हैं तो उससे हमें जिस धन की प्राप्ति होती है उसे फल नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हम उस धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। वह धन लेना तो हमारे कर्तव्य का ही हिस्सा है न कि फल है। फल का आशय  है मन की शांति और अगर वह नहीं है तो इसका मतलब यह कि हम अपने मन के  प्रति कर्तव्यविमुख हो रहे हैं। उसको प्रसन्नता तभी मिलती है जब इद्रियों को वश में रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं। धन हो या अन्य भौतिक साधन  हमारे लिये फल नहीं हो सकते बल्कि वह हमारे कर्तव्य पूर्ति का हिस्सा होते हैं। जो यही विचार करते हैं उनको इस संसार के प्रति निष्काम भाव प्राप्त हो जाता है और वह जीवन का आनंद उठा पाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति:अपनी इच्छाओं के दास नही स्वामी बनें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=122</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 04:32:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति
ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति<br />
हविपा   कृष्णावत्र्मेव   भूव  एवाभिवर्धते</strong></p></blockquote>
<p>  <strong>जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और अधिक जल उठती है उसी प्रकार आदमी सतत इच्छाओं की पूर्ति जैसे जैसा होती जाती है वैसे ही वह और  अधिक बढ़ जातीं हैं। </strong></p>
<blockquote><p><strong>यश्चैतान्प्राघ्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत्<br />
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागों विशिष्यते</strong></p></blockquote>
<p><strong>एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा जो सबका त्याग कर दे उनमें त्यागी को ही श्रेष्ठ कहा जा सकता है।</strong></p>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या-मनुस्मृति के इन दोनों श्लोंकों का आशय यही है कि हमें अपनी इच्छाओं का  दास बनने  की बजाय उनका मालिक होना चहिए। जब हम अपने अंदर तमाम तरह की इच्छाएं पाल लेते हैं तो उनको पूरा करने के लिये इधर-उधर भटकने लगते हैं और तब हमारें सामने अनेक प्रकार के तनाव उपस्थित हो जाते हैं। हमारा काम कई चीजों के बिना भी चल सकता है पर हम उनको पाने की चेष्टा करते हेै। कई चीजें तो हमारे लिये क्षणिक काम या समय के लिये उपयोग में आतीं हैं और बाद में उनको कबाड़ में रख दिया जाता है पर हम उसे पाने में अपनी बेशकीमती समय और ऊर्जा नष्ट कर देते हैं। इसकी बजाय हम अपनी उन व्यर्थ की इच्छाओं और कामनाओं के स्वामी बनकर उन्हें रोंकें तो हम अपने जीवन में न केवल अपार आनन्द प्राप्त करेंगे बल्कि अपने आसपास ही  दूसरे मनुष्यों  के लिये आदर्श भी बन सकते है।</p>
<p><strong>नोट-उपरोक्त श्लोक कृतिदेव 10 में टंकित कर परिवर्तित टूल से युनिकोड में किये गये हैं अतः इसमें कुछ अलग के दिखाई दे रहे है। सुधि पाठक इसे अवगत हों।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:अधर्म से प्राप्त धन छिपाने से अन्य दोष भी प्रकट होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=121</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 03:37:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है.<br />
२. अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरु हैं. दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपकर अधर्म और पाप कार्य करने वालों के शासक यमराज हैं.<br />
३.सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक युवावस्था  बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं.<br />
४.पहली  अवस्था  में वह काम करें जो वृद्धावस्था में सुखपूर्वक रह सकें और जीवन भर वह कार्य करें जिसको मरने पर भी लोग याद करें.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:दुष्ट राजा की  सेवा से मन को होता है कष्ट]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=119</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 03:34:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।<br />
        2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है। पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।</p>
<p>        3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। </p>
<p>       4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार न सोचना विपत्तियों को बुलाना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=118</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 03:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li>
<p align="left">जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
</li>
<li>
<p align="left">समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 06:36:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही  नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की  धार  नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन  करता हूँ  वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है। </p>
<p>अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती  है कि  दीपावली पर सूर्य नारायण  दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि  होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम  कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों  का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग  बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं। </p>
<p>इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि  इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब  ऐसे में अपने घर के बाहर खडे  उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह  गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां  थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।</p>
<p>पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित  सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे  दूसरे सज्जन बोले-''हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।''<br />
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित  सज्जन ने उससे कहा--'तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि  भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच  है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।''<br />
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित  सज्जन से  विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना  चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल  रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परनिंदा न करने वाले ही लोकप्रिय होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=114</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 02:52:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप्त नहीं  होता। सामान्यत: सुख-दुख के प्राप्ति मनुष्य के हाथ में न होकर परमात्मा के हाथ में हैं।<br />
2.जिस तरह बछड़ा हजारों पहुसों के बीच में अपनी माता को ढूंढ कर उसके निकट पहुंच जाता है और उसका स्तनपान करने लगता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसका पीछा करता है और उसका फल उसे अवश्य मिलता है।<br />
3.जो वास्तविक तत्व ज्ञान   कर उपदेश करने वाले गुरु को सम्मान नहीं देता वह शिष्य पहले कुत्ते की योनि में जन्म लेने के चांडाल की योनि में उत्पान होता है।<br />
4.अगर आप समाज में लोगों की समक्ष अपनी लोकप्रियता पाना चाहते हैं तो दूसरों की निंदा करना बंद कर दो। परनिंदा करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है और इसकी वजह से वह दूसरे को छोटा साबित कर अपने को बड़ा साबित करना चाहता है। जो दूसरों के निंदा नहीं करते वह लोगों में लोकप्रिय होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सावधानी से काम लें तो मिट्टी का घड़ा भी होता है दीर्घायु ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=113</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 02:30:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखें   और भूतकाल की परवाह न करें तथा वर्तमान में जीने  का प्रयास करें. परमात्मा में विश्वास करें.<br />
२. मनुष्य के जीवन में सब दुखों के जड़ स्नेह है. जिस  मनुष्य से स्नेह होता है उसके दुख की चिंता हमेशा मन में बनी रहती है.<br />
३.हर मनुष्य के  मन में  ही सुख-दुख और अन्य विषय मूल रूप से मौजूद रहते हैं जिसने मन को वश में कर लिए वही सुखी है.<br />
४.मनुष्य  का शरीर मिटटी के कच्चे घडे के समान एक ही क्षण में टूटकर बिखर सकता है पर जिस तरह कच्चे  घडे का सावधानी से उपयोग करें तो वह लंबे समय तक चल सकता है वैसे ही अगर इंसान अपनी शरीर का अत्यंत  सावधानी का उपयोग करे तो लंबे समय तक स्वस्थ  रहते हुए जीवित रह सकता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अपनी बातें यथासंभव गुप्त रखना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=111</link>
<pubDate>Mon, 17 Mar 2008 03:38:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=111</guid>
<description><![CDATA[बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन की हानि, अपने मानसिक संताप, अपने घर-परिवार के सदस्यों के दोष तथा  किसी दुष्ट द्वारा अपने पर किये गए प्रहार और अपमान की भूलकर  भी  किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा न करे। इन सब बातों को यथासंभव गुप्त रखना चाहिए।</strong></p></blockquote>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या-लोग अक्सर अपनी बात अपने मन में नहीं रखते और दूसरों को अपनी बात बता देते हैं जो की बाद में उनके लियी हानिकारक होती है। हम नित-प्रतिदिन कई लोगों के संपर्क में रहते हैं और ऐसा लगता है कि वह हमारे लिए विश्वसनीय हैं यह हमारा भ्रम होता है। घर, कार्यालय, दूकान या किसी अन्य ऐसे स्थान पर जहाँ निय्मिति जाते हैं वहाँ हमसे रोज मिलने वाले लोग होते हैं और हमें यह भ्रम हो जाता है कि बस वह हमारे विश्वस्त हैं और हम उनके। इस चक्कर में हम उनको अपने परिवार, संताप और उपलब्धियों के बारे में बता देते हैं कि वह भला दूसरे को क्यों बताएगा? भावनात्मक प्रबाह में हम उनको ऐसी बाते भी बता देते हैं जो नहीं बताना चाहिऐ और वह जाकर सबको बता देता और हमें फिर संताप होता है।</p>
<p>इसलिए पाने घर-परिवार, संपदा और तकलीफों की जानकारी जहाँ तक हो सके गुप्त रखना चाहिए। जब तक आवश्यक न लगे किसी के सामने उसका बखान नहीं करना चाहिऐ।</p>
]]></content:encoded>
</item>

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