<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindi-book &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-book/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-book"</description>
	<pubDate>Sat, 10 May 2008 18:14:23 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःविषयी लोग कभी सिद्ध नहीं होते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 06:01:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=123</guid>
<description><![CDATA[इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्यसंशयम्<br />
सन्न्यिम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति </span></strong></p>
<p><strong>इस विश्व में सभी प्रकार के जीव इंद्रियों के विषयों में बुरी  तरह फंस जाते हैं इसलिये उनमे एक नहीं अनेक दोष आ जाते हैं। जो व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं वही सिद्धि प्राप्त कर पाते है।</strong></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="color:#993366;">श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्तवा घ्रात्वा च यो नरः<br />
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितन्द्रियः</span></strong></p>
<p><strong>जो  व्यक्ति अपने जीवन में अपनी निंदा-प्रशंसा, प्रिय-अप्रिय वचन सुनने, सुंदर और भद्दा दिखने, छूने में सख्त और कोमल, खाने में मीठे या कड़वे स्वाद,  अच्छी या बुरी गंध को सूंघने  तथा जो सुख और दुख से परे हो जाता है है वही सच्चा सिद्ध है।</strong></p>
<p><strong><span style="color:#993366;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</span></strong>आजकल हमारे सामने कई सिद्ध लोग  आते हैं जो अपने पास अनेक प्रकार की चमत्कारी सिद्धि  होने का दावा करते है। उनके कई मानने वाले भी भ्रमवश उनका प्रचार करते है। सच तो यह है कि आजकल सच्चा सिद्ध मिलना  मुश्किल है। सच्चा सिद्ध तो वही है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। आजकल के सिद्ध तो काले पैसे को सफेद करने और अन्य चमत्कार करने में जुटे रहते हैं। सच्चे सिद्ध का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह किसी प्रपंच में नही फंसते। वह स्वयं किसी के पास जाते ह और न किसी को अपने यहंा आने के लिये प्रेरित करते हैं।</p>
<p>सिद्ध होने के लिये कोई सांसरिक कार्य छोड़ने की जरूरत नहीं होती। जिसे सब  त्याग कहते हैं वह वास्तव में भाव का त्याग है। हमारे पास अनेक वस्तुऐं हैं उनका उपयोग तो हमें करना चाहिए पर उसके प्रति स्वामित्व का बोध नहीं रखना चाहिए। हम कोई कार्य करते हैं तो उससे हमें जिस धन की प्राप्ति होती है उसे फल नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हम उस धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। वह धन लेना तो हमारे कर्तव्य का ही हिस्सा है न कि फल है। फल का आशय  है मन की शांति और अगर वह नहीं है तो इसका मतलब यह कि हम अपने मन के  प्रति कर्तव्यविमुख हो रहे हैं। उसको प्रसन्नता तभी मिलती है जब इद्रियों को वश में रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं। धन हो या अन्य भौतिक साधन  हमारे लिये फल नहीं हो सकते बल्कि वह हमारे कर्तव्य पूर्ति का हिस्सा होते हैं। जो यही विचार करते हैं उनको इस संसार के प्रति निष्काम भाव प्राप्त हो जाता है और वह जीवन का आनंद उठा पाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:38:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</guid>
<description><![CDATA[अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय<br />
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान<br />
कही जश्न के लिए पीता है  शराब<br />
ताकत के लिए खाता  कबाब<br />
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब<br />
पर अकेले में होता है<br />
अपने कर्मों  से ही होता  परेशान  </p>
<p>इन्तजार करता है त्योहारों का<br />
कुछ मिलने के व्यवहारों का<br />
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान<br />
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान<br />
सिद्धि के लिए करता है यत्न<br />
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न<br />
अपने से  भागता रहता है इंसान </p>
<p>सीख लो हर पल जीना<br />
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना<br />
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता<br />
देने से किसी को नाम आगे जाता<br />
गले में हार पड़ने से<br />
पीठ पर चाल डालने से<br />
मिलता है थोडी देर का सम्मान<br />
अपने बोलों में भर दो रस<br />
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान<br />
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस<br />
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है<br />
देने वाला ही खुशी भी लूटता है<br />
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं<br />
मरने या पीठ पीछे हो<br />
वही कहलाता है असली सम्मान<br />
-----------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:इस अस्थिर संसार में धर्म ही अपना होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</link>
<pubDate>Sat, 15 Mar 2008 05:21:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की  गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। </p>
<p><strong>व्याख्या-</strong> बाल्यावस्था, युवावस्था  और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही  अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों से -घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो - की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी जा सकती। अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।<br />
<strong>*व्याख्या-</strong> अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:गोत्र की  वृद्धि पर हिरन भी उछलते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=99</link>
<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 03:32:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=99</guid>
<description><![CDATA[रहिमन ठहरी धूरि  की, रही पवन ते पुरि
गाँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रहिमन ठहरी धूरि  की, रही पवन ते पुरि<br />
गाँठ युक्ति की खुलि गयी, अंत धूरि को धूरि<br />
कविवर रहीम  कहते हैं की ठहरी हुई धूल जब हवा के सहारे  ऊपर उठती हैं तो कष्ट कारक होती है. उसी तरह अगर कोई हमारे रहस्य की गाँठ है वह खुल जाती हैं तो कीं जगह नीचा देखना पड़ता है. </p>
<p>रहिमन अपने गोट को, सबै चहत उत्साह<br />
मृग उछरत आकाश को, भूमि खनत कराह </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की सब लोग  अपने गोत्र की वृद्धि के इच्छुक होते हैं. हिरन आकाश तक उछलते हैं और सूअर पृथ्वी को खोदने लगते हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:विद्या सज्जन पुरुष की शक्ति होती है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/02/15/vidur-neetividhyaa-sajjan-purush-kee-shakti-hotee-hai/</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:13:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/02/15/vidur-neetividhyaa-sajjan-purush-kee-shakti-hotee-hai/</guid>
<description><![CDATA[१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची कुल का मद है. यह घमंडी पुरुषों के लिए मद हैं परन्तु सज्जन पुरुषों के लिए दम के साधन हैं.<br />
२.मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले संत है, संतों के भी सहारे संत ही हैं. दुष्टों को सहारा देने वाले संत हैं, पर दुष्ट लोग संतों को सहारा नहीं देते.<br />
३.अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता है, जिसके पास गाय है वह मीठे स्वाद की आकांक्षा को जीत लेता है, सवारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता है और शीलवान पुरुष सब पर विजय पा लेता है.<br />
४.पुरुष शील में ही प्रधान है जिसका वही नष्ट हो जाता है, इस संसार में उसका जीवन, धन और बंधुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:कुल के अंहकार का भाव भक्ति में बाधक ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=90</link>
<pubDate>Wed, 13 Feb 2008 04:10:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=90</guid>
<description><![CDATA[कुल खोये कुल उबरै, कुल राखै कुल जाय
राम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><strong>कुल खोये कुल उबरै, कुल राखै कुल जाय<br />
राम निकुल कुल भेटिया, सब कुल गया बिलाय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुल के अंहकार को मिटाकर सेवा  करने पर संपूर्ण रूप से अपना कल्याण होता है और कुल का अंहकार रखने से संपूर्ण हित नष्ट हो जाते हैं. जब अपने मन में केवल भगवान् के प्रति सच्चा भाव होता है तब कुल आदि का भाव नहीं रह जाता है.</p>
<p align="center"><strong>कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय<br />
तब कुल काको लाजि है, चारि पाँव का होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं मनुष्य कुल के मोह में पड़कर पतित भाव को प्राप्त हो जाता है. वैसे मनुष्य हंस का स्वरूप है परन्तु उसे भूलकर वह सांसरिक बातों के चक्कर में पड़ जाता है. कुल की मर्यादा की लाज का ख्याल करते हुए वह दुनिया का बोझ इस तरह उठाता है जैसे चार पाँव वाला जीव हो.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:वर्णमाला का शोधन कर भक्ति में लीन हो जाओ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=85</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 04:00:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=85</guid>
<description><![CDATA[पढि पढि तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढि पढि तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो चोर<br />
जिस पढ़ने साहिब मिले, सो पढ़ना कछु  और</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं पुस्तकें पढ़-पढ़कर तो पत्थर के समान जड़ अज्ञानी  होते गए और लिख-लिख कर भी चोर बनते गए। जिसे पढ़ने से स्वामी मिलता है वह तो कुछ और ही है।<br />
*यहाँ आशय यह है कि कोई किताबें पढ़कर अहंकारी हो जाता है कि हमें तो सब आता है और वह कुछ नया सीखना नहीं चाहता , या वह उसमें से उठाकर कुछ लिखने लगता पर अपना कोई दृष्टिकोण उसमें नहीं आता और न उस पढे हुए की राह पर चलता पर दूसरों को  उपदेश देता फिरता है. </p>
<p><strong>कबीर पढ़ना  दूर करू, पोथी देहु बहाय<br />
बावन अक्षर सोधि के, राम नाम लौ लाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं यह बहुत अधिक पढना तो दूर करो और इन पोथियों को पानी में बहा दो। बावन अक्षरों (हिन्दी वर्णमाला) को शोधकर उसके सार को ग्रहण कर और उससे राम की भक्ति में लग जाओ।<br />
*यहाँ कबीर दास जी का आशय यह है कि अपनी शिक्षा प्राप्त कर अपने व्यवसाय के साथ भक्ति भाव भी रखना चाहिऐ। आजकल हमने दिखा होगा जो आधुनिक शिक्षा प्राप्त करते हैं वह विदेशी लेखकों के हवाले से संदर्भ देकर अधिक बात करते हैं और उनको अपने देश का अध्यात्म एकदम पुराना विषय और अंध विश्वास की तरह लगता है जबकि हम देखे तो अब विदेशों में भी कबीर दर्शन पर चर्चा होने लगी है। इस दोहे में उन्होने स्पष्ट सन्देश दिया है कि आप शिक्षा प्राप्त करें जरूर और अपने अन्दर अध्यात्म चेतना भी जागृत करें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:शांत व्यक्ति को दुर्बल न समझें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/chankya-neetishant-vyakti-ko-durbal-na-samjhen/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 03:47:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/01/23/chankya-neetishant-vyakti-ko-durbal-na-samjhen/</guid>
<description><![CDATA[
१.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
१.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।</p>
<p>२.वैद के ज्ञान की गहराई को न समझकर उनकी निंदा करने वाले उनमें वर्णित सच्चाई और महानता को कम नहीं कर सकते। शास्त्र निहित आचार व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों के उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते। </p>
<p>३.शांत, सज्जन व्यक्ति को दुर्बल कहने वाले दुर्जनों का प्रयास भी निरर्थक हो जाता है। किसी की निंदा कराने वाले का अपना ही नाश होता है। </p>
<p>४.कामवासना से रहित व्यक्ति रोग रहित नहीं रह सकता है, कामंधता भी अपने आप में एक रोग है। </p>
<p>५.अधिक मोह भी मनुष्य को कमजोर बना देता है। ममता अच्छा गुण है पर मोह बुरा है। बुद्धि पूर्वक प्रेम करना अच्छा है, मोह तो अज्ञानता के कारण होता है। क्रोध की आग में क्रोधी व्यक्ति ही भस्म होता है। </p>
<p>६.आत्मज्ञान से बढ़कर इस संसार में कोई दूसरा सुख नहीं। सत्य के ज्ञान से मनुष्य अज्ञानता द्वारा पैदा हुए कष्ट से बच सकता है।<br />
७.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट बहुत दिन बाद जनचर्चा का विषय बना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 16:36:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल बीस ओवरीय विश्वकप प्रतियोगिता के सेमी फाइनल में आस्ट्रेलिया को हारने के बाद शुरू हुई। पहले ऎसी चर्चा १९८३ में शुरू हुई थी बाजार में लोगों को जमकर भुनाया गया और विश्व में आर्थिक रुप से गरीब कहे जाने वाला भारत क्रिकेट का आर्थिक आधार बन गया। फिर एक दौर एसा आया कि भारतीय टीम अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर तो अच्छा प्रदर्शन करती पर प्रतियोगिताओं में पिट कर आ जाती। क्रिकेट के कर्ण धारों को लगता कि अन्तराष्ट्रीय दौरों के सफलता से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बरकरार रहेगी और उन्होने प्रतियोगिताओं को भी सामान्य रुप से लिया और पिछले विश्व कप के बाद भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो गयी भले ही क्रिकेट से जुडे लोग इसे नही मानते हैं पर इसके आर्थिक पक्ष से जुडे विशेषज्ञ इस पहलू को जानते हैं कि लोगों में अगर लगाव अधिक नहीं है तो उसका फ़ायदा नही उठाया जा सकता है।</p>
<p>बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि'कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना'।</p>
<p>कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।</p>
<p>बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामजी लगायेंगे बेडा पार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 03:50:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[विश्वास धारण कर हृदय में
रामजी करेंगे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विश्वास धारण कर हृदय में<br />
रामजी करेंगे बेड़ा पार<br />
जलमार्ग हो या थल मार्ग या<br />
करना हो आकाश में<br />
बिना पंख विचरण<br />
कोई अगर बाधा होगी तो<br />
हृदय से स्मरण कर नाम का<br />
हो जाओगे उसके पार<br />
उनकी भक्ति में शक्ति अपार<br />
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार</p>
<p>तुम चाहोगे कि<br />
काम सब रामजी करें<br />
नाम तुम्हारा हो<br />
दूसरों के यकीन और भक्ति की<br />
परवाह नहीं<br />
बढाना चाहते अपना व्यापार<br />
दिखाते है लोगों को सपने<br />
लक्ष्य का पता नहीं अपने<br />
रामजी के नाम से बड़ा नामा<br />
क्या करेंगे लोगों का भला<br />
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार</p>
<p>रामजी ने कहा<br />
'मुझसे बडे हैं भक्त मेरे<br />
बिना लालच और लोभ<br />
मेरी भक्ति के भाव में पडे'<br />
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार<br />
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार<br />
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा<br />
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने<br />
पर हम तो उनकी शक्ति को माने<br />
भक्त तो नाम लेते हैं<br />
अभक्त भी लगाते पुकार<br />
पर उनसे भी क्या कहें<br />
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया<br />
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार<br />
रामजी की माया है अपरंपार<br />
अपने भक्तों के दें भक्ति<br />
और अभक्तों को माया के चक्कर में<br />
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार<br />
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह<br />
अपनी देह के अमर होने का भ्रम<br />
व्यापार ही जिनका धर्म<br />
भक्तों की भावनाओं बेखबर<br />
जिन्होंने तय कर लिया है कि<br />
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे<br />
रामजी के अलावा उन्हें<br />
कौन समझा सकता है कि<br />
यकीन कर लो<br />
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो<br />
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे</p>
<p>----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:46:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</guid>
<description><![CDATA[                     महाभारत ग्रंथ की रचना ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।</p>
<p align="justify">                 श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'<br />
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'</p>
<p align="justify">
              आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
</p>
<p align="justify">श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।</p>
<p align="justify">         महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है<br />
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।</p>
<p align="justify">
                गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
</p>
<p align="justify">                      भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रात:काल का आनंद ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 10:39:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के लिए अपने सामान के साथ पक्षियों के लिए दाना भी ला जाता हूँ। मुंडेर पर उन दानों को बिखेरने और पानी भर कर रखने के बाद अपनी योग साधना में तल्लीन हो जाता हूँ। उस समय अँधेरा होता है और जैसे ही थोडी रोशनी होनी शुरू होती हैं सबसे पहले गिलहरी का आगमन होता है। मेरे पास से निकलती गिलहरी दाने की तरफ जाती है तो मेरी तरफ देखती जाती है, पता नहीं क्या सोचती है और जैसे-जैसे मेरी तल्लीनता बढती है वैसे वैसे ही चिड़ियाओं के झुंड की आवाजें मेरे कानों में गूंजती है।</p>
<p>वह मुंडेर मेरे से दस फूट की दूरी पर है और वैसे कहते है कि योग साधना में कहीं ध्यान भटकना नहीं चाहिए पर मेरा मानना है कि इन पक्षियों का मेरे सामाजिक जीवन से कोई सरोकार नही है और उनकी तरफ ध्यान लगाना लगभग वैसा ही है जैसे दुनियादारी से ध्यान हटाना। कई बार तो मैं वहाँ पांच-छः प्रकार के पक्षी देखता हूँ, जिसमें तोता और कबूतर भी शामिल हैं। उनको देखकर जो मुझे अनुभूति होती है उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अगर मैं यह कहूं कि मेरा वह हर दिन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिऐ।</p>
<p>पता नहीं उनके मन में भी कुछ चलता है। जब मैं सर्वांगासन के लिए टांगें ऊपर किये होता हूँ तब चिड़ियायेँ बिल्कुल मेरी टांगों की पास से निकल जातीं हैं। उस समय मैं आंखें बंद किये होता हूँ तो डर जाता हूँ। मजे की बात यह है इतने सारे आसनों के बीच नही निकलतीं। उसके तत्काल बाद मैं शवासन करता हूँ , और उस समय भी वह ऐसा ही करतीं है । शवासन के समय कभी कभी गिलहरी भी छूकर भाग जाती है। मुझे उस समय हंसी आती है क्योंकि उनका इस तरह खेलना अच्छा लगता है। वैसे कई वर्ष से ऐसा हो रहा है पर मैं ध्यान नहीं देता था पर पांच-छः महिने पहले ऐक चिड़िया सर्वांगासन के समय मेरी टांग से टकराकर मेरे मुहँ पर गिरी और फिर भाग गयी। उसके बाद से मैंने उनकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। पहले तो दाना डालकर अपनी आँखें बंद कर योग साधना किया करता था। इन पक्षियों की चहचहाने की आवाज में जो माधुर्य है वह किसी संगीत में नहीं मिलता। और यह ऐक एसी फिल्म है जो कभी भी पुरानी होती नजर नहीं आती। ऐक एसा आनंद आता है जो अवर्णनीय है। शेष फिर कभी</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
