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	<title>hindi-blog &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-blog"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:33:05 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 19:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</guid>
<description><![CDATA[कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कलम और दवात लेकर<br />
जब निकले थे घर से तो<br />
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है<br />
लिखने बैठे बचपन  से<br />
अपने गुजारे लम्हों की कहानी<br />
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी<br />
भूल गए रोना क्या होता है<br />
देखा है बस एक ही सच<br />
काटता  है वही आदमी जो उसने बोया होता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता<br />
पर इसके लिए कोई काबिल भी  तो नजर आता<br />
जो बेचते हैं सम्मान<br />
उनको लिखना नहीं आता<br />
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर<br />
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता<br />
ऐसा लगता है कि<br />
पहले सम्मान की सोचते हैं<br />
बाद में लिखा होता है<br />
हम तो अपने  लिखे को कभी<br />
सम्मान के योग्य नहीं पाते<br />
तो सम्मान कहाँ से जुटाते<br />
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता<br />
होता समय नष्ट<br />
फिर हम दूसरों का लिखा  कहाँ पढ़ पाते<br />
और बिना पढे भला क्या लिख पाते<br />
जो पढ़ते बिलकुल  नहीं लिखते हैं जरूर<br />
उनमें आ जाता है गुरुर<br />
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं<br />
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ<br />
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते<br />
अपनी कमअक्ली का पता था<br />
इसलिए लिखना किया शुरू<br />
 शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु<br />
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है<br />
--------------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कविता का जन्म ही पीडा से होता है-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 17:17:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद ही मुझे लगने  लगा था कि ब्लोगरों पर भी व्यंग्य लिखना चाहिए पर लगा कि इतने सारे ब्लोगर हैं और कोई नाराज हो गया तो? इसलिए कुछ दिन खामोश रहा पर एक हैं क्योंकि मुझे लगा कि इससे मेरी शांति में खलल पडेगा. धीरे-धीरे मैंने अपने ऊपर ही ब्लोगर के रूप में व्यंग्य लिखना शुरू किया. मैंने व्यंग्य लिखना एक हास्य कविता से शुरू किया था जो एक ब्लोग से प्रेरित होकर लिखी थी.  एक ब्लोग है   आईना ब्लोग.  उन्होने मेरी एक पोस्ट के शीर्षक को दूसरे ब्लोग की पोस्ट  के शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया था.  उन्होने ऐसा अन्य   ब्लोगरों की पोस्ट के साथ भी किया था और यह बताया था कि किस तरह दो ब्लोग की  पोस्ट के शीर्षक विरोधाभासी  हैं.  उसमें मेरा सीधे मजाक उडाया नहीं गया था पर तब मैंने  पहली हास्य कविता अपने ब्लोग पर लिखी थी ''आईने में बदहवास दीपक बापू". उसके बाद तो मैंने एक के बाद एक हास्य कवितायेँ लिखीं. इसका मतलब सीधा है कि आईना ने मुझे हास्य कवितायेँ लिखने के लिए प्रेरित किया. </p>
<p>आज उसमें धुरविरोधी के लिए एक हास्य कविता थी और मुझे बहुत दिलचस्प लगी. धुरविरोधी एक प्रख्यात ब्लोगर रह चुके हैं और अब वह   ब्लोगवाणी(हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखाने वाला फोरम)के संचालक हैं-मुझसे मिलने वाले एकमात्र ब्लोगर श्रीसुरेश चिपलूनकर ने यही बताया था. तब मुझे लगा कि हो सकता है कि वह अनुमान के आधार पर कह रहे हैं. आज इस बात की पुष्टि हो गयी.   अगर मैं ब्लोगवाणी के संचालक को भुलाकर केवल धुरविरोधी की बात करूं तो मुझे उनकी याद है. ब्लोग जगत में सबसे अधिक सक्रिय ब्लोगर के रूप में रहे उस शख्स की कोई पोस्ट मैं इससे पढता वह ब्लोग बंद कर लापता हो गया. हुआ यह कि उस समय मैं समझ नहीं पा रहा था कि यहाँ क्या हो रहा है? उसके जाने के बाद मैंने उसे दिलचस्प व्यक्ति को उसकी कमेन्ट की माध्यम से जानने का प्रयास किया.मैंने वह सब पोस्टें देखीं जिस पर उनकी  कमेन्ट थी. उसकी विदाई पर कई ब्लोगरों ने विदाई का ऐसा ग़मगीन माहौल  बनाया कि अगर कभी हिन्दी ब्लोग जगत पर फिल्म बने और ऐसा दृश्य हो तो लोग रो पड़ेंगे. </p>
<p>लोगों की याददाश्त कमजोर होती है पर लेखक की नहीं. मेरे अन्दर उस समय धुर विरोधी के लिए ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. मैंने उसकी कमेन्ट  देखकर  महसूस किया कि यह शख्स कभी भी यहाँ से  छोड़ कर नहीं जायेगा. बिलकुल मेरी तरह नशेड़ी है लिखने का. धुरविरोधी के छद्म नाम है यह तो कोई भी कह सकता है इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि वह कहीं असली नाम से प्रगट होगा. वैसे धुरविरोधी ने हमेशा अपनी कमेन्ट में मेरी प्रशंसा की पर जिस मुद्दे पर वह विवाद कर रहे थे उसमें मैं उनसे असहमत था. सबसे बड़ी बात यह कि मैंने उस शख्स की कोई पोस्ट देखी नहीं थी और देखी तो याद नहीं थी पर इतना तय था कि धुरविरोधी की हिन्दी ब्लोग लेखन में प्रतिबद्धता निर्विवाद थी.<br />
प्रसंगवश याद आया कि मेरे एक अन्य मित्र अरुण  'पंगेबाज' ने भी बहुत शोर मचाया था-हम उसे नहीं जानते पर शायद मुम्बई में रहते हैं आदि-आदि. पंगेबाज और धुरविरोधी के अगर तेवर देखें तो ऐसा लगता है कि लडाकू होंगे पर अगर उनका लेखन की गहराई देखें तो ताज्जुब इस बात का होता है ब्लोग जगत के लोग उनको समझ नहीं पाए. हास्य का भाव स्वाभाविक रूप से पैदा करने की उनमें शक्ति है.  अगर किसी ने मुझे गलत जानकारी नहीं दी हो तो अरुण जी भी ब्लोगवाणी  से कहीं न कहीं जुडे हुए हैं. लिखने का मजा किस तरह उठाया जाता है यह इनसे सीखना चाहिऐ. अरुण पंगेबाज से मेरी दोस्ती अधिक नहीं है पर एक दो बार संपर्क से यह लग गया है कि वह भी मजे लेने वाले आदमी हैं.<br />
हाँ, एक बात जरूर हैं कि हिन्दी में फोरम चलाना आसान नहीं है और ऐसा लगता है कि दोनों अब लिख कम  ही पाते हैं. धुरविरोधी यानी ब्लोगवाणी  के  मैथिली जी आज उस आईने के निशाने पर हास्य कविता के रूप में आ गए जिसे मैंने कभी निशाने पर लिया था. सच तो यह कि मैं कविता पढ़कर हंस पडा. </p>
<p>मगर असली बात यह नहीं है जो मैं कह रहा हूँ.उस कविता में आईना के लेखक  की पीडा यह है कि उनका ब्लोग ब्लोग वाणी से अलग कर दिया गया है और वह कई ईमेल मैथिली जी को भेज चुके हैं पर वह लिंक नहीं हो रहा है. मगर यह सब उनके साथ नहीं हो रहा है. मेरे कई ब्लोग ऐसे हैं जिनके लिए मुझे ब्लोग वाणी को कई ईमेल करने पड़े. बाद में वह लिंक हो जाते हैं. अब यह तो समय की उपलब्धता का भी सवाल है कि लोगों को अपने अन्य  काम भी रहते हैं और हिन्दी ब्लोग जगत से अभी कोई विशेष आय होती  हैं नहीं. मगर जिस तरह आईना में कविता लिखी  गयी है उसे देखकर तो यही लगता  है कि <strong>कविता वास्तव में पीडा से पैदा होती है. इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्द अगर दुनिया से ख़त्म हो जायेगा तो कविता  ही नहीं पैदा होगी.</strong> </p>
<p><strong>हिन्दी ब्लोगर कई बार ऐसे सनसनी और रोमांच पैदा कर देते हैं कि लगता है  कि अब पता नहीं क्या होगा. कहीं हमला होता दिखाएँगे तो ऐसा कि आदमी घबडा जाये  कि पता नहीं क्या हुआ? पहले लहू लहान होने की खबर सारा दिन चलायेंगे फिर शाम को घोषणा कि चिंता की कोई बात नहीं है. मैं एक बात यकीन से कह सकता हूँ कि जब फिल्म वालों को कोई कहानी न नहीं मिलेगी  तब वह ब्लोगरों पर कहानी ढूंढेंगे तो कई वर्षों तक उनको कहानियों का टोटा नहीं पड़ेगा.</strong> बहरहाल किसी विवाद में पड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं और आज ऐसे ही खाली-पीली बैठा था तो सोचा कि अपने दोनों तरफ के मित्रों में जो द्वंद चल रहा है उस पर विचार करूं. फिर धुर विरोधी जिसने मुझे प्रेरित किया था और आईना जिसकी वजह से मुझे हास्य कविता लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई उन पर कुछ न कुछ तो लिखना ही था.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लिखने वाले हिट्स   की परवाह नहीं करते-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=478</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 15:17:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=478</guid>
<description><![CDATA[मैं सोचता हूँ कि ब्लोगरों के विषय पर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं सोचता हूँ कि ब्लोगरों के विषय पर कम लिखूं पर रोज कोई न कोई ऐसी बात होती है कि मुझे अपनी पुरानी लिखी बातें दोहरानी पड़ती हैं और कई बार तो ऐसा होता है  कि मैं शाम को घर लौटते समय कोई विषय सोचता हूँ पर यहाँ ब्लोग पर  कुछ  ऐसा देखता हूँ तो फिर इसी विषय पर लिखने बैठ जाता  हूँ। </p>
<p>आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने भी ब्लोग जगत से तौबा(अच्छा यह है कि उन्होने शायद शब्द जोडा है) करने का फैसला सुना दिया। मैं तो हतप्रभ रह गया क्योंकि वह अकेले ब्लोगर  हैं जिनसे मैं ग्वालियर में मिल चुका हूँ। पहले मैं उनको इतना नहीं पढता था  पर उनसे मुलाक़ात के बाद उनकी पुरानी और नई पोस्ट पढता रहा। उनके लिखे को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावी लगा और अगर कोई नया ब्लोगर होगा तो उसे सुरेश चिपलूनकर जी को आदर्श मानने के लिए कहूंगा। किसी भी फोरम पर हिट न मिलने का दुख उनको भी है। इस मामले में उनसे मुझे कोई हमदर्दी नहीं है और क्योंकि जैसा वह लिखते हैं उसकी उनको जरूरत नहीं है बल्कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि वह मुझ जैसे फ्लॉप ब्लोगरों से हमदर्दी जाता सकें। हम दोनों मिले पर किसी ने ब्लोगर मीट की रिपोर्ट नहीं छापी यह इस बात का प्रमाण है कि हम कितने सहज भाव के लोग हैं।   <strong>कहते हैं कि संयोग तो संयोग को ढूढ़ लेता है। </strong></p>
<blockquote><p><strong>राजीव  तनेजा, परमजीत बाली, रविन्द्र प्रभात, ममता श्रीवास्तव, घुघूती बासूती और उड़न तश्तरी मेरे ब्लोग पर निरंतर संपर्क में रहते हैं और  उससे ऐसा लगता है कि सहज भाव से लेखन करने वालों की रचना  में धार रहती है। दरअसल  उछलकूद करने वाले कम संख्या में रहते हैं पर दिखते अधिक हैं जबकि सहज भाव के लोग अधिक होते हैं पर दिखते कम  हैं।</strong></p></blockquote>
<p>पहले सुरेश चिपलूनकरजी के बारे में थोडी बात और कर लें।<br />
1.वह अपने ब्लोग अपने मित्रों को भेजते हैं और उनको वह  वहीं पढ़ते हैं और उनकी संख्या चारों फोरमों की सफलतम पोस्टों की हिट से अधिक होती है।<br />
2.वह व्यापक विषयों पर लिखते हैं और ब्लोग और ब्लोगरों पर कम ही लिखते हैं। विवादास्पद नहीं लिखते। जैसे-जैसे प्रसिद्धि मिलेगी आम पाठकों में उनको  बहुत पढा जायेगा। यह भी आज संयोग है कि मैं अपने मित्रों को अपने जिन ब्लोगों के पते दिए हैं उन पर उनको लिंक करने  वाला था और उन सबको कह भी दिया है।<br />
3.गहन अध्ययन कर लिखते हैं और उसके पाठक वैसे भी कम होते हैं। उन जैसा लेखन इन ब्लोगों पर मैंने नहीं देखा है पर वह अपने मित्रों के अलावा फोरमों पर  नये संपर्क समयाभाव के नहीं बना पाए। फोरमों पर तो अगर शीर्षक में ब्लोग लिखा हो तो वह हिट हो जाता है। सुरेश चिपलूनकर जी को तो मित्र लोग ईमेल पर ही पढ़ लेते है तो फिर उनको वहाँ हिट ब्लोग विषय पर लिखने से भी मिलेंगे इसमें संदेह है। फिर हम लोगों के मन में हिट है तो किसकी परवाह करते  हैं।<br />
४.ब्लागस्पाट पर होने के कारण वर्डप्रेस के ब्लोग उनके संपर्क में अधिक नहीं आ पाते। वर्डप्रेस के ब्लोगर अगर चौपालों पर जिसे नही देख पाते उसे अपने डेशबोर्ड पर भी देख लेते हैं पर अगर ब्लोगस्पॉट के ब्लोग चूक गए तो फिर उसे नहीं देख पाते।    </p>
<p>यह फोरम तो केवल आपस में मेल मिलाप की भूमिका तक ही ठीक हैं पर आपकी पोस्ट तो आगे भी जाती है। केवल ब्लोगर ही देखते हैं यह बात  नहीं है अन्य लोग भी देखते हैं। कमेन्ट देने वाले  ब्लोगर आपके मित्र की तरह हैं और आप जिन की पोस्टें हिट देखते हैं वह उनके मित्रों का परिणाम है  और  पहले अपने को तो हिट बना लें फिर किसी को बनाएं। इस हिट-फ्लॉप के चक्कर में पढना बेकार है। कौन कैसा लिख रहा है सब देख रहे हैं। </p>
<blockquote><p><strong>जहाँ तक लिख का समाज और लोगों को बदलने की बात तो यह एक भ्रम है कि हम अपने लिखे से कुछ बदल सकते हैं। अरे, इस समाज को भगवान  श्रीकृष्ण और श्रीराम और संत शिरोमणी कबीरदास और महान विचारक  चाणक्य अपने अनुभव और ज्ञान  की अनमोल संपदा सौंप गए तब उसके यह  हाल हैं तो वह किसके लिखने से बदलेगा। हाँ एक लेखक के  रूप में उस ज्ञान  की धारा को आगे बढाने का नैतिक कर्तव्य पूरा करना ही एक धर्म हैं। </strong></p></blockquote>
<p>लोगों पर प्रभाव पड़ता है और मैं कई पोस्टों से इतना प्रभावित होता हूँ कि कमेन्ट लिखते समय अगर वह लिखूं तो ब्लोगर कहेंगे कि  मजाक उड़ा रहा है।<br />
कल भी लिखा था और आज भी लिख रहा हूँ सौ से अधिक हिट भी हिन्दी में क्या मायने रखते हैं? जबकि यह करोडों लोगों की भाषा है। मजे के लिए लिखो तो खूब मजा आयेगा। लिखने का व्यसन तो मेरा पुराना है और यहाँ अपनी एक तरह से डायरी लिख रहा हूँ। ऐसे में  मित्रों का मिलना तो एक बोनस है और सुरेश चिपलूनकर जी से हुई भेंट और राजीव  तनेजा से फोन पर हुई बातचीत इसी लिखे का परिणाम है। </p>
<blockquote><p><strong>बस इतना इस विषय पर आज इतना  ही। इस विषय पर इसी ब्लोग पर  मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि चौपालों के हिट या फ्लॉप एक भ्रम है। मैं उम्मीद करता हूँ कि सुरेश चिपलूनकर जी आगे भी लिखना जारी रखेंगे।           </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब  आम पाठक ही तय करेंगे अपनी पसंद ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=477</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 16:20:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=477</guid>
<description><![CDATA[इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिसमें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं होती और यह बिना पैसे का सम्मान दिलवाता है। मैं भी लिखता हूँ इसलिए अंतर्जाल हो या निजी जीवन उसमें  अगर कुछ प्रशंसक हों तो आश्चर्य की बात नहीं है। आजकल अंतर्जाल के बाहर कुछ नहीं लिख रहा तो कुछ   निजी प्रशंसक रोज टोकते हैं कि वहाँ लिखो तब हो सकता है कि अंतर्जाल पर भी कुछ लोग हों जो बार-बार प्रेरित करने के लिए नाम बदलकर पुरानी पोस्टों पर कमेन्ट  लिखते हुए  तारीफों के पुल बाँध देते हैं। उनका लिखा गया कमेन्ट  ब्लोगरों की कमेन्ट से अलग होता है और चूंकि यहाँ तमाम तरह के ऐसे प्रयास हो सकते हैं जिनका परीक्षण करना मुश्किल है कि वह वास्तव में आम पाठक हैं या कोई मित्र ब्लोगर  हैं।<br />
यह भी संभव  है कि अंतर्जाल  पर मैं हिन्दी में कुछ भी लिखता रहूँ उसके लिए कुछ लोग-हो सकता है वह कहीं नौकरी करते हों  जहाँ नियोक्ता की तरफ से अपने संभावित आर्थिक लाभ के लिए अन्य कामों साथ  ब्लोगरों को प्रोत्साहित  करने का काम भी उनको सौंपा गया हों- सक्रिय हों और मेरे साथ अन्य लोगों  को भी सन्देश भेजते हों। अगर मैं बिलकुल निराशाजनक स्थिति की कल्पना करू तो यही लगता है-और यह कल्पना ही है। </p>
<p>अगर ऐसा नहीं है और उनमें वास्तविकता है तो मानना पडेगा कि हिन्दी ब्लोग जगत अब दिलचस्प दौर में पहुँचने वाला है और देश के करोडों हिन्दी भाषी ही- जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन हैं- अब यह तय कर सकते हैं कि कौन अंतर्जाल पर उनके  पसंदीदा ब्लोग  लेखक है। आम पाठक अब हिन्दी की तरफ बढ़ रहा है। अगर कोई व्यवासायिक रूप से हमें गुमराह नहीं कर रहा हो तो गूगल से हिन्दी के शब्दों से भी तलाश हो रही है। हिन्दी साहित्य की   हर विधा के शब्द-हिन्दी कविता, कहानी, हास्य व्यंग्य, आध्यात्म, रहीम, कबीर, चाणक्य, मनु स्मृति, विदुर नीति तथा अन्य अनेक शब्दों के रास्ते  अपने सब ब्लोगों पर आम पाठकों को आते देखता हूँ। इसके अलावा असंख्य शब्द और भी हैं। इनको अंग्रेजी शब्दों से भी ढूंढते हैं। कभी कभी कुछ धार्मिक प्रुवृति के लोग भी तारीफ़ कर जाते है तो कुछ अपने नाम के आगे संत की पहचान वाले स्थापित कर आशीर्वाद दे जाते हैं। </p>
<p>मैं  यह सब देख रहा हूँ और जैसा कि  पहले ही लिखा है कि संशय मेरे मन में रहता है, पर अगर उससे दूर हट कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि  अब अच्छा लिखना शुरू करूं। व्यंग्य, कहानी और चिंतन लिखना शुरू करूं फिर बात वहीं आकर अटकती हैं कि इतनी मेहनत करने के बाद भी क्या मैं यह देख पाऊंगा कि आम पाठक उसे पढ़ रहा है कि नहीं।हर  आम पाठक कमेन्ट नहीं लिख सकता और क्या वाकई वह हममें  दिलचस्पी ले रहा है इसको समझ पाना मुशिकल है। इसके बावजूद मैंने अपने सभी निज-पत्रक(ब्लोग) दिखाने वाले फोरमों और वेब साईटों की हिट्स की परवाह किये बिना कई पोस्ट लिखीं हैं। मैंने फोरमों से अलग ब्लोगों पर भी अपनी पोस्टों पर  लोग आते देखे हैं। एक संशय होता है कि क्या वह ब्लोग वाकई लोग देख रहे हैं। बीच-बीच में उन पर पोस्ट डाल  देता हूँ और भुला देता पर जब उन पर व्युज  देखता हूँ कि वह कोई कम नहीं होते। चौपालों और वेबसाईटों   पर त्वरित पाठक मिलने से ध्यान बँटा रहता है इसलिए आम पाठक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। चौपालों से अलग ब्लोग पर लोग आते हैं पर कब पता नहीं चलता। इसमें नीरसता का बोध होता है जबकि चौपालों पर मित्रों के ब्लोग पढ़ते हुए, उन पर कमेन्ट देते हुए और दूसरों को हिट और अपने को फ्लॉप देखने में जो आनंद आता है वह अवर्णनीय  हैं पर इसके बावजूद  नारद, ब्लोग वाणी, चिट्ठा जगत, और हिन्दी ब्लोग पर हम सब ब्लोगर किसी भी पोस्ट के निर्णायक नहीं है इस सत्य को स्वीकार  कर लेना चाहिए। कल मैंने  जो पोस्ट डाली थी उस पर  कल और आज कुल   ४२ हिट्स हैं, और उस ब्लोग पर दोनों दिन  मिलाकर  १३७ व्युज हैं-मतलब चौपालों से बाहर ९५ व्युज  और भी हैं।</p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि इन चौपालों का उपयोग केवल हम लोगों के आपसी मिलन के लिए है और यहाँ हिट्स और पसंद के चक्कर में पड़ने  की  बजाय करोडों  हिन्दी भाषी पाठकों को लक्ष्य कर लिखने वाले ही स्थाई हिट्स ले सकते हैं। चौपाल पर कितने हिट्स मिल सकते हैं? शायद ही किसी को सौ से अधिक मिल सकते हैं और इतने बडे देश में उसके क्या मायने हो सकते हैं। बात तो तब  बनेगी  जब रेल, बस, हवाई जहाज और अन्य  सार्वजनिक स्थानों पर चर्चा हो कि देखो हम अमुक ब्लोगर को पढ़ते हैं या अमुक ब्लोगर की वह पोस्ट अच्छी थी। कुछ ऐसे  ब्लोगर  मैंने  देखें हैं जो आगे चलकर वाकई नाम करेंगे।  इसलिए  लिखो तो आम लोगों के पढ़ने के लिए लिखो। कविता, कहानी, व्यंग्य, और उपन्यास लिखो। एक बात जो इस माध्यम में होगी, वह यह कि लिखना छोटा ही है और न पूरा हो तो अगले दिन के लिए रख लो। जरूरी नहीं है कि एक दिन में सब पूरा हो। यहाँ पसंद और हिट का खेल तो चलता रहेगा इसे देखो और मजे लो इसलिए मैं कभी भी किसी भी फोरम द्वारा व्युज और हिट्स दिखाने का विरोध नहीं करता। मैं जब इन फोरमों  पर आता हूँ तो कभी भी अपने हिट्स पर ध्यान ही नहीं देता बल्कि दूसरों के हिट्स देखकर खुश होता हूँ। मैं और मेरी पोस्ट अपनी स्थिति के अनुसार फ्लॉप हैं पर इन चौपालों से बाहर के खेल पर मेरी नजर रहती है और देखना है कि आगे क्या होता है? (क्रमश:)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल से सम्मान करे वही है सच्चा  वीर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 14:18:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</guid>
<description><![CDATA[फटे हुए कपडे पहने
चक्षुओं से अश्रु प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फटे हुए कपडे पहने<br />
चक्षुओं से अश्रु प्रवाहित करता हुआ<br />
फंदेबाज आ पहुंचा और  बोला<br />
''दीपक बापू आज हमारी बात मान लो<br />
हम पत्नी पीडितों का दर्द भी जान लो<br />
लिखो  महिला दिवस पर हास्य कविता<br />
करो हमारे दर्द का हरण<br />
नहीं तो हम मर  जायेंगे''</p>
<p>घर के बाहर पहुंचे थे उसी समय<br />
धूप में सायकल चलाकर<br />
पोंछ रहे थे पसीना बीडी जलाकर <br />
और धुआं छोड़ते  हुए बोले दीपक बापू<br />
''अभी तो घर में घुसे और तुम आ गए<br />
कहते हो हास्य कविता लिखो<br />
भूल गए कितने उस पर व्यंग्यबाण चला गए<br />
फिर भी बताओ माजरा क्या है<br />
लिखने की सोचेंगे अगर समझ जायेंगे''</p>
<p>बोला फंदेबाज<br />
''दीपक बापू<br />
आज है महिला दिवस<br />
हमने रास्ते  में दी अपनी<br />
एक पढी-लिखी  पडोसन को उसकी बधाई<br />
बीबी तो कम पढी लिखी है<br />
क्या जानती है इस बारे में<br />
इसलिए हमने इस बारे में<br />
कोई बात नहीं बताई<br />
पडोसन ने जाकर  बता दिया घर पर<br />
सास भी थी वहीं<br />
हुआ घमासान<br />
हमारी हो गयी  पिटाई<br />
आज है तुम्हारी हास्य कविता का सहारा<br />
तुम लिखो तभी हम घर जायेंगे<br />
नहीं तो कही भाग जायेंगे''</p>
<p>पहले ही थे पसीना और निकलने लगा<br />
अपनी धोती कसते  और टोपी संभालते<br />
और हँसते हुए बोले-<br />
''तुम भी हो नालायक<br />
भला क्या जरूरत थी जो दी बधाई<br />
शैतान भी दस घर छोड़  देता है<br />
मूर्ख ही है वह जो  पड़ोस में पंगा लेता है   <br />
वैसे तुम्हारी पत्नी कम पढी-लिखी है<br />
पर समझदार है<br />
मेरी तरफ से उनको देना बधाई<br />
हम उनको मानते हैं<br />
तुम्हारी  नालायकी को भी हम जानते हैं<br />
इसलिए पुरुष दिवस की बात तुमको नहीं बताई <br />
तुम्हें पडी  मार भी असरदार है<br />
 जिन हास्य कविताओं पर हँसते थे<br />
उसी की शरण में आये हो<br />
मगर गलत समय पर आये हो<br />
हम हास्य कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
समझदार महिलाओं पर हम क्या लिख पायेंगे</p>
<p>सुना है कहीं<br />
पत्नी पीड़ित अपना दर्द सुनाने के लिए<br />
महिलाओं को बाँट रहे हैं फूल<br />
हम नहीं बरसा सकते शब्द रूपी शूल<br />
वैसे भी क्या गम जमाने में<br />
जो बैठे बिठाए मुसीबत बुलाएं<br />
महिला दिवस पर कविता आजमाने में<br />
हमारे घर पर ऐसे लफड़े नहीं होते<br />
कि  तुम्हारी तरह रोते<br />
इधर-उधर मुहँ से कहने की बजाय<br />
लिखकर ही कविता में सजाते हैं बधाई<br />
यही है हमारी कमाई<br />
अब तुम निकल लो यहाँ से <br />
घर पर सुन लिया कि  तुम<br />
हास्य कविता लिखवाने आये हो<br />
तुम्हारे साथ हम भी फंस जायेंगे <br />
 यहाँ से भी कट जायेगा तुम्हारा  पता<br />
फिर हम तुम्हें चाय भी नहीं पिला पायेंगे<br />
वैसे ही है महिलाओं के अधिकार का प्रश्न गंभीर<br />
महिलाओं का स्वभाव होता है कोमल और  धीर<br />
कह गए हैं बडे-बडे विद्वान<br />
महिला का  दिल से सम्मान करे<br />
वही  है सच्चा  वीर<br />
जो अब तक संसार  नहीं समझ पाया  <br />
तुम और हम क्या समझ पायेंगे<br />
हम इस पर हास्य  कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
------------------------------------------<br />
 <strong>नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नंबर १३६ चलेगा नहीं बल्कि  दौड़ेगा-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/03/05/nanbar-136-chalegaa-naheen-balki-daudegaa-haasya-vyangya/</link>
<pubDate>Tue, 04 Mar 2008 16:15:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/03/05/nanbar-136-chalegaa-naheen-balki-daudegaa-haasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[भारत का सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है? ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत का सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है? किसी साईट में शायद कोई भारत के हिन्दी ब्लोगरों के अते-पते प्रकाशित हुए हैं उसके कर्णधारों   को पता नहीं है और या छुपा रहे हैं कि भारत के हिन्दी ब्लोगों में सबसे लोकप्रिय ब्लोग किसी चौपाल पर पंजीकृत नहीं है.  अब मैं व्यंग्य लिखना नही चाहता पर ब्लोग के मित्र हो या निजी, शरारत करने से बाज नहीं आते तो फिर मैं ही क्यों संयम दिखाऊँ. ठोक ही देता हूँ व्यंग्य.</p>
<p>निजी मित्र कहते हैं कि तुम और कुछ नहीं केवल चिंतन लिखो और यह भी कि केवल  ब्लोगरों के लिए मत लिखो हमारी समझ में नहीं आता. ब्लोग मित्र भी साफ नहीं लिखते पर जहाँ महापुरुषों के साथ कहीं थोडा भी चिंतन होता है वहाँ कमेन्ट बडे उत्साह से  लगाकर अप्रत्यक्ष संकेत दे जाते हैं कि कुछ अपना लिखा करो. अब मैंने सोचा था यही करेंगे और बेकार हैं व्यंग्यों पर अधिक मेहनत करना. इतने सारा लिखा पर नतीजा १३६ नंबर. चलो कोई बात नहीं पर तिस पर हमारे प्रिय श्री   अनिल रघुराज जी जैसे मित्र चिट्ठी डाल गए जैसे कह रहे हों'आकर देखो अपना हाल.'' </p>
<p>उनके ब्लोग पर गए अपने हाल देखे. फिर उस साईट पर गए जहाँ से कभी-कभी एकाध बार व्युज आया है और वह भी शायद तब जब वह लिंक  कर रहे होंगे. आप नहीं जानते पर ब्लोग पर कुछ लोग जानते हैं कि सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है. गाहे-बगाहे उसकी चर्चा हुई है. अब अधिक पोल मत खुलवाओ क्योंकि उसकी चर्चा अपने फोरमों पर हो चुकी और उसकी प्रसिद्धि  खामख्वाह में बढ़  जायेगी. हाँ एक बात बता देता हूँ कि अपना भी कोई  ब्लोग कभी  शिखर पर आएगा.  मैं भी अब नये प्रयोग कर रहा हूँ और इसमें कितनी सफलता मिलेगी यह अलग बात है. इशारों में बात है और कुछ लोग इसे समझेंगे ही. अंतर्जाल है कि इन्द्रजाल शीर्षक से लेख मैंने ऐसे  प्रयोग से प्रभावित होकर ही लिखा था.</p>
<p>जैसे-जैसे आगे जा रहा हूँ नित नयी सूचनाएं आतीं हैं. मुझे ऐसा याद आ  रहा है कि मैंने अपने किसी साथी ब्लोग की पोस्ट में पढा था कि अब कोई ऐसा टूल आ रहा है जिसमें किसी भी भाषा में पढ़  सकते हैं. मतलब अगर हम हिन्दी में लिख रहे हैं तो उस कोई अंग्रेज उस टूल से पढ़ सकता है.  फिर उस दिन एक भारत का एक अंग्रेजी ब्लोगर कमेन्ट में लिख गया कि ''A language is not a problem for communication nowadays, There are various advanced tools available for removing the language barrier, the problem is different. Most of the people are either not aware of these tools or they don’t know how to use them.<br />
Like the google transliteration features an embedded dictionary which accompanies the writer to write without flaws. With the increasing intelligence in the tools, I hope, it will be easier in upcoming days.''</p>
<p>मैंने उस ब्लोगर का नाम इसलिए नहीं दिया क्योंकि अभी एक  अन्य  अंग्रेजी ब्लोगर मित्र प्रीतम पी  हंस जी की कमेन्ट को पोस्ट में डाला तो अब उन्होने भी अपना के हिन्दी ब्लोग शुरू कर दिया है. अब मैं  किसी अंग्रेजी लेखक को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं बनाना चाहता. वैसे ही तो फ्लॉप  हैं. अभी तो १३६ पर हैं कहीं १३७ पर पहुंच गए तो. इससे तो अच्छा है अंग्रेजी वाले को वहीं लिखने दें.    </p>
<p>अब बात करें इस टूल की तो पता नहीं आया है क्या? पर कभी-कभी एकदम अंग्रेजी के नाम से सुशोभित कुछ कमेन्ट देखकर विचार उठता  है कि क्या उन्होने मेरी रचनाएं पढी होंगी? उनके लिखे से ऐसा लगता है कि  उन्होने पढा होगा. हो सकता है कि कुछ लोगों के पास ऐसा टूल हो और उसकी मुझे तो जरूरत नहीं है क्योंकि अभी में हिन्दी का ही पूरा नहीं पढ़ पाया तो अनुवाद कर क्या पढूंगा? मेरी रचनाएं चोरी भी नहीं होती कि अंग्रेजी वाले उसे उठाएंगे. हाँ  जिनकी रचनाएं चोरी होतीं हैं उन्हें चेत जाना चाहिऐ. </p>
<p>आप बात करें लोकप्रियता की. हम जिस राह  पर चल रहे हैं उसका अनुमान किसी को नहीं है कि वहाँ कहाँ जाती है. लोकप्रियता का कोई पैमाना नहीं है. कोई नंबर वन पर नहीं  होगा और होंगे तो उनकी संख्या कम से कम  १०८ होगी. मेरा शब्द्लेख सारथी ब्लोग मेरा सबसे लोकप्रिय ब्लोग हैं और उसके बाद आता हैं अनंत शब्द  योग का. यह ऐसे दो ब्लोग हैं जिन पर मैं नियमित नहीं भी लिखू  तो हिट्स आते हैं. इनसे ही मुझे समझ में आता है कि ब्लोग पर लिखी  जाने वाली सामग्री का क्या महत्त्व है.</p>
<p>भारत के सबसे लोकप्रिय ब्लोग का नाम मैं इसलिए नहीं दे रहा क्योंकि अब जैसे-जैसे लिखते जा रहे हैं वह जल्दी अपनी आभा खो  बैठेगा क्योंकि वह तब शुरू किया गया होगा जब हिन्दी में इतनी सामग्री नहीं होगी जितनी अब हैं. उस ब्लोग पर मैं एक अन्य  ब्लोग पर लिखे पते से ही गया था. एक अन्य ब्लोग से जानकारी आई कि वह हिट क्यों है? एक भ्रम शायद ब्लोगरों को है कि केवल चौपाल पर ही हम लोग एक-दुसरे को पढ़ते हैं और आम पाठक कोई नहीं है. मैं अपनी पोस्टों में इसका उल्लेख करता  आया हूँ  कि जिन पोस्टों को फोरमों पर दस व्युज  भी नहीं मिलते वह महीनों तक उससे अधिक तो आम पाठक द्वारा पढी जातीं है और उके लिए ब्लागरों से मिलने वाली तात्कालिक टिप्पणी  का मोह छोड़ना जरूर होता है.  </p>
<p>मैं अंतर्जाल पर हिन्दी के भविष्य को लेकर बिलकुल चिंतित नहीं हूँ इसलिए लिखता जा रहा हूँ और  सबको भी यही सलाह देता हूँ कि तुम लिखते जाओ. बाकी उस वेब साईट के बारे में तो कई लोग लिख चुके हैं. अंतर्जाल और कौन किसको देख रहा है. कोई भी वेब साईट बना सकता है और हिन्दी के ब्लोग को अपने हिसाब से लिख सकता है. वैसे १३६ नंबर में १३ का अंक मुझे फलता नजर आ रहा है इसलिए लिख रहा हूँ कि कहीं हो सकता है कि नंबर सीधे १३ पर आ जाये. एक नंबर तो खैर क्या बनेगा.  कम से कम एक बात की तो खुशी है कि श्री अनिल रघुराज जी नी अपनी पोस्ट में हमारे ब्लोग को सम्मान दिया. इससे अधिक हमें क्या चाहिऐ.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना नाम भी होगा-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 15:27:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखने वाले एक
कविनुमा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर लिखने वाले एक<br />
कविनुमा ब्लोगर को भी<br />
आयोजकों ने कविसम्मेलन में बुलाया<br />
जब वह भी पहुंचा मंच पर तो<br />
कवियों को बहुत गुस्सा आया<br />
एक बोला<br />
''इसे उतारों यहाँ से<br />
यह यहाँ क्यों आया<br />
यह जमीनी कवियों का सम्मेलन में<br />
अंतर्जाल पर लिखने वाला क्यों बुलाया''</p>
<p>आयोजक ने कहा<br />
''अब साहित्य अंतर्जाल पर छा जायेगा<br />
आप लोगों की रचनाएं यही वहाँ पहुंचा पाएगा<br />
एक-दो कविता  सुना लेने दो<br />
कौन लोग याद रखेंगे<br />
अखबारों में कल कवियों के रूप में<br />
आप के ही नाम छपेंगे<br />
बाद में यह हमारे कार्यक्रम की<br />
खबर अपने ब्लोग पर लिखेगा<br />
इसका नाम तो है छद्म और वह भी<br />
ऐसी जगह पर जहाँ कोई नहीं पढेगा<br />
इसके लेख में हमारा नाम ही दिखेगा<br />
इसलिए इसे बुलवाया''</p>
<p>सुनकर ब्लोगर को गुस्सा आया<br />
और चिल्लाकर बोला-<br />
''इतना सस्ता समझ लिया है<br />
एक कविता सुनाने के लिए यह सब<br />
कैसे  कर जाऊंगा<br />
अरे, मैं तो लिखता हूँ वहाँ रोज नया<br />
यह एक कविता लिखते हैं<br />
उसे कई-कई बार अनेक जगह पर<br />
सुनाते दिखते हैं<br />
जब अंतर्जाल पर साहित्य छा जायेगा<br />
तब मेरा नाम भी आएगा<br />
नहीं छपेगी किताब मेरी तो क्या<br />
मेरा लिखा आसमान में तो लहरायेगा<br />
वैसे भी मैं  यहाँ सुनाने नहीं सुनने आया<br />
पर लगता है की अभी इनको कोई इल्म नही है<br />
अंतर्जाल ने अपनी रचनाएं  छपने के लिए<br />
दूसरों के आगे झुकने से बचाया<br />
 दूसरी जगह जाकर भीड़ में<br />
जाकर शब्दों का मेले लगाने से हटाया<br />
कभी-कभी होते हैं साहित्य और कवि  सम्मेलन<br />
नारद, ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग्स ने<br />
हमें रोज साहित्यकारों से मिलने का मौका दिलाया<br />
अब मैं जाता हूँ क्योंकि उससे कीमती वक्त<br />
निकालकर  यहाँ किसी तरह आया.''    </p>
<p>नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो उसके लिए वही जिम्मेदार होगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[ संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल:आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/16/sanskruti-aur-sanskar-bachane-ka-saval-hindi-article/</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 14:58:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/16/sanskruti-aur-sanskar-bachane-ka-saval-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर के अनुसार सऊदी अरब में वेलेंटाइन डे पर उसे मनाने से रोकने के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए-गुलाब के फूलों की बिक्री रोकी गयी और लाल रंग के कागज़ के रैपर में उपहार बेचने पर पाबंदी लगाई गयी. हमारे देश में भी कई लोग इसका विरोध करते हैं और उसे रोकने के लिए वह उपाय करते हैं जो मेरे विचार से अनुचित है. वेलेंटाइन डे पर कल मैंने दो हास्य कवितायेँ लिखीं थी और मैं इसका विरोध या समर्थन करने की बजाय इसकी उपेक्षा करने का पक्षधर रहा हूँ. मेरे लिए इसे मनाने वाले हंसी के  पात्र हैं एक तरह से प्यार का ऐसा नाटक करते हैं जिसके बारे में वह खुद नहीं जानते. </p>
<p>मैं इस बात के विरुद्ध हूँ कि किसी को ऐसे कार्य से जबरदस्ती रोका जाये जिससे  किसी दूसरे को कोई हानि होती है. स्पष्टत: मैं वेलेंटाइन डे का पक्षधर नहीं हूँ और कभी-कभी तो लगता है कि इसके विरोधियों ने ही इसको प्रोत्साहन दिया है. यह पांचवां  वर्ष है जब इसे इतने जोश-खरोश से मनाया गया. इससे पहले क्यों नहीं मनाया जाता था? साफ है कि इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों को रोज कुछ न कुछ  कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रचार करते हैं. होटलों और अन्य व्यवसायिक स्थानों पर युवा-युवतियों की  भीड़ जाती है. पार्क और अन्य एकांत स्थान पर जब खतरे की आशंका देखते हैं तो वह पैसा खर्च करते हैं. आखिर उसका फायदा किसे होता है?<br />
हमारे में से कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने आज से दस वर्ष पूर्व वेलेंटाइन डे का नाम भी सुना हो. अब उसका समर्थन और विरोध अजीब लगता है. जहाँ तक देश की संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मुझे जबरन विरोध कोई तरीका नजर नहीं आता. इससे तो उसे प्रचार ही मिलता है. फिर आम आदमी जो इसे नहीं जानता वह भी इसका नाम लेता है. कई लोगों ने इसका आपसी चर्चा में जिक्र किया और मैंने सुना. मुझे लगता है कि इस तरह इसे और प्रचार मिला. </p>
<p>जहाँ तक संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मैं इसे भी वाद और नारों में लिपटे शब्दों की तरह देखता हूँ. आप यह कह सकते हैं कि मैं हर विषय पर वाद और नारों से जुडे होने की बात क्यों लिखता हूँ. तो जनाब आप  बताईये कि बच्चों को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का काम किसे करना चाहिऐ-माता-पिता को ही न! इस तरह जबरन विरोध कर आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि कुछ लोग हैं जो इस काम में नाकाम रहे हैं. दूसरी बात आखिर संस्कारों और संस्कृति का व्यापक रूप लोगों के दिमाग में क्या है यह आज तक कोई नहीं बताया. बस बचाना है और शुरू हो जाते हैं. आखिर इसकी उपेक्षा क्यों नहीं कर देते. एक दिन के विरोध से क्या हम समाज में जो नैतिकता का पतन हुआ है उसे बचा सकते हैं? कतई नहीं, क्योंकि हम अपने समाज के उस खोखलेपन को नहीं देख रहे जो इसे ध्वस्त किये दे रहा है. देश में कन्या के भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं पर उसमें  कामयाबी नहीं मिल रही है. जिस दहेज़ प्रथा को हम सामान्य मानते हैं उससे जो विकृति आई है उस पर कभी किसी ने सोचा है?इसने समाज को बहुत बुरी तरह खोखला कर दिया है. </p>
<p>हम सऊदी अरब द्वारा लगाए प्रतिबन्ध की बात करें. वहाँ कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहाँ  भी इस बीमारी ने अपने कदम रखे हैं तो इसका सीधा मतलब यही है कि बाजार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पूंजीवर्ग के सदस्य  ही विजय श्री प्राप्त करते  है. इस प्रसंग में एक बात जो महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब में  एक धार्मिक राज्य होते हुए भी वहाँ क्यों लोग इसके प्रति आकर्षित हुए? विश्व में उदारीकरण के नाम पर  बाजार के ताकतवर लोगों के द्वार सब जगह खुले हैं पर आम आदमी के लिए नहीं. इसलिए बाजार की व्यवस्था वह सब परंपराएं और विचार लेकर आगे बढ़ रही है जो उसके लिए आय के स्त्रोत बना सकते हैं.<br />
इसका मुकाबला करना है तो उसके लिए उन लोगों को खुद दृढ़ हो होना पडेगा जिन पर अपने बच्चों पर संस्कार डालने की जिम्मेदारी है. अपने घर और बाहर अपने बच्चों को अपने आध्यात्म से अवगत कराये बिना उनको ऐसे  हास्यास्पद काम से दूर नहीं रखा जा सकता. सुबह और शाम आरती जो लोग पहले करते थे उसे फिजूल मानकर अब छोड़ दिया गया है पर आदमी के मन में संस्कार भरने का काम उसके  द्वारा किया जाता था वह अनमोल था.  कभी बच्चे को मंदिर ले जाया जाता था तो कभी तीज-त्यौहार   पर बडों के चरण स्पर्श कराये जाते थे. अब सब बातें  छोड़ उसे अपना काम सिद्ध करने का ज्ञान दिया जाता है और फिर जब वह छोड़ कर बाहर चला जाता है तो अकेलेपन के साथ केवल उसकी यादें रह जातीं हैं. </p>
<p>संस्कारों और संस्कृति के नाम पर वह फसल हम लहलहाते देखना चाहते हैं जिसके बीज हमें बोये ही नहीं. आखिर हमारे संस्कारों और संस्कृति की कौनसी ऐसी फसल खड़ी है जिसे बचाने के लिए हम हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं. अपने आध्यात्म से परे होकर हमें ऐसी आशा नहीं करना चाहिए. याद रखना पूरी दुनिया भारत की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा मानती है पर अपने देश में कितने लोग उससे परिचित हैं इस पर विचार करना चाहिए. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नमस्कार! - Blogging in Hindi]]></title>
<link>http://naamtobatao.wordpress.com/?p=28</link>
<pubDate>Sat, 26 Jan 2008 22:23:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>Arpit</dc:creator>
<guid>http://naamtobatao.wordpress.com/?p=28</guid>
<description><![CDATA[मेरे ब्लोग पर आपका स्वागत हैं|
आशा करत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><font size="5">मेरे ब्लोग पर आपका स्वागत हैं&#124;</font></p>
<p><font size="5">आशा करता हूं िक आपका िदन सुखद रहे!</font></p>
<p><font size="5">ये मेरी पह्ली कोिशश हैं िह्न्दी मै िलखने की... इसिलये कोई गलती हो तो माफ कर देना&#124;</font></p>
<p><font size="5">- <b>अिपॅत</b></font></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मलयवती - सताइसवीं पुतली ]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/12/11/%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 08:59:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2007/12/11/%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- </p>
<p>विक्रमादित्य बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा था और राज-काज चलाने में उनका कोई मानी था। वीरता और विद्वता का अद्भुत संगम थे। उनके शस्त्र ज्ञान और शास्त्र ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी। वे राज-काज से बचा समय अकसर शास्त्रों के अध्ययन में लगाते थे और इसी ध्येय से उन्होंने राजमहल के एक हिस्से में विशाल पुस्तकालय बनवा रखा था। वे एक दिन एक धार्मिक ग्रन्थ पढ़ रहे थे तो उन्हें एक जगह राजा बलि का प्रसंग मिला। उन्होंने राजा बलि वाला सारा प्रसंग पढ़ा तो पता चला कि राजा बलि बड़े दानवीर और वचन के पक्के थे। वे इतने पराक्रमी और महान राजा थे कि इन्द्र उनकी शक्ति से डर गए। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे बलि का कुछ उपाय करें तो विष्णु ने वामन रुप धरा। वामन रुप धरकर उनसे सब कुछ दान में प्राप्त कर लिया और उन्हें पाताल लोक जाने को विवश कर दिया।</p>
<p>जब उनकी कथा विक्रम ने पढ़ी तो सोचा कि इतने बड़े दानवीर के दर्शन ज़रुर करने चाहिए। उन्होंने विचार किया कि भगवान विष्णु की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया जाए तथा उनसे दैत्यराज बलि से मिलने का मार्ग पूछा जाए। ऐसा विचार मन में आते ही उन्होंने राज-पाट और मोह-माया से अपने आपको अलग कर लिया तथा महामन्त्री को राजभार सौंपकर जंगल की ओर प्रस्थान कर गए। जंगल में उन्होंने घोर तपस्या शुरु की और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। उनकी तपस्या बहुत लम्बी थी। शुरु में वे केवल एक समय का भोजन करते थे। कुछ दिनों बाद उन्होंने वह भी त्याग दिया तथा फल और कन्द-मूल आदि खाकर रहने लगे। कुछ दिनों बाद सब कुछ त्याग दिया और केवल पानी पीकर तपस्या करते रहे। इतनी कठोर तपस्या से वे बहुत कमज़ोर हो गए और साधारण रुप से उठने-बैठने में भी उन्हें काफी मुश्किल होने लगी। धीरे-धीरे उनके तपस्या स्थल के पास और भी बहुत सारे तपस्वी आ गए। कोई एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या करने लगा तो कोई एक हाथ उठाकर, कोई काँटों पर लेटकर तपस्या में लीन हो गया तो कोई गरदन तक बालू में धँसकर। चारों ओर सिर्फ ईश्वर के नाम की चर्चा होने लगी और पवित्र वातावरण तैयार हो गया।</p>
<p>विक्रम ने कुछ समय बाद जल भी लेना छोड़ दिया और बिलकुल निराहार तपस्या करने लगे। अब उनका शरीर और भी कमज़ोर हो गया और सिर्फ हड्डियों का ढाँचा न आने लगा। कोई देखता तो दया आ जाती, मगर राजा विक्रमादित्य को कोई चिन्ता नहीं थी। विष्णु की आराधना करते-करते यदि उनके प्राण निकल जाते तो सीधे स्वर्ग जाते और यदि विष्णु के दर्शन हो जाते तो दैत्यराज बलि से मिलने का मार्ग प्रशस्त होता। वे पूरी लगन से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तपस्यारत रहे। जीवन और शरीर का उन्हें कोई मोह नहीं रहा। राजा विक्रमादित्य का हुलिया ऐसा हो गया था कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि वे महाप्रतापी और सर्वश्रेष्ठ हैं।</p>
<p>राजा के समीप ही तपस्या करने वाले एक योगी ने उनसे पूछा कि वे इतनी घोर तपस्या क्यों कर रहे हैं। विक्रम का जवाब था- "इहलोक से मुक्ति और परलोक सुधार के लिए।" तपस्वी ने उन्हें कहा कि तपस्या राजाओं का काम नहीं है।राजा को राजकाज के लिए ईश्वर द्वारा जन्म दिया जाता है और यही उसका कर्म है। अगर वह राज-काज से मुँह मोड़ता है तो अपने कर्म से मुँह मोड़ता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को अपने कर्म से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। विक्रम ने बड़े ही गंभीर स्वर में उससे कहा कि कर्म करते हुए भी धर्म से कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। उन्होंने जब उससे पूछा कि क्या शास्त्रों में किसी भी स्थिति में धर्म से विमुख होने को कहा गया है तो तपस्वी एकदम चुप हो गया। उनके तर्कपूर्ण उत्तर ने उसे आगे कुछ पूछने लायक नहीं छोड़ा। राजा ने अपनी तपस्या जारी रखी। अत्यधिक निर्बलता के कारण एक दिन राजा बेहोश हो गए और काफी देर के बाद होश में आए। वह तपस्वी एक बार फिर उनके पास आया और उनसे तपस्या छोड़ देने को बोला। उसने कहा कि चूँकि राजा गृहस्थ हैं, इसलिए तपस्वियों की भाँति उन्हें तप नहीं करना चाहिए। गृहस्थ को एक सीमा के भीतर ही रहकर तपस्या करनी चाहिए।  </p>
<p>जब उसने राजा को बार-बार गृहस्थ धर्म की याद दिलाई और गृहस्थ कर्म के लिए प्रेरित किया तो राजा ने कहा कि वे मन की शान्ति के लिए तपस्या कर रहे हैं। तपस्वी कुछ नहीं बोला और वे फिर तपस्या करने लगे। कमज़ोरी तो थी ही- एक बार फिर वे अचेत हो गए। जब कई घण्टों बाद वे होश में आए तो उन्होंने पाया कि उनका सर भगवान विष्णु की गोद में है। उन्हें भगवान विष्णु को देखकर पता चल गया कि तपस्या से रोकने वाला तपस्वी और कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु थे। विक्रम ने उठकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तो भगवान ने पूछा वे क्यों इतना कठोर तप कर रहे हैं। विक्रम ने कहा कि उन्हें राजा बलि से भेंट का रास्ता पता करना है। भगवान विष्णु ने उन्हें एक शंख देकर कहा कि समुद्र के बीचों-बीच पाताल लोक जाने का रास्ता है। इस शंख को समुद्र तट पर फूँकने के बाद उन्हें समुद्र देव के दर्शन होंगे और वही उन्हें राजा बलि तक पहुँचने का मार्ग बतलाएँगे। शंख देकर विष्णु अंतध्र्यान हो गए। विष्णु के दर्शन के बाद विक्रम ने फिर से तपस्या के पहले वाला स्वास्थ्य प्राप्त कर लिया और वैसी ही असीम शक्ति प्राप्त कर ली।</p>
<p>शंख लेकर वे समुद्र के पास आए और पूरी शक्ति से शंख फूँकने लगे। समुद्र देव उपस्थित हुए और समुद्र का पानी दो भागों में विभक्त हो गया। समुद्र के बीचों-बीच अब भूमि मार्ग दिखाई देने लगा। उस मार्ग पर राजा आगे बढ़ते रहे। काफी चलने के बाद वे पाताल लोक पहुँच गए। जब वे राजा बलि के महल के द्वार पर पहुँचे तो द्वारापालों ने उनसे आने का प्रयोजन पूछा। विक्रम ने उन्हें बताया कि राजा बलि के दर्शन के लिए मृत्युलोक के यहाँ आए हैं। एक सैनिक उनका संदेश लेकर गया और काफी देर बाद उनसे आकर बोला कि राजा बलि अभी उनसे नहीं मिल सकते हैं। उन्होंने बार-बार राजा से मिलने का अनुरोध किया पर राजा बलि तैयार नहीं हुए।  </p>
<p>राजा ने खिन्न और हताश होकर अपनी तलवार से अपना सर काट लिया। जब प्रहरियों ने यह खबर राजा बलि को दी तो उन्होंने अमृत डलवाकर विक्रम को जीवित करवा दिया। जीवित होते ही विक्रम ने फिर राजा बलि के दर्शन की इच्छा जताई। इस बार प्रहरी संदेश लेकर लौटा कि राजा बलि उनसे महा शिवरात्रि के दिन मिलेंगे। विक्रम को लगा कि बलि ने सिर्फ़े टालने के लिए यह संदेश भिजवाया है। उनके दिल पर चोट लगी और उन्होंने फिर तलवार से अपनी गर्दन काट ली। प्रहरियों में खलबली मच गई और उन्होंने राजा बलि तक विक्रम के बलिदान की खबर पहुँचाई। राजा बलि समझ गए कि वह व्यक्ति दृढ़ निश्चयी है और बिना भेंट किए जानेवाला नहीं है। उन्होंने फिर नौकरों द्वारा अमृत भिजवाया और उनके लिए संदेश भिजवाया कि भेंट करने को वे राज़ी हैं।  </p>
<p>नौकरों ने अमृत छिड़ककर उन्हें जीवित किया तथा महल में चलकर बलि से भेट करने को कहा। जब वे राजा बलि से मिले तो राजा बलि ने उनसे इतना कष्ट उठाकर आने का कारण पूछा। विक्रम ने कहा कि धार्मिक ग्रन्थों में उनके बारे में बहुत कुछ वर्णित है तथा उनकी दानवीरता और त्याग की चर्चा सर्वत्र होती है, इसलिए वे उनसे मिलने को उत्सुक थे। राजा बलि उनसे बहुत प्रसन्न हुए तथा विक्रम को एक लाल मूंगा उपहार में दिया और बोले कि वह मूंगा माँगने पर हर वस्तु दे सकता है। मूंगे के बल पर असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।</p>
<p>विक्रम राजा बलि से विदा लेकर प्रसन्न चित्त होकर मृत्युलोक की ओर लौट चले। पाताल लोक के प्रवेश द्वार के बाहर फिर वही अनन्त गहराई वाला समुद्र बह रहा था। उन्होंने भगवान विष्णु का दिया हुआ शंख फूँका तो समुद्र फिर से दो भागों में बँट गया और उसके बीचों-बीच वही भूमिवाला मार्ग प्रकट हो गया। उस भूमि मार्ग पर चलकर वे समुद्र तट तक पहुँच गये। वह मार्ग गायब हो गया तथा समुद्र फिर पूर्ववत होकर बहने लगा। वे अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक स्त्री विलाप करती मिली। उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर गहरे विषाद के भाव थे। पास आने पर पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो गई है और अब वह बिल्कुल बेसहारा है। विक्रम का दिल उसके दुख को देखकर पसीज गया तथा उन्होंने उसे सांत्वना दी। बलि वाले मूंगे से उसके लिए जीवन दान माँगा। उनका बोलना था कि उस विधवा का मृत पति ऐसे उठकर बैठ गया मानो गहरी नींद से जागा हो। स्त्री के आनन्द की सीमा नहीं रही। </p>
<p>सौजन्य : <a href="http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/snbts027.htm">इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गुरू का सम्मान]]></title>
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<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:49:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार क प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्व्यं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड  से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी&#124; तुम्हें कुछ हो जाता तो ...।</p>
<p>अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशिर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता]]></title>
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<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 05:26:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)</p>
<p>...यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की<br />
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:<br />
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-<br />
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख<br />
ताकि वे सनद रहें...<br />
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं<br />
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी</p>
<p>सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह<br />
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है<br />
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर<br />
बंद कर दिया है अब!</p>
<p>सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए<br />
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना</p>
<p>कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का<br />
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है<br />
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!<br />
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं<br />
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)</p>
<p>उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ<br />
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख<br />
क्योंकि वे सनद हैं<br />
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ</p>
<p>नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं<br />
वह मैं नहीं<br />
मेरा भाई था जटायु<br />
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से<br />
कौन है सीता?<br />
और किसको बचायें? क्यों?<br />
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे<br />
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर<br />
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं</p>
<p>...........................<br />
गुफा में शाँती है...<br />
...........................</p>
<p>कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार<br />
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है<br />
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं<br />
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं<br />
देखते नहीं ये<br />
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर<br />
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना...</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समस्या]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 04:12:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी सम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी समस्या दूर कर सकते हैं। सभी लोग जल्दी से जल्दी अपनी समस्या फकीर को बताकर उपाय जानना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि हर कोई बोलने लगा और किसी को कुछ समझ में नहीं आया। अचानक फकीर चिल्लाए. 'खामोश'। सब चुप हो गए। फकीर ने कहा, "मैं सबकी समस्या दूर कर दूंगा। एक साथ बोलने के बजाय सब लोग एक-एक कागज पर अपनी समस्या लिख लाएं और मुझे दें।</p>
<p>कुछ ही देर में फकीर के सामने कागजों का ढेर लग गया। फकीर ने कागजों को एक टोकरी में रखा और सबसे गोला बनाकर बैठ ने को कहा। गोले के बीच में टोकरी रख दी।<br />
एक आदमी की तरफ इशारा करके कहा, "यहाँ से शुरू करके सब बारी-बारी से आएंगे और एक-एक कागज़ उठा लेंगें।" ध्यान रहे किसी को अपना कागज़ नहीं उठाना है। लोग एक-एक कर आए कागज उठा-उठा कर अपनी-अपनी जगह बैठ गए। फकीर ने कहा,"अब इस कागज़ में लिखी किसी दूसरे की समस्या पढो। अगर चाहो तो मैं तुम्हारी समस्या दूर कर दूँगा पर उसके बदले कागज़ पर लिखी समस्या तुम्हारी हो जाएगी। तुम्हें लगता है कि तुम्हारी समस्या बडी है तो उसे दूर करवाकर कागज़ पर लिखी दूसरे की छोटी-सी समस्या अपना लो। चाहो तो आपस में कागज़ बदल लो। जब तय कर लो कि अपनी समस्या के बदले कौन सी समस्या लोगे तब मेरे पास आ जाना।</p>
<p>लोगों ने जब कागज़ पर लिखी समस्या पढी तो वे घबरा गए। लोग एक दूसरे से कागज़ बदल-बदल कर पढ रहे और बार-बार उन्हें लगता कि उनकी समस्या तो जैसी है वैसी है, पर इस नई समस्या का सामना वे कैसे कर पाएंगे। कुछ देर में हर किसी को समझ में आ गया कि उनकी समस्या जैसी भी है उनके अपने जीवन का हिस्सा है और वे उसी का सामना कर सकते हैं। एक-एक कर के लोग चुपचाप वहाँ से चले गये।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[हिंदी पोस्ट - You can now post your blog in Hindi]]></title>
<link>http://chennairavi.wordpress.com/2007/03/09/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-you-can-now-post-your-blog-in-hindi/</link>
<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 04:20:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>Ravi Chander</dc:creator>
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<description><![CDATA[
Blogger now allows you to post in Hindi.

अब आप हिंदी में भी पोस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp1.blogger.com/_x9r07q1bv6Q/RfDc3UlS2UI/AAAAAAAAAEE/6HjzQ5f8-5g/s1600-h/devafont.gif"><img style="float:right;cursor:hand;margin:0 0 10px 10px;" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_x9r07q1bv6Q/RfDc3UlS2UI/AAAAAAAAAEE/6HjzQ5f8-5g/s320/devafont.gif" border="0" /></a>
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