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	<title>hindi-bharat &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-bharat/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-bharat"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:38:52 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो समझ में आया वही लिख दिया-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 15:21:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=521</guid>
<description><![CDATA[मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र और उड़न तश्तरी ब्लाग के लेखक श्री समीर लाल वाकई हिंदी ब्लाग जगत के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। वह मेरे ब्लागों पर सबसे अधिक टिप्पणी रखने वाले व्यक्ति हैं और मैं हृदय में उनके प्रति आत्मीयता का भाव रखता हूं पर उसका प्रदर्शन करना मुझे ठीक नहीं लगता। उनकी टिप्पणियां आमतौर से संक्षिप्त और औपचारिक  होती हैं पर उससे अपने अंदर एक प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। मैं यह लेख उनकी प्रशंसा या समीक्षा के लिये नहीं लिख रहा हूं बल्कि कल उनकी टिप्पणी में जिस तरह दूसरे ब्लाग और टिप्पणियां लिखने के लिये अभियान चलाने की बात कही है उसी परिप्रेक्ष्य में मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये जो शायद अलग प्रतीत हों पर  उनको रखना जरूरी समझता हूं। </p>
<p>श्री समीरलाल जी ने हिंदी में ब्लाग बढ़ाने तथा उन पर टिप्पणियां लिखने  की बात कहीं है वह मेरे अभियान का एक भाग है पर मैं हिंदी ब्लाग जगत लिये पाठक जुटाने के अभियान को भी कम वरीयता नहीं देता।  हिंदी ब्लाग में निराशाजनक स्थिति को मैं भी अनुभव करता हूं पर इसके लिये पाठकों की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अंतर्जाल  हिंदी ब्लाग के लिये पाठकों की संख्या नगण्य है। इसलिये अनेक ब्लाग लेखक केवल हिंदी के ब्लाग सभी एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटरों पर हिंट पाने के लिये लिखते हैं और वहां साहित्य सृजन जैसा वातावरण अभी नहीं बन पाया है। अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में यह बात लिख चुके हैं कि वह लिखने तो आये थे साहित्य और यहां अब कुछ अन्य लिख रहे हैं। मैं उनका लिखा पढ़कर यह बात मानता भी हूं कि वह वाकई साहित्य लिखते होंगे। देव और कृतिदेव फोंट में टाईप करने वाले अनेक लेखक यूनिकोड में लिखते हुए ब्लाग पर आये तो स्वयं मूल स्वरूप खो बैठे जिनमें मैं भी स्वयं भी शामिल हूं। अब देव और कृतिदेव को यूनिकोड मेंे बदलने वाला टूल आया है तब अनेक लोग खुश हुए क्योंकि उनको लगा कि वह अब पहले से अच्छे परिणाम निकाल सकते हैं। आज इतना बड़ा लेख लिखने का साहस मेरे अंदर केवल इसीलिये आया क्योंकि  सीधे कृतिदेव में लिख रहा हूं और यह टूल आये अभी अधिक वक्त नहीं हुआ। ऐसे में मुझे विश्वास है कि आगे और ब्लाग लेखक बेहतर लिखकर लेखक जुटाने का प्रयास करेंगे। इस समय जो हिंदी ब्लाग जगत पर लिखा जा रहा है उस पर दृष्टिपात किये बिना हम अगर किसी अभियान पर निकलेंगे तो शायद वहीं होंगे जहां अभी हैं। </p>
<p>शुरूआती दिनों में मैंने भी एग्रेगेटरों पर हिट पाने के लिये ऐसी पोस्टें लिखीं पर मुझे ध्यान आया कि एक लेखक के लिये अपने पाठकों की संख्या बढ़ाने वाले  व्यापक आधार वाले विषयों पर लिखना आवश्यक है। मैने हास्य कविताएं, आलेख, हास्य व्यंग्य, कहानियां, लघु कथाएं बहुत कठिनाई से यूनिकोड में लिखीं पर एग्रीगेटरों पर उनके हिट ने मुझे निराश किया।  फिर भी मैं आगे बढ़ता रहा यह सोचकर कि देखा जायेगा कि आगे क्या होता है? ब्लाग लेखक साथी हो सकते हैं पाठक नहीं यह बात मुझे अपने बढ़ते पाठक देखकर बहुत बाद में समझ आयी। तब मैंने तय किया कि अब आम पाठक को लक्ष्य कर लिखना चाहिए। फिर यह भी देखा कि मेरे ब्लाग पर आने वाला पाठक अन्य ब्लाग भी देखे ताकि वह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के ब्लागों से परिचित हो सके इसलिये मैंने दूसरे ब्लाग लेखकों के भी ब्लाग लिंक किये ताकि अगर पाठक मुझसे  असंतुष्ट हो तो वह दूसरे का ब्लाग लेखकों  का लिखा पढ़कर वह यह समझ सके कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने वाले भी कम नहीं है। यह मैने बहुत देर से किया फिर भी मेरे ब्लाग दूसरे ब्लागों  पर पाठक भेजते हैं। यह मैं बीस हजार की पाठक संख्या पार करने वाले ब्लाग की सूचनाओं में बता चुका हूं। उसमें यह भी बता चुका हूं कि किस तरह लोग जहां हास्य की सामग्री देखते ही  झपट पड़ते हैं। उसमें ‘हंसते रहो’ और ‘ठहाका’ ब्लाग को अधिक संख्या में मेरे ब्लाग से पाठक मिलना इसी बात का प्रमाण हैं। मेरे  ब्लाग से उड़न तश्तरी ब्लाग पर  भी पाठक जाते हैं और श्रीसमीरलाल जी के पास कोई काउंटर हो तो वह इसे देख सकते हैं। मैं श्रीसमीरलाल को बहुत पसंद करता हूं पर मेरे अज्ञात पाठक मेरी इस राय को नहीं जानते इसलिये उड़न तश्तरी के बाद लिंक किये गये ब्लागों पर अधिक गये-केवल इसलिये ही न कि  उसका नाम वहां किसी हास्य सामग्री होने का संदेश नहीं देता।<br />
केवल  नये ब्लाग बनवाने और टिप्पणियां लिखने से हिंदी ब्लाग जगत के लाभ की मैं संभावना नहीं देखता। सबसे बड़ी बात यह है कि विषय भी आम पाठक से सरोकार रखने वाला होना चाहिए। इस हिंदी ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो हमेशा ही कमेंट देते हैं और कुछ ब्लाग लेखक जब कोई जोरदार विषय होता है तो इस बात की परवाह नहीं करते कि मैंने उनको कभी टिप्पणी दी कि नहीं वह लिख जाते हैं।<br />
श्री समीरलाल जी अकेले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो ब्लाग से हटकर लिखे गये विषयों पर भी बहुत सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं पर इसका श्रेय उनके मधुर व्यवहार को जाता  है और टिप्पणियां तो इतनी करते हैं कि मैं भी सोचता हूं कि  यह व्यक्ति अगर ऐसा न करे तो मैं लिखूंगा कि नहीं। वह बहुत अच्छा लिखते हैं पर इतनी सारी हिट दिलाने के लिये यह अकेला कारण नहीं है। </p>
<p>        इस अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक लंबे समय तक  लिखना चाहते हैं उनको सोचना अंतर्मुखी होगा पर लिखना बहिर्मुखी होगा। मेरे दिमाग में कुछ विचार हैं जो इस प्रकार हैं।</p>
<p>(1) अपने ब्लाग पर दूसरे के ब्लाग को भी लिंक दे। अकेले सफलता पाने का का विचार त्याग दें। कोई हमारा मित्र है या नियमित रूप से टिप्पणी करने वाला ब्लाग लेखक  तो लिंक दें अच्छी बात है पर यह भी देखें कि क्या कोई ऐसे ब्लाग लेखक भी हैं जो आपको कमेंट नहीं देते पर उनकी सामग्री पठनीय है तो उसे भी लिंक दें। हो सकता है उसकी वजह से  आपका ब्लाग पढ़ने आम पाठक आये क्योंकि वह सोचेगा कि यह आपके ब्लाग में लगा ब्लाग है वह ऊपर उसका पता थोड़े ही देखता है। मेरे मित्र उड़न तश्तरी और ममता श्रीवास्तव को पढ़ते हैं पर वह जाते मेरे ही ब्लाग से ही हैं-उनके ब्लाग का कोई अपने कंप्यूटर पर पता नहीं रखता।  हो सकता है कोई ऐसे भी लोग हैं जो मेरे ब्लाग पर इसलिये आते हों कि किसी दूसरे ब्लाग लेखक का ब्लाग मेरे ब्लाग से चिपका समझते होंं। जब तक नारद अभिव्यक्ति  पत्रिका से लिंक था मैं वहीं से उस पर जाता था-हो सकता है कि कुछ पाठक मेरे जैसे ही हों। अगर कोई अच्छा लिखने वाला ब्लाग लेखक है तो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसका ब्लाग लिंक करें। इसके लिये आपको सभी ब्लाग पढ़ना पढ़ेंगे।<br />
(2)ब्लाग लेखकों को ऐसे विषयों पर ही ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक हों। अगर कोई समाचार दे रहें हैं तो उसके साथ एक संपादक के रूप में भी विचार व्यक्त करें। याद रखिये जो आम पाठक यहां आते हैं वह उस ब्लाग लेखक की मौलिकता देखना चाहते हैं। महापुरुषों के संदेश लिखने वाली पोस्टों पर अनेक लोगों ने टिप्पणी लिखी थी कि अगर आप इनके साथ अपने विचार रखते तो बहुत अच्छा होता।<br />
(3)अपनी पोस्ट के साथ अधिकतम श्रेणियां रखें। कभी-कभी अंग्रेजी में भी टिप्पणियां रखें। हमारा  ब्लाग अंग्रेजी वालें भी पढ़ें यह तो चाहते हैं पर इस बात का ध्यान नहीं रखते कि अंग्रेजी वाले वहां कैसे आयेंगे। इसके अलावा अंग्रेजी शब्दों से भी हिंदी पाठक ब्लाग पर आते हैं<br />
(4)आलेख, निबंध, कविता, हास्य कविता, व्यंग्य और कहानी जैसे शब्द शीर्षक में लिख दें तो बढिया। मेरी वही हास्य कविताएं लोग पढ़ रहे हैं जिन पर मैंने ऊपर ही लिख दिया है।<br />
मैं जैसा हूं सबके सामने हैं। एग्रीगेटरों पर मैं हिट नहीं पाता यह सच है पर मुझे लगता है कि आम पाठकों का कुछ रुझान मेरी तरफ है। आम पाठकों की बात तो मैं ही लिखता हूं बाकी तो कोई नहीं बताता कि उसकी तरफ कैसा रुझान है? यह सबसे महत्वपूर्ण है। एग्रीगेटरों पर अनेक ब्लाग लेखकों से मित्रता मेरे लिए एक बोनस है क्योंकि मेरा मुख्य लक्ष्य पाठकों तक पहुंचना है। अभी सफलता दूर है पर मैंने भी ऐसा क्या लिख दिया है कि उछलता फिरूं। सच तो यह है कि कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिलने के बाद तो मैंने सहज भाव से लिखना शुरू किया है और मैं जानता हूं कि यह सफलता अकेले चलने से नहीं मिलेगी इसलिये चाहता हूं कि अन्य ब्लाग लेखक भारी सफलता पायेंगे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आयेगी। आखिरी बात यह है कि मैं कोई सिद्ध व्यक्ति नहीं हूं जो यह कहूं कि जो मैने लिखा है वही सही है। जो अनुभव किया वही लिख रहा हूं और हो सकता है कई इससे सहमत न हों और इसकी संभावना रहेगी भी क्योंकि ब्लागवाणी के हिट इस बात का प्रमाण है कि मेरे हाथ से कोई हिट पोस्ट नहीं निकली। वैसे भी मैं अपने कंप्यूटर की समस्याओं से एक महीने से परेशान हूँ और इधर कही बिजली तो कभी आंधी मेरी पोस्ट को रोक देती हैं।शेष फिर कभी	</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पसीना ही कविता लिखवाता है]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</link>
<pubDate>Wed, 07 May 2008 16:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=520</guid>
<description><![CDATA[बदलते मौसम के साथ
मन भी यूं बदल जाता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बदलते मौसम के साथ<br />
मन भी यूं बदल जाता है<br />
जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ<br />
ग्रीष्म के जलती दोपहर में<br />
व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है<br />
नरक लगता हो  जीवन<br />
शाम होते बहती ठंडी हवा का<br />
एक झौंका भी शीतल कर देता है<br />
मौसम और मन के पहिये<br />
घूमते देख कौन कह सकता है<br />
हमारा मन भी होता है कभी हमारे साथ<br />
..........................</p>
<p>गर्मी की दोपहर में<br />
साइकिल पर चलते हुए<br />
पसीने में नहाए मैंने उसे देखा है<br />
लिखता है कविता वह हसंते  हुए<br />
कभी  उसे रोते नहीं देखा है<br />
पूछने पर बताता है<br />
उसके दोपहर का पसीना ही<br />
रात में शीतलता देकर उससे कविता लिखवाता है<br />
मैं उसे केवल आईने में ही देख पाता हूं<br />
क्योंकि वह चेहरा<br />
केवल उसी में नजर आता है </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यह टूल मुझे तो दिलचस्प लगा-आलेख It is interesting tool, I thought - Stories]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 15:09:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=518</guid>
<description><![CDATA[मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी आदत है कि आते ही  अपने ईमेल पर चिट्ठाकारों की चर्चा को अवश्य पढ़ता हूं। उसमें हमेशा अपने मतलब की बात ढूंढने की कोशिश करता हूं। श्री अनुनाद सिंह-जिन्होंने देवनागरी का टूल दिखाकर मुझे एक तरह से  हिंदी ब्लाग जगत के दूसरे दौर में पहुंचा दिया-ने आज वहां एक अनुवाद का दिखाया। इस टूल की चर्चा मैं अक्सर करता रहा हूं कि हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद  का कोई <a href="http://translate.google.com/translate_t">"&#62;टूल</a> है जो शायद हमारे पास नहीं पहुंचा। एक अंग्रेजी के ब्लागर ने मेरी एक पोस्ट पर कमेंट में कहा था कि अब तो भाषा की दीवार ही खत्म होने वाली है और उसी के कहने पर मैने अपना एक लिखा था कि शायद कोई ऐसा टूल है। मेरी पोस्टों पर अनेक बार अग्रेजी लोगों ने अपनी कमेंट रखीं हैं, शुरूआत में मुझे हैरानी होती थी कि यह भला कैसे पढ़ते होंगे। फिर मुझे लगा कि शायद मेरे वर्डप्रेस के ब्लागों की  श्रेणियां अंग्रेजी वालों से टकरातीं है इसीलिये खोलकर वह अपनी भाषा में चिपका जाते होंगे।</p>
<p>कुछ दिनों से ब्लागस्पाट के ब्लाग भी पता नहीं किन ऐसे लोगों की पकड़ में आ जाते हैंे जो अंग्रेजी में कुछ कमेंट चिपका देते हैं। जब उस ब्लागर ने ऐसे टूल की बात की तो मुझे यकीन हो गया कि ऐसा कोई टूल है जो हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा है। आज श्रीअनुनाद सिंह ने इसकी चिट्ठाकार चर्चा में जानकारी दी तो मैंने एक दो लाइन लिख कर प्रयोग किया। ऐसा लगा कि ठीकठाक है। पिछले एक माह में श्रीअनुनाद सिंह ने यह तीसरा टूल दिया है जिसका मै प्रयोग करने वाला हूं। एक टूल तो उन्होनें मुझे देवनागरी से अरबी लिपि में भी भेजा। जब मैने उसका प्रयोग किया तो मेरी आंखें फटी रह गयी कि देखो अंतर्जाल पर क्या क्या देखने को मिल रहा है।</p>
<p>अगर यह टूल सफल रहता है तो वाकई इस दुनियां में बहुत कुछ बदलने वाला है। मेरे जैसा अंग्रेजी में पैदल आदमी भी जब अपनी पोस्ट अंग्रेजी मैंने  लिखेगा तो फिर जो अंग्रेजी में पढ़ कर लिख रहे है उनसे दो आगे ही रहेगा। अगर किसी को हानि न पहुंचे  तो मैं अपने प्रयोग भी करता हूं। आज यह पोस्ट उसी टूल से अंग्रेजी में कर प्रस्तुत करूंगा। बहुत शोर सुनते थे कि अंग्रेजी वाले हिट हैं। यहां हिंदी में तो हिट हुए नहीं देखते हैं अंग्रेजी में क्या स्थिति बनती है। अभी शायद कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर आप बताईये हिंदी के ब्लाग लेखक अंग्रेजी में लिखेंगे तब क्या वह अपना कुछ प्रभाव नहीं छोड़ेंगे? हालांकि अंग्रेजी वाले इससे पढ़ सकते है पर उनको भी इसका का क्या पता कि जो शब्द दिख रहे हैं वह  हिंदी है कि अरबी? इसलिये क्यों ने अपनी एकाध पोस्ट अंग्रेजी में अनुवाद कर रख दें। हालांकि मैं हिंदी को लेकर बहुत संवेदलशील हूं और उसमें लिखते रहने के इच्छुक होने के कारण कभी अंग्रेजी का आत्मसात नहीं किया। वरना इतनी तो मुझे आती है कि थोड़ा अभ्यास कर लिखने लगता।</p>
<p>जैसे हमें अंग्रेजी का हिंदी में अनुवाद  अच्छा लगता है वैसे ही अंग्रेजी वालों को भी लगता है। यह मानवीय स्वभाव है कि जिस स्थिति में वह रहता है उससे अलग वातावरण में उसकी जिज्ञासा रहती है। बहरहाल लंबी चौड़ी   बातें तो होतीं रहेंगी फिलहाल की जानकारी पर श्रीअनुनाद सिंह को बधाई।मैंने यह अनुवाद उसी टूल से किया है और ऐसा लगता है कि अगर सावधानी से  हिन्दी लिखी जाये तभी इसका इस्तेमाल सही रूप से किया जा सकता है. कुछ गलतियां इसमें थीं जिस मैंने अपने विवेक से ठीक करने का प्रयास किया है. इसमें मैं अपने हिन्दी में लिखे के लिए जिम्मेदार हूँ बाकी जिम्मा तो टूल का है. बहरहाल यह टूल दिलचस्प है.<br />
http://translate.google.com/translate_t<br />
---------------------------------------<br />
My habit is that I come to your email on the discussion chitthakar  must read me. There is always a matter of their means I am trying to find. Mr. Singh resonance - who published showing me a kind of tool to Hindi Blog to the world's second round - there today showed a translation tool. The discussion of the tools that I am often been translated into English, Hindi, a tool that perhaps we have not arrived. I have an English blogger on ksment  said at a post now that the language of the wall and ending at the behest of the same one I wrote that perhaps a tool. My posts on a number of times people have  his givan coment, in the beginning was that I wonder how good it will be read. Then I felt that perhaps my wordpress  the English blog  categories of those who matchd  is open so  he  go to paste in their language.</p>
<p>A few days from the Blog of  blogspot  not know what these people are caught in English, some of which is  paste coment  you. When he did a tool of blogger spoke, I was convinced that it is a tool which has been translated into Hindi from English. mr. anunad  Singh, today discussed its chitthakar  given a two-line, I used to write. It felt right. Singh, the last one month in the third mr anunad singh tool to use to which I am. I published a tool, they also sent in from the Arabic script. When I used it, my eyes remain open been on internet  Look to see what is getting.</p>
<p>If the tool is always successful, this really is going to change many things in the world. I also like the English man in the foot when his post in English, then, that I write in English are read by writing them will be two further. If a loss is not reached by then I am also using his. Today, that same post in English to submit a tool to do. Hear that the English were a lot of noise hit. Here in the hit Hindi, not English, see what the situation is going. Perhaps some people still joke believe it, you told that    writer in English, Hindi Blog then write what it does not leave some effect? Who can read English, although it is on them will also address what are showing that the Hindi word that Arabic? Why so few of his posts to keep the translation in English. However, I took a lot of Hindi  stay, and I wrote it for being willing to absorb ever not English. Otherwise, I come so that it seems a bit of writing exercises.</p>
<p>We like the English translation of the Hindi is so good even those who feel English. It is human nature that he lives in which case it is a different atmosphere in his curiosity often. However, things have long  will remain on information currently mr anunaad  Singh congratulated.<br />
<a href="http://www.google.com/transliterate/indic/">http://www.google.com/transliterate/indic/</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम कहां जा रहे हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 10:57:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</guid>
<description><![CDATA[आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;">आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों को दौरा किया तो लगा कि जैसे व्यंग्य के लिऐ कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं है। अक्सर  व्यंग्य लिखने के प्रयास में रहता हूं और इसके लिये मुझे विषय की आवश्यकता होती है। पहले जब सीधे यूनिकोड में लिखता था तो गद्य में व्यंग्य लिखने से बचता था और इसीलिये हास्य कविताओं से काम चलाता था जिसमें विषय को स्पष्ट करने में कठिनाई होती थी अब जब कृतिदेव में मेरे लिये लिखना सरल हुआ है तब से विषयों को लेकर कोई समस्या नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आज एक ब्लाग देखा जिसमें लिखा था कि ब्लाग चूंकि फ्री में है इसलिये चाहे जो उस पर लिख रहा है और इस तरह ब्लागिंग दिशाहीन हो रही है। मैंने सोचा था कि उसमें कोई भारी भरकम विचार होगा पर जब ब्लाग खोला तो पाया कि केवल दस लाईनें लिखीं हैं। ऐसा-वैसा बस और कुछ नहीं। अब ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उसकी दिशा क्या हो? इसका जवाब उसमें नहीं लिखा था। लिखने वाले ने भी लिखने के लिये लिखा था और उसे जोरदार हिट मिले थे।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">यह फोरम हिंदी ब्लागिंग को दिशा देने के लिये सज्जन लोगों ने बनाये पर वहां आकर अच्छा खासा लेखक दिशाहीन हो ही जाता है। रोज जो दोस्तों से हिट और कमेंट मिलते हैं उसे पचाना आसान होगा यह तो हम नहीं मानते क्योंकि हमें न तो इतने हिट मिलते हैं और न ही कमेंट। सो पता नहीं उसको पचाने के लिये कितनी देर वज्रासन में बैठना पड़ेगा। फोरमों पर अपने ब्लाग फ्लाप देखकर दिल को तसल्ली होती है कि अब कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिट मिलेंगे तो लोगों की दृष्टि में आ जायेंगे और वह फिर तमाम तरह के मीनमेख निकालने लगेंगे। फिर उनका जवाब देते फिरो। समय की खराबी और ऊर्जा के निरर्थक विसर्जन के अलावा उसमें कुछ नहीं हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">अब लोग लिख रहे है कि ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उनका खुद का लिख किस दिशा से आया और किस दिशा को जा रहा है यह हम पूछ सकते थे पर लगा कि ख्वामख्वाह में उनको नाराज कर दें। इसीलिये अपना ही एक व्यंग्य लिख दें। वह इसे पढेगे ही नहीं क्योंकि किसकों यहां पता हम किसको पढ़कर लिख रहे हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">सभी आदमी सब जगह दौड़े जा रहे हैं।  दिशा का पता नहीं पर दौड़े जा रहे हैं।  एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि ‘आखिर हम किस दिशा में दौड़ रहे हैं?’</span></p>
<p><span style="color:#003300;">पर कोई किसी को जवाब नहीं देता। पूछते सब ही हैं जब थककर सांस लेते हैं। उस समय सब दौड़ रहे होते हैं और जवाब इसलिये नहीं देते कि क्या पता फिनिशिंग टच में ही इस दौड़ प्रतियोगिता में पिछड़े गये हैं तो गया जो मिलने वाला होगा। क्या? इसका किसी को पता नहीं है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">सो ब्लागिंग भी ऐसे ही है। सब लिखे जा रहे है कि हो सकता है आगे कोई पुरस्कार वगैरह मिल जाये तो हो सकता है कि समाज में थोड़ा सम्मान बढ़ जाये। अब 2008 चल रहा है और साल भर इसी तरह कुछ लाईने लिखते रहे तो हो सकता है इस साल के नाम पर मिलने वाला कोई पुरस्कार ही हाथ लग जाये। इसी तरह ही लिखते जाओ। ब्लागरों पर कुछ भी लिख दो हिट हो जाता है। आम पाठक के लिये वह दो र्कौड़ी का नहीं है। इसीलिये हम ब्लागरों को विषय इस तरह बनाते हैं कि वह आम पाठक को भी समझ में आये कि इंटरनेट पर ईमेल के विस्तार के रूप में एक ब्लाग भी होता है जिस पर लोग कुछ लिखते भी हैं और वह ब्लागर कहलाते हैं। हमारे लिये यह ईमेल का विस्तार ऐसे ही जैसे एक पत्रिका। जिस तरह एक रजिस्टर का इस्तेमाल एक गणित का छात्र भी करता है तो एक लेखक उस पर अपनी रचनाएं लिखता है-कुछ लोग डायरी भी लिखते हैं पर वह लेखक नहीं कहलाते।<br />
 हम तो एक लेखक की तरह लिखने का काम कर रहे हैं। हमारी नजर में ब्लागर वह हैं जो ब्लाग का ईमेल के विस्तार की तरह इस्तेमाल करते हैं और लेखक वह हैं जो इसे अपनी रचनाओं के लिखने के लिये उपयोग करते हैं। जिस तरह रजिस्टर पर लिखा गया सभी लोगों के उपयोग का नहीं होता। वैसे ही हाल ब्लाग का है। हम इतनी बड़ी पोस्ट लिख रहे हैं यह फोरमों पर फ्लाप हो जायेगी पर दिशाहीन बताने वाली पोस्ट हिट पा चुकी है। है न दिलचस्प बात!</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ पुराने ब्लागर अब यह समझ गये हैं कि इन फोरमों के आगे भी होती है ब्लागिंग। पहले एक फोरम पर तो कविता के ब्लाग ही नहीं लिये जाते थे और अब हालत यह है कि फोरम वाले हिंदी का जो ब्लाग देखते हैं वही अपने यहां दिखाने लगते हैं। अभी कोई कथित पुरस्कार बंटे तो बड़ी बेदर्दी से कहा गया कि इसमे कविता के ब्लाग शामिल नहीं किये गये। हमने अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाने पर जब हास्य कविताएं बरसाईं तो समझ में आया कि क्या होती है कविता। हमें भी बहुत हैरानी होती है यह देखकर कि हमारी हास्य कविताएं पाठकों में ऐसे हिट पा रहीं है कि डर लगने लगा कि कहीं इतना लिखने की सजा हम हास्य कवि की उपाधि के रूप में न पायें। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">हिंदी भाषा लिखने में हमें मजा  आता है पर कोइै कहानीकार, व्यंग्यकार और लेखक कहे तो सुनकर अच्छा लगता है पर हास्य कवि कहे तो ऐसा लगता है कि हमारी पूरी मेहनत गयी पानी में-क्योंकि उससे कि हमारा दायदा सीमित हो गया प्रतीत होता है।  </span></p>
<p><span style="color:#003300;">बहरहाल दिशाहीनता की स्थिति नहीं है। हां,यहां लेखक कम हैं और ईमेल विस्ताकर अधिक हैं जो तात्कालिक हिट्स या ईमेल पाकर खुश हो जाते हैं।  आम पाठक अभी अपनी बात लिख कर लेखक को दे नहीं रहा इसीलिये कभी कभी निराशा होती है पर फिर अपनी रचना से जो प्रतिबद्धता हो वह फिर होंसला ला देती है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आखिरी बात यह ब्लाग फ्री में नहीं है जैसा कि कुछ ब्लागर लिखते हैं। जनाब जिस कंपनी के भी इंटरनेट कनेक्शन हैं उनके विज्ञापन गूगल पर  अन्य वेब साईटों पर देखे जा सकते हैं और उनको हम बराबर भुगतान कर रहे है। कंपनियां अपनी कमाई के सारे रास्ते खुले रखना चाहतीं हैं इसलिये इस ब्लाग को एस.एम.एस की तरह ही इस्तेमाल करवा रहीं हैं। अपनी भडास निकालो और हर महीने कनेक्शन का भुगतान करते जाओ। फिर भी कुछ ब्लागर अच्छा लिख रहे हैं और उनको पढ़ने में मजा आता है-जहां तक हमारी जानकारी है कुछ ब्लागर हमारे लिखे का भी आनंद उठाते हैं। हम फोरमों पर एक पाठक की तरह जाते हैं इसीलिये कभी अपने हिट या फ्लाप होने का अध्ययन नहीं करते। हां, अपना ब्लाग सामने आ जाता है तब ही उसके व्यूज देखते हैंं। आम पाठकों की संख्या बढ़ती लग रही हैं। इधर कृतिदेव में सीधे लिखने की वजह से हम और बेपरवाह हो गये हैं कि अब तो लिखना है हिट या फ्लाप तो अब आम पाठक तय करेंगे और दिशा भी अब उनकी पसंद पर ही तय होनी है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब बंद हो गया हकलाते हुए लिखना ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 07:22:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</guid>
<description><![CDATA[     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल पर लिखना शुरू कर रहा हूं। रोमन लिपि में लिखकर हिंदी लिखता तो कहीं न कही मन में अस्वभाविकता का अनुभव तो होता ही था-एसा लगता था कि हकलाते और तुतलाते  हुए ही लिख रहा हूं। मैने नारद पर अपनी जो पहली पोस्ट लिखी थी  उसका शीर्षक ही था ‘मैं हकलाते हुए लिख रहा हूं’। उसके  बाद भी बहुत लिखा पर हमेशा कहीं न कहीं यह लगता  कि अपना मौलिक स्वरूप जब खुद ही नहीं दिख पा रहा हूं तो दूसरे क्या देख पाते होंगे।</p>
<p>    कृतिदेव में  कल से यह मेरी छठी पोस्ट है। कल कृतिदेव का हिंदी टूल जब अपने डेस्कटाप पर ला रहा था तो शंका थी कि वह सफल होगा क्यांकि पहले भी ऐसे ही दो टूलों पर मैं अपना समय खराब कर चुका था-हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि वह टूल गलत थे। हो सकता है कि मुझे उपयोग करना ही नहीं आता हो। संभवत: मेरा कंप्यूटर उसे स्वीकार नहीं करता हो। ऐसे टूल रहे होंगे इसमें तो मुझे यकीन था क्योंकि अंतर्जाल की दो पत्रिकाओं हिन्दी नेस्ट और अभिव्यक्ति-अनुभूति ने मेरी देव और कृतिदेव फोट में भेजी गयी रचनाओं को संभवतः इन्हीं टूलों  से यूनिकोड में बदल कर प्रकाशित किया गया होंगा। इसके बावजूद मैं एक वर्ष तक इन टूलों से दूर रहा तो इसका कारण यही हो सकता है कि यह टूल पूरी तरह सौ प्रतिशत उपयोगी नहीं रहे होंगे या इनका स्थानांतरण कठिन होगा। ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैने कुछ साथी ब्लागरों को यह लिखते हुए देखा कि हमें तो कृतिदेव में ही काम करना पसंद करते है।’ इधर यह भी स्वीकार करते थे कि वह यूनिकोड में लिख रहे है।</p>
<p>    मैं इन चर्चाओं पर नजर रखता था। एक बार तो मैने लिख  भी दिया था कि ऐसा कोई प्रमाणिक टूल आयेगा तो वह गूगल से ही आयेगा।  कल जब मैने एक  ब्लाग  देखा और उसमें इस टूल को अपने डेस्कटाप पर लाया। जब इसमें मैने अपनी कृतिदेव में टंकित सामग्री यूनिकोड में रखी और क्लिक किया तो जो सामने परिणाम आया उसे मन खुश हो गया। यूनिकोड का उपयोग के इस्तेमाल की बात करें तो कह सकते हैं कि कुछ नहीं से तो जो है वहीं ठीक है। अपनी अभिव्यक्ति करने के लिये रोमन लिपि का हिंदी टूल का उपयोग किया पर कृतिदेव का परिवर्तित टूल का कल से इतना उपयोग कर लिया है कि अब उसमें सीमित दिलचस्पी रह गयी। वह भी कभी कमेंट लगाने या शीर्षक के लिये काम में लेंगे। </p>
<p>    यह टूल बहंत पहले नहीं मिला इसको लेकर मन में कोई निराशा भी नहीं है। वजह यह है कि यूनिकोड में बहुंत कठिनाई से लिखते थे पर वह संघर्ष कई एसी हास्य कविताओं का जन्मदाता बना जिसके न होने पर संभव नहीं होता। कई बार अच्छा और मजेदार ख्याल आया तो उस पर बड़ा व्यंग्य लिखने की बजाय छोटी हास्य कविताएं लिख दीं और वह पंसद की गयीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि महापुरूषों के संदेश सुबह लिखने का मन बनाया क्यांकि अपने निजी जीवन और लेखन  में उनके संदेशों पर आधुनिक संदर्भ में व्याख्या को कई  लोगों ने बहुत पसंद किया। जब शूरूआत की तो कम समय होने के कारण हमने सीधे संदेश ही लिखे ताकि मन को तसल्ली रहे कि हम यहां भी वही कर रहे है। पिछले पंद्रह दिन से अपनी टंकण की  अपनी गति को बढ़ा हुआ देखा तो वर्तमान संदर्भ में   व्याख्या देने का काम शूरू किया तब तक यह टूल आ गया। यह टूल आफलाइन भी काम कर रहा है इसलिए इंटरनेट को खोलकर बैठने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा कोई शब्द गलत दिख जाये तो उसे बीच में ठीक किया जा सकता है जबकि दूसरे टूलों पर यह त्रटियां ठीक करने में कठिनाई आती थी।</p>
<p>     कई बार जब व्यंग्य या कहानी लिखने का मन आता  तो पहले तो यह सोचना पड़ता था कि वह कितना लंबा खिंचेगा। जब लगता  कि वह लंबा खिंचेगा तो फिर मन नहीं होता था। कृतिदेव में इस चिंता से मुक्त रहेंगे। एक बैठक में नहीं तो अगली बैठक में उसे पूरा कर सकते है-क्योंकि उसको तो अपने वर्ड  प्रोग्राम में ही तो रखना है।<br />
कुल मिलाकर अभी तक हकलाते और तुतलाते लिख रहे थे पर अब लगता है कि वह बंद हो गया है। सबसे बड़ी बात यह कि इसमें हमारी आंखें नहीं थकेंगी क्योंकि इसमें हमें कंप्यूटर की तरह देखने की जरूरत ही नहीं है। अगर कोई कागज या किताब  सामने  रखकर लिखते जायेगे जबकि यूनिकोड में सामने भी देखना पड़ता है कि अक्षर सही आया कि नहीं। कृतिदेव में तो हम आंखें ही बंद कर टाइप कर लेते है। एक बार टाइप करने के बाद उसे फिर देखते हैं और कोई सुधार होता है तो कर देते है।</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति:अपनी इच्छाओं के दास नही स्वामी बनें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=122</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 04:32:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=122</guid>
<description><![CDATA[न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति
ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति<br />
हविपा   कृष्णावत्र्मेव   भूव  एवाभिवर्धते</strong></p></blockquote>
<p>  <strong>जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और अधिक जल उठती है उसी प्रकार आदमी सतत इच्छाओं की पूर्ति जैसे जैसा होती जाती है वैसे ही वह और  अधिक बढ़ जातीं हैं। </strong></p>
<blockquote><p><strong>यश्चैतान्प्राघ्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत्<br />
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागों विशिष्यते</strong></p></blockquote>
<p><strong>एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा जो सबका त्याग कर दे उनमें त्यागी को ही श्रेष्ठ कहा जा सकता है।</strong></p>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या-मनुस्मृति के इन दोनों श्लोंकों का आशय यही है कि हमें अपनी इच्छाओं का  दास बनने  की बजाय उनका मालिक होना चहिए। जब हम अपने अंदर तमाम तरह की इच्छाएं पाल लेते हैं तो उनको पूरा करने के लिये इधर-उधर भटकने लगते हैं और तब हमारें सामने अनेक प्रकार के तनाव उपस्थित हो जाते हैं। हमारा काम कई चीजों के बिना भी चल सकता है पर हम उनको पाने की चेष्टा करते हेै। कई चीजें तो हमारे लिये क्षणिक काम या समय के लिये उपयोग में आतीं हैं और बाद में उनको कबाड़ में रख दिया जाता है पर हम उसे पाने में अपनी बेशकीमती समय और ऊर्जा नष्ट कर देते हैं। इसकी बजाय हम अपनी उन व्यर्थ की इच्छाओं और कामनाओं के स्वामी बनकर उन्हें रोंकें तो हम अपने जीवन में न केवल अपार आनन्द प्राप्त करेंगे बल्कि अपने आसपास ही  दूसरे मनुष्यों  के लिये आदर्श भी बन सकते है।</p>
<p><strong>नोट-उपरोक्त श्लोक कृतिदेव 10 में टंकित कर परिवर्तित टूल से युनिकोड में किये गये हैं अतः इसमें कुछ अलग के दिखाई दे रहे है। सुधि पाठक इसे अवगत हों।</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:अधर्म से प्राप्त धन छिपाने से अन्य दोष भी प्रकट होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=121</link>
<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 03:37:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=121</guid>
<description><![CDATA[१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१. अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है.<br />
२. अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरु हैं. दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपकर अधर्म और पाप कार्य करने वालों के शासक यमराज हैं.<br />
३.सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक युवावस्था  बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं.<br />
४.पहली  अवस्था  में वह काम करें जो वृद्धावस्था में सुखपूर्वक रह सकें और जीवन भर वह कार्य करें जिसको मरने पर भी लोग याद करें.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:हमेशा झगडा करने वाला संकट में रहता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=120</link>
<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 03:33:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong> १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारता, अन्य लोगों के साथ दया, कुटिल से कठोरता, सज्जनों से प्रेम तथा दुष्ट से अभिमान, विद्वानों से विनम्रता, शत्रुओं से वीरता और बडों से क्षमा प्रार्थना का व्यवहार करने वाला व्यक्ति सदा ही सुखी रहता है।<br />
	२.बिना सोचे समझे खर्च करने वाला, अनाथ (मटर गश्ती करने वाला) और हमेशा झगडा करने वाला सदैव संकट में रहते हैं।<br />
	३.अन्न से दस गुना आटे में, आटे से दस गुना दूध में, दूध से दस गुना मांस में और मांस से दस गुना घी में शक्ति होती है।<br />
	४.शोक से रोग, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस बढ़ता है। </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:दुष्ट राजा की  सेवा से मन को होता है कष्ट]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=119</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 03:34:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।<br />
        2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है। पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।</p>
<p>        3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। </p>
<p>       4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 19:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</guid>
<description><![CDATA[कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कलम और दवात लेकर<br />
जब निकले थे घर से तो<br />
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है<br />
लिखने बैठे बचपन  से<br />
अपने गुजारे लम्हों की कहानी<br />
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी<br />
भूल गए रोना क्या होता है<br />
देखा है बस एक ही सच<br />
काटता  है वही आदमी जो उसने बोया होता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता<br />
पर इसके लिए कोई काबिल भी  तो नजर आता<br />
जो बेचते हैं सम्मान<br />
उनको लिखना नहीं आता<br />
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर<br />
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता<br />
ऐसा लगता है कि<br />
पहले सम्मान की सोचते हैं<br />
बाद में लिखा होता है<br />
हम तो अपने  लिखे को कभी<br />
सम्मान के योग्य नहीं पाते<br />
तो सम्मान कहाँ से जुटाते<br />
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता<br />
होता समय नष्ट<br />
फिर हम दूसरों का लिखा  कहाँ पढ़ पाते<br />
और बिना पढे भला क्या लिख पाते<br />
जो पढ़ते बिलकुल  नहीं लिखते हैं जरूर<br />
उनमें आ जाता है गुरुर<br />
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं<br />
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ<br />
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते<br />
अपनी कमअक्ली का पता था<br />
इसलिए लिखना किया शुरू<br />
 शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु<br />
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है<br />
--------------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पिछले वर्ष होली पर लिखा अब पढें]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=505</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 11:41:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=505</guid>
<description><![CDATA[पिछले वर्ष की होली पर मैं अपने ब्लोग ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष की होली पर मैं अपने ब्लोग बनाने से जूझ रहा था. उस समय मैंने सदा हिन्दी फॉण्ट में अपनी रचनाएं लिखी थीं और मान लिया था कि सब हो गया ठीक. उस समय नारद से न तो संपर्क था और न इरादा था कि वहाँ जाएं. बाद मैं  अपनी कुछ पोस्ट यूनीकोड में लिखीं और  वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर हिन्दी में  दिखलाने के लिए  इसका शीर्षक और पहला पैराग्राफ  यूनीकोड में लिखता था ताकि वह हिन्दी में दिख सके और आगे तो लोग मेरी तरह इसे पढ़ लेंगे यह मान लिया. बाद में जब नारद पर आये तो लोगों ने कहा कि इन पोस्टों का इलाज करो, पर अब मैं इन्हें यूनीकोड पर लिख नहीं सकता. इसलिए अवसर आने  पर   इनको प्रस्तुत करूंगा क्योंकि उनके शीर्षक देखकर लोग काफी प्रभावित थे और पढ़ना चाहते थे.<br />
(यह इसी ब्लोग पर २४ मार्च २००७ को लिख था)<br />
<a href='http://deepakbapukahin.wordpress.com/files/2008/03/yogi-15.jpg' title='yogi-15.jpg'><img src='http://deepakbapukahin.wordpress.com/files/2008/03/yogi-15.jpg' alt='yogi-15.jpg' /></a><a href='http://deepakbapukahin.wordpress.com/files/2008/03/yogi-26.jpg' title='yogi-26.jpg'><img src='http://deepakbapukahin.wordpress.com/files/2008/03/yogi-26.jpg' alt='yogi-26.jpg' /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कविता का जन्म ही पीडा से होता है-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 17:17:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद ही मुझे लगने  लगा था कि ब्लोगरों पर भी व्यंग्य लिखना चाहिए पर लगा कि इतने सारे ब्लोगर हैं और कोई नाराज हो गया तो? इसलिए कुछ दिन खामोश रहा पर एक हैं क्योंकि मुझे लगा कि इससे मेरी शांति में खलल पडेगा. धीरे-धीरे मैंने अपने ऊपर ही ब्लोगर के रूप में व्यंग्य लिखना शुरू किया. मैंने व्यंग्य लिखना एक हास्य कविता से शुरू किया था जो एक ब्लोग से प्रेरित होकर लिखी थी.  एक ब्लोग है   आईना ब्लोग.  उन्होने मेरी एक पोस्ट के शीर्षक को दूसरे ब्लोग की पोस्ट  के शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया था.  उन्होने ऐसा अन्य   ब्लोगरों की पोस्ट के साथ भी किया था और यह बताया था कि किस तरह दो ब्लोग की  पोस्ट के शीर्षक विरोधाभासी  हैं.  उसमें मेरा सीधे मजाक उडाया नहीं गया था पर तब मैंने  पहली हास्य कविता अपने ब्लोग पर लिखी थी ''आईने में बदहवास दीपक बापू". उसके बाद तो मैंने एक के बाद एक हास्य कवितायेँ लिखीं. इसका मतलब सीधा है कि आईना ने मुझे हास्य कवितायेँ लिखने के लिए प्रेरित किया. </p>
<p>आज उसमें धुरविरोधी के लिए एक हास्य कविता थी और मुझे बहुत दिलचस्प लगी. धुरविरोधी एक प्रख्यात ब्लोगर रह चुके हैं और अब वह   ब्लोगवाणी(हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखाने वाला फोरम)के संचालक हैं-मुझसे मिलने वाले एकमात्र ब्लोगर श्रीसुरेश चिपलूनकर ने यही बताया था. तब मुझे लगा कि हो सकता है कि वह अनुमान के आधार पर कह रहे हैं. आज इस बात की पुष्टि हो गयी.   अगर मैं ब्लोगवाणी के संचालक को भुलाकर केवल धुरविरोधी की बात करूं तो मुझे उनकी याद है. ब्लोग जगत में सबसे अधिक सक्रिय ब्लोगर के रूप में रहे उस शख्स की कोई पोस्ट मैं इससे पढता वह ब्लोग बंद कर लापता हो गया. हुआ यह कि उस समय मैं समझ नहीं पा रहा था कि यहाँ क्या हो रहा है? उसके जाने के बाद मैंने उसे दिलचस्प व्यक्ति को उसकी कमेन्ट की माध्यम से जानने का प्रयास किया.मैंने वह सब पोस्टें देखीं जिस पर उनकी  कमेन्ट थी. उसकी विदाई पर कई ब्लोगरों ने विदाई का ऐसा ग़मगीन माहौल  बनाया कि अगर कभी हिन्दी ब्लोग जगत पर फिल्म बने और ऐसा दृश्य हो तो लोग रो पड़ेंगे. </p>
<p>लोगों की याददाश्त कमजोर होती है पर लेखक की नहीं. मेरे अन्दर उस समय धुर विरोधी के लिए ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. मैंने उसकी कमेन्ट  देखकर  महसूस किया कि यह शख्स कभी भी यहाँ से  छोड़ कर नहीं जायेगा. बिलकुल मेरी तरह नशेड़ी है लिखने का. धुरविरोधी के छद्म नाम है यह तो कोई भी कह सकता है इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि वह कहीं असली नाम से प्रगट होगा. वैसे धुरविरोधी ने हमेशा अपनी कमेन्ट में मेरी प्रशंसा की पर जिस मुद्दे पर वह विवाद कर रहे थे उसमें मैं उनसे असहमत था. सबसे बड़ी बात यह कि मैंने उस शख्स की कोई पोस्ट देखी नहीं थी और देखी तो याद नहीं थी पर इतना तय था कि धुरविरोधी की हिन्दी ब्लोग लेखन में प्रतिबद्धता निर्विवाद थी.<br />
प्रसंगवश याद आया कि मेरे एक अन्य मित्र अरुण  'पंगेबाज' ने भी बहुत शोर मचाया था-हम उसे नहीं जानते पर शायद मुम्बई में रहते हैं आदि-आदि. पंगेबाज और धुरविरोधी के अगर तेवर देखें तो ऐसा लगता है कि लडाकू होंगे पर अगर उनका लेखन की गहराई देखें तो ताज्जुब इस बात का होता है ब्लोग जगत के लोग उनको समझ नहीं पाए. हास्य का भाव स्वाभाविक रूप से पैदा करने की उनमें शक्ति है.  अगर किसी ने मुझे गलत जानकारी नहीं दी हो तो अरुण जी भी ब्लोगवाणी  से कहीं न कहीं जुडे हुए हैं. लिखने का मजा किस तरह उठाया जाता है यह इनसे सीखना चाहिऐ. अरुण पंगेबाज से मेरी दोस्ती अधिक नहीं है पर एक दो बार संपर्क से यह लग गया है कि वह भी मजे लेने वाले आदमी हैं.<br />
हाँ, एक बात जरूर हैं कि हिन्दी में फोरम चलाना आसान नहीं है और ऐसा लगता है कि दोनों अब लिख कम  ही पाते हैं. धुरविरोधी यानी ब्लोगवाणी  के  मैथिली जी आज उस आईने के निशाने पर हास्य कविता के रूप में आ गए जिसे मैंने कभी निशाने पर लिया था. सच तो यह कि मैं कविता पढ़कर हंस पडा. </p>
<p>मगर असली बात यह नहीं है जो मैं कह रहा हूँ.उस कविता में आईना के लेखक  की पीडा यह है कि उनका ब्लोग ब्लोग वाणी से अलग कर दिया गया है और वह कई ईमेल मैथिली जी को भेज चुके हैं पर वह लिंक नहीं हो रहा है. मगर यह सब उनके साथ नहीं हो रहा है. मेरे कई ब्लोग ऐसे हैं जिनके लिए मुझे ब्लोग वाणी को कई ईमेल करने पड़े. बाद में वह लिंक हो जाते हैं. अब यह तो समय की उपलब्धता का भी सवाल है कि लोगों को अपने अन्य  काम भी रहते हैं और हिन्दी ब्लोग जगत से अभी कोई विशेष आय होती  हैं नहीं. मगर जिस तरह आईना में कविता लिखी  गयी है उसे देखकर तो यही लगता  है कि <strong>कविता वास्तव में पीडा से पैदा होती है. इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्द अगर दुनिया से ख़त्म हो जायेगा तो कविता  ही नहीं पैदा होगी.</strong> </p>
<p><strong>हिन्दी ब्लोगर कई बार ऐसे सनसनी और रोमांच पैदा कर देते हैं कि लगता है  कि अब पता नहीं क्या होगा. कहीं हमला होता दिखाएँगे तो ऐसा कि आदमी घबडा जाये  कि पता नहीं क्या हुआ? पहले लहू लहान होने की खबर सारा दिन चलायेंगे फिर शाम को घोषणा कि चिंता की कोई बात नहीं है. मैं एक बात यकीन से कह सकता हूँ कि जब फिल्म वालों को कोई कहानी न नहीं मिलेगी  तब वह ब्लोगरों पर कहानी ढूंढेंगे तो कई वर्षों तक उनको कहानियों का टोटा नहीं पड़ेगा.</strong> बहरहाल किसी विवाद में पड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं और आज ऐसे ही खाली-पीली बैठा था तो सोचा कि अपने दोनों तरफ के मित्रों में जो द्वंद चल रहा है उस पर विचार करूं. फिर धुर विरोधी जिसने मुझे प्रेरित किया था और आईना जिसकी वजह से मुझे हास्य कविता लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई उन पर कुछ न कुछ तो लिखना ही था.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परनिंदा न करने वाले ही लोकप्रिय होते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=114</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 02:52:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप्त नहीं  होता। सामान्यत: सुख-दुख के प्राप्ति मनुष्य के हाथ में न होकर परमात्मा के हाथ में हैं।<br />
2.जिस तरह बछड़ा हजारों पहुसों के बीच में अपनी माता को ढूंढ कर उसके निकट पहुंच जाता है और उसका स्तनपान करने लगता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसका पीछा करता है और उसका फल उसे अवश्य मिलता है।<br />
3.जो वास्तविक तत्व ज्ञान   कर उपदेश करने वाले गुरु को सम्मान नहीं देता वह शिष्य पहले कुत्ते की योनि में जन्म लेने के चांडाल की योनि में उत्पान होता है।<br />
4.अगर आप समाज में लोगों की समक्ष अपनी लोकप्रियता पाना चाहते हैं तो दूसरों की निंदा करना बंद कर दो। परनिंदा करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है और इसकी वजह से वह दूसरे को छोटा साबित कर अपने को बड़ा साबित करना चाहता है। जो दूसरों के निंदा नहीं करते वह लोगों में लोकप्रिय होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[लिखने वाले हिट्स   की परवाह नहीं करते-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=478</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 15:17:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=478</guid>
<description><![CDATA[मैं सोचता हूँ कि ब्लोगरों के विषय पर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैं सोचता हूँ कि ब्लोगरों के विषय पर कम लिखूं पर रोज कोई न कोई ऐसी बात होती है कि मुझे अपनी पुरानी लिखी बातें दोहरानी पड़ती हैं और कई बार तो ऐसा होता है  कि मैं शाम को घर लौटते समय कोई विषय सोचता हूँ पर यहाँ ब्लोग पर  कुछ  ऐसा देखता हूँ तो फिर इसी विषय पर लिखने बैठ जाता  हूँ। </p>
<p>आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने भी ब्लोग जगत से तौबा(अच्छा यह है कि उन्होने शायद शब्द जोडा है) करने का फैसला सुना दिया। मैं तो हतप्रभ रह गया क्योंकि वह अकेले ब्लोगर  हैं जिनसे मैं ग्वालियर में मिल चुका हूँ। पहले मैं उनको इतना नहीं पढता था  पर उनसे मुलाक़ात के बाद उनकी पुरानी और नई पोस्ट पढता रहा। उनके लिखे को देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावी लगा और अगर कोई नया ब्लोगर होगा तो उसे सुरेश चिपलूनकर जी को आदर्श मानने के लिए कहूंगा। किसी भी फोरम पर हिट न मिलने का दुख उनको भी है। इस मामले में उनसे मुझे कोई हमदर्दी नहीं है और क्योंकि जैसा वह लिखते हैं उसकी उनको जरूरत नहीं है बल्कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि वह मुझ जैसे फ्लॉप ब्लोगरों से हमदर्दी जाता सकें। हम दोनों मिले पर किसी ने ब्लोगर मीट की रिपोर्ट नहीं छापी यह इस बात का प्रमाण है कि हम कितने सहज भाव के लोग हैं।   <strong>कहते हैं कि संयोग तो संयोग को ढूढ़ लेता है। </strong></p>
<blockquote><p><strong>राजीव  तनेजा, परमजीत बाली, रविन्द्र प्रभात, ममता श्रीवास्तव, घुघूती बासूती और उड़न तश्तरी मेरे ब्लोग पर निरंतर संपर्क में रहते हैं और  उससे ऐसा लगता है कि सहज भाव से लेखन करने वालों की रचना  में धार रहती है। दरअसल  उछलकूद करने वाले कम संख्या में रहते हैं पर दिखते अधिक हैं जबकि सहज भाव के लोग अधिक होते हैं पर दिखते कम  हैं।</strong></p></blockquote>
<p>पहले सुरेश चिपलूनकरजी के बारे में थोडी बात और कर लें।<br />
1.वह अपने ब्लोग अपने मित्रों को भेजते हैं और उनको वह  वहीं पढ़ते हैं और उनकी संख्या चारों फोरमों की सफलतम पोस्टों की हिट से अधिक होती है।<br />
2.वह व्यापक विषयों पर लिखते हैं और ब्लोग और ब्लोगरों पर कम ही लिखते हैं। विवादास्पद नहीं लिखते। जैसे-जैसे प्रसिद्धि मिलेगी आम पाठकों में उनको  बहुत पढा जायेगा। यह भी आज संयोग है कि मैं अपने मित्रों को अपने जिन ब्लोगों के पते दिए हैं उन पर उनको लिंक करने  वाला था और उन सबको कह भी दिया है।<br />
3.गहन अध्ययन कर लिखते हैं और उसके पाठक वैसे भी कम होते हैं। उन जैसा लेखन इन ब्लोगों पर मैंने नहीं देखा है पर वह अपने मित्रों के अलावा फोरमों पर  नये संपर्क समयाभाव के नहीं बना पाए। फोरमों पर तो अगर शीर्षक में ब्लोग लिखा हो तो वह हिट हो जाता है। सुरेश चिपलूनकर जी को तो मित्र लोग ईमेल पर ही पढ़ लेते है तो फिर उनको वहाँ हिट ब्लोग विषय पर लिखने से भी मिलेंगे इसमें संदेह है। फिर हम लोगों के मन में हिट है तो किसकी परवाह करते  हैं।<br />
४.ब्लागस्पाट पर होने के कारण वर्डप्रेस के ब्लोग उनके संपर्क में अधिक नहीं आ पाते। वर्डप्रेस के ब्लोगर अगर चौपालों पर जिसे नही देख पाते उसे अपने डेशबोर्ड पर भी देख लेते हैं पर अगर ब्लोगस्पॉट के ब्लोग चूक गए तो फिर उसे नहीं देख पाते।    </p>
<p>यह फोरम तो केवल आपस में मेल मिलाप की भूमिका तक ही ठीक हैं पर आपकी पोस्ट तो आगे भी जाती है। केवल ब्लोगर ही देखते हैं यह बात  नहीं है अन्य लोग भी देखते हैं। कमेन्ट देने वाले  ब्लोगर आपके मित्र की तरह हैं और आप जिन की पोस्टें हिट देखते हैं वह उनके मित्रों का परिणाम है  और  पहले अपने को तो हिट बना लें फिर किसी को बनाएं। इस हिट-फ्लॉप के चक्कर में पढना बेकार है। कौन कैसा लिख रहा है सब देख रहे हैं। </p>
<blockquote><p><strong>जहाँ तक लिख का समाज और लोगों को बदलने की बात तो यह एक भ्रम है कि हम अपने लिखे से कुछ बदल सकते हैं। अरे, इस समाज को भगवान  श्रीकृष्ण और श्रीराम और संत शिरोमणी कबीरदास और महान विचारक  चाणक्य अपने अनुभव और ज्ञान  की अनमोल संपदा सौंप गए तब उसके यह  हाल हैं तो वह किसके लिखने से बदलेगा। हाँ एक लेखक के  रूप में उस ज्ञान  की धारा को आगे बढाने का नैतिक कर्तव्य पूरा करना ही एक धर्म हैं। </strong></p></blockquote>
<p>लोगों पर प्रभाव पड़ता है और मैं कई पोस्टों से इतना प्रभावित होता हूँ कि कमेन्ट लिखते समय अगर वह लिखूं तो ब्लोगर कहेंगे कि  मजाक उड़ा रहा है।<br />
कल भी लिखा था और आज भी लिख रहा हूँ सौ से अधिक हिट भी हिन्दी में क्या मायने रखते हैं? जबकि यह करोडों लोगों की भाषा है। मजे के लिए लिखो तो खूब मजा आयेगा। लिखने का व्यसन तो मेरा पुराना है और यहाँ अपनी एक तरह से डायरी लिख रहा हूँ। ऐसे में  मित्रों का मिलना तो एक बोनस है और सुरेश चिपलूनकर जी से हुई भेंट और राजीव  तनेजा से फोन पर हुई बातचीत इसी लिखे का परिणाम है। </p>
<blockquote><p><strong>बस इतना इस विषय पर आज इतना  ही। इस विषय पर इसी ब्लोग पर  मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि चौपालों के हिट या फ्लॉप एक भ्रम है। मैं उम्मीद करता हूँ कि सुरेश चिपलूनकर जी आगे भी लिखना जारी रखेंगे।           </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब  आम पाठक ही तय करेंगे अपनी पसंद ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=477</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 16:20:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिसमें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं होती और यह बिना पैसे का सम्मान दिलवाता है। मैं भी लिखता हूँ इसलिए अंतर्जाल हो या निजी जीवन उसमें  अगर कुछ प्रशंसक हों तो आश्चर्य की बात नहीं है। आजकल अंतर्जाल के बाहर कुछ नहीं लिख रहा तो कुछ   निजी प्रशंसक रोज टोकते हैं कि वहाँ लिखो तब हो सकता है कि अंतर्जाल पर भी कुछ लोग हों जो बार-बार प्रेरित करने के लिए नाम बदलकर पुरानी पोस्टों पर कमेन्ट  लिखते हुए  तारीफों के पुल बाँध देते हैं। उनका लिखा गया कमेन्ट  ब्लोगरों की कमेन्ट से अलग होता है और चूंकि यहाँ तमाम तरह के ऐसे प्रयास हो सकते हैं जिनका परीक्षण करना मुश्किल है कि वह वास्तव में आम पाठक हैं या कोई मित्र ब्लोगर  हैं।<br />
यह भी संभव  है कि अंतर्जाल  पर मैं हिन्दी में कुछ भी लिखता रहूँ उसके लिए कुछ लोग-हो सकता है वह कहीं नौकरी करते हों  जहाँ नियोक्ता की तरफ से अपने संभावित आर्थिक लाभ के लिए अन्य कामों साथ  ब्लोगरों को प्रोत्साहित  करने का काम भी उनको सौंपा गया हों- सक्रिय हों और मेरे साथ अन्य लोगों  को भी सन्देश भेजते हों। अगर मैं बिलकुल निराशाजनक स्थिति की कल्पना करू तो यही लगता है-और यह कल्पना ही है। </p>
<p>अगर ऐसा नहीं है और उनमें वास्तविकता है तो मानना पडेगा कि हिन्दी ब्लोग जगत अब दिलचस्प दौर में पहुँचने वाला है और देश के करोडों हिन्दी भाषी ही- जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन हैं- अब यह तय कर सकते हैं कि कौन अंतर्जाल पर उनके  पसंदीदा ब्लोग  लेखक है। आम पाठक अब हिन्दी की तरफ बढ़ रहा है। अगर कोई व्यवासायिक रूप से हमें गुमराह नहीं कर रहा हो तो गूगल से हिन्दी के शब्दों से भी तलाश हो रही है। हिन्दी साहित्य की   हर विधा के शब्द-हिन्दी कविता, कहानी, हास्य व्यंग्य, आध्यात्म, रहीम, कबीर, चाणक्य, मनु स्मृति, विदुर नीति तथा अन्य अनेक शब्दों के रास्ते  अपने सब ब्लोगों पर आम पाठकों को आते देखता हूँ। इसके अलावा असंख्य शब्द और भी हैं। इनको अंग्रेजी शब्दों से भी ढूंढते हैं। कभी कभी कुछ धार्मिक प्रुवृति के लोग भी तारीफ़ कर जाते है तो कुछ अपने नाम के आगे संत की पहचान वाले स्थापित कर आशीर्वाद दे जाते हैं। </p>
<p>मैं  यह सब देख रहा हूँ और जैसा कि  पहले ही लिखा है कि संशय मेरे मन में रहता है, पर अगर उससे दूर हट कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि  अब अच्छा लिखना शुरू करूं। व्यंग्य, कहानी और चिंतन लिखना शुरू करूं फिर बात वहीं आकर अटकती हैं कि इतनी मेहनत करने के बाद भी क्या मैं यह देख पाऊंगा कि आम पाठक उसे पढ़ रहा है कि नहीं।हर  आम पाठक कमेन्ट नहीं लिख सकता और क्या वाकई वह हममें  दिलचस्पी ले रहा है इसको समझ पाना मुशिकल है। इसके बावजूद मैंने अपने सभी निज-पत्रक(ब्लोग) दिखाने वाले फोरमों और वेब साईटों की हिट्स की परवाह किये बिना कई पोस्ट लिखीं हैं। मैंने फोरमों से अलग ब्लोगों पर भी अपनी पोस्टों पर  लोग आते देखे हैं। एक संशय होता है कि क्या वह ब्लोग वाकई लोग देख रहे हैं। बीच-बीच में उन पर पोस्ट डाल  देता हूँ और भुला देता पर जब उन पर व्युज  देखता हूँ कि वह कोई कम नहीं होते। चौपालों और वेबसाईटों   पर त्वरित पाठक मिलने से ध्यान बँटा रहता है इसलिए आम पाठक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। चौपालों से अलग ब्लोग पर लोग आते हैं पर कब पता नहीं चलता। इसमें नीरसता का बोध होता है जबकि चौपालों पर मित्रों के ब्लोग पढ़ते हुए, उन पर कमेन्ट देते हुए और दूसरों को हिट और अपने को फ्लॉप देखने में जो आनंद आता है वह अवर्णनीय  हैं पर इसके बावजूद  नारद, ब्लोग वाणी, चिट्ठा जगत, और हिन्दी ब्लोग पर हम सब ब्लोगर किसी भी पोस्ट के निर्णायक नहीं है इस सत्य को स्वीकार  कर लेना चाहिए। कल मैंने  जो पोस्ट डाली थी उस पर  कल और आज कुल   ४२ हिट्स हैं, और उस ब्लोग पर दोनों दिन  मिलाकर  १३७ व्युज हैं-मतलब चौपालों से बाहर ९५ व्युज  और भी हैं।</p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि इन चौपालों का उपयोग केवल हम लोगों के आपसी मिलन के लिए है और यहाँ हिट्स और पसंद के चक्कर में पड़ने  की  बजाय करोडों  हिन्दी भाषी पाठकों को लक्ष्य कर लिखने वाले ही स्थाई हिट्स ले सकते हैं। चौपाल पर कितने हिट्स मिल सकते हैं? शायद ही किसी को सौ से अधिक मिल सकते हैं और इतने बडे देश में उसके क्या मायने हो सकते हैं। बात तो तब  बनेगी  जब रेल, बस, हवाई जहाज और अन्य  सार्वजनिक स्थानों पर चर्चा हो कि देखो हम अमुक ब्लोगर को पढ़ते हैं या अमुक ब्लोगर की वह पोस्ट अच्छी थी। कुछ ऐसे  ब्लोगर  मैंने  देखें हैं जो आगे चलकर वाकई नाम करेंगे।  इसलिए  लिखो तो आम लोगों के पढ़ने के लिए लिखो। कविता, कहानी, व्यंग्य, और उपन्यास लिखो। एक बात जो इस माध्यम में होगी, वह यह कि लिखना छोटा ही है और न पूरा हो तो अगले दिन के लिए रख लो। जरूरी नहीं है कि एक दिन में सब पूरा हो। यहाँ पसंद और हिट का खेल तो चलता रहेगा इसे देखो और मजे लो इसलिए मैं कभी भी किसी भी फोरम द्वारा व्युज और हिट्स दिखाने का विरोध नहीं करता। मैं जब इन फोरमों  पर आता हूँ तो कभी भी अपने हिट्स पर ध्यान ही नहीं देता बल्कि दूसरों के हिट्स देखकर खुश होता हूँ। मैं और मेरी पोस्ट अपनी स्थिति के अनुसार फ्लॉप हैं पर इन चौपालों से बाहर के खेल पर मेरी नजर रहती है और देखना है कि आगे क्या होता है? (क्रमश:)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परमात्मा ने सोने में सुगन्ध नहीं डाली ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=112</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 03:24:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछडा केवल अपनी  माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।</p>
<blockquote><p><strong>2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।</strong></p></blockquote>
<p>3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।<br />
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।<br />
4.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।<br />
5.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।</p>
<p>*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग पर  हिट्स:कितने सच्चे और कितने फर्जी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=476</link>
<pubDate>Mon, 17 Mar 2008 16:32:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=476</guid>
<description><![CDATA[मेरे लिए  कोई भी हिन्दी ब्लोग का फोरम ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे लिए  कोई भी हिन्दी ब्लोग का फोरम खास नहीं है और मुझे इनके किसी कर्णधार से कोई शिकायत भी नहीं है, पर हाँ पिछले कुछ दिनों से ब्लोग वाणी  पर कुछ ब्लोगरों के अधिक हिट देखकर कुछ ब्लोगरों को विचलित होते  देख  मुझे लगा की आज अपनी बात कहनी चाहिए -क्योंकि  मुझे भी इस फोरम से हिट मिलते हैं पर वह मेरे लिए अधिक मायने नहीं रखते.</p>
<p>बात हिन्दी  ब्लोग दिखाने में पहल करने वाले  नारद फोरम  से ही शुरू करें. अपना ब्लोग शुरू करने के  चार माह बाद मैं  वहाँ पर आया था, वह भी कुछ ब्लोगरों के सन्देश मिलने  के बाद. आप यकीन करिये जहाँ मैंने पहले खुद वहाँ पंजीकृत कराने  के लिए असफल प्रयास किया था और बाद में जब कुछ मित्रों के कहने पर अपना ईमेल भेज रहा था तो अधिक खुश नहीं था पर समय बलवान है और वहाँ मित्र मिलते गए और अब ४ अप्रैल को इस सफत को एक वर्ष पूरा होना है. ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग के बनने के बावजूद भी ब्लोगर नारद से कहीं और जाना नही चाहते थे. नारद खराब तो सबके मूड खराब. एक दिन नारद से परेशानी आई तो एक महिला ब्लोगर ने उसमें अपनी पोस्ट न दिखने की शिकायत की जबकि मैंने  उसकी पोस्ट को  ब्लोगवाणी पर देखा. नारद फोरम  वाले नाराज न हों इसलिए मैंने एक पोस्ट लिखी''नाराद का मोह न छोड