<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hindi-anubhuti &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-anubhuti/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-anubhuti"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:01:20 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःबिना मांगे मिली वस्तु ही अमृत समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 04:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</guid>
<description><![CDATA[१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।<br />
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।<br />
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।<br />
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।<br />
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।<br />
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है।<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःमैले वस्त्रों से स्त्री की रक्षा होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:03:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</guid>
<description><![CDATA[1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्रियों के पति बंधु और पति और विद्वानों का रक्षक ज्ञान होता है।<br />
2.सत्य से धर्म, योग से विद्या और सफाई से सुंदर रूप और सदाचार से कुल की रक्षा होती है<br />
3.तोलने से अनाज, फेरने से घोड़े, निरंतर देखभाल से गौऔं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।<br />
4.सदाचार से हीन मनुष्य का कुल ऊंचा हो तो भी उसे प्रतिष्ठित नहीं माना जा सकता है।<br />
5.जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य तथा प्रतिष्ठा से द्वेष करता है उसके रोग का कोई इलाज नहीं होता है।<br />
6.न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद या आलस्य करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही अपना मंत्र प्रकट हो जाने से बचना चाहिए और ऐसे किसी पेय का सेवन नहीं करें जिसे नशा चढ़ता हो।</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">"दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका"</a> पर लिखी गयी है। इसका पता इस प्रकार है। http://rajdpk.wordpress.com<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:47:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</guid>
<description><![CDATA[श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर
श्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर<br />
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप </p>
<p>other web pege<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
http://dpkraj.wordpress.com<br />
http://rajlekh.blogspot.com<br />
http://rajlkeh.wordpress.com<br />
http://zeedipak.blogspot.com<br />
http://deepakraj.wordpress.com</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःहमारे शरीर में विपत्तियां सहने की क्षमता होती है अधिक]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 04:48:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह<br />
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है। </p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।</p>
<p>मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया? </p>
<p>इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रसन्नता देने वाले को कुछ न देने वाले पशु समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 03:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत<br />
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।<br />
<strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं। कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:किसी के कहने से बड़े लोग छोटे नहीं हो जाते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=141</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 04:10:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=141</guid>
<description><![CDATA[
जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="deleteBody">
<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं<br />
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।</p>
<p><strong>जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय<br />
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।</p>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लोग ने भी पार  की दस हजार पाठको की संख्या-विशेष संपादकीय ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</link>
<pubDate>Thu, 29 May 2008 14:26:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=138</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/30bepg8.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज मेरा यह ब्लाग मेरे पूर्वानुमान  के अनुसार दस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। सच तो यह है इस बात लिखने का मेरा आज मन नहीं था, पर कई लोग विश्लेषणों दिलचस्पी रखते हैं। ब्लाग जगत में अंसख्य मित्र हैं वह शायद इस पाठ से बोर हों-यह सोचकर कि हर चौथे  दिन अपने ब्लाग के आंकड़ों को सामने रख देता है- पर फिर भी कुछ हैं जो अनुसंधान की दृष्टि से आंकड़ों में दिलचस्पी रखते है। इस ब्लाग को लेकर एक बार मेरे मन में कड़वाहट भर गयी थी और सोचा था कि इसके दस हजार पाठक संख्या पार कर दिखा दूंगा। दो दिन पहले भी यह ख्याल था पर फिर लगा कि यह सब तो चलता रहेगा। आपसी वाद विवादों पर क्या मन मैला करना? केवल संदेशों से सुसज्जित इस ब्लाग के लिए  एक टंकक हूं और मुझे अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।  </p>
<p>ब्लाग लेखकों के व्यूज कम हैं पर वह मेरे प्रेरक हैं। टिप्पणियां नगण्य हैं पर जितनी हैं वह किसी भी भारी भरकम ब्लाग पर अधिक लगने वाली टिप्पणियों से कम नहीं है। जैसा कि मेरे हर ब्लाग के साथ है समीर लाल, ममता श्रीवास्तव, मीनाक्षी जी, परमजीत बाली, विस्फोट (यही नाम मुझे याद आ रहा है) और महक जैसे कुछ नाम यहां अधिक है। आम पाठकों की संख्या (अगर उनमें मुझे कोई भ्रम नहीं है तो ) नब्बे प्रतिशत से अधिक है। मेरे तीन ब्लाग <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथि</a> और यह शब्दलेख पत्रिका अध्यात्म विषयों के लिए सुरक्षित हैं इसलिये इन पर ऐसा लिखना मुझे ठीक नहीं लगता कि किसी पर प्रहार होता लगे। यह मेरे सुबह लिखे जाने ब्लाग हैं तब मैं केवल इसी विषय पर सोचता हूं। ज्ञानी दिखने के लिए नहीं बल्कि लिखकर उसे धारण करने का प्रयास करता हूं।  इसका प्रभाव भी देखता हूं कि क्षमा और दया भाव में शक्ति है वह यहां से ही पता लगती है। चाणक्य से कहा है कि वक्त पड़े तो चतुराई भी दिखाओ पर उसका आशय यह कदापि नहीं है कि हमेशा छलकपट कर काम चलाओ। चाणक्य से कहा कि कभी क्रोध का प्रदर्शन करो-हां मुझे याद आ रहा है कि इस पाठ के रखने के दो दिन बाद मुझे ऐसा भी करना पड़ा था।<br />
एक कोने में पड़े इस शांत ब्लाग धीमी गति से चलता दिखत अवश्य है पर प्रतिदिन इस पर बड़ी संख्या में व्यूज होते हैं। कई बार तो पाठ लिखे हुए ब्लाग की संख्या इनसे पीछे रहती है और वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर वह इससे पिछड़ जाते हैं। </p>
<p>अधिक विश्लेषण करने के लिए और भी लोग हैं। केवल 101 पाठों में इतनी संख्या जुटाने वाला यह मेरा अकेला ब्लाग हैं।  भले ही ब्लाग लेखकों की संख्या इस पर कम है पर फिर भी उसके लेखक को अन्य ब्लाग पर तो वही प्रेरित करते है। समस्त ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को मेरी तरफ से शुभकामनाएं। साथ ही स्पष्ट बता देना चाहता हूं कि मेरे मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं हैं। जब हम आपस में एक जगह खड़े होते हैं तो वाद विवाद भी होते है। अगर मैं कुछ कभी किसी के लिए लिखता हूं तो उसे अपना समझकर लिखता हूं। शेष फिर कभी।</p>
<p>दीपक भारतदीप  </p>
<p><strong>१० हजार की संख्या में विभिन्न फोरमों से आये व्युज की संख्या जो कुल का दस प्रतिशत भी नहीं है.</strong><br />
Reffer Views<br />
blogvani.com 265<br />
narad.akshargram.com 84<br />
chitthajagat.in 27<br />
narad.akshargram.com/?show=all 23<br />
filmyblogs.com/hindi.jsp 22<br />
blogvani.com/Default.aspx?mode=tag… 21<br />
chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%A8%E0%A… 17<br />
blogvani.com/Default.aspx?count=100 16 </p>
<p><strong>विभिन्न पाठों को को पढने वालों की संख्या </strong></p>
<p>कबीर के दोहे:जह༯a&#62; 644<br />
चाणक्य नीति:प़्/a&#62; 305<br />
चाणक्य नीति:सम़/a&#62; 249<br />
रहीम के दोहे-कि༯a&#62; 224<br />
बाप-बेटे का होत 204<br />
दिल का राज, सिर ༯a&#62; 179<br />
चाणक्य नीति: वि༯a&#62; 172<br />
रहीम के दोहे:ह्༯a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:बु़/a&#62; 164<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 156<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 147<br />
श्री गणेश जी को  145<br />
जो कार लायक नही༯a&#62; 144<br />
चाणक्य नीति:कप़/a&#62; 143<br />
रहीम के दोहे:चत༯a&#62; 132<br />
सच-झूठ का अंतर्༯a&#62; 129<br />
परिचय  127<br />
चाणक्य नीति: शर༯a&#62; 118<br />
मेरा परिचय  115<br />
कुछ न पढा, रौनक ़/a&#62; 111<br />
विदुर नीति:जिस़/a&#62; 110<br />
रहीम के दोहे:गो༯a&#62; 106<br />
संत कबीर वाणी:ख༯a&#62; 102<br />
चीन ने आख़िर अप༯a&#62; 99<br />
चाणक्य नीति:अप़/a&#62; 97<br />
कवितायेँ और क़्/a&#62; 96<br />
रहीम के दोहे:व्༯a&#62; 93<br />
विदुर नीति:धनि़/a&#62; 92<br />
चाणक्य नीति-जरॼ/a&#62; 89<br />
चाणक्य नीति:सा़/a&#62; 87<br />
विदुर नीति:विदॼ/a&#62; 87<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 87<br />
मन के खोखलेपन क༯a&#62; 83<br />
प्रात:काल का आन༯a&#62; 81<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 81<br />
पापा ब्लोगर नं़/a&#62; 81<br />
विदुर नीति:अधरॼ/a&#62; 77<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 76<br />
क्या ब्लोग जगत ༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:श༯a&#62; 75<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 74<br />
चाणक्य नीति:हमॼ/a&#62; 73<br />
रामजी लगायेंगे 70<br />
नीयत पर भरोसा न༯a&#62; 68<br />
स्वेट मार्डेन:़/a&#62; 67<br />
कब कौन सा रंग सा 67<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 66<br />
चाणक्य नीति:दु़/a&#62; 65<br />
मनुस्मृति:अपनी 62<br />
वह भूत-भूत कर चि 60<br />
चाणक्य नीति:सभॼ/a&#62; 60<br />
ऐसा भी क्या अक्༯a&#62; 58<br />
चाणक्य नीति:स़्/a&#62; 57<br />
चाणक्य नीति:शा़/a&#62; 56<br />
मनुस्मुतिःस्त༯a&#62; 55<br />
रहीम के दोहेःप़/a&#62; 54<br />
चाणक्य नीति:अल 54<br />
चाणक्य नीतिःतप 53<br />
कैसे करते हैं व༯a&#62; 53<br />
क्रिकेट भी अब फ༯a&#62; 53<br />
कतिपय सम्मान प़/a&#62; 52<br />
मनु स्मृतिःधन ़/a&#62; 50<br />
चाणक्य नीति:इस ༯a&#62; 49<br />
चजइ-ब्लोगरों मॼ/a&#62; 48<br />
चाणक्य नीतिःसं 47<br />
इसलिए कवि हमेश़/a&#62; 46<br />
चाणक्य नीति:सु़/a&#62; 46<br />
कवि ब्लोगर आवे़/a&#62; 45<br />
चाणक्य नीति:पऱ/a&#62; 45<br />
संत कबीर वाणी:व༯a&#62; 45<br />
वही कहलाता है अ༯a&#62; 45<br />
मनुस्मृति: मां़/a&#62; 44<br />
संत कबीर वाणी:म༯a&#62; 42<br />
मनुस्मृतिःपरि༯a&#62; 41<br />
फ्लॉप हैं तो बे༯a&#62; 41<br />
एक बेकार खबर को  40<br />
चाणक्य नीति:असॼ/a&#62; 39<br />
शब्द बोलते जगह ༯a&#62; 39<br />
चजई-चिट्ठा जगत ༯a&#62; 38<br />
संत कबीर वाणी:क༯a&#62; 36<br />
मनुस्मृतिःविष༯a&#62; 36<br />
संत कबीर वाणी:ब༯a&#62; 35<br />
आस्ट्रेलिया का 35<br />
चाणक्य नीति:सं़/a&#62; 35<br />
मैं बिकने लायक ༯a&#62; 34<br />
क्रिकेट बहुत द़/a&#62; 34<br />
मनुस्मृति:ढोंग 33<br />
माफ़ी दी कि क़दम 33<br />
रहीम के दोहेःगॼ/a&#62; 32<br />
मनुस्मृतिःईमा༯a&#62; 32<br />
चाणक्य नीति:पै़/a&#62; 32<br />
शायद ही लोग समझ  32<br />
इस ब्लोग के बार༯a&#62; 32<br />
क्या लिखूं 'ब्ल༯a&#62; 30<br />
या इसे भ्रमवश ल༯a&#62; 28<br />
मनु स्मृतिःपर् 25<br />
संत कबीर वाणीः़/a&#62; 24<br />
होली के रंग फीक༯a&#62; 23<br />
अपनी मनस्थिति ༯a&#62; 22<br />
मनुस्मृतिःसदा༯a&#62; 19<br />
चजई- क्या सब चलॼ/a&#62; 17<br />
संत कबीर वाणी:ज༯a&#62; 14<br />
अंतर्जाल पर प़्/a&#62; 14  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</guid>
<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 05:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</guid>
<description><![CDATA[यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये<br />
अधिकं वापि विद्येत  सः सोम पातुमर्हति</strong> </span></p>
<p><span style="color:#003300;">जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज<br />
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-</strong>हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है।  अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं।  आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया  संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</guid>
<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति: मांस खाने से कभी स्वर्ग नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 04:33:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#800080;">यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च<br />
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;"><br />
ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्<br />
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत्</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है पर एक बात यह भी कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों का मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि हमारे देश में भी बलि के द्वारा पूजा की प्रवृति रही है। उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यह सब दिखावा है। आपने देखा होगा कि कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर कई जगह पशुओं की बलि देकर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। कई जगह ऐसी मन्नतें भी मांगी जाती है जिसमें उसके पूर्ण होने पर पशुओं की बलि देने की बात कहीं जाती है। यह सब ढोंग है जो कि मांसाहारी लोगों ने अपने फायदे के लिये शुरू किया था। जो लोग ऐसा करते हैं वह पाखंडी हैं और उनको कभी भी पुण्य प्राप्त नहीं हो सकता है। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">इसके विपरीत मांस से मानसिक और शारीरिक विकास उत्पन्न होते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं। इसलिये जिन लोगों को ऐसे भ्रम हैं कि बलि देने से उनके इष्ट प्रसन्न होते हैं उन्हें दूर  कर लेना चाहिए। <br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:इस अस्थिर संसार में धर्म ही अपना होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</link>
<pubDate>Sat, 15 Mar 2008 05:21:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</guid>
<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की  गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। </p>
<p><strong>व्याख्या-</strong> बाल्यावस्था, युवावस्था  और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही  अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों से -घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो - की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी जा सकती। अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।<br />
<strong>*व्याख्या-</strong> अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते-कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=86</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 16:28:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=86</guid>
<description><![CDATA[इंसानों की भीड़ में
कभी दर्द. कभी प्रे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इंसानों की भीड़ में<br />
कभी दर्द. कभी प्रेम<br />
और हास्य से सुसज्जित<br />
शब्दों से रचनाएं बरसाने वाले<br />
कवि अकेले क्यों हो जाते<br />
शायद इसलिए कि  पुराने भ्रमों में<br />
चलते हुए लोगों को<br />
वह कभी रास नहीं आते<br />
समाज के   लिए हमेशा  जूझते<br />
पर यकीन नहीं जीत पाते<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते  </p>
<p>भ्रम के निवारण की कोशिश<br />
अपराध क्यों माना जाता<br />
शायद इससे स्वर्ग का टिकट<br />
बेचने वालों   का धधा मारा जाता<br />
और उनकी ताकत पर चलता<br />
सारा यह गुलाम ज़माना<br />
जिसे हैं सर्वशक्तिमान की दुआ कमाना<br />
कवि का शब्द<br />
जिन्दगी के सच से उपजा<br />
भ्रम का शत्रु हो जाता<br />
भेड़ की तरह भेड़ियों के पीछे जाते लोग<br />
अपने अगुआ के कथन से<br />
अपने को आजाद करने से घबडाते<br />
बनाते सच्चे  शब्दों से दूरियां<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते </p>
<p>कोई कवि नहीं बेचता<br />
सर्वशक्तिमान के घर पहुंचाने का दावा<br />
स्वर्ग में सुरक्षित पहुंचाने का छलावा<br />
सुनकर कविता लोग खुश हो जाते<br />
जमकर तालियाँ बजाते<br />
पर फिर भ्रम के रास्ते जाते<br />
फिर पुराने किताबों में लिखे<br />
संदेशों को सुनाने वाले<br />
अपने ही आकाओं के जाल में फंस जाते<br />
तब  कवि के सच्चे शब्द ही<br />
सबसे बड़ा भ्रम नजर आते<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते     </p>
<p>फिर भी भाषा रचती है<br />
अपने लिए कुछ शब्दवीर<br />
जो अपने शब्दों से भले ही<br />
जमाने की बदल नहीं पाते तस्वीर<br />
पर सच के साथ ही चलते<br />
भले ही कैसी भी हो तकदीर<br />
अस्तित्वहीन भ्रम भले ही<br />
बढ़ता लगता<br />
पर  कवि के शब्दों के आईने में<br />
उनका असली चेहरा दिखता<br />
डरते हैं लोग जीवन के सच  से<br />
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते<br />
---------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैसे करते हैं वारे-न्यारे-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=79</link>
<pubDate>Sat, 02 Feb 2008 15:00:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=79</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज फिर घर और बोला
&#8221;दीपक बाप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज फिर घर और बोला<br />
''दीपक बापू यह भी भला क्या<br />
किताबों की  नक़ल छापते हो<br />
कभी लिखते किसी के समझ में<br />
न आने वाला चिंतन<br />
और कभी हास्य कविता लिखकर<br />
बस उसे ही झांकते हो<br />
कभी गरीबों पर भी लिखो<br />
भले ही उनका कल्याण मत करो<br />
पर उनके झंडाबरदार बनते दिखो<br />
तभी बनोगे नंबर वन ब्लोगर<br />
अभी तो खाली-पीली हांकते हो'</p>
<p>सुनकर चौंके और फिर  कीबोर्ड पर<br />
नाचती उंगलियाँ रोकी<br />
उतारी सिर से टोपी<br />
और चश्में को किया नाक पर<br />
कहैं दीपक बापू<br />
''अभी टीवी पर देखी थी हमने  एक खबर<br />
तुम तो होगे उससे भी बेखबर<br />
किया था एक डाक्टर ने<br />
फिर फिल्म में पुलिस वाले का रोल किसी टाईम<br />
करता था इधर गरीबों की किडनी उखाड़कर<br />
अमीरों को लगाने का क्राईम<br />
सब धंधों में हैं उसका नाम<br />
भले आदमी के लिए बचा है कोई काम<br />
इधर गरीबो के कल्याण के लिए  नारे लगाते<br />
उधर उसके लिए आती मदद अपनी<br />
जेब में ही कर जाते<br />
क्या उनकी तरह हम भी नारे लगाकर<br />
करें गरीबों का कल्याण<br />
हमारे यहाँ वर्जित हैं बताना किया गया दान<br />
रहा हमारे लिखने का सवाल<br />
उससे भला क्या मचेगा बवाल<br />
गरीबी पर लिखा या फिल्म में रचा<br />
अमीर देशों में अंग्रेजी में ही बिकता<br />
वहाँ नहीं है दर्द इस देश के गरीबों जैसा<br />
इसलिए लिखने वाले कमा लेते<br />
उन पर लिख कर पैसा<br />
हम लिखें क्या जिन्होंने लिया<br />
उनके दर्द को बेचने का ठेका<br />
वह भी हारने लगे  है<br />
अमीरों का राज  चलेगा<br />
यह वह भी मानने लगे<br />
गरीबों के दर्द पर लिखने से<br />
उनकी गरीबी दूर होती तो हम भी<br />
कई वाद चलकर नारे लगाते<br />
अपने लिए बहुत सारे सामान  जुटाते<br />
पर ऐसे में अपने से दूर हो जाते<br />
तुम ने भी खूब सुने हैं वाद और नारे<br />
देखा होगा कैसे करतें हैं लोग<br />
गरीब की जमीन और किडनी छीनकर<br />
अपने वारे-न्यारे<br />
फिर अब इसके लिए हमारे<br />
कीबोर्ड पर क्यों झांकते हो<br />
------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट बहुत दिन बाद जनचर्चा का विषय बना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 16:36:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9a%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल बीस ओवरीय विश्वकप प्रतियोगिता के सेमी फाइनल में आस्ट्रेलिया को हारने के बाद शुरू हुई। पहले ऎसी चर्चा १९८३ में शुरू हुई थी बाजार में लोगों को जमकर भुनाया गया और विश्व में आर्थिक रुप से गरीब कहे जाने वाला भारत क्रिकेट का आर्थिक आधार बन गया। फिर एक दौर एसा आया कि भारतीय टीम अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर तो अच्छा प्रदर्शन करती पर प्रतियोगिताओं में पिट कर आ जाती। क्रिकेट के कर्ण धारों को लगता कि अन्तराष्ट्रीय दौरों के सफलता से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बरकरार रहेगी और उन्होने प्रतियोगिताओं को भी सामान्य रुप से लिया और पिछले विश्व कप के बाद भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो गयी भले ही क्रिकेट से जुडे लोग इसे नही मानते हैं पर इसके आर्थिक पक्ष से जुडे विशेषज्ञ इस पहलू को जानते हैं कि लोगों में अगर लगाव अधिक नहीं है तो उसका फ़ायदा नही उठाया जा सकता है।</p>
<p>बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि'कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना'।</p>
<p>कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।</p>
<p>बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।</p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
