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	<title>hindi-abhivyakti &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hindi-abhivyakti/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-abhivyakti"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 11:00:40 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[मनुस्मृतिःबिना मांगे मिली वस्तु ही अमृत समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 04:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=181</guid>
<description><![CDATA[१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।<br />
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।<br />
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।<br />
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।<br />
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।<br />
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है।<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःसफलता के मद में उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करना वर्जित]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</link>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 04:06:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=179</guid>
<description><![CDATA[1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.किसी विशेष उद्देश्य से किए गए कर्म से पहले उसका महत्व समझ लेना चाहिए। अपना काम प्रारंभ करने से पहले पूरी तरह सूच विचार करना ठीक है। उतावली से कोई भी काम आरंभ नहीं करना चाहिए।<br />
2.घैर्यवान मनुष्य क लिए यह उचित है कि पहले अपने कर्म का उद्देश्य, संभावित परिणाम तथा  उससे होने वाले लाभ से अपने जीवन के विकास का विचार कर कार्य प्रारंभ करे।<br />
3.जो मनुष्य अपनी स्थिति, लाभ,हानि, धन, देश तथा दण्ड का विचार नहीं कर सकता वह कभी अपने जीवन में स्थिर नहीं रह सकता।<br />
4जो मनुष्य उपलब्ध तथ्यों के प्रमाण को सही तरह से जानता है और धर्म अर्थ का जिसे पूर्ण ज्ञान है वही दत्त चित होकर अपना कार्य कर पाता है और विकास की तरफ बढ़ता है।<br />
5.जिसे सफलता प्राप्त हो गयी है उसे अगर गर्व में चूर होकर किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार सपंत्ति तथा उपलब्धि को नष्ट कर देता है जैसे सुंदरता को बुढ़ापा<br />
................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका </a>पर लिखा गया पाठ है।<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिःमैले वस्त्रों से स्त्री की रक्षा होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:03:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=176</guid>
<description><![CDATA[1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.पशुओं के बादल, राजाओं के मंत्री, स्त्रियों के पति बंधु और पति और विद्वानों का रक्षक ज्ञान होता है।<br />
2.सत्य से धर्म, योग से विद्या और सफाई से सुंदर रूप और सदाचार से कुल की रक्षा होती है<br />
3.तोलने से अनाज, फेरने से घोड़े, निरंतर देखभाल से गौऔं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।<br />
4.सदाचार से हीन मनुष्य का कुल ऊंचा हो तो भी उसे प्रतिष्ठित नहीं माना जा सकता है।<br />
5.जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य तथा प्रतिष्ठा से द्वेष करता है उसके रोग का कोई इलाज नहीं होता है।<br />
6.न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद या आलस्य करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही अपना मंत्र प्रकट हो जाने से बचना चाहिए और ऐसे किसी पेय का सेवन नहीं करें जिसे नशा चढ़ता हो।</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">"दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका"</a> पर लिखी गयी है। इसका पता इस प्रकार है। http://rajdpk.wordpress.com<br />
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-सूर्य के सामने दीपक क्या करेगा?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Wed, 16 Jul 2008 04:03:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर सकता है? अमीर आदमी को दान देने से क्या लाभ? जिसके पास पर्याप्त मात्रा में धन हो उसके सामने दान दी गयी वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। दान सदैव निर्धन को दिया जाना चहिए।<br />
2.निर्धन सदा धन की तलाश में भटकते हैं, उनके हृदय में सद धनी बनने की आकांक्षा बनी रहती है<br />
3.प्रत्येक मनुष्य की यह इच्छा रहती है कि वह मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करे। अपनी पूरी आयु इसी इच्छा की पूर्ति में नष्ट कर देता है। सभी इंसान अपनी इच्छाओं के दास बनकर रहे गये हैं।</strong></p></blockquote>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>हमारे देश के लोगों में  दान की प्रवृत्ति जन्मजात रहती है। सामान्य आदमी हमेशा थोड़ा बहुत दान करता है पर यह दान अधिकतर कुपात्रों को मिलता है-यह दान उन भिखारियों को मिलता है जो अधिकतर मंदिरों के बाहर खड़े होते हैं और उनकी यह आदत होती है न कि बाध्यता। इसके अलावा उन तथाकथित गुरुओं और संतों को मिलता है जिनके लिये भक्ति और ज्ञान बेचना एक व्यवसाय है। वह इस धन से तमाम तरह के आश्रम बना लेते हैं और फिर उनका उपयोग भी व्यवसायिक ढंग से धर्म के नाम पर ही करते हैं। </p>
<p>ऐसे अनेक किस्से आते हैं कि अमुक भिखारी मरा तो उसके घर से ढेर सारा धन बरामद हुए। कई लोग तो अच्छा खासा परिवार होते हुए भी भीख मांगते हैं क्योंकि यह एक आदत है जिसे पड़ जाये वह छूटती नहीं है। अतः दान हमेशा ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। वह मांगता न हो पर उसकी आवश्यकता हमारी दृष्टि में आ जाये तो उसकी सहायता करना चाहिए। यह सहायता इस तरह करना चाहिए जैसे कि उसे न लगे कि हम दान कर रहे हैं। यही सच्चा दान है। मांगने पर यह बताकर दान करने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःस्वर्ग का विचार करना ही व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 05:29:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=164</guid>
<description><![CDATA[स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः<br />
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान  में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्योंकि  तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास के रूप में ही प्राप्त होता  है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अनेक कथित ज्ञानी  लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।<br />
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे-प्रेम मे टेढ़ी चाल न चलें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 03:55:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=163</guid>
<description><![CDATA[फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर<br />
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।</p>
<p><strong>प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं<br />
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है। सच तो यह है कि आजकल आम जीवन मेंप्रेम एक तरह से चालाकी करने का हथियार बन गया है। जिसके पद, पैसा और प्रतिष्ठा है उसके सामने सभी लोग प्रेम करने का नाटक करते हैं जबकि जो असहाय है उससे सभी मूंह फेरते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक पोस्ट  ने की एक हजार पाठक संख्या पार-संपादकीय]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 14:51:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ ‘कबीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस ब्लाग/पत्रिका का मेरा यह पाठ <a href="http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/25/jahaan-kadr-n-ho-vahaan-n-jaayen/">‘कबीर के दोहेःजहाँ अपने गुण की कद्र न हो वहाँ न जाएं’</a> एक हजार की पाठक संख्या को पार कर गया। इससे पहले ई-पत्रिका का पर भी कबीरदास जी का एक पाठ एक हजार की संख्या पार कर कर चुका है।</p>
<p>मैं अक्सर अपने पाठों पर आने वाले पाठकों के मार्ग और शब्द देखता हूं। उससे यह पता लगता है कि आम पाठकों की रुचियां किस विषय में हैं।<br />
25 दिसम्बर को मैंने उपरोक्त पाठ लिखा था और उस समय ही इस ब्लाग की शूरूआत की थी। वैसे मेरा मेरा यह ब्लाग 13246 पाठक संख्या पर पहुंच चुका है। इस ब्लाग पर मैं अपनी रुचि के अनुसार अध्यात्म विषय पर ही लिखता हूं। मेरे दो अन्य ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘अंतर्जाल पत्रिका’</a> और <a href="http://deepkraj.blogspot.com">’शब्दलेख सारथी’</a> भी केवल अध्यात्म विषयों से संबंधित ब्लाग ही हैं। मैं बचपन से ही अध्यात्म विषयों में रुचि लेता रहा हूं पर अंधविश्वासों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है। इसी कारण बिना अध्यात्म विषयो पर लिखे मुझे आनंद नहीं मिलता। यह संयोग ही है कि मुझे ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला तो मैंने उसका उपयोग अपनी रुचि के अनुसार किया।<br />
एक अनुभव जो मुझे यहां हुआ कि हमारे देश के समस्त प्रदेशों लोग आध्यात्म विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कुछ लोग उनकी भक्ति भावनाओं  दोहन अपने अर्थोपार्जन करने के लिये करते हैं। रहीम और कबीर के दोहे अनेक संत अपने प्रवचनों में सुनाते हैं मगर वही जिनसे वह गुरू कहला सकें। संत कबीर जी ने गुरू की महिमा का बखान तो किया है पर ऐसे गुरूओं से सतर्क रहने का आग्रह किया है जो ढोंगी हैं-उनके उन दोहों को कोई नहीं सुनाता क्योंकि इससे लोगों के दिमाग में चेतना आयेगी और वह उनक चरित्र का विश्लेषण करेंगे।</p>
<p>मैंने महापुरुषों के संदेश निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि स्वयं के चिंतन के लिये किया था। मैं ब्लाग/पत्रिका को अपनी डायरी की तरह इस्तेमाल करता हूं। यह लिखते लिखते कई बातें मैं अपने दिमाग में धारण कर चुका हूं और इसलिये कहीं वार्तालाप में पहले से अधिक प्रभावी सिद्ध होता हूं। इसका कारण यह है कि मैं लिखते हुए उन संदशों को अपने मस्तिष्क में धारण करता हूं। इसलिये वह कहीं वार्तालाप में प्रकट हो जाते हैं और फिर कई जगह व्यवहार में सतर्कता का भाव भी पैदा होता है। अपने अध्ययन और चिंतन के लिये शुरू मुझे इन प्रयासों ने जो लोकप्रियता दिलाई वह मुझे हैरान कर देती है। अक्सर सोचता हूं कि जब महापुरुषों के संदेश भर रखने से ही मुझे इतना प्यार और सम्मान मिलता है तो फिर उनका उपयोग वह व्यवसायिक प्रवचन करने वाले  कथित संत क्यों नहीं प्राप्त करेंगे? यह अलग बात है कि वह इन संदेशों में अपना नमकमिर्च लगाकर लोगों को इस तरह सुनाते हैं कि लोग केवल उनका चेहरा ही ध्यान रखें और सब भूल जायें।<br />
हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रेगेटरों के यहां भी इन संदेशों को पढ़ने वाले बहुत हैं और मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित करते हैं। सुबह के समय जब यह संदेश लिखकर मैं जाता हूं तो मेरे ब्लाग लेखक मित्र इनको देखते हैं और टिप्पणियां देते हैं। कुछ मित्र औपचारिक टिप्पणी डालते हैं पर ऐसे संदेशों पर अधिक लिखने की गुंजाइश भी कहां होती है। हां, मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है। आम पाठक निरंतर मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं पर इन संदशों को पढ़ते हैं और यही मुझ मामूली टंकक का पारिश्रमिक है। आखिर इसमें मैं टंकण के अलावा क्या करता हूं?’ मेरी अध्यात्मक रुचि का यह रथ चलते रहने के पीछे पाठकों और ब्लाग लेखक मित्रों का ही योगदान है।</p>
<p>..................................................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःपशुओं  की टांग खाने पर दवा भी लेनी पड़ती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</link>
<pubDate>Tue, 08 Jul 2008 04:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=159</guid>
<description><![CDATA[रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु ख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है कि लोग तो  भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-</strong>वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।</p>
<p>आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिये लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान  कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। हृदय से भक्ति करने के लाभ होते हैं यह अब विज्ञान भी मानने लगा है। भजन भक्ति करते हुए आदमी सांसरिक विषयों से अपने मस्तिष्क को मुक्त कर लेता है और इस कारण उसका शुद्धिकरण हो जाता है। ध्यान को मन खुश करने के लिये एक बहुत बड़ा साधन माना गया है। अगर भगवान का नाम हृदय से स्मरण किया जाये तो अनेक विकार स्वतः परे जायेंगे, इसमें संशय नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 01:17:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=158</guid>
<description><![CDATA[पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल<br />
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।</p>
<p><strong>पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय<br />
वह अक्षर इनमे नहीं हंसि दे भावे रोय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये। </p>
<p>अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए। जब तक मनुष्य को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है तब तक वह गुलामों की भांति विषयों के पीछे भागता है और धन, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठित लोगों की चाटुकारित का अपने का धन्य समझने लगता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीः साधुओं को मानते नहीं मसखरों को देते सम्मान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:05:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=157</guid>
<description><![CDATA[कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय<br />
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय </strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या</strong>-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पात्र नहीं बने]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=156</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:22:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय<br />
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।</p>
<p>कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’</p>
<p>हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=154</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:47:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर
श्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर<br />
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।<br />
-------------------------------<br />
दीपक भारतदीप </p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम तो स्वार्थ का होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:02:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=153</guid>
<description><![CDATA[प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं<br />
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है। </p>
<p>आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:परमात्मा का महत्व स्वीकार करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=151</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 05:38:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=151</guid>
<description><![CDATA[रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक</p>
<p>दांत दिखावत दीन है, चलत घिसावत नाक</strong> </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की हाथी के समान किसी में शक्ति नहीं है परन्तु वह भी परमात्मा के महत्त्व को स्वीकार करता है और दोनों दंत दिखाता हुआ पृथ्वी पर नाक रगड़कर चलता है।</p>
<p><strong>रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत</p>
<p>चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की कठोर चिंताओं के से अपने को मुक्त कर अपने चित पर नियंत्रण करो क्योंकि चिता तो प्राणहीन प्राणी को जलाकर राख कर देती है परन्तु चिंता तो जिंदा प्राणी को ही जलाकर भस्म कर देती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>कई लोगों अपने देहाभिमान के साथ अपने दौलत का भी अहंकार होता है और वह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इसके अलावा कुछ लोग भगवान की भक्ति तो करते हैं पर मन में उसके प्रति विश्वास का भाव नहीं होता। भक्ति करने के बाद अपनी दिनचर्या में ऐसे लिप्त हो जाते हैं जैसे कि वह स्वयं ही कर्ता हों। उनकी मान्यता यह है कि ईश्वर ने हाथ पांव दिये हैं बुद्धि दी है तो कर्म तो हमें ही करना है तभी तो फल मिलेगा। यह विचार दर्शाता है कि उनमें ईश्वर के प्रति विश्वास नहीं है। कर्म करना है यह सत्य पर अपने अंदर यह विश्वास भी बनाये रखना है कि दाता तो वही परमात्मा है। कोई अमीर हो या गरीब काम सबके हो जाते हैं पर भ्रम यह रहता है कि अमीर पर भगवान की कृपा है और गरीब पर नहीं। यह भाव भक्ति से परे करता है क्योंकि इससे अहंकार और कुंठा का भाव पैदा होता है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:49:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय<br />
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि  न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><strong>यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत<br />
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। अतःऐसे लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:समय छोटे आदमी को भी बड़ा बना देता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</link>
<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 04:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=146</guid>
<description><![CDATA[
छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
<strong>छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख<br />
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।<br />
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महकने देना यह चमन-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 12:05:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=142</guid>
<description><![CDATA[
महकने देना यह चमन
कलियों को फूल बनने द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/inbgih.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
<strong>महकने देना यह चमन<br />
कलियों को फूल बनने देना<br />
बिखरेगी जब चारों तरफ सुगंध<br />
तुम भी आनंद विभोर हो लेना<br />
डर का साया हो अगर तुम्हारे दिल पर<br />
तो उसे भी सहेज लेना<br />
अमन के दुश्मन बहुत हैं<br />
चमन को उजाड़ दें<br />
ऐसे उल्लू भी अमूमन बहुत हैं<br />
पर हवायें जिन्हें बहलाकर<br />
जल उन्हें नहलाकर<br />
सूरज उनको सहलाकर<br />
देते हैं इस धरती को उपहार<br />
जिससे बिखर जाती है खुशबू चारों ओर<br />
ऐसे फूलों को ही जीवन देना<br />
ओ, बाग के माली!<br />
भले ही तेरे इस बाग में<br />
खिले हुए फूलों की खुशबू से<br />
जमाना महकता हो<br />
तेरा नाम लेकर कोई नहीं चहकता हो<br />
पर तू  और  तेरा रब सच जानता है<br />
यह बात समझ लेना<br />
...............................<br />
दीपक भारतदीप </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार कार्य करना ही बुद्धिमानी]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Wed, 04 Jun 2008 03:40:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</guid>
<description><![CDATA[१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा  कभी-कभी अपने  बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
२.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।<br />
३.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है। पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पसु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।<br />
४.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणीःहमारे घट में है ज्ञान का भंडार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=136</link>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 05:00:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=136</guid>
<description><![CDATA[(यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवीं पोस्ट है)
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><strong>(यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवीं पोस्ट है)</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong></strong><br />
<strong>सहकामी तू घट में करै, घट ही में करतार<br />
घट ही भीतर पाइये, सुरति शब्द भण्डार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीर दास हृदय को जो धारण किये है वही सबका करतार है। इसी हृदय के भीतर ज्ञान और सत्य का अपार भंडार है अगर हम उसे पा लें तो जीवन सफल हो जायेगा।<br />
 <br />
<strong>सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम<br />
निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो कामना रखकर परमात्मा का भजन करते हैं उनको उत्तम फल की प्राप्ति होती है परंतु जो निष्काम भाव से भगवान श्रीराम का स्मरण करते है उन्हें अविनाशी परमात्मा के अवश्य दर्शन होते हैं।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>संत कबीरदास जी ने यहां सकाम भक्ति का भी फल बताया है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि बिना हृदय में धारण किये उसमें भी सफलता मिल जायेगी। वह अपने दोहों के निरंतर इस बात पर जोर देते हैं कि हृदय में ही परमात्मा का ढूंढो तभी ज्ञान और सत्य के भंडार की प्राप्ति होगी। आजकल हम देखते हैं कि सकाम भक्ति के नाम पर भी ढोंग का बोलबाला है।  लोग तमाम तरह की मूर्तियों की पूजा करने को अलावा कथित ढोंगी संतों को अपना गुरू बनाते है। कबीर दास यह भी कहते हैं कि जो केवल रटकर ज्ञान सुनाते हैं उनको अपना गुरू बनाने से कोई भी लाभ नहीं होता। वह उन्हें सकाम भक्ति का वह रास्ता बताते हैं जिसमें परमात्मा की जगह गुरू की मूर्ति घरों में रखवाकर उसकी पूजा करवाते हैं। तमाम तरह की दक्षिण और दान मांगते हैं। सांसरिक पदार्थ इस तरह भेजते हैं जैसे उनका नाम लिख जाने से वह पवित्र हो गये हों। यह कथित सकाम भक्ति भी किसी काम की नहीं है। उसके लिये भी यह आवश्यक है कि भगवान को हृदय में धारण किया जाये।<br />
<strong>नोट-यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवी पोस्ट है और इसके लिये ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई क्योंकि उनकी प्रेरणा से ही यह कार्य संभव हो सका&#60;</strong></p>
<p><strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःगुणहीन व्यक्ति पशु के समान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</link>
<pubDate>Sat, 17 May 2008 05:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=135</guid>
<description><![CDATA[रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन
सहि ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन<br />
सहि के सोच बेसाहियो, गया हाथ को चैन<br />
</strong>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों को नयनों के माध्यम से प्रेम संबंध हो जाता है, वह दुनियां का कोई विचार नहीं करते। जो लोग ऐसा प्यार करते हैं उनको यह समझ लेना चाहिए कि उनके जीवन का चैन गया और सब कुछ सहकर इस झगड़े को मोल लेना चाहिए।</p>
<p><strong>रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान<br />
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिन पूंछ बिषान </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों में विद्या, बुद्धि, धर्म, यश और दान जिस व्यक्ति में नहीं है उनका इस धरती पर जन्म लेना ही व्यर्थ हो जाता है। वह लोग पशु के समान हैं।</p>
<p><strong>रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार<br />
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि  पाप के धन को नष्ट होने में अधिक देर नहीं लगती-जैसे चोरी कर होली की लकड़ी लायी जाती है* और वह कुछ ही पल में जल जाती है।<br />
*पहले होलिकोत्सव पर लकड़ी लाने के लिए चोरी की जाती थी। समय के अनुसार अब यह परंपरा लुंप्त होती जा रही थी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=127</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 05:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये<br />
अधिकं वापि विद्येत  सः सोम पातुमर्हति</strong> </span></p>
<p><span style="color:#003300;">जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज<br />
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-</strong>हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है।  अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं।  आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया  संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृतिःपर्वों पर मंदिरों में अवश्य जाना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=126</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:04:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्<br />
ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूदेव च पर्वसु</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">अपनी रक्षा तथा कल्याण के लिये अमावस्या तथा पूर्णिमा जैसे पर्वों पर देवताओं, धार्मिक पुरुषों तथा श्रेष्ठ अध्यात्मिक विद्वानों तथा भगवान के घर अवश्य जाना चाहिए। </span></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनञ्जनम्<br />
पूर्वान्ह एवं कुर्वीत देवतानां च पूजनम्</span></strong></p>
<p><span style="color:#003300;">दिन के प्रथम पहर में ही अपने मल-मूत्र का त्याग, दंत मंजन, स्नान, आंखें में अंजन लगाना तथा पूजन आदि कर्म करने चाहिए।</span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हमारे यहां अनेक पर्व मनाये जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में मेलमिलाप करना होता है। जबकि लोग इसको केवल अपने उल्लास मनाने का समय मानते हैं। यह क्षणिक उल्लास केवल पकवान खाने या फटाखे जलाने से प्राप्त नहीं होता न ही अपने कथित गुरूओं के आश्रम पर पिकनिक मनाने ने प्राप्त होता है। जब ऐसा कोई पर्व का दिन हो तो उस दिन सच्चे संतों की संगत करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि साधु संत कोई गेहुंए रंग के वस्त्र धारण किये हो। हमारी मित्र मंडली या आसपास ऐसे भक्त होते हैं जो वास्तव में गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं ऐसे लोगों के पास जाना चाहिए। इसके अलावा मंदिर आदि भी जाना चाहिए। यह सच है कि वहां पत्थर या लकड़ी  की मूर्ति होती है और परमात्मा का निवास तो हमारे मन में है पर चक्षुओं वह इंद्रिय है जिससे हम उसका स्वरूप ग्रहण कर ध्यान लगाते हैं। दरअसल मूर्ति पर जब हमारा ध्यान जाता है तो वह दुनियांवी विचारों से प्रथक होकर नवीनता का भाव ग्रहण करता है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ लोग कहते हैं कि मूर्तियों की पूजा से क्या होता है हम तो मन में ही ध्यान कर लेते हैं। यह एक छलावा है। हमारा मन तो आंख से देखी, कान से सुनी, कान से सूंधी और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं में ही भटकता है। ऐसे मे अगर हमने अपने चक्षुओं से परमात्मा का स्वरूप ग्रहण किया तो मन में पवित्रता का भाव आता है। हमारे अध्यात्म मनीषियों को आज भी कोई चुनौती नहीं देता और अगर उन्होंने मूर्तिपूजा को बनाया है तो इसलिये कि उन्होंने मनुष्य मन की प्रभुता और उसकी कमजोरियों को समझा है। कुछ लोग मूर्तिपूजकों में तमाम दोष देखते हैं-अमुक आदमी तो ढोंगी है बस मूर्तियां पूजता है और मूर्ति में क्या रखा है-आदि बातें कहते हैं। ऐसे लोग अपने अंदर दोष देखें तो हजार दोष उनमें दिखाई देंगे। आकर्षक होटल देखकर उसमें खाना खाने जायेंगे। पार्कों में जाकर हवा खाते हुए महत्वहीन बातें करेंगे। कहीं अपने  लोगों के तो कहीं आकर्षक पत्थर और लोहे की  इमारतों के फोटो खीचेंगे और सबको दिखाएंगे। उनमें उनको सार्थकता दिखाई देती है पर मूर्तिपूजा में हजारों दोष दिखाई देते हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">देश में कई लोग मंदिरों में जाते हैं। कहते हैं अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है उसी तरह जो निरंतर मंदिर जाते हैं उनके मन में शांति और भक्ति का भाव तो आ ही जाता है। जो लोग मंदिर नहीं जाते े वह इस बात को नहीं समझ सकते। हां यह मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि मूर्ति का स्वरूप अपने ध्यान में रखकर अंततः निराकार की तरफ जाना चाहिए न कि वहीं अपना  ध्यान टिकाए रखना चाहिए। वह भक्ति का चरम तो है ही अनेक प्रकार का ज्ञान स्वतः हमारे मस्तिष्क में आने लगता है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति: मांस खाने से कभी स्वर्ग नहीं मिलता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 04:33:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#800080;">यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च<br />
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;"><br />
ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्<br />
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत्</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है पर एक बात यह भी कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों का मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि हमारे देश में भी बलि के द्वारा पूजा की प्रवृति रही है। उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यह सब दिखावा है। आपने देखा होगा कि कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर कई जगह पशुओं की बलि देकर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। कई जगह ऐसी मन्नतें भी मांगी जाती है जिसमें उसके पूर्ण होने पर पशुओं की बलि देने की बात कहीं जाती है। यह सब ढोंग है जो कि मांसाहारी लोगों ने अपने फायदे के लिये शुरू किया था। जो लोग ऐसा करते हैं वह पाखंडी हैं और उनको कभी भी पुण्य प्राप्त नहीं हो सकता है। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#800080;">इसके विपरीत मांस से मानसिक और शारीरिक विकास उत्पन्न होते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं। इसलिये जिन लोगों को ऐसे भ्रम हैं कि बलि देने से उनके इष्ट प्रसन्न होते हैं उन्हें दूर  कर लेना चाहिए। <br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
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