<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>hasya-vyangy &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hasya-vyangy/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hasya-vyangy"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 14:42:15 +0000</pubDate>

	<generator>http://wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[नकली जिंदगी की खातिर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=517</guid>
<description><![CDATA[फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया
सच ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">फिल्मों में ही होता है चक दे इंडिया<br />
सच में तो सब जगह है<br />
एक ही नारा गूंजता है भग दे इंडिया<br />
फिल्म में हाकी की काल्पनिका कहानी ने<br />
देश में खूब नाम कमाया<br />
ओलम्पिक से हाकी टीम का<br />
‘नो एंट्री’ संदेश आया<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘फिल्मों में नकली हीरो और<br />
नकली कहानी पर फिदा होकर लोग<br />
उसी राह पर चल रहे हैं<br />
ख्वाबों ही देख रहे हैं तरक्की की सपना<br />
पर सबका कर्म और भाग्य होता अपना<br />
आखें से देखते नजर आते हैं<br />
पर देख कहां पाते हैं<br />
कानों से सुनते तो दिखते<br />
पर कितना सुन पाते हैं<br />
अपनी अक्ल रख दी है<br />
नकली ख्वाबों की अलमारी में बंद<br />
गुलामों की तरह दूसरे के<br />
इशारे पर चले जाते हैं<br />
पर्दे पर देखते जो जिंदगी<br />
उसे ही सच करने के कोशिश में<br />
बुझा देते हैं अपनी जिंदगी का दिया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;"><br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हम कहां जा रहे हैं-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 10:57:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=515</guid>
<description><![CDATA[आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;">आज जब हिन्दी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों को दौरा किया तो लगा कि जैसे व्यंग्य के लिऐ कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं है। अक्सर  व्यंग्य लिखने के प्रयास में रहता हूं और इसके लिये मुझे विषय की आवश्यकता होती है। पहले जब सीधे यूनिकोड में लिखता था तो गद्य में व्यंग्य लिखने से बचता था और इसीलिये हास्य कविताओं से काम चलाता था जिसमें विषय को स्पष्ट करने में कठिनाई होती थी अब जब कृतिदेव में मेरे लिये लिखना सरल हुआ है तब से विषयों को लेकर कोई समस्या नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आज एक ब्लाग देखा जिसमें लिखा था कि ब्लाग चूंकि फ्री में है इसलिये चाहे जो उस पर लिख रहा है और इस तरह ब्लागिंग दिशाहीन हो रही है। मैंने सोचा था कि उसमें कोई भारी भरकम विचार होगा पर जब ब्लाग खोला तो पाया कि केवल दस लाईनें लिखीं हैं। ऐसा-वैसा बस और कुछ नहीं। अब ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उसकी दिशा क्या हो? इसका जवाब उसमें नहीं लिखा था। लिखने वाले ने भी लिखने के लिये लिखा था और उसे जोरदार हिट मिले थे।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">यह फोरम हिंदी ब्लागिंग को दिशा देने के लिये सज्जन लोगों ने बनाये पर वहां आकर अच्छा खासा लेखक दिशाहीन हो ही जाता है। रोज जो दोस्तों से हिट और कमेंट मिलते हैं उसे पचाना आसान होगा यह तो हम नहीं मानते क्योंकि हमें न तो इतने हिट मिलते हैं और न ही कमेंट। सो पता नहीं उसको पचाने के लिये कितनी देर वज्रासन में बैठना पड़ेगा। फोरमों पर अपने ब्लाग फ्लाप देखकर दिल को तसल्ली होती है कि अब कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिट मिलेंगे तो लोगों की दृष्टि में आ जायेंगे और वह फिर तमाम तरह के मीनमेख निकालने लगेंगे। फिर उनका जवाब देते फिरो। समय की खराबी और ऊर्जा के निरर्थक विसर्जन के अलावा उसमें कुछ नहीं हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">अब लोग लिख रहे है कि ब्लागिंग दिशाहीन है तो फिर उनका खुद का लिख किस दिशा से आया और किस दिशा को जा रहा है यह हम पूछ सकते थे पर लगा कि ख्वामख्वाह में उनको नाराज कर दें। इसीलिये अपना ही एक व्यंग्य लिख दें। वह इसे पढेगे ही नहीं क्योंकि किसकों यहां पता हम किसको पढ़कर लिख रहे हैं। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">सभी आदमी सब जगह दौड़े जा रहे हैं।  दिशा का पता नहीं पर दौड़े जा रहे हैं।  एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि ‘आखिर हम किस दिशा में दौड़ रहे हैं?’</span></p>
<p><span style="color:#003300;">पर कोई किसी को जवाब नहीं देता। पूछते सब ही हैं जब थककर सांस लेते हैं। उस समय सब दौड़ रहे होते हैं और जवाब इसलिये नहीं देते कि क्या पता फिनिशिंग टच में ही इस दौड़ प्रतियोगिता में पिछड़े गये हैं तो गया जो मिलने वाला होगा। क्या? इसका किसी को पता नहीं है।</span></p>
<p><span style="color:#003300;">सो ब्लागिंग भी ऐसे ही है। सब लिखे जा रहे है कि हो सकता है आगे कोई पुरस्कार वगैरह मिल जाये तो हो सकता है कि समाज में थोड़ा सम्मान बढ़ जाये। अब 2008 चल रहा है और साल भर इसी तरह कुछ लाईने लिखते रहे तो हो सकता है इस साल के नाम पर मिलने वाला कोई पुरस्कार ही हाथ लग जाये। इसी तरह ही लिखते जाओ। ब्लागरों पर कुछ भी लिख दो हिट हो जाता है। आम पाठक के लिये वह दो र्कौड़ी का नहीं है। इसीलिये हम ब्लागरों को विषय इस तरह बनाते हैं कि वह आम पाठक को भी समझ में आये कि इंटरनेट पर ईमेल के विस्तार के रूप में एक ब्लाग भी होता है जिस पर लोग कुछ लिखते भी हैं और वह ब्लागर कहलाते हैं। हमारे लिये यह ईमेल का विस्तार ऐसे ही जैसे एक पत्रिका। जिस तरह एक रजिस्टर का इस्तेमाल एक गणित का छात्र भी करता है तो एक लेखक उस पर अपनी रचनाएं लिखता है-कुछ लोग डायरी भी लिखते हैं पर वह लेखक नहीं कहलाते।<br />
 हम तो एक लेखक की तरह लिखने का काम कर रहे हैं। हमारी नजर में ब्लागर वह हैं जो ब्लाग का ईमेल के विस्तार की तरह इस्तेमाल करते हैं और लेखक वह हैं जो इसे अपनी रचनाओं के लिखने के लिये उपयोग करते हैं। जिस तरह रजिस्टर पर लिखा गया सभी लोगों के उपयोग का नहीं होता। वैसे ही हाल ब्लाग का है। हम इतनी बड़ी पोस्ट लिख रहे हैं यह फोरमों पर फ्लाप हो जायेगी पर दिशाहीन बताने वाली पोस्ट हिट पा चुकी है। है न दिलचस्प बात!</span></p>
<p><span style="color:#003300;">कुछ पुराने ब्लागर अब यह समझ गये हैं कि इन फोरमों के आगे भी होती है ब्लागिंग। पहले एक फोरम पर तो कविता के ब्लाग ही नहीं लिये जाते थे और अब हालत यह है कि फोरम वाले हिंदी का जो ब्लाग देखते हैं वही अपने यहां दिखाने लगते हैं। अभी कोई कथित पुरस्कार बंटे तो बड़ी बेदर्दी से कहा गया कि इसमे कविता के ब्लाग शामिल नहीं किये गये। हमने अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाने पर जब हास्य कविताएं बरसाईं तो समझ में आया कि क्या होती है कविता। हमें भी बहुत हैरानी होती है यह देखकर कि हमारी हास्य कविताएं पाठकों में ऐसे हिट पा रहीं है कि डर लगने लगा कि कहीं इतना लिखने की सजा हम हास्य कवि की उपाधि के रूप में न पायें। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">हिंदी भाषा लिखने में हमें मजा  आता है पर कोइै कहानीकार, व्यंग्यकार और लेखक कहे तो सुनकर अच्छा लगता है पर हास्य कवि कहे तो ऐसा लगता है कि हमारी पूरी मेहनत गयी पानी में-क्योंकि उससे कि हमारा दायदा सीमित हो गया प्रतीत होता है।  </span></p>
<p><span style="color:#003300;">बहरहाल दिशाहीनता की स्थिति नहीं है। हां,यहां लेखक कम हैं और ईमेल विस्ताकर अधिक हैं जो तात्कालिक हिट्स या ईमेल पाकर खुश हो जाते हैं।  आम पाठक अभी अपनी बात लिख कर लेखक को दे नहीं रहा इसीलिये कभी कभी निराशा होती है पर फिर अपनी रचना से जो प्रतिबद्धता हो वह फिर होंसला ला देती है। </span></p>
<p><span style="color:#003300;">आखिरी बात यह ब्लाग फ्री में नहीं है जैसा कि कुछ ब्लागर लिखते हैं। जनाब जिस कंपनी के भी इंटरनेट कनेक्शन हैं उनके विज्ञापन गूगल पर  अन्य वेब साईटों पर देखे जा सकते हैं और उनको हम बराबर भुगतान कर रहे है। कंपनियां अपनी कमाई के सारे रास्ते खुले रखना चाहतीं हैं इसलिये इस ब्लाग को एस.एम.एस की तरह ही इस्तेमाल करवा रहीं हैं। अपनी भडास निकालो और हर महीने कनेक्शन का भुगतान करते जाओ। फिर भी कुछ ब्लागर अच्छा लिख रहे हैं और उनको पढ़ने में मजा आता है-जहां तक हमारी जानकारी है कुछ ब्लागर हमारे लिखे का भी आनंद उठाते हैं। हम फोरमों पर एक पाठक की तरह जाते हैं इसीलिये कभी अपने हिट या फ्लाप होने का अध्ययन नहीं करते। हां, अपना ब्लाग सामने आ जाता है तब ही उसके व्यूज देखते हैंं। आम पाठकों की संख्या बढ़ती लग रही हैं। इधर कृतिदेव में सीधे लिखने की वजह से हम और बेपरवाह हो गये हैं कि अब तो लिखना है हिट या फ्लाप तो अब आम पाठक तय करेंगे और दिशा भी अब उनकी पसंद पर ही तय होनी है।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 16:06:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=513</guid>
<description><![CDATA[सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">सभाकक्ष से बाहर निकलते ही<br />
फंदेबाज जोर से चिल्लाया<br />
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो<br />
मैं बहुत भला आदमी समझा था<br />
पर तुम तो निकले एकदम चालू<br />
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस<br />
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया<br />
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र<br />
ढंग से हमारी बात कहोगे<br />
यही सोच तुम्हें बुलाया<br />
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये<br />
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये<br />
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे<br />
उस पर तो हम बोल ही न पाये<br />
बताओं अब क्या मूंह लेकर<br />
साथियों के पास जाऊं<br />
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले<br />
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में<br />
जहां खाने की पर्ची  तुम्हारे प्रबंधन ने दी है<br />
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा<br />
राजनीति करने चले हो या<br />
खरीदने ज्वार बाजरा<br />
हम न तीन में  न तेरह में<br />
न अटे में न फटे में<br />
हम तो तुम्हारे वफादार हैं<br />
मजदूरों के हिमायती है हम भी<br />
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है<br />
कमरे के अंदर<br />
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग<br />
एक समझना बात बचकानी है<br />
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते<br />
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते<br />
अरे, जाकर मजदूरों को<br />
आश्वासन मिलने की बात बता देना<br />
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की<br />
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना<br />
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना<br />
अपने दो-चार चमचों को भी<br />
प्रमोशन दिलवा देना<br />
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब<br />
निकल गया हाथ से मामला तो<br />
फिर मुश्किल होगा पकड़ना<br />
वाद और नारों पर चलना सालों साल<br />
भरना अपने घर में माल<br />
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना<br />
हम तो हैं सब जगह फ्लाप<br />
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है<br />
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये<br />
ऐसा ही मायाजाल है रचना<br />
कमरे के बाहर हाय-हाय<br />
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना<br />
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया<br />
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा<br />
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया<br />
...............................................</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अब बंद हो गया हकलाते हुए लिखना ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 07:22:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=508</guid>
<description><![CDATA[     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>     मुझे लग रहा है कि जैसे आज से अंतर्जाल पर लिखना शुरू कर रहा हूं। रोमन लिपि में लिखकर हिंदी लिखता तो कहीं न कही मन में अस्वभाविकता का अनुभव तो होता ही था-एसा लगता था कि हकलाते और तुतलाते  हुए ही लिख रहा हूं। मैने नारद पर अपनी जो पहली पोस्ट लिखी थी  उसका शीर्षक ही था ‘मैं हकलाते हुए लिख रहा हूं’। उसके  बाद भी बहुत लिखा पर हमेशा कहीं न कहीं यह लगता  कि अपना मौलिक स्वरूप जब खुद ही नहीं दिख पा रहा हूं तो दूसरे क्या देख पाते होंगे।</p>
<p>    कृतिदेव में  कल से यह मेरी छठी पोस्ट है। कल कृतिदेव का हिंदी टूल जब अपने डेस्कटाप पर ला रहा था तो शंका थी कि वह सफल होगा क्यांकि पहले भी ऐसे ही दो टूलों पर मैं अपना समय खराब कर चुका था-हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि वह टूल गलत थे। हो सकता है कि मुझे उपयोग करना ही नहीं आता हो। संभवत: मेरा कंप्यूटर उसे स्वीकार नहीं करता हो। ऐसे टूल रहे होंगे इसमें तो मुझे यकीन था क्योंकि अंतर्जाल की दो पत्रिकाओं हिन्दी नेस्ट और अभिव्यक्ति-अनुभूति ने मेरी देव और कृतिदेव फोट में भेजी गयी रचनाओं को संभवतः इन्हीं टूलों  से यूनिकोड में बदल कर प्रकाशित किया गया होंगा। इसके बावजूद मैं एक वर्ष तक इन टूलों से दूर रहा तो इसका कारण यही हो सकता है कि यह टूल पूरी तरह सौ प्रतिशत उपयोगी नहीं रहे होंगे या इनका स्थानांतरण कठिन होगा। ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैने कुछ साथी ब्लागरों को यह लिखते हुए देखा कि हमें तो कृतिदेव में ही काम करना पसंद करते है।’ इधर यह भी स्वीकार करते थे कि वह यूनिकोड में लिख रहे है।</p>
<p>    मैं इन चर्चाओं पर नजर रखता था। एक बार तो मैने लिख  भी दिया था कि ऐसा कोई प्रमाणिक टूल आयेगा तो वह गूगल से ही आयेगा।  कल जब मैने एक  ब्लाग  देखा और उसमें इस टूल को अपने डेस्कटाप पर लाया। जब इसमें मैने अपनी कृतिदेव में टंकित सामग्री यूनिकोड में रखी और क्लिक किया तो जो सामने परिणाम आया उसे मन खुश हो गया। यूनिकोड का उपयोग के इस्तेमाल की बात करें तो कह सकते हैं कि कुछ नहीं से तो जो है वहीं ठीक है। अपनी अभिव्यक्ति करने के लिये रोमन लिपि का हिंदी टूल का उपयोग किया पर कृतिदेव का परिवर्तित टूल का कल से इतना उपयोग कर लिया है कि अब उसमें सीमित दिलचस्पी रह गयी। वह भी कभी कमेंट लगाने या शीर्षक के लिये काम में लेंगे। </p>
<p>    यह टूल बहंत पहले नहीं मिला इसको लेकर मन में कोई निराशा भी नहीं है। वजह यह है कि यूनिकोड में बहुंत कठिनाई से लिखते थे पर वह संघर्ष कई एसी हास्य कविताओं का जन्मदाता बना जिसके न होने पर संभव नहीं होता। कई बार अच्छा और मजेदार ख्याल आया तो उस पर बड़ा व्यंग्य लिखने की बजाय छोटी हास्य कविताएं लिख दीं और वह पंसद की गयीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि महापुरूषों के संदेश सुबह लिखने का मन बनाया क्यांकि अपने निजी जीवन और लेखन  में उनके संदेशों पर आधुनिक संदर्भ में व्याख्या को कई  लोगों ने बहुत पसंद किया। जब शूरूआत की तो कम समय होने के कारण हमने सीधे संदेश ही लिखे ताकि मन को तसल्ली रहे कि हम यहां भी वही कर रहे है। पिछले पंद्रह दिन से अपनी टंकण की  अपनी गति को बढ़ा हुआ देखा तो वर्तमान संदर्भ में   व्याख्या देने का काम शूरू किया तब तक यह टूल आ गया। यह टूल आफलाइन भी काम कर रहा है इसलिए इंटरनेट को खोलकर बैठने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा कोई शब्द गलत दिख जाये तो उसे बीच में ठीक किया जा सकता है जबकि दूसरे टूलों पर यह त्रटियां ठीक करने में कठिनाई आती थी।</p>
<p>     कई बार जब व्यंग्य या कहानी लिखने का मन आता  तो पहले तो यह सोचना पड़ता था कि वह कितना लंबा खिंचेगा। जब लगता  कि वह लंबा खिंचेगा तो फिर मन नहीं होता था। कृतिदेव में इस चिंता से मुक्त रहेंगे। एक बैठक में नहीं तो अगली बैठक में उसे पूरा कर सकते है-क्योंकि उसको तो अपने वर्ड  प्रोग्राम में ही तो रखना है।<br />
कुल मिलाकर अभी तक हकलाते और तुतलाते लिख रहे थे पर अब लगता है कि वह बंद हो गया है। सबसे बड़ी बात यह कि इसमें हमारी आंखें नहीं थकेंगी क्योंकि इसमें हमें कंप्यूटर की तरह देखने की जरूरत ही नहीं है। अगर कोई कागज या किताब  सामने  रखकर लिखते जायेगे जबकि यूनिकोड में सामने भी देखना पड़ता है कि अक्षर सही आया कि नहीं। कृतिदेव में तो हम आंखें ही बंद कर टाइप कर लेते है। एक बार टाइप करने के बाद उसे फिर देखते हैं और कोई सुधार होता है तो कर देते है।</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 06:36:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=116</guid>
<description><![CDATA[पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही  नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की  धार  नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन  करता हूँ  वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है। </p>
<p>अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती  है कि  दीपावली पर सूर्य नारायण  दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि  होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम  कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों  का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग  बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं। </p>
<p>इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि  इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब  ऐसे में अपने घर के बाहर खडे  उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह  गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां  थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।</p>
<p>पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित  सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे  दूसरे सज्जन बोले-''हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।''<br />
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित  सज्जन ने उससे कहा--'तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि  भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच  है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।''<br />
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित  सज्जन से  विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना  चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल  रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द ही हमारे मित्र और गुरु-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 19:19:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=506</guid>
<description><![CDATA[कलम और दवात लेकर
जब निकले थे घर से तो
नह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कलम और दवात लेकर<br />
जब निकले थे घर से तो<br />
नहीं जानते थे सम्मान क्या होता है<br />
लिखने बैठे बचपन  से<br />
अपने गुजारे लम्हों की कहानी<br />
अपने जजबात बयान किये अपनी जुबानी<br />
भूल गए रोना क्या होता है<br />
देखा है बस एक ही सच<br />
काटता  है वही आदमी जो उसने बोया होता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
मांगें तो सम्मान भी मिल जाता<br />
पर इसके लिए कोई काबिल भी  तो नजर आता<br />
जो बेचते हैं सम्मान<br />
उनको लिखना नहीं आता<br />
जो पाते हैं चंद शब्द लिखकर<br />
उनका लिखा भी हमारे समझ में नहीं आता<br />
ऐसा लगता है कि<br />
पहले सम्मान की सोचते हैं<br />
बाद में लिखा होता है<br />
हम तो अपने  लिखे को कभी<br />
सम्मान के योग्य नहीं पाते<br />
तो सम्मान कहाँ से जुटाते<br />
फिर मिलता तो जाकर लेना पड़ता<br />
होता समय नष्ट<br />
फिर हम दूसरों का लिखा  कहाँ पढ़ पाते<br />
और बिना पढे भला क्या लिख पाते<br />
जो पढ़ते बिलकुल  नहीं लिखते हैं जरूर<br />
उनमें आ जाता है गुरुर<br />
दूसरों के लिखे से ही लिखते हैं<br />
इसलिए अपने को सर्वश्रेष्ठ<br />
कहलवाने में हम वैसे भी शर्माते<br />
अपनी कमअक्ली का पता था<br />
इसलिए लिखना किया शुरू<br />
 शब्द ही हैं हमारे मित्र और गुरु<br />
लिखने का मतलब उनसे मिलन भर होता है<br />
--------------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:38:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=115</guid>
<description><![CDATA[अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय<br />
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान<br />
कही जश्न के लिए पीता है  शराब<br />
ताकत के लिए खाता  कबाब<br />
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब<br />
पर अकेले में होता है<br />
अपने कर्मों  से ही होता  परेशान  </p>
<p>इन्तजार करता है त्योहारों का<br />
कुछ मिलने के व्यवहारों का<br />
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान<br />
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान<br />
सिद्धि के लिए करता है यत्न<br />
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न<br />
अपने से  भागता रहता है इंसान </p>
<p>सीख लो हर पल जीना<br />
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना<br />
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता<br />
देने से किसी को नाम आगे जाता<br />
गले में हार पड़ने से<br />
पीठ पर चाल डालने से<br />
मिलता है थोडी देर का सम्मान<br />
अपने बोलों में भर दो रस<br />
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान<br />
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस<br />
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है<br />
देने वाला ही खुशी भी लूटता है<br />
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं<br />
मरने या पीठ पीछे हो<br />
वही कहलाता है असली सम्मान<br />
-----------------------------------------</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कविता का जन्म ही पीडा से होता है-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 17:17:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=479</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद ही मुझे लगने  लगा था कि ब्लोगरों पर भी व्यंग्य लिखना चाहिए पर लगा कि इतने सारे ब्लोगर हैं और कोई नाराज हो गया तो? इसलिए कुछ दिन खामोश रहा पर एक हैं क्योंकि मुझे लगा कि इससे मेरी शांति में खलल पडेगा. धीरे-धीरे मैंने अपने ऊपर ही ब्लोगर के रूप में व्यंग्य लिखना शुरू किया. मैंने व्यंग्य लिखना एक हास्य कविता से शुरू किया था जो एक ब्लोग से प्रेरित होकर लिखी थी.  एक ब्लोग है   आईना ब्लोग.  उन्होने मेरी एक पोस्ट के शीर्षक को दूसरे ब्लोग की पोस्ट  के शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया था.  उन्होने ऐसा अन्य   ब्लोगरों की पोस्ट के साथ भी किया था और यह बताया था कि किस तरह दो ब्लोग की  पोस्ट के शीर्षक विरोधाभासी  हैं.  उसमें मेरा सीधे मजाक उडाया नहीं गया था पर तब मैंने  पहली हास्य कविता अपने ब्लोग पर लिखी थी ''आईने में बदहवास दीपक बापू". उसके बाद तो मैंने एक के बाद एक हास्य कवितायेँ लिखीं. इसका मतलब सीधा है कि आईना ने मुझे हास्य कवितायेँ लिखने के लिए प्रेरित किया. </p>
<p>आज उसमें धुरविरोधी के लिए एक हास्य कविता थी और मुझे बहुत दिलचस्प लगी. धुरविरोधी एक प्रख्यात ब्लोगर रह चुके हैं और अब वह   ब्लोगवाणी(हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखाने वाला फोरम)के संचालक हैं-मुझसे मिलने वाले एकमात्र ब्लोगर श्रीसुरेश चिपलूनकर ने यही बताया था. तब मुझे लगा कि हो सकता है कि वह अनुमान के आधार पर कह रहे हैं. आज इस बात की पुष्टि हो गयी.   अगर मैं ब्लोगवाणी के संचालक को भुलाकर केवल धुरविरोधी की बात करूं तो मुझे उनकी याद है. ब्लोग जगत में सबसे अधिक सक्रिय ब्लोगर के रूप में रहे उस शख्स की कोई पोस्ट मैं इससे पढता वह ब्लोग बंद कर लापता हो गया. हुआ यह कि उस समय मैं समझ नहीं पा रहा था कि यहाँ क्या हो रहा है? उसके जाने के बाद मैंने उसे दिलचस्प व्यक्ति को उसकी कमेन्ट की माध्यम से जानने का प्रयास किया.मैंने वह सब पोस्टें देखीं जिस पर उनकी  कमेन्ट थी. उसकी विदाई पर कई ब्लोगरों ने विदाई का ऐसा ग़मगीन माहौल  बनाया कि अगर कभी हिन्दी ब्लोग जगत पर फिल्म बने और ऐसा दृश्य हो तो लोग रो पड़ेंगे. </p>
<p>लोगों की याददाश्त कमजोर होती है पर लेखक की नहीं. मेरे अन्दर उस समय धुर विरोधी के लिए ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. मैंने उसकी कमेन्ट  देखकर  महसूस किया कि यह शख्स कभी भी यहाँ से  छोड़ कर नहीं जायेगा. बिलकुल मेरी तरह नशेड़ी है लिखने का. धुरविरोधी के छद्म नाम है यह तो कोई भी कह सकता है इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि वह कहीं असली नाम से प्रगट होगा. वैसे धुरविरोधी ने हमेशा अपनी कमेन्ट में मेरी प्रशंसा की पर जिस मुद्दे पर वह विवाद कर रहे थे उसमें मैं उनसे असहमत था. सबसे बड़ी बात यह कि मैंने उस शख्स की कोई पोस्ट देखी नहीं थी और देखी तो याद नहीं थी पर इतना तय था कि धुरविरोधी की हिन्दी ब्लोग लेखन में प्रतिबद्धता निर्विवाद थी.<br />
प्रसंगवश याद आया कि मेरे एक अन्य मित्र अरुण  'पंगेबाज' ने भी बहुत शोर मचाया था-हम उसे नहीं जानते पर शायद मुम्बई में रहते हैं आदि-आदि. पंगेबाज और धुरविरोधी के अगर तेवर देखें तो ऐसा लगता है कि लडाकू होंगे पर अगर उनका लेखन की गहराई देखें तो ताज्जुब इस बात का होता है ब्लोग जगत के लोग उनको समझ नहीं पाए. हास्य का भाव स्वाभाविक रूप से पैदा करने की उनमें शक्ति है.  अगर किसी ने मुझे गलत जानकारी नहीं दी हो तो अरुण जी भी ब्लोगवाणी  से कहीं न कहीं जुडे हुए हैं. लिखने का मजा किस तरह उठाया जाता है यह इनसे सीखना चाहिऐ. अरुण पंगेबाज से मेरी दोस्ती अधिक नहीं है पर एक दो बार संपर्क से यह लग गया है कि वह भी मजे लेने वाले आदमी हैं.<br />
हाँ, एक बात जरूर हैं कि हिन्दी में फोरम चलाना आसान नहीं है और ऐसा लगता है कि दोनों अब लिख कम  ही पाते हैं. धुरविरोधी यानी ब्लोगवाणी  के  मैथिली जी आज उस आईने के निशाने पर हास्य कविता के रूप में आ गए जिसे मैंने कभी निशाने पर लिया था. सच तो यह कि मैं कविता पढ़कर हंस पडा. </p>
<p>मगर असली बात यह नहीं है जो मैं कह रहा हूँ.उस कविता में आईना के लेखक  की पीडा यह है कि उनका ब्लोग ब्लोग वाणी से अलग कर दिया गया है और वह कई ईमेल मैथिली जी को भेज चुके हैं पर वह लिंक नहीं हो रहा है. मगर यह सब उनके साथ नहीं हो रहा है. मेरे कई ब्लोग ऐसे हैं जिनके लिए मुझे ब्लोग वाणी को कई ईमेल करने पड़े. बाद में वह लिंक हो जाते हैं. अब यह तो समय की उपलब्धता का भी सवाल है कि लोगों को अपने अन्य  काम भी रहते हैं और हिन्दी ब्लोग जगत से अभी कोई विशेष आय होती  हैं नहीं. मगर जिस तरह आईना में कविता लिखी  गयी है उसे देखकर तो यही लगता  है कि <strong>कविता वास्तव में पीडा से पैदा होती है. इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्द अगर दुनिया से ख़त्म हो जायेगा तो कविता  ही नहीं पैदा होगी.</strong> </p>
<p><strong>हिन्दी ब्लोगर कई बार ऐसे सनसनी और रोमांच पैदा कर देते हैं कि लगता है  कि अब पता नहीं क्या होगा. कहीं हमला होता दिखाएँगे तो ऐसा कि आदमी घबडा जाये  कि पता नहीं क्या हुआ? पहले लहू लहान होने की खबर सारा दिन चलायेंगे फिर शाम को घोषणा कि चिंता की कोई बात नहीं है. मैं एक बात यकीन से कह सकता हूँ कि जब फिल्म वालों को कोई कहानी न नहीं मिलेगी  तब वह ब्लोगरों पर कहानी ढूंढेंगे तो कई वर्षों तक उनको कहानियों का टोटा नहीं पड़ेगा.</strong> बहरहाल किसी विवाद में पड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं और आज ऐसे ही खाली-पीली बैठा था तो सोचा कि अपने दोनों तरफ के मित्रों में जो द्वंद चल रहा है उस पर विचार करूं. फिर धुर विरोधी जिसने मुझे प्रेरित किया था और आईना जिसकी वजह से मुझे हास्य कविता लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई उन पर कुछ न कुछ तो लिखना ही था.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब  आम पाठक ही तय करेंगे अपनी पसंद ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=477</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 16:20:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=477</guid>
<description><![CDATA[इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस दुनिया में लेखन एक ऐसा कार्य है जिसमें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं होती और यह बिना पैसे का सम्मान दिलवाता है। मैं भी लिखता हूँ इसलिए अंतर्जाल हो या निजी जीवन उसमें  अगर कुछ प्रशंसक हों तो आश्चर्य की बात नहीं है। आजकल अंतर्जाल के बाहर कुछ नहीं लिख रहा तो कुछ   निजी प्रशंसक रोज टोकते हैं कि वहाँ लिखो तब हो सकता है कि अंतर्जाल पर भी कुछ लोग हों जो बार-बार प्रेरित करने के लिए नाम बदलकर पुरानी पोस्टों पर कमेन्ट  लिखते हुए  तारीफों के पुल बाँध देते हैं। उनका लिखा गया कमेन्ट  ब्लोगरों की कमेन्ट से अलग होता है और चूंकि यहाँ तमाम तरह के ऐसे प्रयास हो सकते हैं जिनका परीक्षण करना मुश्किल है कि वह वास्तव में आम पाठक हैं या कोई मित्र ब्लोगर  हैं।<br />
यह भी संभव  है कि अंतर्जाल  पर मैं हिन्दी में कुछ भी लिखता रहूँ उसके लिए कुछ लोग-हो सकता है वह कहीं नौकरी करते हों  जहाँ नियोक्ता की तरफ से अपने संभावित आर्थिक लाभ के लिए अन्य कामों साथ  ब्लोगरों को प्रोत्साहित  करने का काम भी उनको सौंपा गया हों- सक्रिय हों और मेरे साथ अन्य लोगों  को भी सन्देश भेजते हों। अगर मैं बिलकुल निराशाजनक स्थिति की कल्पना करू तो यही लगता है-और यह कल्पना ही है। </p>
<p>अगर ऐसा नहीं है और उनमें वास्तविकता है तो मानना पडेगा कि हिन्दी ब्लोग जगत अब दिलचस्प दौर में पहुँचने वाला है और देश के करोडों हिन्दी भाषी ही- जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन हैं- अब यह तय कर सकते हैं कि कौन अंतर्जाल पर उनके  पसंदीदा ब्लोग  लेखक है। आम पाठक अब हिन्दी की तरफ बढ़ रहा है। अगर कोई व्यवासायिक रूप से हमें गुमराह नहीं कर रहा हो तो गूगल से हिन्दी के शब्दों से भी तलाश हो रही है। हिन्दी साहित्य की   हर विधा के शब्द-हिन्दी कविता, कहानी, हास्य व्यंग्य, आध्यात्म, रहीम, कबीर, चाणक्य, मनु स्मृति, विदुर नीति तथा अन्य अनेक शब्दों के रास्ते  अपने सब ब्लोगों पर आम पाठकों को आते देखता हूँ। इसके अलावा असंख्य शब्द और भी हैं। इनको अंग्रेजी शब्दों से भी ढूंढते हैं। कभी कभी कुछ धार्मिक प्रुवृति के लोग भी तारीफ़ कर जाते है तो कुछ अपने नाम के आगे संत की पहचान वाले स्थापित कर आशीर्वाद दे जाते हैं। </p>
<p>मैं  यह सब देख रहा हूँ और जैसा कि  पहले ही लिखा है कि संशय मेरे मन में रहता है, पर अगर उससे दूर हट कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि  अब अच्छा लिखना शुरू करूं। व्यंग्य, कहानी और चिंतन लिखना शुरू करूं फिर बात वहीं आकर अटकती हैं कि इतनी मेहनत करने के बाद भी क्या मैं यह देख पाऊंगा कि आम पाठक उसे पढ़ रहा है कि नहीं।हर  आम पाठक कमेन्ट नहीं लिख सकता और क्या वाकई वह हममें  दिलचस्पी ले रहा है इसको समझ पाना मुशिकल है। इसके बावजूद मैंने अपने सभी निज-पत्रक(ब्लोग) दिखाने वाले फोरमों और वेब साईटों की हिट्स की परवाह किये बिना कई पोस्ट लिखीं हैं। मैंने फोरमों से अलग ब्लोगों पर भी अपनी पोस्टों पर  लोग आते देखे हैं। एक संशय होता है कि क्या वह ब्लोग वाकई लोग देख रहे हैं। बीच-बीच में उन पर पोस्ट डाल  देता हूँ और भुला देता पर जब उन पर व्युज  देखता हूँ कि वह कोई कम नहीं होते। चौपालों और वेबसाईटों   पर त्वरित पाठक मिलने से ध्यान बँटा रहता है इसलिए आम पाठक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। चौपालों से अलग ब्लोग पर लोग आते हैं पर कब पता नहीं चलता। इसमें नीरसता का बोध होता है जबकि चौपालों पर मित्रों के ब्लोग पढ़ते हुए, उन पर कमेन्ट देते हुए और दूसरों को हिट और अपने को फ्लॉप देखने में जो आनंद आता है वह अवर्णनीय  हैं पर इसके बावजूद  नारद, ब्लोग वाणी, चिट्ठा जगत, और हिन्दी ब्लोग पर हम सब ब्लोगर किसी भी पोस्ट के निर्णायक नहीं है इस सत्य को स्वीकार  कर लेना चाहिए। कल मैंने  जो पोस्ट डाली थी उस पर  कल और आज कुल   ४२ हिट्स हैं, और उस ब्लोग पर दोनों दिन  मिलाकर  १३७ व्युज हैं-मतलब चौपालों से बाहर ९५ व्युज  और भी हैं।</p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि इन चौपालों का उपयोग केवल हम लोगों के आपसी मिलन के लिए है और यहाँ हिट्स और पसंद के चक्कर में पड़ने  की  बजाय करोडों  हिन्दी भाषी पाठकों को लक्ष्य कर लिखने वाले ही स्थाई हिट्स ले सकते हैं। चौपाल पर कितने हिट्स मिल सकते हैं? शायद ही किसी को सौ से अधिक मिल सकते हैं और इतने बडे देश में उसके क्या मायने हो सकते हैं। बात तो तब  बनेगी  जब रेल, बस, हवाई जहाज और अन्य  सार्वजनिक स्थानों पर चर्चा हो कि देखो हम अमुक ब्लोगर को पढ़ते हैं या अमुक ब्लोगर की वह पोस्ट अच्छी थी। कुछ ऐसे  ब्लोगर  मैंने  देखें हैं जो आगे चलकर वाकई नाम करेंगे।  इसलिए  लिखो तो आम लोगों के पढ़ने के लिए लिखो। कविता, कहानी, व्यंग्य, और उपन्यास लिखो। एक बात जो इस माध्यम में होगी, वह यह कि लिखना छोटा ही है और न पूरा हो तो अगले दिन के लिए रख लो। जरूरी नहीं है कि एक दिन में सब पूरा हो। यहाँ पसंद और हिट का खेल तो चलता रहेगा इसे देखो और मजे लो इसलिए मैं कभी भी किसी भी फोरम द्वारा व्युज और हिट्स दिखाने का विरोध नहीं करता। मैं जब इन फोरमों  पर आता हूँ तो कभी भी अपने हिट्स पर ध्यान ही नहीं देता बल्कि दूसरों के हिट्स देखकर खुश होता हूँ। मैं और मेरी पोस्ट अपनी स्थिति के अनुसार फ्लॉप हैं पर इन चौपालों से बाहर के खेल पर मेरी नजर रहती है और देखना है कि आगे क्या होता है? (क्रमश:)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दों के भाव भी कम रंगीन नहीं होते-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=475</link>
<pubDate>Sun, 16 Mar 2008 15:21:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=475</guid>
<description><![CDATA[इसमें कोई संदेह नहीं है की पिछले कुछ द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इसमें कोई संदेह नहीं है की पिछले कुछ दिनों से मेरे ब्लोगों के पाठक कम हो गए हैं और इसके दो कारण हैं एक तो अब इम्तहान का समय शुरू हो गए  और इसमें छात्र, पालक और शिक्षक उसमें व्यस्त हो गए हैं और दूसरा मैं हास्य और गंभीर कवितायेँ नहीं लिख रहा हूँ। इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूँ क्योंकि मुझे तो लिखने से मतलब है। मैंने ब्लोग जगत में सब कुछ तो नहीं पर बहुत कुछ समझ लिया है। हिट और फ्लॉप दोनों का रूप समझ लिया है और अब मैं किसी प्रकार भ्रम में नहीं रहता क्योंकि वास्तविक धरातल पर चलने में जो शक्ति मिलती है उससे किसी भी सुझाव का परीक्षण करने का सामर्थ्य   भी आ जाता है।</p>
<p>अभी चिट्ठाजगत ने गिरगिट का लिंक बांटने का काम शुरू किया है और उनके समर्थक ब्लोगर इस पर खूब पोस्ट लिख रहे हैं। जहाँ तक मेरा अनुमान हैं यह  भोमियो का परिष्कृत संस्करण है। इन दोनों के बारे में  पुराने ब्लोगर जानते हैं। इसे  लगाने से अन्य  भाषी लोग हिन्दी में लिखे को अपनी लिपि में पढ़  सकते हैं। चिट्ठाजगत के लोग निश्चित रूप से मेहनत करते हैं और मेरा  उनको हतोत्साहित करने का कोई इरादा भी नहीं है हो सकता है आगे चलकर उनका कोई प्रयोग काम आये, पर जिस तरह ब्लोगर इस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं वह अतिउत्साह से प्रेरित हैं और मेरे लिए व्यंग्य का  विषय।</p>
<p>मैंने एक   वरिष्ठ ब्लोगर की पोस्ट देखी। चिट्ठा जगत के गिरगिट बांटो अभियान के समर्थन में लिखी पोस्ट पर उसे लिंक किया गया। मैंने वह  पोस्ट देखी तो हंसी आयी गयी। हर वाक्य  के पीछे प्रश्नवाचक चिन्ह था। उसका आशय कोई इस अभियान के समर्थन में नहीं लगता था पर खुलकर विरोध न करने के कारण पाठक भ्रमित हो सकता है। उसमें एक अन्य भाषा का ब्लोग दिखाया गया था। फिर पूछा गया की क्या आप इसे अपनी देवनागरी लिपि में पढ़ना चाहेंगे? आपका ब्लोग दूसरी लिपि में ऐसा दिखेगा और हो सकता है कि अन्य भाषा में कोई हिन्दी का कोई मुरीद आपको पढ़ना चाहे?<br />
पूरे शब्द मुझे यादं नहीं रहे, पर उस ब्लोग पर कमेंट के रूप में केवल एक ही शब्द  लिखने वाला था 'नहीं'। इसके साथ ही पोस्ट पूरी हो जाती।  मैंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि मुझे लगा कि पहले ही अपने साथ विवाद कम नहीं है और उसे किसलिए बढाएं। वह वैसे भी चिट्ठाजगत के सलाहकार  रहे हैं।</p>
<p>इसलिए सोचा अलग से लिखेंगे। चिट्ठाजगत वाले बहुत मेहनत करते हैं और हिन्दी को अंतर्जाल पर फैलाने की उनकी  प्रतिबद्धता को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर उनके प्रयोग हमेशा ही फलदायी नहीं रहते। पहले उन्होने रोमन लिपि का प्रयोग किया। फिर अपनी पसंद के ब्लोग की सुविधा जोड़ी जो ब्लोग पह पहले से ही उपलब्ध है। हाँ इसका फायदा मुझे जरूर हुआ। हम किसी की पसंद में नहीं है और जो अपनी पसंद के ब्लोगरों को पढ़ रहे हैं उन पर हम चाहे जो लिख लें कोई नहीं पढता। कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और हमने ब्लोगरों को इस समाज का हिस्सा मान लिया है इसलिए उन पर खूब लिखते हैं। अपनी पसंद पढ़ने वाले ब्लोगर हमारा ब्लोग देख भी नहीं पाते. हाँ इससे भी भी हमारी पाठक संख्या कम हुई है पर लिखने का मजा खूब आ रहा है। हमें पढ़ने वाले फ्री स्टाइल वाले हैं और वह चौपालों पर फ्री स्टाइल में ही पढ़ते हैं।  </p>
<p>समस्या यह नहीं है कि हिन्दी भाषी लोग  कंप्यूटर पर आते नहीं हैं बल्कि वह हिन्दी में पढ़ने में दिलचस्पी नहीं ले रहे या उनको पता नहीं है और यही चिंता का विषय है। हिन्दी में लिखने वाले ब्लोगर अपने आसपास देखें  कितने लोगों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट है और जिनके पास नहीं हैं वह भी साइबर कैफे में जाते हैं। हिन्दी उत्तर भाषा की आधार स्तंभ है और यहाँ क्या कम इंटरनेट हैं। लोग अगर हिन्दी नहीं पढ़ रहे तो कोई अंग्रेजी भी नहीं पढ़  रहे। वह तो अपनी आँखें फोटो देखने में बर्बाद कर रहे हैं। इंटरनेट का  सदुपयोग करने वालों की संख्या कम है इसलिए ही हिन्दी लिखने वालों को पाठक कम मिल रहे हैं। मेरे ब्लोग के पते ले गए पर उनमें से कितने खोल रहे हैं यह मुझे पता है? घर पर बच्चों  की खातिर इंटरनेट लगवाने वाले   निजी  लोग कंप्यूटर पर क्या देखना चाहते हैं? फिल्मी हीरोइनों के नाम लिखकर सर्च करते हैं। वह हिन्दी बोल लिख सकते हैं क्योंकि इसके अलावा  कोई और भाषा उनके लिए है ही नहीं अंग्रेजी से पैदल जो हैं। हिन्दी में पढ़ने के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं क्योंकि खुद हिन्दी में कोई साहित्य  लिखना उनकी बूते का नहीं है। </p>
<p>ऐसे में अपनी लिपि को गिरगिट की तरह बदलने के सुविधा कोई बडा पाठक वर्ग जुटाएगी यह सोचना भी गलती है। यह सवाल तो तब उठता जब हमें लगता कि हिन्दी देवनागरी के जानकार लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा कम है।मैं अपने जान-पहचान वालों को हिन्दी टूल की जानकारी भेजता हूँ। अपने मित्रों को अपने पते देता हूँ और उनसे कहता हूँ कि मेरा पढ़ना नहीं चाहते तो चौपालों के लोगो क्लिक कर उन   पर जाओ। उन पर अन्य लिंकित ब्लोग पढो। चौपालों पर कोई ब्लोग प्रिय लगे तो उसका नाम मुझे बताओं में उसे लिंक कर दूंगा। मेरे अपने होने के बावजूद तुम अगर नहीं पढता चाहते तो तुम्हें दूसरे  ब्लोग डेस्कटॉप पर सेव करके दे जाऊंगा।कोई सार्थक परिणाम नहीं मिलता। </p>
<p>फिर भी मैं आशावादी हूँ क्योंकि अपने प्रयोगों से बहुत कुछ सीख रहा हूँ। लिखने में कोताही नहीं बरतता  क्योंकि मुझे पता है  कि मेरे लिखे शब्दों को पढ़ने वाले कम नहीं होंगे। मेरा लक्ष्य हिन्दी के आम पाठक तक पहुंचना  है और उसके लिए जो भी सात्विक उपाय हैं करूंगा और मुझे सफलता मिलेगी। मुझे गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलना क्योंकि शब्दों के भाव भी कम रंगीन नहीं होते। इसके बावजूद चिट्ठाजगत के लोगों की मेहनत का प्रशंसक हूँ. खुद अपना पसीना बहाता हूँ इसलिए किसी की मेहनत का मजाक नहीं उडाता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल का  राज, सिर का  ताज -हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=107</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 17:38:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=107</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल में ही बने रहें
राज बस वही राज ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने दिल में ही बने रहें<br />
राज बस वही राज रहते हैं<br />
दूसरे के सिर पर सजे किसे अच्छे लगते हैं<br />
खुद पहनकर सजें<br />
वही ताज अच्छे रहते हैं<br />
अपने दिल के राज ही होते हैं ताज<br />
अगर किसी को दे दिए तोहफे में<br />
तो वही नश्तर  चुभोने लगते हैं<br />
---------------------------------</p>
<p>अपने दिल की बात अगर किसी को<br />
बता दी तो भड़क सकती हैं चिंगारी<br />
जो वह फ़ैली चारों और लग सकती हैं आग<br />
आयेगी सबसे पहले  अपने जलने की बारी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल से सम्मान करे वही है सच्चा  वीर-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 14:18:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=474</guid>
<description><![CDATA[फटे हुए कपडे पहने
चक्षुओं से अश्रु प्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>फटे हुए कपडे पहने<br />
चक्षुओं से अश्रु प्रवाहित करता हुआ<br />
फंदेबाज आ पहुंचा और  बोला<br />
''दीपक बापू आज हमारी बात मान लो<br />
हम पत्नी पीडितों का दर्द भी जान लो<br />
लिखो  महिला दिवस पर हास्य कविता<br />
करो हमारे दर्द का हरण<br />
नहीं तो हम मर  जायेंगे''</p>
<p>घर के बाहर पहुंचे थे उसी समय<br />
धूप में सायकल चलाकर<br />
पोंछ रहे थे पसीना बीडी जलाकर <br />
और धुआं छोड़ते  हुए बोले दीपक बापू<br />
''अभी तो घर में घुसे और तुम आ गए<br />
कहते हो हास्य कविता लिखो<br />
भूल गए कितने उस पर व्यंग्यबाण चला गए<br />
फिर भी बताओ माजरा क्या है<br />
लिखने की सोचेंगे अगर समझ जायेंगे''</p>
<p>बोला फंदेबाज<br />
''दीपक बापू<br />
आज है महिला दिवस<br />
हमने रास्ते  में दी अपनी<br />
एक पढी-लिखी  पडोसन को उसकी बधाई<br />
बीबी तो कम पढी लिखी है<br />
क्या जानती है इस बारे में<br />
इसलिए हमने इस बारे में<br />
कोई बात नहीं बताई<br />
पडोसन ने जाकर  बता दिया घर पर<br />
सास भी थी वहीं<br />
हुआ घमासान<br />
हमारी हो गयी  पिटाई<br />
आज है तुम्हारी हास्य कविता का सहारा<br />
तुम लिखो तभी हम घर जायेंगे<br />
नहीं तो कही भाग जायेंगे''</p>
<p>पहले ही थे पसीना और निकलने लगा<br />
अपनी धोती कसते  और टोपी संभालते<br />
और हँसते हुए बोले-<br />
''तुम भी हो नालायक<br />
भला क्या जरूरत थी जो दी बधाई<br />
शैतान भी दस घर छोड़  देता है<br />
मूर्ख ही है वह जो  पड़ोस में पंगा लेता है   <br />
वैसे तुम्हारी पत्नी कम पढी-लिखी है<br />
पर समझदार है<br />
मेरी तरफ से उनको देना बधाई<br />
हम उनको मानते हैं<br />
तुम्हारी  नालायकी को भी हम जानते हैं<br />
इसलिए पुरुष दिवस की बात तुमको नहीं बताई <br />
तुम्हें पडी  मार भी असरदार है<br />
 जिन हास्य कविताओं पर हँसते थे<br />
उसी की शरण में आये हो<br />
मगर गलत समय पर आये हो<br />
हम हास्य कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
समझदार महिलाओं पर हम क्या लिख पायेंगे</p>
<p>सुना है कहीं<br />
पत्नी पीड़ित अपना दर्द सुनाने के लिए<br />
महिलाओं को बाँट रहे हैं फूल<br />
हम नहीं बरसा सकते शब्द रूपी शूल<br />
वैसे भी क्या गम जमाने में<br />
जो बैठे बिठाए मुसीबत बुलाएं<br />
महिला दिवस पर कविता आजमाने में<br />
हमारे घर पर ऐसे लफड़े नहीं होते<br />
कि  तुम्हारी तरह रोते<br />
इधर-उधर मुहँ से कहने की बजाय<br />
लिखकर ही कविता में सजाते हैं बधाई<br />
यही है हमारी कमाई<br />
अब तुम निकल लो यहाँ से <br />
घर पर सुन लिया कि  तुम<br />
हास्य कविता लिखवाने आये हो<br />
तुम्हारे साथ हम भी फंस जायेंगे <br />
 यहाँ से भी कट जायेगा तुम्हारा  पता<br />
फिर हम तुम्हें चाय भी नहीं पिला पायेंगे<br />
वैसे ही है महिलाओं के अधिकार का प्रश्न गंभीर<br />
महिलाओं का स्वभाव होता है कोमल और  धीर<br />
कह गए हैं बडे-बडे विद्वान<br />
महिला का  दिल से सम्मान करे<br />
वही  है सच्चा  वीर<br />
जो अब तक संसार  नहीं समझ पाया  <br />
तुम और हम क्या समझ पायेंगे<br />
हम इस पर हास्य  कविता नहीं लिख पायेंगे<br />
------------------------------------------<br />
 <strong>नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है. </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नंबर १३६ चलेगा नहीं बल्कि  दौड़ेगा-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/03/05/nanbar-136-chalegaa-naheen-balki-daudegaa-haasya-vyangya/</link>
<pubDate>Tue, 04 Mar 2008 16:15:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/03/05/nanbar-136-chalegaa-naheen-balki-daudegaa-haasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[भारत का सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है? ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत का सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है? किसी साईट में शायद कोई भारत के हिन्दी ब्लोगरों के अते-पते प्रकाशित हुए हैं उसके कर्णधारों   को पता नहीं है और या छुपा रहे हैं कि भारत के हिन्दी ब्लोगों में सबसे लोकप्रिय ब्लोग किसी चौपाल पर पंजीकृत नहीं है.  अब मैं व्यंग्य लिखना नही चाहता पर ब्लोग के मित्र हो या निजी, शरारत करने से बाज नहीं आते तो फिर मैं ही क्यों संयम दिखाऊँ. ठोक ही देता हूँ व्यंग्य.</p>
<p>निजी मित्र कहते हैं कि तुम और कुछ नहीं केवल चिंतन लिखो और यह भी कि केवल  ब्लोगरों के लिए मत लिखो हमारी समझ में नहीं आता. ब्लोग मित्र भी साफ नहीं लिखते पर जहाँ महापुरुषों के साथ कहीं थोडा भी चिंतन होता है वहाँ कमेन्ट बडे उत्साह से  लगाकर अप्रत्यक्ष संकेत दे जाते हैं कि कुछ अपना लिखा करो. अब मैंने सोचा था यही करेंगे और बेकार हैं व्यंग्यों पर अधिक मेहनत करना. इतने सारा लिखा पर नतीजा १३६ नंबर. चलो कोई बात नहीं पर तिस पर हमारे प्रिय श्री   अनिल रघुराज जी जैसे मित्र चिट्ठी डाल गए जैसे कह रहे हों'आकर देखो अपना हाल.'' </p>
<p>उनके ब्लोग पर गए अपने हाल देखे. फिर उस साईट पर गए जहाँ से कभी-कभी एकाध बार व्युज आया है और वह भी शायद तब जब वह लिंक  कर रहे होंगे. आप नहीं जानते पर ब्लोग पर कुछ लोग जानते हैं कि सबसे लोकप्रिय ब्लोग कौनसा है. गाहे-बगाहे उसकी चर्चा हुई है. अब अधिक पोल मत खुलवाओ क्योंकि उसकी चर्चा अपने फोरमों पर हो चुकी और उसकी प्रसिद्धि  खामख्वाह में बढ़  जायेगी. हाँ एक बात बता देता हूँ कि अपना भी कोई  ब्लोग कभी  शिखर पर आएगा.  मैं भी अब नये प्रयोग कर रहा हूँ और इसमें कितनी सफलता मिलेगी यह अलग बात है. इशारों में बात है और कुछ लोग इसे समझेंगे ही. अंतर्जाल है कि इन्द्रजाल शीर्षक से लेख मैंने ऐसे  प्रयोग से प्रभावित होकर ही लिखा था.</p>
<p>जैसे-जैसे आगे जा रहा हूँ नित नयी सूचनाएं आतीं हैं. मुझे ऐसा याद आ  रहा है कि मैंने अपने किसी साथी ब्लोग की पोस्ट में पढा था कि अब कोई ऐसा टूल आ रहा है जिसमें किसी भी भाषा में पढ़  सकते हैं. मतलब अगर हम हिन्दी में लिख रहे हैं तो उस कोई अंग्रेज उस टूल से पढ़ सकता है.  फिर उस दिन एक भारत का एक अंग्रेजी ब्लोगर कमेन्ट में लिख गया कि ''A language is not a problem for communication nowadays, There are various advanced tools available for removing the language barrier, the problem is different. Most of the people are either not aware of these tools or they don’t know how to use them.<br />
Like the google transliteration features an embedded dictionary which accompanies the writer to write without flaws. With the increasing intelligence in the tools, I hope, it will be easier in upcoming days.''</p>
<p>मैंने उस ब्लोगर का नाम इसलिए नहीं दिया क्योंकि अभी एक  अन्य  अंग्रेजी ब्लोगर मित्र प्रीतम पी  हंस जी की कमेन्ट को पोस्ट में डाला तो अब उन्होने भी अपना के हिन्दी ब्लोग शुरू कर दिया है. अब मैं  किसी अंग्रेजी लेखक को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं बनाना चाहता. वैसे ही तो फ्लॉप  हैं. अभी तो १३६ पर हैं कहीं १३७ पर पहुंच गए तो. इससे तो अच्छा है अंग्रेजी वाले को वहीं लिखने दें.    </p>
<p>अब बात करें इस टूल की तो पता नहीं आया है क्या? पर कभी-कभी एकदम अंग्रेजी के नाम से सुशोभित कुछ कमेन्ट देखकर विचार उठता  है कि क्या उन्होने मेरी रचनाएं पढी होंगी? उनके लिखे से ऐसा लगता है कि  उन्होने पढा होगा. हो सकता है कि कुछ लोगों के पास ऐसा टूल हो और उसकी मुझे तो जरूरत नहीं है क्योंकि अभी में हिन्दी का ही पूरा नहीं पढ़ पाया तो अनुवाद कर क्या पढूंगा? मेरी रचनाएं चोरी भी नहीं होती कि अंग्रेजी वाले उसे उठाएंगे. हाँ  जिनकी रचनाएं चोरी होतीं हैं उन्हें चेत जाना चाहिऐ. </p>
<p>आप बात करें लोकप्रियता की. हम जिस राह  पर चल रहे हैं उसका अनुमान किसी को नहीं है कि वहाँ कहाँ जाती है. लोकप्रियता का कोई पैमाना नहीं है. कोई नंबर वन पर नहीं  होगा और होंगे तो उनकी संख्या कम से कम  १०८ होगी. मेरा शब्द्लेख सारथी ब्लोग मेरा सबसे लोकप्रिय ब्लोग हैं और उसके बाद आता हैं अनंत शब्द  योग का. यह ऐसे दो ब्लोग हैं जिन पर मैं नियमित नहीं भी लिखू  तो हिट्स आते हैं. इनसे ही मुझे समझ में आता है कि ब्लोग पर लिखी  जाने वाली सामग्री का क्या महत्त्व है.</p>
<p>भारत के सबसे लोकप्रिय ब्लोग का नाम मैं इसलिए नहीं दे रहा क्योंकि अब जैसे-जैसे लिखते जा रहे हैं वह जल्दी अपनी आभा खो  बैठेगा क्योंकि वह तब शुरू किया गया होगा जब हिन्दी में इतनी सामग्री नहीं होगी जितनी अब हैं. उस ब्लोग पर मैं एक अन्य  ब्लोग पर लिखे पते से ही गया था. एक अन्य ब्लोग से जानकारी आई कि वह हिट क्यों है? एक भ्रम शायद ब्लोगरों को है कि केवल चौपाल पर ही हम लोग एक-दुसरे को पढ़ते हैं और आम पाठक कोई नहीं है. मैं अपनी पोस्टों में इसका उल्लेख करता  आया हूँ  कि जिन पोस्टों को फोरमों पर दस व्युज  भी नहीं मिलते वह महीनों तक उससे अधिक तो आम पाठक द्वारा पढी जातीं है और उके लिए ब्लागरों से मिलने वाली तात्कालिक टिप्पणी  का मोह छोड़ना जरूर होता है.  </p>
<p>मैं अंतर्जाल पर हिन्दी के भविष्य को लेकर बिलकुल चिंतित नहीं हूँ इसलिए लिखता जा रहा हूँ और  सबको भी यही सलाह देता हूँ कि तुम लिखते जाओ. बाकी उस वेब साईट के बारे में तो कई लोग लिख चुके हैं. अंतर्जाल और कौन किसको देख रहा है. कोई भी वेब साईट बना सकता है और हिन्दी के ब्लोग को अपने हिसाब से लिख सकता है. वैसे १३६ नंबर में १३ का अंक मुझे फलता नजर आ रहा है इसलिए लिख रहा हूँ कि कहीं हो सकता है कि नंबर सीधे १३ पर आ जाये. एक नंबर तो खैर क्या बनेगा.  कम से कम एक बात की तो खुशी है कि श्री अनिल रघुराज जी नी अपनी पोस्ट में हमारे ब्लोग को सम्मान दिया. इससे अधिक हमें क्या चाहिऐ.   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना नाम भी होगा-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 28 Feb 2008 15:27:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/29/apnaa-naab-bhee-hoga-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखने वाले एक
कविनुमा ब्ल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर लिखने वाले एक<br />
कविनुमा ब्लोगर को भी<br />
आयोजकों ने कविसम्मेलन में बुलाया<br />
जब वह भी पहुंचा मंच पर तो<br />
कवियों को बहुत गुस्सा आया<br />
एक बोला<br />
''इसे उतारों यहाँ से<br />
यह यहाँ क्यों आया<br />
यह जमीनी कवियों का सम्मेलन में<br />
अंतर्जाल पर लिखने वाला क्यों बुलाया''</p>
<p>आयोजक ने कहा<br />
''अब साहित्य अंतर्जाल पर छा जायेगा<br />
आप लोगों की रचनाएं यही वहाँ पहुंचा पाएगा<br />
एक-दो कविता  सुना लेने दो<br />
कौन लोग याद रखेंगे<br />
अखबारों में कल कवियों के रूप में<br />
आप के ही नाम छपेंगे<br />
बाद में यह हमारे कार्यक्रम की<br />
खबर अपने ब्लोग पर लिखेगा<br />
इसका नाम तो है छद्म और वह भी<br />
ऐसी जगह पर जहाँ कोई नहीं पढेगा<br />
इसके लेख में हमारा नाम ही दिखेगा<br />
इसलिए इसे बुलवाया''</p>
<p>सुनकर ब्लोगर को गुस्सा आया<br />
और चिल्लाकर बोला-<br />
''इतना सस्ता समझ लिया है<br />
एक कविता सुनाने के लिए यह सब<br />
कैसे  कर जाऊंगा<br />
अरे, मैं तो लिखता हूँ वहाँ रोज नया<br />
यह एक कविता लिखते हैं<br />
उसे कई-कई बार अनेक जगह पर<br />
सुनाते दिखते हैं<br />
जब अंतर्जाल पर साहित्य छा जायेगा<br />
तब मेरा नाम भी आएगा<br />
नहीं छपेगी किताब मेरी तो क्या<br />
मेरा लिखा आसमान में तो लहरायेगा<br />
वैसे भी मैं  यहाँ सुनाने नहीं सुनने आया<br />
पर लगता है की अभी इनको कोई इल्म नही है<br />
अंतर्जाल ने अपनी रचनाएं  छपने के लिए<br />
दूसरों के आगे झुकने से बचाया<br />
 दूसरी जगह जाकर भीड़ में<br />
जाकर शब्दों का मेले लगाने से हटाया<br />
कभी-कभी होते हैं साहित्य और कवि  सम्मेलन<br />
नारद, ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग्स ने<br />
हमें रोज साहित्यकारों से मिलने का मौका दिलाया<br />
अब मैं जाता हूँ क्योंकि उससे कीमती वक्त<br />
निकालकर  यहाँ किसी तरह आया.''    </p>
<p>नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो उसके लिए वही जिम्मेदार होगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल:आलेख ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/16/sanskruti-aur-sanskar-bachane-ka-saval-hindi-article/</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 14:58:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/02/16/sanskruti-aur-sanskar-bachane-ka-saval-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर के अनुसार सऊदी अरब में वेलेंटाइन डे पर उसे मनाने से रोकने के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए-गुलाब के फूलों की बिक्री रोकी गयी और लाल रंग के कागज़ के रैपर में उपहार बेचने पर पाबंदी लगाई गयी. हमारे देश में भी कई लोग इसका विरोध करते हैं और उसे रोकने के लिए वह उपाय करते हैं जो मेरे विचार से अनुचित है. वेलेंटाइन डे पर कल मैंने दो हास्य कवितायेँ लिखीं थी और मैं इसका विरोध या समर्थन करने की बजाय इसकी उपेक्षा करने का पक्षधर रहा हूँ. मेरे लिए इसे मनाने वाले हंसी के  पात्र हैं एक तरह से प्यार का ऐसा नाटक करते हैं जिसके बारे में वह खुद नहीं जानते. </p>
<p>मैं इस बात के विरुद्ध हूँ कि किसी को ऐसे कार्य से जबरदस्ती रोका जाये जिससे  किसी दूसरे को कोई हानि होती है. स्पष्टत: मैं वेलेंटाइन डे का पक्षधर नहीं हूँ और कभी-कभी तो लगता है कि इसके विरोधियों ने ही इसको प्रोत्साहन दिया है. यह पांचवां  वर्ष है जब इसे इतने जोश-खरोश से मनाया गया. इससे पहले क्यों नहीं मनाया जाता था? साफ है कि इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों को रोज कुछ न कुछ  कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रचार करते हैं. होटलों और अन्य व्यवसायिक स्थानों पर युवा-युवतियों की  भीड़ जाती है. पार्क और अन्य एकांत स्थान पर जब खतरे की आशंका देखते हैं तो वह पैसा खर्च करते हैं. आखिर उसका फायदा किसे होता है?<br />
हमारे में से कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने आज से दस वर्ष पूर्व वेलेंटाइन डे का नाम भी सुना हो. अब उसका समर्थन और विरोध अजीब लगता है. जहाँ तक देश की संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मुझे जबरन विरोध कोई तरीका नजर नहीं आता. इससे तो उसे प्रचार ही मिलता है. फिर आम आदमी जो इसे नहीं जानता वह भी इसका नाम लेता है. कई लोगों ने इसका आपसी चर्चा में जिक्र किया और मैंने सुना. मुझे लगता है कि इस तरह इसे और प्रचार मिला. </p>
<p>जहाँ तक संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मैं इसे भी वाद और नारों में लिपटे शब्दों की तरह देखता हूँ. आप यह कह सकते हैं कि मैं हर विषय पर वाद और नारों से जुडे होने की बात क्यों लिखता हूँ. तो जनाब आप  बताईये कि बच्चों को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का काम किसे करना चाहिऐ-माता-पिता को ही न! इस तरह जबरन विरोध कर आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि कुछ लोग हैं जो इस काम में नाकाम रहे हैं. दूसरी बात आखिर संस्कारों और संस्कृति का व्यापक रूप लोगों के दिमाग में क्या है यह आज तक कोई नहीं बताया. बस बचाना है और शुरू हो जाते हैं. आखिर इसकी उपेक्षा क्यों नहीं कर देते. एक दिन के विरोध से क्या हम समाज में जो नैतिकता का पतन हुआ है उसे बचा सकते हैं? कतई नहीं, क्योंकि हम अपने समाज के उस खोखलेपन को नहीं देख रहे जो इसे ध्वस्त किये दे रहा है. देश में कन्या के भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं पर उसमें  कामयाबी नहीं मिल रही है. जिस दहेज़ प्रथा को हम सामान्य मानते हैं उससे जो विकृति आई है उस पर कभी किसी ने सोचा है?इसने समाज को बहुत बुरी तरह खोखला कर दिया है. </p>
<p>हम सऊदी अरब द्वारा लगाए प्रतिबन्ध की बात करें. वहाँ कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहाँ  भी इस बीमारी ने अपने कदम रखे हैं तो इसका सीधा मतलब यही है कि बाजार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पूंजीवर्ग के सदस्य  ही विजय श्री प्राप्त करते  है. इस प्रसंग में एक बात जो महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब में  एक धार्मिक राज्य होते हुए भी वहाँ क्यों लोग इसके प्रति आकर्षित हुए? विश्व में उदारीकरण के नाम पर  बाजार के ताकतवर लोगों के द्वार सब जगह खुले हैं पर आम आदमी के लिए नहीं. इसलिए बाजार की व्यवस्था वह सब परंपराएं और विचार लेकर आगे बढ़ रही है जो उसके लिए आय के स्त्रोत बना सकते हैं.<br />
इसका मुकाबला करना है तो उसके लिए उन लोगों को खुद दृढ़ हो होना पडेगा जिन पर अपने बच्चों पर संस्कार डालने की जिम्मेदारी है. अपने घर और बाहर अपने बच्चों को अपने आध्यात्म से अवगत कराये बिना उनको ऐसे  हास्यास्पद काम से दूर नहीं रखा जा सकता. सुबह और शाम आरती जो लोग पहले करते थे उसे फिजूल मानकर अब छोड़ दिया गया है पर आदमी के मन में संस्कार भरने का काम उसके  द्वारा किया जाता था वह अनमोल था.  कभी बच्चे को मंदिर ले जाया जाता था तो कभी तीज-त्यौहार   पर बडों के चरण स्पर्श कराये जाते थे. अब सब बातें  छोड़ उसे अपना काम सिद्ध करने का ज्ञान दिया जाता है और फिर जब वह छोड़ कर बाहर चला जाता है तो अकेलेपन के साथ केवल उसकी यादें रह जातीं हैं. </p>
<p>संस्कारों और संस्कृति के नाम पर वह फसल हम लहलहाते देखना चाहते हैं जिसके बीज हमें बोये ही नहीं. आखिर हमारे संस्कारों और संस्कृति की कौनसी ऐसी फसल खड़ी है जिसे बचाने के लिए हम हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं. अपने आध्यात्म से परे होकर हमें ऐसी आशा नहीं करना चाहिए. याद रखना पूरी दुनिया भारत की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा मानती है पर अपने देश में कितने लोग उससे परिचित हैं इस पर विचार करना चाहिए. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द बोलते जगह देखकर-कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=83</link>
<pubDate>Tue, 05 Feb 2008 16:13:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=83</guid>
<description><![CDATA[ पढ़ते हैं कोई भाषा की  बड़ी किताब
लगाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> पढ़ते हैं कोई भाषा की  बड़ी किताब<br />
लगाते फिर अपने पढे पाठों का हिसाब<br />
साहित्य के शब्दों से परहेज<br />
गणित में ही होता  उनका हिसाब</p>
<p>कौन समझाए किसको<br />
अंकों के खेल में दो और दो चार होते<br />
पर शब्दों के कभी कई अर्थ होते<br />
नाम है कुछ<br />
इशारा कहीं और होता<br />
सिंह कभी बहादुर तो<br />
लोमडी जैसा कहीं चालाक आदमी<br />
और सांप का मतलब कहीं<br />
दुष्ट  भी होता<br />
कभी-कभी हंसी में भी<br />
रोने का आभास होता<br />
शब्द बोलते हैं जगह देखकर<br />
होता नहीं उनका कोई हिसाब<br />
किताब में छापी  कहानी  बोलती है<br />
कविता चहकती है<br />
गीत गाते हैं<br />
गणित में एक और एक दो  होते<br />
शब्दों में होते  एक और एक ग्यारह<br />
भाषा के अर्थ वह क्या समझेंगे<br />
जिन्होंने पढी नहीं उसकी किताब<br />
लगाते हैं जो शब्दों का अंकों की तरह हिसाब<br />
-------------------------------------------   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुछ देर आत्ममुग्ध हो जाएं, ब्लोग पर लिख आयें-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=465</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 17:40:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=465</guid>
<description><![CDATA[आओ कुछ पल के लिए आत्ममुग्ध हो जाएं
चलो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आओ कुछ पल के लिए आत्ममुग्ध हो जाएं<br />
चलो अपने ब्लोग पर लिख आयें<br />
हमारे लिखने से ज़माना नहीं बदल जायेगा<br />
पर दिल का गुबार तो निकल जायेगा<br />
वैसे भी किसी के लिखे से<br />
जमाना क्या बदलेगा<br />
पहले तो हम ही बदल जाएं </p>
<p>कुछ लिखेंगे नहीं तो कुछ पढ़ने लगेंगे<br />
किसने क्या लिखा उसके जाल में फंसेंगे<br />
ढेर सारी किताबे लिखी गयी हैं<br />
कुछ पडी हैं रद्दी की तरह अलमारी में<br />
तो कुछ मशहूर हुईं हैं जंग करवाने के लिए<br />
पूजने के लिए आलों  में रखीं है<br />
पर नहीं है वह भी पढ़ने के लिए<br />
आओ अपना ही लिखा पढ़ते जाएं </p>
<p>वाद और नारों पर चलता रहा है समाज<br />
नहीं उसके विचारों में गहराई आज<br />
भेड़ की तरह हांके जाते लोग<br />
जागते हुए खुली आंखों से नींद में<br />
चलने का हो गया सबको रोग<br />
आओ कुछ अपना ही लिखा पढ़ते जाएं</p>
<p>मन को बहना है इधर या उधर<br />
जाना है वहीं ले जायेगा वह जिधर<br />
कोई हमें पहले हांके कोई कथा सुनाकर<br />
रच डालें कई कहानी और कवितायेँ<br />
कोई  हमें मन्त्र-मुग्ध कर<br />
बाँध कर अपनी दरबार में सजाए<br />
आओ कुछ पल के लिए आत्ममुग्ध हो जाएं<br />
चलो अपने ब्लोग पर लिख आयें<br />
-------------------------------------- </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भजन करते-करते भक्त हो जायेंगे-हास्य क्षणिकाएँ ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=464</link>
<pubDate>Sun, 03 Feb 2008 11:46:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=464</guid>
<description><![CDATA[निजी अस्पतालों के बाहर लिखा रहता है
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>निजी अस्पतालों के बाहर लिखा रहता है<br />
'गरीबों का इलाज मुफ्त किया जाता है'<br />
शायद इसलिए उनके पेट की किडनी<br />
कभी खराब न हो इसलिए ही<br />
कुछ डाक्टरों द्वारा  उसे निकालकर<br />
अमीर की देह में फिक्स्ड डिपोजिट<br />
मुफ्त में किया जाता है<br />
---------------------------------------</p>
<p>एक गरीब मरी