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	<title>glogbal-dashborad &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "glogbal-dashborad"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 06:29:08 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[मन के समंदर में लहर और नाव का खेल]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=389</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 11:12:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=389</guid>
<description><![CDATA[मन के समंदर में उठती लहरें
कई नाम है जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i22.tinypic.com/x28ktu.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />मन के समंदर में उठती लहरें<br />
कई नाम है जो नाव की तरह<br />
लहराते निकल जाते हैं<br />
जिसका किनारा आ गया<br />
वह साथ छोड़कर चला गया<br />
वह लहरें भी रूप बदल देती<br />
जिनके साथ वह खेल जाते हैं<br />
एक लहर आती, एक नाव ले आती<br />
उसके रुखसत होने के पहले ही<br />
दूसरी उठती नजर आती<br />
हर किसी का मन है समंदर<br />
सबकी अलग अलग कहानी हैं<br />
कुछ लहरों के साथ ही बहते<br />
तो कुछ दृष्टा बनकर<br />
लहर और नाव का खेल देखते जाते हैं<br />
मन के समंदर में तैरते हैं बस नाम<br />
हाथ में तो सबके किरकिरी नजर आती है<br />
...............................</p>
<p>दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब क्रिकेट मैच होंगे तब अपने ब्लाग भी फ्लाप होंगेःव्यंग्य    ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=386</link>
<pubDate>Thu, 05 Jun 2008 16:38:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=386</guid>
<description><![CDATA[
क्रिकेट प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i24.tinypic.com/nz5844.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
क्रिकेट प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी है। मैंने एक भी मैच नहीं देखा पर टीवी पर अनेक बार ऐसा अवसर आ जाता था जब मैं समाचार सुनना चाहता तो सामने इस पर चर्चा चलती मिलती। मैं बहुत बोर होता तब अपने किसी भी ब्लाग पर लिखने के लिये अपना कंप्यूटर खोलकर बैठ जाता। किसी ब्लाग पर जाता तो कोई न कोई ब्लाग लेखक इन मैचों पर पर लिखकर पढ़ने का जायका ही खराब कर देता। मैंने एक भी ऐसा ब्लाग नहीं खोलकर पढ़ा जिसमें इस प्रतियोगिता के मैच या खिलाड़ी के बारे में चर्चा का संभावना होती। </p>
<p>मैंने अपने एक ब्लाग में जिक्र किया था कि जब से यह प्रतियोगिता शुरू हुई तब से मेरे ब्लाग की पाठक संख्या कम हो गयी थी।  कहां तो मेरी हास्य कविताएं कुछ हिट ले आतीं और कहां इन मैचों के चलते फ्लाप हो गयी। हिंदी के सभी ब्लाग दिखाने वाले फोरमों पर जाने में ही संकोच होता पर जाना तो पड़ता ही है। अगर किसी दूसरे का पढ़ेंगे नहीं तो लिखेंगे क्या खाक? बहरहाल पिछले दो दिन से लग रहा है कि पाठक संख्या फिर उसी पटरी पर आ रही है। मेरा दीपक बापू कहिन जिस तरह आगे बढ़ रहा था उसके अगल रविवार तक ही बीस हजार पाठक संख्या होने की संभावना थी पर कल और आज उसकी पाठक संख्या दुगनी हो गयी जो कि पहले सामान्य थी और यह उसने यह लक्ष्य आज ही प्राप्त कर दिखाया।<br />
मैं सोच रहा था कि जिस तरह क्रिकेट के चलते पहले जनसामान्य की गतिविधियों में शिथिलता देखी जाती थी वह अब अंतर्जाल पर भी दिख रही है। अंतर्जाल एकदम आधुनिक व्यक्तियों के लिये लिखने और पढ़ने की जगह है और अब इसी वर्ग में ही क्रिकेट देखने वाले अधिक रह गये हैं। मैंने एक अन्य बात भी देखी वह यह कि किसी दिन मैच न हो या अच्छा  न हो तो इन ब्लाग पर पाठकों की संख्या बढ़ जाती थी तब मैं कनखियों से टीवी देखकर यह अनुमान करता था कि लोगों का आज के मैच में रुझान नहीं है।<br />
प्रसंग वश याद आया कि जब पिछले साल विश्व कप हो रहा था तब नारद फोरम ने एक अलग कालम क्रिकेट के संबंध में बना दिया था जहां मेरी कृतिदेव और देव में लिखे पाठ बिना पंजीकरण के वहां दिखाये जबकि वह पढ़ने लायक थे ही नहीं। क्योंकि शीर्षक और शूरू की कुछ पंक्तियां मैं यूनिकोड में लिखता था पर बाकी पूरी सामग्री कृतिदेव में होती थी। वहां भारतीय टीम क्या पिटी नारद का कालम पिट गया और प्रतियोगिता से पहले ही उसे नारद से हटा दिया गया। इधर मैने यूनिकोड में लिखना शूरू किया तो पाठक भी बहुत अधिक मिलने लगे। मतलब यह कि आधुनिक लोगों में अभी भी क्रिकेट के प्रति रुझान है और उसकी वजह से अंतर्जाल पर पाठकों की संख्या में कमी आती रहेगी। एक बात मजे की है कि क्रिकेट का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने वाले बहुत कम ब्लाग लेखक हैं पर लगता है कि कुछ अपने को बुद्धिजीवी सबित करने के लिए विरोध तो करते हैं पर चुपके-चुपके देखते भी हैं वरना इस प्रतियोगिता के दौरान   पाठक संख्या कम नहीं होती। इस विषय पर मेरे आलोचनात्मक आलेखों और हास्य कविताओं पर कई लोगों ने क्रिकेट खेल पर अनेक प्रतिकूल टिप्पणियां कीं। इसके बावजूद भी यह एक वास्तविकता है कि एक बहुत बड़ा वर्ग इन मैचों को देखने के लिए टीवी से चिपका रहा।  मैं यह दावा कभी नहीं करता कि मैं सही हूं पर अपने सभी ब्लाग पर पाठकों की संख्या देखकर मुझे यही लगता है कि जब क्रिकेट मैच होंगे तब अपने ब्लाग फ्लाप होंगे। </p>
<p>वैसे अंतर्जाल पर मेरा पहला लेखक क्रिकेट पर व्यंग्य करते हुए लिखा गया था और यह विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू होने से पहले की बात थी। मैंने शुरू के लीग मैचों को न देखने का विचार क्योंकि उस समय मैं अपने ब्लाग बनाने के लिये जूझ रहा था। जिस दिन भारत बंग्लादेश से हारा उस दिन मुझे अगले दिन सुबह इस समाचार का पता लगा। कीनिया को हराया तो मैंने लिखा था कि शेरों ने किया मेमनों का शिकार‘। यह आलेख नारद पर आये पर कोई पढ़ पाया होगा इसमें संदेह है। मैं क्रिकेट से विरक्त वैसे ही हो रहा था और अंतर्जाल पर लिखने का अवसर आने के बाद तो उससे और परे होना ही था पर विश्व कप में हारने के बाद तो एकदम उसके प्रति रुचि समाप्त हो गयी क्योंकि अब ब्लाग पर आगे बढ़ने का अवसर आ रहा था। हो सकता है कि मैं एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में भी अब दिलचस्पी न लूं और यहीं बैठकर अपने पाठ लिखता रहूं यह जानते हुए भी कि वह फ्लाप होंगे। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सब मिल गया फिर  उन्हें और क्या चाहिए-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=333</link>
<pubDate>Sun, 23 Mar 2008 12:50:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=333</guid>
<description><![CDATA[वह क्रिकेट खेले और विश्व कप जीतकर प्रत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह क्रिकेट खेले और विश्व कप जीतकर प्रतिष्ठा का वह इतना  शिखर छू लें-जो एक आदमी के लिए दिवास्वप्न हो। वह चौके-छक्के मैदान पर लगाकर अपना बैंक बेलेंस बढा लें और अपने रहने के  लिए महल बना लें जिसमें आधुनिक जीवन व्यतीत करने की सुविधा हो। उन्हें और क्या चाहिए?</p>
<p>वह फिल्मी दुनिया में करतब दिखाते हुए  बादशाह बन जाएं। ऐसे व्यक्तित्व के मालिक हों जिसकी  कल्पना देवलोक के देवताओ  से ही मिलती हो। इस मायावी दुनिया में जो सुख गिनाए  जाते हैं वह सब मिल गए हों। अपने और बेटे की प्रसिद्धि और साथ में खुशहाल परिवार। कोई कमी नहीं। रोज किसी अख़बार या टीवी चैनल पर उनके फिल्मों की चर्चा होती हो। खुद काम करें और बाद में अपने बेटों को भी इस लाइन में लाकर अभिनेता या निर्माता बना दें और वह भी चमकता सितारा हो। अगर बच्चे छोटे  हों तो भी उनकी चर्चा मीडिया में होती हो  उन्हें और क्या चाहिए।</p>
<p>फिर भी उनकी कुछ मजबूरियाँ हैं। उनको धार्मिक दिखना है और समाज के लोगों के सामने उसका प्रदर्शन  करना है और ऐसे नहीं किसी एक धर्म का बल्कि दूसरे धर्म का भी सम्मान करते दिखना है। इस देश में धर्म की ताकत को सब जानते हैं। माया   नहीं मिली  तो भी सर्वशक्तिमान के घर आदमी जाता है और मिल जाती है तो भी धन्यवाद देने जाता है। सर्वशक्तिमान के घर सब मांगने नहीं जाते कुछ तो केवल अपने हृदय का  भक्ति भाव अपना कर्तव्य  समझ कर उसे  व्यक्त करते हैं तो कुछ यह अपने को दिखाने जाते हैं की हम भक्ति करते हैं।</p>
<p>चलिए सब ठीक। पर एक पशु  की बलि। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी का विश्व कप जीता जो कि एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी उस पर तो कप्तान ने कुछ नहीं किया। तब किसी से मन्नत क्यों  नहीं मांगी। उसका महत्त्व नहीं मालुम था। वह तो उचट कर लग गयी। उसमें मेहनत  नहीं की। सोचा-'यह भी कोई टूर्नामेंट है जो मन्नत मांगें।'<br />
उस जीत में उनका कोई योगदान नहीं था। वह तो देश के लाखों क्रिकेट प्रेमियों की दुआएं थी तो सर्वशक्तिमान उनको विश्व का जितवा दिया।उनके अब इस व्यवहार से  कम से कम अब तो ऐसा ही लगता है। जब जीतकर लौटे तो लोगों ने सिर आंखों पर बिठा लिया। वह कहीं भी मत्था टेकने नहीं गए क्योंकि उसमें सर्वशक्तिमान की कोई  भूमिका उनको नजर नहीं आयी। कोई पशु बलिदान होने से बच गया।<br />
अपने वरिष्ठ खिलाडियों के सन्यास से कमजोर हो रही आस्ट्रेलिया की टीम को हराने  के लिए मन्नत मांगी। वह पूरी हो गयी। उसमें साथी खिलाडियों का कोई योगदान नहीं था क्योंकि वह तो मन्नत की वजह से उनमें शक्ति आ गयी थी। मन्नत के लिए जिस पशु का वध होना था उसकी बदकिस्मती से जीते कोई अपनी किस्मत थोडे थी। </p>
<blockquote><p><strong>किसका नाम लें और किसका नहीं! बडे हो जाते हैं पर चरित्र बौना ही रहता है। जिन्हें नयी पीढी को अपने कर्म पर विश्वास कर आगे बढ़ने का सन्देश देने का जिम्मा है वही उसे अन्धविश्वास के अँधेरे में धकेल रहे हैं। हर तरह के दरबारों में हाजिरी लगाते हैं। संदेह होता है कि भगवान को खुश कर रहे हैं या कोई और लोग हैं जिनको खुश कर अपना काम चला रहे हैं। इधर टूथपेस्ट, साबुन, कार, और गाडी का प्रचार और उधर हर तरह की दरबार में गुहार! यह तालमेल समझ में नहीं आता। </strong></p></blockquote>
<p>वैसे भी भक्ति कोई दिखाने की नहीं होती-भक्ति का मतलब है एकांत साधना। जो दिखाते हैं वह ढोंग होता है।आजकल लोग शिक्षकों से पढ़ते हैं पर जीवन के लिए कोई गुरु करते नहीं है इसलिए वह क्रिकेट और फिल्म से जुडे लोगों को अपना आदर्श मान लेते है। वह लोग शिखर पर होते हैं और समाज अपने शिखर पुरुषों का ही अनुकरण करता है। इसलिए बडे लोगों के ढोंग भी समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लोग इसलिए किसी दरबार में नहीं जाते कि वहाँ अपने भक्ति भाव व्यक्त करना है बल्कि उनका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि हम भक्त हैं। ऐसे में किसे दोष दें और किसे नहीं।   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तुम  वापस  ले जाओ यह बोतल-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/03/21/tum-vapas-le-jaao-yah-botal-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 17:12:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/03/21/tum-vapas-le-jaao-yah-botal-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[पुराने झोले में छिपाकर फंदेबाज
दारू क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>पुराने झोले में छिपाकर फंदेबाज<br />
दारू की बोतल लाया<br />
और उसके  साथ नमकीन का<br />
लिफाफा भी हाथ में थमाया<br />
और बोला<br />
''दीपक बापू लिखते-लिखते<br />
ब्लोग पर तुम्हें एक वर्ष से<br />
अधिक हो गया पर<br />
फिर भी रहे तुम्हारे  ब्लोग  फ्लॉप<br />
कल यह पीकर अपने ब्लोगों पर<br />
विचरण करना हो जाओगे  टॉप<br />
जब से छोडा   है तुमने पीना<br />
मैं अकेला हो गया हूँ<br />
पीने में तो मजा आता नहीं है<br />
तुम फ्लॉप हो इसलिए कभी<br />
तुम्हारा लिखा पढ़ने में भी मजा नहीं  आया''</p>
<p>सुनकर हुए हैरान हुए<br />
और अपनी खिसकती नेकर  ऊपर खींचते<br />
और अंग्रेजी  टोपी साधते हुए<br />
दारू की बोतल की तरफ<br />
पहले ललचाती नजर से देखा<br />
फिर संभाल कर बोले दीपक बापू<br />
''हमारे लिखे  में मजा तो<br />
हमें  भी नहीं आता<br />
चिंतन लिखने बैठते तो व्यंग्य हो जाता<br />
हास्य लिखने बैठते तो चुटकुला हो जाता<br />
पर लिखने में फिर भी  नशा बहुत आया </p>
<p>शराव पीकर अपने से<br />
बहुत  किया है खिलवाड़<br />
अपने ही मुहँ से पीया जहर<br />
दिया खून बिगाड़<br />
नशेडी तो बचपन से हैं लिखने के<br />
लेखक तो हैं बस दिखने के<br />
दारू की बोतल का जिन्न अब<br />
हमें लुभा नहीं पाता<br />
अंतर्जाल पर इतना स्वतन्त्र लिखने का<br />
नशा हमसे दूर नहीं हो पाता<br />
हिट और फ्लॉप की फिक्र में<br />
अपना समय कभी नहीं गंवाया<br />
अपने बनाए शिखर पर बैठे तो<br />
फिर किसी दूसरे का शिखर नहीं भाया<br />
न खिलाड़ी हैं न निर्णायक<br />
न गीतकार न गायक<br />
अपनी श्रेणी के लिए कोई शब्द<br />
हमें भी नहीं सूझ पाया<br />
पोस्ट की बोतल में शब्दों की<br />
वही शराब  डालते हैं जो खुद पीते हैं<br />
कहीं से कुछ ढूँढने की जरूरत नहीं<br />
वही लिखते जो लम्हें हम जीते हैं<br />
लिखते बहुत लोग हैं<br />
पर उसके नशे में बहुत कम लोग जीते हैं<br />
कोई लिखते-पढ़ते  शराब पर लिखी शायरी<br />
कोई पढता-लिखता   कामुक डायरी<br />
करते हैं अपनी देह को शिथिल<br />
कहीं थोडी परेशानी आ जाये<br />
घबडा जाता है दिल<br />
कहा है स्वामी समीरानंद ने<br />
दीपक बापू अलख जगायेंगे<br />
भले ही किया होगा मजाक<br />
पर हम जानते हैं<br />
लोग हमसे यही करवाएंगे<br />
फिर किसकी  फिक्र में पीयें<br />
हिट और फ्लॉप की फिक्र में क्यों  जीयें<br />
अपनी पोस्टें लेकर जंग के लिए<br />
हम कभी नहीं निकलते<br />
जो हिट हैं वह  फ्लॉप की फिक्र में<br />
हो जाते हैं दुबले<br />
और जो  फ्लॉप हैं वह शर्म के मारे<br />
अपने घर से नहीं  निकलते<br />
हमें तो दर्शक दीर्घा में<br />
बैठने का ही लेना है मजा<br />
तुम वापस ले जाओ यह बोतल<br />
हमने  बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया<br />
------------------------------------<br />
 </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तो यह था एक बकरे का बलिदान-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=330</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 18:35:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=330</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
दीपक बापू अंतर्जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>आया फंदेबाज और बोला<br />
दीपक बापू अंतर्जाल पर<br />
"लिखते-लिखते तुम क्या पाओगे सम्मान<br />
कहीं मन्नत मानो और हो जाओ हिट तो<br />
करना किसी बकरे का बलिदान<br />
आजकल भला मेहनत पर भरोसा कौन करता है<br />
सर्वशक्तिमान भी कुछ लेकर काम करता है<br />
अब छोडो अपनी प्रतिभा पर अभिमान<br />
सिखा रहा है क्रिकेट का कप्तान''</p>
<p>कंप्यूटर पर लिखते-लिखते रुक गए हाथ<br />
टोपी को घुमाकर बोले दीपक बापू<br />
'समझ गए अखबार पढ़ कर आ रहे हो<br />
हमारा ब्लोग पढ़ते तो कुछ समझ पाते<br />
माया घुमाती  है आदमी को ऐसा कि<br />
अच्छे खासे लोग शिकारी हो जाते<br />
हम तो समझे थे कि<br />
आस्ट्रेलिया में किला फतह<br />
खिलाडियों के खेल की वजह से हुआ है<br />
या फिर कोई जुआ हुआ है<br />
पर बात आई समझ में<br />
यमदूत भी रहे  होंगे असमंजस में<br />
बकरा रहा होगा  कोई क्रिकेट प्रेमी<br />
पापों की वजह से बकरे की योनि मिली होगी<br />
किसी एक पुण्य की वजह से<br />
अपनी मौत चुनने की छूट उसे होगी<br />
माँगा होगा सर्वशक्तिमान से<br />
 उसने क्रिकेट के कप्तान के हाथों से<br />
कटने का वरदान<br />
इसीलिए हो गया बलिदान </p>
<p>यमदूतों ने ही की होगी मेहनत<br />
सर्वशक्तिमान का हुक्म बजाना था<br />
क्रिकेट की टीम को जितवाना था<br />
ताकि बकरे को मिला<br />
पूरा हो सके वरदान<br />
कोई हलाल करे उसे क्रिकेट का कप्तान<br />
इतनी मेहनत उन्होने  शायद ही किसी<br />
जीव को  लाश   बनाने पर की होगी<br />
जिसने ऐसी कामना की होगी<br />
अगर क्रिकेट की टीम हार जाती<br />
बकरे की इच्छा अधूरी रह जाती<br />
अब खुला है यह राज जाकर<br />
कैसे  चूहे शेर हो गए थे<br />
कंगारू ढेर हो गए थे<br />
यह था एक बकरे का बलिदान<br />
हम क्यों कर रहे थे अपनी जीत पर अभिमान''<br />
---------------------------------------- </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति:राज्य सभी धर्मों के पालन कराने वाला मध्यस्थ ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=329</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 03:16:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=329</guid>
<description><![CDATA[
१.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
१.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए। सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन की  व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।<br />
२.सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।<br />
३.यदि अपराधियों को सजा  देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।<br />
४.संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना तनाव  और थकावट बढाते हैं खुद लोग-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=328</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 17:21:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=328</guid>
<description><![CDATA[हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य योनि बहु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य योनि बहुत पुण्य करने पर मिलती है और अगर कोई इस योनि में दान-पुण्य और धर्म का निर्वाह नहीं करेगा तो उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना पडेगा। नित-प्रतिदिन चाहे किसी सत्संग में जाये यही सुनने को मिलेगा।</strong></p></blockquote>
<p>मगर ज़रा समाज की हालत देखिये तो किस हाल में पहुंच गया है। बचपन से लेकर आज तक मैंने यहाँ लोगों के रंग-ढंग देखे हैं  उससे मुझे हंसी आती है शायद यही कारण है की कभी गंभीर लेख लिखने बैठता हूँ तो व्यंग्य लिख जाता हूँ। कई लोगों को मैंने अपनी जिन्दगी में सघर्ष करते देखा। अपने परिवार और बच्चों के लिए रोटी  जुटाने के लिए उन्होने जमकर संघर्ष किया और फिर लक्ष्मी जी की उन पर कृपा हुई तो सरस्वती ने विदा ले ली। उम्र के उस मोड़ पर उन्हें शराब पीते देखा जिसमें उसे छोडा जाता है।</p>
<p>उस दिन एक  सगाई में गया। वहाँ लड़के के नाना को दारू पीते देखा। मेरे दादाजी से उनकी मित्रता थी और कई बार मैं अपने पिताजी के साथ उनके घर  गया था। वह व्यापार के लिए बाहर जाते थे और कहीं से  कुछ सामान लाते थे जो हमें सौंपते थे। वह शराब आदि नशे से दूर थे यह बात मैंने अपने बडे लोगों के मुख से सुनीं थी। उनको शराब पीता देख कर  मैंने लड़के के पिता अपने मित्र से पूछा-''इन्होने  कब से पीना शुरू की।''</p>
<p>उसने इधर-उधर देखा और बोला-''तुमने पीना कब बंद किया?''<br />
उस समय मेरे सामने तीन लोग और थे और वहाँ मेरे लिए भी ग्लास तैयार किया गया था और मैंने उसे लेने से इनकार कर दिया। मैंने अपने मित्र से कहा--''अगर तुम यह  सोचते हो कि  में इसे पीने वाला हूँ तो भूल  जाओ। मैंने पांच साल पहले  पीना छोड़ दिया है। कभी कभार पी लेता था और वह भी एक वर्ष  से बंद है। हाँ, तुम इस बात  को टालों मत के तुम्हारे ससुर ने कब से पीना शुरू कर दिया है।''<br />
मेरा मित्र वहाँ से खिसक गया तो एक अन्य दोस्त बोला-''इनको पीते हुए पंद्रह वर्ष हो गए हैं।''</p>
<p>मैंने हिसाब लगाया  तो उन्होने पचपन वर्ष की आयु में  पीना शुरू किया होगा। मेरा मेजबान मित्र फिर हमारे पास से गुजरा तो मैंने उसे बुलाया और कहा-''पर मेरी उम्र अभी पचपन नहीं हुई है तो पांच वर्ष पहले कैसे  हो सकती थी। ऐसा लगता है कि तुम्हारे ससुर को गलत संगत  लग गयी है।''</p>
<p>मेरा मित्र बोला ''तुमने अधिक पी ली है।<br />
दूसरे मित्र ने कहा-''यह तो ले ही नहीं रहा है?''<br />
मेरे मित्र ने कहा-''क्यों आज कैसे साधू बन रहे हो।''<br />
मैंने कहा-''आखिर इमेज भी कोई चीज है। तुम खुद नहीं पीते हो और दूसरों को पथभ्रष्ट कर रहे हो। वैसे भी तुम बहुत चालाकी करते रहे हो पर अब नहीं चलेगी।''<br />
वह हंसकर चला गया तो दूसरा मित्र बोला-''तो तुम्हें भी बाकी लोगों की तरह इसके बारे में गलतफहमी है कि यह  पीता नहीं है। आओ चलो दिखाऊँ।''<br />
वह मेरे कंधे पर हाथ रख कर बगीचे के पास बनी  इमारत  के एक कमरे में ले गया। मैंने देखा मेरा मित्र अपने कुछ खास लोगों में एक सज्जन के हाथ से ग्लास लेकर पी रहा था। मैंने अपने दोस्त को खींचा और वापस अपनी टेबल पर आ गया। दरासल मेरा वह मित्र बाहर काम करता था पर अपने अधिकतर रिश्तेदार हमारे शहर में होने के कारण यहीं सगाई कर रहा था।<br />
बाद में मैंने उसे पाउच से कुछ निकाल कर जब धीमा जहर खाते देखा तो मुझे हैरानी हुई। मैंने अपने दूसरे दोस्त से कहाँ-''शराब तो ठीक! यह पाउच तो एकदम जहर जैसा है। कमाल यह लोग इसे खाते कैसे हैं?'' </p>
<p>मेरे मित्र ने अपनी जेब से एक पाउच निकला और उसमें से दाने अपनी मुहँ में दाल दिए। और बोला-ऐसे। </p>
<blockquote><p><strong>शराब और  अन्य व्यसन जिस तरह समाज का हिस्सा बन गए हैं उसे देखकर मैं  सोचता हूँ कि हम जिस स्वस्थ भारत की बात करते हैं वह एक कल्पना है। लोग शारीरिक और मानसिक  रूप से स्वस्थ दिखते हैं पर क्या वाकई  होते हैं।</strong></p></blockquote>
<p> मैं जब पीता था तो किसी महफ़िल में जाने से पहले पीकर जाता था और वहाँ पीता था तो थोडी पीता था। उसमें भी मैंने कभी किसी से बदतमीजी  नहीं की। कई बार लोग महफिलों में  उधम मचा देते हैं। शराब पीने से आदमी के खून में तेजी  आती  है पर उसका फायदा उठाकर लोग बदतमीजी उसी से करते हैं जिससे डरते नहीं है। वरना अपने से ताक़तवर आदमी के आगे वह वैसे ही क्यों मिमियाते  हैं जैसे बिना शराब के मिमियाते हैं, हालांकि यह एक अलग विषय है पर हम समाज की रीतियों को चला रहे हैं उसमें  शराब और अन्य व्यसन कैसे शामिल किये गए हैं उसका कोई जवाब नहीं दे  सकता है।</p>
<p>उस पर जिस  तरह पाउचों का सेवन बढ़ रहा है वह आने वाले कॉम को किस हालत में पहुँचायेगा  कहा नहीं  जा सकता। उस दिन एक लड़का घर आया। वह पाउच खाता है। थोडी देर बैठने के बाद बोला-''मेरे सिर में दर्द हो रहा है। आपके पास कोई गोली है?''<br />
मैंने कहा-''गोली तो नहीं है और होती तो  भी देता नहीं। तुम अपनी जींस पर कसकर बंधा हुआ बेल्ट  थोडा ढीला कर लो। तुम्हारा सिर दर्द थोडी देर में ख़त्म हो जायेगा नहीं तो फिर तुम्हें दूसरा उपाय बताऊंगा।''</p>
<p>उसने बेल्ट   ढीला किया, उसके कुछ देर बाद भी वह बात करता रहा और फिर बोला--''मेरा सिर दर्द कम  हो रहा है। पर कमाल है यह  आपने  सब कैसे सोचा?।''</p>
<p>मैंने उसे कहा-''तुमने मेरे सामने ही तीन पुडिया खाईं है और तुम्हारा कसा हुआ बेल्ट देखर मुझे लगा कि कहीं हवा का चक्कर है। तुम्हें बहुत जल्दी पता लग गया पर मुझे बहुत देर बाद समझ में आयी।''</p>
<p>हम अपने शरीर को निरर्थक  कामों में अधिक लगा रहे हैं। शरीर के विकार तो दिखाई देते हैं पर मन के विकार तो कोई ही देख पाता  है। अपने शरीर से खिलवाड़  करते लोगों पर मुझे बहुत  तरस आता है क्योंकि एक समय मैं भी  इस दौर  से निकल चुका हूँ। वर्तमान हालत में लोगों पर तनाव अनेक कारणों से बढ़ रहा है पर उससे बचने के लिए जो उपाय करते हैं वह तनाव और बढा देते हैं। जब उस उपाय का असर ख़त्म होता है तो तनाव बढ़ने के साथ थकावट भी बढ़ जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं=हिन्दी शायरी ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=327</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 17:00:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=327</guid>
<description><![CDATA[कभी सोचते हैं कि दिमाग का बोझ उठाकर
जम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>कभी सोचते हैं कि दिमाग का बोझ उठाकर<br />
जमीन पर फैंक दें<br />
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं</p>
<p>कई जगहों पर खडे होने का मन नहीं करता<br />
उकता जाते हैं मिलने वाले लोगों से<br />
सोचते हैं चले जाएं परे वहाँ से<br />
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं</p>
<p>हम बोलते हैं, पर सुनता कोई नहीं<br />
बहरे कानों को सुनाते हैं दुखडा<br />
न देख रही आंखों को दिखा रहे<br />
अपना दिल, जो हो चुका टुकडा-टुकडा<br />
कोई हमदर्दी नहीं दिखा रहा<br />
सोचते हैं अकेले में अपने को समझाएं<br />
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं</p>
<p>अपनी मजबूरियों के ढोने की ऐसी आदत है<br />
उतारने पर हल्का हो जाने का डर होता है<br />
उनसे मुक्ति की बहुत चाह है<br />
पर मजबूरियाँ इसकी इजाजत नहीं देतीं </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इसलिए महिला दिवस पर कुछ नहीं लिखा-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=320</link>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 12:33:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=320</guid>
<description><![CDATA[आज महिला दिवस है और मैं अपने आसपास देख ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज महिला दिवस है और मैं अपने आसपास देख रहा हूँ की शायद ही  कोई महिला हो  जिसे यह मालुम हो और अगर मालुम हो तो वह इसके प्रति गंभीर हो। ऐसे में  महिला दिवस पर कुछ लिखने से कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है। पिछली बार जब पुरुष दिवस था तो मैंने उस  पर एक आलेख लिखा था तो उस पर एक महिला ब्लोगर ने टिप्पणी दी कि '' आज पुरुष दिवस पर हमें  आपसे सहानुभूति  है''। अगर मैं केवल यह भी लिख दूं तो उससे क्या? वैसे भी देखा जाये तो कई जगह पुरुषों को भी सहानुभूति की जरूरत होती है.<br />
आजकल हर विषय पर दिवस मनाया जाता  है और लिखने के लिए मसाला मिल जाता है पर वह इतना सामान्य होता है कि लगता है कि कुछ असामान्य लिखा जाये पर उसमें विवाद होने का ख़तरा  है तो सोचा कि आज हम भी कुछ नहीं लिख रहे। कोई जरूरी  है कि हम हर विषय पर लिखें।  </p>
<p>फिर महिलाओं के बिना किसी पुरुष का अस्तित्व कैसे हो सकता है? उसी तरह एक पुरुष के बिना किसी स्त्री का अस्तित्व नहीं हो सकता है। आज टीवी और अखबार पर इस बारे में बहुत कुछ दिखाया जा  रहा है। जिन महिलाओं ने अपने क्षेत्र में सफलता हासिल की है उनकी चर्चा है। होना चाहिए भी पर क्या जिन महिलाओं ने  अपने घर संभाले उन पर कुछ नहीं लिखना चाहिए। स्त्री-पुरुष पर स्वाभाविक  रूप से एक-दूसरे निर्भर रहते हैं और अगर स्त्री पुरुष की घर में  रहकर सेवा करती है तो पुरुष भी बाहर रहकर उसके घर की रक्षा करता है-अगर वह गृहस्वामी होता है स्त्री भी गृहस्वामिनी कहलाती है ।  आज खास और प्रसिद्ध महिलाओं के नाम लेकर आम महिला को क्या बताया जायेगा? </p>
<p>जो महिलाएं उस आयु में हैं जहाँ कुछ नया करने के लिए नहीं है उनको बताया जायेगा कि देखो ''तुम एक आम औरत हो'' और जो नवयौवनाएं हैं   उनको बताया जायेगा कि इन  जैसा होने का सपना देखो। इस तरह विभिन्न विषयों पर दिवस मनाने की प्रवृति पश्चिम से आई है पर हमारे यहाँ मीडिया को इसे भुनाने का अवसर मिल रहा है। देखा जाये तो परिवार हो या समाज उसमें लिंग और  आयु के आधार पर भेद कर नहीं चला जा सकता है-अगर पुरुष भर के बाहर के काम देखता है तो स्त्री घर का। बच्चा छोटा होता है तो माता-पिता उसे पालते हैं और जब बूढे होते हैं तो वह उनको पालता है।<br />
एक तरफ  मीडिया व्यक्तिगत रूप से उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाली  कामकाजी महिलाओं का प्रचार कर रहा है वहीं वह कामकाजी पति-पत्नी के बच्चों  के भटकने की शिकायत करता है। कभी कोई  ऐसी घटना होती है तो माँ-बाप के कामकाजी होने पर बहस होती  हैं पर नतीजा सिफर। कोई  स्थाई सन्देश नहीं आता यही वजह है कि हर वर्ष हर दिवस पर चर्चा और वैसी ही जैसी पहले हो चुकी है। सच तो यह है कि जिसके सामने जैसी स्थिति होती है वैसे ही वह चले लगता है। जहाँ  पुरुष आय अर्जन के मामले में कमजोर होते हैं वहाँ महिलाएं यह भी मोर्चा संभालतीं हैं और जहाँ पुरुष भरपूर कमा रहा है वहाँ समय होते हुए भी औरतें समाज के लिए कोई काम नहीं करतीं। कहीं औरतें घर संभालने और कमाने के साथ समाज में अपने आसपास के लोगों की  निष्काम भाव से मदद करतीं है। वैसे भी गृहस्थ औरतें कुछ ऐसे काम करतीं है जिनको हम कभी समाज सेवा के रूप में नहीं मानते-जैसे पड़ोस में कोई बच्चा बीमार हो तो उसकी माँ के साथ उसे  अस्पताल ले जाना। कोई पड़ोस में गरीब बच्चा हो उसको कभी कभी अपने बच्चे के खिलोने देना। मतलब यह कि अपने आसपास के लोगों की मदद करने को भला कौन समाज सेवा मानेगा? उनका नाम तो तभी  हो सकता है जब वह किसी ऐसी जगह पर हों जहाँ से प्रचार माध्यम रोज उस पर लिख सकें। महिलाओं की तरक्की से  यही आशय प्रचारित करते हुए   दिखाया जा रहा है कि वह घर से बाहर कोई उपलब्धि प्राप्त करे। सवाल यह है कि फिर घर कौन संभालेगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय महिलाएं जो घर का काम करतीं है उनका अगर भौतिक मूल्य आँका जाये तो वह पुरुषों से कई गुना अधिक है और उसके आधार निष्कर्ष  निकाला जाये तो कहा जा सकता है कि    जो काम पुरुष कर सकते हैं और उसे महिलाएं कर रहीं है तो वह आम गृहस्थ महिलाओं से कम कमा रहीं है। हालांकि यह फार्मूला उन महिलाओं पर लागू नहीं हो सकता जो बहुत अधिक कमा रही हैं।</p>
<p>सब अपनी जगह ठीक है। अपने परिवार , शिक्षा और आसपास के वातावरण के प्रभाव से सब अपने रास्ते पर चलते हैं।   हाँ, जो स्त्री और पुरुष अपनी निजी उपलब्धियों और परिवार के अलग  अगर समाज  के लिए कुछ करते हैं  या उसके कार्य से समाज के लिए कोई  सन्देश होता है इतिहास में उसी का नाम दर्ज होता है।निज उपलब्धियों का सुख तो आदमी अपने जीवन में भोगने के साथ प्रचार भी पाता है  पर समाज को उससे तथाकथित  प्रेरणा के अलावा कोई  प्रत्यक्ष   लाभ  नहीं होता।</p>
<p>बचपन से लेकर आजतक महिलाओं के हाथों से ही मैंने भोजन ग्रहण किया है और अपना जीवन आज भी उनके आधीन पाता हूँ। माँ, बहिनें, पत्नी और अन्य रिश्तेदार महिलाओं ने कितनी बार प्यार किया होगा। इसका कोई हिसाब नहीं है। फिर अपनी संस्कृति में धन्यवाद देने की परंपरा कहाँ है? जब घर-रिश्तेदारी की महिलाओं को कभी धन्यवाद नहीं दिया तो फिर आज महिला दिवस पर किसके लिए लिखें। हाँ मन में कृतज्ञता   का भाव रहता है पर उसे व्यक्त करना आसान नहीं होता। घर-गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं को कम नहीं आँका जा सकता  क्योंकि उनके कार्य का धनराशि  में सत्यापन करना कोई आसान काम नहीं है। इसलिए जब कोई ऐसा सर्वेक्षण  मिलेगा तभी कुछ लिखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[छूकर देखो अपना मन (कविता साहित्य)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=305</link>
<pubDate>Sun, 10 Feb 2008 13:14:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=305</guid>
<description><![CDATA[मनोरंजन के लिए किसी
दृश्य, वस्तु या आद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मनोरंजन के लिए किसी<br />
दृश्य, वस्तु या आदमी की  चाहत<br />
इन्सान को मजबूर करती है<br />
इधर-उधर जाने के लिए<br />
बाजार में कई बुत खडे  है<br />
पैसा लेकर दिल  बहलाने के लिए</p>
<p>भटकते मन को चैन और खुशी<br />
चंद सिक्के दिला देते हैं<br />
जब ऊब जाये हंसने से<br />
मनोरंजन के लिए दहला भी  देते हैं<br />
बिकता है मनोरंजन भी<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए </p>
<p>पर कोई ऐसी चीज नहीं मिलती जो<br />
हर पल मन बहला सके<br />
रोज पनपते दर्द को सहला सके<br />
हालत यह होती की<br />
जितने  दर्द हल्का कर पाते<br />
वह नये दर्द में जुड़कर चले आते<br />
फिर चले जाते उन ठिकानों पर<br />
जहाँ सजे हैं बाजार<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए</p>
<p>क्यों नहीं तलाशते<br />
अपने मन में ही मनोरंजन<br />
क्यों जाते उन लोगों  के पास<br />
जो बेचते नकली दवा दिल की<br />
फिक्र उनको आदमी की नहीं<br />
होती केवल अपने बिल की<br />
कभी गानों की सजाते झूठी महफ़िल<br />
कभी डर की रचना से बहलाते दिल<br />
पूरी जिन्दगी गुजारते  हैं<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए </p>
<p>छूकर देखो अपना मन<br />
तन्हाई में देखो<br />
अपने अन्दर लहलहाता चमन<br />
वहीं राज छिपे हैं उसे बहलाने के लिए<br />
फिर कभी न वहाँ जाओगे<br />
जहाँ सजता है नकली रोशनी में बाजार<br />
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए<br />
-----------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:परिश्रम कर भोजन ग्रहण करें ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=302</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 04:10:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/?p=302</guid>
<description><![CDATA[चाह गयी  चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह
जिनक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चाह गयी  चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह<br />
जिनको कछु न चाहिए। वे साहन के साह </strong><br />
कविवर रहीम का कहना है कि इस संसार में जिसकी चिंताएं और आकांक्षाएं ख़त्म हो गयीं है। वह निश्चित और बेफिक्र है वह तो मालिकों का भी मालिक  है।<br />
<strong>चारा चारा जगत में, छाला हित कर लेय<br />
ज्यों रहीम आता  लगे, त्यों मृदंग स्वर देय</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि भोजन ही इस विश्व में सबको प्यारा है, अत: दूसरों की भूख के लिए कष्ट सहन करना चाहिए। जिस प्रकार मृदंग की थाप पर लगा आटा मधुर स्वर उत्पन्न करता है उसी प्रकार परिश्रम करें भले ही हाथों में छालें  हो जाएं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:घी दूध से सींच गया नीम का  वृक्ष मीठा नहीं होता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/04/chankya-nitineem-kaa-vruskh-meethaa-naheen-hotaa/</link>
<pubDate>Tue, 04 Dec 2007 04:07:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/04/chankya-nitineem-kaa-vruskh-meethaa-naheen-hotaa/</guid>
<description><![CDATA[१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.<br />
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती  है. </p>
<p>२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पाटा. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली  सिंह को कुएँ में गिराकर मार  डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.  </p>
<p>३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नेकी का रास्ता और भूलने का दरिया ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/02/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sun, 02 Dec 2007 10:39:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मौसम की तरह लोग भी
बदल जाते हैं
सर्दी म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मौसम की तरह लोग भी<br />
बदल जाते हैं<br />
सर्दी में गर्मी की यादें नहीं आती<br />
मुसीबत की घडी में जो साथ दें<br />
खुशियों के पल में<br />
उनकी  स्मृति दिमाग से परे हो जाती</p>
<p>तुमने अगर किसी को<br />
दिया हो उसके तकलीफों में तो भूल जाओ<br />
सदियों से कहते आ रहे हैं<br />
नेकी  कर दरिया में डाल<br />
तुम भले ही अपने  मन में रखो<br />
पर नेकी के रास्ते का<br />
भूलने के दरिया की तरफ ही है  ढाल<br />
वह खुद ही चलकर जायेगी<br />
इसलिए तू ही उसे खुद डाल<br />
तुम भी वैसी चलते जाओ<br />
जैसे घडी की सुई चलती जाती   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोगर नहीं लिख सका प्रेम गीत ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/01/blogar-nahin-likh-saka-geet/</link>
<pubDate>Sat, 01 Dec 2007 15:00:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/12/01/blogar-nahin-likh-saka-geet/</guid>
<description><![CDATA[ब्लोगर की प्रेमिका ने भेजा उसे ईमेल
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लोगर की प्रेमिका ने भेजा उसे ईमेल<br />
'मेरे मीत<br />
अगर चाहते हो तुम मुझे<br />
तो लिख कर भेजो फड़कता हुआ गीत<br />
मेरे सहेलियों ने दी है मुझे चुनौती<br />
नहीं लिख सकता तुम्हारा ब्लोगर<br />
कभी भी कोई प्रेम  गीत<br />
 इसलिए तुम अपने शब्दों को श्रृंगार रस में<br />
भिगोकर लिखो फड़कता हुआ गीत<br />
साबित करो सच्ची है हमारी प्रीत'</p>
<p>ब्लोगर हक्का-बक्का रह गया<br />
उसके शब्दों का महल रेत की तरह ढह गया<br />
समझ गया मुश्किल है अब प्रेम में जीत<br />
अब उसके लिए लिखना आसान नहीं है<br />
 कोई श्रृंगार रस से सराबोर  कोई  गीत<br />
फिर भी लिखने बैठा लेका शब्द  संग्रह<br />
नहीं चाहता था प्रेम में विग्रह<br />
बचाना  चाहता था अपनी प्रीत </p>
<p>प्रेमिका के विरह में वह क्या बनेगा<br />
इसके लिए ढूंढने लगा था<br />
लिखने के लिए तमाम संज्ञाएँ<br />
वह सोचते-सोचते हुआ परेशान<br />
सभी नाम कहीं न कहीं मौजूद थे<br />
उसको लगने लगा डर<br />
कहीं उस नाम के आदमी<br />
प्रेमिका के पास पहुचं न जाये<br />
समय निकलता गया<br />
वह वहीं ठहर गया<br />
उधर प्रेमिका की सहेलिया उसे शर्माएं<br />
गुजरते हुए समय के साथ<br />
प्रेमिका का मन भी बदलता गया<br />
उसने अपने प्रेमी के ब्लोग पर कमेन्ट<br />
लिखने वाले  को ईमेल किया<br />
उसने लिख कर भेजा एक गीत<br />
'अगर तुम नहीं मिली तो<br />
तुम्हारी याद में शेर, चीता या<br />
खरगोश बन जाऊंगा<br />
कर लो मुझसे प्रीत'<br />
प्रेमिका को मजा आ गया<br />
इस तरह पहले ब्लोगर का<br />
पता कट गया<br />
लिख नहीं पाया वह गीत<br />
अच्छी  संज्ञाओं की सोचते-सोचते ही<br />
निकल गयी उसके हाथ से प्रीत<br />
सोचने लगा<br />
'अच्छा होता पंचतंत्र से सीख लेता<br />
पशु-पक्षियों की ही  संज्ञा लेता<br />
कोई  भी रच लेता गीत<br />
हाथ में रहती मेरी प्रीत'<br />
------------------------------  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर (२)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 14:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[जब मैं अपने सभी ब्लोग पर पाठकों की संख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब मैं अपने सभी ब्लोग पर पाठकों की संख्या देखता हूँ तो चक्कर में पड़ जाता हूँ, क्योंकि  अधिकतर ब्लॉगों पर संख्या १०० से ऊपर निकल जाती है, चाहे मैं पोस्ट करूं या नहीं. पिछले कई दिनों से इस बढ़ती संख्या की वजह से  उन पर यह सोचकर लिखता हूँ कि नियमित से अगर वह पढ़ रहें है तो आखिर मुझे क्यों न लिखना चाहिए. स्वभाव से मैं जिज्ञासु और कुछ कर गुजरने की इच्छा वाला व्यक्ति हूँ. इसलिए यह देखता रहता हूँ कि किस किस्म की रचनाएं उनके द्वारा देखी जा रहीं है और वह  किस तरह मेरे ब्लोग पर आते हैं. मेरे ब्लोग कितनी वेब साइटों पर लिंकित हैं और कैसे पढे जा रहे हैं इसे मैं निरंतर देखता हूँ. खासतौर से वर्डप्रेस के ब्लोग इस मामले में मुझे बहुत सारी जानकारी देते हैं क्योंकि उसमें मैंने केटेगरी और टेग अधिक रखे हुए हैं. </p>
<p>मुझे यह पता नहीं कि ब्लाग पर लिखने वालों के क्या अनुभव हैं पर एक बात मेरी समझ में आ गयी है कि यह भी एक वेब साईट की तरह हैं. मैंने जो अंग्रेजी में इन पर केटेगरी या टेग अपनी पोस्ट  दिए हैं वह जब सर्च पा डालता हूँ तो  उस विषय बनी वेब साईट के बाद मेरे ब्लोग वहाँ दिखाई देते हैं,  और हिन्दी में देवनागरी में डालने पर तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. उदाहरण के लिए अगर मैं चाणक्य, कबीर या रहीम लिखता हूँ तो विकिपीडिया के बाद मेरे ब्लोग आ जाते हैं. वैसे यह हमें मालूम है कि यह वेब साईट नहीं है पर जो पढ़ने वाले हैं उनके लिए यह एक वेब साईट की तरह हैं. जब लोग हिन्दी टूल से अपने शब्द इन सर्च इंजिनों में डालेंगे तो जो हमने टेग या केटेगरी अपनी पोस्ट में लगाते हैं वह उनके सामने ब्लोग ला खडा कर देंगे. </p>
<p>इसलिए जो लेखक अपनी रचनाओं के लिए इन ब्लोग का इस्तेमाल करेंगे उनको आगे बहुत पढ़ने वाले मिलेंगे.<br />
जब मैं सर्च पर जाकर हिन्दी और अंग्रेजी में शब्द रखता हूँ और मेरे ब्लोग मेरे सामने आ जाते हैं तो मुझे खुद पर यकीन नहीं होता कि मेरा लिखा अंतर्जाल पर इस तरह फ़ैल चुका है. इसलिए लिखते समय मेरे दिमाग में यही विचार रहता है कि ऐसा लिखा जाये जो बहुत समय तक नवीनता का बोध लिए हो. बस बात वहीं आकर अटकती हैं कि लोगों को हिन्दी टूल के बारे में बताया जाये ताकि अपने सर्च में टूल से हिन्दी देवनागरी के शब्द पोस्ट करें.<br />
                                   ऐसा नहीं है कि लोग कर नहीं रहे पर उनकी संख्या कम है. मैंने अपने दो मित्रों को हिन्दी टूल बताया और जब इसका उपयोग किया तो उनका मत था कि अभी इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को इस बारे में अधिक पता नहीं है. उन्होने कुछ जगह अपने दिवाली की बधाई हिन्दी भाषा में भेजी तो उनसे पूछा गया कि आप ऐसे हिन्दी कैसे लिखते हैं जो हमारी पढ़ने में आती है.  इसलिए मेरा मानना है कि अंतरजाल पर जो हिन्दी लिख रहे हैं वह अपने लोगों को ब्लोग बनाने के साथ हिन्दी दूल के इस्तेमाल के लिए  प्रेरित करें.</p>
<p>                  इधर मैंने कुछ ब्लोग देखें हैं जिनमें कई युवा लेखक इसका उपयोग अपनी साहित्यक रचनाओं के लिए करना चाहते हैं और उनकी रचनाओं में जो पुट है उसको देखते हुए मुझे लगता है कि वह लोग इस विधा को बहुत आगे तक ले जाने वाले हैं. उससे भी अधिक जिसकी कल्पना इसके आविष्कार करने वालों ने भी नहीं की होगी.  वैसे भी मैं आशावादी हूँ और निराशावादिता का मेरा जीवन मैं कोई स्थान नहीं है.इसलिए जो इस पर लिख रहे हैं उन्हें निराश नहीं होना चाहिऐ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:विपरीत संस्कार वालों  का मेल नहीं हो सकता]]></title>
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<pubDate>Mon, 12 Nov 2007 04:13:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।</p>
<p>     2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।</p>
<p>     3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है। </p>
<p>     4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।</p>
<p>    5.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ।<br />
6.तेल में जल नहीं मिल सकता, घी में जल नहीं मिलता. पारा किसी से नहीं मिल सकता। इसी प्रकार विपरीत स्वभाव वाले एक दूसरे से नहीं मिल सकते।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:सिद्ध से साधू श्रेष्ठ ]]></title>
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<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 05:52:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय
ना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय<br />
नाता तोड़े गुरू भजै, भक्त कहावै सोय</strong></p>
<p>कविवर कबीर दास जी कहते हैं कि जाति-पांति का अभिमान है तब तक भक्ति नहीं हो सकती। अहंकार और मोह को त्यागा कर, सभी नाते-रिश्तों को तोड़कर भक्ति करो तभी भक्त कहला सकते हो।</p>
<p><strong>भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख कराइ जो कोय<br />
शबद हृँ सनेही रहै, घर को पहुंचे सोय</strong></p>
<p>भक्ति के बिना उद्धार नहीं हो सकता, चाहे लाख प्रयत्न करो, वे सब व्यर्थ ही सिद्ध होंगे, जो केवल सदगुरु के प्रेमी हृँ, उनके सत्य-ज्ञान का आचरण करने वाले हैं वही अपने उद्देश्य को पा सकते हैं, अन्य कोई नहीं। </p>
<p><strong>मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार<br />
हते पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार </strong></p>
<p>कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं, जो विचारकर नहीं बोलते। बस अपनी मनमर्जी से उलटा -सीधा जो भी मुहँ में आया बोलने लग जाते है। ऐसे लोग अपनी जीभ में कड़वे और कठोर वचन रूपी तलवार बांधकर दूसरों की आत्मा को कष्ट देते रहते हैं। ऐसे लोगों को अमानवीय प्रवृति का ही कहा जा सकता है। </p>
<p><strong>साधू सिद्ध बहु अंतरा, साधू मता प्रचंड<br />
सिद्ध जू बारे आपको, साधू तारे नौ खण्ड</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि साधू और सिद्ध में अन्तर है, दोनों में साधू ही श्रेष्ठ है। सिद्ध तो केवल अपना ही कल्याण करता है लेकिन साधू लोग पूरे विश्व का उद्धार करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[गुरु-चेला और क्रिकेट ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/05/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f/</link>
<pubDate>Mon, 05 Nov 2007 17:33:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य बाजार  में आये, तो देखा सब जगह लोग मूर्तियों की तरह खडे थे. बाजार में सब दुकानों   के बाहर लोग खडे थे और टीवी की तरफ घूर कर देख रहे  थे. </p>
<p>                गुरु ने चेले से पूछा-''यह क्या बात है लोग क्या कर रहे हैं.''<br />
               चेले ने कहा-''गुरु जी, सब क्रिकेट मैच देख रहे हैं.<br />
गुरु जी ने कहा-''पिछली बार आये तो यह बीमारी कम थी, क्या फिर यह वाइरस फ़ैल गया. जाओ पता करो. देखते हैं कि कुछ इसका इलाज हो सकता है. मैं तब तक  यहाँ पेड़ के नीचे बैठकर आराम करता हूँ.<br />
                              'कौनसा पेड़ गुरूजी-'चेले ने पूछा<br />
                 गुरूजी ने इधर-उधर देखा-'यहाँ एक पेड़ था न! मैं उसके नीचे आकर बैठता था. लगता  है  काट दिया. चलो वह दुकान बंद है वहीं बैठकर आराम करता हूँ तब तक तुम पीछे वाली लाइन से जल्दी चाय ले आओ.'</p>
<p>                                  चेला चला गया और गुरूजी वहीं  विराजमान हो गए. थोडी देर बार चेला लौट आया और बोला-''गुरूजी चाय वाला बोला इस समय मैच चल रहा है और अपने बल्लेबाज धुआंधार खेल रहे हैं, थोडी देर बाद आना.''</p>
<p>               गुरूजी-''पिछली बार तो कह रहा था की क्रिकेट मैच नहीं देखूंगा. फिर उसने  देखना शुरू कर दिया.''</p>
<p>                चेला-''गुरूजी!ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप में टीम जीतकर आ गयी है इसलिए उसने दोबारा देखना शुरू कर दिया है.''<br />
                   गुरूजी-''ठीक है! थोडी देर बाद चले जाना. वह चाय अच्छी बनता है इसलिए उसके नखरे झेल लेते हैं.<br />
                    थोडी देर बाद चेला लौट आया और बोला-''चाय वाले का मूड खराब हो गया. अपने खिलाडी की सेंचुरी नहीं हो पायी. कहा रहा है की मूड खराब हो गया घर जा रहा हूँ.''<br />
                  गुरूजी बोले-''ठीक है. अब फिर यह वाइरस फ़ैल गया और मुझे पहले ही लग रहा था कि यह बीमारी फिर फैलेगी. फिफ्टी-फिफ्टी गयी तो ट्वंटी-ट्वंटी फ़ैली और साथ में फिफ्टी-फिफ्टी भी लाई.  चलो कहीं और चलते हैं.''</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: दूसरे समुदाय  का आश्रय लेना कष्टकारी ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/31/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 14:03:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.सदैव गुणी व्यक्ति को ही दान के रूप मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.सदैव गुणी व्यक्ति को ही दान के रूप में धर या अन्य पदार्थ देना चाहिए , गुणहीन व्यक्ति को दिया गया दान व्यर्थ है. समुद्र अपने जल का डान मेघ को देता जो वर्षा कर मीठा जल बरसाते हैं जिससे भूमंडल के प्राणी जीवन पाते हैं. वर्षा के रूप में मेघ द्वारा बरसाया गया जल समुद्र द्वारा दिए गए जल से करोडों गुना बढ़कर फिर उसी समुन्दर में पहुंच जाता है. स्पष्ट है की समुद्र ने गुणवान मेघ को जल दान का उसे मीठा बना लिया. समुद्र ने मेघ को जल देकर  भूमंडल के जड़-चेतन को जीवन प्रदान करने का पुण्य अर्जित किया और अधिक मात्रा में जल भी प्राप्त किया.<br />
२.अपने निरंतर    अभ्यास  से मनुष्य  अनेक गुणों को प्राप्त कर लेता है लेकिन  अभ्यास से ही सब गुण प्राप्त नहीं होते. कुछ गुण ऐसे भी होते हैं, जो स्वाभाविक होते हैं, जैसे-दानशीलता, मधुर बोलना, शौर्यता तथा पांडित्य-यह गुण ऐसे होते  हैं जिन्हें अभ्यास से प्राप्त नहीं किया जा सकता.<br />
३.उनका जीवन व्यर्थ है जिन्होंने कभी अपने हाथों से दान नहीं किया, कभी अपने कानों से वेद नहीं सुना, अपनी आँखों संतों और महात्माओं के दर्शन नहीं किये, जिन्होंने कभी तीर्थ यात्री नहीं की, जो अन्याय से प्राप्त किये धन से अपना भरण-पोषण करते हैं, घमंड से जिनका सिर हमेशा ऊंचा रहता है.<br />
४.जिस प्रकार अपने समुदाय  को छोड़कर दूसरे  समुदाय  का सहारा लेने से राजा  का विनाश हो जाता है, उसी प्रकार जो मनुष्य अपने समुदाय   को छोड़कर दूसरे समुदाय  का  सहारा लेता है तो वह स्वयं भी राजा की तरह नष्ट होता है. दूसरे समुदाय के लोग अंतत: यही  सोचते हैं की जो अपनों का नहीं हुआ वह हमारा क्या होगा.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल और दोस्ती ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 14:47:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हमें पूछा था अपने दिल को<br />
बहलाने के लिए किसी  जगह का पता<br />
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया<br />
जहां बिकती है दिल की खुशी<br />
दौलत के सिक्कों से<br />
जहाँ पहुंचे तो सौदगरों ने<br />
मोलभाव में उलझा दिया<br />
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी<br />
और दिमाग का चैन<br />
तो इस दुनिया में रहता<br />
हर आदमी क्यों इतना बैचैन<br />
हम घर पहुंचे और सांस ली<br />
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा<br />
जिस चैन को ढूंढते थक गए थे<br />
आखिर उसने ही उसका पता दिया<br />
-------------------<br />
दोस्ती निभाने के वादे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैंदोस्ती निभाने के वा दे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैं<br />
------------------<br />
कोई भी जब मेरे पास<br />
वादों का पुलिंदा लेकर आता है<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज मी लुटने का दिन है<br />
पहले सलाम करते हैं<br />
फिर पूछते हैं हालचाल<br />
फिर याद दिलाते हैं<br />
पुरानी दोस्ती का इतिहास<br />
मैं इन्तजार करता हूँ<br />
उनकी फरमाइश सुनने का<br />
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर<br />
दावा यह कि केवल तुम अपने हो<br />
इसीलिये कह रहा हूँ<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज एक दोस्त अपने से<br />
सबंध ख़त्म होने का दिन है<br />
________________</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कार  और साईकिल की टक्कर ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/29/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Mon, 29 Oct 2007 15:01:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह साइकिल पर अपने एक तरफ गैस का छोटा  सि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह साइकिल पर अपने एक तरफ गैस का छोटा  सिलेंडर बाँध कर जा रहा था. उसके आगे भी हैंडल पर जो समान टंगा था उससे साफ लग रहा था की वह कोई गैस आदि को साफ  करने और उनकी मरम्मत करने का काम करता होगा. एक जगह ट्रैफिक जाम था और संभाल कर चलते रहने के बाद भी उसके सिलेंडर का हिस्सा जाम में फंसी कार से टकरा गया. उसे पछतावा हुआ पर यह उसके चेहरे पर आयी शिकन से लग रहा था.</p>
<p>                                              कार के अन्दर से चूड़ीदार पायजामा और सफ़ेद कुरता  पहने एक  आदमी निकला उसने अपनी कार देखी और उसपर लगे खरोंच के निशान दिखे तो उसे गुस्सा अग्या  और उसने  साइकिल वाले को पास बुलाया, उसके पास आते ही उसने उसकी गाल पर जोर  से थप्पड़ जड़ दिया. उस गरीब की आंखों में पानी भर आया, और अपने गाल पर हाथ रखता हुआ वहाँ से चला गया.</p>
<p>                                          एक सज्जन जो इस घटनाक्रम को देख रहे थे उस साइकिल वाले के पास गए और बोले-'चलो, पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ. उसको अदालत में घसीट कर दिखाएँगे कि  किस तरह थप्पड़ मारा जाता है.'</p>
<p>                                     उस साइकिल वाले ने लगभग रोते हुए कहा-.बाबूजी, जाने दीजिये. हम गरीबों की इज्जत क्या है? यह लोग तो ऐसे ही हैं. इन जैसे लोगों के बाप अंधे होकर अंधी कमाई  कर  रहे हैं और इनसे में गरीब कहाँ तक मुकाबला करूंगा?"</p>
<p>                             वह चला गया और वह सज्जन उसे जाते देखते रहे . एक दूसरा साइकिल वाला सज्जन भी उनके पास आया और बोला-'वह  सही कह रहा था. इनका कोई क्या कर सकता है. </p>
<p>                          उन सज्जन ने कहा-'भाई, हकीकत तो यह है कि इस तरह तो गरीब का सड़क पर चलना  मुशिकल हो जायेगा. अगर यह कार वाला मारकर उसे उडा जाता तो कुछ नहीं और उसकी साइकिल से थोडी खरोंच लग गई तो उसने उसे थप्पड़ मारा. इस तरह तो गरीब जब तक लड़ेगा नहीं तो जिंदा नही रह पाएगा.'</p>
<p>                             वह कार दूर खडा था. दूसरा साइकिल वाला बोला-'साहब वह गरीब आदमी कहाँ भटकता? आप मदद करते तो आपको भी परेशानी होती. हम तो गरीब  लोग हैं, मैं साइकिल पर फल बेचता हूँ पर दिन भर अपमान को झेलता रहता हूँ. हम लोगों को आदत है, यह सब देखने की.'</p>
<p>                    उन सज्जन ने आसमान की  तरफ देखा और गर्दन हिलाते हुए लंबी साँसे लेते हुए कहा -'लोग समझते नहीं है को जो गरीब काम कर रहे हैं, वह अमीरों पर अहसान करते हैं क्योंकि वह कोई अपराध नहीं करते. शायद यही कारण  है कि आजकल कोई छोटा काम करने की बजाय अपराध करना पसंद करते हैं. जो इस हालत में भी छोटा काम कर रहे हैं उन्हें तो सलाम करना चाहिऐ न कि इस तरह अपमानित करना चाहिए. जब तक अमीर लोग गरीब का सम्मान नहीं करेंगे तब तक इस देश में अपराध कम नहीं हो सकता. </p>
<p>                                   वह सज्जन वहाँ से निराशा और हताशा में अपनी गर्दन हिलाते हुए चले गए, पीछे से दूसरा साइकिल वाला उनको जाते हुए पीछे से खडे होकर देखता रहा.  </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परोपकार मधुमक्खी से सीखें ]]></title>
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<pubDate>Thu, 04 Oct 2007 02:04:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[        1.सुकर्म करने वाले कभी भी लोग,भोग, यो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        1.सुकर्म करने वाले कभी भी लोग,भोग, योग और पत्र(रुपया-पैसा) का संचय नहीं करते। इसी कारण उनका सुयश सर्वत्र फैलता है और विक्रमादित्य हौं या भगवान श्री कृष्ण सब अपने अपने सकर्मों के लिए प्रसिद्ध हैं पर इनमें से किसी ने भी भोग, योग और धन को केवल अपने पास ही तक सीमित नहीं रखा। अपने सत्कर्मों से अर्जित फल को पूरे समाज में बाँटा। मधु मक्खियों को देखो कितने परिश्रम से वह मधु को एकत्रित करती हैं यह जानते हुए भी कि इसे कोई तोड़ कर ले जायेगा। इस प्रकार से परोपकार के कारण ही लोगों का सुयश बना रहता है।<br />
     2.सुयश के लिए सुकर्म आवश्यक है। बिना सुकर्म के सुयश नहीं मिलता। सुकर्म रूपी दुग्ध से ही सुयश रूपी नवनीत निकलती है। सुकर्म ही सुकर्म का जन्मदाता है।<br />
     3.जो पाखंडी होता है वह दूसरों के काम बिगाड़ता है, धनी द्वेष करने वाला ऊपर से मणि पर भीतर से क्रूर होती है वह मार्जर कहलाता है। बिल्ली में भी लगभग इसी प्रकार के स्वभाव होते हैं। </p>
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