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	<title>feature-blog &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "feature-blog"</description>
	<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 00:40:57 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[अभिनव बिंद्रा ही है असली इंडियन आइडियल-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=592</link>
<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 15:42:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ओलंपिक मेंं अभिनव बिंद्रा का स्वर्ण प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ओलंपिक मेंं अभिनव बिंद्रा का स्वर्ण पदक जीतना बहुत खुशी की बात है इसका कारण यह है कि भारत में खेल जीवन का एक अभिन्न अंग माना जाता है और हर वर्ग का व्यक्ति इसमें रुचि लेता है पर कई कारणों वश भारत का नाम विश्व में चमक नहीं पाया। </p>
<p>पिछले कई वर्षों से क्रिकेट का आकर्षण लोगों पर ऐसा रहा है कि हर आयु वर्ग के लोग इसे खेलते और देखते रहे। अनेक जगह ऐसे प्रदर्शन मैच भी होते हैं जहां बड़ी आयु के लोग अपना खेल दिखाते हैं क्योंकि इसमें कम ऊर्जा से भी  काम चल सकता है। कई जगह महिलाएं भी प्रदर्शन मैच खेलती रही हैं। मतलब इसका फिटनेस से अधिक संबंध नहीं माना जाता। वेसे भी अंग्रेज स्वयं ही इसे बहुत समय तक साहब लोगों का खेल मानते हैं और जहां उनका राज्य रहा है वहीं वह लोकप्रिय रहा है। यह अलग बात है कि प्रतियोगिता स्तर पर एकदम फिट होना जरूरी है पर भारतीय क्रिकेट टीम को देखें तो ऐसा लगता है कि सात खिलाड़ी चार बरस तक अनफिट हों तब भी टीम चल जाती है। भारत में शायद हाकी की जगह क्रिकेट को इसलिये ही बाजार में महत्व दिया गया कि कंपनियों के लिये माडलिंग करने वाले कुछ अनफिट खिलाड़ी भी अन्य खिलाडि़यों के सहारे अपना काम चला सकते हैं। हाकी,फुटबाल,व्हालीबाल,और बास्केटबाल भी टीम के खेल हैं पर उनमें दमखम लगता है। अधिक दमखम से खिलाड़ी अधिक से अधिक पांच बरस तक ही खेल सकता है, पर क्रिकेट में एसा कोई बंधन नहीं है। अब भारतीय क्रिकेट टीम की जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद प्रचार माध्यम जबरन उसे खींचे जा रहे हैं। </p>
<p>अभिनव बिंद्रा ने व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता है। अपने आप में यह उनकी एतिहासिक जीत है। वह संभवत इस ओलंपिक के ऐसे स्वर्ण पदक विजेता होंगे जो लंबे समय तक अपने देश में सम्मान प्राप्त करेंगे।  अन्य देशों के अनेक खिलाड़ी स्वर्ण पदक प्राप्त करेंगे तो उस देश के लोग किस किसका नाम याद रख पायेंगे आखिर सामान्य आदमी की स्मरण शक्ति की भी कोई सीमा होती है। सर्वाधिक बधाई प्राप्त करने वालों में भी उनका नाम शिखर पर होगा। उनकी इस उपलब्धि को व्यक्तिगत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।  देश के अधिकतर खेलप्रेमी लोग केवल टीम वाले खेलों पर ही अधिक ध्यान देते हैं जबकि विश्व में तमाम तरह के खेल होते हैं जिनमें व्यक्तिगत कौशल ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है।<br />
 अभिनव बिंद्रा की इस उपलब्धि से देश में यह संदेश भी जायेगा कि व्यक्तिगत खेलों में भी आकर्षण है। अभी साइना बैटमिंटन में संघर्ष कर रही है। मुक्केबाज भी अभी मैदान संभाले हुए हैं। सभी चाहते हैं कि यह सभी जीत जायंे। ओलंपिक में जीत का मतलब केवल स्वर्ण पदक ही होता है। ओलंपिक ही क्या किसी भी विश्व स्तरीय मुकाबले में जीत का मतलब कप या स्वर्णपदक होता है। यह अलग बात है कि हमारे देश मेंे जिम्मेदारी लोग और प्रचार माध्यम  देश  को भरमाने के लिये दूसरे नंबर पर आयी टीम को भी सराहते हैंं। इसका कारण केवल उनकी व्यवसायिक मजबूरियां होती हैं।  सानिया मिर्जा विश्व में महिला टेनिस की वरीयता सूची  में प्रथम दस क्या पच्चीस में ं भी कभी शामिल नहीं हो पायी पर यहां के प्रचार माध्यम उसकी प्रशंसा करते हुए नहीं थकते।  कम से कम अभिनव बिंद्रा ने सबकी आंखें खोली दी हैं।  लोगों को यह समझ मेंं आ गया है कि किसी भी खेल में उसका सर्वोच्च शिखर ही छूना किसी खिलाड़ी की श्रेष्ठता का प्रमाण है। </p>
<p>भारतीय दल एशियाड,राष्ट्रमंडल या ओलंपिक मेें जाता है तो यहां के कुछ लोग कहते हैं कि ‘हमारा देश खेलने में विश्वास रखता है जीतने में नहीं। खेलना चाहिए हारे या जीतें।’<br />
यह हास्यास्पद तक  है।  कुछ सामाजिक तथा आर्थिक विश्ेाषज्ञ किसी भी देश की प्रगति को उसकी खेल की उपलब्धियों के आधार पर ही आंकते हैं। जब तक भारत खेलों में नंबर एक पर नहीं आयेगा तब तक उसे कभी भी विश्व में आर्थिक या सामरिक रूप से नंबर एक का दर्जा नहीं मिल सकता।  भारत में क्रिकेट लोकप्रिय है देश के अनेक लोग इसे गुलामी का प्रतीक मानते हैं। उनकी बात से पूरी तरह सहमत न भी हों पर इतना तय है कि अन्य खेलों में हमारे पास खिलाड़ी नहीं है और हैं तो उनको सुविधायें और प्रोत्साहन नहीं है। अभिनव  बिंद्रा सच में असली इंडियन आइडियल है। अभी तक लोगों ने टीवी पर फिल्मी संगीत पर नाचते और गाते इंडियन आइडियल देखे थे उनको अभिनव की तरफ देख कर यह विचार करना चाहिए कि वह कोई नकली नहीं है। उन्होंने कोई कूल्हे मटकाते हुए कप नहीं जीता। ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करना कोई कम उपलब्धि नहीं होती।  अपना अनुभव  धीरज के साथ उपयोग करते हुए पूरे दमखम के साथ उन्होंने यह स्वर्ण पदक  जीता है। वह भारत के अब तक के सबसे एतिहासिक खिलाड़ी हैं। अभी तक किसी भी भारतीय ने भी ऐसी व्यक्तिगत उपलब्धि प्राप्त नहीं की है। ध्यानचंद के नेतृत्व वाली हाकी टीम के बाद अब उनकी उपलब्धि ही एतिहासिक महत्व की है। जिस खेल में उन्होंने भाग लिया उसमें पूरे विश्व के खिलाड़ी खेलते हैं और वह क्रिकेट की तरह आठ देशों में नहीं खेला जाता। ऐसे अवसर पर अभिनव बिंद्रा को बधाई। वैसे उनका खेल निरंतर चर्चा में नही आता पर उनकी उपलब्धि हमेशा चर्चा में रहेगी।<br />
...............................................</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लाग यानि अखबार और किताब-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=583</link>
<pubDate>Tue, 05 Aug 2008 15:17:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=583</guid>
<description><![CDATA[अगर मुझसे कोई सवाल करता है कि अंतर्जाल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अगर मुझसे कोई सवाल करता है कि अंतर्जाल पर क्या लिख रहे हो तो मेरा एक ही जवाब होता है कि‘ब्लाग पर लिखता हूं।’<br />
फिर सवाल पूछा जाता है-‘ब्लाग यानि क्या?’<br />
अब मेरे लिये बहुत मुश्किल होता है यह जवाब देना क्योंकि इसका कोई आधिकारिक हिंदी अनुवाद मेरे पास उपलब्ध नहीं है। तब मैं कहता हूं कि यह समझो कि‘जैसे अपनी समाचार पत्र या पत्रिका की तरह ही समझो।’<br />
लोग आराम से मेरी बात समझ जाते हैं। हालांकि उनका अगला प्रश्न होता है कि-‘इसमें तुम्हें मिलता क्या है?’<br />
तब मुझे बताना पड़ता है कि अभी ऐसी संभावना नहीं बनी है।’<br />
उस दिन एक मित्र ने मुझसे कहा-‘यार, मेरी पत्नी एक स्कूल में टीचर है वहां निकलने वाली एक पत्रिका के लिये उसे एक निबंध चाहिये । कोई पुराना लिखा हो तो बता दो या फिर नया लिख दो।’<br />
मैने उससे कहा-‘अलग से तो मैं कुछ लिखने से रहा पर अगर तुम मेरे घर आकर सभी ब्लाग देख लो और जो पसंद आ जाये तो उसे फ्लापी,सीडी, या पेन ड्राइव में ले  जाओ।’<br />
उसने कहा-‘ इंटरनेट तो उसी स्कूल में है तुम तो ब्लाग का पता दे दो।’</p>
<p>दो दिन बाद वह प्रिंट कर ले आया और बोला-‘यार, यह लेख मेरी पत्नी को पसंद आया पर इस पर थोड़ा कुछ और लिख दो मजा आ जाये। यह कुछ छोटा है।’</p>
<p>मैंने उस लेख को देखा और उस ब्लाग पर जाकर वहां से वह लेख ले आया और यूनिकोड से कृतिदेव में परिवर्तित कर विंडो में लाया और फिर उसमें जोड़कर उसे सीडी में दे दिया ताकि वह प्रिंट करा सके। चलते समय उसने कहा-‘यह ब्लाग तो वाकई काम की चीज है। यह एक अखबार की तरह भी है और किताब की तरह भी।<br />
मैंने तुम्हारी कम से कम पांच लेखों की कापी निकलवाई थी और यह इसलिये ले आया कि इसमें संशोधन करा सकूं।’</p>
<p>यह बात आज से चार माह पुरानी है और मेरे से कई लोग कहते हैं कि अपनी रचनायें दो तो मैं उनसे कहता हूं कि तुम मेरे ब्लाग से उठा लो, पर कई लोग सुविधा होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा सकते। कारण यह है कि लोग यहां परंपरावादी हैंं। अभी भी लेखक को एक फालतू का आदमी समझा जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर वह मशहूर नहीं है तो किसी काम का नहीं है। अक्सर मैं सोचता था कि कोई प्रकाशक मिल जाये तो अपनी किताब छपवा लूं। मरे एक मित्र ने अपनी क्षणिकाओं की किताब छपवाई थी और वह चाहता था कि इस संबंध में वह किसी ई-पत्रिका से  संपर्क कर इसे अंतर्जाल पर प्रचारित करे। उस समय मैंने नया कंप्यूटर केवल इस इरादे से लिया था कि उस पर आपन लेख टाईप करूंगा और बाहर का कोई काम आया तो उसे भी कर दूंगा। कंप्यूटर में सौ घंटे का इंटरनेट टाईम फ्री मिला। उससे पांच दस घंटे काम किया और वह फिर बंद हो गया। मेरे मित्र ने एक ई-पत्रिका का पता दिया और मैं उसे ढूंढने में लग गया पर वह नहीं मिली तो दूसरी हाथ लग गयी। उस पर लेख लिखा। उस समय सद्दाम को फांसी दी गयी थी और अंतर्जाल पर इस संबंध में मेरा आलेख वहां छपा। इधर यह विचार बना कि चलो अपना कनेक्शन लगा लेते हैंं। </p>
<p>ब्लाग पर काम करना शुरू किया तब पता लगी इसकी ताकत क्या है? आज एक जगह पढ़ा कि आस्+ट्रेलिया में टीवी चैनलों और अखबारों को इंटरनेट ने पीछे छोड़ दिया है। एक दिन यह यहां भी होना है। जैसे अंतर्जाल पर ब्लाग लेखन बढ़ता जायेगा वैसे पाठक भी इधर आयेगा। जैसे प्रिंटर मेरे पास है अगर उसकी स्याही सस्ती होती तो शायद मैं बहुत सारे प्रिंट निकालकर किताबें बांट चुका होता। यह प्रिंटर जितने का है उतने की तो स्याही है। एक तरह से मेरा प्रिंटर कबाड़ हो गया है। </p>
<p>समय बहुत बलवान है। जिस गति से पिछले दो सालों में जो बदलाव यहां मैने देखे हैं उससे लगता है कि वह समय भी आयेगा जब लोग ब्लाग को किताबों की तरह पढ़ेंगे। मुख्य समस्या यह है कि लेखक को क्या मिलेगा? हिंदी में मौलिक लेखकों के पाठों पर नजर सबकी है पर उनको कुछ मिले इसके लिये कोई प्रयासरत नहीं है। वैसे ही हिंदी लेखकों के साथ बहुत चालाकियां की जाती रहीं है और अंतर्जाल पर तो वह और भी अधिक होंगी इसमें संदेह नहीं है, पर यहां किसी से मनमानी से बचने का एक ही उपाय है कि अपने ब्लाग पर ही लिखते जायें। यहां किसी को आका बनाने की जरूरत नहीं है।  जो मजा लेते हुए लिखेंगे वह कालांतर में बहुत नाम करेंगे। यह ब्लाग किताबों की तरह अंतर्जाल की लाइब्रेरी में बने रहेंगे।  जब तक लिख रहे हैं तब तक अखबार की तरह लिखो। </p>
<p>लिखने के बारे में त्वरित टिप्पणियां का मोह त्यागे बिना अंतर्जाल पर बेहतर लिखना कठिन है।  त्वरित टिप्पणियों से प्रेरणा मिलती है यह ठीक है पर उसमें मोह पालना अपने लेखन के लिए विष है तब केवल ब्लाग लेखकों को प्रसन्न करने के लिये ही लिखने का मन करता है और वह आम पाठकों के लिये किसी मतलब का नहीं रह जाता। कुल मिलाकर हिंदी ब्लाग जगत में अभी आम ब्लाग लेखक को आय अर्जित करने में समय लगेगा क्योंकि अभी किसी ने इतनी ख्याति अर्जित नहीं की है जिसे विज्ञापनदाता विज्ञापन दें। अभी तो जो लोग कमा रहे हैं उनके बारे में क्या लिखना?<br />
वह सभी तो डोमेन लिये बैठे हैं ओर उनके लिये ब्लाग लेखक एक सहायक से अधिक नहीं है पर वह समय आयेगा जब ब्लाग लेखक कहीं लिंक करने के लिये भी पैसे मांगेंगे। शायद यही कारण है कि आम ब्लाग लेखकों को भटकाने की भी कोशिशें हो रहीं हैं। हमारे यहां लिख और दिख। कुछ लोगों को सम्मान आदि भी मिलेंगे पर जिनको अंतर्जाल पर प्रसिद्ध प्राप्त करना है उन्हें केवल अपने ब्लाग पर ही बने रहना बेहतर होगा क्योंकि यह अखबार भी है और किताब भी। उन्हें बेगारी से भी बचना होगा। यहां की चालाकियों पर शेष फिर कभी!</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">‘दीपक बापू कहिन’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[आलोचना किसी की, बिफरता कोई और है-आलेख]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=529</link>
<pubDate>Sun, 25 May 2008 14:24:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/?p=529</guid>
<description><![CDATA[हिंदी ब्लाग जगत में नित नये अनुभव होते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी ब्लाग जगत में नित नये अनुभव होते हैं। यह पता ही नहीं लगता कि कोई उसी बात पर नाराज हो रहा है जिस पर बता रहा है या कोई अन्य कारण है। कभी कभी तो लगता है कि कोई पुरानी बातों से त्रस्त होकर ऐसे विषय पर आलोचना ऐसे विषय पर तो नहीं कर रहा है जिससे उसका संबंध नहीं है। फिर अनाम या छद्म नाम हो तो संदेह और बढ़ जाता है कि कहीं वह ऐसे ही विषयों पर नजर रखने के लिए तो नहीं है।<br />
सुरेश चिपलूनकर जी ने एक लेख लिखा जिसमें कुछ फिल्मी हीरो द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे कार्यक्रमों की आलोचना थी। वह अपने तीखे शब्दों से अपनी आलोचना करने के लिए जाने जाते है और शायद अपने ब्लाग मित्रों में इसी कारण लोकप्रिय भी हैं। मैं समझता हूं कि वह हर विषय की निष्पक्ष विवेचना करते हैं। यह अलग बात है कि कुछ लोग जिन्हें केवल अपनी पंसद का ही सुहाता है वह उनसे चिढ़ जाते हैं। मुझे एक बार तो उनके आलोचकों पर हंसी आ गयी थी। उन्होंने क्षेत्रीय विवाद में बिल्कुल किसी का पक्ष न लेते हुए लिखा था पर उसमें दोनों पक्ष उन पर प्रहार कर रहे थे और मुझे नहीं लगता था कि वह लोग उसे समझ पाये। </p>
<p>आज भी कुछ ऐसा ही लगा उनके ब्लाग पर किसी ऐसे टिप्पणीकर्ता की टिप्पणी थी जो उनके आलेख को समझा ही नहीं और चिपलूनकर जी ने उसका जवाब अपने ब्लाग पर  दिया जिसमें उस टिप्पणीकर्ता का ईमेल या ब्लाग का पता न होने पर गुस्सा भी जाहिर किया गया था। असहमत लोग जब अनाम या छद्म नाम से टिप्पणी लिखते हैं तो कई सवाल मेरे मस्तिष्क में आते हैं। कुछ मीडिया से जुड़े लोग हमारे ब्लाग पर निगाह रख रहे है। जिस तरह क्रिकेट और फिल्म मिल रहे हैं वैसे ही ब्लाग और फिल्म भी मिल रहे हैं-इसमें भी मेरे कुछ दार्शनिक ढंग के विचार हैं पर वह यहां नहीं रख सकता। </p>
<p>मैंने आज ही एक लेख में यह विषय  उठाया था कि ब्लाग लिखवाने के पीछे कोई हिंदी के प्रति किसी का सौहार्द नहीं बल्कि उसके लिखे जाने के प्रचार का किसी को लाभ है वही उसके लिये प्रयास कर रहा है। ऐसे लोग यहां सक्रिय हैं। फिल्मी हीरो का ब्लाग बन गया उसकी खबर आखिर यहंा ब्लाग पर देने की क्या जरूरत हैं? फिर चाहते हैं कि अन्य लोग भी इस पर लिखें। यह जो फिल्म हीरो हैं इनमें एक के पास भी समय नहीं है कि वह अपना ब्लाग स्वयं लिखें-इसके लिए उनके सहायक ही बहुत हैं। उनको प्रचार की आवश्यकता नहीं पर वह उन कंपनियों से जुड़े हैं जो संचार माध्यमों की रीढ़ बनती जा रहीं है। उनको हिंदी मे ब्लाग नहीं बल्कि उनके लिखते रहने का प्रचार चाहिए ताकि अन्य लोग भी प्रेरित होकर इंटरनेट कनेक्शन ले। उनके लोग यहां सक्रिय हैं। अगर नहीं तो जरा आज सुरेश चिपलूनकर का आलेख देखें और एक ब्लाग पर उसमें उल्लेखित  हीरो के ब्लाग बनने का समाचार दूसरे ब्लाग पर है। इसलिये अब यहां किसी हीरो की आलोचना सहन नहीं की जा रही है। </p>
<p>क्रिकेट में खेल रहे अनेक खिलाड़ी और फिल्मों में काम कर रहे अभिनेता ब्लाग बनाते जायेंगे और उसका प्रचार होगा। इनमें से किसी का ब्लाग हिंदी में नहीं होगा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब मैंने वह कमेंट देखी। कितनी बदतमीजी से लिखी गयी थी। मुझे लगता है कि हिंदी ब्लाग जगत अब नये रूप में आ रहा है जहां यह पता ही नहीं लग रहा है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है? एक अभिनेता की आलोचना पर ऐसी टिप्पणी! मैं ऐसे लोगों को बता दूं कि भई, हम किसी के बंधुआ नहीं हैं। हर महीने छह सौ से साढ़े छह सौ रुपये भुगतान करते है। स्वतंत्र अभियक्ति का साधन है इसलिये हाथ घिसते हुए लिख रहे हैं। अगर तुम असहमत हो तो अपने ब्लाग पर लिखो। एसी वाहियात टिप्पणी वह भी अनाम और छद्म नाम से करते हो। अपने ईमेल का पता नहीं देते। </p>
<p>मैंने कहा था कि कुछ लोग हैं जो लिखने और पढ़ने के साथ टिप्पणियों के लिये कोई अन्य फायदे ले रहे हैं। हमारे ब्लोग लेखक मित्र पूरे पते के साथ बड़े प्रेम से टिप्पणी लिखते हैं तो प्रसन्नता होती है पर अगर कोई अनाम या छद्म नाम रखता है तो हम मान लेते हैं कि उसे कोई फायदा है। मेरा अनुमान सही था इस ब्लाग जगत पर नजर रखी जा रही है और बढ़ती पाठक संख्या केवल उसी का ही परिणाम है कि कुछ लोगों को ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित करने के साथ उन पर नजर रखने के लिऐ नियुक्त किया गया है। ऐसा नहीं है कि आम पाठक यहां नहीं है पर उसकी संख्या कम हैं। मेरे एक आलेख में कुछ फिल्मी हीरो के नाम थे और सभी का नाम डालकर उसे पढ़ा गया। इसी आधार पर मैंने अपना आज का लेख लिखा था और लगता है कि वाकई यही बात है। कंपनियों के लिए माडलिंग करने वाले फिल्मी अभिनेताओं  की यहां आलोचना इसलिये सहन नहीं की जा रहीं-यह आलोचना भी कोई ऐसी नहीं है बल्कि इस तरह की समाचार पत्रों में आये दिन होती रहती है। आखिर कुछ ऐसा है जो हम ब्लाग लेखक समझ नहीं पा रहे पर धीरे-धीरे सब स्पष्ट होता जायेगा। जहां तक मेरा विचार है जो हिंदी भाषा के ब्लाग लेखक हैं उनमें एक भी मुझे इस प्रवृत्ति का नहीं है और अब यहां बाहर से ऐसे लोग सक्रिय हो रहे हैं जो यहां अपना नियंत्रण बनाना चाहते है। आखिर सवाल यह है कि आलोचना किसी की हो रही है और बिफरता कोई अन्य है तब यह सवाल तो उठेगा ही । </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[नए समाज के निर्माण की पहल करें ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/17/%e0%a4%a8%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Tue, 16 Oct 2007 15:37:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत एक बृहद  देश है और इसमें  तमाम प्रक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत एक बृहद  देश है और इसमें  तमाम प्रकार के समुदाय और समाज के लोग रह्ते है और यह कोई नयी बात नही है। अगर कोई नयी बात है तो वह  यह कि हम आधुनिक समय में एकता की बात अधिक करनें लगें है और यह इस बात का द्योतक है कि भारतीय समाज में अब धर्म, विचार और वैयक्तिक विषयों पर झगड़े पहले की बनस्बित बहुत बढ़ गये हैं. शायद यही वजह है कि हम सब जगह शांति और एकता के नारे लगा रहे हैं.</p>
<p>           देश के हालत कैसे हैं यह सब जानते हैं और किस तरह समाज में वैमनस्य के बीज बोए जा रहे हैं यह हम सभी देखते आ रहे  हैं. फिर जब सब लोग शांति और एकता की बात करते हैं फिर भी हो क्यों नहीं पा रही है यह सोचने का विषय है. आखिर समाज में हम अपनी भूमिका किस रूप में निभा रहे हैं इस पर भी हमें आत्मंथन  तो करना चाहिए. देश के सारे बुद्धिमान लोग एक भारतीय समाज बनाने की बात तो करते है पर उसकी कोई कल्पना उनके दिमाग में नहीं है और शांति और एकता केवल एक नारा बनकर रह गये हैं. फिर हम आ जाते हैं इस बात पर कि सब समाजों को एक होना चाहिए. सवाल यह है के समाज का कोई अपने आप में कोई भौतिक रूप नहीं होता और व्यक्ति की इकाई उसे यह  संज्ञा प्रदान करती है तो क्यों न हमें व्यक्ति तक जाकर अपनी बात कहना चाहिए. </p>
<p>        अगर हम एक भारतीय समाज की बात कर रहे हैं जिसमें सब समाज उसकी इकाई है तो हमें उनके वर्त्तमान  स्वरूप को भी समझना होगा. समय ने इन हमारे सभी समाजों को कितना खोखला कर दिया है इस पर  दृष्टिपात किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते. पहले  समाज के संगठन बहुत मजबूत होते थे और लोग अपने से बडे, प्रतिष्ठित था विद्वान लोगों की बात मानते थे तब आर्थिक स्वरूप भी एसा नहीं था और मध्यम वर्ग अपनी बौद्धिक प्रभाव से दोनों वर्ग पर अपना नियन्त्रण रखता चलता था. लोग अपने समाज के दबंग लोगों से हमेशा तकलीफ में राहत मिलने की उम्मीद होती थी. अगर देखा जाये तो समाज के सबसे अधिक आवश्यकता आदमी को बच्चों के विवाह के समय होती है और इसमें भी कोई अधिक पहले  परेशानी नहीं  होती थी. अब  बढते भौतिकतावाद ने रिश्तों को लोहे-लंगर के सामान से बाँध दिया है-और आजकल तो हालात यह है कि लड़के को कार मिलनी है लडकी वाले को देनी है. रिश्तों की औकात अब आर्थिक आधार पर तय होने लगी है. पहले भी रिश्तेदारों में अमीर गरीब होते थे  पर आज अन्तर पहले से बहुत ज्यादा हो गया है. समाज  के शक्तिशाली लोगों से गरीब और कमजोर तबका अब कोई आशा नहीं कर सकता. अत उनकी पकड़ समाजों पर वैसी नहीं है जैसे पहले थी</p>
<p>          कहने का तात्पर्य यह है कि समाज टूटे पडे हैं और कोई नया समाज बन ही नहीं रहा और चूंकि हम लोगों को नाम के लिए ही सही उनकी छात्र छाया में रहें की आदत हो गयी है  इसलिये उनके  नाम पर उसके  भग्नावशेषों  में रह रहे हैं. जो लोग समाजों में एकता और शांति की बात करते हैं वह सभी समाजों के खोखलेपन को जानते हुए भी चर्चा नहीं करते. अपने समाज की आलोचना की तो वह नाराज होंगे और दूसरे की करने पर तो वैसे ही झगड़े का अंदेशा है ऐसे में नारा लगाकर रहना ही सबको श्रेयस्कर लगता है. मेरा आशय यह कि एकता व्यक्ति की व्यक्ति से हो सकती है पर समाज की एकता तो वैसे भी एक नारा ही लगती है  फिर खोखले और बिखर चुके समाज अपने अन्दर तो एकता कर लें फिर दूसरे समाज से करने की सोचें.</p>
<p>            मैं देख रहा हूँ लोग अब नए समाज की स्थापना करना चाहते हैं पर उनके मार्गदर्शक बुद्धिजीवी अभी भी उन्हें पुरानी  पहचान  पर एक होने का संदेश दे रहे हैं जो कि अब आम आदमी कि दृष्टि से अव्यवहारिक  हो चुके हैं. अब अगर इस देश के बुद्धिमान लोग चाहते हैं कि इस देश में एकता और शांति से लोग रहे तो उन्हें  नए समाज के निर्माण के लिए कार्य करना चाहिए. यह प्रक्रिया कोई एक दिन में पूरे नहीं होगी पर उसको शुरू तो किया जा सकता है, और इसके परिणाम भी अभी से दिखना शुरू होंगे. हमें केवल इस बात पर विचार करना चाहिए कि आम आदमी की सामाजिक परेशानी किस तरह  की है और वह क्या चाहता है? हमें कभी न कभी तो समाजों  में आये खोखलेपन पर दृष्टिपात करना ही होगा, जिनको हम देखते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं. इन सब पर विचार करके ही यह तय करना होगा कि हम समाज का कोई नया रूप देखना चाहिते हैं या इन्हीं भग्नावशेषों से ही एकता और शांति करना चाहते हैं  </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[शाश्वत प्रेम के कितने रुप ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/10/11/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Thu, 11 Oct 2007 03:25:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
&#8216;प्रेम&#8217; शब्द मूलरूप से संस्कृत के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="post-body entry-content">
<p align="justify">'प्रेम' शब्द मूलरूप से संस्कृत के 'प्रेमन' शब्द से उत्पन्न हुआ है। प्रेम का शाब्दिक अर्थ है-'प्रिय का भाव'। ऐक अन्य प्रकार की व्युत्पत्ति दिखाई देती है, जहाँ प्रेम को 'प्रीञ' धातु से मनिन' प्रत्यय करके सिद्ध किया गया है (प्रीञ+मनिन=प्रेमन)। इस द्वितीय व्युत्पत्ति के अनुसार प्रेम का अर्थ है-प्रेम होना, तृप्त होना, आनन्दित होना या प्रेम, तृप्त और आनंदित करना।</p>
<p align="justify">निर्गुण-निराकार ब्रह्म को अद्वैत मतावलंबियों 'सच्चिदानंद' कहा है। वह सत है क्योंकि उसका विनाश नही होता, वह चित है क्योंकि स्वयं प्रकाशमान और ज्ञानमय है तथा आनंद रुप है इसलिये कि वह प्रेममय है। यदि वह आनंदात्मक न हो तो उसके अस्तित्त्व और और चैतन्य की क्या सार्थकता रह जायेगी। सत-चित का भी प्रयोजन यह आनंद या प्रेम ही है। इसी प्रेम लक्षण के वशीभूत होकर वह परिपूर्ण, अखंड ब्रह्म सृष्टि के लिए विवश हो गया। वह न अकेले प्रेम कर सका , न तृप्त हो सका और न आनंद मना सका। तब उसके मन में एक से अनेक बन जाने की इच्छा हुई और वह सृष्टि कर्म में प्रवृत्त हुआ।</p>
<p align="justify">आनंद स्वरूप प्रेम से ही सभी भूतों की उत्पत्ति होती है, उसमें ही लोग जीते हैं और उसमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यही तथ्य तैत्तिरीयोपनिषद (३.६) की पंक्तियों में प्रतिपादित किया गया है।</p>
<p align="justify">प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड और उससे परे जो कुछ है- सब इसकी परिधि में आ जाते हैं। प्रेम संज्ञा भी है और क्रिया वाचक भी है। संज्ञा इसलिये कि सब में अंत:स्थ भाव रुप (मन का स्थायी भाव) है और यह भाव व्यक्त भी होता है अव्यक्त भी। क्रियात्मक इसलिये कि समस्त चराचर के व्यापारों का प्रेरक भी है व्यापारात्मक भी है। किन्तु मूल है अंत:स्थ का अव्यक्त भाव, जो अनादि और अनंत है, जो सर्वत्र और सब में व्याप्त है। यही अव्यक्त भाव रुप प्रेम सात्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के प्रभाव से विविध विकारों के रुप में बुद्धि में प्रतिबिंबित होता है और व्यवहार में व्यक्त होता है ।</p>
<p align="justify">यही प्रेम बडों के प्रति आदर, छोटों के लिए स्नेह, समान उम्र वालों के लिए प्यार, बच्चों के लिए वात्सल्य, भगवान् के प्रति भक्ति , आदरणीय लोगों के लिए श्रद्धा, जरूरतमंदों के प्रति दया एवं उदारता से युक्त होकर सेवा, विषय-सुखों के संबध में राग और उससे उदासीनता के कारण विराग, स्व से (अपने से) जुडे रहने से मोह और प्रदर्शन से युक्त होकर अहंकार, यथार्थ में आग्रह के कारण सत्य, जीव मात्र के अहित से विरत होने में अहिंसा, अप्रिय के प्रति अनुचित प्रतिक्रिया के कारण घृणा और न जाने किन-किन नामों से संबोधित होता है। प्रेम तो वह भाव है जो ईश्वर और सामान्य जीव के अंतर तक को मिटा देता है। जब अपने में और विश्व में ऐक-जैसा ही भाव आ जाय, और बना रहे तो वह तीनों गुणों से परे शुद्ध प्रेम है।</p>
<p align="justify">यह प्रेम साध्य भी है प्रेम पाने का साधन भी है। साधारण प्राणी सर्वत्र ऐक साथ प्रेम नहीं कर सकता-इस तथ्य को देखते हुए ही हमारे देश के पूज्य महर्षियों ने भक्ति का मार्ग दिखाया जिससे मनुष्य अदृश्य ईश्वर से प्रेम कर सके। इन्द्रियों के वशीभूत दुर्बल प्राणियों के लिए ईश्वर से प्रेम की साधना निरापद है जबकि लौकिक प्रेम में भटकाव का भय पग-पग पर बना रहता है। ईश्वरीय प्रेम को सर्वोच्च प्रतिपादित करने के पीछे यही रहस्य छिपा है और ईश्वरीय प्रेम का अभ्यास सिद्ध होने के पश्चात प्राणी 'तादात्म्य भाव' की स्थिति में आरूढ़ हो जाता है और तब शुद्ध प्रेम की स्थिति उसे स्वयंसिद्ध हो जाती है। प्रेम की इस दशा में पहुंचकर साधक को अपने ही अन्दर सारा विश्व दृष्टिगोचर होने लगता है और संपूर्ण विश्व में उसे अपने ही स्वरूप के दर्शन होने लगते है। समस्त चराचर जगत में जब अपने प्रियतम इष्ट के दर्शन होने लगें तो समझ लेना चाहिऐ कि हमें अनन्य और शाश्वत प्रेम की प्राप्ति हो गयी।</p>
<p align="justify">(<strong>कल्याण</strong> <strong>से साभार</strong>)</p>
<p align="justify">-----------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देवनागरी में लिखा और रोमन में पढा ]]></title>
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<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 16:16:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मुझे हिंदी ब्लोगों का रोमन में दिखने म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे हिंदी ब्लोगों का रोमन में दिखने में कोई आपति नहीं है, और न ही लोगों के रोमन लिखने पढने में कोई दिलचस्पी है. मेरी प्रतिबद्धता अपनी हिंदी भाषा और देवनागरी से है पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपनी मर्जी पर दूसरों को चलने के लिए कहूं. बहुत कडी लगने के बावजूद वह  यह कहने में मुझे कोई हर्ज नहीं है कि मैं रोमन लिपि में पढने वालों के लिए नहीं लिखता और अगर वह पढेंगे तो ठीक न ही पढ़ें तो ठीक है. </p>
<p>         पहले एक चुटकुला  लिखना सही लगता है. एक छोटा बच्चा बोलना नहीं सीख रहा था तो उसकी मां की सहेली ने उससे कहा'मैं तुम्हारे यहां अपना तोता छोड जाती हूँ वह तुम्हारे बच्चे को खेलते हुए बोलना सिखा देगा.'</p>
<p>                 वह अपना तोता वहीं छोड गयी. एक महीने बाद वह लौटी तो उसने देखा कि सहेली का बच्चा तो कुछ नहीं सीखा था बल्कि तोता ही राम-राम भूल गया और हुंगु....हुंगु बोल रहा था. </p>
<p>               इधर जिस तरह रोमन पर चिट्ठा दिखने का प्रचार हो रहा है उससे तो डर लगता है कि कहीं वाकई अंतर्जाल पर देवनागरी लिपि का प्रचार ही बंद न हो जाये. ऐसा लगता है कि देवनागरी लिपि में शायद पाठक न मिल पाने की वजह से धीरज खत्म हो रहा है और अब रोमन लिपि पर ज्यादा ही भरोसा होने लगा है. मुझे इसमें भी कोई आपति नहीं है पर पिछले कुछ माह से वर्ड प्रेस के पाठकों का अध्ययन का रहा हूँ उससे लगता है कि मैं उन्हें सजग करता चलूँ कि मेरा चिट्ठा भी रोमन लिपि में दिख रहा है पर मैने उसे देवनागरी में ही लिखा है. अगर आप इसे रोमन में पढ़ रहे है और उसे देवनागरी में भी पढ़ सकते हैं तो वैसे ही पढे, यह मेरे ऊपर मेहरबानी होगी. </p>
<p>             मुझे लगता है कि रोमन लिपि में इतने पाठक नहीं हो सकते जितने देवनागरी में मिलेंगे. मुझे तो लग रहा है कि कहीं लोगों के दिमाग में रोमन लिपि में हिंदी पढ़कर यह गलतफहमी न हो जाये कि यहाँ हिंदी ऐसे ही लिखी जाती है. कैसे? इसका जवाब यह है कि वर्डप्रैस के व्यूज देखकर पता लगता है कि अधिकतर पढने वाली रोमन लिपि में कबीर, चाणक्य, रहीम और आध्यात्म, लिखकर वहां आ रहे हैं. यह पिछले चार महीने से मैं देख रहा हूँ. और तो और मेरे चौपालों पर अपन्जीकृत ब्लोग भी इनकी पकड़ में आते हैं.इन सब लोगों को देवनागरी से अनजान मानना गलत होगा क्योंकि अभी यह सब लोगों को नहीं मालुम कि कोई हिंदी टूल भी उपलब्ध है.  अब मैं सोच रहा हूँ कि  कहीं इन जानकार लोगों को भी अगर वही रोमन लिपि वाली जगह दिखी और  पढ़कर आधा-अधूरा आनंद लाकर तसल्ली करते रहे तो देवनागरी का प्रचार उतनी तेजी से नहीं होगा जितना हम समझ रहे हैं-होगा तो यह मेरा दावा है. अब एक संदेह और होता है कि अंग्रेजी में उनके लिखने के बाद उनके सामने हमारा कौनसा ब्लोग आयेगा-रोमन वाला  या देवनागरी वाला. </p>
<p>            हालांकि मैं ज्यादा चिंतित नहीं हूँ, क्योंकि हर भाषा की आत्मा उसकी लिपि होती है, तिस पर हिंदी तो और भी गजब की है उसे देवनागरी लिपि में ही लिखा और पढा जा सकता है. कमल कमल  कमल और  दीपक दीपक दीपक यह ऐक जैसे दिख रहे हैं, इन दोनों शब्दों को तीन अलग प्रकार से लिखा गया है. पर इन्हें रोमन में करें तो कोई भी कहेगा कि जिसने लिखा है वह अंग्रेजी में पैदल है. अपने ही ब्लोग को जब मैं पढ़ रहा था हो लग रहा था कि कई एसे शब्द  हैं जिनकी स्पेलिंग रोमन में ग़लत है और गूगल वालों का हिंदी टूल हम हिंदी वालों पर तरस  खाकर हिंदी में सही अनुवाद कर देता है. अभी यहाँ  देंता शब्द चला जाता पर मुझे रोमन वालों का ख़्याल आया कि क्या  पढेंगे? चलो इस बहाने भाषा में शुद्धिकरण  की प्रवृति बढेगी. </p>
<p>       अगर हिंदी की आत्मा  देवनागरी है वैसे ही अंग्रेजी की आत्मा रोमन  है. अगर मुझे कहीं अंग्रेजी का कोई शब्द देवनागरी में मिल जाता है तो थोडा दिक्कत आती है. कभी कुछ कहानियों में अंग्रेजी के वाक्य देवनागरी में पढने को मिल जाते हैं तो थोडा ध्यान से सोचकर पढते है  पर अगर वही वाक्य रोमन में हो तो कोई समय नहीं लगता. हिंदी को रोमन में लिखना शायद कुछ लोगों को आसान लगता है पर पढ़ना उससे ज्यादा मुश्किल है. फिर उसकी गेयता का भी प्रश्न है. कम से कम मैं तो यही कह  सकता हूँ कि अभी कोई निष्कर्ष निकालने से पहले यह देखना जरूरी है आगे इसका क्या स्वरूप सामने आता है. हिंदी चिट्ठों का रोमन में लिखने से ज्यादा गूगल का इंडिक ट्रांसलिटरेशन टूल की खुशी हुई. और यह लेख मैं उसी पर लिख रहा हूँ. साथ ही यह भी सोच रहा हूँ कि कहीं रोमन में पढने वाले स्पेलिंग की गलती निकालने लगे तो.......हिंदी वालों को ही इतना सब्र नहीं है बुध्दी और बुद्धि को चल जाने दें आखिर गूगल टूल पर कोई नया आदमी लिख रहा है.  एसे में रोमन वालों ने भी यही तेवर दिखाए तो.........मतलब हम जिस लिपि में लिख नहीं रहे उसका जवाब कहाँ से देंगे और किसी ने जब अपना प्रश्न पेश किया तो यह पता कैसे लगेगा कि किस लिपि वाले का सवाल है. उसने कहा कि तुमने कमल गलत लिखा है तो देवनागरी का लेखक अपने ही शब्द का उलट पलट का देखेगा पर वह तो उसका वैसा ही लिखा मिलेगा. देखो आगे-आगे क्या होता है.कही ऐसा न हो जाये देवनागरी में लिखने वाले इसे बात पर ज्यादा ध्यान देने लगें कि उनके रोमन में शब्द सही होना चाहिए और ऐसे मशगूल हो जाएँ कि देवनागरी लिपि में हिंदी को अंतर्जाल पर स्थापित करना याद ही न रहे.      </p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[आध्यात्मिक ज्ञान के बिना विकास अधूरा ]]></title>
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<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 03:54:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[               देश को विकास की ओर ले जाने की बात ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>               देश को विकास की ओर ले जाने की बात सभी करते है और करना चाहिऐ, पर आज तक कोई भी स्पष्ट नहीं का सका कि उसका स्वरूप क्या? क्या भौतिक साधनों के उपलब्धि ही विकास है? क्या आदमी के मानसिक विकास को कोई मतलब नही है?</p>
<p>             अगर हम विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास से करते हैं तो वह स्वाभाविक रुप से आता ही है, और साथ में विनाश भी होता है। जो आज है उसका स्वरूप भी बदलेगा-इसी बदलाव को हम विकास कहते हैं और फिर एक दिन उसका विनाश भी होता है। इतने सारे भौतिक साधन होते हुए भी पूरे विश्व में अमन चैन नहीं है। एक तरफ सरकारें विकास का ढिंढोरा पीटती हैं दूसरी तरफ आतंकवादी उन्हीं साधनों का इस्तेमाल गलत उद्देश्यों के लिए करते है उनके पास धन और अन्य साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और जैसे जैसे संचार के क्षेत्र में नये नए साधन आ रहे आम आदमी के पास इस्तेमाल के लिए बाद में पहुंचते है आतंकवादी उसे शुरू कर चुके होते हैं। इसका सीधा आशय यही है उनके पास धन और साधनों की उपलब्धता है पर विचार शक्ति नहीं है। यह विचार शक्ति तभी आदमी में आती है जब वह अपने अध्यात्म को पहचानता है। आजकल आदमी को भौतिक शिक्षा तो दीं जाती है पर अध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया जाता और वह दूसरों के लिए उपयोग की वस्तु बनकर रह जाता है।</p>
<p>          हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरू की छबि रखता है और यहां के अध्यात्म आदमी में सर्वांगीण विकास कि प्रवृति उत्पन्न करता है। हमारे महर्षियों और संतों ने अपनी तपस्या और तेज से यहाँ ऐसे बीज बो दिए हैं जो आज तक हमारे देश की छबि उज्जवल है पर अपने धर्म ग्रंथो को असांसारिक और भक्ति से ओतप्रोत मानकर उन्हें नियमित शिक्षा से दूर कर दिया गया है, यही कारण है हमारे देश के प्रतिभाशाली लोग भौतिक शिक्षा ग्रहण कर विदेश में तो ख़ूब नाम कमा रहे हैं पर देश को उसका लाभ नहीं मिल पाया वजह हर जगह अज्ञान का बोलबाला है। वह विदेशों में नाम कमा रहे हैं और यहाँ हम खुश होते हैं पर कभी यह सोचा है कि हमारे देश में रहकर वह लोग कम क्यों नहीं कर पाये?</p>
<p>            केवल भौतिक शिक्षा से सुख-समृद्धि तो आ सकती है पर शांति का केवल एक ही जरिया है और वह है अध्यात्म का विकास। इसका आशय यह है कि आदमी समय के अनुसार बड़ा होता है और अपने प्रयासों से भौतिक साधनों का निर्माण और संचय स्वाभाविक रुप से करेगा ही पर वह तब तक अध्यात्मिक विकास नहीं कर सकते जब तक उसे कोई गुरू नहीं मिलेगा। अगर हम विश्व में फैले आतंकवाद को देखें तो अधिकतर आतंकवादी भौतिक शिक्षा से परिपूर्ण है वह हवाई जहाज उड़ाने, कंप्युटर चलाने और बम बनने में भी माहिर है और कुछ तो चिकित्सा और विज्ञान में ऊंची उपाधिया प्राप्त हैं, इसके बावजूद आतंकवाद की तरफ अग्रसर हो जाते हैं उसमें उनका दोष यही होता है कि धन और धर्म के नाम पर भ्रम में डालकर उन्हें इस रास्ते पर आने को बाध्य कर दिया जाता है ।<br />
इस तरह यह जाहिर होता है कि भौतिक साधनों के विकास के साथ अध्यात्म का विकास भी जरूरी है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अभी लिखा क्या है जो लिपि पर झगड़ने लगे-हास्य कविता  ]]></title>
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<pubDate>Thu, 04 Oct 2007 13:29:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[स्कूल से घर लौटे बच्चे आपस में
रोमन और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>स्कूल से घर लौटे बच्चे आपस में<br />
रोमन और देवनागरी लिपि को<br />
लेकर लड़ने लगे<br />
'मैं तो रोमन में हिंदी लिखूंगा<br />
तुझे देवनागरी में लिखना है लिख<br />
दूसरा कहता है<br />
'मैं तो हिंदी में ही हिंदी जैसा दिखूंगा<br />
तुझे अंग्रेजी जैसा दिखना है तो दिख'<br />
माँ हैरान है और पूछती है<br />
'बेटा अभी तो शब्द ज्ञान आया है<br />
लिखोगे तुम तो पढेगा कौन<br />
तुम चिल्ला रहे हो<br />
कौन सुने और कौन पढे<br />
शब्द तो तभी पढा और सुना जाता है<br />
जब आदमी होता है मौन<br />
तुम क्या लिखोगे और क्या पढोगे<br />
प्रेमचंद, निराला, प्रसाद और कबीर को<br />
नहीं पढा  लडाई झगडा करते हुए<br />
अपनी ज़िन्दगी गुजारोगे<br />
अभी तो बोलना शुरू किया है<br />
अब तक लिखा क्या है जो<br />
लिपि को लेकर लड़ने लगे हो<br />
हिंदी का जो होना है सो हॊगा<br />
पहले पढ़ना सीखो और फिर सोचो<br />
लोगों चाव से पढ़ें एसा नहीं लिखा तो<br />
तुम्हारा नाम भी अनाम होगा<br />
यह अभी से ही लग रहा है दिख<br />
जब  यूनिकोड है तो काहेका झगडा<br />
रोमन में लिख देवनागरी में पढ<br />
रोमन में भी पढ देवनागरी में लिख' </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धोनी की कप्तानी का अब परीक्षण होगा]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/29/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 14:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

आस्ट्रेलिया की टीम  भारत दौरे पर आ गय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>आस्ट्रेलिया की टीम  भारत दौरे पर आ गयी है और कल उसके साथ भारतीय टीम अपना  पहला एक दिवसीय मैच  खेलने  वाली है। बीस  ओवरीय विश्व कप में अपनी टीम  की जीत से हर्षित भारतीय दर्शकों की एक बार फ़िर क्रिकेट में रुचि जागी है पर उनको इन मैचों में वैसा खेल नहीं देखने को मिलेगा जैसा कि वह अपेक्षा कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इसके नियम वैसे ही जैसे कि पहले थे। बीस ओवरों में नियम कुछ्ह अलग  है और जिसमें बल्लेबाजों को ज्यादा लाभ होता है और वह तेजी से बल्लेबाजी कर   रन बनाते हुए दर्शकों का मनोरंजन कर  सकते हैं जबकि एक दिवसीय  और  पांच दिवसीय टेस्ट मैचों के नियम गेंदबाज और बल्लेबाज दोनों के लिये समान रूप से  लाभदायक हैं।</p>
<p>                         अगर हम एक दिवसीय मैचों की दृष्टि से देखें तो भारतीय टीम की स्थिति उतनी ही दयनीय है जिस तरह पहले थी और विश्व की वरीयता सूची में उसका नबंर चर्चा लायक भी नहीं है। इसके अलावा पुराने खिलाडियों की वापसी भी कोई टीम के मनोबल बढने में सहायक सिद्ध नहीं होने वाली। जो दर्शक इन मैचों में बीस ओवरों वाले दृश्य देखने चाहेंगे उनको निराशा ही हाथ लगेगी। हालंकि एक दिवसीय मैचों के खेल में दक्षता के साथ रणनीतिक कौशल की भी आवश्यकता भी होती है और इस मामले भी भारतीय टीम बहुत् कमजोर है और कभी यह नहीं लगा कि उसका कप्तान कभी कोई रणनीति बनाकर   मैदान में उतरता है। अब धोनी को  नया कप्तान बनाया गया है और यह श्रंखला उसके लिये यह वास्तविक परीक्षा का समय है। उसके सामने सबसे बडी समस्या यह आने वाली है कि अब उसके साथ वह वरिष्ठ खिलाडी भी हैं जिन पर टीम में वैमनस्य की भावना उत्पंन करने की आरोप लगे हैं। एक संदेह यह भी है कि अपने से जूनियर खिलाडी जो अब उनका कप्तान भी है उसके लिये वह वैसा खेलेंगे भी के नहीं जैसा वह चाह्ता है।</p>
<p>              वैसे तो इन खिलाडियों को टीम में शामिल  करने पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं पर भारतीय टीम के चयन में कई बातें एसी होतीं हैं जिसकी वजह से समझोते किये जाते हैं। अगर किसी को यह पता होता कि बीस ओवर में भारतीय टीम जीत भी सकती है तो यकीन मानिये इन वरिष्ठ खिलाडियों को वहां भी ले जाया जाता। यदि भारतीय दर्शकों की रती भर भी दिल्चस्पी उस प्रतियोगिता में होती तो भी इन खिलाडियो को वहां झेलना पडता। इस प्रतियोगिता को भारतीय मीडिया ने भी अधिक महत्व नहीं दिया था वर्ना वह पहले ही इन खिलाडियों का टीम में शामिल करने के लिये दबाव बना देता। विश्व कप में विजय के बाद भारत पहुंचने पर ही धोनी और उसके साथियों को पता लगा कि वह कोई भारी सफ़लता प्राप्त कर लौटे है-यह बात धोनी ने खुद कही है। धोनी इस मामले में किस्मत के घनी रहे कि उनको इन खिलाडियों का सानिध्य   वहां नहीं मिला वरना वह भी असफ़ल कप्तानों की सूची में शामिल होते। इसमें कोई शक नहीं यह सब सीनियर महान हैं पर देश को विश्व विजयी बनाने कि उनमें कुब्बत  नहीं है और इनको ऐक नहीं पांच-पांच अवसर दिये जा चुके हैं। अब धौनी को ऐसी  हालतों से जूझना होगा जिसकी कल्पना भी उनहोने पहले नहीं की होगी। अगर वह इन वरिष्ठ खिलाडियों को साध पाये तो ही वह आगे भी सफ़लता का दौर जारी रख सकते हैं।</p>
<p>        अगर भारतीय टीम इस श्रंखला में अच्छा प्रदर्शन करती है तो भी उसकी विश्व वरीयता में थोडा सुधार हो सकता है इससे अधिक आकर्षण इसमे और अधिक नहीं है। हां नये  कप्तान और विश्व कप जीतने के तत्काल  बाद हो रही इस श्रंखला में लोग पहले से अधिक दिलचस्पी लेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है। बीस ओवरीय  विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी के लिये कप्तान की रूप में करने के लिये ज्यादा के लिये कुछ था भी नहीं पर यहां एक कप्तान के रूप में अपनी क्षमता का परिचय देना होगा।<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रचार और बाजार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 14:36:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[उपभोक्ता और निर्माता की
मर्जी पर नहीं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>उपभोक्ता और निर्माता की<br />
मर्जी पर नहीं चलता बाजार<br />
करता है काम एक तंत्र<br />
जिसे कहते हैं प्रचार<br />
सामान खरीदने वाले<br />
कही रेडियो पर सुना हो<br />
कही टीवी पर देखा को<br />
कही पत्र-पत्रिका में पढा हो तब<br />
बनाते अपने विचार का आधार<br />
कभी कौन बनेगा करोड़पति<br />
कभी इंडियन आइडियल<br />
तो कभी चाहिए क्रिकेट का हीरो<br />
उत्पाद बेचने के लिए<br />
आजकल जरूरी है यह सब<br />
नहीं तो सिमट जाता है जीरो<br />
पर पूरा व्यापार</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
आदमी की देह से ज्यादा<br />
उसकी अक्ल पर काबू पाने के लिए<br />
चल रही है विज्ञापन की जंग<br />
जिसमें पैसे के अलावा कोई<br />
किसी का साथी नही<br />
कोई किसी के संग<br />
साथ अपने अक्ल लेकर जाओ बाजार<br />
ठगी से बच नही सकते<br />
सस्ती चीज कही से ले नहीं सकते<br />
किसी चीज की गारंटी भी नहीं उपचार<br />
किसी चीज को खरीद कर ठग जाओ<br />
तो भूल जाओ<br />
मत करो पछतावे का विचार</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भक्त मौन है ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/24/%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 16:07:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भक्त से पूछा गया
&#8216;बता राम कौन है&#8217;
जो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भक्त से पूछा गया<br />
'बता राम कौन है'<br />
जो मनुष्यदेह धारण किये हो<br />
और पूछे ऐसा प्रश्न<br />
इस अहंकार पर भक्त मौन है</p>
<p>रोम-रोम में बसते हैं<br />
कण-कण में रहते हैं<br />
रक्त की हर बूँद में<br />
सदैव प्रवाहित हैं<br />
जिस भक्त के हृदय के स्वामी है<br />
वह कैसे इस प्रश्न का उत्तर दे कि<br />
'राम कौन है'</p>
<p>प्रश्न में छाया है अहंकार<br />
पर भक्ति तो होती निरंकार है<br />
मन के भाव होते हैं पवित्र<br />
उन्हें व्यक्त करना बेकार है<br />
अंहकार का सबसे अच्छा उत्तर मौन है</p>
<p>जिन्होंने खोजा उसे पाया<br />
जिनके मन में अहंकार<br />
वाणी से निकले शब्दों में है प्रहार<br />
आत्ममुग्धता से भरा व्यवहार<br />
उनके भी पास हैं पर देख नहीं पाया</p>
<p>अंतर्दृष्टि का अँधेरा<br />
दैहिक चक्षुओं से भी प्रकाश की<br />
अनुभूति को दूर कर देता है<br />
इसलिये वह पूछते हैं कि<br />
'राम कौन है'<br />
जिसके घट-घट में बसते हैं<br />
हर पल देह में विचरते हैं<br />
वह भक्त मौन है<br />
जिसे अपनी अटूट भक्ति में विश्वास है<br />
वह जानता है उनकी कृपा दृष्टि को<br />
इसलिये सुनकर भी यह प्रश्न<br />
अनसुना कर देते हैं भक्त कि<br />
'यह राम कौन है'<br />
आत्मा और परमात्मा के बीच<br />
सेतु की तरह है राम का नाम<br />
इसलिये भक्त मौन है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहस और तर्क तो विद्वानों को करना चाहिए ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 11:40:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
 
बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चाहिए। विद्वान का मतलब यह कि जिस विषय पर बहस हो उसमें उसने कहीं न कहीं शिक्षा और उपाधि प्राप्त की हो या उसने उस विषय को इस तरह पढा हो कि उसे उसके संबंध में हर तथ्य और तत्व का ज्ञान हो गया हो। हमारे देश में हर समय किसी न किसी विषय पर बहस चलती रहती है और उसमें भाग लेने वाले हर विषय पर अपने विचार देते हैं जैसे कि उस विषय का उनको बहुत ज्ञान हो और प्रचार माध्यमों में उनका नाम गूंजता रहता है। उनकी राय का मतलब यह नहीं है कि वह उस विषय में पारंगत हैं। उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने का कारण यह होता है कि वह अपने किसी अन्य कारण से चर्चित होते हैं, न कि उस विषय के विद्वान होने के की वजह से ।</p>
<p>स्वतंत्रता के बाद इस देश में सभी संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों की कार्यशैली का एक तयशुदा खाका बन गया है जिससे बाहर आकर कोई न तो सोचना चाहता है और न उसके पास ऐसे अवसर हैं। धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, राजनीति, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में बहुत लोग सक्रिय हैं पर प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता है जिसके पास या तो कोई पद है या वह उन्हें विज्ञापन देने वाला धनपति है या लोगों की दृष्टि में चढ़ा कोई खिलाडी या अभिनेता है-यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे उस विषय का ज्ञान हो जिस पर वह बोल रहा हो। इसी कारण सभी प्रकार की बहस बिना किसी परिणाम पर समाप्त हो जाती हैं या वर्षों तक चलती रहती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और बहस भी बढने लगी है और कभी-कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों को लोगों की दृष्टि में अपना प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए विषयों की जरूरत है तो उनमें अपना नाम छपाने के लिए उन्हें यह अवसर सहजता से प्रदान करते हैं।</p>
<p>अन्य विषयों पर बहस होती है तो आम आदमी कम ही ध्यान देता है पर अगर धर्म पर बहस चल रही है तो वह खिंचा चला आता है। धर्म में भी अगर भगवान् राम श्री और श्री कृष्ण का नाम आ रहा तो बस चलता-फिरता आदमी रूक कर उसे सुनने, देखने और पढने के लिए तैयार हो जाता है। मैं कुछ लोगों की इस बात से सहमत हूँ कि भगवान श्री राम और श्री कृष्ण इस देश में सभी लोगों के श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं। लोग उनके प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि उनकी निन्दा या आलोचना से उन्हें ठेस पहुँचती हैं। इसके बावजूद कुछ लोग प्रचार की खातिर ऐसा करते हैं और उसमें सफल भी रहते हैं।</p>
<p>धर्म के संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया पर इसके बावजूद इन्हें श्रद्धा भाव से पढने वालों की कमीं नहीं है। यह अलग बात है कि कोई कम तो कोई ज्यादा पढता है। फिर कुछ पढने वाले हैं तो ऐसे हैं जो इसमें ऐसी पंक्तियों को ढूंढते हैं जिसे उनकी आलोचना करने का अवसर मिले। वह पंक्तिया किस काल और संदर्भ में कही गयी हैं और इस समय क्या भारतीय समाज उसे आधिकारिक रुप से मानता है या नहीं, इस बात में उन्स्की रूचि नहीं होती। मुझे तो आश्चर्य तो तब होता है कि ऐसे लोग अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते-जाहिर है कि उनका उद्देश्य ही वही होता है किसी तरह नकारात्मक विचारधारा का प्रतिपादन करें। मजे की बात तो यह है कि जो उनका प्रतिवाद करने के लिए मैदान में आते हैं वह भी कोई बडे ज्ञानी या ध्यानी नहीं होते हैं केवल भावनाओं पर ठेस की आड़ लेकर वह भी अपने ही लोगों में छबि बनाते हैं-मन में तो यह बात होती है कि सामने वाला और वाद करे तो प्रतिवाद कर अपनी इमेज बनाऊं।</p>
<p>मतलब यह कि धर्म मे विषय में ज्ञान का किसी से कोई वास्ता नहीं दिखता। एक मजेदार बात और है कि अगर किसी ने कोई संवेदनशील बयान दिया है प्रचार माध्यम भी उसके समकक्ष व्यक्ति से प्रतिक्रिया लेने जाते हैं बिना यह जाने कि उसे उस विषय का कितना ज्ञान है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के कई प्रसिद्ध विद्वान है जो इस विषय के जानकार हैं पर उनसे प्रतिक्रिया नहीं लेने जाता जबकि उनके जवाब ज्यादा सटीक होते, पर उससे समाचारों का वजन नही बढ़ता यह भी तय है क्योंकि लोगों के दिमाग में भी यही बात होती है कि प्रतिक्रिया देने का हक केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा से संपन्न लोगों को ही है पंडितों (यहाँ मेरा आशय उस विषय से संबधित ज्ञानियों और विद्वानों से है जो हर वर्ग और जाति में होते हैं) को नहीं। वाद, प्रतिवाद और प्रचार के यह धुरी समाज कोई नयी चेतना जगाने की बजाय लोगों की भावनाओं का दोहन या व्यापार करने के उद्देश्य पर ही केंद्रित है।</p>
<p>इसलिये जब ऐसे मामले उठते हैं तब समझदार लोग इसमें रूचि कम लेते हैं और असली भक्त तो बिल्कुल नहीं। इसे उनकी उदासीनता कहा जाता है पर मैं नहीं मानता क्योंकि प्रचार की आधुनिक तकनीकी ने अगर उसके व्यवसाय से लगे लोगों को तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की हैं तो लोगों में भी चेतना आ गयी है और वह जान गए हैं कि इस तरह के वाद,प्रतिवाद और प्रचार में कोई दम नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शाश्वत सत्य के रुप हैं राम ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/22/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%aa-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 14:28:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[राम हैं एक काल्पनिक पात्र है
आ रहे रोज ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>राम हैं एक काल्पनिक पात्र है<br />
आ रहे रोज ऐसे बयान<br />
बढ़ रही है जमाने में<br />
फिल्मों के नकली पात्रों का<br />
अभिनय करने वालों की शान<br />
अमीरों के ड्राइंग रूमों में<br />
लगती हैं लगती है तसवीरें<br />
पर फिर भी नहीं पाते<br />
देवताओं जैसी पूजा<br />
उठाया कुछ लोगों ने उन्हें यही दर्जा<br />
दिलाने का बीड़ा<br />
इसलिये रामजी के काल्पनिक<br />
होने का करते एलान</p>
<p>चक दे इंडिया में देश को<br />
विश्व कप जीता दिखाकर<br />
करा रहे लोगों से वाह-वाह<br />
पर सच में क्या भारत ऐसे कहीं जीता<br />
एशिया कम में क्या जीती टीम<br />
पूरे देश में 'चक दे इन्डिया' का ढिंढोरा पीटा<br />
विश्व कप में पिटी हॉकी टीम पर<br />
कभी मंथन नहीं करेंगे<br />
फिल्मों में नकली पात्र गढ़कर<br />
लोगों को भ्रमित करेंगे<br />
देश की बढते दिखाते नकली शान</p>
<p>मुन्ना भाई में गांधी मार्ग का नही<br />
गांधीगिरी का किया प्रचार<br />
गांधीजी का कम नकली पात्र के<br />
गुणों पर ज्यादा किया विचार<br />
रुपहले परदे पर अभिनेताओं की<br />
रामजी जैसी छबि उतारने का<br />
इस तरह प्रयास करेंगे<br />
कि परदे के बाहर की तस्वीर लोग भूलेंगे<br />
जब बाजार में ज्यादा नहीं टिकता झूठ<br />
विज्ञापन पर पलने वालों के उमेठते कान<br />
नकली हीरो के लिए बड़ी लकीर नहीं खींच सकते<br />
तो असली हीरो का कम करो मान</p>
<p>हर फिल्म में ऐक ही हीरो करता है<br />
पूरे समाज का उद्धार<br />
बाकी पब्लिक दिखाते बेकार<br />
अकर्मण्य लोगों की फ़ौज बढाते<br />
जो अपनी दुर्गत से उबरने के लिए<br />
करती हीरो का इन्तजार<br />
कोई नकली हीरो आयेगा जो<br />
अकेले लड़कर उबार जाएगा<br />
रामजी की तरह वानर सेना नहीं जुटाएगा<br />
अगर कोई फिर हुआ अवतार तो<br />
हमें भी लड़ने के लिए बुलाएगा<br />
हमें घरो से निकालकर जंग के<br />
मैदान मे ले जाएगा<br />
इससे तो हीरो अच्छा जो सारा<br />
काम अकेले कर जाएगा<br />
यही सोच लोगों को नही होने<br />
देता सत्यता का भान</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
रामायण में अकेले रामजी ही नही<br />
हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान<br />
और नल-नील भी नायक जैसा सम्मान पाते<br />
रामायण का भी यही है संदेश कि<br />
धर्म के लिए सब मिलकर लड़ो<br />
मर्यादा और भक्ति भाव से रहते हुए<br />
किसी से भी न डरो<br />
मत भूलो अपनी पहचान</p>
<p>कण-कण में राम है<br />
कल्पनाओं से परे उनका काम है<br />
जो लिखते हैं पर वाल्मीकि और<br />
तुलसी जैसा न रच पाते न पाते समान<br />
कुंठा में व्यक्त करते अभिमान<br />
रामजी शाश्वत सत्य का प्रतीक है<br />
सच्चे भक्त ही यह जानते हैं<br />
वह बहकते नही हैं<br />
और हँसते हैं ऐसे सुनकर बयान<br />
----------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तू तो हैं हिन्दी का सेवक ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%a4%e0%a5%82-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 15:50:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिन्दी दिवस पर लोगों के सुने उदगार
लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी दिवस पर लोगों के सुने उदगार<br />
लेखकों से कहने लगे<br />
हिन्दी के चिराग जला दो<br />
सारे जगत में ज्ञान का प्रकाश<br />
हम फैलायेंगे<br />
ऊंची इमारत में रहने वाले<br />
चारो ओर संपन्नता की<br />
रोशनी में रहने वाले<br />
कार में बैठकर टहलने वाले<br />
गरीब लेखकों से कहते हैं कि<br />
तुम हिन्दी के लिए<br />
अपनी प्रतिभा से रोज करो रचनाएँ<br />
हमारे प्रकाशन में है ताकत<br />
हम उन्हें तुमसे ज्यादा गरीबों में<br />
सस्ती दरों पर पढ़वायेंगे</p>
<p>ज्ञान के चिराग तो बहुत आसान है जलाना<br />
तुम माया के चक्कर में ना आना<br />
घर में दिया न जलता हो<br />
पर तुम ज्ञान का प्रकाश फैलाना<br />
मिटटी के दिए की क्या कीमत<br />
बाजार से खरीद लाना<br />
तेल में क्या लगता है<br />
किराने की दुकान से उधार लाना<br />
रुई का क्या<br />
अपने घर के कबाड़ से जुटाना<br />
तू दान कर<br />
अपनी मातृभाषा हिन्दी का नाम कर<br />
हम नही लिखना जानते<br />
इसलिये नहीं लिखते<br />
शब्दों के शेर हम से नही सधते<br />
माया तो ख़ूब है पर<br />
व्याकरण का मायाजाल नहीं समझते<br />
हम तो बाजार ही सजायेंगे</p>
<p>हम हैं प्रकाशन के स्वामी<br />
और तू है हिन्दी का सेवक<br />
क्या यह कम है तेरे चिराग<br />
बाजार में चमकते नजर आएंगे<br />
रोटी की चिन्ता मत कर<br />
वह तो तुझे भगवान दिलवायेंगे<br />
--------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राम तो राजा थे ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/20/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Wed, 19 Sep 2007 13:34:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/20/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[
 
कोई पूछता है
कि रामजी ने इंजीनियरिंग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
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<p>कोई पूछता है<br />
कि रामजी ने इंजीनियरिंग की डिग्री<br />
किस विश्वविद्यालय से पायी<br />
कोई जवाब देता है  कि<br />
उन्होने विश्वामित्र के गुरुकुल<br />
में ग्रहण की शिक्षा<br />
लंका तक पुल बनाने में<br />
जुटे थे वानर तब रामजी ने<br />
सुपरवाईजर की भूमिका निभाई</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
राम पर जो सवाल उठाएं<br />
उनसे बहस क्या करें<br />
क्योंकि खत्म नहीं होगा<br />
उनके निरर्थक सवालों का पिटारा<br />
पश्चिमी संस्कृति ने<br />
उनकी बुद्धि की राह भटकाई<br />
नख से लेकर शिख तक अहंकार में<br />
पूरी ज़िन्दगी उन्होने बिताई<br />
पर आपति तो हमें रामजी को<br />
सुपरवाईजर और इंजिनियर<br />
कहने पर भी आयी<br />
क्योंकि वह तो राजा थे<br />
आज के राजपुत्र भी कौन इनीनियरिंग की<br />
डिग्री लेकर कौंनसे सेतु बनाते हैं<br />
सब ही राजनीतिक कुर्सी के तलाश में<br />
जुट जाते हैं<br />
फ़िर रामजी तो आज भी हैं घट-घटवासी<br />
लिख गए तुलसी महाराज<br />
'होए वही जो राम रचि राखा'<br />
इंजीनियर और सुपरवाईजर<br />
न सेतु बनाए न बनवाएँ<br />
वह तो केवल खींचे खाका<br />
ले वेतन और कमीशन<br />
पक्के होने का प्रमाण देते<br />
ढह जाये तो भी उनका नहीं होता बाल बांका<br />
पिता की आज्ञा पर राजपाट छोड़<br />
गए वन को उन त्यागी रामजी से<br />
उनकी क्या तुलना<br />
जो करते हैं जीवन भर<br />
छ्ल-कपट से माया की कमाई</p>
<p>त्रेता में अंग्रेजी डिग्री वाले<br />
इंजीनियर नही बनते थे<br />
पर फ़िर  भी पुलों  का होता था निर्माण<br />
और वह कभी एसे नहीं ढहते थे<br />
राम तो थे राजा<br />
जो जनहित के लिए निर्माण का ठेका<br />
देते हैं<br />
इसलिये लड़ते रहे दोस्तो<br />
किसीके कहने से रुकोगे तो नहीं<br />
पर रामजी के नाम पर<br />
हिंदी या अंग्रेजी में तुम्हारी ऎसी बात<br />
 हम जैसे अल्पज्ञानी राम भक्तो की<br />
समझ में बिल्कुल नहीं आयी<br />
हम भी क्या करें न छोड़ सकते राम भक्ति<br />
न यह कविताई<br />
इसलिये सीधी सादी  भाषा में<br />
कह दीं अपनी बात<br />
इससे ज्यादा हम नही<br />
दिखा सकते अपनी चतुराई<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सत्य से कब तक आंखें छिपाओगे]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/19/%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9b%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Tue, 18 Sep 2007 14:56:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[सत्य से जितनी दूर जाओगे
भ्रम को उतना ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सत्य से जितनी दूर जाओगे<br />
भ्रम को उतना ही करीब पाओगे<br />
खवाब भले ही हकीकत होने लगें<br />
सपने चाहे सामने चमकने लगें<br />
उम्मीदें भी आसमान में उड़ने लगें<br />
पर तुम अपने पाँव हमेशा<br />
जमीन पर ही रख पाओगे</p>
<p>झूठ को सच साबित करने के लिए<br />
हजार बहानों की बैसाखियों की<br />
जरूरत होती है<br />
सच का कोई श्रृंगार नहीं होता<br />
कटु होते हुए भी<br />
उसकी संगत में सुखद अनुभूत होती हैं<br />
कब तक उससे आंखें छिपाओगे</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आंकडो के जाल में मत आओ, तुम लिखते जाओ ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%93-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 03:23:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
 
अपनी हिन्दी भाषा में लिखते जाओ
कतरनो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>अपनी हिन्दी भाषा में लिखते जाओ<br />
कतरनों में लिखे आंकड़ों पर<br />
अपनी दृष्टि मत लगाओ<br />
लिखो कहानी, कविता और व्यंग्य<br />
और लोगों को पढ़ाते जाओ<br />
और दूसरे का लिखा भी पढते जाओ</p>
<p>हिन्दी की दशा कहीं शोचनीय नहीं है<br />
तुम्हार लिखे से वह अंतर्जाल पर<br />
चमक रही है<br />
जिन्हें पढ़ना है वह खुद आएंगे<br />
तुम अपनी रचनाएं<br />
कहीं डालने मत जाओ<br />
अपने ब्लोग पर डटे रहो<br />
हमने देखा है हिन्दी के पाठक<br />
दूर-दूर से उसे पढने आते हैं<br />
हमारी पीठ थपथपाते हैं<br />
लोगों के बहकावे में मत आओ</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
'यहाँ लिख और वहां दिख' जैसे<br />
नारों पर न करो दृष्टिपात<br />
आंकडे हमें झूठ बोलने और भ्रम का<br />
जाल फैलाने के लिए रचे जाते हैं<br />
ताजमहल खड़ा है वहीं पर<br />
बाजार में उसे भी दौड़ता दिखाते हैं<br />
तुम हिन्दी में हास्य-व्यंग्य के दीपक<br />
जलाते जाओ<br />
कबाड़ से निकली कतरन में तो<br />
बस अँधेरे दिखाए जाते हैं<br />
जहाँ नहीं है रोशनी की जरूरत<br />
वहीं अग्नि जलाए जाते हैं<br />
पर सत्य यह है अपने घर की रोशनी से<br />
मेहमानों को को खुश कर पाते हैं<br />
तुम अपनी मातृ भाषा हिन्दी को<br />
अपने ही घर में समृद्ध किये जाओ<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी भाषा के लिये किसी का मोहताज न होना]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 14:48:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae/</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी दिवस पर कई लोग बोले
हिन्दी की द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी दिवस पर कई लोग बोले<br />
हिन्दी की दशा बहुत खराब<br />
अंग्रेजी इलाकों एकदम शोचनीय<br />
यह न बताया कि अपने इलाक़े में<br />
कौनसी अंग्रेजी है पूज्यनीय<br />
तुम उठो -बैठो अंग्रेजी के साथ<br />
कौन करेगा हिन्दी में बात<br />
कैसे हो सकती है हिन्दी वंदनीय</p>
<p>------------------------------</p>
<p>एक लेखक ने दूसरे से कहा<br />
'अंग्रेजी इलाक़े में हिन्दी की हालत<br />
बहुत खराब है<br />
चलो कुछ हिन्दी में पोस्टर<br />
चिपकाये आते हैं<br />
लोग आते - जाते पढ