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	<title>edcation &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/edcation/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "edcation"</description>
	<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 08:15:06 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[भावी सातवीं पीढ़ी के लिये-लघुकथा]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=439</link>
<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 15:58:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दो धनी लोगों के पास पैसा फालतू पड़ा हु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दो धनी लोगों के पास पैसा फालतू पड़ा हुआ था। वह अपना व्यापार फैलाने के लिये एक नये बसे  दूसरे शहर की ओर नया व्यापार स्थापित करने के लिये  रवाना हुए। दोनों विचार करते हुए जा रहे थे कि कौनसा व्यवसाय करें ताकि उनका धन इतना हो जाये कि सात पीढि़यों तक वह काम आये। आने वाली पीढि़यां कुछ भी न करें तो तभी उसका जीवन यापन शान से चलता रहे। उनका अपने यहां एकत्रित धन के बारे में यह अनुमान था कि अभी वह आगे की छह पीढि़यों तक के लिये ही पर्याप्त है सातवी पीढ़ी तक वह पहुंचेगा उसमें उनको संदेह था।</p>
<p>बस में बैठकर दोनों बातें कर  रहे थे। एक ने कहा-‘आखिर हम वहां कौनसा काम करेंगे? यह समझ में नहीं आ रहा। कैसे तेजी से पैसा आये यह सोचना जरूरी है क्योंकि अपनी भावी सातवीं पीढ़ी के लिये धन का इंतजाम करने के लिये हमें तेजी से कमा करनेा होगा। हमारी उमर भी अब हो चली है।  आजकल उमर का क्या भरोसा? उससे पहले ही इस दुनियां से रवाना हो जायें।’<br />
दूसरे ने कहा-’पहले चलकर वहां जायजा तो लें कि वहां के लोग और वातावरण कैसा है। वैसे हम दोनों को ऐसा काम करना चाहिये जो एक दूसरे का पूरक हो। जैसे मैं तुम किसी ऐसी खाने-पीने की  चीज का काम करो जो लोगों का बीमार करती हो तो मैं ऐसी दवाई बेचने का काम करूंगा जो ठीक करती हो।’<br />
पहले सेठ ने कहा-‘तुम पागल हो गये हो। लोग समझ नहीं जायेंगे।’<br />
दूसरे सेठ-‘समझदार तो पहले दिन ही समझ लेंगे पर वह अपने ग्राहक नहीं होंगे पर ऐसे लोगों की संख्या कम ही होगी। तुम कोई ठंडी गरम चीज  बनाकर बेचने का धंधा शुरू करना मैं और उनसे पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज की दवा बेचूंगा।<br />
पहला-‘पर लोग सीधे बीमार होकर तुम्हारे पास दवाई लेने आयेंगे। उसके लिये डाक्टर की जरूरत होगी।’<br />
दूसरा-‘उसकी चिंता तुम मत करो। मैं खुद ही डाक्टर बन जाऊंगा।’<br />
बस में एक चोर उनकी बात सुन रहा था और वह दोनों के पास आ गया और बोला-‘आप लोग मुझे डाक्टर बना देना।’<br />
दूसरे सेठ ने पूछा-‘तुम कौन हो? और तुम्हारे पास कोई डिग्री है जो डाक्टर बनाकर बिठा दें।’<br />
चोर बोला-‘मैं एक चोर हूं। कुछ  दिन पहले  एक चोरी करने गया था तो एक बैग को मैंने यह सोचकर हाथ में उठा लिया कि उसमें पैसा होगा पर उसमें तो डाक्टर होने की नकली प्रमाण पत्र हैं। असली होते तो कोई भी खरीद लेता पर नकली थे तो कोई खरीददार नहीं मिला। इतना बड़ा धोखा होने के बाद मैंने चोरी से सन्यास ले लिया।  आपको डाक्टर की जरूरत है इसलिये मुझे अब इस समाज से बदला लेने का विचार आया जिसकी वजह से मुझे नकली डिग्री का बोझ उठाना पड़ा। आप तो बस एक छोटा अस्पताल खुलवा देना। </p>
<p>दूसरे सेठ ने कहा-‘ठीक है चलेगा, क्योंकि उस इलाके में अभी लोग बसना शुरू हुए हैं और इसलिये हम अपना धंधा जमाने जा रहे हैं, तुम्हारा कमीशन अधिक नहीं दे पायेंगे। वैसे हमने सुना है कि चोर भले ही चोरी छोड़ दे पर हेराफेरी छोड़ नहीं सकता। तुम हमें धोखा नहीं दोगे कैसे मान लें। कहीं तुम नकली डिग्री में पकड़े गये तो हमारे धंधे का  क्या होगा?’</p>
<blockquote><p><strong>यह लघुकथा मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://rajlekh.worpdpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका’</a> पर लिखी गयी है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
दीपक भारतदीप, लेखक संपादक  </strong></p></blockquote>
<p>चोर ने कहा-‘मैं तो पकड़ा जाता हूं और छूट जाता हूं। मेरा धंधा जम जाये तो मैं अपना कोई चेला भी वहीं फिट कर दूंगा जो आपकी आपातकाल में सेवा करेगा।’</p>
<p>पहला सेठ बोला-‘मैं तुम लोगों के साथ शरीक नहीं हो सकता। मेरा काम तो खाने पीने की चीजें बेचने का है, जरूरी थोड़े ही मैं कोई खराब चीज बेचूं।’<br />
दूसरे सेठ ने कहा-‘पांच-दस रुपये में तुम क्या लोगों को अमृत बेचोगे। तुम जो कच्चा माल लाओगे क्या उसमें बीमारी के कीटाणु नहीं होंगे? अरे, सुनते नहीं लोग कहते हैं कि बाजार की चीज मत खाया करो। इसलिये ही न कि बाजार में चीज खुले में रखे अपने आप ही खराब हो जाती है। वैसे भी तुम अपना दुकान वहीं खोलना जहां इसका अस्पताल खुलवायें।<br />
पहला सेठ बोला-‘ नहीं, मैं इसकी संगत नहीं कर सकता? मैं तो अच्छा सामान बेचूंगा।’<br />
दूसरे सेठ ने कहा-‘ बीमार होने की चीजें बेचना ताकि लोग इसके अस्पताल में भर्ती हों तो उनको पूछने वाले आयेंगे तो वह भी तुम्हारे ग्राहक होंगे। अगर ऐसी चीजें नहीं बेचोगे तो अधिक संख्या में उस इलाके में आयेंगे नहीं। तुम्हें और कुछ नहीं करना! बस, अपनी चीजों को अधिक सफाई से नहीं बनाना और खुले में रखना हैं ताकि वहां हवा में फैलने वाले बीमारियों के कीटाणु उसमें अपनी जगह बना लें। वैसे  तुम्हें अपनी भावी सातवीं पीढ़ी के लिये कमाना है या नहीं?</p>
<p>पहला सेठ चुप हो गया। तीनों अपने गंतव्य की ओर बढ़ते जा  रहे थे। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विभिन्न समाजों का पुराने ढर्रे पर चलना अब कठिन-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=437</link>
<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 15:57:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=437</guid>
<description><![CDATA[जाति, धर्म, भाषा और वर्ण के आधार पर हमार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जाति, धर्म, भाषा और वर्ण के आधार पर हमारे देश में अनेक वर्षों से संगठित समाज चले आ रहे हैं और इसकी आदत वंशानुगत रूप से  हमारे रक्त में ही उपस्थित है। हम कभी अपने को अपने समाज से अलग नहीं देख पाते। जबकि वास्तविकता यह है कि आधुनिक समय में इन समाजों का अस्तित्व केवल नाम को रह गया है और हमारे जीवन में समाज के होने की अनुभूति केवल शादी के लिये वर और वधू ढूंढने के समय ही हो पाती है अन्यथा जीवन में कोई अन्य मजबूत संपर्क अपने समाज से शायद ही रह पाता है।  इसके बावजूद लोग अपना अस्तित्व इन खंडित समाजो में तलाश रहे हैं। हम अक्सर अपने पुराने लोगों पर अपढ़ और अनगढ़ का आरोप लगाते हैं पर शिक्षित होने के बावजूद कितना इन समाजों के दबाव से उबर पाये है यह कभी विचार नहीं कर पाते। इसके अलावा कुछ लोग अभी भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये समाजों का ही उपयोग करना श्रेयस्कर समझते हैं। </p>
<p>पुराने समय के शहर और गांव का परिदृश्य  देखें तो  संयुक्त परिवार की प्रथा तो थी ही साथ ही एक ही समाज के लोगों का घर और व्यवसायिक स्थल भी एक ही जगह स्थित होते थे। गलियां और मोहल्ले उनके समाजों के नाम से भी पुकारे जाते थे। वहां समाज एक सुव्यस्थित और संगठित रूप से दिखता था और लोग अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिये एक दूसरे के साथ जुड़े रहते थे। आधुनिक समय में स्थिति बदलाव की तरफ बढ़ रही   है। अब नये ढंग से कालोनी और बाजार बने हैं जहां विभिन्न समाजों के लोग केवल आर्थिक और व्यवसायिक कारणो के साथ ही अपनी रुचियों के अनुसार  ही वहां रहते हैं। अपने समाज का व्यक्ति हो पास हो यह सब की इच्छा होती है पर न भी हो तो वह भय नहीं खाता।<br />
नौकरी और व्यवसाय में संपर्क स्थापित करने वाले व्यक्तियों में कोई भी किसी जाति और धर्म का हो सकता है-अनेक स्थानों पर हमारे मित्र समूह होते हैं पर उनमें अपनी जति, धर्म या भाषा आधार न होकर व्यक्तिगत रूचियां, कार्य की प्रकृति और स्वभाव होता है। कहीं छह या आठ मित्रों का समूह होता है जहां जाति, भाषा, और धर्म के आधार पर सभी लोग अलग होते हैं पर उनका आपसी संपर्क कभी उसे उजागर नहीं कर पाता।<br />
ऐसे बदलाव के बावजूद भी लोग खंडित समाज की तरफ ताकते हैं पर उनमें निराशा का बोध उत्पन्न होता है। आजकल के प्रतियोगिता के युग में सभी लोग एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते हैं और ऐसे में कोई किसी के साथ रियायत नहीं करता पर चाहते सभी हैं कि समाजों से उनको सहयोग मिले। सबसे अधिक समस्या शादी विवाह में आती है पर जैसे अंतर्जातीय विवाहों की प्रवत्ति बढ़ रही है समाजों वह खंडित ढांचा अपने अस्त्तिव को खोता नजर आ रहा है।<br />
समाज में कुछ माता पिता अपने बेटी और बेटे के लिये अंतर्जातीय विवाह करने को तैयार हो जाते हैं तो इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है यह अलग बात है इसमें उनके प्रयास कम उनके बच्चों का आपसी प्रेम ही इसका प्रेरक होता है। धीरे-धीरे लोग अब भौतिकता के युग में समाज द्वारा अपने सदस्य होने के नाते जो व्यक्ति  आर्थिक दायित्व पूरे करने का जो दबाव बन रहा है, उसे  अपनी सहनशक्ति से बाहर अनुभव करने लगे हैं और ऐसी कई घटनायें सामने आ रही है जिसमें माता पिता न केवल बच्चों को अंतर्जातीय विवाह की अनुमति देते  बल्कि उसमें स्वयं ही दोनों पक्ष भी शामिल हो रहे हैं। ऐसी घटनायें नगण्य हैं पर वह इस बात का संकेत हैं कि विभिन्न समाज अपने पुराने ढर्रे पर अधिक नहीं चल पायेंगें। किसी भी समाज केे शीर्षस्थ लोग कितना भी अपने समाज का गुणगान कर लें पर वह इस तथ्य का नकार नहीं सकते कि भौतिकतावाद ने उनके समाज के सदस्यों को अलग करना शुरू कर दिया है। अब तो ऐसा लगता है कि समाजों का आधार केवल शादी विवाह ही था और जैसे जैसे अंतर्जातीय विवाहों को सामाजिक स्वीकृति मिलती जायेगी उनके अस्तित्व का संकट बढ़ता ही जायेगा। यही कारण है कि आज भी सभी समाज के शीर्षस्थ बाहुबली अपने समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले युगलों और उनके परिवारों को दंडित करने का प्रयास करते है।  देखा जाये तो सभी समाजों का छोटे और मध्यम वर्ग के  लोगों का बौद्धिक, आर्थिक और शारीरिक दोहन कई बरसों से किया जाता रहा पर अब आधुनिक समय में जब लोगों को इससे मुुक्ति पाने का अवसर मिला तो वह इससे मुक्त हो रहे हैं-यह गति धीमी है पर आगे नये समाज के निर्माण के संकेत तो अब मिलने लगे है।<br />
फिर भी कुछ बौद्धिक, प्रबुद्ध, धनी और प्रतिष्ठित होने के साथ ही कुंठित लोगों का एक वर्ग है जो अपने स्वार्थ और अज्ञान के कारण इस बदलते समाज को रोकना चाहता है। ऐसे कुंठित और अल्पाज्ञानी लोग अभी भी अपने समाज के सदस्यों को उसके आधार पर अपने साथ करने का प्रयास करते हैं। लोग उनके सामने हामी भर भी देते हैं पर दोनों ही दिल से जानते हैं कि यह एक दिखावा है।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका</a> पर लिखी गया पाठ है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर कहीं अन्य  प्रकाशित करने की जानकारी मिलें तो इस <a href="http://deepakraj.wordpress.com">पते</a> पर सूचना दें।<br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com"><strong>दीपक भारतदीप</strong></a>, लेखक एवं संपादक </strong></p></blockquote>
<p>अब समय बदल गया है भले ही कुछ लोग जानते हुए भी उससे मूंह फेरना चाहते हैं। अब तो इंटरनेट का युग हैं इसमेें भी कुछ लोग ऐसे व्यवहार करना चाहते हैं जैसे कि पहले लोग किया करते थे। मगर कुछ समझदार लोग हैं जो अपनी व्यवाहारिक कठिनाईयों से जूझते हुए यह अनुभव करते हैं कि समाज अब उनका सहायक नहीं है और वह भले ही मजबूरी में ही सही उससे अलग होने को तैयार  हो जाते हैं।  कई जगह उनका विरोध होता है पर ऐसा करने वाले लोगों की व्यवहारिक कठिनाईयों को दूर करने का माद्दा नहीं रखते। इसलिये जिन लोगों को अपने समाज से दूरी बनाने में झिझक हो उसे अब अपने हृदय से मिटा देना  चाहिए। अगर उनके बच्चों ने विजातीय विवाह का संकल्प लिया है तो उसमें उसका सहायक होने में झिझक नहीं करना चाहिए।  इसके कारण यह है कि विवाह के बाद भी बच्चों को अपने अभिभावकों की आवश्यकता होती है और अगर उनके साथ वह दूरी बनायेंगे तो हो सकता है कि वह अपना वैवाहिक जीवन अच्छी तरह नहीं गुजार सकें। ऐसे में समाज तो उनके पास आने से रहा और वैसे ही सजातीय विवाह करने पर कौन कोई किसके पास कठिनाई में आता है? ऐसे में अभिभावकों को अपनी जिद्द छोड़ना चाहिए। इस लेखक ने कुछ ऐसे अंतर्जातीय विवाहों में शामिल होकर यही अनुभव किया है कि जिसमें माता पिता स्वयं शरीक होते हैं वह बच्चे आगे भी खुश रहते हैं।  बदलते समय में समाज का बदलना स्वभाविक है और उसे रोकना अपने लिये कठिनाई उत्पन्न करना है।<br />
.....................................  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[What Does Your Future Hold?]]></title>
<link>http://linksforlearning.wordpress.com/?p=43</link>
<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 04:17:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>debbiecluff</dc:creator>
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<description><![CDATA[I was out to lunch with a dear friend, Kim Power Stilson, a couple of days ago and she asked me wha]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin:0 0 10pt;"><span style="font-size:14pt;line-height:115%;"><span style="font-family:Calibri;">I was out to lunch with a dear friend, Kim Power Stilson, a couple of days ago and she asked me what my plans were for the future, career wise. It as an interesting question that I didn't have an immediate answer to so I simple said, "At this time I am not sure as I am trying to figure out what I want to do". Growing up, my father had never really settled on one job, so it seemed like a silly question to ask. I had always followed in his entrepreneur steps and always sensed that opportunity would knock. Was I wrong? or just naive in my thinking? <span> </span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0 0 10pt;"><span style="font-size:14pt;line-height:115%;"><span style="font-family:Calibri;">I pondered on that question for a couple of days and now think I have a solid answer to "what my future holds". I began my career choice as many young teenagers do, the decision was made by my parents. My mom had 10 kids and I liked kids so teaching felt like the right career path. She had gone to school to be a teacher, so that is what I was mostly pushed into doing. My mom had always said it was a good choice for moms to be teachers, so I went that route, seemed like a work from home job, in some sense as teachers were always working from home. I taught for two years and decided I hated teaching, too much politics and social networking (in the non-online form). So I had to adapt to my surroundings and, as my mother would say, "See a need, fill it". </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0 0 10pt;"><span style="font-size:14pt;line-height:115%;"><span style="font-family:Calibri;">I decided to do the next best thing to teaching, online tutoring and instant homework help. This was a definite "work from home" field with an "online marketing business" twist. <span> </span>I spent hours on end (remember the quote from Abe Lincoln, "if I had 6 hours to chop down a tree, I would spend the next 4 hours sharpening my ax") learning about the internet. I learned how to social network, how to start my own small business, all about the SEO (Search Engine Optimization)and WWW (World Wide Web). I<span>  </span>became a "preferred" writer on sites such as ezineonline.com and article city (they even sent me a mug at the end of the year for all my writing contributions). I found amazing business consulting sites (such as powerstrategies.tv and planetarystreams.com) that enabled me to bring my business to<span>  </span>a successful money<span>  </span>making company. </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0 0 10pt;"><span style="font-size:14pt;line-height:115%;"><span style="font-family:Calibri;">I am at a new stage in my life, but a lot of what my future holds depends on what I steps I decide to take in my life and how I strategically place my next pieces. I don't think I was wrong or naive in not knowing that answer to what my future holds mainly because I am know I am able to do something with what I am giving. To quote the amazing President Abe Lincoln again, "During the Civil War the generals told the President that they had caught 6 cows and wanted to know what to do with them. He replied, "Milk Them". So to the World Wide Web and those spending hours on Google trying to find the answer to what their future holds, just remember to take what you are given and find the easiest solution. </span></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चमत्कार को नमस्कार, सहजता से कोई नहीं सरोकार-आलेख ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=435</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:03:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=435</guid>
<description><![CDATA[इस प्रथ्वी पर जीवन अपनी सहज धारा से बह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>इस प्रथ्वी पर जीवन अपनी सहज धारा से बहता जाता है। अनेक आपदायें इस प्रथ्वी पर आती हैं पर फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। यहां सांस लेने वाला प्रत्येक जीव भी अपने जीवन में उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरता हुआ अपन जीवन सहजता से  व्यतीत करता है। प्रथ्वी पर सभी प्राणी-जिसमे पेड़-पौद्ये, पशु-पक्षी और मनुष्य अपने जीवन में दुःख-सुख और आशा और निराशा के दौर से गुजरते है। बस फर्क इस बात का है कि इंसान उसे बयान कर सकता है दूसरे उसे सुन सकते हैं पर अगर दूसरे बयान करें तो इंसान उसे सुन नहीं सकता पर जिसमें चेतना है वह उसे महसूस कर सकता है।<br />
कुल मिलाकर जीवन दुःख-सुख और आशा निराशा इसी सहज जीवन का हिस्सा  है पर मनुष्य जो सब प्राणियो में विवेकवान है उसमें हर बुरी बात को त्रासदी और अच्छी बात को चमत्कार कहता है। </p>
<p>मनुष्य के मन में फैली इसी धारणा पर अनेक चालाक लोग अपनी रोटी सैंकते हैं। कभी किसी बाबा के नाम तो कभी किसी फकीर के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक स्थान के निर्माण के नाम पर चमत्कार का भ्रमजाल फैलाते हैं। किसी घटना पर चमत्कार का रंग चढ़ाकर उसका प्रचार इस तरह करते हैं कि अपनी हालातों से परेशान लोग उस प्रतीक की तरफ आकर्षित हो जो उसके पीछे है।</p>
<p>14 वर्ष की एक लड़की का अपने ही घर में कत्ल हो गया। कत्ल होते ही जांचकर्ताओं ने माना कि कातिल कोई घर का आदमी है। पहले एक नौकर पर शक गया और उसकी तलाश शुरू की गयी। लड़की की देह पंचतत्वों मेंं विलीन  अभी हुई थी कि उसी आरोपी नौकर का शव उसी घर की छत पर मिला जहां उस लड़की का कत्ल हुआ था। मामला उलझ गया। मृतक लड़की के बदहवास माता पिता क्या बतायें और क्या बोलें? सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे जैसे सरेआम मुकदमा चल रहा हो। टीवी चैनल सीधे प्रसारण कर रहे थे। बताओ कातिल कौन है? धीरे-धीरे कत्ल की सुई पिता की तरफ घुमाई गयी। उस तमाम तरह के आरोप लगाते हुए कहानियां गढ़ी गयी। उसके मित्रों पर संदेह किया गया। एक तरह से फैसला दिया गया कि पिता ही अपने पुत्री के कत्ल के लिये जिम्मेदार है। उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया। </p>
<p>जांच आगे बढ़ी। अब तीन अन्य नौकरों को घेरा गया। जांच पूरे पचास दिन चली। मृत लड़की का पिता जेल में था तो तीन अन्य नौकर भी इसी आरोप में धरे गये। जांच चलती रही। प्रचार माध्यम उस मृत लड़की की हत्या के  समाचारों को बेचते रहे और तो और इतना भी भूल गये कि किसी मृतक के चरित्र पर सार्वजनिक आक्षेप करना तो दूर एकांत में भी लोग ऐसा करना अनुचित मानते हैं। सारी संस्कृति और संस्कारों का मखौल उड़ाते हुए एक 14 साल के मृत लड़की के बारे में जो बातें कहीं गयी उनको सुनकर ऐसा लगा जैसे कि किसी ने कानों में गरम सीसा डाल दिया।<br />
आखिर जांचकर्ताओं ने अदालत में माना कि मृत लड़की के पिता के विरुद्ध लगाये गये आरोप के संबंध में उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। पिता जेल से बाहर आ गया। यह कहानी है पर सब घटनायें समाज और देश के नियमों को अनुसार घटित हुईं। परेशान पिता जेल से छूटा तो अपनी पत्नी के साथ सांईबाबा के मंदिर गया। </p>
<p>बस प्रचार माध्यमों को अवसर मिल गया कि यह तो उनके चमत्कार की वजह से रिहा हुआ है। इस पर कई कार्यक्रम दिखाये और उसकी प्रष्ठभूमि में सांईबाबा के भजन बजाये। वैसे सांईबाबा के चमत्कारों के बारे में आजकल सभी चैनल जमकर प्रसारण कर रहे थे। यह उनके प्रति भक्ति भाव का नहीं बल्कि अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के कारण कर रहे है। लोग चमत्कार एक कार्यक्रम के रूप में देखें और उसे खरीदें-यही भाव उनके मन में रहता है।<br />
उपरोक्त हत्याकांड की जांच में अनेक विशेषज्ञ जांचकर्ता लगे। उन्होंने उसके हर पहलू  का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उन्होंने समय लिया पर हत्याकांड की स्थिति को देखते हुये यह कोई बड़ी बात नहीं थी। जांचकर्ता तमाम तरह की शैक्षणिक उपाधियों के साथ अपने कार्य का अनुभव लिये हुए थे। उसी आधार पर उन्होंने अपनी बात अदालत में रखी। अदालत ने भी सब देखा और जमानत दी। यह एक सहज और सामान्य प्रक्रिया है।<br />
मगर प्रचार माध्यमों को इसमें कुछ ऐसा चाहिये था जिसे वह बेच सकें और  इसे चमत्कार का तत्व उनको मिल गया। अपनी लड़की की पहले मौत और फिर उसकी हत्या का आरोप अपने ऊपर लेने वाले पिता के लिये पूरा समय संघर्षपूर्ण था और उस दौरान उसके पास न तो हादसे पर रोने का समय था और न किसी चमत्कार की उम्मीद करने का। रिहा होने के बाद वह सांईबाबा के मंदिर गया इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। अपने देश में कई ऐसे लोग हैं जो ऐसे अवसरों पर मंदिर जाते हैं। अनेक लड़के और लड़कियों को  परीक्षा परिणाम में उत्तीर्ण होने पर मंदिर जाते देखा जा सकता है। किसी को लड़का हुआ है पत्नी अस्पताल में है तो पति पहले अपने इष्ट के मंदिर जाता है। कई लोग अकारण भी जाते हैं। मजे की बात यह है कि सांईबाबा के मंदिर जाने के बावजूद उस पिता ने  किसी से नहीं कहा कि ‘कोई चमत्कार हुआ है’, पर प्रचार माध्यम अपनी तरफ से अनेक बातें जैसे पहले जोड़ रहे थे अब भी जोड़ रहे हैं।</p>
<p>सांई बाबा के इस देश में करोड़ों  भक्त हैं। इन पंक्तियों का लेखक हर गुरूवार को सांईबाबा के मंदिर जाकर ध्यान लगाता है। उनका मूल  संदेश यही है कि ‘श्रद्धा और सब्र रखो जीवन में सारे काम होंगे।’ आशय यही है कि अपने अंदर परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते हुए उसका ध्यान करते हुए धीरज रखो सारे सांसरिक कार्य सहजता से हो जायेंगे। इसके बावजूद कुछ लोग उनके नाम पर चमत्कारों का प्रचार कर असहजता का वातावरण फैलाते हैं। सांईबाबा कहते हैं कि जीवन में  धीरज रखो पर  उनकी भक्ति का व्यवसायिक दोहन करने वाले कहते हैं कि आप दौड़ो उनके पीछे तो चमत्कार हो जायेगा। सांईबाबा के मंदिर में जाकर मैं जिस तरह के दृश्य देखता हूं तो मुझे अचंभा होता है कि लोग किस तरह उनके द्वारा दिये गये सहज रहने के संदेश की अवहेलना करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो सांईबाबा के श्रद्धा और सब्र के संदेश के मार्ग पर चलेगा वह आनंद से जीवन व्यतीत करेगा पर यह चमत्कार नहीं है बल्कि उनके संदेश के अनुसार अपने जीवन को सहजता से जीने का सहज परिणाम है। चमत्कार शब्द तो असहजता का भाव पैदा करते हैं।   </p>
<p>यह तो केवल एक घटना का उल्लेख भर किया गया है पर अनेक घटनायें ऐसी हैं जिनमें प्रचार माध्यम चमत्कार बनाकर अपने कार्यक्रमों को बेचते हैं। इस देश में ही श्रीगीता में निष्काम भाव से कार्य करने का संदेश दिया गया और यही वह देश है जिसमें सांसरिक कार्यों में सफलता के लिये चमत्कारों का  प्रचार किया जाता है। ऐसा विरोधाभास शायद ही कहीं देखने को मिले। चमत्कारों को नमस्कार करते हुए सहज भाव  का तिरस्कार करते हैं।<br />
......................</p>
<p>दीपक भारतदीप</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दखोजी और शब्दयोगी-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=434</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 17:02:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=434</guid>
<description><![CDATA[शब्दखोजी ने कहा
‘अब तो मैं नये शब्द रच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शब्दखोजी ने कहा<br />
‘अब तो मैं नये शब्द रचूंगा<br />
फिर कोई जोरदार  रचना करूंगा<br />
पुराने शब्द लिखते हुए अब<br />
मेरा मन नहीं भरता<br />
लिखने बैठता हूं तो<br />
रचना करने से पुराने शब्दों से<br />
पीछा छुड़ाने का मन करता<br />
कई नये शब्द गढ़ लूंगा<br />
फिर कोई अपनी भाषा के ग्रंथ का सृजन करूंगा<br />
जिससे मेरा नाम प्रसिद्ध हो जायेगा’</p>
<p>शब्दयोगी ने कहा<br />
‘खोज शब्द ही तुम्हें असहज बना देती है<br />
अपनी इच्छा ही आदमी को हरा देती है<br />
सहजत से रचना करने के लिये<br />
अपने कदम जब उठ जाते हैं<br />
शब्द अपने आप नया रूप गढ़ते हुए<br />
कागज पर उतर आते हैं<br />
लाखों लोग भी मिलकर बोलें तो<br />
कोई नया शब्द नही बन पाता है<br />
कोई एक सहजता से लिखे और बोले तो<br />
वही भाषा का हिस्सा बन जाता है<br />
कुछ शब्द छोटे करने या मिलाने से<br />
अर्थ तो बना लेते<br />
पर अपना सहज भाव गंवा देते<br />
रचना करने की पहले सोचना<br />
कोई शब्द खोजने की छोड़ो योजना<br />
क्या पता कोई लिख जाये शब्द ऐसा<br />
जिससे तुम और तुम्हारी रचना को<br />
अपने आप अमरत्व मिल जायेगा’<br />
...............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब टूटता है सन्नाटा-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=433</link>
<pubDate>Sun, 06 Jul 2008 14:32:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=433</guid>
<description><![CDATA[
जब जज्बातों में आता ठहराव
तब शब्द खाम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब जज्बातों में आता ठहराव</p>
<p>तब शब्द खामोश हो जाते</p>
<p>स्तब्ध मन </p>
<p>सन्नाटे में ताकता है</p>
<p>उस समय  न सोचना अच्छा लगता है</p>
<p>न बोलना</p>
<p>तब भी अंतर्मन समेटता है कई  ख्याल  वहां</p>
<p>वही अंदर बनाते हैं आशियाना</p>
<p>जिनमें रहते हुए शब्द होते हैं ताकतवर</p>
<p>जब टूटता है सन्नाटा</p>
<p>बहते चले जाते</p>
<p>कहीं कहानी तो कहीं कविता बन जाते<br />
.............................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका की पाठक संख्या 25 हजार के पार-विशेष संपादकीय]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=431</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 16:28:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=431</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग@पत्रिका पाठक संख्या 25 ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/nbwx2p.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />आज मेरा यह ब्लाग@पत्रिका पाठक संख्या 25 हजार पार कर गया। वेसे देखा जाये कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। अनेक ब्लाग लेखक इस संख्या को पहले ही पार चुके हैं पर और यह मेरा पहला ब्लाग है जो इस संख्या को पार कर गया है।</p>
<p>अंतर्जाल पर अपने ब्लाग/पत्रिका लिखना शुरू करते समय मुझे कोई ज्ञान नहीं था और आज भी केवल कार्यसाधक ज्ञान है पर मैंने जिस उद्देश्य के से यहां लिखना शुरू किया था उसकी तरफ यह मेरा पहला कदम है। अक्सर मेरे मित्र मुझसे पूछते हैं कि मैं अखबारों में क्यों नहीं लिखता तो मेरा कहना था कि ढेर सारी रचनायें भेजने के बाद अगर कोई एकाध छप जाती है तो उससे मेरे को संतोष नहीं होता। फिर आजकल ऐसे किस्से भी सुनने में आ रहे हैं कि स्थानीय स्तर पर ही छपने के लिये संपर्क होना जरूरी हैं।<br />
मेरा लिखने का उद्देश्य अपनी अभिव्यक्ति का व्यक्त करना है और उसमें प्रसिद्धि का मोह मुझे कभी नहीं रहा। मैं लोगों के बीच घुसा रहता हूं और वहां अपने लिये हमेशा ही अपने लिखने के विषय तलाशता हूं। कभी किसी को नहीं बताता कि मैं उनके अपनी कहानियां और व्यंग्य तलाश रहा हूं।</p>
<p>कुछ लोग कहते हैं कि अगर आप लेखक हैं तो आपको चालाक भी होना चािहए तभी आप पत्र-पत्रिकाओं में जगह पा सकते है। ऐसा मैं बरसों से सुनता आ रहा हूं पर अपने लिखने से कभी विरक्त नहीं हुआ। इसका मुझे नशा है और दूसरे नशों से बचने के लिये यही मेरे पास एक मार्ग है कि मैं लिखूं। इसमें भी एक बात है कि जैसा मैं लिखता हूं वैसा दिखता हूं। अपने जीवन में छल कपट से दूर रहा हूं पर पत्रकारिता के मेरे गुरू ने मुझे ऐसा ज्ञान दिया कि किसी की चालाकी मेरे से छिपती नहीं है। उन्होंने मुझसे कहा था कि कोई अगर तुम्हें तस्वीर दिखाता है तो तुम उसके पीछे जाकर देखो वह सच छिपाता है। लोग लिखते हैं और समझाते हैं मैं उनके पीछे देखता हूं। मैं नहीं भी चाहूं तो वह मुझे दिखाई देते हैं। फिर भी में सदा सकारात्मक पक्षों पर ही लिखता हूं। </p>
<p>हिंदी में लिखते बहुत हैं पर प्रभावी कितने हैं इसका फैसला समय करता है। मैं अपने लेखों को मौलिकता के साथ लिखता हूं। मैं किसी किताब से उद्धरण तभी लेता हूं जब आवश्यक हो। भाषा का अधिक ज्ञान नहीं है पर कथ्य की ताकत से वह ढक जाती है ऐसे मेरे मित्र मुझे कहते हैं। लिखने के बाद कभी उसका पीछा नहीं करता न साथ रखता हूं कि देखो मैंने यह लिखा है। अंतर्जाल पर लिखते हुए अधिक प्रसिद्धि नहीं मिली-किसी समाचार पत्र पत्रिका ने ध्यान नहीं दिया इसलिये ऐसा मानना गलत नहीं है-क्योंकि इस लायक अभी लिखा नहीं यह स्वयं भी मानता हूं। मैं जब तक हाथ से लिखकर टाईप नहीं करूंगा तब तक शायद अच्छा नहीं लिख पाऊंगा। बहरहाल प्रसिद्धि मिल जाने पर ऐसा ही करने का वादा करता हूं। अभी तक जिन ब्लाग लेखकों ने अपनी टिप्पणियां देकर मुझे लिखते रहने के लिये प्रेरित किया और जो पाठक अपने विचार भेजते हैं, उनको ही पूरा श्रेय देता हूं। प्रयास करूंगा कि आगे और बेहतर करने का प्रयास करूं। अपने ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों का इस अवसर पर आभारी हूं। यह औपचारिकता की वजह से नहीं लिख रहा क्योंकि जब भी मैं लिखता हूं तो दिल से लिखता हूं।</p>
<p>.......................<br />
<strong>दीपक भारतदीप<br />
लेखक एवं संपादक</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कीचड़ उछालने पर मिठाई  मिलेगी सोचा न था-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=430</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 13:13:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=430</guid>
<description><![CDATA[
ब्लागर साइकिल चलाता हुआ घर पहुंचा तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[
<p>ब्लागर साइकिल चलाता हुआ घर पहुंचा तो पत्नी ने उसे देखते ही पूछा-‘क्या कहीं कीचड़ में गिर गये थे जो शर्ट और पैंट पर इतने काले दाग लगे हैं।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘नहीं, बरसात की वजह से एक जगह सड़क पर पानी जमा था, उसके पास से निकल रहा था तो एक जीप वहां से तेजी से निकली और छींटे मेरे कपड़ों पर आकर गिरे।’<br />
पत्नी ने कहा-‘तो देखकर चला करो न! एक तो बरसात में कपड़े देर से सूखते हैं फिर तुम कभी भीग कर आते हो तो कभी  कारें वगैरह कीचड़ उड़ा जाती हैं। इधर उधर देखकर चला करो कि कहीं से कोई कार वगैरह आ रही हो तो दूर हो जाओ। बरसात में भी कहीं रुकते नहीं हो।’<br />
ब्लागर ने अपनी शर्ट टांगते हुए कहा-‘क्या करुं! जब कहीं रास्ते मे रुकने की जगह मिलेगी तभी तो रुकूंगा।’<br />
पत्नी ने चिढ़कर कहा-‘हां, कपड़े तो मुझे ही धोने पड़ते हैं।’</p>
<p>इतने में बाहर से आवाज आयी-‘भाई साहब, घर मेंे सही सलामत पहंुंच गये कि नहीं। उनके साथ बड़ा दर्दनाक हादसा पेश आया। देखकर  बहुत दुख हुआ।’<br />
वह दूसरा ब्लागर था। चूंकि अभी दरवाजा बंद नहीं किया गया था इसलिये वह बिना बाधा के पहले ब्लागर के पास तक पहुंच गया था। गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘कैसा हादसा? तो यह झूठ बोल रहे थे कि कोई जीप वाला कीचड़ के छींटे उड़ा गया था। साइकिल चलाते हुए भी कुछ सोच रहे होंगे। ध्यान कहीं दूसरी तरफ होगा इसलिये गिर गये।’<br />
नहीं! बिल्कुल नहीं!दूसरा ब्लागर बोला-‘भाई साहब कभी झूठ नहीं बोलते। वह सच कह रहे हैं क्योंकि उस जीप में मैं भी था। मेरे दोस्त की जीप थी। जब भाई साहब पर कीचड़ के छींटे उड़कर पहुंचे तो मुझे बहुत अफसोस हुआ। मैंने ड्रायवर से रुकने को कहा पर मेरा दोस्त नहीं माना। तब तक गाड़ी बहुत दूर निकल आयी फिर मेरा घर भी आया। पर मेरा मन नहीं माना। वैसे भाईसाहब एक जगह आज मिठाई और नमकीन खरीद रहे थे तब मैंने उनको देखा था। सोचा चलो आज अपने कृत्य की माफी भी मांग लूंगा और कुछ नाश्ता भी मिल जायेगा।’<br />
गृह स्वामिनी ने कहा-‘हां, आप बैठिये। अभी चाय और नमकीन लेकर आती हूं। घर में ही रखा है। यह मिठाई और नमकीन तो किसी को भिजवाने के लिये है, पर आपको थोड़ी निकाल देती हूं।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा‘-ज्यादा नहीं निकालना। एक दो टुकड़ा निकालकर देना  नहीं तो इतनी कम हो जायेगी कि जिसको भेज रहे हैं उसे संदेह हो जायेगा। हम पर नहीं उस पर जो इसे ले जा रहा है वहां देने!<br />
गृहस्वामिनी चली गयी तो पहले ब्लागर पेंट पहने ही, दूसरा ब्लागर जिस कुर्सी पर बैठा था उसके सामने ही रखी दूसरी कुर्सी पर बैठा और फिर उसके सामने झुकते हुए चेहरा उसके सामने लेजाते हुए बोला-‘ड्रायवर नहीं रुका या तुमने मना किया। शर्म आ रही थी या मेरे समर्थकों से पिटने का खतरा था। तुम्हें पता है उस बाजार में मुझे जानने वाले बहुत हैं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘वाह, क्या बात है। अंदर की बात कैसे समझ जाते हो, पर मैंने उसे पिटने के डर से नहीं बल्कि अपनी इज्जत बचाने के लिये कहा। मैं उतरता तो तुमसे बात करनी पड़ती। क्या कहता मेरा दोस्त मेरे बारे में कि साइकिल वाले से माफी मांग रहा है। फिर जब उसे पता पड़ता कि तुम भी एक ब्लागर हो तो मेरे प्रति जो ब्लागर होने का जो सम्मान है वह भी कम हो जाता। अरे, साइकिल चलाने वाले भी ब्लागर हो सकते हैं तो फिर कोई भी हो सकता है-यही वह सोचता न!<br />
गृहस्वामिनी आयी तो दूसरे ब्लागर ने अपना सुर बदल लिया-‘मुझे वाकई बहुत दुःख हुआ।’<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘अब यह तो होता ही रहता है। बरसात में सड़कों पर पानी जमा हो जाता है तो कई लोगों को ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है।’<br />
वह चार बनाने चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, भले ही एक टुकड़ा आया तो क्या हुआ? वैसे मैं सोच रहा था कि चलो आज मिठाई खाने को मिल जायेगी। इसलिये माफी का बहाना लेकर आया।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, मुझे पता है तुम इसलिये आये हो। मुझे अफसोस है तुम्हारी इच्छा वैसे पूरी नहीं हो सकी। तुम्हारे कीचड़ उछालने का गुस्सा यही सोचकर शांत हो गया।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘पर एक बात है दूसरे पर कीचड़ उछालकर मिठाई खाने को मिलती है तो कितना अच्छा लगता है। ऐसा कभी सोचा भी नहीं था।’<br />
पहला ब्लागर-‘बिना किसी पर कीचड़ उछाले पहले तुमने कभी मिठाई खाई है क्या?‘<br />
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?<br />
पहले ब्लागर ने कंधे उचकाये और कहा-‘मुझे नहीं मालुम? मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया।’<br />
इतने मे गृहस्वामिनी चाय ले आयी और बोली-‘मैं पड़ौसन की तबियत खराब है उसे देखने जा रही हूं। आप दोनों चाय पी लेना।’<br />
चाय पीते हुए दूसरा ब्लागर बोला-‘यह बात तुम अपने ब्लाग  पर नहीं लिखना कि एक ब्लागर ने दूसरे पर कीचड़ उछाला।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘बिल्कुल नहीं लिखूंगा। मुझे अपना सम्मान प्यारा है। यहां मेरा कोई सम्मान नहीं करता यह बात मैं कैसे लिख सकता हू।"<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘लिख भी लोगे तो क्या कर लोगे। वैसे तुम सज्जनता से एक रिपोर्ट लिख देना जिसमें हम दोनों का सौहार्द दिखता हो  जिसे पढ़कर लोग समझें कि देखो अनजाने में कीचड़ उछालने पर एक ब्लागर ने दूसरे से  कैसे माफी मांगी। कोई ब्लागर ऐसा कर सकता है। वैसे मैं माफी  नहीं मांगता तो तुम क्या कर लेते? पर मैंने मांगी ताकि तुम इस पर एक रिपोर्ट लिख सको।’<br />
वह जब जा रहा था तो पहले ब्लागर ने कहा-‘सुनो, अगली बार ऐसी गलती कर जाओ तो माफी मत मांगने आना। हर बार मिठाई मिलने की उम्मीद करना बेकार है। ऐसे संयोग रोज नहीं बनते।<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘दूसरी बार कोई संयोग बन जायेगा। तुम्हारे साथ नहीं किसी और के साथ ऐसा संयोग बन सकता है।<br />
पहले ब्लागर ने हंसते हुए कहा-‘क्या पूरी जिंदगी ऐसे संयोग के सहारे ही मिठाई खाते रहोगे। दूसरे पर कीचड़ उछालकर मिठाई खाने का इरादा हमेशा के लिये बना रहे हो। याद, रखना ऐसा संयोग तुम्हारे उलट भी हो सकता है।’<br />
वह चला गया। थोड़ी देर बार गृहस्वामिनी आयी और उसने पूछा-‘क्या बातचीत हुई। अब उस पर क्या लिख रहे हो?’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘कीचड़ उछालने पर मिठाई मिल सकती है यह सोचा भी न था।’<br />
गृहस्वामिनी ने आश्चर्य से पूछा-‘ऐसा उसने कहा?’<br />
पहला ब्लागर हंस पड़ा और बोला-‘ उसके बारे में ऐसा मत सोचो! यह मैं लिख रहा हूं।’<br />
...................................................<br />
दीपक भारतदीप</p>
<blockquote><p><strong>नोट-यह हास्य व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक आज तक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं मिला। </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानते नहीं तो फिर पत्थर क्यों उड़ाते-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 12:44:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=428</guid>
<description><![CDATA[
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नहीं मानेंगे<br />
पर भगवान के बुत उड़ाने पहुंच जाते<br />
जवाब नहीं देना इसलिये<br />
तोपों से गोले बरसाते<br />
जब नहीं मानते तो क्यों<br />
पत्थर पर बम बरसा रहे थे<br />
जब खौफ की भाषा बोल रहे थे तब<br />
ऐसे  सवाल भला कहां से आते</p>
<p>जो पत्थर के बुतों मे भगवान देखते<br />
वह भी भला जिंदगी को कहां समझ पाते<br />
कि कई सभी पत्थर ऐसा सम्मान नहीं पाते<br />
दिल में है अगर उसकी तस्वीर<br />
वही पत्थरों में भी नजर आती है<br />
वह श्रद्धा ही है जिसे हम वहां देख पाते<br />
मगर फिर भी पत्थर पूज<br />
कर लेते अपने कर्तव्य की इतिश्री<br />
फिर दया और धर्म से दूर हो जाते</p>
<p>विश्वास और पाखंड की जंग<br />
सदियों से जारी है<br />
कभी दिखती कम<br />
कभी होती भारी है<br />
नहीं जानते लोग धर्म का मर्म<br />
बाहर शोर मचाकर छिपते हैं अपने आप से<br />
अपने खाली दिल दिमाग में<br />
झांकते  ही आती उनको शर्म<br />
जहां  अज्ञान का अंधेरा है<br />
लालच का डेरा है<br />
अपनी नाकामियों से उपजे क्रोध ने<br />
उनको घेरा है<br />
पुरानी किताबों के अर्थ रहित प्रसंग<br />
नये जीवन का बनाते अपने अंग<br />
पत्थर टूटने से श्रद्धा नही टूटती जिनकी<br />
वही सर्वशक्तिमान को समझ पाते<br />
बुतों से खौफ खाने वाले<br />
इंसान भी बहुत हैं<br />
भले ही कहते उसमें नहीं देखते<br />
फिर क्यों तोड़ने जाते<br />
मन में रहता है खौफ या विश्वास<br />
जिन्होंने लगाई ज्ञान सागर में डुबकी<br />
वही भक्ति और सत्संग पाते<br />
तलवारों और तोपों की संगत वाले<br />
अपने हिस्से तो केवल खौफ ही पाते<br />
.................................<br />
यह कविता ब्लाग लेखक श्री अफलातून की कविता के आधार पर लिखी गयी और वहां पोस्ट करने के बाद यहां प्रस्तुत की गयी है।<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान -कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=427</link>
<pubDate>Wed, 25 Jun 2008 14:40:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=427</guid>
<description><![CDATA[पल रंग बदलती दुनियां में
रिश्ते भी बदल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पल रंग बदलती दुनियां में<br />
रिश्ते भी बदलते हैं रंंग<br />
जो सारी उमर साथ चलने का<br />
एलान करते सरेआम<br />
वह कभी नहीं चलते संग<br />
जिनसे फेरा होता है मूंह<br />
वही चल पड़ते है साथ<br />
निभाने लगते हैं बिना वादा किये<br />
चाहे होते है रास्ते तंग<br />
कोई शिकायत नहीं करते<br />
चलते है संग<br />
.....................................</p>
<p>किसी एक रंग पर मत दिल लगाना<br />
हर रंग को अपनी आंखें पर आजमाना<br />
किसी रंग का भरोसा नहीं फीका पड़ जाये<br />
जो फीका लगता संभव है वही जीवन चमकाये<br />
इंसानों के भी रंग होते हैं<br />
कभी उनके मन होतेे उजले तो<br />
कभी काले होते हैं<br />
इज्जत करते हैं जो दिखाने की<br />
करते हैं वही बदनाम<br />
कर जाते हैं अपने पैगाम देकर दिल खुश<br />
जो खुश्क जिंदगी जी रहे होते हैं<br />
बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान<br />
किसी एक पर मत दिल न लगाना<br />
.......................................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेल की बोगी में ज्ञान की किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=425</link>
<pubDate>Wed, 18 Jun 2008 15:14:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=425</guid>
<description><![CDATA[
वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली। </p>
<p>वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं।  अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।</p>
<p>बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया  और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का  मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।  </p>
<p>मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक  सेल्समेन ने<br />
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’</p>
<p>मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’</p>
<p>उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’ </p>
<p>मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’<br />
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’<br />
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’<br />
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’<br />
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’<br />
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’<br />
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’<br />
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’</p>
<p>रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ	 इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी  पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’<br />
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।</p>
<p>अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’<br />
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।</p>
<p>मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि  जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस  रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह औरत-कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=423</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 16:16:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=423</guid>
<description><![CDATA[दिन भर ईंट, पत्थर और
सीमेंट का मसाला-तस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिन भर ईंट, पत्थर और<br />
सीमेंट का मसाला-तस्सल सिर<br />
पर रखकर ढोती वह औरत<br />
रात्रि में प्लास्टिक की छत से ढंकी<br />
झौंपडी के बाहर आंगन में<br />
बबूल की लकड़ी से<br />
अग्नि जलाकर<br />
उस पर रोटी सेंकती वह औरत</p>
<p>सुबह चाय बनाते हुए<br />
अपने बच्चे को<br />
गोद में बैठाकर<br />
उसे बडे स्नेह से<br />
मुस्कान बिखेरती<br />
और दूध पिलाती वह औरत</p>
<p>अपने अनवरत संघर्ष से<br />
इस सृष्टी में जीवन को ही<br />
सहजता से जीवनदान देती<br />
चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती<br />
अपनी शक्ति और सामर्थ्य का<br />
प्रतीक है वह औरत<br />
कोई उसके दर्द को नहीं सहलाता<br />
उसकी तस्वीरें बाजार में बिकतीं हैं मंहगे भाव में<br />
सोच भी नहीं सकती वह औरत<br />
उसके दर्द का बयान करती हुई लिखी गयी कहानियां<br />
बनी कई फिल्में<br />
पाए उन्होने इनाम<br />
न ही बदली उसकी दिनचर्या न काम<br />
रोटी बनाना सुबह और शाम<br />
दिन में मजदूरी और फिर खाने के बाद थोडा आराम<br />
उसमें भी अपने ही जैसी औरतों को<br />
अपना दर्द सुनाकर खुश होने की कोशिश करती  वह औरत </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनोरंजन के नाम पर कुछ भी थोपा जा रहा है-आलेख ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=421</link>
<pubDate>Wed, 11 Jun 2008 15:59:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=421</guid>
<description><![CDATA[
दस साल की उस बालिका ने मुझसे कहा कि-‘ म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
दस साल की उस बालिका ने मुझसे कहा कि-‘ मुझे पुराने गाने बहुत अच्छे लगते  हैं। उसमें सब शब्द समझ में आते हैं, पर नये गाने तो बिल्कुल समझ में नहीं आते। उनमें बहुत शोर होता है।’</p>
<p>मैं उसे हैरानी से देखने लगा। उस समय मेरे रेडियो में एफ. एम. पर अमानुष फिल्म का गाना ‘दिल किसी ने मेरा ऐसा तोड़ा कि इक अमानुष बना कर छोड़ा’ आ रहा था। किशोर कुमार की आवाज में चल रहा गाना मेरे को अभिभूत किये दे रहा था। वह बालिका हमारे रिश्तेदार की है और दो दिन के लिये हमारे यहां रहने  आयी थी। उस समय वह कंप्यूटर पर गेम भी खेल रही थी और इस इंतजार में थी कि कब मैं उसे वहां से हटने के कहूं। मै पलंग पर बैठा अपनी किताबें उलट पलट रहा था। </p>
<p>मैंने उससे पूछा-‘तुमने इससे पहले भी पुराने गाने सुने हैं।<br />
वह बोली-‘हमारे घर में रेडियो नहीं है पर कई बार रास्ते में सुनने को मिलते हैैं तो अच्छे लगते हैं। उनमें एक-एक शब्द समझ में आता है। आजकल के गाने तो केवल शोर मचाते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता।’<br />
मैंने उसे कंप्यूटर खाली करने को कहा और फिर उससे पूछा-‘पर लोग तो आजकल ऐसे ही गाने सुनते हैं।’<br />
उसने कहा-‘अंकल, जब यह सुनने को मिल रहे हैं तो कोई क्या करे। आपके यहां मैं दो-तीन गाने सुन चुकीं हूं। सब अच्छे लगे।’</p>
<p>मैं कंप्यूटर पर कविताये लिखने लगा तो उसने कविता पढ़कर कहा-‘अरे वाह, आपकी कविताएं तो हमारे स्कूल की किताबों से अच्छी हैं। आपकी यह कवितायें   स्कूल की किताबों  में क्यों नही पढ़ाते?’</p>
<p>मै हंस पड़ा। वह शायद नहीं जानती कि यह संभव नहीं है। फिर मैंने उससे पूछा-‘ तुम्हारे साथ के बच्चे भी ऐसा ही महसूस करते हैं कि पुराने गाने ही अच्छे हैं।’<br />
वह बोली-‘हां, मेरी एक सहेली है उसके पापा को गाने सुनने का शौक है वह भी यही कहती है। बाकी बच्चों को शायद ऐसे गाने सुनने के लिये मिलते ही कहां होंगे? पर अगर यह सुनेंगे तो वह भी यही कहेंगे। सब आपकी तरह थोडे ही है कि गाने सुने। </p>
<p>यह कोई काल्पनिक घटना नहीं है। तब मैं सोच रहा था कि फिल्म वाले कहते हैं कि आजकल लोग यही पसंद कर रहे हैं इसलिये ऐसा हम कर रहे हैं। दरअसल फिल्म वाले अपनी ताकत जान गये है इसलिये वह जो चीज समाज में स्थापित करना चाहते हैं, कर लेते हैं। संगीत के नाम पर जब कोई नया गाना आता है तो सारे प्रसारण केंद्र उसे हाथों हाथ लेते हैं। लोगों के सामने जो आता है उस पर अधिक विचार नहीं करते। इसी कारण फिल्म वाले अपनी कमजोरियां भी छिपाने में सफल होते गये हैं। हिंदी फिल्मों में कहानी, संवाद और गाने के नाम पर क्या है, सभी जानते हैं। मगर कोई चारा नहीं है। कहते हैं कि बाजार का रुख उपभोक्ता तय करता है पर फिल्म के मामले में मुझे यह नियम कभी लागू होता नहीं दिखा। एकाधिकार के कारण वह अपने हिसाब से बाजार और उपभोक्ता को बाध्य करता है।<br />
मुझे याद है कि जब हम छोटे थे तब लोग कहते थे कि आजकल तो फिल्मों में गंदगी अधिक दिखाते हैं और उनके गाने भी बेकार है तब हंसते थे। वैसे भी जब किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, मन्ना डे का समय ऐसा था कि वह मघ्यम तेज गति के संगीत  पर भी अपने स्वर से शब्दों का जादू बिखेरते थे। इसलिये शायद हमें बचपन में पुरानी फिल्मों के गाने अच्छे नहीं लगते थे। संगीत की गति में भी इतना अंतर नहीं था। आजकल तो संगीत के नाम पर शोर है और शायद आजकल के गाने शादी विवाह में उन गीतों को बजवाने के लिए ही इतना तीव्र गति का संगीत देते हैं जो कान फाड़ देता है। फिर कहते हैं कि युवाओंं को पसंद है। सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्मों के आने के साथ उनको लोकप्रिय बनाने और फिर उसका फायदा उठाने के लिऐ ही नये गीतों को सब जगह चलाया जाता है और पुराने फिल्मी गीत केवल उनको ही याद रह पाते हैं जो उसमें हृदय से रुचि लेते हैं।  मैं एक से लेकर एक हजार तक गानों की वह सूची बना सकता हूं जो मुझे पंसद है पर और कोई यह नहीं करना चाहेगा क्योंकि नये गाने के शोर में शास्त्रीय संगीत और मध्यम गति के गीतों को जिन लोगों ने नहीं सुना भला  उसके कान क्या स्वाद जाने?</p>
<p>फिल्म वालों की एक कमजोरी है। वह किसी लेखक या कवि को वैसा सम्मान नहीं दे सकते जैसा वह अपने उद्योग से सबंधित अन्य विधा के पारंगत लोगों को देते हैं। इन फिल्म वालों पर ही अनेक लोगों की कहानियां और गाने चुराने के आरापे लगे हैं। कुछ गीतकारों पर तो यह आरोप भी लगे हैं कि वह गाने  किसी से लिखवाकर अपने नाम से दिखाते हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि प्रेमचंद तथा उन  जैसे कुछ प्रसिद्ध लेखक भी इस फिल्मी दुनियां से निराश होकर घर लौट गये। स्वतंत्रता के बाद जो भी बड़े लेखक हुए उनका फिल्म के गीत, पटकथा या कथा में कोई चचिर्त  अविस्मरणीय योगदान नहीं है यह इस बात का प्रमाण है कि फिल्मों की कहानी कभी समाज का हिस्सा नहीं बनती। यही हाल चैनलों का है। मेरे घर पर टीवी सास-बहु के कथित सीरियल देख रही उस बालिका से पूछा था कि-‘क्या उसकी चाची और ताई भी ऐसे ही आंखें तरेर कर बात करती हैं। क्या तुम्हारे  परिवार के सदस्य इस पात्रों से मेल खाते हैं?’</p>
<p>उसने  फट से जवाब दिया-‘नहीं! इनमें तो सब बकवास दिखाते हैं पर क्या करें यही देखने को मिलता है तो देख लेते हैं!</p>
<p>तब मैं सोच में पड़ गया कि ‘आखिर यह कैसा बाजार है जहां उपभोक्ता के हाथ में कोई सूत्र नहीं है। कहने को तो निर्माता निर्देशक कहते हैं कि हम वही दिखाते है जो समाज में होता है पर मेरा कहना है कि वह जैसा समाज को देखना चाहते हैं वैसी ही फिल्में बनाते हैं। आजकल यही चैनल वाले कर रहे हैं। फिल्मों का समाज पर जो प्रभाव है उसे कम आंकना गलत है क्योंकि अगर हम आत्म अवलोकन करें तो स्वयं भी अनुभव करेंगे कि कहीं न कहीं हमारी सोच इससे प्रभावित होती रही है। मनोरंजन के नाम पर इस देश के लोगों की मजबूरी उठाकर यहां के लोगों पर जो थोपा जा रहा है वह उसे पसंद नहीं करते पर इसके लिये वह कुछ कर भी नहीं सकते। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उसे ही प्यार करते हैं जो करीब होता है-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=420</link>
<pubDate>Tue, 10 Jun 2008 16:33:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यूं तो दिल सभी की देह में होता है
पर खुश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो दिल सभी की देह में होता है<br />
पर खुशनसीब होते हैं वह  जिनको<br />
जिंदगी में प्यार नसीब होता है</p>
<p>देखकर पर्दे पर चलचित्र  का प्यार<br />
नाचते गाते नायक-नायिका<br />
अपनी जिंदगी में वैसा ही सच देखनें के लिए<br />
कई  लोग तरस जाते है<br />
पर जमीन पर न कोई नायक होता न नायिका<br />
यहां बगीचों में जाकर घूमते हुए में भी<br />
पहरेदारों के डंडे  बरस जाते है<br />
हीरो बूढ़ा भी हो तो<br />
तो कमसिन मिल जाती है प्यार करने के लिए<br />
पर सच  में कोई कोई आंख उठाकर भी देख ले<br />
भला ऐसा भी कहां गरीब होता है</p>
<p>प्यार भरे गाने सुनते हुए बीत गये बरसों<br />
दिल की दिल में रह गयी<br />
इंतजार तो इंतजार ही रहा<br />
शायद कोई सच में नहीं प्यार करे<br />
तो दिल्लगी ही कर ले<br />
आज, कल या परसों<br />
परदे के चलचित्र से परे रहकर<br />
जब देखते हैं अपनी जिंदगी तो<br />
उसे ही प्यार करते हैं<br />
जो शरीर के करीब होता है<br />
फिर भी गीतों में झूम लेते हैं<br />
यही ख्याल करते हुए<br />
गीत-संगीत पर झूम सकते हैं<br />
यह भी किसी किसी का नसीब होता है</p>
<p>...................................</p>
<p>दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 16:20:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=418</guid>
<description><![CDATA[
मन भी एक कागज की तरह है
कई नाम लिख जाते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
मन भी एक कागज की तरह है<br />
कई नाम लिख जाते हैं<br />
धुंधलाने लगते हैं जब उसके रंग<br />
नये खाली पन्ने लिखने के लिए<br />
चले आते हैं<br />
ख्यालों का कारवां जैसे-जैसे बढता जाता है<br />
मन भी उसके साथ हो जाता है<br />
जिंदगी की राह में<br />
दूर तक साथ चलता है<br />
वही हमसफर हो जाता है<br />
मिलकर बिछड़ने वालों  के चेहरे भी<br />
मन की आंखों  से  धीरे-धीरे<br />
धुंधलाने नजर आने लग  जाते हैं</p>
<p>जिंदगी छोटी है पर<br />
आदमी के कदम भी कहां बड़े हैं<br />
रास्ते में भी कई इंसानी बुत खड़े हैं<br />
लगते हैं  सभी अपने जैसे<br />
पर नीयत का भरोसा करें कैसे<br />
जैसे हमारा ख्याल बदलता है<br />
दूसरों के मन भी बदल जाते हैं</p>
<p>सपने में मचलता हो<br />
या जागते हुए बहलता हो<br />
अपने मन का क्या भरोसा<br />
उस  पर काबू रखना होता है  कठिन<br />
फिर दूसरों के मन साफ होने की<br />
उम्मीद क्यों करते है<br />
यह मन ही है जिससे लोग<br />
अपनों से भी दूर हो जाते हैं<br />
जिंदगी के सफर में साथ चलने वाले<br />
कई लोग बेमन से साथ हो जाते हैं<br />
------------------------------<br />
दीपक भारतदीप<br />
 </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमने क्या बुरा किया-कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</link>
<pubDate>Sun, 08 Jun 2008 15:36:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=417</guid>
<description><![CDATA[जिनको अपना समझकर सच कहा
वह बेगाना समझन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिनको अपना समझकर सच कहा<br />
वह बेगाना समझने लगे<br />
जब तक उनकी लापरवाह अदाओं पर<br />
खामोश रहे<br />
उनको हम अच्छे लगे<br />
जो एक बार किया इशारा<br />
उनको संभल जाने का<br />
तब से मूंह फेरकर वह जाने लगे<br />
अजनबियों जैसे हो गये अब<br />
गैरों की तरह मिलने लगे<br />
सोचते हैं हमने सच कहकर क्या गलत किया<br />
गलत राह पर चलने के खतरे<br />
होते है बहुत<br />
अगर हमने उनको आगाह किया तो<br />
क्या बुरा किया<br />
वह चले जा रहे हैं फिर भी<br />
बस अब  हम से संभलकर चलने लगे<br />
..............................<br />
दीपक भारतदीप</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इंसान भी अब पालतू होते हैं-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 17:53:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=412</guid>
<description><![CDATA[कई चेहरे रोज दिखते हैं
पर फिर भी अनजान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कई चेहरे रोज दिखते हैं<br />
पर फिर भी अनजाने रह जाते हैं<br />
मिलते हैं रोज कई लोग यहां<br />
पर सभी अपनी महफिलों में आने के<br />
दावतनामे नहीं भिजवाते हैं</p>
<p>आते हैं कई खत हमारे दरवाजे पर<br />
लिखने वाले सभी अपने नहीं हो जाते हैं<br />
सस्ती है दोस्ती<br />
एक जाम पर दोस्त बदल जाते हैं<br />
बेदर्द जमाने में लोग<br />
क्या समझेंगे दिल के इशारे<br />
उनके दिल में तो चमकते पत्थरों के<br />
घर बस जाते हैं</p>
<p>सहारे की उम्मीद किससे करें<br />
मददगार कीमत बताए जाते हैं<br />
जिनकी आंखों पर  है दौलत का पर्दा<br />
वह किसी के बहते पसीने को<br />
भला क्या देख पायेंगे<br />
जिनके कान सुनते है शोर<br />
भला किसी बेसहारे की<br />
सिसकती आवाज कहां सुन पायेंगे<br />
जुबान जिनकी गिरवी है अपने आका के पास<br />
भला सच क्या कह पायेंगे<br />
आपने हाथों रखी है अपनी कलम गुलाम<br />
मालिक के इशारे के बिना<br />
किसका नाम लिख पायेंगे<br />
इंसान  भी  अब पालतू होते हैं<br />
जो अपना  सम्मान बेच आते हैं<br />
हर जगह अपने आका के नाम<br />
लिखते और गाते नजर आते हैं</p>
<p>....................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन के रोग का इलाज तो मन ही में है-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=409</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 07:22:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=409</guid>
<description><![CDATA[
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><br />
आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फिर भी उसकी मेरे से मित्रता बरसों पुरानी है। वह आर्केस्टा चलाता है। मैं  कई बार विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर उसका कार्यक्रम सुन चुका हूं। उसने कभी मुझे स्वयं इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि उसकी और मेरी मित्रता ऐसी भी नहीं रही। वह जब कहीं मिलता है तो उससे बड़ी आत्मीयता से बातचीत हेाती हैं। इस तरह  मेरे चार मित्र हैं जो रास्ते पर मिलते हैं और आत्मीय रूप से बातचीत कर अलग हो जाते हैं। यह आर्केस्ट्रा चलाने वाला मेरा मित्र कैसे बना यह तो मै भी नहीं जानता। हां, इतना याद है कि कुछ वर्ष पहले मैं अपनी एक रचना देने अखबार में गया तो वह वहीं काम से खड़ा था तब उसकी और मेरी बातचीत शुरू हुई। बाद में तो वह उस अखबार के दफ्तर में भी आता रहा जहां मैं काम करता था। </p>
<p>एक हिंदी फिल्म का गाना है। शायद पड़ौसन का! इक चतुर नार, बड़ी होशियार....................उस गाने को वह जिस तरह मंत्रमुग्ध ढंग से गाता है वह मन को छू लेता है। वह जब भी कहीं जाता है लोग इस गाने की फरमाइश अवश्य करते है।</p>
<p>उस दिन रास्ते चलते हुए उससे मुलाकात हुई। मुझसे कहने लगा-‘यार आजकल तो ऐसा लगता है कि अधिकतर लोगों को साइकिटिस (मनोचिकित्सक)की आवश्यकता हैं। आजकल लोग क्या बात करते हैं समझ में नहीं आता।’<br />
मनोचिकित्सक शब्द से मैं सतर्क हो गया। मैने उससे पूछा-‘क्या हुंआ।’<br />
वह बताने लगा कि-‘ ‘‘मैं अभी एक आदमी के घर उसके लड़के की शिकायत लेकर गया था। वह मेरे भाई से बेकार में लड़ता रहता है तो वह कहने लगा कि बचपन में उसके लड़के को सिर पर चोट लगी थी तो उसके दिमाग में खराबी पैदा हो गयी थी। अब बताओं भला ऐसा कहीं होता है। अच्छी तरह खाता पीता है, बात करता है। भला ऐसा कहीं ऐसा होता है’’?’<br />
मैंने कहा-‘‘पर उसने जब स्वयं कहा है तो होगा? वह अपने लड़के की इस कमजोरी को स्वयं ही मान रहा है क्या यही कम है।’<br />
उसने कहा-‘‘हां यह बात तो सही है। उस आदमी ने बरसों से स्कूटर तक नहीं चलाया। शायद यही वजह रही होगी, पर मैं उसे अकेले की बात नहीं कर रहा। ऐसा लगता है कि मांबाइल, कंप्यूटर और तथा अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग से अधिकतर  लोग कही मानसिक रोगों का शिकार तो नहीं हो रहे।’</p>
<p>मैंने हंसते हुए कहा-‘आप तो जानते हो कि किसी अन्य व्यक्ति को मनोरोगी बताकर मैं अपने को मनोरोगी घोषित नहीं करना चाहतां।’<br />
वह जोर से हंसा-‘अच्छा! याद आया! वही जो तुमने मानसिक चिकित्सालय के बोर्ड पर लिखी बातों का जिक्र किया था। हां, मैं भी सोचता हूं कि इस तरह दूसरों को मनोरोगी मानना छोड़ दूं।’</p>
<p>मेरा एक अन्य लेखक मित्र है और वह एक दिन मनोचिकित्सालय गया था। वहां उसने एक बोर्ड पढा, जिस पर दस प्रश्न लिखे थे। साथ ही यहा भी लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। मुझे वह सभी प्रश्न याद नहीं है पर जितने याद हैं उतने लिख देता हूं। उस लेखक मित्र की बेटी ने उसे ब्लाग तो बना दिया है पर उसने  अभी उस पर मेरे कहने के बावजूद लिखना शुरू नहीं किया। जब वह लिखेगा तो उससे कहूंगा कि वह दस के दस प्रश्न वैसे ही लिख दे। उनमें से जो प्रश्न मुझे याद हैं वह नीचे लिख देता हूं। </p>
<p>1.क्या आपको लगता है कि आप सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं पर बाकी सबका व्यवहार खराब है।<br />
2.क्या आपको लगता है कि आप हमेशा सही सोचते हैं बाकी लोग गलत सोचते है।<br />
3.क्या आपको लगता है कि आप दूसरों की सफलता देखकर खुश होते हैं और बाकी लोग आपकी सफलता या उपलब्धि से जलते है।<br />
4. आप दूसरों का भला करते हैं पर सभी लोग आपका बुरा करने पर आमादा होते है।<br />
5. क्या आपको लगता है कि आपकी नीयत अच्छी है  अन्य सभी लोगों की  खराब है।<br />
6.आप सबसे अच्छा काम करते हैं पर उसकी कोई सराहना नहीं करता जबकि दूसरों के खराब काम को भी आप सराहते है।</p>
<p>मैने जब अपने मित्र की बात सुनी तबसे अपने आपको यह यकीन दिलाने का प्रयास करता हूं कि मैं मनोरोगी नहीं हूं। कई बार जब तनाव के पल आते है तब मैं सोचता हूं कि कहीं मैं मनोरोगी तो नहीं हूं तक यह प्रश्न अपने मन में दोहरात हूं साथ ही यह उत्तर भी कि नहीं। ताकि मुझे यह न लगे कि मै मनोरोग का शिकार हो रहा हूं।<br />
अगर मैं कहीं ने लौटता हूं और मुझसे कोई पूछता है कि‘आपके साथ वहां कैसा व्यवहार हुआ?’<br />
बुरा भी हुआ हो तो मैं कहता हूं कि‘अच्छा हुआ’<br />
कोई पूछे-‘अमुक व्यक्ति कैसा है?’<br />
मैं कहता हूं-‘ठीक है?’<br />
अंतर्जाल पर कोई बात लिखते हुए  कई बार यह स्पष्ट लिख देता हूं कि मैं कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं हूं जो मेरे विचार में परिवर्तन की संभावना न हो। इसके साथ ही यह भी बता देता हूं कि अपने लिखे का अच्छे या बुरे न होने का भार मै अपने मस्तिष्क पर नहीं डालता।<br />
दूसरो का लिखा अगर समझ में न आये या अच्छा न लगे तब भी वहां नहीं लिखता कि यह ठीक नहीं है। सोचता हूं कि मुझे मुझे ठीक नहीं लगा तो क्या दूसरों को अच्छा लग सकता है। अगर किसी जगह प्रतिवाद स्वरूप टिप्पणी लिखनी तो जरूर लिखता हूं कि भई,  आपके विचार पर मेरा यह विचार है  परं और उससे पहले भी सोच लेता हूं कि वह बात इन प्रश्नों के दायरे ने बाहर है कि नहीं। प्रशंसा करना मनोरोग के दायरे में नहीं आता है पर आलोचना कहीं मनोरोग के प्रश्नों के दायरे में तो नहीं यह अवश्य देख लेता हूं।’</p>
<p>वैसे दूसरे क्या सोचते हैं यह अलग बात है। हां, अपने अंदर जरूर आजकल देखना चाहिए कि कहीं हम मनोरोग का शिकार तो नहीं हो रहे। हम जिस तरह विद्युतीय प्रवाह से चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं उसको देखकर मुझे लगता है कि हमारे अंदर मनोरोगों का होना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं डरा नहीं रहा हूं। हो सकता है कि शुरू में आप डर जायें पर एक बात याद रखें कि मनोरोगों की दवा भी मन में ही है और जब आप जान जायेंगे कि आप में उसका कोई अंश है तो बिना बताये अपना इलाज भी शुरू कर देंगे। जैसे मैंने अपने मित्र की बात सुनकर तय किया कि अब अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करूंगा और कोई करे तो उस  पर नाचूंगा नहीं।  किसी को अपने से कमतर नहीं बताऊंगा । अपनी वस्तु या पाठ को दूसरे के पाठ से श्रेष्ठ बताने का प्रयास से स्वयं परे रहूंगा। मन का इलाज मन से करने का प्रयास किया है अब सफल हुआ कि नहीं यह मुझे भी पता नहीं। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गिरने से पहले वह डालियां सीना तानकर खड़ी थीं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=408</link>
<pubDate>Thu, 15 May 2008 17:58:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=408</guid>
<description><![CDATA[ हम किसी बड़ी इमारत में ऐसी जगह बैठे है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> हम किसी बड़