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	<title>dohe &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/dohe/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "dohe"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 09:19:00 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[भृतहरि शतकःआजीविका कमाते हुए मनुष्य की जिंदगी चली जाती है]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=42</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 04:01:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=42</guid>
<description><![CDATA[
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं<br />
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः<br />
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां<br />
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ-परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हर मनुष्य को अपने जीविकोपार्जन के लिये कार्य करना पड़ता है पर वह केवल इससे संतुष्ट नहीं होता। उसने अनेक तरह के सामाजिक व्यवहारों की परंपरा बना ली है जिसके निर्वहन के लिये अधिक धन की आवश्यकता होती है। मनुष्य समुदाय ने कथित संस्कारों के नाम पर एक दूसरे मुफ्त में भोजन कराने के लिये ऐसे रीति रिवाजों की स्थापाना की है जिनको हरेक के लिये करना अनिवार्य हो गया है और जो नहीं करता उसका उपहास उड़ाया जाता है। अपने परिवार के भरण-पोषण करने के अलावा पूरे कथित समाज में सम्मान की चिंता करता हुआ आदमी पूरी जिंदगी केवल इसी में ही बिता देता है और कभी उसके पास भजन के लिये समय नहीं रह पाता। वह न तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर पाता है और न इस प्रकृति के विभिन्न रूपों को देख सकता है। बस अपना जीवन ढोता रहता है। अपने अंदर बौद्धिक गुणों का वह कभी उपयोग नहीं कर पाता। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:32:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरवाणीःमरने से  डरने वाले प्यार क्या करेंगे?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:20:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=155</guid>
<description><![CDATA[जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं<br />
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है। </p>
<p><strong>प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय<br />
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 02:45:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</guid>
<description><![CDATA[यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय 
ज्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय </strong><br />
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव<br />
कविवर रहीम कहते हैं की शरीर-रुपी बाजार में मन बिक गया, जैसे पानी में व्यक्ति का प्रतिबिबं पड़ने से जल के अन्दर समाहित व्यक्ति का शरीर वास्तविक नहीं होता. वह केवल परछाईं मात्र होता है,</p>
<p><strong>रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति<br />
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मांस खाने वाले राम को नहीं जानते]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=35</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 02:59:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=35</guid>
<description><![CDATA[काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष
निश्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष<br />
निश्चय राम न जानहीं, कहैं कबीर संदेस</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो पशु को मारकर उसकी देह काटा करते हैं वह सब पाखंडी हैं और भगवान श्री राम को नहीं जानते-यही मेरा संदेश है।</p>
<p><strong>बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल<br />
जो बकरी को खात है, तिनका कौन हवाल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो बकरी केवल घासी खाती है उसकी खाल खींच ली जाती है तो उन मनुष्यों का क्या हाल होता होगा जो बकरी का मांस खाते हैं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल समाज में मांस खाने का प्रचलन बढ़ रहा है और अंग्रेजी के आकर्षक नाम रखकर उसके खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं। सच तो यह है कि मांस भक्षण करने के लिये मनुष्य की देह उपयुक्त नहीं है और वर्तमान समय में हम देखें तो अनेक रोग इसी कारण फेल रहे हैं क्योंकि लोग गरिष्ठ भोजन कर रहे है।<br />
मांस खाने से शरीर में मांस बढ़ता है और इससे हमारी नसों में रक्त प्रवाह बाधित होता हैं। एक बात यह याद रखने योग्य है कि हम वैसा ही सोचते और बोलते है जैसे तत्व हमारे रक्त में हेाते हैं। इतना ही नहीं हमारी देह से वैसे ही गंध भी निकलती है जिसके अनुरूप दूसरे लोगों पर हमारा अच्छा प्रभाव पढ़ता है। यह बहुत सूक्ष्म ज्ञान है पर इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता। </p>
<p>अतः हमें अपना खान-पान में अधिक से अधिक सात्विकता रखनी चाहिए ताकि हमारे तन, मन और विचारों में पवित्रता रहे और लोगों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 04:02:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</guid>
<description><![CDATA[जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय<br />
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता। </p>
<p>जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार<br />
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार</p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=33</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 06:17:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार<br />
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य का शब्द हो उसी के अनुसार कार्य करो। इस संसार में कई ऐसे गुरू हैं जो पांखडी और प्रपंची होते हैं। वह अपने स्वार्थ के अनुसार कार्य करते हुए उपदेश देते हैं और उनसे कोई लाभ नहीं होता। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संबंध में मेरे द्वारा एक आलेख अन्य ब्लाग पर लिखा गया था जो यहां प्रस्तुत है। </p>
<p>आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं<br />
भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है। </p>
<p>भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.</p>
<p>भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं. </p>
<p>यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और अध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।'' </p>
<p>मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं। </p>
<p>एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 03:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस<br />
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।<br />
<strong>मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग<br />
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।</p>
<p>कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:प्रसन्नता देने वाले को कुछ न देने वाले पशु समान ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 03:37:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत<br />
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।<br />
<strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं। कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:काटने पर भी लकडी जहाज बनकर पार लगाती है]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=29</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 08:12:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=29</guid>
<description><![CDATA[तरुवर जड़ से काटिया, जबै तम्हारो जहाज
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तरुवर जड़ से काटिया, जबै तम्हारो जहाज<br />
तारे पर बोरे नहीं, बांह गाहे की लाज</p>
<p>संत कबीर दास जी कहते हैं कि लोग वृक्ष को जड़ से काट डालते हैं, परन्तु उस वृक्ष की लकडी का जब जहाज बन जाता है, तब भी वह काटने वाले को नदी-समुद्र से पार लगाता है शत्रु मानकर डुबाता नहीं है। सच है, बडे लोग बांह पकड़ने में लज्जा करते हैं। </p>
<p>आशय- संत कबीर दास जी कहते वृक्ष से बड़प्पन का गुण लेने की सलाह देते हैं। आदमी लकडी को बेरहमी से काट कर नाव बनाता है इसके बावजूद वह बदला लेने के लिए उसे सागर में नहीं डुबाती। इसी तरह सज्जन लोग किसी पर क्रोध प्रदर्शन न कर परहित के कार्य में लगे रहते हैं ।</p>
<p>कबीर विषधर बहु मिलै, मणिधर मिला न कोय<br />
विषधर को मणिधर मिलै, विष तजि अमृत होय</p>
<p>संत कबीर दास जी कहते हैं कि विषधर सर्प तो बहुत मिलते हैं पर मणि वाल सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाय तो विष मिटकर अमृत हो जाता है। </p>
<p>भावार्थ-कहते हैं कि जहाँ सांप ने काट लिया हो वहाँ मणि लगाने से विष निकल जाता है। वही मणि दूध में डाल कर पीया जाये उसका कोड भी दूर हो जाता है (हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है)। आशय यह है कि यहाँ बुर लोगों की संगत के कारण बुरी आदतें तो बहुत जल्दी आ जाती हैं पर अच्छे की संगत बहुत जल्दी नहीं मिल पाती है और अगर मिल जाये तो अपने आप ही अच्छे संस्कार विचार मन में आ जाते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:हाथी के मुहँ से गिरे दाने से चींटी पेट पालती है ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=27</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 06:42:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कुंजी मुख से कन गिरा, खुटै न वाको आहार
क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कुंजी मुख से कन गिरा, खुटै न वाको आहार<br />
कौड़ी कन लेकर चली, पोषन दे परिवार</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि खाते हुए हाथी के मुख से यदि अन्न का दाना गिर जाये तो उसके आहार पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर उसे चींटी ले जाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। इस तरह यह संसार दया भाव पर चलता है।<br />
<strong>भावे जाओ बादरी, भावै जावहु गया<br />
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब ते बड़ी दया</strong><br />
सन्त शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चाहे बद्रीनाथ जाओ या गया धाम, जहां अच्छा लगे वहां जाओं पर इस संसार में मन को प्रसन्न करने का केवल एक ही तरीका है कि दूसरे पर दया करो।<br />
<strong>जहां दया वहां धर्म है, जहां लोभ तहं पाप<br />
जहां क्रोध वहां काल है, वहां क्षमा वहां आप</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां दया है वहीं धर्म स्थित होता है और जहां लोभ है वहां पाप है। जहां क्रोध है वहां काल और जहां क्षमा है वहां परमात्मा का वास है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कबीर संदेशःअहंकार होता है पतन का कारण]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=28</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 06:36:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=28</guid>
<description><![CDATA[मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि
म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि<br />
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।<br />
<strong>तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय<br />
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।</p>
<p>इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट<br />
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट</p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।</p>
<p>व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Sant Kabir speech: relevant to interfere with a devotional]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 05:59:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=20</guid>
<description><![CDATA[inglish translation by googl tool

1.Sant Kabir G says that the head clean - clean water and clothes]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>inglish translation by googl tool</strong><br />
<strong><strong></strong></strong></p>
<p>1.Sant Kabir G says that the head clean - clean water and clothes to wear a life spent in the nut account. Without the devotional guru spent his life meaningless, are receiving death </p>
<p>2.Sant Kabir G says head of the world's increasing friendship with the people of God comes devotional doubleentry.xml.in.h obstacle. Ram sat in the privacy of a memorial should be relevant only if the sadhus, or can be devotional. </p>
<p>In the context of the current interpretation - devotional people have stressed from the noise are cosy. Temples and prayer houses of worship in the pattern of film songs to hear such people are dancing as if he were God's devotional. Groups in cities away by making statues in the temples of philosophy to go. While the show itself and others, is devotional, not on the mind of satisfaction. The devotional man's mind so that it will be received on such a crowded, noisy, the cosy God in vain to remember because our focus is not on the one hand remains. The fact is that in the privacy of devotional and meditation. Concentration will be the same as in the ideas of cleanliness and purity will. If we think that a fellow with us in this devotional, it became not possible. If a person is or will be with us much attention, and it will take devotional sense of concentration can not come. If we want God's peace of mind, the devotional met in art should try to privacy.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Rahim's couplets: arrogance of the small man's testimony]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=19</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 04:59:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=19</guid>
<description><![CDATA[inglish transleteshan by googl tool 
1.Rahim says that big man who is suffering more days, it can no]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>inglish transleteshan by googl tool </strong></p>
<p>1.Rahim says that big man who is suffering more days, it can not hide its prosperity because people have seen a decline in tolerance when his life is his grief to the people it takes to address it. So two out of elephant teeth come because he could not tolerate their hunger. </p>
<p>2.Rahim says that the big man his mouth sometimes do not boast their own people while the small show of arrogance. Like the first gooseberry mustard small but appears like a small mustard jackfruit ever is missing. </p>
<p>In the context of the current interpretation - is said that such a wealthy person does not show arrogance as the newly rich show. It appears that they are already naturally rich in the society honours is the newly wealthy are deprived of it because his deeds to his mastery of his deeds, and to use the property as a way to Others have not. </p>
<p>However, the big man is considered to be the same as that which best practice in the interest of society. In addition, he helps others. The heart of the same people who respect their work comes on the money, rank and power from rich people to get respect is to mock him and he is satisfied they are in arrogance. Today, all that money and place the condition of society are sitting on top of what the people of the dwarf character. He is not eligible to sit on top of that illusory when he sits on are, they have the arrogance of his power is. The people of character and integrity of the business, is the arrogance they do not go anywhere access to their properties because they are coming because even though there is respected everywhere.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार न सोचना विपत्तियों को बुलाना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=118</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 03:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=118</guid>
<description><![CDATA[

जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li>
<p align="left">जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
</li>
<li>
<p align="left">समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मुहँ में डाले तेल से आंखों देखा घी भला ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=135</link>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 03:08:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=135</guid>
<description><![CDATA[आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल
साधू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल<br />
साधू सों झगडा भला, ना साकट सों मेल</strong></p></blockquote>
<p>आंखों से देखा घी का दर्शन भी अच्छा है और तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं है। साधू-संतो से झगडा भी अच्छा है परन्तु निगुरा (जिसका कोई गुरू नहीं है) से मेल-मिलाप कदापि अच्छा नहीं है, क्योंकि साधू से झगडा होने पर निर्णय अच्छा हो सकता है पर निगुरे से मेल-मिलाप कभी भी फलदायी नहीं हो सकता। </p>
<blockquote><p><strong>सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय<br />
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय</strong></p></blockquote>
<p>संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वेलेंटाइन डे और भारतीय संस्कृति-hindi article]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 15:05:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</guid>
<description><![CDATA[कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर के अनुसार सऊदी अरब में वेलेंटाइन डे पर उसे मनाने से रोकने के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए-गुलाब के फूलों की बिक्री रोकी गयी और लाल रंग के कागज़ के रैपर में उपहार बेचने पर पाबंदी लगाई गयी. हमारे देश में भी कई लोग इसका विरोध करते हैं और उसे रोकने के लिए वह उपाय करते हैं जो मेरे विचार से अनुचित है. वेलेंटाइन डे पर कल मैंने दो हास्य कवितायेँ लिखीं थी और मैं इसका विरोध या समर्थन करने की बजाय इसकी उपेक्षा करने का पक्षधर रहा हूँ. मेरे लिए इसे मनाने वाले हंसी के  पात्र हैं एक तरह से प्यार का ऐसा नाटक करते हैं जिसके बारे में वह खुद नहीं जानते. </p>
<p>मैं इस बात के विरुद्ध हूँ कि किसी को ऐसे कार्य से जबरदस्ती रोका जाये जिससे  किसी दूसरे को कोई हानि होती है. स्पष्टत: मैं वेलेंटाइन डे का पक्षधर नहीं हूँ और कभी-कभी तो लगता है कि इसके विरोधियों ने ही इसको प्रोत्साहन दिया है. यह पांचवां  वर्ष है जब इसे इतने जोश-खरोश से मनाया गया. इससे पहले क्यों नहीं मनाया जाता था? साफ है कि इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों को रोज कुछ न कुछ  कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रचार करते हैं. होटलों और अन्य व्यवसायिक स्थानों पर युवा-युवतियों की  भीड़ जाती है. पार्क और अन्य एकांत स्थान पर जब खतरे की आशंका देखते हैं तो वह पैसा खर्च करते हैं. आखिर उसका फायदा किसे होता है?<br />
हमारे में से कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने आज से दस वर्ष पूर्व वेलेंटाइन डे का नाम भी सुना हो. अब उसका समर्थन और विरोध अजीब लगता है. जहाँ तक देश की संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मुझे जबरन विरोध कोई तरीका नजर नहीं आता. इससे तो उसे प्रचार ही मिलता है. फिर आम आदमी जो इसे नहीं जानता वह भी इसका नाम लेता है. कई लोगों ने इसका आपसी चर्चा में जिक्र किया और मैंने सुना. मुझे लगता है कि इस तरह इसे और प्रचार मिला. </p>
<p>जहाँ तक संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मैं इसे भी वाद और नारों में लिपटे शब्दों की तरह देखता हूँ. आप यह कह सकते हैं कि मैं हर विषय पर वाद और नारों से जुडे होने की बात क्यों लिखता हूँ. तो जनाब आप  बताईये कि बच्चों को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का काम किसे करना चाहिऐ-माता-पिता को ही न! इस तरह जबरन विरोध कर आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि कुछ लोग हैं जो इस काम में नाकाम रहे हैं. दूसरी बात आखिर संस्कारों और संस्कृति का व्यापक रूप लोगों के दिमाग में क्या है यह आज तक कोई नहीं बताया. बस बचाना है और शुरू हो जाते हैं. आखिर इसकी उपेक्षा क्यों नहीं कर देते. एक दिन के विरोध से क्या हम समाज में जो नैतिकता का पतन हुआ है उसे बचा सकते हैं? कतई नहीं, क्योंकि हम अपने समाज के उस खोखलेपन को नहीं देख रहे जो इसे ध्वस्त किये दे रहा है. देश में कन्या के भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं पर उसमें  कामयाबी नहीं मिल रही है. जिस दहेज़ प्रथा को हम सामान्य मानते हैं उससे जो विकृति आई है उस पर कभी किसी ने सोचा है?इसने समाज को बहुत बुरी तरह खोखला कर दिया है. </p>
<p>हम सऊदी अरब द्वारा लगाए प्रतिबन्ध की बात करें. वहाँ कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहाँ  भी इस बीमारी ने अपने कदम रखे हैं तो इसका सीधा मतलब यही है कि बाजार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पूंजीवर्ग के सदस्य  ही विजय श्री प्राप्त करते  है. इस प्रसंग में एक बात जो महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब में  एक धार्मिक राज्य होते हुए भी वहाँ क्यों लोग इसके प्रति आकर्षित हुए? विश्व में उदारीकरण के नाम पर  बाजार के ताकतवर लोगों के द्वार सब जगह खुले हैं पर आम आदमी के लिए नहीं. इसलिए बाजार की व्यवस्था वह सब परंपराएं और विचार लेकर आगे बढ़ रही है जो उसके लिए आय के स्त्रोत बना सकते हैं.<br />
इसका मुकाबला करना है तो उसके लिए उन लोगों को खुद दृढ़ हो होना पडेगा जिन पर अपने बच्चों पर संस्कार डालने की जिम्मेदारी है. अपने घर और बाहर अपने बच्चों को अपने आध्यात्म से अवगत कराये बिना उनको ऐसे  हास्यास्पद काम से दूर नहीं रखा जा सकता. सुबह और शाम आरती जो लोग पहले करते थे उसे फिजूल मानकर अब छोड़ दिया गया है पर आदमी के मन में संस्कार भरने का काम उसके  द्वारा किया जाता था वह अनमोल था.  कभी बच्चे को मंदिर ले जाया जाता था तो कभी तीज-त्यौहार   पर बडों के चरण स्पर्श कराये जाते थे. अब सब बातें  छोड़ उसे अपना काम सिद्ध करने का ज्ञान दिया जाता है और फिर जब वह छोड़ कर बाहर चला जाता है तो अकेलेपन के साथ केवल उसकी यादें रह जातीं हैं. </p>
<p>संस्कारों और संस्कृति के नाम पर वह फसल हम लहलहाते देखना चाहते हैं जिसके बीज हमें बोये ही नहीं. आखिर हमारे संस्कारों और संस्कृति की कौनसी ऐसी फसल खड़ी है जिसे बचाने के लिए हम हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं. अपने आध्यात्म से परे होकर हमें ऐसी आशा नहीं करना चाहिए. याद रखना पूरी दुनिया भारत की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा मानती है पर अपने देश में कितने लोग उससे परिचित हैं इस पर विचार करना चाहिए. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:ज्ञान रुपी हाथी की सवारी कीजिए, भौंकने पर ध्यान न  दीजिये]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:29:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=124</guid>
<description><![CDATA[हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार
श्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार<br />
श्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की ज्ञान रूपी हाथी पर सहज भाव से दुलीचा डालकर उस पर सवारी कीजिए और संसार के दुष्ट पुरुषों को कुत्ते की तरह भोंकने दीजिये, उनकी पवाह मत करिये. </p>
<p><strong>कहते को कहि जान दे, गुरु की सीख तू लेय<br />
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोग आलोचना और निंदा करते हैं और उनकी परवाह नहीं करना चाहिऐ. अपने गुरु की शिक्षा लेकर उस पर चलना चाहिऐ और कुछ दुष्ट लोग अगर निंदा करते हैं तो उनके भोंकने पर जवाब नहीं देना चाहिऐ. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जिसके साथ दिखें  चेले उसी को संत समझ लेते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=87</link>
<pubDate>Sat, 09 Feb 2008 04:17:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=87</guid>
<description><![CDATA[बाहर राम क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाहर राम क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम<br />
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम</strong> </p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दिखावटी रूप से राम का भजन करने से कोई लाभ नहीं होता. राम का स्मरण हृदय से करो. इस संसार में तुम्हारा  क्या काम है तुम्हें तो भगवान का स्मरण मन में करना चाहिऐ. </p>
<p><strong>फूटी आँख विवेक की, लखें न संत असतं<br />
जिसके संग दस बीच हैं, ताको नाम महंत</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जिन लोगों की ज्ञान और विवेक नष्ट हो गये है वह सज्जन और दुर्जन का अन्तर नहीं बता सकता है और सांसरिक मनुष्य जिसके साथ दस-बीस चेले देख लेता है वह उसको ही महंत समझा करता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:सज्जन सौ बार रूठे तो भी मनाएं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=119</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 04:14:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=119</guid>
<description><![CDATA[जैसी जाकी बुद्धि है, तैसे कहैं बनाय
ता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जैसी जाकी बुद्धि है, तैसे कहैं बनाय<br />
ताकौं बुरो न मानी, लें कहाँ सो जाय </p>
<p>कविवर रहीम  जी कहते हैं कि जिस मनुष्य की जैसी बुद्धि है वह उसके अनुरूप ही तो काम करता है। उस मनुष्य का बुरा मत मानिए क्योंकि वह और बुद्धि कहाँ लेने जायेगा। </p>
<p>टूटे सुजन मनाइये, जौ टूटे सौ बार<br />
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार<br />
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार सच्चे मोतियों का हार टूट जाने पर बार-बार पिरोया जाता है, उसी प्रकार यदि सज्जन सौ बार भी नाराज हो जाएं तो भी उन्हें सौ बार ही मना लेना चाहिऐ क्योंकि वह मोतियों की तरह मूल्यवान होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:बिना देह के कौतुक देखा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=84</link>
<pubDate>Wed, 06 Feb 2008 04:06:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=84</guid>
<description><![CDATA[गुरु मिले शीतल भया, मिति मोह तन पाया
नि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गुरु मिले शीतल भया, मिति मोह तन पाया<br />
निशि वासर सुख निधि लहूँ, अन्तर प्रगटे आप</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की सदगुरु मिले तो मन में शीतलता  आ गई और तन और मन का जो मोह था वह मिट गया. हृदय में परमात्मा प्रगट हो गए और दिन-रात  का हर पल सुखमय हो गया</p>
<p><strong>कौतुक देखा देह बिन, रवि शशि बिना उजास<br />
साहिब सेवा माहिं हैं, बेपरवाही दास </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बिना देह ऐसा महान आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखा की वहाँ पर सूर्य-चंद्रमा के बिना ही उजाला है. उस स्थिति में वहाँ साहेब परमात्मा के सेवा में भक्त बेपरवाह होकर लगे हुए हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:कल्पित उपासना से कौन जीव बचेगा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=82</link>
<pubDate>Tue, 05 Feb 2008 04:06:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=82</guid>
<description><![CDATA[राजा  की चोरी करे, रहै रंग की ओट
कहैं कब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>राजा  की चोरी करे, रहै रंग की ओट<br />
कहैं कबीर क्यों उबरै, काल कठिन की चोट</strong> </p>
<p>संत शिरोमणि  कबीरदास जी कहते हैं कि  कोई राजा के घर से चोरी करके दरिद्र की शरण लेकर बचना चाहे तो कैसे बचेगा? इस तरह सदगुरू से मुहँ छिपाकर और कल्पित देवी-देवताओं की शरण लेकर कल्पना की कठिन चोट से जीव कैसे बचेगा. </p>
<p><strong>सुनिए सन्तों साधू मिलि, कहहिं कबीर बुझाय<br />
जेहि विधि गुरु सों प्रीती छै कीजै सोई उपाय </strong></p>
<p>संत शिरोमणि  कबीरदास जी कहते हैं कि साधू और सन्तों सब मिलकर सुनो जिस तरह गुरु से दृढ़ प्रेम हो वही उपाय करो. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:जहाँ ईर्ष्या की गाँठ है वहाँ आनंद रस नहीं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=115</link>
<pubDate>Sat, 02 Feb 2008 04:26:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=115</guid>
<description><![CDATA[जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय
मं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय<br />
मंड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि यह संसार खोजकर देख लिया है, जहाँ परस्पर ईर्ष्या आदि की गाँठ है, वहाँ आनंद नहीं है. महुए के पेड़ की प्रत्येक गाँठ में रस  ही रस होता है वे परस्पर जुडी होतीं हैं. </p>
<p><strong><strong>जलहिं मिले रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर<br />
अंगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर</strong></strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बन जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:चतुर को चूकने की कसक होती हैं .]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=76</link>
<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 04:15:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=76</guid>
<description><![CDATA[रहिमन कुटिल कुठार ज्यों, करि डारत द्वै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन कुटिल कुठार ज्यों, करि डारत द्वै टूक<br />
चतुरन  के कसक्त रहे समय चूक की हूक </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की जैसे कठोर कुल्हाड़ी लकडी के दो टुकड़े कर देती है, उसी प्रकार चतुर  व्यक्तियों के समय पर चूक जाने से हृदय में कसक बनी रहती हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:जब फसल घर आये तभी उसे अपनी समझो]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=113</link>
<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 04:06:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पकी कहती देखि के, गरब किया किसान
अजहूँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पकी कहती देखि के, गरब किया किसान<br />
अजहूँ झोला बहुत हैं, घर आवै तब जान</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की फसल को तैयार देखकर किसान खुशी से फूला नहीं समाता. उसे  अत्यंत अभिमानी हो जाता. परतु यह उसका भ्रम है क्योंकि उसके बाद भी बहुत परेशानियाँ होतीं हैं  और जब वह कटकर घर आ जाये तभी उसे अपनी समझना चाहिए  </p>
<p><strong>पांच तत्व का पुतरा, मानुष धरिया नाम<br />
दिन चार के कारने, फिर फिर  रोके ठाम</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की यह देह रूपी पुतला पांच तत्वों से निर्मित है जिसका मनुष्य नाम रखा दिया है. चार दिन के क्षणिक भोगों के कारण इस जीव ने अपनी मुक्ति का रास्ता स्वयं ही बंद कर रखा है.</p>
]]></content:encoded>
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