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दिल्ली में ’गर्ल’-फ्रेंडः एक बेफिक्री सी लड़की

जिंदगी सिगरेट के धुंए सी लगने लगी है, जब से उसे पीते हुए देखा है। मैंने कभी नहीं पी, मन जरूर हुआ लेकिन मन को मना लिया। दिल्ली आया था बड़े अरमान लेकर कुछ पूरे हुए कुछ अभी भी अधूरे हैं। आने से पहले सोचा था कि दिल्ली में एक गर्लफ्रेंड होगी जिसके साथ थोड़ी ऐश होगी। गर्लफ्रेंड तो नहीं मिली लेकिन एक गर्ल जरूर मिली जो बेहतरीन फ्रेंड बन गई। वो हमेशा कहती है तुम मुझे एकदम बच्चे जैसे लगते हो। सही तो कहती है। हालांकि है तो हमउम्र ही लेकिन उसके सोचने, समझने, लिखने-पढ़ने का अंदाज का कुछ ऐसा है कि मुझे वाकई उसकी बात में सच्चाई का अक्स दिखता है।

पिछले कुछ महीनों से उसका साथ काफी सुकून वाला हो गया है। उसके साथ में कुछ अपनापन सा है। उठते बैठते खाते पीते हर जगह एक लगाव सा है। ये प्यार नहीं है ना ही आकर्षण।

लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं बन सकते? जिसने भी कहा मैं उसे पागल समझता हूं। कभी सोचा नहीं था कि ऐसी भी कोई दोस्त बन सकती है मेरी। कुछ तो बात है उसमें जो वो दूसरों से अलग है। हर बार हमेशा कुछ नया बताने और सिखाने की आदत हो, या हमेशा मजे लेने वाला अंदाज सब कुछ कितना बेहतरीन है। हर बात खुलकर बोलना, अच्छा बुरा चाहे जो भी हो जैसा भी हो हर बात पर बात करना। जब बात करने या मिलने का मन नहीं होता तो बेहद शांत सी आवाज आती है, अभी बहुत बुरे मूड में हूं। बाद में फोन करती हूं।

पहली बार कोई दोस्त ऐसा मिला है जो किसी और का गुस्सा मुझ पर नहीं उतारता। वरना कुछ लोग तो ऐसे चिल्लाते हैं मानों मैंने ही उनका सब कुछ सत्यानाश कर दिया हो। एक शाम ऑफिस से निकलकर मार्केट गया तो साथ लौटते वक्त उसने कहा कि सिगरेट ले लेते हैं; मुझे पीने का मन कर रहा है। मैंने कुछ नहीं कहा। जब कमरे में बैठकर उसने सिगरेट पीते हुए धुआं उड़ाया तो लगा कि जिंदगी वाकई ऐसी ही होनी चाहिए इस धुएं की तरह एकदम बेफिकर, बेपरवाह। जिधर मुड़ना है मुड़ो, जिधर उड़ना है उडो़। तुम्हारी इस बेफिक्री से कुछ लोग जलेंगे, मुंह बनाएंगे, जिसे जैसा करना है करे लेकिन तुम इस धुएं की तरह ही आजाद बनकर उड़ो।

आधी रात को सुनसान सड़क पर चलते हुए यही खयाल बार-बार मन में आ रहा था। सोच रहा था कि कभी सोचा नहीं था ऐसी किसी लड़की से दोस्ती होगी। जो इतना खुलकर जीती होगी। बहुत से दोस्त हैं उसके। कइयों को मैं भी जानता हूं, कुछ को नाम से कुछ को चेहरे से। अक्सर बातें करते हैं दोस्तों की तो नाम आ ही जाते हैं और नाम के साथ उनसे जुड़ी बातें भी।

किसी को कविता पसंद है तो कोई कहानी पसंद करता है। जब भी उससे बात करता हूं तो लगता है कि उसके दोस्तों के बीच में मैं इकलौता ऐसा हूं जिसे किताब खत्म करते ही उसके लेखक का नाम भूल जाता है। शायद इसीलिए वो कहती है कि मैं अभी बच्चा हूं। बस एक आदत मिलती है हमारी। फिल्मों के नाम और उनके एक्टर डायरेक्टर पल भर में हमारे दिमाग से छूमंतर हो जाते हैं।

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