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	<title>chikitsa &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/chikitsa/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "chikitsa"</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 11:19:04 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[उपभोक्तावाद का परिष्कार या निसर्गोपचार ?]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=303</link>
<pubDate>Thu, 26 Jun 2008 06:29:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपनी जड़ें जमाने के बाद उपभोक्तावाद को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी जड़ें जमाने के बाद उपभोक्तावाद को नफ़ीस बनाने की माँग व्यापक होने लगती है । यूरोप और अमेरिका में सशक्त बन चुका उपभोक्ता आन्दोलन अक्सर सेहत और नैतिकता से जुड़े सवाल कारगार ढंग से उठाता है । पश्चिम के पर्यावरणवादी आन्दोलन में भी यूरोपवासियों की यह चिन्ता मुख्य है - 'प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंडारों से हमारा दिन पर दिन बढ़ता उपभोग सीमित न होने पाए और अधिक दिन तक उपभोग के लिए हम बचे रहें '। रासायनिक खाद के बिना पैदा किए गए अनाज और फलों की अच्छी खासी माँग इन अमीर देशों में पैदा हुई है - उपभोक्तावाद का परिष्कार ! उनकी उपभोक्तावाद और पर्यावरण की चिन्ताएं गरीब मुल्कों में बढ़ रही भूखमरी और गैरबराबरी का समाधान नहीं ढूंढती हैं ।</p>
<p>    <strong>राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान गांधीजी सिर्फ संघर्ष के कार्यक्रम नहीं चलाते थे । इन संघर्षों के लिए आवश्यक ताकत पैदा करने वाले रचना के काम भी चलाते थे । यह रचनात्मक काम वैकल्पिक समाज के सपने का अक्स भी प्रस्तुत करते थे। निसर्गोपचार या प्राकृतिक चिकित्सा के उनके प्रयोगों के पीछे भी ऐसा विप्लवी ख्वाब रहा होगा। </strong></p>
<p>    मेरी पत्नी डॉ. स्वाति के इस वर्ष के ग्रीष्मावकाश के दौरान गांधी-विनोबा की धारा के एक वरिष्ट कार्यकर्ता जगदीश शाह द्वारा वडोदरा के निकट गोत्री में स्थापित 'विनोबा आश्रम' के निसर्गोपचार केन्द्र में बतौर 'दर्दी' (मरीज) आठ दिन रहने का मौका मिला ।</p>
<p>    गोत्री गाँव की ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पास कर तीन रुपए में तीन एकड़ जमीन इस आश्रम के लिए दी थी । अब गोत्री वडोदरा नगर पालिका का हिस्सा है और पुराने गोत्री गाँव से जुड़ा सिर्फ़ एक परिवार( रमेश भाई का) आश्रम का हिस्सा है । निसर्गोपचार केन्द्र व्यावसायिक आधार पर चलाया जा रहा है । केन्द्र की एक <a href="http://naturecure.cfsites.org/" target="_blank">वेबसाइट</a> भी है । आर्थिक आधार पर दी जाने वाली रियायत के नाम पर सर्वोदयी कार्यकर्ता , नेता और उनके स्वजन मुफ़्त चिकित्सा पाते हैं । मेरे बाप , बहन और भान्जी इस छूट का लाभ उठा चुके थे और उनके अनुभव सुनने के बाद हमने ( मैं और स्वाति) वहाँ जाने का निर्णय लिया ।</p>
<p>    जगदीश शाह बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस केन्द्र में उपचार के लिए एडवान्स बुकिंग हो जा रही है । अनिवासी गुजराती और उच्च मध्यम वर्गीय यहाँ इस चिकित्सा का लाभ ले रहे हैं । गुजरात विद्यापीठ द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा के डिप्लोमा के छात्र/छात्राएं यहाँ महीना भर 'इन्टर्नशिप' करते हैं । मुख्य उपचार विधियों को संचालित करने में यह बच्चे काम आ जाते हैं ।</p>
<p>    <strong>यह चिकित्सा विधि निश्चित ही मुख्यधारा से अलग है परन्तु जब तक आम आदमी इसे जीवन पद्धति के रूप में नहीं अपना पाता इसे वैकल्पिक चिकित्सा कहना उचित न होगा । ऐसे में यह प्रयोग 'परिष्कृत उपभोक्तावाद' को बढ़ावा देने वाला व्यवसाय ही होगा ।</strong></p>
<p>   इस केन्द्र में १२०० से ३००० रुपए प्रतिमा पाने वाले कर्मचारियों की फौज है जो रसोई , उपचार केन्द्र , मरीजों के रहने के स्थान और खेत बगीचे में काम करते हैं । उपचार का मुख्य आधार 'आहार - सुधार' है । सिर्फ़ पानी , सिर्फ़ रसाहार और सिर्फ़ फलाहार आहार के तीन प्रकार हैं । कटि स्नान ,वाष्प स्नान , मट्टी लेप , मालिश,एनिमा और योगासन के प्रशिक्षक और सहायक प्रशिक्षित और सेवा भाव से ओत प्रोत हैं । इनमें से कई कर्मचार कम दरमाह के कारण बाकी समय में ऑटो रिक्शा चलाना,ट्रैवेल एजेन्सी से जुड़ने जैसे काम करते हैं ।</p>
<p>    आठ दिन यहाँ रहकर हमने योगासन से जुड़ी कुछ सूक्ष्म क्रियाएं और आसन सीखे , पाँच - पाँच किलो वजन घटाया और घर लौट कर आहार-परिवर्तन का मन बनाया । दो लोगों का खर्च करीब पाँच हजार रुपए आया। कुछ बीमारियाँ भी समाप्त हो गयी हों तो अचरज नहीं होगा।</p>
<p>  ऐसे केन्द्र जब तक सरकारी नीति का हिस्सा नहीं बनते तब तक यह आम आदमी की पहुँच से बाहर रहेंगे तथा हमारे जैसे मध्य वर्गीय परिवारों के उपभोक्तावाद को 'परिष्कृत' करने की दुकान बने रहेंगे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (५) : अफ़लातून ]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=294</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 09:33:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[      गांधी जी और कांग्रेस ने दूसरी गोल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">      गांधी जी और कांग्रेस ने दूसरी गोलमेज वार्ता के बाद पहली बार डॉ. अम्बेडकर को दलितों के प्रतिनिधियों के रूप में मान्यता दी । इसी लिए पूना करार में डॉ. अम्बेडकर को एक पक्ष बनाया गया । ये दोनों विभूतियाँ दलित समस्या के प्रति एक दूसरे के दृष्टिकोण से अच्छी तरह वाकिफ़ थीं । यरवदा जेल में कार्यकर्ताओं से बातचीत में गांधी जी ने स्पष्ट शब्दों में इन मतभेदों को प्रकट किया है । ' प्रधानमन्त्री के खिलाफ यह लड़ाई ( पृथक निर्वाचन के विरुद्ध उपवास ) न की होती , तो हिन्दू धर्म का खात्मा हो जाता । अलबत्ता , अभी तक हम लोगों की आपसी लड़ाई तो खड़ी ही है । आज अम्बेदकर चार करोड़ लोगों के लिए नहीं बोलते । मगर जब इन चार करोड़ में शक्ति आयेगी , तब वे सोच विचार नहीं करेंगे । इन चार लोगों का मन भगवान पल भर में बदल सकता है और वे मुसलमान भी बन सकते हैं । लेकिन ऐसा न हो तो वे चुन - चुन कर हिन्दुओं को मारेंगे । यह चीज मुझे अच्छी नहीं लगेगी , पर मैं इतना जरूर कहूँगा कि सवर्ण हिन्दू इसी लायक थे । ' गांधीजी की मान्यता थी कि सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर पर उनके द्वारा लिए जा रहे कार्यक्रम का विकल्प दलितों को राजनैतिक सत्ता दिलाकर वैधानिक परिवर्तन कराना नहीं हो सकता । मंदिर प्रवेश और सहभोज के कार्यक्रमों में डॉ. अम्बेडकर की दिलचस्पी कम थी , लेकिन गांधी जी इन कार्यक्रमों को करोड़ों आस्तिक दलितों की दृष्टि से और हिन्दू समाज की एकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते थे । डॉ. अम्बेडकर की नीति तथा उनके स्वतंत्र नेतृत्व का गांधी जी पर दबाव था । इसी प्रकार गांधी जी के नेतृत्व का डॉ. अम्बेडकर पर दबाव था । गांधी जी ने पूना करार के बाद एक बार कहा था , ' मैं हरिजनों का कम छोड़ दूँ ,तो अम्बेडकर ही मुझ पर टूट पड़ें ? और जो करोड़ों बेजुबान हरिजन हैं , उनका क्या हो ? " पूना करार के लिए डॉ. अम्बेडकर और गांधी जी की वार्ताओं के जो दौर चले थे उसका डॉ. अम्बेदकर ने अपनी पुस्तक में विवरण बिलकुल नहीं दिया है , लेकिन महादेवभाई की डायरी ने उस दौर के इतिहास को दस्तावेज का रूप दिया है । इन वार्ताओं के दरमियान डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी से कहा था , ' मगर आप के साथ मेरा एक ही झगड़ा है , आप केवल हमारे लिए नहीं , वरन कथित राष्ट्रीय हित के लिए काम करते हैं । आप सिर्फ़ हमारे लिए काम करें , तो आप हमारे लाड़ले वीर ( हीरो )  बन जाँए । ' ( <em>महदेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृष्ठ ६० </em>) पूना करार पर सहमति के तुरन्त पश्चात डॉ. अम्बेडकर गांधी जी से जेल में मिलने आये , तब जो संवाद हुए वे इस प्रकार हैं-</p>
<p style="text-align:left;">    ठक्कर बापा - 'अम्बेडकर का परिवर्तन हो गया '</p>
<p style="text-align:left;">    बापू बोले - ' यह तो आप कहते हैं । अम्बेडकर कहाँ कहते हैं ? "</p>
<p style="text-align:left;">    अम्बेडकर - ' हाँ, महात्मा हो गया । आपने मेरी बहुत मदद की । आपके आदमियों ने मुझे समझने का जितना प्रयत्न किया , उसके बनिस्पत आपने मुझे समझने का अधिक प्रयत्न किया । मुझे लगता है कि इन लोगों की अपेक्षा आपमें और मुझमें अधिक साम्य है । '</p>
<p style="text-align:left;">    सब खिलखिलाकर हँस पड़े । बापू ने कहा , ' हाँ ' । इन्हीं दिनों बापू ने भी कहा था कि , ' मैं भी एक तरह का अम्बेदकर ही तो हूँ ? कट्टरता के अर्थ में । ' ( <em>वही , पृ. ७१ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    पूना करार के बाद के दिनों में इन दोनों विभूतियों के निकट आने की कफ़ी संभावना थी । गांधी जी की प्रेरणा से बने अस्पृश्यता निवारण मंडल की केन्द्रीय समिति में अम्बेडकर ने रहना मंजूर किया था । इस संस्था के उद्देश्य निर्धारित करने के संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर द्वारा समाज व्यवस्था की बाबत अपनी पैनी समझदारी प्रकट करने वाले सुझाव दिए । बाद में जब उक्त मंडल के व्यवस्थापन में दलितों की भागीदारी की बात आयी तब गांधी जी ने कहा कि प्रायश्चित करने वाले सवर्ण ही इस मंडल में कर्ज चुकाने की भावना से रहेंगे । कर्जदार को समझना चाहिए , कि उसे अपना ऋण कैसे चुकाना है । डॉ. अम्बेडकर के मन पर इन रवैए का प्रतिकूल असर पड़ा ।</p>
<p style="text-align:left;"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/" target="_blank">भाग १ </a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/" target="_blank">भाग २</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/18/gandhi_ambedkar3/" target="_blank">भाग ३</a> </strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/19/gandhi_ambedkar_4/" target="_blank">भाग ४ </a></strong></p>
<p style="text-align:left;"> </p>
<p style="text-align:left;">
<div id="9041f4f7-ef58-4742-9bb3-b80b22e28e2a" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;text-align:left;margin:0;padding:0;">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80"><span style="color:#0066cc;">गांधी</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%95%e0%a4%b0"><span style="color:#0066cc;">अम्बेडकर</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/gandhi"><span style="color:#0066cc;">gandhi</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/ambedkar"><span style="color:#0066cc;">ambedkar</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/brahminism"><span style="color:#0066cc;">brahminism</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/puna%20pact"><span style="color:#0066cc;">puna pact</span></a></div></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['शेक्सपियर गुजर गए ,कीट्स नहीं रहे,मेरी तबीयत भी कुछ नासाज़-सी है'-मार्क ट्वेन]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=282</link>
<pubDate>Tue, 11 Mar 2008 07:50:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[आपात-काल के आखिरी दौर में लोकनायक जयप्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">आपात-काल के आखिरी दौर में लोकनायक जयप्रकाश के गुर्दों के बिगड़ने के बाद उन्हें कुछ दिन चंडीगढ़ के स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में रखा गया फिर मुम्बई ले आया गया ।जसलोक अस्पताल में डाइलिसिस होती और गैर-डाइलिसिस दिनों में वे अपने मित्र अखबार मालिक रामनाथ गोयनका के  एक अतिथि गृह में आराम करते । दोनों ही स्थानों पर खूफिया निगरानी रहती । बनारस के रामभूषण जेपी से जसलोक में मिलकर निकले तब बन्दा वहाँ मौजूद था। लाल जूता पहने व्यक्ति ने उनसे नाम पूछा तो घबड़ा कर बोले -'मैं भूषण राम।'</p>
<p align="left">    उसी प्रवास में अतिथि गृह में जेपी के पाँव दबाने का मौका मिला था।इस कोटि का सुख १९६९ में सरहदी गाँधी बादशाह ख़ान के ०० नम्बर के विशाल पाँवों को दबाने में मिला था।बहरहाल जेपी ने खबर लेनी शुरु की तब मैंने उन्हें बताया कि उनके मित्र नवकृष्ण चौधरी नजरबन्दी के दौरान पक्षाघात के शिकार हुए तब उन्हें पेरोल के कागजात पर खुद के दस्तख़त करने में २५ मिनट लग गए थे।यह सुनकर जेपी उद्वेलित हो गए थे और जानकी बहन से बोले,</p>
<p align="left">'जरा डायरी निकाल कर,वह तारीख तो बताना'। जानकी बहन को वह तारीख बताने के लिए जेपी की जेल डायरी खोलने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उन्हें वह तिथि याद हो चुकी थी। वह तिथि जब जेपी को अपनी सेहत बिगाड़ने का पहले पहल संशय हुआ था ।</p>
<p align="left">चंडीगढ़ के पी जी आई से जेपी की सेहत की पहली ठोस खबर संस्थान से स्नातोकत्तर उपाधि पाने वाले तरुण शान्ति सेना के युवा नेता डॉ. अभय बंग ला चुके थे। उनसे प्रत्यक्ष मिल कर ।</p>
<p align="left">    देश की चिकित्सा व्यवस्था का शीर्ष इन ३०-३२ वर्षों में काफ़ी बदला है। हेलिकॉप्टर से मरीज ढोने वाले पाँच सितारा डीलक्स अस्पतालों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है । शिवकुमार 'पराग' के दोहे को याद करें तो-</p>
<p align="left"><strong>नर्सिंग होमों की दशा , देख दिया दिल रोए।</strong></p>
<p align="left"><strong>लाश तभी मिल पाएगी , बिल चुकता जब होए।</strong></p>
<p align="left">    सार्वजनिक खजाने से निजी डीलक्स अस्पताल को तरह तरह के ऋण - अनुदान दिए जाते हैं तब आम जनता पर यह दोहरी मार होती है ।एक तरफ़ जनता की जेब से टैक्स निचोड़ना , दूसरी तरफ उस धन को ऐसी निजी सेवाओं के लिए लगाना जिसे पाना आम आदमी की सामर्थ्य से परे हो । गरीब से गरीब आदमी से भी सरकार को राजस्व मिलता है,यह अक्सर नजर अन्दाज कर दिया जाता है।मैं अक्सर दियासलाई का उदाहरण देता हूँ-इससे वसूले जाने वाले 'टिकस' की चिप्पी हर डिब्बे पर चिपकी रहती है।</p>
<p align="left">    मेरे शहर बनारस के सबसे बड़े निजी अस्पताल का मालिक एक भ्रष्ट पूर्व आबकारी कमीशनर है जिसे प्रदेश की सरकारी वित्तीय संस्था 'पिकप' ने आसान शर्तों पर १२ करोड़ ऋण दिया था तथा जिसकी'एम आर आई' सेवा का उद्घाटन तकालीन मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह ने किया था। इस अस्पताल में भर्ती हो कर इलाज करवाना आम जनता के पहुँच के बाहर है।</p>
<p align="left">    लखनऊ स्थित स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में १० दिन गुजार कर मेरा यह यकीन पुख्ता हुआ है कि इस देश की जनता की विशिष्ट चिकित्सकीय से वा हेतु सरकारी क्षेत्र में ऐसे संस्थानों का बने रहना जरूरी है। जहाँ तक इस संस्थान के 'नाम' का सवाल है - उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि इस मुहावरे का विलोम उस पर लागू होगा-"आँख का अन्धा नाम नैन सुख"।इस मुल्क की सियासत में एक लफंगे का संविधानेतर सत्ता के रूप में स्थापित होने का वह पहला उदाहरण था।ऐसा युवा जो मो्टर चुराने के आरोप में पॉलिटेकनीक से निकाला गया हो,जिसकी चप्पलें सूबे का दिग्गज मुख्यमंत्री उठाता हो और जो बगैर लाइसेंस के हवाई जहाज उड़ाने में 'टें' बोल गया हो।</p>
<p align="left">    <strong>ऐसे संस्थानों की चिकित्सा-सेवा का मेरुदण्ड उसके आवासीय चिकित्सक होते हैं। एक हफ़्ते में सर्वाधिक घण्टों की सेवा करने वाले " कर्मठ,जुझारू,युवा,चिकित्सक"।</strong> " " के बीच आए अल्फ़ाज़ मैंने हृदय-शल्य के गहन चिकित्सा कक्ष में लगे आवासीय चिकित्सक डॉ. महेन्द्र कुमार के मुँह से सुने थे। चिदम्बरम के बजट भाषण में निजी चिकित्सालयों को बढ़ावा देने की बात है- यह बात वे नर्सों को समझाने की कोशिश कर रहे थे।</p>
<p align="left">   इस गहन चिकित्सा कक्ष के ग्यारह बिस्तरों पर मुझसे कमजोर आर्थिक स्थिति के मरीजों की बहुलता रही।उसमें कुछ को भले ही खेती लायक जमीन बेचनी पड़ी हो (यह मजबूरी नहीं होनी चाहिए) लेकिन उसके बाद इलाज पाना ऐसे सरकारी संस्थानों में ही मुमकिन है। यहाँ तीन धमनियों की बाई-पास शल्य में ७१,००० रुपए लगे । दिल्ली के डीलक्स पाँच सितारा अस्पताल में साढ़े सात लाख रुपए लगते और लखनऊ के ही छत्रपति साहू महाराज चिकत्सकीय विश्वविद्यालय में मात्र ४५,००० रुपए लगते।</p>
<p align="left">    इस मुल्क के गरीब मरीजों के प्रति आवासीय चिकित्सकों की सहानुभूति प्रकट करने वाली घटनाएं मैंने गहन चिकित्सा में पड़े-पड़े देखी -</p>
<p align="left">* इस कक्ष के शीशे के बड़े दरवाजों के पार गलियारा दिखाई देता है।एक रात इस कक्ष में तैनात डॉ. अमित कुमार अचानक दौड़ कर बाहर निकल कर भागे।लौटे एक बुजुर्ग दम्पति को साथ ले कर।शीशे के इस पार से डॉ. अमित ने वृद्धा को रोते हुए और उसके पति को सहारा दे कर ले जाते हुए देखा था।डॉ. अमित ने महिला को भर्ती किया,रात भर सुश्रुषा हुई,अगले दिन महिला ने स्वयं जाने की इच्छा जताई तब उसे आवश्यक निर्देश दे कर उसे विदा किया।</p>
<p align="left">** दाढ़ी-मूँछ और सिर के बाल छिलवाए , छरहरे शरीर का डॉक्टर मयंक आठ-दस वर्ष की जरीना खान को गोद में लिए दौड़ते हुए गहन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हुआ।बच्ची छ: महीने पहले भर्ती हुई थी तब कमजोरी और दस्त के कारण उसका ऑपरेशन न हो सका था। इस बार दाखिला पाने के पहले संस्थान परिसर के बाहर आर एस एस द्वारा स्थापित 'माधव-आश्रम' में वह परिवार टिका था जहाँ उस सुबह बच्ची को दौरा आया।बहरहाल,सही हाथों में पहुँचने के पहले गुजर चुकी थी।</p>
<p align="left">*** इन तमाम मौतों के बाद कानूनी लिखाई-पढ़ाई के काम को अत्यन्त दायित्वबोध से सम्पन्न करने वाले अक्सर डॉ. राम उर्फ़ डॉ. रामकृष्ण शुक्ल होते थे।</p>
<p align="left">**** गहन चिकित्सा कक्ष के पाँच नम्बर बिस्तरे पर मैं भरती था और छ: नम्बर पर मऊ जिले के घोसी का एक दुबला-पतला युवा को लाया गया। रक्त में हीमोग्लोबिन का प्रतिशत पाँच से कम था और किसी अन्य विभाग में उसका सीना चीरा जा चुका था। पर्याप्त रक्त और प्लाज़्मा चढ़ाने के बाद यह फैसला लिया गया कि आई.सी.यू में ही उसकी शल्य क्रिया की जाएगी।यह क्रिया सफल रही।इसके तीन बाद उस तरुण के बारे में डॉ. उद्गीत धीर को इस बात की सन्तुष्टि थी कि 'रक्तादि से अस्पताल में इस युवा को जो ताकत मिल जा रही है वह अस्पताल के बाहर शायद मुमकिन नहीं होती।'</p>
<p align="left">    पाँच सितारा-निजी-डीलक्स अस्पतालों में मूल मकसद(मुनाफ़ा कमाना) अलग होता है ।इस वजह से ऐसी घटनाएं वहाँ सम्भव नहीं हो सकतीं।</p>
<p align="left">(हृदय-शल्य के गहन चिकित्सा कक्ष में 'पाँच दिन' पर अन्यत्र पोस्ट करूँगा।)</p>
<p align="left">सभी मित्रों की शुभ कामना के लिए आभार।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Osteoarthrits in Ayurveda India]]></title>
<link>http://travel2india.wordpress.com/?p=19</link>
<pubDate>Mon, 14 Apr 2008 04:30:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>travel2india</dc:creator>
<guid>http://travel2india.wordpress.com/?p=19</guid>
<description><![CDATA[Traditional system of medicine of India, Ayurveda is not only a medical system but a way of life whi]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Traditional system of medicine of India, Ayurveda is not only a medical system but a way of life which aims at holistic management of health and diseases. Ayurveda is divided into eight disciplines i.e Kaya Chikitsa (Internal medicine), Shalya (surgery), Shalakaya (ENT), Bhoot vidya (Psychiatry) Kaumar-bhritya (Pediatrics), Agad tantra (Toxicology), Rasayana (Geriatrics or Jara chikitsa) and Vajikarna (Eugenics and aphrodisiacs).</p>
<p>Thus, Rasayana Chikitsa or Geriatrics or Jara Chikitsa is one among eight branches of Asthanga <a title="Kerala Ayurveda Tours" href="http://www.cultureholidays.com/kerala/ayurveda/" target="_blank">Ayurveda</a>, which not only deals with diseases and conditions associated with old age but is also used as a preventive method against unhealthy body changes. Rasayana Chikitsa enhances immune system, arrests ageing, gives lusture to skin provides energy and nourishes body (Sapta dhatus).<br />
People between age 65-85 yrs are rising throughout the globe. It is believed that by year 2030, world population of people between 60-85 yrs of age will increase by 66% so quite a good number of populations will come under graying population. Many advances in scientific medicine have ensured longevity in the life span in Indian men and women, traced post independence. Indian aged population is currently the second largest in the world. This group of population is exposed to number of diseases one among them is osteoarthritis i.e Sandhigatavata.</p>
<p>Osteoarthritis or Osteoarthosis is mainly related to aging but metabolic, genetic, chemical and mechanical factors can also lead to it. Its symptoms mainly appear in middle age and almost everyone has them by the age of 70 yrs. This disease is caused by loss of cartilage of the joints which is a protein substance that serves as a cushion between bones of the joints and when it degenerates, the bone next to it becomes inflamed leading to total loss of cushion between the bones of the joints and this causes friction between the bones leading to pain and there is limitation of joint mobility. Also, there is hypertrophy of the bone at articular margins.<br />
 <br />
Osteoarthritis is one of the major problems for which the treatment is almost limited with focus on pain reduction. Osteoarthritis of knee is more prevalent in our population which interferes not only with the physical activity but entire quality of life. Features of Osteoarthritis seem to be similar with Sandhigatavata described in Ayurveda. The cause of Sandhigatavata in Ayurveda is attributed to improper diet, lifestyle and oldage leading to degeneration of body elements, aggravation of Vata Dosa and reduction in Shleshaka Kapha, a slimy substance present in the joint.</p>
<p><a title="Indian Ayurveda Treatments" href="http://us.travelchacha.com/ayurveda-in-india/" target="_blank">Ayurveda Holidays</a></p>
<p><strong>RISK FACTORS</strong><br />
- Obesity is the most powerful risk factor for Osteoarthritis of knees as it increases the mechanical stress on cartilage.<br />
- Faulty posture also predisposes to this disease.<br />
- Repeated trauma or surgery to the joint structures.<br />
- Abnormal joints at birth (congenital abnormalities)<br />
- Gout<br />
- Diabetes and other hormone disorders like growth hormone disorders.<br />
<strong>SYMPTOMS OF OSTEOARTHRITIS</strong><br />
- Deep aching pain that gets worse after exercise or putting weight on it and is relieved by rest.<br />
-grating of the joint with motion<br />
- joint swelling<br />
-limited movement.</p>
<p><strong>TREATMENT</strong><br />
Treatment of Osteoarthritis is aimed at<br />
1. Reducing pain<br />
2. Maintaining mobility<br />
3. and minimizing disability<br />
In modern medicine although many drugs have been reported to be effective but are not free from severe side effects. In patients where the aggressive medical management has failed, surgical treatment is advised.</p>
<p><strong>TREATMENT IN AYURVEDA</strong><br />
The disease Sandhigata vata like Vatik disorders is difficult to treat and its crippling effect on patients with many emotional problems. If treated early the symptomatic involvement may occur and progress of disease is lessened.</p>
<p>Different preventive and palliative treatment and procedures like Panchakarma are advocated for management of Osteoarthritis by Ayurvedic physicians by considering the prakriti, age, tolerability etc of the patients, stage of the disease and the season etc. As the disease is considered to be caused to a pathological condition which is caused by aggravated Vata dosa hence its treatment measured inlcude to ensure the state of equilibrium of vitiated Vata by Vatahara and Rasayana drugs.</p>
<p><strong>PREVENTIVE MEASURES</strong></p>
<p>Healthy diet<br />
Proper exercise<br />
Maintenance of weight<br />
Proper posture during day to day activities<br />
Beware of energy draining foods like fast foods, canned, frozen packaged left over and old foods, foods laced with preservatives chemicals and additives.</p>
]]></content:encoded>
</item>

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