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	<title>chankya &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/chankya/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "chankya"</description>
	<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 20:31:22 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःभक्ति एकांत तथा अध्ययन समूह में करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</link>
<pubDate>Thu, 17 Jul 2008 04:06:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=167</guid>
<description><![CDATA[1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, शक्ति से राज्य तथा गुणवान पत्नी से घर की रक्षा होती है।<br />
2.वासना इस संसार का सबसे बड़ा रोग है। वासना से मनुष्य का शरीर अंदर ही अंदर से खोखला होने के साथ बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है।<br />
3.क्रोध एक तरह से अग्नि है जो पूरे संसार को जलाकर राख कर देती है। यह इंसान का पूरी तरह विनाश करता है।<br />
4.जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है वह हमेशा सुखी रहेगा।<br />
5.बुद्धिमान और ज्ञानी स्वर्ग, चोर अपने जीवन और भोगी विलासी मनुष्य सुंदर स्त्री की कामना करते हैं।<br />
6.समुद्र के लिये जिस तरह वर्षा होना या न होना बराबर है उसी तरह जिसका पेट भरा है उसके लिये उत्तम से उत्तम भोजन व्यर्थ है।<br />
7.तपस्या, भक्ति. पूजा तथा साधना हमेशा एकांत में करना चाहिए जबकि विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से अध्ययन करना चाहिए। उसी तरह गायक समूह गान गायें तो प्रभावित करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चाणक्य नीति-सूर्य के सामने दीपक क्या करेगा?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</link>
<pubDate>Wed, 16 Jul 2008 04:03:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=165</guid>
<description><![CDATA[1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>1.सूर्य के प्रकाश के सामने दीपक क्या कर सकता है? अमीर आदमी को दान देने से क्या लाभ? जिसके पास पर्याप्त मात्रा में धन हो उसके सामने दान दी गयी वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। दान सदैव निर्धन को दिया जाना चहिए।<br />
2.निर्धन सदा धन की तलाश में भटकते हैं, उनके हृदय में सद धनी बनने की आकांक्षा बनी रहती है<br />
3.प्रत्येक मनुष्य की यह इच्छा रहती है कि वह मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करे। अपनी पूरी आयु इसी इच्छा की पूर्ति में नष्ट कर देता है। सभी इंसान अपनी इच्छाओं के दास बनकर रहे गये हैं।</strong></p></blockquote>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>हमारे देश के लोगों में  दान की प्रवृत्ति जन्मजात रहती है। सामान्य आदमी हमेशा थोड़ा बहुत दान करता है पर यह दान अधिकतर कुपात्रों को मिलता है-यह दान उन भिखारियों को मिलता है जो अधिकतर मंदिरों के बाहर खड़े होते हैं और उनकी यह आदत होती है न कि बाध्यता। इसके अलावा उन तथाकथित गुरुओं और संतों को मिलता है जिनके लिये भक्ति और ज्ञान बेचना एक व्यवसाय है। वह इस धन से तमाम तरह के आश्रम बना लेते हैं और फिर उनका उपयोग भी व्यवसायिक ढंग से धर्म के नाम पर ही करते हैं। </p>
<p>ऐसे अनेक किस्से आते हैं कि अमुक भिखारी मरा तो उसके घर से ढेर सारा धन बरामद हुए। कई लोग तो अच्छा खासा परिवार होते हुए भी भीख मांगते हैं क्योंकि यह एक आदत है जिसे पड़ जाये वह छूटती नहीं है। अतः दान हमेशा ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। वह मांगता न हो पर उसकी आवश्यकता हमारी दृष्टि में आ जाये तो उसकी सहायता करना चाहिए। यह सहायता इस तरह करना चाहिए जैसे कि उसे न लगे कि हम दान कर रहे हैं। यही सच्चा दान है। मांगने पर यह बताकर दान करने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बिना पूछे दान देना अधर्म का कार्य]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=40</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 03:44:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=40</guid>
<description><![CDATA[
१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।<br />
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।<br />
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।<br />
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ के सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है। 1</p>
<p>  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच न करें]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=36</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:12:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=36</guid>
<description><![CDATA[1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछ्दा केवल अपने माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।</p>
<p>2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।</p>
<p>3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।<br />
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।<br />
युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।<br />
4.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।</p>
<p>*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=32</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:40:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=32</guid>
<description><![CDATA[
1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।</p>
<p>2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते। </p>
<p>3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।</strong></p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ। </p>
<p>आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार कार्य करना ही बुद्धिमानी]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Wed, 04 Jun 2008 03:40:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=139</guid>
<description><![CDATA[१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा  कभी-कभी अपने  बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
२.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।<br />
३.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है। पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पसु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।<br />
४.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःविद्यार्थियों को ‘अतिसेवा’ से दूर रहना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 06:53:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=24</guid>
<description><![CDATA[1.जिन व्यक्तियों के पास विद्या, दान, शील]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जिन व्यक्तियों के पास विद्या, दान, शील तप के गुण नहीं हैं वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर बोझ है और वह पशु के समान ही जीवन व्यतीत करता है।<br />
2.विद्याध्यन कर रहे व्यक्ति के लिये आवश्यक है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम, क्रोध, लोभ, स्वाद,श्रृंगार, कौतुक, अतिनिद्रा और अतिसेवा से का त्याग कर दे।<br />
3.धन संपत्ति अपनी होकर भी अगर वह दूसरे के पास पड़ी रहे और ऐन वक्त काम न आये तो ऐसे धनवान होने का क्या लाभ? उसी प्रकार पुस्तक में लिखी विद्या भी किस काम की जब तक पढ़कर उसका सदुपयोग न किया जाये।<br />
4.जिस प्रकार पानी की बूंद से घड़ा भर जाता है उसी प्रकार नियमित रूप से अभ्यास करने से विद्या की प्राप्ति भी हो जाती है।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-शिक्षा के दौरान छात्रों को जीवन का आनंद उठाने के लिये आजकल अनेक अवसर प्रदान किये जाते हैं। कहीं पिकनिक तो कहीं पिक्चर दिखाने के लिए विद्यालयों की तरफ से कार्यक्रम बनाये जाते हैं। कठ विद्यालयों के विज्ञापन में छात्रों के शिक्षा और खेलकूद के अलावा अन्य सुविधाओं की जानकारी भी दी जाती है। अनेक बार ऐसे समाचार भी आते हैं कि अपने विद्यालय के साथी छात्रों और शिक्षकों के साथ बाहर घूमने गये छात्र-छात्राऐं हादसे के शिकार हो जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि घूमने-फिरने और युवावस्था के आनंद उठाने के लिये भी वही आयु है जो छात्र जीवन की है। यह विचार गलत है। देखा जाये तो जीवन में आनंद के अवसर तो नितांत आते हैं नहीं तो छात्रों के साथ शिक्षक क्यों ऐसे कार्यक्रमों में जाते हैं? क्या वह आनंद नहीं उठाते। आज के बाजार युग में तो अनेक विज्ञापन ही छात्र-छात्राओं को उपभोक्ता मानकर फिल्माये जाते हैं जिसमें यह बताया जाता है कि किस तरह वह वस्तुओं उपभोग कर एश कर सकते हैं। इससे लोगों में यह भ्रम हो जाता है कि यह उम्र मजे करने के लिऐ हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</link>
<pubDate>Sat, 10 May 2008 05:32:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=134</guid>
<description><![CDATA[जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्<br />
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः</strong></p>
<p>धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्<br />
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्</strong></p>
<p>इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</guid>
<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</link>
<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 05:36:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=147</guid>
<description><![CDATA[अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः<br />
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः</p>
<p>जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।</p>
<p>सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:हमेशा झगडा करने वाला संकट में रहता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=120</link>
<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 03:33:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=120</guid>
<description><![CDATA[ १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong> १.अपने परिवार के सदस्यों के साथ उदारता, अन्य लोगों के साथ दया, कुटिल से कठोरता, सज्जनों से प्रेम तथा दुष्ट से अभिमान, विद्वानों से विनम्रता, शत्रुओं से वीरता और बडों से क्षमा प्रार्थना का व्यवहार करने वाला व्यक्ति सदा ही सुखी रहता है।<br />
	२.बिना सोचे समझे खर्च करने वाला, अनाथ (मटर गश्ती करने वाला) और हमेशा झगडा करने वाला सदैव संकट में रहते हैं।<br />
	३.अन्न से दस गुना आटे में, आटे से दस गुना दूध में, दूध से दस गुना मांस में और मांस से दस गुना घी में शक्ति होती है।<br />
	४.शोक से रोग, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस बढ़ता है। </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:दुष्ट राजा की  सेवा से मन को होता है कष्ट]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=119</link>
<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 03:34:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=119</guid>
<description><![CDATA[           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>           1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।<br />
        2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है। पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।</p>
<p>        3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। </p>
<p>       4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:समय के अनुसार न सोचना विपत्तियों को बुलाना ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=118</link>
<pubDate>Tue, 25 Mar 2008 03:32:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[

जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li>
<p align="left">जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
</li>
<li>
<p align="left">समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।</p>
</li>
</ol>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सुपात्र को दान देने वाला ही सच्चा वीर ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=117</link>
<pubDate>Mon, 24 Mar 2008 03:17:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.अर्थ कार्यों का मूल होता है 
राज्यश्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>१.अर्थ कार्यों का मूल होता है </strong><br />
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए<br />
<strong>२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती. </strong><br />
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.<br />
<strong>३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.<br />
</strong>अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सावधानी से काम लें तो मिट्टी का घड़ा भी होता है दीर्घायु ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=113</link>
<pubDate>Wed, 19 Mar 2008 02:30:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखें   और भूतकाल की परवाह न करें तथा वर्तमान में जीने  का प्रयास करें. परमात्मा में विश्वास करें.<br />
२. मनुष्य के जीवन में सब दुखों के जड़ स्नेह है. जिस  मनुष्य से स्नेह होता है उसके दुख की चिंता हमेशा मन में बनी रहती है.<br />
३.हर मनुष्य के  मन में  ही सुख-दुख और अन्य विषय मूल रूप से मौजूद रहते हैं जिसने मन को वश में कर लिए वही सुखी है.<br />
४.मनुष्य  का शरीर मिटटी के कच्चे घडे के समान एक ही क्षण में टूटकर बिखर सकता है पर जिस तरह कच्चे  घडे का सावधानी से उपयोग करें तो वह लंबे समय तक चल सकता है वैसे ही अगर इंसान अपनी शरीर का अत्यंत  सावधानी का उपयोग करे तो लंबे समय तक स्वस्थ  रहते हुए जीवित रह सकता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:परमात्मा ने सोने में सुगन्ध नहीं डाली ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=112</link>
<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 03:24:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछडा केवल अपनी  माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।</p>
<blockquote><p><strong>2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।</strong></p></blockquote>
<p>3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।<br />
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।<br />
4.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।<br />
5.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।</p>
<p>*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अपनी बातें यथासंभव गुप्त रखना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=111</link>
<pubDate>Mon, 17 Mar 2008 03:38:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>बुद्धिमान  व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन की हानि, अपने मानसिक संताप, अपने घर-परिवार के सदस्यों के दोष तथा  किसी दुष्ट द्वारा अपने पर किये गए प्रहार और अपमान की भूलकर  भी  किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा न करे। इन सब बातों को यथासंभव गुप्त रखना चाहिए।</strong></p></blockquote>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या-लोग अक्सर अपनी बात अपने मन में नहीं रखते और दूसरों को अपनी बात बता देते हैं जो की बाद में उनके लियी हानिकारक होती है। हम नित-प्रतिदिन कई लोगों के संपर्क में रहते हैं और ऐसा लगता है कि वह हमारे लिए विश्वसनीय हैं यह हमारा भ्रम होता है। घर, कार्यालय, दूकान या किसी अन्य ऐसे स्थान पर जहाँ निय्मिति जाते हैं वहाँ हमसे रोज मिलने वाले लोग होते हैं और हमें यह भ्रम हो जाता है कि बस वह हमारे विश्वस्त हैं और हम उनके। इस चक्कर में हम उनको अपने परिवार, संताप और उपलब्धियों के बारे में बता देते हैं कि वह भला दूसरे को क्यों बताएगा? भावनात्मक प्रबाह में हम उनको ऐसी बाते भी बता देते हैं जो नहीं बताना चाहिऐ और वह जाकर सबको बता देता और हमें फिर संताप होता है।</p>
<p>इसलिए पाने घर-परिवार, संपदा और तकलीफों की जानकारी जहाँ तक हो सके गुप्त रखना चाहिए। जब तक आवश्यक न लगे किसी के सामने उसका बखान नहीं करना चाहिऐ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सभी वनों में चन्दन वृक्ष नहीं होते ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=110</link>
<pubDate>Sun, 16 Mar 2008 03:46:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पर्वत तो बहुत हो सकते हैं किन्तु यह आव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>पर्वत तो बहुत हो सकते हैं किन्तु यह आवश्यक होना कदापि  नहीं हो सकता कि प्रत्येक पर्वत पर माणिक्य उपलब्ध ही हों। जैसे कि प्रत्येक  हाथी के मस्तक में गजमुक्ता होना जरूरी नहीं है उसी प्रकार सभी वनों में चन्दन वृक्ष  हों यह आशा भी नहीं की जा सकती है। </strong></p></blockquote>
<p><strong>वर्त्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>सभी तिलों में तेल नहीं होता और सब धनी दयालू हों यह भी जरूरी नहीं है। आजकल आकर्षण और चमक का ज़माना है।  अगर देखें तो पिछले कुछ समय से हमारे देश में भौतिक साधनों की उपलब्धता बढ़ी है, कहने को तो यह भी कहा जाता है कि हमारा राष्ट्र विकास के पथ पर है पर यह चमक एक दिखावा है। इस विकास के साथ हमारे साँस्कृतिक मूल्य बिखर रहे हैं। देश में धनपतियों की संख्या बड़ी है पर उस संख्या से अधिक गरीब बढ़ें हैं। समाज में पूंजीपतियों की एक भूमिका होती थी और उससे सद्भाव और संतुलन बना रहता था पर आज वह समाप्त हो गया है। धनवानों से हमेशा दया और समाज की आर्थिक रक्षा की अपेक्षा की जाती है। इसके विपरीत हम हर रोज अपने देश के शक्तिशाली लोगों द्वारा कमजोर वर्ग के साथ अनाचार और शोषण की खबरें पढ़ते हैं।<br />
अक्सर कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी होती है कि जो धनी है उसके सेवा कर या उसे प्रसन्न कर कुछ धन प्राप्त किया जा सकता है उन्हें चाणक्य के उक्त कथन से प्रेरणा  लेनी चाहिए। सभी धनाढ्य, उच्च   पदारूढ़ और प्रतिष्ठत लोगों में दया और समाज सेवा की भावना हो यह जरूरी नहीं है। इसलिए सोच समझकर अपना कदम आग बढाने चाहिए। </p>
<blockquote><p><strong>आजकल हम लोग ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों के बारे में भ्रम पाल लेते हैं कि उनमें  सभी सभ्य  लोग रहते हैं या जिनके पास बहुत  दौलत हैं तो वह दयालू हैं तो उसे दूर कर लेना चाहिए. समाज में जो कथित बडे लोग हैं उनका आचरण भी ऊंचा होगा यह नहीं सोचना चाहिए . माया की महिमा ऐसी है कि वह किसी भी आदमी को बड़ा बना देती है पर वह किसी के बौने चरित्र को ऊंचा  नहीं कर  सकती </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:इस अस्थिर संसार में धर्म ही अपना होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=109</link>
<pubDate>Sat, 15 Mar 2008 05:21:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की  गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का  जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को  शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। </p>
<p><strong>व्याख्या-</strong> बाल्यावस्था, युवावस्था  और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही  अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।<br />
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों से -घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो - की जाती है।</p>
<p>४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि  उसे  किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी जा सकती। अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।<br />
<strong>*व्याख्या-</strong> अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:प्रेम में  चालाकी करने वाले सुखी]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=108</link>
<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 03:48:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=108</guid>
<description><![CDATA[१.  नीच  प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.  नीच  प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वचनों  द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।</p>
<p>2.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। </p>
<p>3.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।<br />
4. हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:संसार में धन का आना-जाना लगा  रहेगा ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=106</link>
<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 03:50:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।</p>
<p>     2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।</p>
<p>     3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है। </p>
<p>     4.तेल में जल नहीं मिल सकता, घी में जल नहीं मिलता. पारा किसी से नहीं मिल सकता। इसी प्रकार विपरीत स्वभाव वाले एक दूसरे से नहीं मिल सकते।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:अस्थिर चित्त वाले व्यक्ति  में सदभावना नहीं रहती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=105</link>
<pubDate>Wed, 12 Mar 2008 03:26:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=105</guid>
<description><![CDATA[१.अर्थ कार्यों का मूल होता है 
राज्यश्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></strong><strong>१.अर्थ कार्यों का मूल होता है </strong><br />
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए<br />
<strong>२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती. </strong><br />
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.<br />
<strong>३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.<br />
</strong>अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. </p>
<p>आज के संदर्भ में व्याख्या- सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: शरीर के अंगों में सिर श्रेष्ठ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=104</link>
<pubDate>Tue, 11 Mar 2008 03:18:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=104</guid>
<description><![CDATA[
सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><code></p>
<blockquote><p><strong>सभी औषधियों में रसायन  गिलोय सबसे अच्छा है, सभी सुखों में सबसे श्रेष्ठ सुख भोजन  पाना है, ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान है, शरीर  के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है। शिरोभाग में ही समस्त ज्ञानेन्द्रियों  में आँख प्रधान हैं। शरीर के सभी अंगों में सिर सर्वश्रेष्ठ होता है क्योंकि उसमें ही सभी ज्ञानेन्द्रियाँ  होती हैं।</strong></p></blockquote>
<p></code></p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong>कुछ लोग कहते हैं कि विश्व का सारा आधुनिक ज्ञान  अंग्रेजी में है इसलिए उसे पढ़ना जरूरी है। आप देखें  हमारे देश के विद्वान भी अपनी भाषाओं में बहुत सारा ज्ञान  प्रदान कर गए हैं पर पाश्चात्य रहन-सहन के अंधानुकरण ने हमें हर तरह से तनाव की हालत में पहुंचा दिया है।  आयुर्वेद में गिलोय रसायन सभी प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए उत्तम कहा जाता है। आजकल लोग अपना पेट भरने के लिए फास्ट फ़ूड के नाम पर जो खा रहे हैं वह हमारे देश के लोगों के लिए बीमारियों का कारण है। लोग समय पर भोजन नहीं करते और बाजार की चीजों से ही पेट भरते हैं और उससे शरीर में  विकार भर जाते हैं। अगर हमारे शरीर को ऊर्जा पेट से मिलती है तो रोग भी वही देता है। अत: ऐसे भोज्य पदार्थों का सेवन  नहीं करना चाहिए जिनसे पेट में विकार पैदा होते हैं। में यहाँ भोजन  से आशय अन्न से-गेहूँ और चावल- बने पदार्थों को ही मानता हूँ। इनसे बाजार में बने पदार्थ जिस तरह खुले में रखे जाते हैं वह विष की तरह हो जाते हैं।अत: वह ग्रहण करने से बचना चाहिऐ.  </p>
<p>लोग आजकल अपनी आंखों की परवाह न कर जिस तरह टीवी, कंप्यूटर  और फिल्में देखने में उनको  लगा रहे हैं वह उनके लिए हानिकारक होता है-इनके प्रयोग के जो नियम हैं उनका पालन करना चाहिए। जिस तरह हम इनका इस्तेमाल कर रहे हैं उसे देखते हुए तो हमें सुबह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए इससे  आंखों में स्फ्रूर्ति  आती है।मैंने जगह पढा था कि आइब्रों करने से आंखों पर दुष्प्रभाव होता है इसका विश्लेषण भी किया जाना चाहिऐ।  </p>
<p>सिर की महिमा सब जानते हैं पर उस पर अन्याय भी सभी करते हैं। सरकार ने दो पहिया चालकों के लिए हेल्मेंट अनिवार्य कर रखा है पर कुछ लोग इस नियम  के विपरीत चलकर बहुत खुश होते है और देश में बढ़ती हुई दुर्घटनाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि आजकल के युवा अपने सिर के महत्व को नहीं समझते। अधिकतर मामलों में यह माना जाता है कि अगर वाहन चालक हेलमेट पहने होता तो वह शारीरिक हानि नहीं उठाता।  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति: विज्ञान कभी धनी नहीं होता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=103</link>
<pubDate>Mon, 10 Mar 2008 03:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/?p=103</guid>
<description><![CDATA[1.जिस प्रकार फूल में गंध, तिल में तेल, लक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जिस प्रकार फूल में गंध, तिल में तेल, लकडी में आग, दूध में घी और ईख में गुड होता है वैसे ही शरीर में आत्मा होती है यह विचार करना चाहिऐ।<br />
२.देवता न कंठ में, न मिटटी की मूर्ति  में होते हैं। वह तो केवल भावना में बसते हैं। इसलिए ही भावना ही सब कुछ है।<br />
३.धातु, काष्ट और पाषाण की मूर्ति को भावनानुसार पूजन करने से ही भगवान की कृपा की सिद्धि होती है।<br />
४. जो इंसान मुक्ति की इच्छा रखते हों  तो उसे  विषय रुपी विष को त्याग देना चाहिऐ। सरलता, पवित्रता और सत्य का अमृत की तरह पान करना चाहिए।<br />
५.सोने में महक, ईख में फल, चन्दन में फूल, धनी-विज्_ंजान, दीर्घजीवी राजा क्या विधाता ने इनको नहीं बनाया। क्या ब्रह्मा की तरह कोई बुद्धि दाता न था। *<br />
*इसका आशय यह है की भला कहीं सोने में सुगंध होती है। ईख में फल और चन्दन में फूल नहीं होते। विज्ञान  कभी धनी नहीं होता और राजा कभी दीर्घजीवी नहीं होता। विधाता ने ऐसा नहीं किया। क्या विधाता को ऐसी बुद्धि देने वाला कोई नहीं मिला था। सीधा आशय यह है की विधाता ने सब सोच समझकर बनाया है। उसकी महिमा इसलिए अपरंपार मानी जाती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=102</link>
<pubDate>Sun, 09 Mar 2008 03:26:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के  दांतों  में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के  हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार  जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.</p>
<p>२.औषधि, धर्म,धन, धान्य, और गुरु के  मार्गदर्शन वाक्य-इन पांच वस्तुओं का संग्रह अवश्य करें. जो  व्यक्ति इनका संचय नहीं करता वह अपने जीवन की सार्थक नहीं बना सकता. लेकिन इन पांच वस्तुओं का उपयोग भी बहुत सोच समझ कर करना चाहिऐ वरना हानि भी हो सकती है.</p>
<p>३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए.  जुआरियों से झूठ बोलना और  कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.<br />
४.मनुष्य  को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.</p>
<p>५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.</p>
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