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	<title>blogger-meetups &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/blogger-meetups/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "blogger-meetups"</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 02:02:32 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ब्लॉग - समाज के लिए उनका क्या महत्व है?]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/02/08/blogs-how-important-are-they-to-society/</link>
<pubDate>Fri, 08 Feb 2008 01:37:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2008/02/08/blogs-how-important-are-they-to-society/</guid>
<description><![CDATA[पिछले माह, 12 जनवरी 2008 को, हुई दिल्ली ब्लॉ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले माह, 12 जनवरी 2008 को, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित <a href="/2008/01/08/are-you-coming/">प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से लोगों ने यह भी हमें बताया कि वह भेंटवार्ता उनके लिए काफ़ी ज्ञानवर्धक रही, उनको कई बातों की जानकारी मिली और अन्य ब्लॉगरों से मिलने का अवसर तो मिला ही। दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society) के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि ब्लॉगर भेंट सिर्फ़ चाय-कॉफी और गपशप तक ही न सीमित रहें बल्कि हम ब्लॉगर लोग जब मिलें तो अलग-२ विषयों पर कुछ सार्थक चर्चा भी करें और एक दूसरे से सीखें भी, इसलिए Be Relevant का नारा लगाया गया था। :)</p>
<p>तो इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए इस माह, 14 फरवरी 2008 को, एक और ब्लॉगर भेंटवार्ता आयोजित की जा रही है। यह पिछली बार की तरह लंबा चौड़ा कार्यक्रम न होगा, मात्र दो घंटे का कार्यकरम सांयकाल में होगा जिस पर ब्लॉगों और समाज के लिए उनके महत्व पर चर्चा की जाएगी। सिलसिलेवार जानकारी निम्न है:</p>
<p><strong>चर्चा का विषय:</strong> ब्लॉग और समाज के लिए उनका महत्व<br />
<strong>स्थान:</strong> गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center), लोधी रोड, नई दिल्ली<br />
<strong>तिथि:</strong> 14 फरवरी 2008<br />
<strong>समय:</strong> सांयकाल 6:30 से 8:30<br />
<strong>रूपरेखा:</strong> ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों ने विश्व भर में अपनी एक पहचान कायम की है और भारत में भी यह हो रहा है जैसा कि हालिया पिछले समयकाल में विदित हुआ है। अब इसी पर आगे बढ़ते हुए ब्लॉगर/चिट्ठाकार नागरिक पत्रकार(citizen journalists) की अपनी भूमिका निभाने के लिए क्या कर सकते हैं? इसी पर चर्चा की जाएगी एक संवादात्मक सत्र में जिसको निम्न भागों में विभाजित किया गया है:</p>
<ol>
<li>उन वाकयों के उदाहरण जहाँ ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों के कारण बदलाव आए हैं</li>
<li>पत्रकारिता के श्रेष्ठ सिद्धांत जिनका ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों पालन कर सकें</li>
<li>कैसे ब्लॉगर/चिट्ठाकार इस सब पर एक साथ कार्य कर सकते हैं</li>
</ol>
<p><strong>आमंत्रित:</strong> इस भेंटवार्ता में सभी आमंत्रित हैं, वे भी जो मौजूदा ब्लॉगर/चिट्ठाकार हैं और वे भी जो ब्लॉगर/चिट्ठाकार बनना चाहते हों और वे भी जो ब्लॉग पाठक हैं।</p>
<p>इस भेंटवार्ता और सभा में भाग लेने का कोई शुल्क नहीं है, केवल आपको समय निकाल इसमें पधारना मात्र है और चर्चा में भाग लेना है क्योंकि यह आपकी अपनी भेंटवार्ता है और अपनी चर्चा है।</p>
<p>यदि अपने आने की पुष्टि/कन्फर्मेशन यहाँ टिप्पणी के रूप में दे देंगे तो हम लोगों को भी अंदाज़ा रहेगा कि कितने साथी लोग शिरकत करने वाले हैं। यदि कन्फर्मेशन नहीं भी देंगे तो भी आपका स्वागत है, इस भेंटवार्ता में शिरकत करने और भाग लेने के लिए कन्फर्मेशन देना अनिवार्य नहीं है। :)</p>
<p>तो मिलेंगे 14 फरवरी 2008 को सांयकाल साढ़े छह बजे लोधी रोड(नई दिल्ली) स्थित इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center) के गुलमोहर हॉल में। :)</p>
<p>&#160;<br />
<em>अधिक जानकारी के लिए <a href="http://wiki.delhibloggers.in/" target="_blank">यहाँ देखें</a>।</em><br />
&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/?p=232</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 07:26:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/?p=232</guid>
<description><![CDATA[पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग ए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित <a href="/2008/01/08/are-you-coming/">प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)</p>
<p>मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)</p>
<p>भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित <a href="http://snipurl.com/dbnms_meet1_ht" target="_blank">यह लेख</a> छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट <a href="http://www.delhibloggers.in/" target="_blank">www.delhibloggers.in</a> है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन <a href="http://snipurl.com/dbnms_meet1_ndtv" target="_blank">यह लेख</a> छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।</p>
<p>एनडीटीवी 24x7 (NDTV 24x7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/NTAQYkbvhsI'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/NTAQYkbvhsI&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=NTAQYkbvhsI" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7214" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/ky4ewGi8-mQ'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/ky4ewGi8-mQ&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=ky4ewGi8-mQ" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7219" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज<br />
<span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/XjvzL7180ws'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/XjvzL7180ws&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span><br />
यूट्यूब पर इस वीडियो को <a href="http://www.youtube.com/watch?v=XjvzL7180ws" target="_blank">यहाँ देखें</a>। वीडियो को FLV रूप में <a href="http://www.videodownloadx.com/misc/download-video/id/7221" target="_blank">यहाँ डाउनलोड करें</a>।</p>
<p>मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित <a href="/2008/01/18/should-blogs-be-regulated/">बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम</a> का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रयास..... विस्फोट..... और उत्तर]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/01/14/efforts-blasts-replies/</link>
<pubDate>Mon, 14 Jan 2008 01:37:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2008/01/14/efforts-blasts-replies/</guid>
<description><![CDATA[इस पोस्ट को लिखने के पीछे न किसी की बेइ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>इस पोस्ट को लिखने के पीछे न किसी की बेइज़्ज़ती करने का इरादा है और न ही कोई व्यंग्य करने का। साफ़ दिल से यह पोस्ट लिखी है लेकिन यदि किसी को बुरा लगा हो(खासतौर से संजय तिवारी जी जिनका बहुतया उल्लेख है इस पोस्ट में) तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ क्योंकि बुरा लगाने की कोई मंशा न थी और न है।</strong></p>
<p>अभी-२ एक <a href="/2008/01/08/are-you-coming/">ब्लॉगर सम्मेलन</a> निपटा के फारिग हुआ हूँ। अच्छी खासी तादाद में लोग आए और कार्यक्रम को सफ़ल बनाया। चूँकि मैंने सबके लिए खुला रखने का प्रस्ताव दिया था इसलिए हिन्दी ब्लॉगजगत में भी इसकी खबर फैलाई कि साथी लोग आकर सत्संग का लाभ उठाएँ, कुछ ज्ञान अर्जित करें और कुछ दूसरों को दें, हिन्दी ब्लॉगजगत के बाहर भी जो ब्लॉगजगत है उससे मिलें, अंग्रेज़ी हो चाहे अन्य कोई भाषा, ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है ऐसी मेरी सोच है। लेकिन कुछ लोगों को कुछेक बातों से दिक्कत थी। अब दिक्कत खामखा दिक्कत की खातिर या किसी भ्रांति की खातिर यह मैं नहीं जानता; मैं यह मान के चल रहा हूँ कि मिथ्या भ्रांति के चलते दिक्कत थी जिसका माकूल उत्तर मिलने पर वह दूर हो सकती है, इसलिए अपनी ओर से ईमानदार कोशिश करने की खातिर यह सब लिखने का मन बनाया।</p>
<p>विस्फोट वाले संजय तिवारी जी ने <a href="http://visfot.blogspot.com/2008/01/blog-post_09.html" target="_blank">पोस्ट दागी</a> और सीधे ही हमें सूली पर टाँग दिया कि भई यह तो गोलमाल हो रहा है, ऐसा गोलमाल कैसे बर्दाश्त किया जाएगा। मत कीजिए प्रभु, गोलमाल बिलकुल बर्दाश्त मत कीजिए। लेकिन गोलमाल हो तभी ना?? पहले हल्के पटाखे के तौर पर पूछा कि आयोजक कैसे कह सकते हैं कि 200-300 ब्लॉगर आएँगे? जनाब यह तो कहा ही नहीं कि सभी ब्लॉगर होंगे, आंगतुकों में ब्लॉगर भी थे और गैर ब्लॉगर भी थे। गैर ब्लॉगरों में वे लोग भी थे जो दल बदलना चाहते हैं और डिफेक्ट होकर ब्लॉगर दल में आना चाहते हैं क्योंकि उनको यहाँ कुर्सी न सही लेकिन हिट मिलने के आसार दिखाई देते हैं, क्या पता निकट भविष्य में सेन्ट और डॉलर की भी बरसात हो जाए, सब बाबा जी की लीला है!! ;) साथ ही गैर ब्लॉगर दल में ऐसे भी थे जिनको स्वयं तो ब्लॉग लिखने में रूचि नहीं लेकिन जो ब्लॉग लिखते हैं उनमें अवश्य रूचि है। अब कोई कमरा बंद मीटिंग तो थी नहीं एक्सक्लूसिव और ब्लॉगर होने का तमगा लिए लोगों के लिए, खुली सभा थी बाबा जी के द्वार की भांति, कोई भी आए माथा टेके और प्रसाद पाए। दूसरे, 200 ब्लॉगर काहे नहीं आ सकते? क्या आपको अंदाज़ा है कि दिल्ली में और राजधानी क्षेत्र(नोएडा, गुड़गाँव और गाज़ियाबाद) में कुल कितने ब्लॉगर हैं? बहुत से आंकड़ों और शिक्षित अनुमान(educated guess) के अनुसार 500 से अधिक हैं, और ध्यान दें कि मैं हिन्दी ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा वरन्‌ सिर्फ़ ब्लॉगरों की बात कर रहा हूँ जिसमें किसी भी तरह की ब्लॉगिंग किसी भी भाषा में करने वाले हैं। ;)</p>
<p>अब इसके आगे अगला (पहले के मुकाबले)तगड़ा पटाखा यह छोड़ा संजय तिवारी जी(<a href="http://www.tarakash.com/joglikhi" target="_blank">संजय</a> भाई <a href="http://nuktachini.debashish.com/283#comment-7189" target="_blank">नोट करें</a>, पूरा नाम लिखने में कष्ट होता है, पुरानी आदत प्रथम नाम को संबोधित करने की बनी हुई है) ने कि ऐलान कर दिया कि आयोजक तो ऐरे गैरे नत्थू खैरे हैं ही, स्पीकर आदि भी कोई पहचान वाले न लग रिये!! माई बाप, यह तो बताईये कि आप किसके होने की आशा कर रहे थे, अगली बार उनको धर-दबोचने की पूरी कोशिश की जाएगी। वैसे मैं अपने मुँह मिया मिट्ठू नहीं बनता लेकिन मैं ब्लॉगजगत से सन्‌ 1999 से जुड़ा हूँ, बहुत से देशी-विदेशी ब्लॉगरों को जानता हूँ(गिनती मत पूछना जी, वो सन्‌ 2002 में 100 होने के बाद मैंने हिसाब रखना छोड़ दिया था) पर ऐसा सोचने की दिलेरी मैं नहीं दिखा सकता कि मैं <em>सभी</em> को जानता हूँ। खैर हो सकता है तिवारी जी जानते हों, अब मेरे को क्या पता(अन्यथा मत लीजिएगा तिवारी जी आपका मज़ाक कतई नहीं उड़ा रहा, सिर्फ़ अपने को उलझन में पाया था आपका ऐसा कथन पढ़ने के बाद)। वैसे चुहल के लिए ही सही, जनाब क्या आपको पता है कि दुनिया के पहले ब्लॉगर कौन हैं? थोड़ा इसका इतिहास पढ़िए कई रोचक बातें जानने को मिलेंगी। :)</p>
<div style="float:right;width:150px;text-align:center;font-weight:bold;border:3px dashed #660000;border-left:none;border-right:none;margin:10px 0 10px 10px;padding:5px 0;">यदि माइक्रोसॉफ़्ट या कोई अन्य कंपनी ऐसे किसी कार्य के लिए प्रायोजक बनती है तो हानि ही क्या है? ऐसा नेक कार्य करने से उनका नाम हो रहा है और हमारा स्वार्थ हल हो रहा है कि इतनी बड़ी सभा हो रही है और किसी साथी को अपनी जेब इसके लिए ढीली नहीं करनी पड़ रही।</div>
<p>अब तिवारी जी के विस्फोटों को यदि देखें तो क्रमवार उन्होंने पाँच विस्फोट किए। :) पहले विस्फोट के तौर पर उन्होंने कहा:</p>
<blockquote><p>सबसे पहले, निश्चित रूप से इस भेंटवार्ता के पीछे कोई व्यावसायिक नजरिया है. स्पांसरों का खेल है. और जहां व्यावसायिक नजरिया और स्पांसर पहुंच जाते हैं वहां आयोजन हमेशा निमित्त बनकर रह जाते हैं. होता यह है कि आयोजन स्पांसरों के प्रचार के काम में आते हैं.</p></blockquote>
<p>इस विस्फोट का समर्थन कई साथियों ने किया। ठीक है, कोई गलत बात नहीं है ,यदि मामले की जानकारी मुझे न होती और मैं तिवारी जी की जगह होता तो मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता, इसलिए ऐसा सोचने में कोई गड़बड़ नहीं, आखिर जब तक प्रश्न नहीं उठेगा तो उत्तर कैसे आएगा। तो जो लोग इस कार्यक्रम में शरीक हुए थे वे तो गवाह हैं ही, मैं जनाब सिर्फ़ इतना जानने का इच्छुक हूँ कि <strong>जिन-२ साहबान ने इस विस्फोट से सहमति जताई थी लगभग सभी के अपने-२ अड्डों पर विज्ञापनों की अच्छी खासी सजावट है। अब ऐसा क्यों है जनाब?</strong> यह न समझिए कि प्रश्न का उत्तर प्रश्न से दे रहा हूँ, बल्कि यह मानिए कि इस प्रश्न के उत्तर से ही आपको अपना उत्तर मिलेगा कि स्पॉन्सर क्यों थे। तो जनाब-ए-आली, <strong>क्या आपके ब्लॉग पर विज्ञापनों की सजावट का यह निष्कर्ष निकाला जाए कि आप जो लिखते हैं वह प्रायोजक द्वारा प्रभावित होता है और आप सदैव उनका ही गुणगान करते हुए लिखते हैं?</strong> नहीं, कम से कम मैं तो यह नहीं समझता कि आप प्रायोजक के प्रभाव में आकर लिखते हैं, यदि मैं गलत हूँ तो कृपया ज्ञान देकर सुधार कर दीजिए। तो <strong>जब आप जनाब इतने सारे विज्ञापन होने के बावजूद प्रभावित और प्रायोजित विस्फोट नहीं कर रहे तो मालिक आपने यह कैसे सोच लिया कि एकठो माइक्रोसॉफ़्ट के स्पॉन्सर होने कोई अंटशंट कार्य होगा?</strong> वैसे देबू दा ने इस बारे में <a href="http://nuktachini.debashish.com/283" target="_blank">अपने विचार</a> बता ही दिए थे और मैं भी उनके विचारों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। सिर्फ़ अपना भला सोचने वाले कम्यूनिटी के लिए कुछ नहीं कर सकते। <em>खाओ और मिल बाँट कर खाओ</em> यही सीख मुझे बचपन से मिली है, <em>कभी सिर्फ़ अपना मत सोचो</em>, तो इसी तर्ज पर यदि माइक्रोसॉफ़्ट या कोई अन्य कंपनी ऐसे किसी कार्य के लिए प्रायोजक बनती है तो हानि ही क्या है? उनका नाम हो रहा है कि वे ऐसा नेक कार्य कर रहे हैं और हमारा स्वार्थ हल हो रहा है कि इतनी बड़ी सभा हो रही है और किसी साथी को अपनी जेब इसके लिए ढीली नहीं करनी पड़ रही। नहीं तो ऐसी सभा के आयोजन पर हर साथी की जेब से 300-400 रूपए निकलते तो उसका क्या लाभ था? कितने लोग देते? और जो नहीं देते वो इस सम्मेलन से खामखा वंचित रहते। जबकि स्पॉन्सर होने के कारण उनके सम्मिलित होने की राह से जेब की बाधा हट गई।</p>
<p>दूसरा विस्फोट तिवारी जी ने यह किया कि यह दावा ठोक दिया अपना कि चूंकि माइक्रोसॉफ़्ट स्पॉन्सर है और दूसरी कोई पीआर ऐजेन्सी, इसलिए कोई पंगा है। तिवारी जी के अपने शब्दों में:</p>
<blockquote><p>इसका एक स्पांसर माइक्रोसाफ्ट है और दूसरा कोई पीआर एजंसी. ब्लागरों की गाढ़ी कमाई को कैसे कैश करना है इसकी योजना इस पीआर एजेंसी ने ही बनाई होगी और माईक्रोसाफ्ट को पटाया होगा यह तय बात है.</p></blockquote>
<p>साथ ही गाढ़ी कमाई को लूट लेने की सोच का इल्ज़ाम भी!! यह तो बहुत नाइंसाफ़ी है प्रभु!! एक ओर तो हल्ला मचता रहता है हिन्दी ब्लॉगजगत में कि हिट नहीं हैं पाठक नहीं हैं, तो हम सोचे कि भई हिन्दी ब्लॉगिंग अभी शैशव काल में है और बहुत से लोग नए-२ ब्लॉग रोगी हैं जिनको अभी फंडे नहीं पता, इसलिए क्यों न किसी ऐसे बंदे से ज्ञान दिलवाया जाए जो कि ब्लॉग की ही कमाई खाता है ताकि हमारी बिरादरी के लोगों का भी कुछ भला हो उनको भी ज्ञान मिले। और यहाँ तो सीधे हम पर ही चोरी की सोच का इल्ज़ाम लग गया!! ;) और माइक्रोसॉफ़्ट के स्पॉन्सर होने में बुराई क्या है? क्या वो कोढ़ियों की जमात है कि जिनके संपर्क में आते ही सभी कोढ़ी हो जाएँगे? उसकी जगह गूगल स्पॉन्सर होता तो ठीक रहता? अगली बार गूगल को भी पकड़ने की कोशिश करेंगे जनाब, और इस "क्या माइक्रोसॉफ़्ट अछूत है?" पर भी एक पोस्ट दागूँगा अगली फुर्सत मिलते ही जिसमें इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे। इसलिए फिलहाल इस को यहीं छोड़ते हैं, उम्र-ज्ञान-अनुभव में आपसे छोटा हूँ तो कुछ तो छोटे की बात भी मान लीजिए। :)</p>
<p>तीसरा विस्फोट मुझे कुछ समझ तो आया लेकिन कोई अर्थ निकलता न दिखाई दिया। तो तिवारी जी के शब्दों में:</p>
<blockquote><p>ब्लागर मिलन की शुरूआत ऐसे हुई कि भाई लिखते-पढ़ते तो देख लिया एकाध बार मुंह-दिखाई भी हो जाए. अचानक ही अखबारों आदि में हिन्दी ब्लागरों की पर्याप्त चर्चा हो गयी. जाहिर सी बात है अब आप अपना खून-पसीना बहाकर जो कुछ रचना कर रहे हैं कुछ व्यवसायी मानसिकता के लोग अब उसको कैश कराने की कोशिश करेंगे. उनकी नजर में किसी भी प्रकार के कार्य का यही सफल उपयोग होता है. आखिरकार सबकुछ बाजार जो है.</p></blockquote>
<p>इस विस्फोट के दो भाग हैं इसलिए अलग-२ ही झेलते हैं दोनों को। पहला छोटा वाला; मिलने और मुँह दिखाने की बात। मानी जनाब आपकी बात, ब्लॉगर भेंटवार्ता का पहला मकसद यही है और अधिकतर ब्लॉगर भेंटवार्ताएँ होती भी इसी मकसद के तहत हैं। लेकिन जनाब, यदि चाय-कॉफी और मुँह दिखाई के आगे बढ़ एक दूसरे से कुछ सीख लिया जाए अथवा साथ मिलकर कुछ कर लिया जाए तो क्या उसमें कोई पाप है? अनैतिक है? अवांछनीय है? अपनी-२ राय हो सकती हैं, मेरी और बहुत से अन्य लोगों की ऐसी राय नहीं है, बाकी जिनकी ऐसी राय है वो भी अपने साथी ही हैं और हर किसी को अपने विचार और अपनी राय कायम करने का पूरा हक़ है और उसकी मैं इज़्ज़त करता हूँ। :)</p>
<p>दूसरा बड़ा विस्फोट इसमें कैश कराने और बाज़ार में बेचने की बाबत है। तो जनाब <strong>अपने ब्लॉगों पर विज्ञापन सजाकर ब्लॉगर क्या करता है और? बाज़ार में नहीं बेच रहा?</strong> पहली बात तो यह कि हमने ऐसी कोई बात ही नहीं की, दूसरे यह कि कदाचित्‌ आपको पता न हो लेकिन <strong>गूगल और अन्य बहुत सी सेवाएँ ऐसे ही चल रही हैं, दूसरे का माल बेच कमा रहे हैं, और कुछेक के साथ ही कमाई बाँट रहे हैं, सब के साथ नहीं। आपको अचम्भा हुआ? यदि हाँ तो स्वागत है इंटरनेट की दुनिया में, यहाँ वाकई एक हाथ दूसरे को धोता है चाहे दूसरा पहले को न धोए!!</strong> ;)</p>
<p>फिर चौथा विस्फोट हुआ जो कि दूसरे और तीसरे विस्फोट की प्रतिध्वनि ही लगा जब तिवारी जी ने लिखा:</p>
<blockquote><p>हो सकता है एक ब्लागर के रूप में आप इस मिलन में शामिल हों और कुछ माले-मुफ्त दावत उड़ाकर संतोष कर लें लेकिन आपको इस बात का कतई अंदाजा नहीं होगा कि आपको पता भी नहीं चलेगा और आपको सरे बाजार बेच दिया जाएगा.</p></blockquote>
<p>जनाब बिक जाने का पता तो हमको भी नहीं चला। अब दो ही कारण हो सकते हैं कि या तो हमारी आत्मा मर गई है या फिर हम भी मूर्ख हैं जो <em>माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम</em> टाइप माल उड़ा लिए लेकिन आभास ही न हुआ कि कब बिक गए। पता लगे तो म्हारे को भी बता देना मालिक, बड़ी कृपा होगी।</p>
<p>पाँचवा विस्फोट(अब यही मान के चल रहा हूँ) हुआ तो लेकिन अपने को सिर पैर नहीं पता चला इसका क्योंकि संबन्धित ब्लॉग तथा ब्लॉग पोस्ट कदाचित्‌ मैंने पढ़ी नहीं। तिवारी जी बालक की यह भूल क्षमा करना, प्रयत्न पूरा किया था मैंने समझने का पर पिछले विस्फोट के कारण शंका तो हो ही गई है कि मैं भी मूर्खराज की गद्दी के चुनाव में खड़ा होने योग्य हो सकता हूँ। :)</p>
<p>अंत में संजय तिवारी जी ने आखिरी आतिशबाज़ी यह छोड़ी:</p>
<blockquote><p>सह-अस्तित्व और परिवार भावना की नींव पर खड़ा ब्लाग समुदाय अगर इस तरह के व्यावसायिक प्रयासों को मान्यता देता है तो हिन्दी ब्लागिंग के स्वभाव को विकृत होने से कोई बचा नहीं सकता.</p></blockquote>
<p>माई-बाप एक ओर तो आप सह-अस्तित्व की भावना का हवाला दे रहे हैं और दूसरे हाथ पर उसी का पुरज़ोर विरोध भी कर रहे हैं। यह कैसी माया है प्रभु, इस अज्ञानी को भी कुछ ज्ञान दीजिए। :)</p>
<p>दूसरी ओर अनिल रघुराज जी से यह पूछने की गुस्ताखी करूँगा कि संजय तिवारी जी की <a href="http://visfot.blogspot.com/2008/01/blog-post_09.html#c4034670755376949869" target="_blank">विस्फोटक पोस्ट पर टिप्पणी</a> करते हुए कहा कि इस <em>प्रोफेशनल ब्लॉगर मीट</em> से अचंभित हैं तो दूसरी ओर <a href="http://nuktachini.debashish.com/283#comment-7191" target="_blank">देबू दा द्वारा इसी मुद्दे पर लिखी पोस्ट पर टिप्पणी</a> देते हुए कहा कि ऐसे ब्लॉगर सम्मेलन उत्साह बढ़ाने वाले हैं!! जनाब यह हृदय परिवर्तन एकाएक? वैसे आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार भी हूँ कि आपने थोड़ा सा ही सही लेकिन विश्वास किया कि मैं इससे जुड़ा हूँ तो थोड़ी गंभीरता नज़र आती है। यकीन मानिए विश्वास करने वाले लोग शुरु में कम ही होते हैं इसलिए कुछ करने से पहले जो विश्वास करते हैं उनका विश्वास अमूल्य होता है। :)</p>
<p>साथ ही एक टिप्पणी स्पैमर से एडसैन्स फ्रॉड बने और अपने को ब्लॉगर कहने वाले एक साहब की पढ़ी थी जिसमें उन्होंने बताया कि उनको घोर आश्चर्य है कि हिन्दी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने वाले सम्मेलन का कार्यक्रम आदि अंग्रेज़ी में लिखा था!! वैसे तो कोई आवश्यक नहीं लेकिन इन साहब की शंका भी दूर किए देते हैं। तो जनाब वो ऐसा है कि "हिन्दी ब्लॉगिंग उत्थान" तो हमने टैगलाईन या मकसद में कहीं लगाया नहीं, हमारा मकसद तो "ब्लॉगिंग उत्थान" है; अब चाहे वह अंग्रेज़ी हो या हिन्दी या तमिल या बंगाली या गुजराती, ब्लॉगिंग तो ब्लॉगिंग ही होती है और ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है। अपन खुले दिल के हैं इसलिए ऐसा सोचते हैं। :) और दूसरी बात, अब पता नहीं कि आप आए थे कि नहीं परन्तु हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ब्लॉगिंग पर श्री अशोक चक्रधर जी तो हिन्दी में ही बोले थे अंग्रेज़ी में नहीं!! <a href="/2008/01/13/an-apology/">तबियत एकाएक नासाज़ हो जाने के कारण</a> मैं जा नहीं पाया था वर्ना विश्वास कीजिए मैंने भी हिन्दी में ही बोलना था!! ;)</p>
<p>विशेष धन्यवाद रवि रतलामी जी को जिन्होंने इस तरह के आयोजनों के बारे में बता संशक साथी चिट्ठाकारों को ज्ञान दिया। साथ ही ऐसा ही खास वाला धन्यवाद देबू दा को उनकी पोस्ट के लिए। उन सभी लोगों को भी आभार जिन्होंने रत्ती भर भी विश्वास किया। :)</p>
<p>
मैंने इस पोस्ट द्वारा पूरी ईमानदारी से उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश की है। अब यह कोशिश कितनी सफ़ल हुई और कितनी असफ़ल इसके निर्णायक तो आप, यानि कि पाठक और साथी ब्लॉगर, ही हैं।</p>
<p>एक बार पुनः कहूँगा, इस पोस्ट को लिखने के पीछे न किसी की बेइज़्ज़ती करने का इरादा है और न ही कोई व्यंग्य करने का। साफ़ दिल से यह पोस्ट लिखी है लेकिन यदि किसी को बुरा लगा हो(खासतौर से संजय तिवारी जी जिनका बहुतया उल्लेख है इस पोस्ट में) तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ क्योंकि बुरा लगाने की कोई मंशा न थी और न है। :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[माफ़ी चाहूँगा.....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/01/13/an-apology/</link>
<pubDate>Sun, 13 Jan 2008 12:02:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[हिन्दी ब्लॉगजगत में सबको निमंत्रण मै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लॉगजगत में सबको <a href="/2008/01/03/an-invitation/">निमंत्रण</a> मैंने दिया, पकड़-२ पूछा भी कि <a href="/2008/01/08/are-you-coming/">आ रहे हो कि नहीं</a>, लेकिन मौके पर मैं ही नहीं पहुँच सका। क्यों? ऐसी मेरी मजाल कैसे हुई?</p>
<div style="float:right;width:150px;text-align:center;font-weight:bold;border:3px dashed #660000;border-left:none;border-right:none;margin:10px 0 10px 10px;padding:5px 0;">दक्षिण भारत से भी कुछ लोग आए हुए थे जिनको हिन्दी नहीं आती। ऐसों में एक साहब याहू से भी आए थे जिनको याहू वालों ने कल सुबह बंगलोर से खासतौर पर इसी सभा के लिए उड़ाया था!!</div>
<p>तो हुआ यूँ कि हम आयोजकों को मौका-ए-वारदात पर सुबह तकरीबन दस बजे पहुँचना था(अलग से समोसे उड़ाने नहीं) ताकि सब तामझाम देख लिया जाए कि सब ठीक-ठाक है कि नहीं। अब मैं इसके लिए उठा सुबह छह बजे लेकिन तबीयत कुछ ठीक न लगी इसलिए अपना तापमान नापने का मीटर मुँह में घुसा यह नापा की अपने को तो 102 डिग्री बुखार है। मन ही मन खुंदक चढ़ी कि कमबख्त कल शाम तक तो ठीक-ठाक था एकाएक कैसे हो गया ये गोलमाल!! हो सकता है कि पिछले सप्ताह भर की अत्यधिक भागदौड़ और पिछले दो-तीन दिन से बिना नींद लिए काम करने की थकान के कारण हो गया हो। लेकिन हो गया तो हो गया, कुछ कर नहीं सकते इसलिए वार-फुटिंग पर बाकी साथी आयोजकों को फुनवा लगाए कि भई अपन तो आ नहीं सकेंगे इसलिए अपने आप संभालो और हमारे हिन्दी ब्लॉगजगत से जो बंधु आ रहे हैं उनका ज़िम्मा भी तुम्हीं पर है।</p>
<div style="float:left;width:150px;text-align:center;font-weight:bold;border:3px dashed #660000;border-left:none;border-right:none;margin:10px 10px 10px 0;padding:5px 0;">बहुत कोफ़्त भी होती है इस पर लेकिन यह आज का सत्य है कि सभी भारतीयों को हिन्दी नहीं आती। यह कल का सत्य न रहे इसी पर आप और हमको कार्य करना है और यही कदाचित्‌ अपने-२ तरीके से कर भी रहे हैं, हिन्दी को बढ़ावा देकर।</div>
<p>कुछ साथियों ने अपने-२ अड्डों पर आज रपट छाप दी है कि हुआ क्या था वहाँ और मैं न जाने कहाँ नदारद था। साथ ही यह भी कहा कि अंग्रेज़ी का बोलबाला था। तो पहले तो उनसे इस बात की क्षमा चाहूँगा कि उनको अपनत्व नहीं लगा, यकीन मानिए मैं होता तो पूरी कोशिश करता कि पूरा अपनत्व लगे। अभिषेक बक्शी ने जो सत्र लिया वह मैंने और उन्होंने साथ में लेना था और मैंने तो हिन्दी में ही बोलना था, लेकिन उनको श्रेय यह जाता है कि बंदे ने अपने आप मामला संभाल लिया, सुबह उनको भी सूचित कर दिया था कि भई अपना तो बैंड बज गया है इसलिए सिर्फ़ मन से वहाँ मौजूद रहेंगे तन से नहीं। दूसरी बात यह कि मुझे नहीं पता कि अपने बंधु लोग क्या सोच के आए थे लेकिन बंधुओं मैंने यह नहीं कहा था कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी का आयोजन है, यह ब्लॉग सभा थी जिसमें सभी भाषी आमंत्रित थे। कदाचित्‌ अपने हिन्दी ब्लॉगजगत के बंधुओं को न पता हो लेकिन दक्षिण भारत से भी कुछ लोग आए हुए थे जिनको हिन्दी नहीं आती। ऐसों में एक साहब याहू से भी आए थे जिनको याहू वालों ने कल सुबह बंगलोर से खासतौर पर इसी सभा के लिए उड़ाया था!! तो कार्यक्रम अंग्रेज़ी में इसलिए था कि सभी को कुछ न कुछ तो समझ आ ही जाएगा। मानता हूँ और बहुत कोफ़्त भी होती है इस पर लेकिन यह आज का सत्य है कि सभी भारतीयों को हिन्दी नहीं आती। यह कल का सत्य न रहे इसी पर आप और हमको कार्य करना है और यही कदाचित्‌ अपने-२ तरीके से कर भी रहे हैं, हिन्दी को बढ़ावा देकर। और साथी लोगों को अपनत्व की कमी न लगे इसलिए ही श्री अशोक चक्रधर जी का सत्र था। बालेन्दु जी आए इसके लिए उनको भी बहुत धन्यवाद, उनका सत्र भी रखवाते लेकिन उनका आना पहले से तय ना था और आखिर में ही तय हुआ था।</p>
<p>तो हाल-फिलहाल यह था मामला। मैं न आ सका, जानता हूँ यशवंत जी की मेरे से मिलने की तमन्ना थी तो उनसे और बाकी साथियों से माफ़ी चाहूँगा। जल्द ही पुनः मिलने का कार्यक्रम बनाया जाएगा खालिस हिन्दी वालों का, इसलिए टेन्शन नहीं लेने का। :D</p>
<p>रेवाड़ी(हरयाणा) से पधारे शैलेन्द्र यादव जी ने कुछ वीडियो उतारे जो कि <a href="http://lage-raho-india.blogspot.com/2008/01/blog-post.html" target="_blank">यहाँ उपलब्ध हैं</a>। उनको वीडियो उतार सबके साथ बाँटने और इतनी दूर से इस आयोजन में पधारने के लिए बहुत-२ धन्यवाद। :)</p>
<p>&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या आप आ रहे हैं?]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/01/08/are-you-coming/</link>
<pubDate>Tue, 08 Jan 2008 01:37:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सभी ब्लॉगर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी <a href="/2008/01/03/an-invitation/">पिछली पोस्ट</a> में मैंने सभी ब्लॉगर बंधुओं और पाठकों को खुला निमंत्रण दिया था। काहे का? अरे भई आगामी शनिवार 12 जनवरी 2008 को <a href="http://wiki.delhibloggers.in/delhi-bloggers-meets" target="_blank">दिल्ली में एक बहुत बड़ी ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> हो रही है। बड़े-छोटे प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध सभी प्रकार के ब्लॉगर आएँगे, ब्लॉग कंसलटेन्सी, मार्केटिंग आदि कंपनियों और ब्लॉगिंग के विभिन्न आयामों से जुड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि भी आएँगे, मीडिया वाले भी आएँगे। पर महत्वपूर्ण बात है कि आप आएँगे कि नहीं?</p>
<p>क्या आप आ रहे हैं? देखिए आप की के लिए <a href="http://www.techgazing.com/" target="_blank">अजय जैन</a> को पकड़े हैं ब्लॉग मार्केटिंग के फंडे बताने के लिए। और पकड़े हैं <a href="http://www.blogworks.in/" target="_blank">ब्लॉगवर्क्स.इन</a> वाले प्रसिद्ध ब्लॉगर और मार्केटिंग स्पेशलिस्ट <a href="http://www.blogworks.in/executive_profiles/profile_rajesh_lalwani_a_marke.php" target="_blank">राजेश लालवानी</a> को, साथ में हमहू भी एक प्रस्तुतिकरण करूंगा थोड़े तकनीकी विषय पर और पॉडकास्टिंग फोटोब्लॉगिंग आदि के बारे में बताऊंगा। इतने पर भी बस नहीं है, हिन्दी ब्लॉगर हूँ और हम हिन्दुस्तानी हैं तो उसका भी कुछ होना चाहिए ना? सभी अंग्रेज़ी वाले लोग कैसे चलेंगे, थोड़ा बैलेन्स होना माँगता, नहीं? इसलिए प्रसिद्ध हिन्दी कवि श्री अशोक चक्रधर को भी पकड़ लिए हैं, ऊ हिन्दी ब्लॉगिंग आदि पर बोलेंगे।</p>
<p>अब और का चाहिए आपको? इत्ता सब तो दे रहे हैं। साथ ही चाय नाश्ता आदि भी मिलेगा, और वह भी एकदम मुफ़्त!! :D तो इसलिए आप खुद भी आईये और अपने साथ जितनों को ला सकें(चाहे प्यार मोहब्बत से या फिर जबरन अगवा करके) अवश्य लाईये।</p>
<p>तो मिलेंगे फिर शनिवार को इस शानदार ब्लॉगर भेंटवार्ता में। :)</p>
<p><em>अधिक जानकारी के लिए और अपना नाम आंगतुकों की सूचि में जोड़ने के लिए <a href="http://wiki.delhibloggers.in/delhi-bloggers-meets" target="_blank">यहाँ देखें</a>। दिल्ली ब्लॉगर समूह का सदस्य बनने के लिए <a href="http://groups.google.com/group/thedelhibloggers" target="_blank">यहाँ क्लिक करें</a>।</em></p>
<p><strong>आप आ रहे हैं ना..... ??</strong><br />
&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[निमन्त्रण.....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2008/01/03/an-invitation/</link>
<pubDate>Thu, 03 Jan 2008 01:37:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
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<description><![CDATA[पिछली पोस्ट में मैंने समस्या, उसके विश]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="/2008/01/03/problem-analysis-solution/">पिछली पोस्ट</a> में मैंने समस्या, उसके विश्लेषण और उसके समाधान का ज़िक्र किया और इन सब पर थोड़ा प्रकाश डाला। उसी के तहत, समाधान के तौर पर बन रही वेबसाइट के लांच से पहले नई दिल्ली में हम लोग शनिवार 12 जनवरी 2008 को एक आयोजन कर रहे हैं। इस अवसर पर कई जाने माने ब्लॉगर तो उपस्थित रहेंगे ही, मीडिया की भी दल-बल के साथ कवरेज लेने के लिए शिरकत रहेगी। इसको आप एक बड़ी और व्यव्सथित तरीके से आयोजित की गई ब्लॉगर भेंटवार्ता भी समझ सकते हैं।</p>
<p>आप सभी इस अवसर पर सादर आमंत्रित हैं, खाना-पीना आदि सब हमारे ज़िम्मे आपको बस तशरीफ़ लानी होगी। :) आयोजन के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए और अपनी हाज़िरी लगाने के लिए कृपया <a href="http://wiki.delhibloggers.in/delhi-bloggers-meets" target="_blank">यहाँ देखें</a>। इसी अवसर पर दिल्ली ब्लॉगर्स समूह की चौथी वर्षगाँठ भी मनाई जाएगी।</p>
<p>हमें खुशी है कि इस आनंदमय अवसर पर माइक्रोसॉफ़्ट भी हमारे साथ एक प्रायोजक (sponsor) के रूप में है। :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उड़नतश्तरी से मुलाकात .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/11/22/face-to-face-with-flying-saucer/</link>
<pubDate>Thu, 22 Nov 2007 01:37:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/11/22/face-to-face-with-flying-saucer/</guid>
<description><![CDATA[उड़नतश्तरी, यानि कि समीर जी, दिल्ली में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://udantashtari.blogspot.com/" target="_blank">उड़नतश्तरी</a>, यानि कि समीर जी, दिल्ली में लैन्ड हुए और 13 नवंबर की शाम <a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/" target="_blank">नीरज</a> दादा के दौलतखाने पर मिलना तय हुआ। आने वालों में कुछ और लोग भी अपेक्षित थे लेकिन व्यस्तताओं और अन्य कारणों से वे नहीं आ पाए। बहरहाल, दादा ने हुक्म दनदनाया कि मैं समय से थोड़ा पहले पहुँच जाऊँ तो बेहतर रहेगा, कुछ इंतज़ामात जो करने थे वो हो जाएँगे। तो समय से पहले तो मैं पहुँच गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, दादा ने इंडिया टीवी दिखा झिलाने की सोची!! ;) लेकिन अपन भी तैयार होकर निकलते हैं, साथ में एक उपन्यास था जो कि पिछले 4-5 महीनों से मेरे बैग में रह मेरे साथ जगह-२ का सफ़र कर रहा है, अभी आधा ही पढ़ा गया है, तो मैं उसको निकाल पढ़ने लगा और इस तरह समय व्यतीत किया। तत्पश्चात निकले ठेके पर जाने के लिए, आखिर समीर जी आ रहे थे और महफ़िल जमानी थी, तो बिना शराब और कबाब के क्या मज़ा!! लेकिन रास्ते में मेरी मोटरसाइकल नाराज़ हो गई, इग्नीशन चालू न होकर दे। आखिरकार तुक्का लगाया और सेन्ट्रल लॉकिंग वाले रिमोट से चालू हो गई, किसी तरह राम का नाम भजते(दादा ही भज रहे थे, अपन नहीं) ठेके पर पहुँचे, वहाँ समीर जी और दादा के लिए तो व्हिस्की ले ली गई, लेकिन अपने लिए क्या लें यह सोच में पड़ गया क्योंकि ब्रीज़र तो थी नहीं उसके पास। खैर, मैंने सोचा कि खाने के साथ रेड वाइन (red wine) चल जाएगी तो काउंटर पर बैठे व्यक्ति से पूछा कि कौन सी ब्रांड की पोर्ट वाइन (port wine) होगी उनके पास। पहले तो वह मेरी शक्ल देख हैरानी में बैठा रहा कि पता नहीं क्या माँग रहा हूँ उससे, फिर उसके साथ बैठे एक समझदार व्यक्ति ने बताया और वह फिगुएरा की एक बोतल लेकर आया। तत्पश्चात हम लोग दादा के घर आ गए, तो मैंने बोतल देखी और सिर पीट लिया, उसको रेड वाइन (red wine) बोली थी लेकिन उसने व्हाईट वाइन (white wine) दे दी थी। फिर ध्यान आया कि मैंने तो सिर्फ़ "पोर्ट वाइन" देने को कहा था तो उसने पोर्ट वाइन (port wine) दे दी, रेड या व्हाईट तो मैंने बोला ही नहीं था। खैर, अब वापस जाने का मन नहीं था, इसलिए उसी से काम चलाने का निर्णय लिया और उसको ठंडा होने के लिए फ्रीज़र में रख दिया।</p>
<p>कुछ समय बाद समीर जी पधारे। और उसके कुछ समय बाद ही दादा के साथ ऑफिस में काम करने वाला उनका एक मित्र भी आ गया। समीर जी के बारे में जितना अनुमान लगाया था(उनके ब्लॉग आदि को पढ़कर) उससे कहीं अधिक हंसमुख वे निकले। जाम पर जाम और कबाब पर कबाब चलते रहे, और गपशप में समय बीतता रहा। उनके किससे सुनते और हंसी मज़ाक में कई घंटे बीत गए और पता ही नहीं चला। रात्रि के तकरीबन डेढ़-दो बजे समीर जी ने पुनः मिलने का वायदा कर विदा ली।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/2046642682/" title="उड़नतश्तरी वाले समीर लाल" target="_blank"><img src="http://farm3.static.flickr.com/2126/2046642682_ff94caae67.jpg" width="500" height="375" alt="उड़नतश्तरी वाले समीर लाल" /></a></p>
<p>समीर जी की एक बढ़िया सी फोटो खींचने का उनसे वायदा किया था, अब उस समय यही फोटो खींच सका, अच्छी है कि नहीं यह समीर जी स्वयं निर्णय करें। दोबारा मिलेंगे तो इससे अच्छा पोर्ट्रेट उनका लेने का पूरा प्रयास होगा। :)</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Catching Up!]]></title>
<link>http://exercisebeforeknitting.com/2007/09/30/catching-up/</link>
<pubDate>Mon, 01 Oct 2007 01:36:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>Elinor</dc:creator>
<guid>http://exercisebeforeknitting.com/2007/09/30/catching-up/</guid>
<description><![CDATA[Thanks for your positive comments about the new design and the new pattern! It&#8217;s good to be ba]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Thanks for your positive comments about the new design and the new pattern! It's good to be back. It's been a busy month chez ExerciseBeforeKnitting and I've missed all of my blog friends quite a bit! Fortunately, I was able to meet up with one of those bloggers <em>in real life</em> last weekend! Aaron, Beatrix and I were in Portland for a family event and staying <em>on the same block as <a href="http://www.knit-purl.com/">Knit/Purl</a> </em>so I met <a href="http://www.neitherhipnorfunky.com/">Christy</a> there for some great stash expansion and <a href="http://www.flickr.com/photos/elinorbrown/1461224162/">terrible photo-taking</a>. We had a great time and we both came home with some Shi Bui sock yarn and cheap Rowan Kid Classic.</p>
<p><img src="http://exercisebeforeknitting.wordpress.com/files/2007/09/img_5965.JPG" alt="img_5965.JPG" height="596" width="400" /></p>
<p>I have three or four scarves made out of Kid Classic so I thought I'd add to the color range with some red. Every summer for the last few years, my LYS has sold this for cheap at a sidewalk sale and I've made scarves with it. I don't believe I could ever stand a sweater made partly of mohair but it does make a light but very warm scarf.</p>
<p><img src="http://exercisebeforeknitting.wordpress.com/files/2007/09/img_5966.JPG" alt="img_5966.JPG" width="400" /></p>
<p>Since my Sunrise Circle was almost done when I left for Portland, I threw a new project in my bag so that I wouldn't have to carry around a huge, bulky sweater. It was the most rational thing to do, really! I cast on for <a href="http://www.garnstudio.com/lang/en/visoppskrift.php?d_nr=91&#38;d_id=8&#38;lang=us">DROPS Jacket No. 91-8</a> with some Knit Picks Wool of the Andes in Coal. Because I couldn't quite make the stitch gauge, I imagine my jacket will overlap in front a bit but I'm fine with that. I'll probably buy a nice pin to tack it closed. I now have the fronts, the back and one sleeve done with another sleeve and lots of border ribbing to go. And then there's the seaming on the Sunrise Circle...</p>
<p><img src="http://exercisebeforeknitting.wordpress.com/files/2007/09/img_5995.JPG" alt="img_5995.JPG" width="400" /></p>
<p>That's a big pile of pieces in need of seaming. *sigh* These days, it's easy to work in knitting time while studying but finishing requires my full attention so it will have to wait!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमहू भी स्केचियाएँ.....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/09/15/skitchy-sketchy/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 04:34:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/09/15/skitchy-sketchy/</guid>
<description><![CDATA[जुलाई में जीतू भाई के आगमन पर हुई रेगु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जुलाई में जीतू भाई के आगमन पर हुई <a href="/2007/07/18/regular-blogget-meet-some-moments/">रेगुलर ब्लॉगर मीट</a> के कुछ लम्हें मैंने यहाँ दिखाए थे। उस दिन ली सभी तस्वीरों में से एक फोटो से मैं कुछ दिन पहले समय मिलने पर पंगे ले रहा था, अलग-२ कुछ प्रयोग से कर रहा था, नतीजन एक बढ़िया सा स्केच बन गया तो आखिरकार आज उसको अपलोड कर दिया <a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/" target="_blank">अपने फ्लिकर गैलरी</a> में। लीजिए आप भी देखिए और मौज लीजिए। :)</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1383002161/" title="Bloggers' Day Out" target="_blank"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1377/1383002161_c40e755d03.jpg" width="500" height="375" alt="Bloggers' Day Out" /></a></p>
<p>( <em>बाएँ से दाएँ - नीरज दादा, जगदीश जी, श्रीश और जीतू भाई</em> )</p>
<p>असली फोटो जिससे पंगे लिए गए वह <a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/846166894/" target="_blank">यहाँ है</a>। इस स्कैच का रंगीन संस्करण <a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1383901970/" target="_blank">यहाँ है</a>।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉगर मीट फॉर टू]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/08/30/blogger-meet-for-two/</link>
<pubDate>Thu, 30 Aug 2007 01:37:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/08/30/blogger-meet-for-two/</guid>
<description><![CDATA[अब मिश्रा जी तो 27 अगस्त 2007 की ब्लॉगर मीट ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अब <a href="http://hindi.rcmishra.net/" target="_blank">मिश्रा जी</a> तो <a href="http://hindibloggersmeet.blogspot.com/2007/08/blog-post_25.html" target="_blank">27 अगस्त 2007 की ब्लॉगर मीट</a> की घोषणा कर दिए लेकिन डिफॉल्टिंग पार्टी भी वही थे, यानि कि स्वयं ही लेट हुए, एक बजे की जगह मुझे टेलीफोन पर पाँच बजे का समय दिया लेकिन फिर पाँच बजे भी पहुँचने में असमर्थता जताई। यह सुन मैंने सोचा कि चलो बढ़िया है, मैं भी ऑफिस के कार्य में फंसा हुआ था इसलिए मेरा भी आना दिक्कत वाला कार्य लग रहा था, कम से कम मेरे सिर दोष नहीं मढ़ा जाएगा। ;) कोई अन्य भेंटवार्ता स्थल पर पहुँचा होगा इसकी कोई जानकारी नहीं है।</p>
<p>मिश्रा जी के पास अब एक ही दिन और था, परसों यानि कि 28 अगस्त 2007 का, क्योंकि 29 अगस्त की उनकी सुबह एक बजे की वापसी की उड़ान थी। इधर हुआ यूँ कि मिश्रा जी के लैपटॉप की हार्ड-डिस्क नाराज़ हो गई थी, इसलिए उनको वह भी दिखानी थी। अब मुझसे सलाह माँगी तो मैंने अपने कंप्यूटर हार्डवेयर वाले का नंबर और पता दे दिया और कह दिया कि मेरा नाम ले देना। रक्षाबंधन के कारण हार्डवेयर वाले का ऑफिस बंद था, लेकिन भई अब मेरे रेफ़रेन्स से आया था बंदा और मैंने भी फोन कर कह दिया था तो मेरी बात की उसने लाज रख ली और मिश्रा जी के लिए अगले ने आकर ऑफिस खोला। ;) सांयकाल चार बज रहे थे और मिश्रा जी मुझे बराबर रिपोर्ट दे रहे थे, इधर मुझे समय मिल गया तो मैं पहुँच गया हार्डवेयर वाले के ऑफिस। मिश्रा जी की पुरानी हार्ड-डिस्क तो बोल गई थी, नई वाली हार्डवेयर वाले को लेकर आनी थी, तो हमने सोचा कि कहीं चल कुछ भोजन आदि कर लिया जाए और फिर वापसी में हार्डवेयर वाले के घर से मिश्रा जी का लैपटॉप ले लिया जाएगा। तो मिश्रा जी <a href="/2007/05/10/good-bye/">मेरी मोटरसाइकल</a> पर पीछे सवार हो चल दिए।</p>
<p>इरादा तो हमारा जनक पुरी के डिस्ट्रिक्ट सेन्टर वाले बर्कोस(Berco's) में जाकर <a href="http://food.wanderer.in/2007/05/01/good-place-for-chinese-food/" target="_blank">चाईनीज़ भोजन</a> करने का था, लेकिन हर जगह इतना ट्रैफिक जाम था कि मानो पूरी दिल्ली के वाहन सड़क पर उतर आए हों। लेकिन ये ट्रैफिक जाम वाहनों की अधिकता के कारण नहीं थे वरन्‌ जगह-२ पुलिस द्वारा लगाए गए मार्ग अवरोधों के कारण थे और उनके बगल में खड़े पुलिस वाले किसी-२ के कागज़ात आदि जाँचते(और रोकड़ा वसूलते) दिखाई दे रहे थे। इस कारण मेरे शॉर्टकट भी काम न आए क्योंकि मुख्य मार्गों पर ट्रैफिक रूका होने के कारण वे भी भरे हुए थे!! इसलिए आखिरकार अपने घर के पास डॉमिनोस(Domino's) में हम लोग पहुँचे और मिश्रा जी ने प्रसन्नचित्‌ हो पनीर वाला एक पिज़्ज़ा ऑर्डर किया। अब उनसे मैंने पूछा कि ऐसे प्रसन्न होने की क्या बात थी तो वे बोले कि इटली में यदि कहीं बाहर खाने जाते तो दो ही तरह के शाकाहारी पिज़्ज़ा मिलते थे, चीज़ पिज़्ज़ा(cheese pizza) और मशरूम(mushroom) वाला, इसलिए वे ये दो तरह के पिज़्ज़ा खाकर उक्ता गए थे और आखिरकार यहाँ ही उनको अलग तरह का शाकाहारी पिज़्ज़ा मिला। तो पिज़्ज़ा के आने के पहले और खाते समय इधर उधर की बातें हुई। समय बीत रहा था, छह बज गए थे और मिश्रा जी को वापस भी जाना था, नौ बजे हवाई अड्डे के लिए निकलना था, तो इसलिए उनको पहले नई हार्ड-डिस्क लगा उनका लैपटॉप दिलवाया और फिर उनको रोहिणी पूर्व के मेट्रो स्टेशन पर छोड़ मैं वापस हो लिया।</p>
<p>यादगार के तौर पर मिश्रा जी की निम्न तस्वीर ली।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/1259032243/" title="R.C.Mishra" target="_blank"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1424/1259032243_eb69df57a7.jpg" width="500" height="375" alt="R.C.Mishra" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रेगुलर ब्लॉगर मीट - कुछ लम्हें .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/07/18/regular-blogget-meet-some-moments/</link>
<pubDate>Wed, 18 Jul 2007 16:17:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/07/18/regular-blogget-meet-some-moments/</guid>
<description><![CDATA[आज की (रेगुलर)ब्लॉगर भेंटवार्ता में जी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आज की (रेगुलर)<a href="http://hindibloggersmeet.blogspot.com/2007/07/18.html" target="_blank">ब्लॉगर भेंटवार्ता</a> में जीतू भाई तो खैर आ ही गए, साथ ही <a href="http://epandit.blogspot.com/" target="_blank">श्रीश</a> से भी पहली बार मिलना हुआ। प्रस्तुत हैं उसी भेंटवार्ता से कुछ लम्हें। :)</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845274123/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1348/845274123_168ca04bdc.jpg" width="500" height="375" alt="P1000464" /></a><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - <a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/" target="_blank">नीरज</a> दादा, <a href="http://aaina2.wordpress.com/" target="_blank">जगदीश</a> जी</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845283013/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1291/845283013_6d339e7909.jpg" width="500" height="375" alt="P1000465" /></a><br />
( <em><a href="http://www.jitu.info/merapanna/" target="_blank">जीतू</a> भाई</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845290401/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1437/845290401_dc37e5e183.jpg" width="500" height="375" alt="P1000466" /></a><br />
( <em><a href="http://epandit.blogspot.com/" target="_blank">श्रीश</a></em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/846178038/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1215/846178038_db6754f164.jpg" width="500" height="375" alt="P1000471" /></a><br />
<em>दोपहर का भोजन - सरवण भवन में</em><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - श्रीश, <a href="http://srijanshilpi.com/" target="_blank">सृजन शिल्पी</a> जी, जगदीश जी</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845337955/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1213/845337955_066422ed79.jpg" width="500" height="375" alt="P1000480" /></a><br />
<em>दोपहर के भोजन के पश्चात - कैफ़े कॉफी डे में</em><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - सृजन शिल्पी जी, श्रीश</em> )</p>
<p>दोपहर के भोजन के पश्चात वापस इंडिया कॉफी हाउस(मोहन सिंह प्लेस) गए, वहाँ नोटपैड वाली मैडम जी पहुँच चुकीं थी, गर्मी अधिक थी और काफी हाउस सस्ता <em>बेतकल्लुफ़ी का अड्डा</em> ठहरा जहाँ महँगी एयरकंडीशनिंग नहीं थी(पंखा चले था वही बहुत था), इसलिए उन्हीं के आग्रह पर कैफ़े कॉफी डे की ओर सब रवाना हुए, पहला भरा हुआ मिला, दूसरे में थोड़ी प्रतीक्षा के बाद एक टेबल मिल ही गई, बाजू की टेबल पर <a href="http://udantashtari.blogspot.com/" target="_blank">समीर</a> जी से मिलती-जुलती शक्ल-सूरत वाले एक साहब बैठे थे, बेचारे इतने ब्लॉगरों को देख पतली गली से कट लिए। ;) थोड़ी देर बाद ही कैफ़े में नीलिमा जी आ गईं।</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/846222084/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1030/846222084_5c9de1ab1a.jpg" width="500" height="375" alt="P1000484" /></a><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - नोटपैड वाली मैडम जी, नीलिमा जी</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/846230374/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1077/846230374_e1321c36c8.jpg" width="500" height="375" alt="P1000488" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845377831/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1085/845377831_7db15e7979.jpg" width="500" height="375" alt="P1000489" /></a></p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/845387263/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1089/845387263_1940eea9cc.jpg" width="500" height="375" alt="P1000490" /></a></p>
<p>इस भेंटवार्ता सहित अभी तक मैंने जिन ब्लॉगर भेंटवार्ताओं में भाग लिया है उन सभी की तस्वीरें <a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/sets/72157594217557275/" target="_blank">यहाँ</a> हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हुआ न हुआ परसों की ब्लॉगर भेंटवार्ता में .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/07/16/happened-or-not-in-blogger-meet/</link>
<pubDate>Mon, 16 Jul 2007 01:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/07/16/happened-or-not-in-blogger-meet/</guid>
<description><![CDATA[परसों शनिवार को एक हिन्दी ब्लॉगर भेंट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>परसों शनिवार को एक हिन्दी ब्लॉगर भेंटवार्ता हुई, ऐसी हुई कि बस क्या कहें कैसी हुई, वैसे शैलेश बाबू ने <a href="http://merekavimitra.blogspot.com/2007/07/blog-post_15.html" target="_blank">विवरण</a> तो लिख ही दिया है। जैसा कि होता है, चूंकि मैं भी इस भेंटवार्ता में गया था तो मुझसे भी कुछ परिचितों ने कहा कि मैं भी लिखूँ। तो क्या लिखूँ? वैसे यह भी किसी ने कहा कि हर कोई अपने तरीके से लिख रहा है भेंटवार्ता के बारे में तो भई एक जीवित व्यक्ति लिख रहा है तो अपने नज़रिए से ही लिखेगा ना, मशीन तो नहीं कि निष्पक्ष रूप से लिखे, निष्पक्ष कोई नहीं रह सकता(चाहे बेशक ऊपर से न दिखाए)। भेंटवार्ता के बारे में खैर मैंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि मुझे पता है कि यदि मैंने अपने नज़रिए से अपनी शैली में लिखा तो कुछ को चुभन अवश्य होगी, ज़्यादा भी हो सकता है, क्योंकि मेरे जो दिल में होता है वह मैं कह देता हूँ, सूडो(psuedo) चरित्र/मानसिकता/व्यवहार नहीं है मेरा और यदि मैं नहीं समझता कि कहने योग्य बात है तो चुप रहता हूँ।</p>
<p>पर अब कुछ गलत प्रचार कर जो मेरी छवि को धूमिल बनाने का प्रयास किया जा रहा है उसके खिलाफ़ एक बार अवश्य बोलना चाहूँगा। पहले भी बहुतों ने मेरे खिलाफ़ अंट-शंट बकवास कर मेरी छवि को वैसे ही सूरदासों(बहुतया हैं इस दुनिया) की नज़रों में धूमिल किया है। वैसे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, धूमिल करते हो तो कर लो, मेरा क्या उखाड़ लोगे, मैंने कौन सी किसी से यहाँ रिश्तेदारी गांठनी है, जो प्यार-मोहब्बत से बोल लेता है उससे अपन भी प्यार-मोहब्बत से बोल लेते हैं, वर्ना मेरी बला से!!</p>
<p>बात आरंभ होती तो वैसे भेंटवार्ता स्थल से है, लेकिन उस पर बाद में, पहले समय के बारे में। शैलेश बाबू ने <a href="http://merekavimitra.blogspot.com/2007/07/blog-post_15.html" target="_blank">अपनी पोस्ट</a> में तो बहुत नर्मी से कहा है कि मैं लेट आया लेकिन वहाँ भेंटवार्ता में काफी रोष के से भाव से मुझे कहा कि मैं तो इतना विलम्ब से आया हूँ। <a href="http://sanuspoem.blogspot.com/2007/07/blog-post_15.html" target="_blank">जीतू भाई से भी शिकायत की गई</a> कि मैं लेट पहुँचा। ठीक है भई, पहुँचा, दिल्ली है और सुबह तथा सांयकाल सड़कों पर बहुतया वाहन इधर-उधर जा रहे होते हैं, जाम भी लग जाता है, पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करने में मुझे एक घंटे से अधिक समय लगा जो कि मेरी छवि को और धूमिल करता है क्योंकि परिचितों में ड्राईविंग के मामले में मुझे तेज़ समझा जाता है जो कि पंद्रह किलोमीटर जैसी मामूली दूरी दिल्ली की सड़कों पर बीस मिनट या कम में तय करता है। खैर, उसका कोई मलाल नहीं कि चिप-चिपी गर्मी में अधिकतर रास्ता सरक-२ कर तय किया, लेकिन एक बार लेट क्या पहुँच गए लोगों ने गला ही पकड़ लिया। भई इससे पहले भी हिन्दी ब्लॉगर भेंटवार्ता हुई हैं, बहुतों में मैंने भी भाग लिया है और यदि याददाश्त कमज़ोर नहीं है तो मैं पहले या समय पर भी पहुँचा हूँ, बहुत लोग लेट भी आए, लेकिन अपन तो किसी का गिरेहबान नहीं थामें कि लेट क्यों आए(चाहे मज़ाक में कह दिया कि लेट आए क्यों, लेकिन भाव वही कि लेट सही लेकिन आए तो)!! खैर, अब वह तो व्यक्ति-२ पर निर्भर करता है ना कि वे कैसे लेते हैं किसी बात को। तो भई लेट आए, स्वीकार किया, सूली पर चढ़ा दो, अब इससे अधिक भी कुछ बन सके तो वह भी कर लो!! या कहें तो आगे से जब देखूँगा कि लेट हो रहा हूँ तो आउँगा ही नहीं!! आयोजक-२ कर मेरा भजन-कीर्तन कर दिया!! कहाँ लिखा है कि आयोजन करने वाला रात भर से बैठ प्रतीक्षा करे या उसको कोई दिक्कत नहीं हो सकती जिस कारण वह लेट हो?? अफ़लातून जी को कोट(quote) करते हुए शैलेश बाबू ने लिखा है:</p>
<blockquote><p>
वैसे अफ़लातून ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि यह किसी की तरफ़ से आयोजित नहीं है। एक गेदरिंग है। इसलिए कोई आये या न आये, यह चिंता की बात नहीं है। स्वेच्छा है।
</p></blockquote>
<p>अफ़लातून जी ने उपस्थित जनों को यह ज्ञान देने की ज़हमत उठाई इसके लिए उनको साधूवाद। न, कोई व्यंग्य नहीं कर रहा हूँ वरन्‌ इस कार्य के लिए उनको 100% सत्य साधूवाद टिका रहा हूँ।</p>
<blockquote><p>कॉफ़ी का बिल भी टुकडो़ में बँट गया</p></blockquote>
<p>अब यह कह सुनीता जी पता नहीं क्या कहना चाह रही हैं, लेकिन मेरी पूरी कोशिश यही थी कि ऐसा न हो। वैसे तो मैं यह बात कभी न उठाता और कहता, छोटी-मोटी रेज़गारी की मैं टेन्शन नहीं लेता, लेकिन अब कहना आवश्यक लग रहा है। जब 1058 रूपए का बिल आया तो मैंने बिना किसी की ओर देखे और बिना किसी से कुछ कहे शराफ़त से पूरा भुगतान कर दिया। किसी से उसको उसके हिस्से के पैसे देने के लिए कहने का मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन अमिताभ त्रिपाठी जी को लगा कि पूरा बिल मुझे नहीं देना चाहिए इसलिए उन्होंने अपनी ओर से 500 रूपए मुझे जबरदस्ती थमा दिए, मेरी ना नुकुर नहीं चलने दी। खैर, बात यहीं समाप्त हो जाती, लेकिन किसी ने पूछा कि बिल कितना और मेरे मुँह से निकल गया "दे दिया भई चलो आगे बढ़ो"(उस समय मैथिली जी के यहाँ स्थानांतरण की प्रक्रिया आरंभ हो रही थी) तो जैसे कुछ में हड़कम्प मचा, कुछ ने सौ-सौ के नोट मुझे थमाए और कुछ ने अमिताभ जी को। बताना आवश्यक है कि संजय भाई ने भी अपना हिस्सा देना चाहा लेकिन उनकी मैंने एक नहीं चलने दी। लगभग सभी निकल गए थे, कुछ महिलाएँ रह गईं थी। रचना जी ने पूछ लिया कि उनको कितना देना है, तो मैंने कहा कि भुगतान हो चुका है, कुछ नहीं देना। लेकिन उन्होंने ज़िद की तो मैंने मुस्कुराते हुए कह दिया कि हम जेन्टलमेन हैं और लेडीज़ से पैसे नहीं माँग रहे(माँगे तो किसी से भी नहीं थे)। अब इतना कहना था कि रचना जी भड़क गईं। कदाचित्‌ उनसे मेरा परिचय न होने के कारण मेरी मज़ाक में कही बात को उन्होंने गंभीरता से ले लिया जिससे कदाचित्‌ उनके अह्‌म को ठेस लगी। रचना जी आपसे क्षमा चाहूँगा, आपके आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था। तो इस तरह <em>बिल टुकड़ों में बंटा</em>, लेखिका का इसको कहने के पीछे आशय क्या था यह विश्वास पूर्ण तो नहीं कह सकता लेकिन जो मैंने समझा उसके कारण मैंने जो वास्तव में हुआ वह लिख डाला।</p>
<p>अब बात आती है सूडोपन की, यानि कि फेक(fake) चरित्र/व्यवहार की। कुछ लोगों की आदत होती है कि स्वयं करना-धरना कुछ नहीं लेकिन दूसरे के करे में खामखा ज़बरदस्ती मीन-मेख निकालना। भई जब <a href="http://hindibloggersmeet.blogspot.com/2007/06/blog-post_06.html" target="_blank">भेंटवार्ता की घोषणा</a> की गई तो उस समय तो किसी ने आगे आकर नहीं कहा कि भई कोई आवश्यकता हो तो बताना, हम भी हाथ बंटाना चाहेंगे। कोई बहुत बड़ी चीज़ भी नहीं थी कि मैं किसी को मदद के लिए कहता। लेकिन जैसा कि एक प्रोपोगेन्डा(propoganda) के तहत हो रहा है, नारद से जुड़े हर व्यक्ति को क#$%ना साबित करने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है, जो सामने है उसी को पकड़ लो, चाहे अगला किसी को कुछ कह रहा हो या न कह रहा हो, लेकिन उसका बैन्ड अवश्य बजाना है। जीतू भाई को कहा गया कि वो गोली दे गए, "हम तो खास उन्हीं से मिलने आए थे" वगैरह। अब भई उनकी कोई निजी समस्या थी, नहीं आ पाए, जान लोगे क्या? ब्लॉगर भेंटवार्ता आवश्यक है कि वो समस्या को निपटाना? खैर जीतू भाई अपनी ओर से स्वयं बोलने में सक्षम हैं इसलिए मैं गुस्ताखी नहीं करूँगा। लेकिन अपने बारे में बोल सकता हूँ, इसलिए आगे।</p>
<p>तो जब भेंटवार्ता की घोषणा की गई थी तो मैंने स्वयं पहल कर स्थान का चुनाव किया था और कार्यक्रम बनाया था। आरम्भ में स्थान क्नॉट प्लेस में केवेन्टर्स के सामने स्थित कैफे कॉफी डे क्यों रखा इसका भी <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=8837#p8837" target="_blank">कारण</a> दिया था। कितनों को समझ आया, उसकी जानकारी मेरे पास उस समय नहीं थी, अब कुछ अंदाज़ अवश्य है। मसिजीवी आरंभ से ही भजे जा रहे थे कि कैफे कॉफी डे नहीं, लेकिन भई किसी चीज़ से सहमत नहीं तो उससे अच्छी कोई दूसरी भी तो सुझाओ। तो <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=8833#p8833" target="_blank">सुझाया तो उन्होंने अवश्य</a> और यदि सुझाव मान लिया जाता तो ब्लॉगर भेंटवार्ता परसों की चिपचिपी गर्मी में या तो इंडिया हैबिटैट सेन्टर(IHC या India Habitat Center) में हो रही होती जहाँ लोग ओपन एम्फीथियेटर(amphitheatre) में बैठे सूर्यदेव का आशीर्वाद ले रहे होते या दिल्ली हाट में बेतरतीब सूर्य की छतरी के नीचे बगल वाले ब्लॉगर बंधु की बात कम और माहौल की चिल्ल-पों अधिक सुन रहे होते। वैसे सुझाव और भी थे, जैसे कि राष्ट्रीय संग्रहालय जहाँ अभी आपने थोड़ा आवाज़ उँची की होती और आपको बाहर निकाल दिया जाता यह कह कि वह कोई कॉन्फ्रेन्स आदि की जगह नहीं है!! तब क्या होता, वही जो अब हो रहा है, सभी मेरी जान को रो रहे होते, क्योंकि आयोजन करने का गुनाह तो मैंने किया ना!! लेकिन सोचता हूँ कि क्या उस स्थिति में एक आवाज़(मसिजीवी की) कम होती मुझे लताड़ने में? ..... पता नहीं, निश्चित नहीं कर पा रहा हूँ, दिमाग का कंप्यूटर इस सवाल को पूछने पर सिस्टम ओवरलोड(system overload) का एरर(error) दे रहा है। यहाँ यह बात अवश्य नोट करने वाली है कि मसिजीवी जी को कैफे कॉफी डे से सख्त चिढ़ है, क्यों अब यह तो मुझे नहीं पता, कदाचित्‌ इसलिए कि मुझे वह पसंद है या फिर <a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post.html#comment-6217690049009744668" target="_blank">कॉफी संबन्धित अल्पज्ञान</a> के कारण या फिर .....</p>
<p>बहरहाल, बहुतों को कैफे कॉफी डे नापसंद आया, सबको लगा कि कोई रेस्तरां है और जैसे वहाँ कोई चर्चा करने को मना करता है। कैफे के एक भाग में 4-5 सोफ़े और कुछ कुर्सियाँ सैट करवा सभी बैठे थे। कैफ़े के उप-प्रबन्धक ने मुझे यह भी कह दिया था कि यदि और अधिक लोग आते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं होने देंगे, सब व्यवस्था है। क्यों कहा? क्योंकि इन साहब को मैं एकाध सप्ताह पूर्व <em>खासतौर से जनपथ जाकर</em> बताकर आया था भेंटवार्ता के बारे में, इसलिए परसों यह उनके लिए अपेक्षित था। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत सरवण भवन में सवा ग्यारह लंच के लिए जाने के बारे में लिखा था, लेकिन मैं स्वयं ही 12 बजे से कुछ मिनट पहले पहुँचा था तो क्या कहता। फिर भी मैंने तकरीबन बारह बजकर दस मिनट पर कहा भी कि सरवण भवन चला जाए यदि लंच की इच्छा है तो, लेकिन किसी ने मना कर दिया कि अभी कैफे में ही टिक के बैठें तो अन्य महानुभावों ने कोई रूचि ही नहीं दिखाई। तकरीबन बीस मिनट बाद बात पुनः उठी तो मैंने कहा कि यदि इच्छा है तो चलते हैं नहीं तो मुझे कोई समस्या नहीं है, शैलेश बाबू पुनः मुझ पर लेट आने की बात लेकर पिल पड़े!! खैर, मैंने और शैलेश बाबू ने सरवण भवन जाकर वेटिंग लिस्ट में नाम और लोगों की संख्या लिखवा दी, उन्होंने बोल दिया था कि कम से कम आधा घंटा लगेगा। इधर वापस आए तो लोगों को दिक्कत थी, मैथिली जी के ऑफिस चलने का किसी ने प्रस्ताव रखा और मैथिली जी का चेहरा हज़ार वाट के बल्ब की भांति तो चमका ही, बहुतों ने अपनी सहमति भी जताई। जब अधिकतर लोग जा रहे थे तो अपने को क्या ऐतराज़ हो सकता था, अपन भी साथ लगने को तैयार। कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा कि इस तरह स्थानांतरण हो, इसलिए रचना जी ने कैफे से ही विदा ली। लेकिन इस बात के लिए मेरे सिर दोष मढ़ना कहाँ तक सही है?</p>
<p>जब सभी बाहर निकल ही गए थे तब मसिजीवी जी बीवी-बच्चों समेत पधारे। उन्होंने द्वार से अंदर जाते समय किसी से(किससे यह ध्यान नहीं) पूछा कि कहाँ जा रहे हैं सब तो उनको बताया गया कि मैथिली जी के यहाँ स्थानांतरण हो रहा है, कैफे में बात नहीं हो पा रही है अच्छे से। छूटते ही साहब ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा, "मैंने तो पहले ही कहा था"। साहब ने क्या कहा था वह मुझे सब पता है, और उस बारे में मैं ऊपर लिख चुका हूँ, दोहराव की आवश्यकता नहीं समझता। लेकिन अभी अति कहाँ थी, अभी तो <em>ठेठ हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने</em> वाले बाऊजी के दिल में गुब्बार बाकी था। तो मुझे <a href="http://shabdashilp.blogspot.com/2007/07/mystery-of-missing-jitendra-chaudhary.html" target="_blank">गूफ़-अप(goof up), यानि मूढ़ता</a>, का चैम्पियन तो करार दिया ही, साथ ही ऐरोगैन्ट(<a href="http://www.shabdkosh.com/en2hi/arrogant" target="_blank">arrogant</a>), यानि कि अभिमानी/हठी, के खिताब से भी नवाज़ा।</p>
<blockquote><p>
If someone can bring about goof ups well he got to be Amit.  Yes he is so good at it and he did it again with razor sharp precision. We reached there..(where well cafe coffee day at Janpath) It was all Amit's plan after it the only outlet that serves Irish his favorite. So  Hindi bloggers  reached there in big numbers and there it is, cafe staff objected, repeatedly asked for orders and blaw blaw By the time 'we' reached it was already decided that we will have to move out. Not that it was not forewarned but  Amit as usual arrogantly yours, rubbished it.
</p></blockquote>
<p>किसी बात को गलत समझ के उसको मिर्च लगा के बताने के बारे में भी अवश्य पढ़ाते होंगे, अजी अतिश्योक्ति अलंकार भी तो कोई चीज़ होती है!! थोड़ी बहुत हिन्दी तो अपन भी समझ लेते हैं जी, किसी को पढ़ाने लायक नहीं आती बस!! ;)</p>
<p>बहरहाल, आगे महाशय लिखते हैं:</p>
<blockquote><p>
Many who decided to stuck to meet had to move 15 odd more kilometers to reach East of Kailash and despite all the good efforts of organisers it wasn't that comfortable, as it could have been at Pragati Maidan which  Maithily suggested earlier. <strong><em>sweatily everyone participated</em></strong>.
</p></blockquote>
<p>गौरतलब है कि मुझे बिलकुल इल्हाम नहीं था कि प्रगति मैदान में बाहर खुले में एयरकंडीशनर लगावाने का प्रबन्ध किया गया था या किसी तरह सूर्य के तेज़ को परसों मंद कर देने का कोई जुगाड़ किया जा सकता/चुका था, कदाचित्‌ कोई दिव्यास्त्र ही चलता, या सबको धूप के चश्में पहना शतुरमुर्ग बना दिया जाता!! ;) वो तो कैफे कॉफी डे वालों को अवश्य आभार दूँगा कि कन्सिडरेट(considerate) लोग इस बात का ख्याल रखते हैं कि गर्मियों में ग्राहकों को पसीना न आए और सर्दियों में ठंड न लगे। तो ऐसी बातें सुन/पढ़ मुझे थोड़ा बुरा भी लगता है, थोड़ा क्रोध भी आता है, लेकिन उस सबसे अधिक बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर तरस आता है और उस कारण बुरा लगना या क्रोध आना सब लगभग नगण्य हो जाता है। <em>अब मुझे ख्याल आता है कि अपने कॉलेज के समय में एकाध अध्यापकों को छोड़ मुझे अन्यों पर तरस ही आता था। क्यों? क्योंकि मैं कोर्स की किताबों के अतिरिक्त विषय संबन्धित डिटेल वाली अन्य किताबें भी पढ़ता था(लायब्रेरी में सड़ रहीं होती थी) और फिर हासिल की गई जानकारी को प्रयोग भी करके देखता था(अन्यथा पूरे तीन साल 160 से अधिक विद्यार्थियों में से किसी में ऐसी धृष्टता करने का साहस नहीं हुआ कि बीच क्लास में हर पाँच मिनट में अध्यापिका को टोक यह बता सके कि वह गलत बता गई है या पढ़ा रही है)।</em></p>
<p>यह भी हाईलाईट(highlight) करने की कोशिश की गई है कि कैफे में चर्चा नहीं हो पा रही थी। अब जैसे मैंने देखा उसके हिसाब से तो जिस तरह कैफे में बैठे थे उसी तरह मैथिली जी के दफ़्तर में भी बैठे थे। जिस तरह कुछ टोलियाँ बन कैफे में बातचीत हो रही थी उसी प्रकार मैथिली जी के यहाँ भी हो रही थी और ऐसे ही होती रहती यदि सृजन जी सबको टोक एक ही चर्चा में भाग लेने के लिए नहीं कहते। तो क्या लोग यह कहना चाह रहे हैं कि यह मैथिली जी के दफ़्तर में विराजमान दैवीय शक्ति का प्रभाव था कि सृजन जी ने ऐसा कहने की हिम्मत दिखाई? न भई, ऐसे मत कहो, सृजन जी में वैसे ही हिम्मत की कमी नहीं है, जो उन्होंने मैथिली जी के दफ़्तर में किया वो कैफे में भी कर सकते थे। और मैं समझता हूँ कि यह बात कदाचित्‌ मैथिली जी को भी नहीं पता होगी, उनके लिए तो यह वाकई आश्चर्यजनक होगा। तो भई काहे भले मानस को टेन्शन में डालते हो, मैं नहीं चाहता कि वे पंडित जी के पास जाकर दक्षिणा दे इसका कारण जानने का प्रयास कर समय और धन व्यर्थ करें, उनके पास करने के लिए अन्य आवश्यक कार्य हैं जिनसे कईयों का भला होगा न कि सिर्फ़ एक पंडित का।</p>
<p>मुझसे कईयों ने पूछा कि कैसी रही भेंटवार्ता, तो मुझे नहीं समझ आ रहा था कि यदि मैं कहूँ कि मेरे अनुसार केवल दो ही बताने योग्य चीज़ें हुई थीं भेंटवार्ता में; एक मैथिली जी के सुपुत्र सिरिल से उनके केबिन में हुई कुछ मिनट की सार्थक बातचीत(परिचय अधिक हुआ एक दूसरे का, आशा है असल बातचीत तो भविष्य में होगी) और दूसरी मैथिली जी की मेज़बानी, तो भलेमानस और बुद्धिजीवी पता नहीं क्या अर्थ निकालेंगे। अब निकालेंगे तो निकालते रहें, अपने को कोई फर्क नहीं पड़ता। सिरिल से अधिक बातचीत होने के पूरे आसार नज़र आ रहे थे, लेकिन बीच में ही परदा गिराने अरूण जी आ गए और जबरन यह बताते हुए बाहर लिवा लाए कि ब्लॉगरों की अदालत में मेरा हॉट सीट पर बैठने का सबसे पहला नंबर है, और यकीनन घुघूती जी परिचर्चा के नाम का गोला दागने के लिए एकदम तैयार बैठीं थीं!! ;)</p>
<p>परसों की भेंटवार्ता ने दो चीज़ें अवश्य सिखा दी। पहली तो यह कि मुझे आगे से कभी आयोजन नहीं करना। सृजन जी और जगदीश जी मुझे अक्सर कहते रहते हैं कि भई करो, दिल्ली की अगली भेंटवार्ता सैट करो, तो अब अनुरोध है कि आगे से मत कहिएगा जी, परिणाम आप देख ही रहे हैं, मुझे आयोजन करने की न तो तहज़ीब है और न ही अक्ल, इसलिए आशा है कि आगे से आप मेरी भद्द पिटवाने को मुझसे नहीं कहेंगे। जो इस भेंटवार्ता में सम्मिलित हुए, <a href="http://epandit.blogspot.com/2007/07/misunderstanding-about-blogger-meet.html" target="_blank">जो नहीं हो पाए</a> और <a href="http://mamtatv.blogspot.com/2007/07/blog-post_14.html" target="_blank">जो आकर चले गए</a>, आप सभी को मेरी <em>गूफ़-अप</em> की आदत और <em>ऐरोगेन्स</em> के कारण जो कष्ट हुआ उसके लिए क्षमा चाहूँगा, आशा है कि आपके बड़े दिल में मुझ <em>ऐरोगेन्ट</em> के लिए क्षमा अवश्य होगी। साथ ही आशा भी है कि जो <em>बुद्धीजीवी</em> और <em>अच्छा आयोजन</em> करने वाले इस बार के <em>ऐरोगेन्स</em> भरे आयोजन से चिढ़े हुए थे वे भविष्य में स्वयं यह साबित करेंगे कि उनमें सिर्फ़ बकर-२ करने का गूदा है या कुछ (बेहतर)<em>ऐरोगेन्स</em> रहित कर दिखाने की समझ है। </p>
<p>दूसरी चीज़ यह सीखी कि हर किसी को कॉफी पब कल्चर की जानकारी नहीं, इसलिए हो सकता है लोग यह सोच चर्चा आदि करने में हिचकिचा रहे हों कि रेस्तरां वाले कहीं आपत्ति न उठाएँ। जिनको भी ऐसा लगा उनको यह बताना चाहूँगा कि ऐसा कुछ नहीं है, बरिस्ता और कैफे कॉफी डे में आम रेस्तरां वाला माहौल नहीं कि जैसे ही आपकी चाय-कॉफी समाप्त हुई आपको जाना होगा। इन जगहों पर मैंने सुबह/दोपहर में लोगों को कैरमबोर्ड आदि खेलते हुए भी देखा है, रात्रि भोजन के पश्चात गिटार बजा गाना गाते भी देखा है और बेतकल्लुफ़ हो चर्चा करते तो सदैव देखा है।</p>
<p>इस भेंटवार्ता के पूर्ण होने पर मैं मैथिली जी को धन्यवाद देता हूँ कि मामला उन्होंने संभाल लिया वरना अपने को तो जूते-चप्पल पड़ जाने थे। उनकी मेज़बानी के लिए भी मैं तहेदिल से(झूठा नहीं) शुक्रिया करता हूँ और उनसे अनुरोध है कि भविष्य में वे कम से कम मुझे तो खान-पान आदि के बिल मे योगदान देने देंगे(दोपहर का लंच मैथिली जी की ओर से हुआ) अन्यथा उनकी मेज़बानी स्वीकारने में वाकई हिचकिचाहट होगी।</p>
<p><a href="/2007/07/15/super-blogger-meet-some-moments/">जो तस्वीरें मैंने ली थीं</a> उनको तो पोस्ट कर ही चुका हूँ, जो देखना चाहें देख लें।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[महा-ब्लॉगर मीट - कुछ लम्हें .....]]></title>
<link>http://itsme.wordpress.com/2007/07/15/super-blogget-meet-some-moments/</link>
<pubDate>Sun, 15 Jul 2007 08:02:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>Amit</dc:creator>
<guid>http://itsme.wordpress.com/2007/07/15/super-blogget-meet-some-moments/</guid>
<description><![CDATA[कल की महा-ब्लॉगर भेंटवार्ता/मीट में अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल की <a href="http://hindibloggersmeet.blogspot.com/2007/06/blog-post_06.html" target="_blank">महा-ब्लॉगर भेंटवार्ता</a>/मीट में अपने कैमरे में कैद किए कुछ पल। तो देखिए उन लम्हों को मेरी नज़र से। :)</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/810056339/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1124/810056339_3580811b6e.jpg" width="500" height="375" /></a><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - <a href="http://www.hindigear.com/" target="_blank">मैथिली</a> जी, <a href="http://merekavimitra.blogspot.com/" target="_blank">शैलेश</a>, <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/" target="_blank">संजय</a> भाई</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/810947022/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1358/810947022_37e925f865.jpg" width="500" height="375" /></a><br />
( <em><a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/" target="_blank">संजय</a> भाई</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/810078079/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1315/810078079_4a010e6b90.jpg" width="500" height="375" /></a><br />
( <em><a href="http://srijanshilpi.com/" target="_blank">सृजन शिल्पी</a> जी</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/810085849/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1259/810085849_9fa13d0399.jpg" width="500" height="375" /></a><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - मोहल्ले वाले अविनाश बाबू, समाजवादी जनपरिषद के अफ़लातून महोदय</em> )</p>
<p><a href="http://www.flickr.com/photos/amit_gupta/810104001/" target="_blank" title="Click for bigger photo"><img src="http://farm2.static.flickr.com/1203/810104001_5d8b575b01.jpg" width="500" height="375" /></a><br />
( <em>बाएँ से दाएँ - <a href="http://aaina2.wordpress.com/" target="_blank">जगदीश</a> जी, <a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/" target="_blank">नीरज</a> दादा, मोहल्ले वाले अविनाश बाबू</em> )</p>
<p>इस भेंटवार्ता सहित अभी तक मैंने जि