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	<title>arbic &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/arbic/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "arbic"</description>
	<pubDate>Thu, 22 May 2008 18:26:29 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 16:17:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>चंद पलों की खुशी की खातिर<br />
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना<br />
भला कौनसी अक्लमंदी है<br />
सब कुछ करते हैं हम<br />
अपने नाम के लिए<br />
लेते हैं इसका और उसका नाम<br />
हम करतार नहीं है<br />
सब जानते हैं<br />
फिर भी हर पर अपना काम<br />
लिखा हो यही मानते हैं<br />
आजाद लगती हैं अक्ल<br />
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को<br />
निभाने के लिए समाज की बंदी है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर सम्मान-हिन्दी हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 15:31:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=150</guid>
<description><![CDATA[बहुत शोर सुनते थे
कोई तरकश चलता
ब्लोग ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत शोर सुनते थे<br />
कोई तरकश चलता<br />
ब्लोग जगत में सजा रहा है<br />
किसी सम्मान की दुकान<br />
देखा तो निकले दस तीर<br />
निकले उसमें थे दस वीर<br />
दावा यह किया कि बस<br />
यही लिखते हैं अंतर्जाल पर अच्छा<br />
बाकी   पेश करते हैं कच्चा<br />
बस इनका ब्लोग ही हमें<br />
ब्लोग की तरह हमेशा फबता  </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
चल पडी हैं हिन्दी ब्लोग में<br />
एक और दुकान<br />
अंतर्जाल पर आयी है हिन्दी तो<br />
साथ लाई है साहित्य से वैसे  लोग भी<br />
जो हर साल बाटेंगे और<br />
बटोरेंगे कई इनाम<br />
लिखने से अधिक पायेंगे सम्मान<br />
अपने  ही तर्कों का करेंगे  अपमान<br />
जो वेब साईट नहीं उठा पा रही<br />
अपने पाठको को बोझ<br />
उन्हें ही ब्लोग जगत पर सजाएंगे<br />
इनाम पाने के लिए ब्लोगर  कहलायेंगे<br />
आज यह सम्मानित करेंगे तो<br />
तो  कल  उनसे सम्मानित हो जायेंगे<br />
हम तो ठहरे छोटे शहर के ब्लोगर<br />
भला कहाँ बडे शहर वालों से जीते पायेंगे<br />
पर देख-देख कर अपना मन बहलायेंगे<br />
हास्य का रस यहाँ बिखेरते जायेंगे<br />
उन्मुक्त हास्य भाव दिखाएँगे<br />
उनके एक  तरकश में है<br />
केवल तीर दस<br />
हमारे बारह तरकश में<br />
कई हैं शब्दों के तीर<br />
हमने पसंद  उनकी  चलते देखना<br />
सम्मान पाना तो उनको ही फबता<br />
--------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भोर में ही शुरू शोर -हिन्दी कविता साहित्य ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/?p=149</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 04:13:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/?p=149</guid>
<description><![CDATA[अभी हुई है भोर
शुरू कर दिया उन्होने शो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अभी हुई है भोर<br />
शुरू कर दिया उन्होने शोर<br />
कैसे न होंगे दिन भर बोर </p>
<p>जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था<br />
वहाँ लगा रहे हैं दिमाग पर जोर<br />
कुछ सीखना था प्रात:<br />
परमात्मा का नाम लेकर<br />
डाल दिया मुहँ में रोटी का कोर<br />
आदमी सुख तो चाहता है<br />
पर दिल में उसके अहसास के लिए<br />
कोई कोना बाकी नहीं  है<br />
चारों तरफ भरा है शोर<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रौशनी और अँधेरे का व्यापार-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/roshni-aur-andhere-ka-vyapar-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 27 Jan 2008 09:27:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/01/27/roshni-aur-andhere-ka-vyapar-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वादों के बादल बरसने का<br />
मौसम जब आता है<br />
यादों पर ग्रहण लग जाता है<br />
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि<br />
कौनसा सा वादा बरसाया जाये<br />
किस याद को लोगों के दिमाग<br />
से  भुलाया जाये<br />
तमाम के लगाते नारे रचकर<br />
हवाई किला   किया जाता है खडा<br />
जो  कभी खुद नहीं चलते<br />
उसके  दरवाजे कितने भी हों  आकर्षक<br />
रास्ता एक कदम बाद ही<br />
दीवार से टकरा जाता है<br />
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए<br />
अभिनय करते हुए जजबातों के<br />
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए<br />
अँधेरे का डर दिखाकर<br />
अपना  करते हैं व्यापार<br />
कहते हैं कि दूध का जला<br />
छांछ भी फूंक कर पी जाता है<br />
पर यहाँ तो आदमी कई बार<br />
जलने के बाद भी आदमी<br />
फिर पीने के लिए  जीभ जलाने आ जाता है<br />
---------------------------------------------------------</p>
<p>अँधेरे न होते तो<br />
रौशनी का व्यापार कौन करता<br />
रोशनी ही न होती अंधेरों से कौन डरता<br />
जिन्दगी इसी घूमते पहिये का नाम है<br />
एक करता जेब खाली दूसरा भरता<br />
--------------------------------------<br />
नोट-यह पत्रिका कहीं भी लिंक कर दिखाने की अनुमति नहीं है. दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
]]></content:encoded>
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