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	<title>anugoonj &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/anugoonj/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "anugoonj"</description>
	<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 12:49:41 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=406</link>
<pubDate>Tue, 13 May 2008 17:30:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=406</guid>
<description><![CDATA[हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3>हादसों की खबर से अब<br />
शहर सिहरता नहीं<br />
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने<br />
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी<br />
जताने के लिये निकलता नहीं<br />
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें<br />
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये<br />
जानते नहीं कि<br />
कोई दूसरे को देखेगा तो तब<br />
अब अपने से आगे देखने की<br />
रौशनी और चाहत होगी<br />
किसी की आंखों  में<br />
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी<br />
आदमी अब सिहरता  नहीं<br />
.............................</h3>
<h3>शांति की बात सियारों से नहीं होती<br />
पीठ पीछे वार करने वालों से<br />
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती<br />
जो यकीन करते हैं उन पर<br />
मुसीबत में किसी की भी<br />
उनसे हमदर्दी नहीं होती<br />
.....................</h3>
<h3>जख्म बांटना ही उनका काम है<br />
इसलिये ही तो उनका नाम है<br />
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की<br />
ख्वाहिश करते हैं कायर<br />
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है<br />
.............................<br />
आग लगाना उनका काम है<br />
मिलते उनको दाम है<br />
कौन देता है कीमत<br />
कौन खरीदता है लाशें<br />
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में<br />
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा<br />
सच तो सब जानते हैं<br />
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है<br />
...............................</h3>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=401</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 16:53:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/?p=401</guid>
<description><![CDATA[ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसकी पत्नी ने  उसे दूसरे ब्लागर के मिलने की खबर  अंदर आकर सुनायी। उसने कहा-‘बोल दो घर पर नहीं है।’</p>
<p>तब तक दूसरा ब्लागर अंदर आ गया और बोला-‘भाई साहब हमसे क्या नाराजगी है?’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘नाराजगी तुमसे नहीं है। तुम्हारी भाभीजी से है तुम्हें अंदर न बुलाकर हमें यह बताने आयीं हैं कि तुम आ गये हो। वैसे हमारी नजरें बहुत तेज हैं और हमने देख लिया था कि तुम अंदर आये हो।’</p>
<p>वह आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला-‘‘भाभीजी, आप मुझे शिकंजी पिलाईये। भाई साहब जरूर शिकंजी पीते हैं-ऐसा मेरा विश्वास है।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘पर यह बात हमने अपने किसी ब्लाग पर तो नहीं लिखी।’</p>
<p>दूसरा ब्लागर बोला-‘मैने अंदाजा कर लिया था। शिकंजी पीकर  इंटरनेट पर  ब्लाग पर  अच्छी तरह लिखा जा सकता है।’</p>
<p>भद्र महिला चली गयी तो वह अपने असली रूप में आ गया और बोला-‘पर जरूरी नहीं है कि शिकंजी पीकर हर कोई ब्लाग पर अच्छा लिख सकता हो।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘हां इसमें कोई शक नहीं है, अगर वह कुछ लिखता हो तो?’<br />
दूसरे ने ब्लागर ने कहा-‘हम पर फब्तियां कस रहे हो!<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘और तुम क्या कर रहे थे?वैसे इधर कैसे भटक गये।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘‘मैं एक  क्रिकेट प्रतियोगिता करा रहा हूं। जिसमें चार ब्लागर और चार कमेंटरों की टीमें हैं। मै चाहता हूं कि तुम उनके लिये कोई एक्शन सीन लिख दो।’</p>
<p>तब तक गृहिणी शिकंजी के ग्लास बनाकर लायी। उसने जब सुना कि कोई क्रिकेट के एक्शन सीन की बात हो रही है तो वह उत्सुकतावश वहीं एक तरफ बैठ  गयी।<br />
पहला ब्लागर-‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन? और इतने सारे ब्लागर और कमेंटर तुम्हारे पास आये कहां से? क्या कहीं से नीलामी में ले आये क्या?’</p>
<p>दूसरा ब्लागर अब गृहिण की उपस्थिति के आभास होने पर सम्मान के साथ  बोला-‘अरे भाईसाहब, आप भी कैसी बात करते हो। अरे, आजकल वह समय गया। आप देख नहीं रहे कहां का खिलाड़ी कहां खेल रहा है। शहर का वासी हो या न हो तो पर उस शहर की तरफ से खेल तो सकता है। वैसे ही ब्लागर हो या न हो, कमेंटर हो या न हो और उसने कभी इंटरनेट खोला भी न हो पर हमने कह दिया कि ब्लागर तो ब्लागर। हमें अपने काम और कमाई से मतलब है।’<br />
दूसरा ब्लागर उसे हैरानी से देखने लगा। फिर वह बोला-‘‘आप तो कुछ एक्शन सीन लिख दो। आजकल तो क्रिकेट के साथ एक्शन भी जरूरी है। किसी खिलाड़ी को किससे लड़वाना है। लड़ाई के लिये वह कौनसा शब्द बोले यह लिखना है। थप्पड़ या घूसा किस तरह मारे और दूसरे के जोर से लगता दिखे पर लगे नहीं इसलिये मैं ही एक्शन डायरेक्टर तो मैं ही रहूंगा पर यह तो कोई पटकथा लेखक ही तय कर सकता है।  फिर उसके लिये कमेटी होगी तो उसमें बहस के डायलाग लिखवाना है। सजा का क्या हिसाब-किताब हो यह भी लिखना है।  एक-दो खिलाड़ी ऐसे है जिनको एक दो मैच बाद बाहर बैठने के लिये राजी कर लिया है। उसके लिये तमाम तरह का प्रचार कराना है।</p>
<p>गृहिणी ने पूछा-‘पर यह किसलिये?’</p>
<p>वह बोला-‘अपने शहर की इज्जत बढ़ाने के लिये। देखिये हमारे शहर की कोई टीम नहीं बुला रहा। इसलिये मैं अपने शहर में क्रिकेट के खेल के विकास के लिये यह कर रहा हूं। स्थानीय मीडिया मेंे भी इसके लिये संपर्क साध रहा हूं ताकि अधिक से अधिक लोग वहां पहुंचे। और हां, इटरवैल में नाच गाने का भी इंतजाम किया है।’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मैने आज तक कोई नाटक नहीं लिखा।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘इसमे लिखने लायक है क्या? यह तो सब आसानी से हो जायेगा। बस थोड़ा सोचना भर है। मुझे अन्य व्यवस्थायें देखनीं नहंी होतीं तो मैं ही इस पर लिखता।’’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मेरे बूते का नहीं है। जब झगड़ा कराना है तो उसके लिये कुछ ऐसा वैसा लिखना जरूरी है, और इस मामले में तुम जितने दक्ष हो मैं तो हो ही नहीं सकता।’</p>
<p>गृहिणी ने दूसरे ब्लागर की तरफ देखकर कहा-‘आपने तो सारे सीन पहले ही  सोच लिये है। एकदम जोरदार कहानी लग रही है। बस आपको तो शब्द ही तो भरने हैं। अभी आप यह सीन बताकर जा रहे हैं यह तो उसे भी याद नहीं रख पायेंगे।फिर लिखेंगे कहां से? आप कोशिश करो तो अच्छा लिख लोगे।’<br />
दोनो ने शिकंजी का ग्लास खत्म किया तो वह दोनों ग्लास उठाकर चली गयी । दूसरा ब्लागर बोला-‘‘ठीक है जब क्रिकेट मैच कराना है और उसमें एक्शन के सीन रखने हैं तो यह भी कर लेता हूं। देखो भाभीजी ने हमारा हौंसला बढ़ाया। एक तुम हो जब तब ऐसी वैसी बातें करते हो। भाभीजी बहुत भले ढंग से पेश आतीं हैं और तुम........................छोड़ो अब तुमसे क्या कहूं</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, पर याद रखना मैंने तुम्हारी उस तुम्हारी पहले और आखिरी कमेंट के बारे में उसे कुछ नहीं बताया। क्या इसके लिये मुझे धन्यवाद नहीं दोगे?<br />
दूसरे ने कहा-‘‘अच्छा मैं चल रहा हूं। और हां, इस ब्लागर मीट पर भी कुछ अच्छा लिख देना ताकि मेरी प्रतियोगिता को प्रचार मिले। फिर देखो तुम्हें कैसे फ्लाप से हिट बनाता हूं।’</p>
<p>वह चला गया और गृहिण ने पूछा-‘‘क्या कहा उसने?’</p>
<p>पहले ब्लागर ने कहा-‘तुमने भी तो सुना! यही कहा‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना’।’’</p>
<p>फिर वह मन में सोचने लगा-‘मैने इस बार भी नहीं पूछा कि इंटरनेट पर बने ब्लाग पर मैं यह रिपोर्ट हास्य कविता के रूप में लिखूं या नहीं। चलो अगली बार पूछ लूंगा।<br />
<strong>नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नही मिला। </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:हंसिनी चुनती है केवल मोती ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/03/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sat, 03 Nov 2007 05:00:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[      मान सहित विष खाप के, संभु भय जगदीश
      ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>      <strong>मान सहित विष खाप के, संभु भय जगदीश<br />
      बिना मान अमृत पिए, राहू कटाए शीश</strong> </p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं  सम्मान के के साथ विषपान कर शिव पूरे जगत में भगवान् स्वरूप हो गए. बिना सम्मान के अमृत-पान कर राहू ने चंद्रमा  से अपना मस्तक कटवा लिया.</p>
<p>भाव-हमें वही कार्य करना चाहिए जिससे सम्मान मिले. समाज हित में कार्य करना विष पीने लायक लगता है पर प्रतिष्ठा उसी से ही  बढती है. अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने से यश नहीं बढ़ता बल्कि कई बार तो अपयश का भागी बनना पड़ता है. इसका एक आशय यह भी है हमें जो चीज सहजता  और सम्मान से मिले स्वीकार करना चाहिए और कहीं हमें अपमान और घृणा से उपयोगी वस्तु भी मिले तो उसे त्याग देना चाहिए.<br />
<strong><br />
मान सरोवर ही मिले, हंसी मुक्ता भोग<br />
सफरिन घरे सर, बक-बालकनहिं जोग </strong></p>
<p>कवि रहीम कहते हैं की हंसिनी तो मान सरोवर में विचरण करती है और केवल मोतियों को ही चुनकर खाती है. सीपियों से भरे तालाब तो केवल बगुले और बच्चों के क्रीडा  स्थल होते हैं. </p>
<p>भाव- विद्वान् और ज्ञानी व्यक्ति सदैव अपने जैसे लोगों से व्यवहार रखते हैं और उनके अमृत वचन सुनते हैं, किन्तु जो मूर्ख और अज्ञानी हैं वह सदैव बुरी संगति और आमोद-प्रमोद में अपना समय नष्ट करते हैं. जिस तरह हंसिनी केवल मानसरोवर में विचरण करती है उसी तरह ज्ञानी लोग सत्संग में अपने मन के साथ विचरण करते हुए अपना समय बिताते और ज्ञान प्राप्त करते हैं.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: बिपति भए धन न रहे]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%8f-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%a8-%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 03:51:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़
नभ त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़<br />
नभ तारे छिपि जात है, ज्यों रहीम भए भोर</strong> </p>
<p>कवि रहीम कहते हैं, जैसे प्रभात होते ही आकाश से तारागन विलीन जो जाते हैं, उसी प्रकार आपत्ति आने पर चाहे कई लाख-करोड़ धन भी पास हो तो वह भी समाप्त हो जाता है।</p>
<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर गुलियाए खाय</strong> </p>
<p>कवि रहीम कहते हैं की कुछ लोग भगवान् राम को ह्रदय में धारण नहीं करते और भोग-विलास में डूबे रहते हैं । पशु की टांगों को स्वाद से खाने के बाद दवा भी खाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अगड़म-बगडम लिखते तो हिट हो जाते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/16/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a4%97%e0%a4%a1%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9f-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Tue, 16 Oct 2007 16:06:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव में ही रहता है। दरअसल पहले ब्लॉगर का घर भी शहर के बाहर कालोनी में था, और वह गाँव उससे बहुत ज्यादा दूर नहीं था। पहला ब्लॉगर कई बार उस गाँव में जा चुका था।</p>
<p>उसने साइकिल उठाई और वहां चल दिया। पक्की सड़क से होते हुए वह उस कच्ची सड़क की ओर मुड़ा जो उस गाँव की तरफ जाती थी । उसने मोड़ पर स्थित पहले मकान के बाहर मैदान पर घास खोद रहे व्यक्ति को देखा और साइकिल से उतरकर आवाज दीं । वह व्यक्ति उसके पास आया। बनियान और तहमद पहने उस व्यक्ति से उसने दूसरे ब्लॉगर का नाम बताते हुए उसके घर पूछा-‘क्या तुम उस जानते हो कहाँ रहता है।’</p>
<p>उस व्यक्ति ने कहा-'इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता।आप गलत गाँव में आ गये हैं’</p>
<p>पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया। उसे लगा कि उसके मित्र ने उसे धोखा दिया है-पर फिर लगा कि हो सकता है यह आदमी ही उसे नहीं जानता हो क्योंकि वह दूसरा ब्लॉगर उस गाँव का नहीं था शहर से उधारी वालों से परेशान होकर ही वह गाँव के बाहर ही कहीं रह रहा था-ऐसा ही उसके मित्र ने बताया था। फिर उसने उस आदमी को घूर कर देखा और कहा-‘अच्छा तो तुम हमें ही चलाने लगे। क्या बात है आज तुम मुझे ही नहीं पहचान रहे।”</p>
<p>वह दूसरा ब्लॉगर था। उसने भी उसे नहीं पहचाना था फिर उसके समझ में आया और बोला-'अच्छा तो तुम हो यार, मैं डर गया था की कोई गलत आदमी मेरा पता पूछ रहा है क्योंकि मुझे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। यहाँ मेरा दूसरा नाम है।”<br />
पहले ब्लोगर ने कहा-'दूसरा कि तीसरा?'<br />
दूसरा बोला-'चौथा। मैं अपने नाम बदलकर काम करता हूँ।इतनी संख्या है कि मुझे खुद याद नहीं रहता और तुम्हारा भी भेजा फ्राई हो जाएगा।'<br />
पहला ब्लॉगर बोला-'अच्छा किया जो नाम बदल लिया हैं नहीं तो उधार माँगने वाले परेशान करते।'<br />
दूसरा ब्लॉगर-‘तुमसे किसने कहा?’’</p>
<p>पहला ब्लोगार-‘’किसी ने नहीं। मैने अनुमान किया।'</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘’कहो कैसे आना हुआ।''<br />
पहले ने कहा-''सोचा तुमसे मिल लूँ ।''<br />
दूसरा-''क्या घर पर कोई काम नहीं था।''<br />
पहला- 'मैं अपने काम सुबह जल्दी निपटा देता हूँ। जो काम तुम कर रहे हो घास काटने का वह मैं अपने गार्डन में सुबह ही कर चुका हूँ। इस समय तुमसे उस रिपोर्ट के बारे में पूछने आया हूँ जो मैने लिखी थी तुमने देखी कि नहीं?”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-”मैने देखी थी , बहुत अच्छी थी । अब तुम यहाँ से चले जाओ। बडे दिनों बाद घर में एन्ट्री मिली है अगर तुम यहाँ रहे और मेरे घर के लोगों ने देख लिया तो हालत खराब हो जायेगी।''</p>
<p>इतने में गृह स्वामिनी बाहर आई और उसने पहले ब्लॉगर को नमस्ते की और अपने पति से बोली-‘भाई साहब को बिठाओ मैं इनके लिये चाय बनाकर आती हू।”</p>
<p>वह अन्दर चली गयी , पहला ब्लॉगर खुश हो गया और बोला-‘’ अगर चाय पिलाना है तो ठीक हैं, अन्दर चलते हैं। यहाँ कुछ गर्मी है।”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘नहीं, बाहर ही बैठो। मैं अन्दर से कुर्सी ले आता हूँ। वैसे तुम्हें साइकिल पर देखकर वह समझी कि तुम कोई लेनदार हो। इसलिये चाय की पूछ लिया और मैं भी यूं सोच कर चुप रह गया कि तुम्हारा नमक खाया है।”</p>
<p>वह अन्दर गया और दो कुर्सिया ले आया।</p>
<p>पहले ब्लॉगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-‘तुमने उस रिपोर्ट पर कमेंट नहीं दी ।’<br />
दूसरा-‘मैने उसे पढा ही नहीं।”</p>
<p>पहला-'पर तुमने अभी कहा था कि रिपोर्ट देखी थी।”<br />
दूसरा-‘हाँ पर मैने यह कब कहा की मैने उस पढा है।?”</p>
<p>पहला-“तुमने कब देखी थी?</p>
<p>दूसरा –‘’तुमसे मिलने के अगली रात दस बजे को।</p>
<p>पहला-“पर मैने तो उसे रात को एक बजे प्रकाशित किया था।'<br />
दूसरा-''अरे यार, तुम भी ऐसे ही हो। तभी मैं कहूं मुझे दिखाई क्यों नहीं दी। वैसे तुमने रात को एक बजे रिपोर्ट क्यों डाली, यह कोई टाइम है?”</p>
<p>पहला-''इसलिये कि घर में सब सो रहे थे।'</p>
<p>दूसरा-‘तुम यार इतना डरते हो?’<br />
पहला-'यह तुम कह रहे हो। मैं नहीं चाहता की मुझे तुम्हारी तरह कहीं ओर ठिकाने ढूंढने पडे।'</p>
<p>दूसरा-अच्छा छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हारी रिपोर्ट हिट हुई या फ्लाप?<br />
पहला-'एकदम फ्लाप?"<br />
दूसरा-'तुमने रिपोर्ट् के बारे में अकडम्-बकडम लिखा कि नहीं? मैं अपनी भाषा में कहूं तो............तुम्हारी भाषा में ही कहता हूं कि अभद्र शब्द............लिखे कि नही"</p>
<p>पहला-'यह क्या होता है? यह कौनसी विधा है।"<br />
दूसरा-'जब यह नहीं जानते तो लिखा क्या होगा? खाक! इसलिये तो रिपोर्ट फ्लॉप हो गयी ।अकडम-बकडम लिखते तो हिट हो जाते. '</p>
<p>पहला--'यह करना जरूरी है।'</p>
<p>दूसरा-'यह फ़ैशन है।"<br />
पहला-'यह में नहीं कर सकता।'</p>
<p>दूसरा-इसलिये तो तुम्हारा लिखा मेरी समझ में नहीं आता और कमेंट नहीं देता और तुम फ्लॉप हो। मेरी भाषा में लिखो तो मैं खूब कमेंट दूं।"</p>
<p>पहला ब्लोगर-'तुम्हारी भाषा सीखने की मुझे जरूरत नहीं है, मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि भईया रिपोर्ट पढ लेना।'<br />
दूसरा-'अब क्या खाक पढ लेना। हो गयी पुरानी। वैसे किसी ने कमेंट दी।'<br />
पहला-'हां! जो मेरे दोस्त हैं उन्होने दी।'</p>
<p>दूसरा-'ब्लोगरों से दोस्ती। वहां भला कोयी है दोस्ती लायक!'<br />
पहला-'हां, तुम ठीक कह्ते हो। सब भले लोग हैं, तुमसे दोस्ती करने लायक तो नहीं हैं।'<br />
दूसरा-'क्या मैं बुरा हूं। देखो मेरे मोहल्ले में आकर यह बद्तमीजी नहीं चलेगी। यह ठेका तो हमने ले रखा है। ऐसी कमेंट लिख जाऊंगा कि छोडो यार.....'</p>
<p>पहला-'ऐसा सोचना भी नहीं। तुम्हें गलतफ़हमी है कि पहले की तुम्हारी तो गल्तिया माफ़ कर चुका हू, अभी तक तुमसे हिसाब बकाया है।'</p>
<p>दूसरा ब्लोगर गुस्से में उसे घूर रहा था फ़िर बोला-'वह तो तुम्हारे छ्द्म नाम का ब्लोग था।</p>
<p>"पहला-"वह सब ठीक है, पर तुम अपने कहे पर लिखी रिपोर्ट पर कमेंट तो देते।"<br />
दूसरा-"जब पढे ही नहीं तो क्या खाक देता?"<br />
पहला-"तो अब पढ कर देना।'<br />
दूसरा-पढ़ने के बाद तो मैं किसी को कमेंट नहीं देता।<br />
'पहला-'तो बिना पढे ही दे देना।"<br />
दूसरा-' यार तुम मेरे मुहल्ले में आकार मुझे तंग मत करो ,वरना ऐसे कमेंट दूंगा कि ........छोडो यार।'<br />
पहला- ''तुम्हारा मोहल्ला। गुरु तुम किस गलतफहमी में हो। हम दोनों का एक ही मोहल्ला है। इस गाँव में मैं कई बार आता हूँ और ज्यादा दूर नहीं है।'<br />
इतने में एक बच्चा अंदर से चाय के दो कप ले आया और रख कर चला गया।पहले ब्लोगर ने तत्काल एक् कप उठा लिया तो दूसरा बोला कि-'क्या यार घर से चाय पीकर नही चले थे क्या कि मेरे कहने से पहले ही कप उठा लिया।<br />
'पहला-"तुम उठाने के लिये कहते?'<br />
दूसरा-"नही!"</p>
<p>पहला-"मुझे मालुम था। वैसे चाय अच्छी बनी है।"</p>
<p>दूसरा-हमारी पत्नी ने तुम्हें शहर से आया लेनदार समझ लिया इसलिये ऐसी स्पेशल चाय पिलाई है-और मैं भी तुम्हारे घर पर नाश्ता कर आया हूं इसलिये झेल रहा हूं।"</p>
<p>चाय पीने के बाद पहला ब्लोगर जाने के लिये तैयार हुआ तब दूसरा ब्लोगर बोला-'यहां किसी को मत बताना कि मैं ब्लोग लिखता हूं। हम दोनों दोस्त हैं और एक ही मुह्ल्ले के हैं, यह भूलना नहीं।"<br />
पहला ब्लोगर हंसते हुए बोला-'पर तुम तो कह रहे थे कि ब्लोगर भला दोस्ती लायक होते हैं? साथ में मुह्ल्ला भी याद आने लगा। चलो कोयी बात नही, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम जल्दी समझ जाओगे कि दोस्ती किसे कहते हैं?'</p>
<p>दूसरा-'इस मीटिंग पर कब रिपोर्ट कब लिख रहे हो?'<br />
पहला-कौंनसी मीटिंग.........अच्छा यह। कल सुबह छः बजे।<br />
दूसरा-'इतनी सुबह क्यों?"<br />
पहला-'उस समय सब घर पर सोते हैं।"<br />
पहला ब्लोगर वहां से साइकिल पर उठाकर चल दिया। आधे रास्ते पर उसे याद आया कि यह तो उसने बताया ही नहीं कि हास्य कविता लिखनी है या नहीं। फ़िर उसने अपने सिर को झटका दिया कि चलो इस बार भी हास्य कविता नहीं लिखते। अगली मीटिंग में पूछ्कर लिख लेंगे।<br />
नोट-यह हास्य व्यंग्य है और इसके पात्र कल्पित हैं अगर किसी की खुराफात से मेल हो जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इन पंक्तियों का लेखक कभी किसी दुसरे ब्लोगर से नहीं मिला है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सहमति-असहमति का द्वंद ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/13/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sat, 13 Oct 2007 16:16:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[   जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>   जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध्य  विचार होता है तब असहमति भी  होती है और होना भी चाहिए क्योंकि उससे ही किसी नए मत के निर्माण  की संभावना होती है. जब कोई अपना विचार किसी विषय पर व्यक्त इस उद्देश्य से करता है कि लोग उसकी बात को माने तो उसे इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ कि उस पर कहीं सहमति तो कहीं असहमति होगी-और उसे दोनों पर दृष्टि रखते हुए ही अपने विचार का पुन:निरीक्षण  भी करना चाहिए. पर ऐसा होता नहीं है. जिन लोगों के पास पद, प्रतिष्ठा और पैसा होता है उन्हें कभी कोई चुनौती स्वीकार्य नहीं है. जिनके पास अपने विचार व्यक्त करने के साधन है वह किसी असहमति को सुनने को तैयार  नहीं होती और यहीं से शुरू होता है संघर्ष. विचारों का यह  संघर्ष अनंत काल से चल रहा है और आज तक कोई एक धारा- जिससे इस धरती पर शांति और विश्वास  स्थापित हो सके-नहीं बह सकी.</p>
<p>       कहते हैं कि झूठ मत बोलो पर बोलते सभी हैं. कहते हैं जीवन में आराम नहीं काम करना चाहिए पर आराम की तलाश सभी कर रहे हैं. दूसरे को सुख दो तो सुख मिलेगा और दुख दोगे तो वह भी तुम्हारे हिस्से में आयेगा, पर वास्तविकता में सभी अपने सुख जुटाने में लगे हैं और अवसर पाते ही दूसरे को दुख देते हैं. ज्ञान बघारने को सब तैयार पर चलने को तैयार नहीं है. आदमी का अहंकार उसे कभी अपने विचार से पीछे नहीं हटने देता. मानसिक अंतर्द्वंद में फंसा आदमी कभी भला किसी को सुख दे सकता है?  रचना से अधिक विध्वंस में उसकी रूचि होती है. कहीं शांति हो उसका ध्यान नहीं जाता जहाँ द्वंद हो वहाँ वह मन और तन के साथ उपस्थित होने में उसे बहुत आनन्द आता है. </p>
<p>     मेरा विचार सब माने-यह विचार हर आदमी का है. असहमति उसे उतेजित कर देती है और वह लड़ने पर आमादा हो जाता है. इस पूरे विश्व में तमाम तरह के वर्ग, जातियाँ,  धर्म और भाषाएं हैं उनके आधार पर मनुष्यों ने अपने को अलग-अलग समूहों में   बाँट लिया है, और इन समूहों के आपसे संघर्ष  से इतिहास भरा पढा है . कहते हैं हम यह हैं और तुम वह हो .कही लड़ते हैं तो कहीं एकता की बात करते हैं. यह दोनों ही बाते भ्रम हैं क्योंकि कहीं जब एकता की चर्चा होती है तो सब अपनी गाते हैं और  इसमें असहमति है और फिर बात इस निष्कर्ष पर ख़त्म होती है कि  समूहों में एकता क्यों होना चाहिए? कहते हैं शांति के लिए! शांति क्यों हो? क्योंकि लडाई हो रही है? आदमी हमेशा अपने मन में विचारों का अंतर्द्वंद पाले रहता है जब वह शांत रह नहीं रह सकता समाज कैसे शांत रह सकता है. समान भी तो आदमी की इकाई से बना है. </p>
<p>            भला अशांत मन कभी शांति ला सकते हैं. सहज नहीं होना चाहते बल्कि शांति चाहते हैं. हम चिल्लायें और बाकी लोग शांत हो जाएँ. हम कहें उसे सब माने और शांत हो जाएँ. कहीं लडाई विचारों की है को कहीँ शांति के लिए है. असहमति को खत्म करने के लिए सहमति बना रहे हैं और अधिक असहमत  होते जा रहे हैं. भला सहमत हुए बिना भी कभी सहमति बन सकती है. अपने विचारों में बदलाव के बिना कभी हम जब किसी से सहमत नहीं हो सकते तो दूसरा कैसे हो जायेगा कभी सोचा है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: साधू वह जो समदर्शी हो ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/03/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%82-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%ae/</link>
<pubDate>Wed, 03 Oct 2007 03:37:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं<br />
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं </p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो। </p>
<p>सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव<br />
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव</p>
<p>कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -विद्यालय ने बोर्ड बदला ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/26/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 16:23:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विद्यालय के प्रबंधन ने
छात्रो की भर्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विद्यालय के प्रबंधन ने<br />
छात्रो की भर्ती बढाने के लिए<br />
अपने प्रचार के पर्चों में<br />
शिक्षा के अलावा अन्य गतिविधियों में<br />
संगीत, गायन, नृत्य और अभिनय में<br />
इस तरह प्रशिक्षण देने का<br />
दावा किया गया  कि<br />
बच्चा इंडियन आइडियल प्रतियोगिता में<br />
नंबर वन पर आ जाये<br />
ट्वंटी ओवर में विश्व कप मे देश जीता<br />
मिटा कर लिखा गया अन्य गतिविधियों में<br />
यहाँ ट्वंटी ओवर क्रिकेट सिखाने की<br />
विशेष सुविधा उपलब्ध है<br />
जिसमे सिक्स लगाने का<br />
जमकर अभ्यास कराया जाता है<br />
जिससे खिलाड़ी सिक्स सिक्सर<br />
लगाने वाला बन जाये<br />
---------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कंप्यूटर चलाने वालो को योग जरूर करना चाहिए ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/23/258/</link>
<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 06:59:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/23/258/</guid>
<description><![CDATA[
विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p align="justify">विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। मैं यहाँ किसी अन्य के बात ना करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करूंगा, क्योंकि इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर मैं कुछ दिनों से ब्लोग लेखकों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहा हू। इसलिये मैंने सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दूं कि मैं अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रहा हू उसका कारण मेरे द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली योग साधना से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि ब्लोग लेखन की वजह से मेरे कुछ आसन और अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ देखता हूँ कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफल हो जाता हूँ। जब कंप्यूटर पर आता हूँ तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल मैंने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि मुझे कोई स्मृति दोष है जो भूल जाता हूँ । मेरा आशय यह है कि जो थकावट मुझे कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुका होता हूँ और आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता।</p>
<p align="justify">पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई योग शिक्षक नहीं हूँ और मैं यह योग साधना पिछले साढ़े चार वर्षों से कर रहा हूँ और मेरे गुरू ऐक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सीखा रहे हैं।</p>
<p align="justify">हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं।</p>
<p align="justify">इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और मैंने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे।</p>
<p align="justify">हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज को बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं, और दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें। यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है वास्तविकता तो यह है है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय मैं तो नहीं देखता। यह तो जीवन जीने की कला है।</p>
<p align="justify">इस ब्लोग पर मैं इसी विषय पर आगे लिखूंगा पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं। हमें सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बिमारी न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नादी शोधन प्राणायाम कहलायेगा। जब हम थोडा पेट पिच्काएंगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी । कंप्यूटर में काम करते हुए</p>
<p align="justify">हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और ना ही सुबह घूमने से कोइ अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। इस ब्लोग पर मैं आगे भी लिखने का प्रयास करूंगा। इस समय तो बस यही कहना चाहूँगा कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा।</p>
<p class="post-footer-line post-footer-line-1"><span class="post-icons"><span class="item-control blog-admin pid-506614504"><a href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=2949228965912421026&#38;postID=6231045681446091057" title="संदेश का संपादन करें"></a></span></span></p>
<p class="post-footer-line post-footer-line-2"><span class="post-labels"></span></p>
<p class="post-footer-line post-footer-line-3">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समझौता ग़मों से, दोस्ती नगमों से कर लो]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/20/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%9d%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 16:16:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[समझौता ग़मों से कर लो
दोस्ती नगमों से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">समझौता ग़मों से कर लो</p>
<p align="left">दोस्ती नगमों से कर लो</p>
<p align="left">महफ़िलों में जाकर</p>
<p align="left">इज्जत की उम्मीद छोड़ दो</p>
<p align="left">जहां सब सज-धज के आएं</p>
<p align="left">वहां तुम्हें देखने की किसे फुर्सत है</p>
<p align="left">सभी बोलें कम अपने लबादे</p>
<p align="left">ज्यादा दिखाएँ</p>
<p align="left">सोचें कुछ और</p>
<p align="left">बोलें कुछ और</p>
<p align="left">सुनकर अनुसना कर सकें तो</p>
<p align="left">सबसे बतियाएं</p>
<p align="left">अगर कोई अपने शब्दों से</p>
<p align="left">घाव कर दे</p>
<p align="left">तो उसका इलाज अपनी</p>
<p align="left">तसल्ली और यकीन की</p>
<p align="left">मरहमों से कर लो</p>
<p align="left">कहैं दीपक बापू</p>
<p align="left">अपनी शान दिखाने के चक्कर</p>
<p align="left">तुम कभी न पडना</p>
<p align="left">दूसरों की चमक में</p>
<p align="left">अपने को अंधा न करना</p>
<p align="left">जिनके चेहरे पर जितनी रोशनी है</p>
<p align="left">उतना ही उनके मन में है अँधेरा</p>
<p align="left">तुम अपने यकीन और हिम्मत के</p>
<p align="left">साथ सबके सामने डटे रहो</p>
<p align="left">किसी और में कुछ भी न ढूँढो</p>
<p align="left">साथ अपने हमदमों को कर लो</p>
<p align="left">---------------</p>
<p align="left"><strong>रिश्तों को नाम नहीं</strong> <strong> देना</strong> </p>
<p>--------------------</p>
<p>रिश्तों को नाम देना<br />
लगता है आसान<br />
तब निभाने का<br />
नहीं होता अनुमान<br />
जब दौर आता है<br />
मुसीबत का<br />
अपने ग़ैर हो जाते हैं<br />
ग़ैर फेर लेते हैं मुहँ<br />
रिश्ता कामयाब नहीं कर पाता<br />
अपनी वफ़ा का इम्तहान</p>
<p>कहना कितना आसान लगता है<br />
कि तुम दोस्त ऐसे<br />
मेरे भाई जैसे<br />
तुम सखी ऎसी<br />
बिल्कुल बहिन जैसी<br />
जब आती है घडी निभाने की<br />
तब न भाई का पता<br />
न भाई जैसे दोस्त का पता<br />
न बहिन का पता<br />
न बहिन जैसी का पता<br />
गलत निकलते हैं<br />
अपनेपन के अनुमान</p>
<p>जरा सी बात पर<br />
रिश्ते तैयार हो जाते हैं<br />
होने को बदनाम<br />
फिर भी अपनों से दूर<br />
तुम मत होना<br />
बेवफाई का बदला<br />
तुम वफ़ा से ही देना<br />
दुसरे करते हैं<br />
विश्वास से खिलवाड़<br />
तुम मत करना<br />
कोई कितना भी<br />
रिश्ते को बदनाम करे<br />
तुम निभाते रहना<br />
अपनी नीयत पर डटे रहना<br />
चाहे धरती डोले<br />
या गिरने वाला हो आसमान<br />
--------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -फ्लॉप ब्लोगर और हिट कवि ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/18/%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%aa-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 18 Sep 2007 14:21:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला
&#8216;य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला<br />
'यार, कवि सम्मेलनों में होने लगी है<br />
हुटिंग ज्यादा<br />
मुझे किसी ने अंतर्जाल पर जाकर<br />
अपनी कविता की दुकान सजाने का<br />
आइडिया सुझाया<br />
तो मुझे तुम्हारा नाम याद आया'</p>
<p>ब्लोगर बहुत खुश हुआ<br />
उसने सोचा अब तक मिलती थी<br />
उनचास टिप्पणियां<br />
अब पचास का जुगाड़ खुद मेरे पास आया<br />
तत्काल उसे कम्प्यूटर के सामने बिठाकर<br />
अंतर्जाल पर काम करने का<br />
पूरा आइडिया समझाते हुए<br />
उसका भी एक ब्लोग बनवाया<br />
जाते-जाते कवि गुरूदक्षिणा में<br />
कवि ने दिया ज्ञान<br />
'क्या यह अगड़म-बगडम लिखते हो<br />
कुछ कवितायेँ और कहानियां लिखा करो<br />
अपनी हिन्दी के ज्ञान का विस्तार करो<br />
जिसकी वजह से इतना तुमने नाम पाया'</p>
<p>ब्लोगर ने बाँध ली कवि की बात गाँठ बांधकर<br />
जुट गया साहित्य सृजन में<br />
पर होता गया फ्लॉप<br />
रचनाएं तो बहुत होने लगीं<br />
टिप्पणियां होती गईँ कम<br />
फिर भी वह लिखने से बाज नही आया<br />
एक दिन पहुँचा कवि के घर<br />
और बोला<br />
'बहुत दिन से न तुम्हें देखा<br />
न तुम्हारा ब्लोग<br />
जो तुमने मुझसे बनवाया '</p>
<p>कवि ने उसे अपना ब्लोग दिखाया<br />
और बोला<br />
'तुमसे बनाने के बाद मैंने<br />
ब्लोग को छद्म नाम से बनाया<br />
क्योंकि चुराई हुई कविताओं के लिए<br />
मैं तो पहले ही बदनाम था<br />
उससे बचने का यही रास्ता नजर आया<br />
देखो मेरे नाम पर पुरस्कार भी आया'<br />
ब्लोगर ने देखा कवि का ब्लोग<br />
उसमें कवि के कतरनों के नीचे<br />
उसकी कविताओं के ही अंश लगे थे<br />
जिनमें कवि ने जोडा था अपना नाम<br />
जिनमें पचास-पचास से<br />
ज्यादा कमेन्ट जड़े थे<br />
फिर कवि ने दिखाए<br />
दूसरे ब्लोग<br />
उनमें भी टिप्पणियों में<br />
ब्लोगर की कविताओं की छबि थी<br />
उसने कवि से कहा<br />
'यहाँ भी तुम बाज नहीं आये<br />
मेरी कतरन से हिट पाए<br />
तुम्हारे रास्ते पर चलाकर मैं<br />
तो हो गया फ्लॉप ब्लोगर<br />
तुमने मेरी रचनाओं से ही<br />
इतना बड़ा पुरस्कार पाया'</p>
<p>कवि घबडा गया और बोला<br />
'यार, मैं क्या करता<br />
मैंने तो अखबार की कतरनों और<br />
तुम्हारी कविताओं के अंशों से ही काम चलाया<br />
यही आइडिया मेरी समझ में आया<br />
अब तुम किसी और से मत कहना<br />
मेरी जिन्दगी में तो पहला<br />
पुरस्कार आया'</p>
<p>ब्लोग वहाँ से निकल बाहर आया<br />
और आसमान में देख कर बोला<br />
'अजब है दुनिया<br />
मैं कवितायेँ लिखकर हिट से<br />
फ्लॉप ब्लोगर हो गया<br />
और वह ब्लोग मेरी कवितायेँ लिखकर<br />
हिट कवि कहलाया'</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[2007 Fall TV Premiere Dates]]></title>
<link>http://genevievelyn.wordpress.com/2007/09/17/2007-fall-tv-premiere-dates/</link>
<pubDate>Mon, 17 Sep 2007 14:11:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>genevievelyn</dc:creator>
<guid>http://genevievelyn.wordpress.com/2007/09/17/2007-fall-tv-premiere-dates/</guid>
<description><![CDATA[Online drug store
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do]]></description>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -आदमी की पहचान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/13/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Thu, 13 Sep 2007 15:12:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/13/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8/</guid>
<description><![CDATA[
हाथी के दांत खाने के और
दिखाने के और हो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
हाथी के दांत खाने के और<br />
दिखाने के और होते हैं<br />
पर भला और बेजुबान जीव<br />
अपनी असलियत किसी से छिपाता नहीं<br />
फ़िर क्यों उसके प्रवृतियों की<br />
चर्चा आदमी से करते हैं<br />
जिसकी नीयत के दांत तो<br />
सांप के जहर से भी ज्यादा<br />
विषैले होते हैं<br />
---------------------------------</p>
<p>होती है कुछ लोगों को<br />
अपनी रचना पर गलतफ़हमी<br />
जो उन्होने रचा है वही<br />
सबसे है अच्छा<br />
खाते हैं ऐसे ही लोग<br />
कदम कदम पर गच्चा<br />
कोई तारीफ़ न करे तो<br />
जोर-जोर से चिल्लाते हैं<br />
और करे तो गरियाते हैं<br />
अपने अहंकार में खो देते हैं<br />
 मानसिक संतुलन<br />
पहचान नहीं पाते<br />
कौन झूठा कौन सच्चा<br />
ऐसे लोगों पर यकीन करना होता कठिन<br />
चरित्र होता है उनका कच्चा<br />
--------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -अल्पज्ञानी और कौवा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/12/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 12 Sep 2007 10:58:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/12/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए
सिद्ध क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए<br />
सिद्ध के पास लेने ज्ञान<br />
और बोले<br />
'महाराज ज़िन्दगी से हैं हम परेशान<br />
तमाम तरह के तंत्र-मंत्र किये<br />
तमाम दरबारों पर मत्था टेका<br />
पर हुआ नही कल्याण<br />
हमारे मन को शांति मिले<br />
कृपा कर ऐसा दें ज्ञान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने तीनों को देखा और कहा<br />
'मैं कोई चमत्कारों का सौदागर नहीं<br />
जो पल में कर दूं तुम्हारा कल्याण<br />
पहले लूंगा तुम्हारा इम्तहान<br />
फिर दूंगा जीवन का ज्ञान'</p>
<p>तीनों को दी कापी और पेन और कहा<br />
'इस पर कौवे पर निबंध लिखो<br />
इसमें तुम्हारा लिखा हुआ ही<br />
कराएगा परिचय दस मिनट में ही कि<br />
कौन कितना बुद्धिमान'</p>
<p>तीनों ने दस मिनट में कापी लिखकर<br />
दे दीं गुरू जीं के हाथ में<br />
करने लगे वह उसकी जांच<br />
एक ने लिखा<br />
'कौवे के बारे में मुझे कुछ भी<br />
लिखना नही आता<br />
मैं तो हूँ गंवार और अनजान '</p>
<p>दुसरे ने लिखा<br />
'कौवा है एसा पंछी<br />
जिसकी सबसे होती है तीक्ष्ण दृष्टी<br />
उस जैसा गुण पा ले<br />
कभी दुख्नी न हो इन्सान'</p>
<p>तीसरे ने लिखा<br />
'कौवा काला, काली उसकी नीयत<br />
सुबह उसकी आवाज सुन लें तो<br />
पूरा दिन होते परेशान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने फैसला दिया<br />
'कौवे के बारे में जो नहीं जानता<br />
उस निरे अज्ञानी को और<br />
जो उसमें दूरदृष्टि देखता है<br />
उस परम बुद्धिमान को<br />
मैं अपना शिष्य बनाऊंगा<br />
जिसने कौवे में दोष देखे<br />
दिखा उसमें एक भी गुण<br />
उस अल्पज्ञानी को<br />
मैं नहीं दे पाऊँगा कोई ज्ञान'</p>
<p>तीनों चले गए तो गुरुजी के<br />
पुराने और प्रिय शिष्य ने पूछा'<br />
'उस निरे अज्ञानी से तो वह ठीक था<br />
कुछ लिखना-पढना तो जानता था<br />
उसे भी अपना शिष्य बना लेते<br />
कृतार्थ करते उसे देकर ज्ञान'</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने कहा<br />
'उसे अपने अक्षर ज्ञान का था अहंकार<br />
सब विषय में पढा पर उसका था अभिमान<br />
इसलिये रह गया अल्पज्ञानी<br />
पर उस अपढ़ अज्ञानी को यह मालुम है कि<br />
नहीं है इसके पास नहीं कोई ज्ञान<br />
वह लगन से सीखेगा<br />
बुद्धिमान पर तो होगी थोडी मेहनत<br />
पर उस अल्पज्ञानी पर<br />
पूरी जिन्दगी गुजार देता<br />
फिर भी नहीं होता उसे ज्ञान<br />
सदैव अहंकार में डूबा रहता<br />
थोडा सीखता ज्यादा दिखाता<br />
दोष दूसरों में देखे<br />
नहीं होता कभी उसे अच्छाई का भान<br />
------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -नाम कमाने के चक्कर में मत पडना ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/10/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%a4-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 11:15:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/10/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%a4-%e0%a4%aa/</guid>
<description><![CDATA[बालक ने अपने शिक्षक को बताया
&#8216; मैं बड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p class="post-body">बालक ने अपने शिक्षक को बताया<br />
' मैं बड़ा होकर करूंगा समाज सेवा'<br />
शिक्षक ने कहा<br />
'तब तो तुम अच्छी तरह पढ़-लिख लो<br />
बडे आदमी बन जाओ<br />
अपने नाम के आगे उपाधियां लगाओ<br />
और कहीं से पुरस्कारों की जुगाड़ लगाओ<br />
फिर भले ही दिखाने के लिए करना समाज सेवा<br />
होगी तुम्हारी इज्जत चारों तरफ<br />
बग़ैर इनके चाहे कितनी भी कर लो<br />
कोई नहीं होगा नाम लेवा'</p>
<p>बालक ने अपने पिता से कहा<br />
पहले तो वह चकराये फिर बोले<br />
'जो राह बताई है तुम्हारे शिक्षक ने<br />
उसी राह पर चलना<br />
पहले अपना घर भरना सीख लो<br />
आजकल मीडिया बहुत पावरफुल है<br />
बाँट देना कुछ कंबल और अनाज<br />
फोटो खिंचवा कर टीवी और अखबार में<br />
विज्ञापन के रुप में छपवा देना<br />
इससे पहले उपाधियों और पुरस्कार का<br />
अपनी नेम प्लेट पर अंबार लगा लेना<br />
फिर तुम्हें प्रसिद्धि दिलाएगी समाज सेवा</p>
<p>बालक का मन फिर गया<br />
उसने सोचा<br />
पहले उपाधियों और पुरस्कारों के<br />
अपने लिए ढ़ेर लगा लूं<br />
शायद तभी होगी समाज सेवा'<br />
फिर उसने अपने दादाजी से पूछा<br />
तो उन्होने कहा<br />
'तुम अपने मन की बात किसी से न कहना<br />
तेरे निच्छ्ल मन को वह नहीं<br />
कभी समझ पाएंगे<br />
अभी जमकर पढ़-लिखना<br />
पर अपने मन में समाज के लिए<br />
सच्ची हमदर्दी रखना<br />
शक्ति का संचय तो करना क्योंकि<br />
वही समाज सेवा के काम आयेगी<br />
पर नाम कमाने के चक्कर में मत पडना<br />
वरना वह झूठी हो जायेगी<br />
---------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -इस तरह वह शादी न हो सकी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/09/%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 09 Sep 2007 14:22:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
मंडप में पहुंचने से पहले ही
दूल्हे ने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>
मंडप में पहुंचने से पहले ही<br />
दूल्हे ने दहेज़ में<br />
मोटर साइकल देने की माँग उठाई<br />
उसके पिता ने दुल्हन के पिता को<br />
इसकी जानकारी भिजवाई<br />
मच गया तहलका<br />
दुल्हन के पिता ने<br />
आकर दूल्हे से किया आग्रह<br />
शादी के बाद मोटर साइकल देने का<br />
दिया आश्वासन<br />
पर दूल्हे ने अपनी माँग<br />
तत्काल पूरी करने की दोहराई</p>
<p>मामला बिगड़ गया<br />
दूल्हे के साथ आए बरातियों ने<br />
दुल्हन पक्ष की कंगाल कहकर<br />
जमकर खिल्ली उडाई<br />
दूल्हन का बाप रोता रहा ख़ून के आंसू<br />
दूल्हे का जमकर हंसता रहा<br />
आख़िर कुछ लोगों को आया तरस<br />
और बीच-बचाव के लिए दोनों की<br />
आपस में बातचीत कराई<br />
मोटर साइकल जितने पैसे<br />
नकद देने पर सहमति हो पाई</p>
<p>दुल्हन के सहेलियों ने देखा मंजर<br />
पूरी बात उसे सुनाई<br />
वह दनदनाती सबके सामने आयी<br />
और बाप से बोली<br />
'पापा आपसे शादी से पहले ही<br />
मैंने शर्त रखी थी कि मेरे<br />
दूल्हे के पास होनी चाहिए कार<br />
पर यह तो है बेकार<br />
मोटर साईकिल तक ही सोचता है<br />
क्या खरीदेगा कार<br />
मुझे यह शादी मंजूर नहीं है<br />
तोड़ तो यह शादी और सगाई'</p>
<p>अब दूल्हा पक्ष पर लोग हंस रहे थे<br />
'अरे, लड़का तो बेकार है<br />
केवल मोटर साइकिल तक की सोचता है'<br />
बाद में क्या करेगा अभी से ही<br />
दुल्हन के बाप को नोचता है<br />
क्या करेंगे ऐसा जमाई'</p>
<p>बात बिगड़ गयी<br />
अब लड़के वाले गिडगिडाने लगे थे<br />
अपनी मोटर साइकल की माँग से<br />
वापस जाने लगे थे<br />
दूल्हा गया दुल्हन के पास<br />
और बोला<br />
'मेरी शराफत समझो तुम<br />
मोटर साइकल ही मांगी<br />
मैं कार भी माँग सकता था<br />
तब तुम क्या मेरे पास हवाई जहाज<br />
होने का बहाना बनाती<br />
अब मत कराओ जग हँसाई'<br />
दुल्हन ने जवाब दिया<br />
' तुम अभी भी अपनी माँग का<br />
अहसान जता रहे हो<br />
साइकिल भी होती तुम्हारे पास<br />
मैं विवाह से इनकार नहीं करती<br />
आज मांग छोड़ दोगे फिर कल करोगे<br />
मैंने तुममें देखा है कसाई'<br />
दूल्हा अपना मुहँ लेकर लॉट गया<br />
इस तरह शादी नही हो पायी<br />
-------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -जब माया के रंग हो जाते बदरंग ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/09/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Sun, 09 Sep 2007 05:57:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
गद्दे और तकिये में रुई की जगह
नोट भरकर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>गद्दे और तकिये में रुई की जगह<br />
नोट भरकर सोवें<br />
ऐसे भाग्य तो किसी-किसी के होवें<br />
मायापुत्र नॉट करें आर्तनाद<br />
क्या हो गयी हमारे गत<br />
हम तो दिन में बाजार में<br />
चलने-फिरने वाले जीव<br />
रात को कैसे जिन्दा लाशों को ढोवें<br />
काश किसी सुन्दरी के पर्स में हौवें<br />
यह क्या कि लोग दिन में हमारे लिए<br />
करें हजारों पाप<br />
प्यार से पुचकार घर लावें<br />
और तकिया और गद्दों में भरकर हम पर सोवें</p>
<p>मायापति सोने के भी कोई<br />
कम बुरे हाल न होवें<br />
होना चाहिए गले और उंगली में<br />
वही लग जाता है नल की टोंटी में<br />
और लोग अपने अच्छे बुरे हाथ<br />
उसका कान उमेठ कर धोवें<br />
जिसे चमकना चहिये अपनी ख्याति के अनुरूप<br />
होते हैं जिसके गह्रने शोरूम में<br />
लोग उसके सामान को ऐसे देखे<br />
जैसे चमकदार पीतल के होवें</p>
<p>वाह री माया तेरे खेल<br />
कोई बेचता पीतल का सामान सोना बताकर<br />
कहीं सोने को छिपाता पीतल जताकर<br />
कहने वाले सही कह गये कि<br />
अति सबकी बुरी होवें<br />
चाहे माया के ढ़ेर ही क्यों न होवें<br />
ख़ूब लगा लो अपने घर में<br />
फूट जाता है भांडा जब<br />
सर्वशक्तिमान डलवाता छापा<br />
माया के रंग हो जाते बदरंग<br />
भाग्य की रेखाएं टेढी होवें<br />
-----------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरा हंसाये क्या जरूरी है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/07/%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Fri, 07 Sep 2007 17:10:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हंसने के लिए क्या हंसी जैसी बात जरूरी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हंसने के लिए क्या हंसी जैसी बात जरूरी है<br />
कोई जबरन हंसाये तो क्या हंसना मज़बूरी है<br />
सहज स्वर और सरल शब्दों से हंसी नहीं आती<br />
क्या चिल्ल-पों पर हंसना जरूरी है<br />
खामोश अदाएं भी बिखेरतीं हैं हंसी के फब्बारे<br />
किसी के फूहड़ डांस पर हंसना क्या जरूरी है<br />
दीवार पर टंगी तस्वीरों को देखकर भी हंस सकते हैं<br />
कोई दाग लगाए तब हँसेंगे, क्या यह सोच जरूरी है<br />
कहैं दीपक बापू मुस्कराते रहो हमेशा चाहे जब हंसो<br />
खुद ही करो हास्य पैदा, कोई दूसरा करे क्या जरूरी है<br />
हंसी कोई बाजार में बिकने वाली चीज नहीं है<br />
बाहर से हंस लो, पर वह अन्दर हो यह भी जरूरी है</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मोबाइल, वह और...........]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/31/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 31 Aug 2007 02:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मोबाइल की बेटरी में खराबी की
खबर ने उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोबाइल की बेटरी में खराबी की<br />
खबर ने उसे हिला दिया<br />
क्योंकि उसने अपनी गर्ल फ़्रेंड को दिये थे<br />
उसी कंपनी की मोबाइल प्रेजेंट जिनकी बेट्री<br />
के फ़ट्ने की खबर ने देश में भूचाल ला दिया<br />
मिलता था वह जिन   गर्लफ्रैंडस  से<br />
अलग दिन और अलग जगह पर<br />
बेटरी फटने के भय  ने<br />
सबको एक ही दिन और ऐक ही समय <br />
उसकी होस्टल  के कमरे की  छत के नीचे <br />
आपस में मिलवा  दिया<br />
 <br />
उसने सबको एक ही कंपनी के<br />
मोबाइल तोहफ़े में दिये थे<br />
जिनकी बेटरी  फटने के चर्चे<br />
टीवी चैनलों ने किये थे<br />
भय से काँपती सब उसके रूम में पहुँची<br />
अपने मोबाइल की बेटरी<br />
बदलवाने का आग्रह लेकर  <br />
 पर जो देखा वहां का मंजर<br />
वह  गुस्से में सब भूल  गयीं  और मिलकर<br />
उसे छठी का दूध याद दिला  दिया<br />
जिसे जो मिला उसके सिर पर मार दिया<br />
 <br />
 <br />
 वह पिटा-कूटा अपने कमरे में  पडा था<br />
ऐक दोस्त ने आकर उसे उठाया<br />
वजह पूछी पर वह कुछ नहीं बता रहा था<br />
बस ऐक ही बात रोते हुए  दोहरा रहा था<br />
‘मोबाइल वालों तुमने यह क्या किया<br />
बेटरी फट जाने देते<br />
पहले ही प्रचार क्यों किया<br />
जिस कंपनी के मोबाइल खरीद्कर लव में<br />
हो गया था हिट उसने ही आज पिटवा दिया<br />
--------------------------------<br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कभी न देख पाया मां-बाप की सेवा का प्रेक्टिकल]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/28/%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%96-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Tue, 28 Aug 2007 14:17:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दादा-दादी से अलग रहने वाले
बच्चे को उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दादा-दादी से अलग रहने वाले<br />
बच्चे को उसके पिता सिखा रहे थे<br />
'बेटा , हमारे बुजुर्गों के कहे अनुसार<br />
सदैव अपने से बडे  लोगों का<br />
तुम सम्मान करना<br />
उनका कहना  है कि हर <br />
बच्चे को चाहिये अपने <br />
मां-बाप की सेवा करना<br />
उसी का होता है जीवन सफ़ल'<br />
बच्चे ने उत्सुकता वश   पूछा<br />
'हम दादा-दादी के साथ क्यों नहीं रह्ते<br />
क्या आप उनकी सेवा करते हो<br />
क्या आपका जीवन भी है सफ़ल'<br />
उसके पिता हो गये खामोश <br />
उतर गयी शकल<br />
 <br />
बडा  होकर  वह ऐक गुरु के पास गया<br />
शरण  के साथ मांगा भक्ति के लिये ज्ञान<br />
मांगी वह शक्ति जिससे <br />
मिले  मन का मैल और अभिमान<br />
गुरुजी ने कहा<br />
'सदा अपने गुरु की आज्ञा मानो <br />
और जो कहैं उसे  ब्रह्मज्ञान ही जानो<br />
सदा अपने माता-पिता के सेवा करो<br />
तभी तुम्हारा जीवन होगा सफ़ल'<br />
उसने पूछा<br />
'गुरुजी आपके गुरु और माता-पिता<br />
कहां है और क्या आप भी उनकी सेवा करते हैं'<br />
गुरुजी हो गये बहुत नाराज्<br />
कहीं उनके मन पर भी गिरी थी<br />
उसके शब्दों  की गाज्<br />
गुससे में बोले-<br />
ऐसे सवाल करोगे तो <br />
कभी भी तुम्हें नहीं आयेगी अकल'<br />
 <br />
वह बन गया बहुत बडा डाक्टर<br />
करने लगा गरीबों की भी मुफ़्त सेवा<br />
समाज सेवा में कमाया उसने नाम<br />
गरीबों की भीड जुटती थी उसके<br />
घर में सुबह और शाम <br />
कीचड में खिल गया जैसे कमल<br />
 <br />
ऐक गरीब बेटे की मां की उसने<br />
अपने  घर पर रखकर सेवा की<br />
उसने दी उसे दुआ और कहा<br />
'बेटे जरूर तुम अपने मां-बाप की भी<br />
सेवा बहुत करते होगे <br />
तभी है तुम्हारा जीवन है  सफ़ल<br />
डाक्टर  ने फ़ीकी हंसी हंसते हुए कहा-<br />
'बस यही नहीं समझा अपने जीवन में<br />
नर्सरी से शिक्षा प्राप्त करना शुरू की<br />
ले आया डिग्री साइंस आफ़ मेडिकल्<br />
मां-बाप की सेवा की थ्योरी खूब सुनीं<br />
पर कभी न देखा उसका प्रेक्टिकल<br />
------- --------------------------------<br />
 </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शांति ढूंढते शोर के बाजार में     ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/19/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a2%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Sun, 19 Aug 2007 10:33:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने ख्यालो में 
दुनियाँ भर की दौलत जु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अपने ख्यालो में <br />
दुनियाँ भर की दौलत जुटाने <br />
घर-परिवार के लिये <br />
हर तरह की सुविधाएं बनाने<br />
का खूबसूरत सपना लेकर  <br />
निकलता है जमीन पर <br />
उसे सच करने के लिये <br />
जिंदगी के सुनहरे पल <br />
यूँ ही बरबाद कर देता <br />
कहीं करता अपने से <br />
बडे आदमी की जी-हुजुरी <br />
कहीं करता अपनी ऊर्जा बेकार <br />
अपने से छोटे को झुकाने  के लिये <br />
 <br />
दिल की शांति ढूंढता  है आदमी  वहाँ <br />
बाजार में शोर का साजो-सामान <br />
सजता है बिकने के लिये जहाँ <br />
किसी को खुद सुकून नहीं देता<br />
घर-घर  और दर-दर<br />
भटकता अपनी तसल्ली के लिये <br />
 <br />
सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है<br />
जो किसी के हाथ में लग जाये <br />
अपने मन में रखें अंधेरा <br />
तो रोशनी कहाँ से आये  <br />
भटकना तो होगा ही आदमी को <br />
अपनी तसल्ली और सुकून के लिये<br />
 कितनो  के घर उजाडता <br />
कितने करता चमन वीरान<br />
बन जाता बेईमान <br />
अपना घर सजाने के लिये <br />
------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['मोबाइल वालों तुमने यह  क्या किया' ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/15/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Wed, 15 Aug 2007 12:40:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/15/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af/</guid>
<description><![CDATA[ 
वह आदमी थका-मांदा घर पहुँचा 
तो देखा घ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>वह आदमी थका-मांदा घर पहुँचा <br />
तो देखा घर मे सभी सदस्यों के <br />
मोबाइल आंगन में जमीन पर पड़े थे <br />
सारे सदस्य उनसे डरे -सहमे दूर  खड़े थे <br />
उसने पहले मोबाइल और फिर उनको <br />
प्रश्नवाचक नजरों से देखा <br />
पिताजी ने  कहा<br />
'तू यह किस कंपनी  के <br />
मोबाइल उठा ले आया है<br />
इसकी बेटरी  भी फट सकती है<br />
एसा समाचार  टीवी में आया है'<br />
माँ  ने कहा<br />
'बेटा पहले जाकर इनको चेक कराओ<br />
हो सके तो इनकी बेटरी बदलवाओ'<br />
पत्नी, बेटा और बेटी के <br />
तेवर  भी नहीं कम कड़े  थे<br />
 <br />
उसने  मुस्कराते हुए कहा<br />
'अच्छा इन सबको मेरे   बेग में रख दो'<br />
सबने  एक स्वर में कहा <br />
'हमें तो लगने लगा है  इससे डर <br />
यह नेक काम भी तुम खुद ही  कर लो<br />
वह सबको देखने लगा <br />
उसे याद था कि आज सुबह तक <br />
यह मोबाइल किसी की जेब <br />
तो किसी के पर्स में पड़े थे <br />
अपना-अपना  मोबाइल लेने सब <br />
उसके साथ चले थे <br />
बदलने  के नाम पर भय के<br />
भूत सब पर चढ़े थे<br />
 <br />
वह मुसकराया <br />
सुख के सब साथी दुख में न कोय <br />
उसे यह वाक्य याद आया <br />
सबको मोबाइल खरीद  कर <br />
देने की गलती का परिणाम भी <br />
उसे अकेले ही भोगना होगा <br />
क्योंकि बाकी लोग हैं <br />
उससे छोटे  या बडे <br />
उसने सब मोबाइल उठाये और <br />
सीढियों के नीचे कबाड़ में रखे <br />
फिर आसमान की तरफ देखते हुए कहा<br />
'मोबाइल वालों तुमने यह  क्या किया<br />
शाश्वत सत्य के दर्शन <br />
करवा कर  मुझे कितना डरा दिया <br />
 <br />
---------------------------------------------</p>
<p align="center"><strong>संपादकीय अभिमत</strong></p>
<p align="center"><strong>---------------------------</strong></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p><strong></p>
<p align="left">
यह  हास्य काव्य रचना हैं और इनके चरित्र काल्पनिक है । इसका    मुख्य उद्देश्य भौतिक  प्रवृति पर प्रहार करना   है और हास्य के मद्देनजर इसके पात्र   गढे   गये हैं।<br />
दीपक भारतदीप   <br />
 </p>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गुरुदक्षिणा और फीस     ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/08/13/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%b8/</link>
<pubDate>Mon, 13 Aug 2007 04:46:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[ 
ट्यूशन के टीचर ने 
अपने स्टुडेन्ट से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a> </p>
<p>ट्यूशन के टीचर ने <br />
अपने स्टुडेन्ट से कहा <br />
'कल हमारी गुरु दक्षिणा लेकर आना <br />
अगर पिताजी न दें तो न आना'<br />
हतप्रभ स्टुडेन्ट ने कहा<br />
'सर, यह गुरुदक्षिणा क्या होती है<br />
कहाँ  मिलती है<br />
और कितने  में मिलती  है <br />
मैं पापा से कहूँगा तो वह ले आयेंगे <br />
पर उन्हें इस बारे में <br />
कुछ  तो पडेगा बताना'<br />
 <br />
टीचर हो गये आग-बबूला<br />
और गुस्से में बोले <br />
'एक तो लेट  पैसे देते हो फिर ऊपर से<br />
मजाक करते हो <br />
तुम्हें शर्म भी नहीं आती <br />
गुरुदक्षिणा  का मतलब है मेरी फीस <br />
नहीं समझ आये मेरी बात<br />
तो कल से यहाँ नहीं आना '<br />
 <br />
दूसरा विद्यार्थी बोला<br />
सर, गुरुदक्षिणा तो गुरु को <br />
गुरुकुल में रहने और पढ़ने पर <br />
दी जाती  है<br />
आप तो हैं  टीचर हमारे <br />
टीचर को तो फीस दी जाती है <br />
घर पर गुरुदक्षिणा कहेंगे तो <br />
कोई नहीं समझेगा <br />
वहां तो फीस ही  पडेगा बताना <br />
 <br />
 <br />
टीचर हैरान और परेशान  हो गये<br />
तब से वह  स्वयं  को <br />
टीचर  ही मानते हैं<br />
बंद कर दिया गुरु कहलाना   <br />
 </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अँधेरे में तीर कहाँ तक चलेंगे]]></title>
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<pubDate>Sun, 12 Aug 2007 09:19:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[  
अंधेरे में चलाते हैं वह तीर
जहाँ दाल ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a>  </p>
<p>अंधेरे में चलाते हैं वह तीर</p>
<p>जहाँ दाल का पानी भी नहीं मिलता</p>
<p>कागजों में बंट जाती है खीर</p>
<p>गरीबी का इलाज करते हैं</p>
<p>ऐसे शल्य-चिकित्सक</p>
<p>जो नहीं जानते इसकी पीर</p>
<p>आकर्षक योजनाओं का रथ</p>
<p>भ्रष्टाचार के पहियों पर</p>
<p>धीरे-धीरे रे