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	<title>05-सुन्दर-काण्ड &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "05-सुन्दर-काण्ड"</description>
	<pubDate>Fri, 10 Oct 2008 19:56:28 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[सुन्दर काण्ड]]></title>
<link>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/sunderkand/</link>
<pubDate>Mon, 24 Jul 2006 07:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>jitu9968</dc:creator>
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<description><![CDATA[                   श्रीजानकीवल्लभो विजयते
                ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>                   श्रीजानकीवल्लभो विजयते<br />
                     श्रीरामचरितमानस<br />
                       ~~~~~~~~<br />
                     पञ्चम  सोपान<br />
                      सुन्दरकाण्ड<!--more--><br />
                        श्लोक<br />
           शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं<br />
           ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।<br />
           रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं<br />
           वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।<br />
           नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये<br />
           सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।<br />
           भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे<br />
           कामादिदोषरहितं  कुरु मानसं च।।2।।<br />
           अतुलितबलधामं     हेमशैलाभदेहं<br />
           दनुजवनकृशानुं      ज्ञानिनामग्रगण्यम्।<br />
           सकलगुणनिधानं        वानराणामधीशं<br />
           रघुपतिप्रियभक्तं   वातजातं नमामि।।3।।<br />
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।<br />
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।<br />
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।<br />
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।<br />
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।<br />
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।<br />
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।<br />
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।<br />
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।<br />
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।<br />
    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।<br />
 --*--*--<br />
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।<br />
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।<br />
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।<br />
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।<br />
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।<br />
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।<br />
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।<br />
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।<br />
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।<br />
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।<br />
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।<br />
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।<br />
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।<br />
   आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।<br />
 --*--*--<br />
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।<br />
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।<br />
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।<br />
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।<br />
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।<br />
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।<br />
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।<br />
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।<br />
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।<br />
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।<br />
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।<br />
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।<br />
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।<br />
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।<br />
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।<br />
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।<br />
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।<br />
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।<br />
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।<br />
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।<br />
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।<br />
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।<br />
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।<br />
दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।<br />
   अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।<br />
 --*--*--<br />
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।<br />
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।<br />
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।<br />
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।<br />
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।<br />
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।<br />
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।<br />
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।<br />
दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।<br />
   तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।<br />
 --*--*--<br />
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।<br />
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।<br />
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।<br />
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।<br />
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।<br />
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।<br />
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।<br />
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।<br />
दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।<br />
   नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।<br />
 --*--*--<br />
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।<br />
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।<br />
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।<br />
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।<br />
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।<br />
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।<br />
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।<br />
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।<br />
दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।<br />
   सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।<br />
 --*--*--<br />
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।<br />
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।<br />
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।<br />
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।<br />
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।<br />
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।<br />
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।<br />
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।<br />
दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।<br />
   कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।<br />
 --*--*--<br />
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।<br />
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।<br />
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।<br />
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।<br />
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।<br />
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।<br />
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।<br />
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।<br />
दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।<br />
   परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।<br />
 --*--*--<br />
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।<br />
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।<br />
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।<br />
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।<br />
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।<br />
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।<br />
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।<br />
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।<br />
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।<br />
दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।<br />
     परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।<br />
 --*--*--<br />
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।<br />
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।<br />
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।<br />
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।<br />
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।<br />
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।<br />
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।<br />
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।<br />
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।<br />
दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।<br />
   सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।<br />
 --*--*--<br />
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।<br />
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।<br />
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।<br />
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।<br />
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।<br />
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।<br />
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।<br />
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।<br />
दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।<br />
   मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।<br />
 --*--*--<br />
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।<br />
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।<br />
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।<br />
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।<br />
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।<br />
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।<br />
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।<br />
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।<br />
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।<br />
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।<br />
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।<br />
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।<br />
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।<br />
    जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।<br />
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।<br />
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।<br />
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।<br />
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।<br />
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।<br />
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।<br />
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।<br />
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।<br />
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।<br />
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।<br />
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।<br />
दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।<br />
   जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।<br />
 --*--*--<br />
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।<br />
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।<br />
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।<br />
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।<br />
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।<br />
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।<br />
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।<br />
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।<br />
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।<br />
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।<br />
दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।<br />
   अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।<br />
 --*--*--<br />
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।<br />
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।<br />
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।<br />
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।<br />
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।<br />
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।<br />
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।<br />
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।<br />
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।<br />
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।<br />
दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।<br />
    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।<br />
 --*--*--<br />
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।<br />
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।<br />
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।<br />
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।<br />
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।<br />
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।<br />
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।<br />
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।<br />
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।<br />
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।<br />
    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।<br />
 --*--*--<br />
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।<br />
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।<br />
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।<br />
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।<br />
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।<br />
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।<br />
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।<br />
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।<br />
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।<br />
दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।<br />
   रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।<br />
 --*--*--<br />
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।<br />
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।<br />
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।<br />
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।<br />
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।<br />
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।<br />
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।<br />
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।<br />
दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।<br />
   कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।<br />
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।<br />
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।<br />
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।<br />
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।<br />
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।<br />
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।<br />
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।<br />
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।<br />
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।<br />
   जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।<br />
 --*--*--<br />
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।<br />
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।<br />
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।<br />
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।<br />
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।<br />
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।<br />
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।<br />
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।<br />
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।<br />
   सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।<br />
 --*--*--<br />
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।<br />
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।<br />
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।<br />
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।<br />
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।<br />
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।<br />
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।<br />
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।<br />
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।<br />
दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।<br />
   तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।<br />
 --*--*--<br />
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।<br />
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।<br />
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।<br />
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।<br />
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।<br />
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।<br />
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।<br />
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।<br />
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।<br />
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।<br />
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।<br />
   गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।<br />
 --*--*--<br />
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।<br />
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।<br />
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।<br />
बसन हीन  नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।<br />
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।<br />
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।<br />
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।<br />
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।<br />
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।<br />
   भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।<br />
 --*--*--<br />
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।<br />
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।<br />
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।<br />
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।<br />
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।<br />
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।<br />
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।<br />
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।<br />
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।<br />
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।<br />
  तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।<br />
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।<br />
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।<br />
बचन सुनत  कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।<br />
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।<br />
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।<br />
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।<br />
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।<br />
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।<br />
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।<br />
दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।<br />
   अट्टहास करि गर्जéा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।<br />
 --*--*--<br />
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।<br />
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।<br />
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।<br />
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।<br />
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।<br />
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।<br />
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।<br />
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।<br />
दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।<br />
   जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।<br />
 --*--*--<br />
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।<br />
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।<br />
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।<br />
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।<br />
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।<br />
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।<br />
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।<br />
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।<br />
दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।<br />
    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।<br />
 --*--*--<br />
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।<br />
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।<br />
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।<br />
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।<br />
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।<br />
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।<br />
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।<br />
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।<br />
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।<br />
   सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।<br />
 --*--*--<br />
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।<br />
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।<br />
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।<br />
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।<br />
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।<br />
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।<br />
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।<br />
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।<br />
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।<br />
   पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।<br />
 --*--*--<br />
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।<br />
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।<br />
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।<br />
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।<br />
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।<br />
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।<br />
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।<br />
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।<br />
दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।<br />
   लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।<br />
 --*--*--<br />
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।<br />
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।<br />
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।<br />
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।<br />
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।<br />
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।<br />
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।<br />
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।<br />
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।<br />
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।<br />
   बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।<br />
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।<br />
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।<br />
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।<br />
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।<br />
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।<br />
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।<br />
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।<br />
दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।<br />
   चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।<br />
 --*--*--<br />
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।<br />
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।<br />
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।<br />
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।<br />
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।<br />
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।<br />
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।<br />
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।<br />
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।<br />
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।<br />
    तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।<br />
 --*--*--<br />
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।<br />
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।<br />
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।<br />
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।<br />
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।<br />
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।<br />
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।<br />
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।<br />
दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।<br />
   नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।<br />
 --*--*--<br />
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।<br />
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।<br />
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।<br />
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।<br />
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।<br />
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।<br />
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।<br />
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।<br />
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।<br />
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।<br />
छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।<br />
   मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।<br />
   कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।<br />
   जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।<br />
   सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।<br />
   गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।<br />
   रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।<br />
   जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।<br />
दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।<br />
   जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।<br />
 --*--*--<br />
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।<br />
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।<br />
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।<br />
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।<br />
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।<br />
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।<br />
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।<br />
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।<br />
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।<br />
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।<br />
दो0--राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।<br />
    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।<br />
 --*--*--<br />
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।<br />
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।<br />
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।<br />
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।<br />
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।<br />
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।<br />
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।<br />
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।<br />
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।<br />
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।<br />
   राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।<br />
 --*--*--<br />
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।<br />
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।<br />
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।<br />
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।<br />
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।<br />
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।<br />
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।<br />
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।<br />
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।<br />
    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।<br />
 --*--*--<br />
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।<br />
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।<br />
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।<br />
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।<br />
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।<br />
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।<br />
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।<br />
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।<br />
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।<br />
   परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।<br />
   मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।<br />
   तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।<br />
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।<br />
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।<br />
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।<br />
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।<br />
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।<br />
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।<br />
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।<br />
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।<br />
   सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।<br />
 --*--*--<br />
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।<br />
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।<br />
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।<br />
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।<br />
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।<br />
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।<br />
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।<br />
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।<br />
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।<br />
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।<br />
   मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।<br />
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।<br />
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।<br />
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।<br />
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।<br />
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।<br />
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।<br />
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।<br />
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।<br />
    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।<br />
 --*--*--<br />
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।<br />
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।<br />
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।<br />
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।<br />
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।<br />
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।<br />
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।<br />
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।<br />
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।<br />
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।<br />
   ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।<br />
 --*--*--<br />
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।<br />
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।<br />
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।<br />
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।<br />
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।<br />
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।<br />
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।<br />
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।<br />
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।<br />
   जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।<br />
 --*--*--<br />
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।<br />
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।<br />
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।<br />
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।<br />
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।<br />
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।<br />
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।<br />
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।<br />
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।<br />
   त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।<br />
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।<br />
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।<br />
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।<br />
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।<br />
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।<br />
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।<br />
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।<br />
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।<br />
   जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।<br />
 --*--*--<br />
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।<br />
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।<br />
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।<br />
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।<br />
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।<br />
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।<br />
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।<br />
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।<br />
दो0--अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।<br />
    देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।<br />
 --*--*--<br />
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।<br />
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।<br />
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।<br />
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।<br />
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।<br />
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।<br />
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।<br />
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।<br />
दो0- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।<br />
    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।<br />
 --*--*--<br />
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।<br />
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।<br />
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।<br />
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।<br />
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।<br />
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।<br />
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।<br />
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।<br />
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।<br />
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।<br />
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।<br />
   जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।<br />
   जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।<br />
   सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।<br />
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।<br />
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।<br />
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।<br />
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।<br />
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।<br />
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।<br />
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।<br />
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।<br />
   बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।<br />
 --*--*--<br />
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।<br />
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।<br />
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।<br />
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।<br />
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।<br />
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।<br />
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।<br />
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।<br />
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।<br />
   प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।<br />
 --*--*--<br />
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।<br />
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।<br />
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।<br />
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।<br />
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।<br />
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।<br />
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।<br />
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।<br />
दो0-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।<br />
   सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।<br />
 --*--*--<br />
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।<br />
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।<br />
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।<br />
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।<br />
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।<br />
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।<br />
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।<br />
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।<br />
दो0--की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।<br />
    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।<br />
 --*--*--<br />
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।<br />
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।<br />
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।<br />
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।<br />
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।<br />
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।<br />
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।<br />
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।<br />
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।<br />
   दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।<br />
 --*--*--<br />
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।<br />
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।<br />
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।<br />
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।<br />
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।<br />
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।<br />
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।<br />
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।<br />
दो0--सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।<br />
    रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।<br />
 --*--*--<br />
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।<br />
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।<br />
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।<br />
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।<br />
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।<br />
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।<br />
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।<br />
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।<br />
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।<br />
दो0--बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।<br />
    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।<br />
    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।<br />
    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।<br />
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।<br />
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।<br />
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।<br />
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।<br />
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।<br />
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।<br />
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।<br />
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।<br />
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।<br />
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।<br />
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।<br />
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।<br />
   बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।<br />
 --*--*--<br />
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।<br />
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।<br />
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।<br />
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।<br />
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।<br />
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।<br />
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।<br />
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।<br />
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।<br />
   बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।<br />
 --*--*--<br />
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।<br />
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।<br />
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।<br />
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।<br />
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।<br />
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।<br />
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।<br />
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।<br />
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।<br />
    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।<br />
 --*--*--<br />
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।<br />
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।<br />
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।<br />
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।<br />
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।<br />
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।<br />
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।<br />
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।<br />
छं0-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।<br />
   यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।<br />
   सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।<br />
   तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।<br />
दो0-सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।<br />
   सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।<br />
           मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम<br />
                ~~~~~~~<br />
      इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने<br />
            पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।<br />
              (सुन्दरकाण्ड समाप्त)<br />
 --*--*-- </p>
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